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द्रोण पर्व · अध्याय 178

भीमसेन और अलायुध का युद्ध

राक्षस अलायुध के आने से कौरव हर्षित हो उठते हैं, और दुर्योधन उसे घटोत्कच के विरुद्ध भेजता है। अलायुध घटोत्कच को छोड़कर भीमसेन को ललकारता है और राक्षसों की सेना तथा भीम में युद्ध छिड़ जाता है; कृष्ण पाण्डव योद्धाओं को कर्ण और राक्षसों के विरुद्ध भेजते हैं। अलायुध भीम का धनुष काट देता है और उसके घोड़ों तथा सारथि को मार डालता है; तब दोनों गदा और घूँसों से भिड़ जाते हैं, और अन्त में कृष्ण घटोत्कच को भीम की रक्षा के लिए प्रेरित करते हैं।

अध्याय 177अध्याय-सूचीअध्याय 179

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.178.1)

तमागतमभिप्रेक्ष्य भीमकर्माणमाहवे । हर्षमाहारयाञ्चक्रुः कुरवः सर्व एव ते ॥

tamāgatamabhiprekṣya bhīmakarmāṇamāhave | harṣamāhārayāñcakruḥ kuravaḥ sarva eva te

युद्ध में भयंकर कर्म करने वाले उसे आया हुआ देखकर सभी कौरव हर्ष से भर उठे।

श्लोक 2 (7.178.2)

तथैव तव पुत्रास्ते दुर्योधनपुरोगमाः । अप्लुवाः प्लवमासाद्य तर्तुकामा इवार्णवम् ॥

tathaiva tava putrāste duryodhanapurogamāḥ | apluvāḥ plavamāsādya tartukāmā ivārṇavam

वैसे ही आपके पुत्र, जिनमें दुर्योधन आगे था, उन नावहीन लोगों के समान हो गए जिन्हें समुद्र पार करने की इच्छा होने पर नाव मिल गई हो।

श्लोक 3 (7.178.3)

पुनर्जातमिवात्मानं मन्वानाः पुरुषर्षभाः । अलायुधं राक्षसेन्द्रं स्वागतेनाभ्यपूजयन् ॥

punarjātamivātmānaṃ manvānāḥ puruṣarṣabhāḥ | alāyudhaṃ rākṣasendraṃ svāgatenābhyapūjayan

अपने को मानो फिर से जन्म पाया हुआ मानकर उन पुरुषश्रेष्ठों ने राक्षसराज अलायुध का स्वागत-वचनों से सत्कार किया।

श्लोक 4 (7.178.4)

तस्मिंस्त्वमानुषे युद्धे वर्तमाने महाभये । कर्णराक्षसयोर्नक्तं दारुणप्रतिदर्शने ॥

tasmiṃstvamānuṣe yuddhe vartamāne mahābhaye | karṇarākṣasayornaktaṃ dāruṇapratidarśane

जब रात में कर्ण और राक्षस के बीच वह अमानवीय, अत्यन्त भयंकर और देखने में दारुण युद्ध चल रहा था,

श्लोक 5 (7.178.5)

न द्रौणिर्न कृपद्रोणौ न शल्यो न च माधवः । एक एव तु तेनासीद्योद्धा कर्णो रणे वृषा ॥

na drauṇirna kṛpadroṇau na śalyo na ca mādhavaḥ | eka eva tu tenāsīdyoddhā karṇo raṇe vṛṣā

न द्रोणपुत्र, न कृप और द्रोण, न शल्य और न माधव कृतवर्मा; उसके सामने रण में लड़ने वाला योद्धा अकेला वृष कर्ण ही था।

श्लोक 6 (7.178.6)

उपप्रैक्षन्त पाञ्चालाः स्मयमानाः सराजकाः । व्यभ्रमंस्तावकाश्चापि घूर्णमानास्ततस्ततः ॥

upapraikṣanta pāñcālāḥ smayamānāḥ sarājakāḥ | vyabhramaṃstāvakāścāpi ghūrṇamānāstatastataḥ

