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द्रोण पर्व · अध्याय 180

कर्ण द्वारा इन्द्र की शक्ति से घटोत्कच का वध

अलायुध को मारकर प्रसन्न घटोत्कच कर्ण पर चढ़ाई करता है और दोनों में बाणों की वर्षा होती है। कर्ण जब उस पर भारी नहीं पड़ता, तब घटोत्कच अदृश्य होकर कौरव सेना पर मायामय अस्त्रों की भयंकर वर्षा करता है, जिससे सेना भागने लगती है। कौरवों के आग्रह पर कर्ण इन्द्र की दी हुई शक्ति चलाता है; वह घटोत्कच को मार डालती है, और गिरते हुए अपने विशाल शरीर से वह एक अक्षौहिणी सेना को कुचल देता है। कौरव हर्षित होते हैं।

अध्याय 179अध्याय-सूचीअध्याय 181

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.180.1)

निहत्यालायुधं रक्षः प्रहृष्टात्मा घटोत्कचः । ननाद विविधान्नादान्वाहिन्याः प्रमुखे तव ॥

nihatyālāyudhaṃ rakṣaḥ prahṛṣṭātmā ghaṭotkacaḥ | nanāda vividhānnādānvāhinyāḥ pramukhe tava

राक्षस अलायुध को मारकर प्रसन्न हुआ घटोत्कच आपकी सेना के आगे तरह-तरह की गर्जनाएँ करने लगा।

श्लोक 2 (7.180.2)

तस्य तं तुमुलं शब्दं श्रुत्वा हृदयकम्पनम् । तावकानां महाराज भयमासीत्सुदारुणम् ॥

tasya taṃ tumulaṃ śabdaṃ śrutvā hṛdayakampanam | tāvakānāṃ mahārāja bhayamāsītsudāruṇam

हृदय को कँपा देने वाली उस भीषण ध्वनि को सुनकर, हे महाराज, आपके योद्धाओं में अत्यन्त भयंकर भय छा गया।

श्लोक 3 (7.180.3)

अलायुधविषक्तं तु भैमसेनिं महाबलम् । दृष्ट्वा कर्णो महाबाहुः पाञ्चालान्समुपाद्रवत् ॥

alāyudhaviṣaktaṃ tu bhaimaseniṃ mahābalam | dṛṣṭvā karṇo mahābāhuḥ pāñcālānsamupādravat

अलायुध के साथ भिड़े हुए भीमसेन के महाबली पुत्र को देखकर महाबाहु कर्ण पाञ्चालों पर टूट पड़ा।

श्लोक 4 (7.180.4)

दशभिर्दशभिर्बाणैर्धृष्टद्युम्नशिखण्डिनौ । दृढैः पूर्णायतोत्सृष्टैर्बिभेद नतपर्वभिः ॥

daśabhirdaśabhirbāṇairdhṛṣṭadyumnaśikhaṇḍinau | dṛḍhaiḥ pūrṇāyatotsṛṣṭairbibheda nataparvabhiḥ

उसने पूरी तरह खींचकर छोड़े हुए, झुकी हुई गाँठों वाले, दस-दस दृढ़ बाणों से धृष्टद्युम्न और शिखण्डी को बेध दिया।

श्लोक 5 (7.180.5)

ततः परमनाराचैर्युधामन्यूत्तमौजसौ । सात्यकिं च रथोदारं कम्पयामास मार्गणैः ॥

tataḥ paramanārācairyudhāmanyūttamaujasau | sātyakiṃ ca rathodāraṃ kampayāmāsa mārgaṇaiḥ

फिर उत्तम लोहे के बाणों से उसने युधामन्यु और उत्तमौजा को तथा रथ में शोभायमान सात्यकि को अपने तीरों से कँपा दिया।

श्लोक 6 (7.180.6)

तेषामप्यस्यतां सङ्ख्ये सर्वेषां सव्यदक्षिणम् । मण्डलान्येव चापानि व्यदृश्यन्त जनाधिप ॥

teṣāmapyasyatāṃ saṅkhye sarveṣāṃ savyadakṣiṇam | maṇḍalānyeva cāpāni vyadṛśyanta janādhipa

हे नरेश, युद्ध में बायें और दायें दोनों हाथों से बाण चलाते हुए उन सब के धनुष केवल मण्डल बने दिखाई देते थे।

श्लोक 7 (7.180.7)

तेषां ज्यातलनिर्घोषो रथनेमिस्वनश्च ह । मेघानामिव घर्मान्ते बभूव तुमुलो निशि ॥

teṣāṃ jyātalanirghoṣo rathanemisvanaśca ha | meghānāmiva gharmānte babhūva tumulo niśi

रात में उनकी प्रत्यञ्चाओं की टंकार और रथों के पहियों की घरघराहट ग्रीष्म के अन्त में बादलों की गड़गड़ाहट के समान भयंकर होकर गूँजने लगी।

श्लोक 8 (7.180.8)

ज्यानेमिघोषस्तनयित्नुमान्वै । धनुस्तटिन्मण्डलकेतुशृङ्गः । शरौघवर्षाकुलवृष्टिमांश्च । सङ्क्राममेघः स बभूव राजन् ॥

jyānemighoṣastanayitnumānvai | dhanustaṭinmaṇḍalaketuśṛṅgaḥ | śaraughavarṣākulavṛṣṭimāṃśca | saṅkrāmameghaḥ sa babhūva rājan

हे राजन्, वह संग्राम एक मेघ बन गया; प्रत्यञ्चा और पहियों की ध्वनि उसकी गर्जना थी, धनुष उसकी बिजली, ध्वजाओं के शिखर उसकी चोटियाँ और बाणों की बाढ़ उसकी वर्षा।

श्लोक 9 (7.180.9)

