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द्रोण पर्व · अध्याय 179

घटोत्कच द्वारा अलायुध का वध

कृष्ण घटोत्कच से कर्ण को छोड़कर भीम को जकड़े हुए अलायुध को मारने को कहते हैं। दोनों राक्षस परिघों, गदाओं, मायाओं, पत्थरों की वर्षा, उखाड़े हुए वृक्षों और पर्वत-शिखरों से लड़ते हैं, और अन्त में खड्गों तथा भुजाओं से भिड़ जाते हैं। घटोत्कच अलायुध को घुमाकर पटक देता है, उसका सिर काट लेता है और उसे दुर्योधन के सामने फेंक देता है; पाण्डव पक्ष विजय के नगाड़े और शंख बजाता है।

अध्याय 178अध्याय-सूचीअध्याय 180

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.179.1)

संदृश्य समरे भीमं रक्षसा ग्रस्तमन्तिकात् । वासुदेवोऽव्रवीद्राजन्घटोत्कचमिदं वचः ॥

saṃdṛśya samare bhīmaṃ rakṣasā grastamantikāt | vāsudevo'vravīdrājanghaṭotkacamidaṃ vacaḥ

युद्ध में भीम को राक्षस के हाथों पास ही जकड़ा हुआ देखकर वासुदेव ने, हे राजन्, घटोत्कच से यह वचन कहा।

वासुदेव उवाच

श्लोक 2 (7.179.2)

पश्य भीमं महाबाहो रक्षसा ग्रस्तमाहवे । पश्यतां सर्वसैन्यानां तव चैव महाद्युते ॥

paśya bhīmaṃ mahābāho rakṣasā grastamāhave | paśyatāṃ sarvasainyānāṃ tava caiva mahādyute

देखो, हे महाबाहो, भीम को युद्ध में राक्षस ने जकड़ रखा है, सारी सेनाओं के और तुम्हारे भी देखते-देखते, हे महातेजस्वी।

श्लोक 3 (7.179.3)

स कर्णं त्वं समुत्सृज्य राक्षसेन्द्रमलायुधम् । जहि क्षिप्रं महाबाहो पश्चात्कर्णं वधिष्यसि ॥

sa karṇaṃ tvaṃ samutsṛjya rākṣasendramalāyudham | jahi kṣipraṃ mahābāho paścātkarṇaṃ vadhiṣyasi

हे महाबाहो, कर्ण को छोड़कर पहले राक्षसराज अलायुध को शीघ्र मार डालो; उसके बाद कर्ण को मारोगे।

सञ्जय उवाच

श्लोक 4 (7.179.4)

स वार्ष्णेयवचः श्रुत्वा कर्णमुत्सृज्य वीर्यवान् । युयुधे राक्षसेन्द्रेण बकभ्रात्रा घटोत्कचः ॥

sa vārṣṇeyavacaḥ śrutvā karṇamutsṛjya vīryavān | yuyudhe rākṣasendreṇa bakabhrātrā ghaṭotkacaḥ

वृष्णिवंशी कृष्ण की बात सुनकर पराक्रमी घटोत्कच ने कर्ण को छोड़ दिया और बक के भाई राक्षसराज अलायुध से युद्ध किया।

श्लोक 5 (7.179.5)

तयोः सुतुमुलं युद्धं बभूव निशि रक्षसोः । अलायुधस्य चैवोग्रं हेडिम्बेश्चापि भारत ॥

tayoḥ sutumulaṃ yuddhaṃ babhūva niśi rakṣasoḥ | alāyudhasya caivograṃ heḍimbeścāpi bhārata

रात में उन दोनों राक्षसों के बीच बड़ा भयंकर युद्ध हुआ, अलायुध का और हिडिम्बा के पुत्र का वह उग्र संग्राम, हे भारत।

श्लोक 6 (7.179.6)

अलायुधस्य योधांश्च राक्षसान्भीमदर्शनान् । वेगेनापततः शूरान्प्रगृहीतशरासनान् ॥

alāyudhasya yodhāṃśca rākṣasānbhīmadarśanān | vegenāpatataḥ śūrānpragṛhītaśarāsanān