पाञ्चाल अपने राजाओं सहित मुस्कराते हुए देखते रहे, और आपके सैनिक घबराकर इधर-उधर घूमते-भटकते रहे।

श्लोक 7 (7.178.7)

चुक्रुशुर्नेदमस्तीति द्रोणद्रौणिकृपादयः । तत्कर्म दृष्ट्वा सम्भ्रान्ता हैडिम्बस्य रणाजिरे ॥

cukruśurnedamastīti droṇadrauṇikṛpādayaḥ | tatkarma dṛṣṭvā sambhrāntā haiḍimbasya raṇājire

द्रोण, अश्वत्थामा, कृप आदि हिडिम्बा के पुत्र का वह कर्म रणभूमि में देखकर घबरा गए और चिल्ला उठे, "यह नहीं हो सकता!"

श्लोक 8 (7.178.8)

सर्वमाविग्नमभवद्धाहाभूतमचेतनम् । तव सैन्यं महाराज निराशं कर्णजीविते ॥

sarvamāvignamabhavaddhāhābhūtamacetanam | tava sainyaṃ mahārāja nirāśaṃ karṇajīvite

सब कुछ व्याकुल हो उठा, हाहाकार मच गया और सब लोग अचेत-से हो गए। हे महाराज, कर्ण के प्राणों के विषय में आपकी सेना निराश हो गई।

श्लोक 9 (7.178.9)

दुर्योधनस्तु सम्प्रेक्ष्य कर्णमार्तिं परां गतम् । अलायुधं राक्षसेन्द्रं समाहूयेदमब्रवीत् ॥

duryodhanastu samprekṣya karṇamārtiṃ parāṃ gatam | alāyudhaṃ rākṣasendraṃ samāhūyedamabravīt

कर्ण को घोर संकट में पड़ा देखकर दुर्योधन ने राक्षसराज अलायुध को बुलाकर उससे यह कहा।

दुर्योधन उवाच

श्लोक 10 (7.178.10)

एष वैकर्तनः कर्णो हैडिम्बेन समागतः । कुरुते कर्म सुमहद्यदस्यौपयिकं मृधे ॥

eṣa vaikartanaḥ karṇo haiḍimbena samāgataḥ | kurute karma sumahadyadasyaupayikaṃ mṛdhe

यह वैकर्तन कर्ण हिडिम्बा के पुत्र से भिड़ा हुआ है और युद्ध में वही महान् कर्म कर रहा है जो उसके योग्य है।

श्लोक 11 (7.178.11)

पश्यैतान्पार्थिवाञ्शूरान्निहतान्भैमसेनिना । नानाशस्त्रैरभिहतान्पादपानिव दन्तिना ॥

paśyaitānpārthivāñśūrānnihatānbhaimaseninā | nānāśastrairabhihatānpādapāniva dantinā

देखो, भीमसेन के पुत्र ने इन शूर राजाओं को मार गिराया है; नाना शस्त्रों से कटे हुए ये ऐसे पड़े हैं जैसे हाथी के गिराए हुए वृक्ष।

श्लोक 12 (7.178.12)

तवैष भारः समरे ज्ञातिमध्ये मया कृतः । तवैवानुमते वीर तं विक्रम्य निबर्हय ॥

tavaiṣa bhāraḥ samare jñātimadhye mayā kṛtaḥ | tavaivānumate vīra taṃ vikramya nibarhaya

हे वीर, यह भार मैंने समर में, तुम्हारे जाति-बन्धुओं के बीच, तुम पर डाला है, और तुम्हारी अपनी ही सम्मति से। पराक्रम दिखाकर उसे नष्ट कर दो।

श्लोक 13 (7.178.13)

पुरा वैकर्तनं कर्णमेष पापो घटोत्कचः । मायाबलं समाश्रित्य कर्षयत्यरिकर्शन ॥

purā vaikartanaṃ karṇameṣa pāpo ghaṭotkacaḥ | māyābalaṃ samāśritya karṣayatyarikarśana