अलायुध के योद्धाओं को, भयंकर रूप वाले उन शूर राक्षसों को, जो धनुष हाथ में लिए वेग से टूट पड़ रहे थे,

श्लोक 7 (7.179.7)

आत्तायुधः सुसङ्क्रुद्धो युयुधानो महारथः । नकुलः सहदेवश्च चिच्छिदुर्निशितैः शरैः ॥

āttāyudhaḥ susaṅkruddho yuyudhāno mahārathaḥ | nakulaḥ sahadevaśca cicchidurniśitaiḥ śaraiḥ

शस्त्र उठाए अत्यन्त क्रुद्ध महारथी युयुधान ने तथा नकुल और सहदेव ने तीखे बाणों से काट डाला।

श्लोक 8 (7.179.8)

सर्वांश्च समरे राजन्किरीटी क्षत्रियर्षभान् । परिचिक्षेप बीभत्सुः सर्वतः प्रकिरञ्छरान् ॥

sarvāṃśca samare rājankirīṭī kṣatriyarṣabhān | paricikṣepa bībhatsuḥ sarvataḥ prakirañcharān

और हे राजन्, किरीटी बीभत्सु ने समर में उन सभी क्षत्रियश्रेष्ठों को सब ओर बाण बरसाते हुए घेर लिया।

श्लोक 9 (7.179.9)

कर्णश्च समरे राजन्व्यद्रावयत पार्थिवान् । धृष्टद्युम्नशिखण्ड्यादीन्पाञ्चालानां महारथान् ॥

karṇaśca samare rājanvyadrāvayata pārthivān | dhṛṣṭadyumnaśikhaṇḍyādīnpāñcālānāṃ mahārathān

और हे राजन्, कर्ण ने समर में राजाओं को, धृष्टद्युम्न, शिखण्डी आदि पाञ्चालों के महारथियों को, खदेड़ दिया।

श्लोक 10 (7.179.10)

तान्वध्यमानान्दृष्ट्वाऽथ भीमो भीमपराक्रमः । अभ्ययात्त्वरितः कर्णं विशिखान्प्रकिरन्रणे ॥

tānvadhyamānāndṛṣṭvā'tha bhīmo bhīmaparākramaḥ | abhyayāttvaritaḥ karṇaṃ viśikhānprakiranraṇe

उन्हें मार खाते देखकर भयंकर पराक्रमी भीम बड़ी शीघ्रता से रण में बाण बिखेरता हुआ कर्ण की ओर बढ़ा।

श्लोक 11 (7.179.11)

ततस्तेऽप्याययुर्हत्वा राक्षसान्यत्र सूतजः । नकुलः सहदेवश्च सात्यकिश्च महारथः । ते कर्णे योधयामासुः पाञ्चाला द्रोणमेव तु ॥

tataste'pyāyayurhatvā rākṣasānyatra sūtajaḥ | nakulaḥ sahadevaśca sātyakiśca mahārathaḥ | te karṇe yodhayāmāsuḥ pāñcālā droṇameva tu

तब वे भी राक्षसों को मारकर वहाँ आ पहुँचे जहाँ सूतपुत्र था: नकुल, सहदेव और महारथी सात्यकि। उन्होंने कर्ण से युद्ध किया, और पाञ्चालों ने द्रोण से।

श्लोक 12 (7.179.12)

अलायुधस्तु सङ्क्रुद्धो घटोत्कचमरिन्दमम् । परिघेणातिकायेन ताडयामास मूर्धनि ॥

alāyudhastu saṅkruddho ghaṭotkacamarindamam | parigheṇātikāyena tāḍayāmāsa mūrdhani

क्रोध से भरे अलायुध ने शत्रुदमन घटोत्कच के सिर पर विशाल परिघ से प्रहार किया।

श्लोक 13 (7.179.13)

स तु तेन प्रहारेण भैमसेनिर्महाबलः । ईषन्मूर्छितमात्मानमस्तम्भयत वीर्यवान् ॥

sa tu tena prahāreṇa bhaimasenirmahābalaḥ | īṣanmūrchitamātmānamastambhayata vīryavān

उस प्रहार से महाबली भीमपुत्र कुछ अचेत-सा हो गया, पर उस वीर ने अपने को सँभाल लिया।

श्लोक 14 (7.179.14)

ततो दीप्ताग्निसङ्काशां शतघण्टामलङ्कृताम् । चिक्षेप तस्मै समरे गदां काञ्चनभूषिताम् ॥

tato dīptāgnisaṅkāśāṃ śataghaṇṭāmalaṅkṛtām | cikṣepa tasmai samare gadāṃ kāñcanabhūṣitām

तब उसने समर में उस पर सैकड़ों घण्टियों से सजी, अग्नि के समान जलती हुई, सोने से मढ़ी गदा फेंकी।

श्लोक 15 (7.179.15)

सा हयांश्च रथं चास्य सारथिं च महास्वना । चूर्णयामास वेगेन विसृष्टा भीमकर्मणा ॥

sā hayāṃśca rathaṃ cāsya sārathiṃ ca mahāsvanā | cūrṇayāmāsa vegena visṛṣṭā bhīmakarmaṇā

भयंकर कर्म करने वाले के फेंकने पर उस भारी आवाज़ करती गदा ने उसके घोड़ों, रथ और सारथि को पल भर में चूर-चूर कर दिया।

श्लोक 16 (7.179.16)

स भग्नहयचक्राक्षाद्विशीर्णध्वजकूबरात् । उत्पपात रथात्तूर्णं मायामास्थाय राक्षसीम् ॥

sa bhagnahayacakrākṣādviśīrṇadhvajakūbarāt | utpapāta rathāttūrṇaṃ māyāmāsthāya rākṣasīm

घोड़े, पहिये और धुरे टूट जाने तथा ध्वजा और रथ का अगला भाग बिखर जाने पर वह राक्षसी माया का आश्रय लेकर तुरन्त रथ से उछल पड़ा।

श्लोक 17 (7.179.17)

स समास्थाय मायां तु ववर्ष रुधिरं बहु । विद्युद्विभ्राजितं चासीत्तुमुलाभ्राकुलं नभः ॥

sa samāsthāya māyāṃ tu vavarṣa rudhiraṃ bahu | vidyudvibhrājitaṃ cāsīttumulābhrākulaṃ nabhaḥ

माया का आश्रय लेकर उसने बहुत रक्त बरसाया; आकाश बिजली से चमक उठा और घनघोर बादलों से भर गया।

श्लोक 18 (7.179.18)

ततो वज्रनिपाताश्च साशनिस्तनयित्नवः । महांश्चटचटाशब्दस्तत्रासीच्च महाहवे ॥

tato vajranipātāśca sāśanistanayitnavaḥ | mahāṃścaṭacaṭāśabdastatrāsīcca mahāhave

तब वज्र गिरे, उल्काएँ और गर्जन हुए, और उस महायुद्ध में चटचट की बड़ी ध्वनि होने लगी।

श्लोक 19 (7.179.19)

तां प्रेक्ष्य महतीं मायां राक्षसो राक्षसस्य च । ऊर्ध्वमुत्पत्य हैडिम्बिस्तां मायां माययाऽवधीत् ॥

tāṃ prekṣya mahatīṃ māyāṃ rākṣaso rākṣasasya ca | ūrdhvamutpatya haiḍimbistāṃ māyāṃ māyayā'vadhīt

राक्षस की उस विशाल माया को देखकर हिडिम्बा के पुत्र राक्षस ने ऊपर उछलकर उस माया को माया से ही नष्ट कर दिया।

श्लोक 20 (7.179.20)