हे शत्रुओं को सताने वाले, यह पापी घटोत्कच माया के बल का आश्रय लेकर बड़ी देर से वैकर्तन कर्ण को पीड़ा दे रहा है।

सञ्जय उवाच

श्लोक 14 (7.178.14)

एवमुक्तः स राज्ञा तु राक्षसो भीमविक्रमः । तथेत्युक्त्वा महाबाहुर्घटोत्कचमुपाद्रवत् ॥

evamuktaḥ sa rājñā tu rākṣaso bhīmavikramaḥ | tathetyuktvā mahābāhurghaṭotkacamupādravat

राजा के इस प्रकार कहने पर भयंकर पराक्रम वाले उस महाबाहु राक्षस ने "ऐसा ही हो" कहकर घटोत्कच पर धावा बोल दिया।

श्लोक 15 (7.178.15)

ततः कर्णं समुत्सृज्य भैमसेनिरपि प्रभो । प्रत्यमित्रमुपायान्तमर्दयामास मार्गणैः ॥

tataḥ karṇaṃ samutsṛjya bhaimasenirapi prabho | pratyamitramupāyāntamardayāmāsa mārgaṇaiḥ

तब, हे प्रभो, भीमसेन के पुत्र ने भी कर्ण को छोड़कर अपने सामने आते हुए शत्रु को बाणों से पीड़ित कर दिया।

श्लोक 16 (7.178.16)

तयोः समभवद्युद्धं क्रुद्धयो राक्षसेन्द्रयोः । मत्तयोर्वासिताहेतोर्द्विपयोरिव कानने ॥

tayoḥ samabhavadyuddhaṃ kruddhayo rākṣasendrayoḥ | mattayorvāsitāhetordvipayoriva kānane

क्रोध से भरे उन दोनों राक्षसराजों में वैसा ही युद्ध छिड़ गया जैसा वन में हथिनी के कारण दो मतवाले हाथियों में होता है।

श्लोक 17 (7.178.17)

रक्षसा विप्रमुक्तस्तु कर्णोऽपि रथिनां वरः । अभ्यद्रवद्भीमसेनं रथेनादित्यवर्चसा ॥

rakṣasā vipramuktastu karṇo'pi rathināṃ varaḥ | abhyadravadbhīmasenaṃ rathenādityavarcasā

राक्षस से छूटा हुआ रथियों में श्रेष्ठ कर्ण भी सूर्य के समान तेजस्वी रथ पर चढ़कर भीमसेन पर टूट पड़ा।

श्लोक 18 (7.178.18)

तमायान्तमनादृत्य दृष्ट्वा ग्रस्तं घटोत्कचम् । अलायुधेन समरे सिंहेनेव गवां पतिम् ॥

tamāyāntamanādṛtya dṛṣṭvā grastaṃ ghaṭotkacam | alāyudhena samare siṃheneva gavāṃ patim

आते हुए कर्ण की उपेक्षा करके, और घटोत्कच को युद्ध में अलायुध के चंगुल में वैसे ही फँसा देखकर जैसे सिंह के चंगुल में बैल,

श्लोक 19 (7.178.19)

रथेनादित्यवपुषा भीमः प्रहरतां वरः । किरञ्छरौघान्प्रययावलायुधरथं प्रति ॥

rathenādityavapuṣā bhīmaḥ praharatāṃ varaḥ | kirañcharaughānprayayāvalāyudharathaṃ prati

प्रहार करने वालों में श्रेष्ठ भीम सूर्य के समान दीप्तिमान रथ पर बैठकर बाणों की झड़ी लगाते हुए अलायुध के रथ की ओर चल पड़ा।

श्लोक 20 (7.178.20)

तमायान्तमभिप्रेक्ष्य स तदाऽलायुधः प्रभो । घटोत्कचं समुत्सृज्य भीमसेनं समाह्वयत् ॥

tamāyāntamabhiprekṣya sa tadā'lāyudhaḥ prabho | ghaṭotkacaṃ samutsṛjya bhīmasenaṃ samāhvayat

उसे आता देखकर अलायुध ने, हे प्रभो, घटोत्कच को छोड़ दिया और भीमसेन को ललकारा।

श्लोक 21 (7.178.21)

तं भीमः सहसाऽभ्येत्य राक्षसान्तकरः प्रभो । सगणं राक्षसेन्द्रं तं शरवर्षैरवाकिरत् ॥

taṃ bhīmaḥ sahasā'bhyetya rākṣasāntakaraḥ prabho | sagaṇaṃ rākṣasendraṃ taṃ śaravarṣairavākirat

राक्षसों का संहार करने वाले भीम ने, हे प्रभो, सहसा उसके पास पहुँचकर उस राक्षसराज को उसके दल-सहित बाणों की वर्षा से ढक दिया।

श्लोक 22 (7.178.22)

तथैवालायुधो राजञ्शिलाधौतैरजिह्मगैः । अभ्यवर्षत कौन्तेयं पुनःपुनररिन्दम ॥

tathaivālāyudho rājañśilādhautairajihmagaiḥ | abhyavarṣata kaunteyaṃ punaḥpunararindama

उसी प्रकार, हे राजन्, हे शत्रुदमन, अलायुध ने भी पत्थर पर तेज किए हुए सीधे जाने वाले बाणों की वर्षा कुन्तीपुत्र पर बार-बार की।

श्लोक 23 (7.178.23)

तथा ते राक्षसाः सर्वे भीमसेनमुपाद्रवन् । नानाप्रहरणा भीमास्त्वत्सुतानां जयैषिणः ॥

tathā te rākṣasāḥ sarve bhīmasenamupādravan | nānāpraharaṇā bhīmāstvatsutānāṃ jayaiṣiṇaḥ

तब वे सभी भयंकर राक्षस, जो नाना प्रकार के शस्त्र लिए हुए आपके पुत्रों की विजय चाहते थे, भीमसेन पर टूट पड़े।

श्लोक 24 (7.178.24)

स ताड्यमानो बहुभिर्भीमसेनो महाबलः । पञ्चभिः पञ्चभिः सर्वांस्तानविध्यच्छितैः शरैः ॥

sa tāḍyamāno bahubhirbhīmaseno mahābalaḥ | pañcabhiḥ pañcabhiḥ sarvāṃstānavidhyacchitaiḥ śaraiḥ

बहुतों के प्रहार सहते हुए महाबली भीमसेन ने उन सबको पाँच-पाँच तीखे बाणों से बींध डाला।

श्लोक 25 (7.178.25)

ते वध्यमाना भीमेन राक्षसाः क्रूरबुद्धयः । विनेदुस्तुमुलान्नादान्दुद्रुवुस्ते दिशो दश ॥

te vadhyamānā bhīmena rākṣasāḥ krūrabuddhayaḥ | vinedustumulānnādāndudruvuste diśo daśa

भीम के प्रहारों से मरते हुए वे क्रूर विचार वाले राक्षस भयंकर चीत्कार करते हुए दसों दिशाओं में भाग गए।

श्लोक 26 (7.178.26)

तांस्त्रास्यमानान्भीमेन दृष्ट्वा रक्षो महाबलम् । अभिदुद्राव वेगेन शरैश्चैनमवाकिरत् ॥

tāṃstrāsyamānānbhīmena dṛṣṭvā rakṣo mahābalam | abhidudrāva vegena śaraiścainamavākirat

भीम से उन्हें भयभीत होते देखकर वह महाबली राक्षस वेग से उसकी ओर दौड़ा और उसे बाणों से ढक दिया।

श्लोक 27 (7.178.27)

तं भीमसेनः समरे तीक्ष्णाग्रैरक्षिणोच्छरैः ॥

taṃ bhīmasenaḥ samare tīkṣṇāgrairakṣiṇoccharaiḥ

भीमसेन ने युद्ध में तीखी नोक वाले बाणों से उसे घायल कर दिया।

श्लोक 28 (7.178.28)

अलायुधस्तु तानस्तान्भीमेन विशिखान्रणे । चिच्छेद कांश्चित्समरे त्वरया कांश्चिदग्रहीत् ॥

alāyudhastu tānastānbhīmena viśikhānraṇe | ciccheda kāṃścitsamare tvarayā kāṃścidagrahīt