सोऽभिवीक्ष्य हतां मायां मायावी माययैव हि । अश्मवर्षं सुतुमुलं विससर्ज घटोत्कचे ॥

so'bhivīkṣya hatāṃ māyāṃ māyāvī māyayaiva hi | aśmavarṣaṃ sutumulaṃ visasarja ghaṭotkace

अपनी माया को माया से ही नष्ट हुआ देखकर उस मायावी ने घटोत्कच पर पत्थरों की भीषण वर्षा की।

श्लोक 21 (7.179.21)

अश्मवर्षं स तं घोरं शरवर्षेण वीर्यवान् । दिक्षु विध्वंसयामास तदद्भुतमिवाभवत् ॥

aśmavarṣaṃ sa taṃ ghoraṃ śaravarṣeṇa vīryavān | dikṣu vidhvaṃsayāmāsa tadadbhutamivābhavat

उस भयंकर पत्थरों की वर्षा को उस पराक्रमी ने बाणों की वर्षा से सब दिशाओं में बिखेर दिया, और वह अद्भुत-सा दृश्य था।

श्लोक 22 (7.179.22)

ततो नानाप्रहरणैरन्योन्यमभिवर्षताम् । आयसैः परिघैः शूलैर्गदामुसलमुद्गरैः ॥

tato nānāpraharaṇairanyonyamabhivarṣatām | āyasaiḥ parighaiḥ śūlairgadāmusalamudgaraiḥ

तब एक-दूसरे पर नाना प्रकार के शस्त्र बरसाते हुए, लोहे के परिघों, शूलों, गदाओं, मूसलों और मुद्गरों से,

श्लोक 23 (7.179.23)

पिनाकैः करवालैश्च तोमरप्रासकम्पनैः । नाराचैर्निशितैर्भल्लैः शरैश्चक्रैः परश्वथैः ॥

pinākaiḥ karavālaiśca tomaraprāsakampanaiḥ | nārācairniśitairbhallaiḥ śaraiścakraiḥ paraśvathaiḥ

पिनाकों, तलवारों, तोमरों, प्रासों और कम्पनों, तीखे नाराचों, तीखे भल्लों, बाणों, चक्रों और कुल्हाड़ियों से,

श्लोक 24 (7.179.24)

अयोगुडैर्भिण्डिपालैर्गोशीर्षोलूखलैरपि । उत्पाटितैर्महाशाखैर्विविधैर्जगतीरुहैः ॥

ayoguḍairbhiṇḍipālairgośīrṣolūkhalairapi | utpāṭitairmahāśākhairvividhairjagatīruhaiḥ

लोहे के गोलों, भिन्दिपालों, गोशीर्षों और ऊखलों से, तथा उखाड़े हुए बड़ी शाखाओं वाले अनेक प्रकार के वृक्षों से,

श्लोक 25 (7.179.25)

शमीपीलूकदम्बैश्च चम्पकैश्चैव भारत । इङ्गुदैर्बदरीभिश्च कोविदारैश्च पुष्पितैः ॥

śamīpīlūkadambaiśca campakaiścaiva bhārata | iṅgudairbadarībhiśca kovidāraiśca puṣpitaiḥ

शमी, पीलु, कदम्ब और चम्पक के वृक्षों से, हे भारत, इङ्गुदी, बेर और फूले हुए कोविदार के वृक्षों से,

श्लोक 26 (7.179.26)

पलाशैश्चारिमेदैश्च प्लक्षन्यग्रोधपिप्पलैः । महद्भिः समरे तस्मिन्नन्योन्यमभिजघ्नतुः ॥

palāśaiścārimedaiśca plakṣanyagrodhapippalaiḥ | mahadbhiḥ samare tasminnanyonyamabhijaghnatuḥ

पलाश, अरिमेद, प्लक्ष, न्यग्रोध और पीपल के बड़े-बड़े वृक्षों से, उस युद्ध में वे दोनों एक-दूसरे को मारते रहे,

श्लोक 27 (7.179.27)