परन्तु अलायुध ने युद्ध में भीम के छोड़े हुए उन बाणों में से कुछ को काट डाला और कुछ को शीघ्रता से हाथ में पकड़ लिया।

श्लोक 29 (7.178.29)

स तं दृष्ट्वा राक्षसेन्द्रं भीमो भीमपराक्रमः । गदां चिक्षेप वेगेन वज्रपातोपमां तदा ॥

sa taṃ dṛṣṭvā rākṣasendraṃ bhīmo bhīmaparākramaḥ | gadāṃ cikṣepa vegena vajrapātopamāṃ tadā

उस राक्षसराज को देखकर भयंकर पराक्रमी भीम ने वज्र के गिरने के समान अपनी गदा वेग से उस पर फेंकी।

श्लोक 30 (7.178.30)

तामापतन्तीं वेगेन गदां ज्वालाकुलां ततः । गदया ताडयामास सा गदा भीममाव्रजत् ॥

tāmāpatantīṃ vegena gadāṃ jvālākulāṃ tataḥ | gadayā tāḍayāmāsa sā gadā bhīmamāvrajat

वह ज्वालाओं से घिरी गदा बड़े वेग से आ रही थी; अलायुध ने उसे अपनी गदा से मारा, और वह गदा भीम की ओर लौट गई।

श्लोक 31 (7.178.31)

स राक्षसेन्द्रं कौन्तेयः शरवर्षैरवाकिरत् । तानप्यस्याकरोन्मोघान्राक्षसो निशितैः शरैः ॥

sa rākṣasendraṃ kaunteyaḥ śaravarṣairavākirat | tānapyasyākaronmoghānrākṣaso niśitaiḥ śaraiḥ

कुन्तीपुत्र ने राक्षसराज को बाणों की वर्षा से ढक दिया, पर राक्षस ने अपने तीखे बाणों से उन्हें भी व्यर्थ कर दिया।

श्लोक 32 (7.178.32)

ते चापि राक्षसाः सर्वे रजन्यां भीमरूपिणः । शासनाद्राक्षसेन्द्रस्य निजघ्नू रथकुञ्जरान् ॥

te cāpi rākṣasāḥ sarve rajanyāṃ bhīmarūpiṇaḥ | śāsanādrākṣasendrasya nijaghnū rathakuñjarān

वे सभी भयानक रूप वाले राक्षस भी रात में राक्षसराज की आज्ञा से रथों और हाथियों को मारने लगे।

श्लोक 33 (7.178.33)

पाञ्चालाः सृञ्जयाश्चैव वाजिनः परमद्विपाः । न शान्तिं लेभिरे तत्र राक्षसैर्भृशपीडिताः ॥

pāñcālāḥ sṛñjayāścaiva vājinaḥ paramadvipāḥ | na śāntiṃ lebhire tatra rākṣasairbhṛśapīḍitāḥ

पाञ्चाल, सृञ्जय, घोड़े और बड़े-बड़े हाथी राक्षसों से अत्यन्त पीड़ित होकर वहाँ चैन न पा सके।

श्लोक 34 (7.178.34)

तं तु दृष्ट्वा महाघोरं वर्तमानं महाहवम् । अब्रवीत्पुण्डरीकाक्षो धनञ्जयमिदं वचः ॥

taṃ tu dṛṣṭvā mahāghoraṃ vartamānaṃ mahāhavam | abravītpuṇḍarīkākṣo dhanañjayamidaṃ vacaḥ

उस अत्यन्त भयंकर महायुद्ध को चलता देखकर कमलनयन कृष्ण ने धनञ्जय से यह वचन कहा।

वासुदेव उवाच

श्लोक 35 (7.178.35)

पश्य भीमं महाबाहुं राक्षसेन्द्रवशं गतम् । पदमस्यानुगच्छ त्वं मा विचारय पाण्डव ॥

paśya bhīmaṃ mahābāhuṃ rākṣasendravaśaṃ gatam | padamasyānugaccha tvaṃ mā vicāraya pāṇḍava