विपुलैः पर्वताग्रैश्च नानाधातुभिराचितैः । तेषां शब्दो महानासीद्वज्राणां भिद्यतामिव ॥

vipulaiḥ parvatāgraiśca nānādhātubhirācitaiḥ | teṣāṃ śabdo mahānāsīdvajrāṇāṃ bhidyatāmiva

और नाना धातुओं से भरे विशाल पर्वत-शिखरों से भी; उनका शब्द वज्रों के फटने के समान बहुत भारी था।

श्लोक 28 (7.179.28)

युद्धं समभवद्धोरं भैम्यलायुधयोर्नृप । हरीन्द्रयोर्यथा राजन्वालिसुग्रीवयोः पुरा ॥

yuddhaṃ samabhavaddhoraṃ bhaimyalāyudhayornṛpa | harīndrayoryathā rājanvālisugrīvayoḥ purā

हे राजन्, भीमपुत्र और अलायुध का वैसा ही भयंकर युद्ध हुआ जैसा पूर्वकाल में वानरराज वालि और सुग्रीव के बीच हुआ था।

श्लोक 29 (7.179.29)

तौ युद्ध्वा विविधैर्घोरैरायुधैर्विशिखैस्तथा । उत्सृज्य च शितौ खड्गावन्योन्यमभिपेततुः ॥

tau yuddhvā vividhairghorairāyudhairviśikhaistathā | utsṛjya ca śitau khaḍgāvanyonyamabhipetatuḥ

नाना प्रकार के भयंकर आयुधों और बाणों से लड़कर उन दोनों ने उन्हें छोड़ दिया और तीखे खड्ग लेकर एक-दूसरे पर टूट पड़े।

श्लोक 30 (7.179.30)

तावन्योन्यमभिद्रुत्य केशेषु सुमहाबलौ । भुजाभ्यां पर्यगृह्णीतां महाकायौ महाबलौ ॥

tāvanyonyamabhidrutya keśeṣu sumahābalau | bhujābhyāṃ paryagṛhṇītāṃ mahākāyau mahābalau

एक-दूसरे पर झपटकर उन दोनों अत्यन्त बलवान् विशालकाय योद्धाओं ने एक-दूसरे के केश पकड़ लिए और भुजाओं में जकड़ लिया।

श्लोक 31 (7.179.31)

तौ स्विन्नगात्रौ प्रस्वेदं सुस्रुवाते जनाधिप । रुधिरं च महाकायावतिवृष्टाविवाम्बुदौ ॥

tau svinnagātrau prasvedaṃ susruvāte janādhipa | rudhiraṃ ca mahākāyāvativṛṣṭāvivāmbudau

पसीने से भीगे अंगों वाले वे विशालकाय दोनों, हे जनाधिप, पसीना और रक्त बहा रहे थे, मानो मूसलाधार बरसते दो बादल हों।

श्लोक 32 (7.179.32)

अथाभिपत्य वेगेन समुद्भ्राम्य च राक्षसम् । बलेनाक्षिप्य हैडिम्बिश्चकर्तास्य शिरो महत् ॥

athābhipatya vegena samudbhrāmya ca rākṣasam | balenākṣipya haiḍimbiścakartāsya śiro mahat

तब हिडिम्बा के पुत्र ने झपटकर, उस राक्षस को घुमाकर और बल से पटककर उसका विशाल सिर काट डाला।

श्लोक 33 (7.179.33)

सोऽपहृत्य शिरस्तस्य कुण्डलाभ्यां विभूषितम् । तदा सुतुमुलं नादं ननाद सुमहाबलः ॥

so'pahṛtya śirastasya kuṇḍalābhyāṃ vibhūṣitam | tadā sutumulaṃ nādaṃ nanāda sumahābalaḥ

कुण्डलों से सजे उस सिर को उठाकर महाबली घटोत्कच ने भयंकर गर्जना की।

श्लोक 34 (7.179.34)

हतं दृष्ट्वा महाकायं बकज्ञातिमरिन्दमम् । पाञ्चालाः पाण्डवाश्चैव सिंहनादान्विनेदिरे ॥

hataṃ dṛṣṭvā mahākāyaṃ bakajñātimarindamam | pāñcālāḥ pāṇḍavāścaiva siṃhanādānvinedire