देखो, महाबाहु भीम राक्षसराज के वश में पड़ गया है। हे पाण्डव, तुम उसके पीछे-पीछे जाओ, सोच-विचार मत करो।

श्लोक 36 (7.178.36)

धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च युधामन्यूत्तमौजसौ । सहितौ द्रौपदेयाश्च कर्णं यान्तु महारथाः ॥

dhṛṣṭadyumnaḥ śikhaṇḍī ca yudhāmanyūttamaujasau | sahitau draupadeyāśca karṇaṃ yāntu mahārathāḥ

धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, युधामन्यु और उत्तमौजा तथा द्रौपदी के पुत्र, ये महारथी साथ मिलकर कर्ण पर चढ़ाई करें।

श्लोक 37 (7.178.37)

नकुलः सहदेवश्च युयुधानश्च वीर्यवान् । इतरान्राक्षसान्घ्नन्तु शासनात्तव पाण्डव ॥

nakulaḥ sahadevaśca yuyudhānaśca vīryavān | itarānrākṣasānghnantu śāsanāttava pāṇḍava

हे पाण्डव, नकुल, सहदेव और पराक्रमी युयुधान तुम्हारी आज्ञा से दूसरे राक्षसों को मारें।

श्लोक 38 (7.178.38)

त्वमपीमां महाबाहो चमूं द्रोणपुरस्कृताम् । मारयस्व नरव्याघ्र महद्धि भयमागतम् ॥

tvamapīmāṃ mahābāho camūṃ droṇapuraskṛtām | mārayasva naravyāghra mahaddhi bhayamāgatam

हे महाबाहो, हे नरव्याघ्र, तुम भी द्रोण को आगे रखने वाली इस सेना का संहार करो; बड़ा भय आ पहुँचा है।

सञ्जय उवाच

श्लोक 39 (7.178.39)

एवमुक्ते तु कृष्णेन यथोद्दिष्टा महारथाः । जग्मुर्वैकर्तनं कर्णं राक्षसांश्चैव तान्रणे ॥

evamukte tu kṛṣṇena yathoddiṣṭā mahārathāḥ | jagmurvaikartanaṃ karṇaṃ rākṣasāṃścaiva tānraṇe

कृष्ण के ऐसा कहने पर जिन महारथियों को जैसा बताया गया था, वे युद्ध में वैकर्तन कर्ण और उन राक्षसों की ओर चल पड़े।

श्लोक 40 (7.178.40)

अथ पूर्णायतोत्सृष्टैः शरैराशीविषोपमैः । धनुश्चिच्छेद भीमस्य राक्षसेन्द्रः प्रतापवान् ॥

atha pūrṇāyatotsṛṣṭaiḥ śarairāśīviṣopamaiḥ | dhanuściccheda bhīmasya rākṣasendraḥ pratāpavān

तब पराक्रमी राक्षसराज ने पूरी तरह खींचकर छोड़े हुए विषधर सर्पों जैसे बाणों से भीम का धनुष काट डाला।

श्लोक 41 (7.178.41)

हयांश्चास्य शितैर्बाणैः सारथिं च महाबलः । जघान मिषतः सङ्ख्ये भीमसेनस्य राक्षसः ॥

hayāṃścāsya śitairbāṇaiḥ sārathiṃ ca mahābalaḥ | jaghāna miṣataḥ saṅkhye bhīmasenasya rākṣasaḥ

और उस महाबली राक्षस ने भीमसेन के देखते-देखते युद्ध में तीखे बाणों से उसके घोड़ों और सारथि को मार डाला।

श्लोक 42 (7.178.42)

सोऽवतीर्य रथोपस्थाद्धताश्वो हतसारथिः । तस्मै गुर्वीं गदां घोरां विनदन्नुत्ससर्ज ह ॥

so'vatīrya rathopasthāddhatāśvo hatasārathiḥ | tasmai gurvīṃ gadāṃ ghorāṃ vinadannutsasarja ha