बक के उस विशालकाय सम्बन्धी, शत्रुदमन को मरा देखकर पाञ्चालों और पाण्डवों ने सिंहनाद किया।

श्लोक 35 (7.179.35)

ततो भेरीसहस्राणि शङ्खानामयुतानि च । अवादयन्पाण्डवेया राक्षसे निहते युधि ॥

tato bherīsahasrāṇi śaṅkhānāmayutāni ca | avādayanpāṇḍaveyā rākṣase nihate yudhi

तब उस राक्षस के युद्ध में मारे जाने पर पाण्डव पक्ष के लोगों ने हज़ारों भेरियाँ और दस-दस हज़ार शंख बजाए।

श्लोक 36 (7.179.36)

अतीव सा निशा तेषां बभूव विजयावहा । विद्योतमाना विबभौ समन्ताद्दीपमालिनी ॥

atīva sā niśā teṣāṃ babhūva vijayāvahā | vidyotamānā vibabhau samantāddīpamālinī

उनके लिए वह रात अत्यन्त विजय देने वाली हुई; दीपों की माला पहने वह चारों ओर जगमगाती हुई चमक उठी।

श्लोक 37 (7.179.37)

अलायुधस्य तु शिरो भैमसेनिर्महाबलः । दुर्योधनस्य प्रमुखे चिक्षेप गतचेतसः ॥

alāyudhasya tu śiro bhaimasenirmahābalaḥ | duryodhanasya pramukhe cikṣepa gatacetasaḥ

महाबली भीमपुत्र ने अलायुध का प्राणहीन सिर दुर्योधन के सामने फेंक दिया।

श्लोक 38 (7.179.38)

अथ दुर्योधनो राजा दृष्ट्वा हतमलायुधम् । बभूव परमोद्विग्नः सह सैन्येन भारत ॥

atha duryodhano rājā dṛṣṭvā hatamalāyudham | babhūva paramodvignaḥ saha sainyena bhārata

तब राजा दुर्योधन अलायुध को मरा देखकर अपनी सेना के साथ अत्यन्त उद्विग्न हो गया, हे भारत।

श्लोक 39 (7.179.39)

तेन ह्यस्य प्रतिज्ञातं भीमसेनमहं युधि । हन्तेति स्वयमागम्य स्मरता वैरमुत्तमम् ॥

tena hyasya pratijñātaṃ bhīmasenamahaṃ yudhi | hanteti svayamāgamya smaratā vairamuttamam

क्योंकि अलायुध ने उससे प्रतिज्ञा की थी, "मैं युद्ध में भीमसेन को मारूँगा", और अपने परम वैर को स्मरण करता हुआ वह स्वयं आया था।

श्लोक 40 (7.179.40)

ध्रुवं स तेन हन्तव्य इत्यमन्यत पार्थिवः । जीवितं चिरकालं भ्रातॄणां चाप्यमन्यत ॥

dhruvaṃ sa tena hantavya ityamanyata pārthivaḥ | jīvitaṃ cirakālaṃ bhrātṝṇāṃ cāpyamanyata

राजा ने निश्चय मान लिया था कि भीम उसी के हाथों मारा जाएगा, और अपने भाइयों का जीवन भी चिरकाल तक बना रहेगा, ऐसा समझ लिया था।

श्लोक 41 (7.179.41)

स तं दृष्ट्वा विनिहतं भीमसेनात्मजेन वै । प्रतिज्ञां भीमसेनस्य पूर्णामेवाभ्यमन्यत ॥

sa taṃ dṛṣṭvā vinihataṃ bhīmasenātmajena vai | pratijñāṃ bhīmasenasya pūrṇāmevābhyamanyata

उसे भीमसेन के पुत्र के हाथों मरा देखकर उसने भीमसेन की प्रतिज्ञा को पूरी हुई ही मान लिया।

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