घोड़े और सारथि के मारे जाने पर भीम रथ के आसन से कूद पड़ा और गरजते हुए उस पर भारी, भयंकर गदा फेंकी।

श्लोक 43 (7.178.43)

ततस्तां भीमनिर्घोषामापतन्तीं महागदाम् । गदया राक्षसो घोरो निजघान ननाद च ॥

tatastāṃ bhīmanirghoṣāmāpatantīṃ mahāgadām | gadayā rākṣaso ghoro nijaghāna nanāda ca

भीषण नाद करती हुई आती उस महागदा को भयंकर राक्षस ने अपनी गदा से मार गिराया और गर्जना की।

श्लोक 44 (7.178.44)

तद्दृष्ट्वा राक्षसेन्द्रस्य घोरं कर्म भयावहम् । भीमसेनः प्रहृष्टात्मा गदामाशु परामृशत् ॥

taddṛṣṭvā rākṣasendrasya ghoraṃ karma bhayāvaham | bhīmasenaḥ prahṛṣṭātmā gadāmāśu parāmṛśat

राक्षसराज का वह घोर और भयावह कर्म देखकर भीमसेन ने प्रसन्न मन से शीघ्र ही गदा उठा ली।

श्लोक 45 (7.178.45)

तयोः समभवद्युद्धं तुमुलं नररक्षसोः । गदानिपातसंहादैर्भुवं कम्पयतोर्भृशम् ॥

tayoḥ samabhavadyuddhaṃ tumulaṃ nararakṣasoḥ | gadānipātasaṃhādairbhuvaṃ kampayatorbhṛśam

मनुष्य और राक्षस में भयंकर युद्ध होने लगा; उनकी गदाओं के प्रहारों की गड़गड़ाहट से धरती बुरी तरह काँप उठी।

श्लोक 46 (7.178.46)

गदाविमुक्तौ तौ भूयः समासाद्येतरेतरम् । मुष्टिभिर्वज्रसंहादैरन्योन्यमभिजघ्नतुः ॥

gadāvimuktau tau bhūyaḥ samāsādyetaretaram | muṣṭibhirvajrasaṃhādairanyonyamabhijaghnatuḥ

गदाएँ छूट जाने पर वे दोनों फिर एक-दूसरे से भिड़ गए और वज्र के समान गड़गड़ाते घूँसों से परस्पर प्रहार करने लगे।

श्लोक 47 (7.178.47)

रथचक्रैर्युगैरक्षैरधिष्ठानैरुपस्करैः । यथासन्नमुपादाय निजघ्नतुरमर्षणौ ॥

rathacakrairyugairakṣairadhiṣṭhānairupaskaraiḥ | yathāsannamupādāya nijaghnaturamarṣaṇau

जो-जो पास में मिला, रथ के पहिये, जुए, धुरे, आसन और साज-सामान, वही उठाकर वे दोनों क्रोधी योद्धा एक-दूसरे को मारने लगे।

श्लोक 48 (7.178.48)

तौ विक्षरन्तौ रुधिरं समासाद्येतरेतरम् । मत्ताविव महानागौ चकृषाते पुनः पुनः ॥

tau vikṣarantau rudhiraṃ samāsādyetaretaram | mattāviva mahānāgau cakṛṣāte punaḥ punaḥ

रक्त बहाते हुए वे बार-बार एक-दूसरे से भिड़े और मतवाले दो विशाल हाथियों की तरह एक-दूसरे को खींचते रहे।

श्लोक 49 (7.178.49)

तावपश्यद्वृषीकेशः पाण्डवानां हिते रतः । स भीमसेनरक्षार्थं हैडिम्बिं पर्यचोदयत् ॥

tāvapaśyadvṛṣīkeśaḥ pāṇḍavānāṃ hite rataḥ | sa bhīmasenarakṣārthaṃ haiḍimbiṃ paryacodayat

पाण्डवों के हित में लगे हृषीकेश कृष्ण ने उन दोनों को देखा और भीमसेन की रक्षा के लिए हिडिम्बा के पुत्र को प्रेरित किया।

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