तदद्भुतं शैल इवाप्रकम्पो । वर्षं महाशैलसमानसारः । विध्वंसयामास रणे नरेन्द्र । वैकर्तनः शत्रुगणावमर्दी ॥

tadadbhutaṃ śaila ivāprakampo | varṣaṃ mahāśailasamānasāraḥ | vidhvaṃsayāmāsa raṇe narendra | vaikartanaḥ śatrugaṇāvamardī

हे नरेन्द्र, पर्वत के समान अचल और महान् पर्वत के समान सारवान्, शत्रुसमूहों को कुचलने वाले कर्ण ने उस बाण-वर्षा को रणभूमि में आश्चर्यजनक रूप से छिन्न-भिन्न कर दिया।

श्लोक 10 (7.180.10)

ततोऽतुलैर्वज्रनिपातकल्पैः । शितैः शरैः काञ्चनचित्रपुङ्खैः । शत्रून्व्यपोहत्समरे महात्मा । वैकर्तनः पुत्रहिते रतस्ते ॥

tato'tulairvajranipātakalpaiḥ | śitaiḥ śaraiḥ kāñcanacitrapuṅkhaiḥ | śatrūnvyapohatsamare mahātmā | vaikartanaḥ putrahite rataste

तब आपके पुत्र के हित में लगे महात्मा कर्ण ने वज्रपात के समान अनुपम, सुनहरे पंखों वाले तीखे बाणों से रणभूमि में शत्रुओं को खदेड़ दिया।

श्लोक 11 (7.180.11)

सञ्छिन्नभिन्नध्वजिनश्च केचित् । केचिच्छरैरर्दितभिन्नदेहाः । केचिद्विसूता विहयाश्च केचिद् । वैकर्तनेनाशु कृता बभूवुः ॥

sañchinnabhinnadhvajinaśca kecit | keciccharairarditabhinnadehāḥ | kecidvisūtā vihayāśca kecid | vaikartanenāśu kṛtā babhūvuḥ

कर्ण ने क्षणभर में कितनों के ध्वज काटकर तोड़ दिये, कितनों के शरीर बाणों से बिंधकर क्षत-विक्षत कर दिये, कितनों को सारथिहीन और कितनों को घोड़ों से हीन कर दिया।

श्लोक 12 (7.180.12)

अविन्दमानास्त्वथ शर्म सङ्ख्ये । यौधिष्ठिरं ते बलमभ्यपद्यन् । तान्प्रेक्ष्य भग्नान्विमुखीकृतांश्च । घटोत्कचो रोषमतीव चक्रे ॥

avindamānāstvatha śarma saṅkhye | yaudhiṣṭhiraṃ te balamabhyapadyan | tānprekṣya bhagnānvimukhīkṛtāṃśca | ghaṭotkaco roṣamatīva cakre

युद्ध में कहीं चैन न पाकर वे युधिष्ठिर की सेना की शरण में लौट आये। उन्हें टूटा हुआ और मुँह फेरा हुआ देखकर घटोत्कच को बड़ा क्रोध आया।

श्लोक 13 (7.180.13)

आस्थाय तं काञ्चनरत्नचित्रं । रथोत्तमं सिंहवत्सन्ननाद । वैकर्तनं कर्णमुपेत्य चापि । विव्याध वज्रप्रतिमैः पृषत्कैः ॥

āsthāya taṃ kāñcanaratnacitraṃ | rathottamaṃ siṃhavatsannanāda | vaikartanaṃ karṇamupetya cāpi | vivyādha vajrapratimaiḥ pṛṣatkaiḥ

सोने और रत्नों से जगमगाते उस उत्तम रथ पर चढ़कर उसने सिंह के समान गर्जना की और वैकर्तन कर्ण के पास पहुँचकर वज्र के समान बाणों से उसे बेध दिया।

श्लोक 14 (7.180.14)

तौ कर्णिनाराचशिलीमुखैश्च । नालीकदण्डासनवत्सदन्तैः । वराहकर्णैः सविपाठशृङ्गैः । क्षुरप्रवर्षैश्च विनेदतुः खम् ॥

tau karṇinārācaśilīmukhaiśca | nālīkadaṇḍāsanavatsadantaiḥ | varāhakarṇaiḥ savipāṭhaśṛṅgaiḥ | kṣurapravarṣaiśca vinedatuḥ kham

कर्णी, नाराच और शिलीमुख बाणों से, नालीक, धनुष और वत्सदन्त बाणों से, वराहकर्ण, विपाठ और सींग जैसी नोंक वाले बाणों से तथा क्षुरप्रों की वर्षा से उन दोनों ने आकाश को गुँजा दिया।

श्लोक 15 (7.180.15)

तद्बाणधारावृतमन्तरिक्षं । तिर्यग्गताभिः समरे रराज । सुवर्णपुङ्खज्वलितप्रभाभिः । विचित्रपुष्पाभिरिव स्रजाभिः ॥

tadbāṇadhārāvṛtamantarikṣaṃ | tiryaggatābhiḥ samare rarāja | suvarṇapuṅkhajvalitaprabhābhiḥ | vicitrapuṣpābhiriva srajābhiḥ

आड़े-तिरछे चलते हुए बाणों की धाराओं से ढका हुआ आकाश, सुनहरे पंखों वाले चमकते बाणों की प्रभा से रंग-बिरंगे फूलों की मालाओं के समान शोभित हुआ।

श्लोक 16 (7.180.16)

समाहितावप्रतिमप्रभावौ । अन्योन्यमाजघ्नतुरुत्तमास्त्रैः । तयोर्हि वीरोत्तमयोर्न कश्चिद् । ददर्श तस्मिन्समरे विशेषम् ॥

samāhitāvapratimaprabhāvau | anyonyamājaghnaturuttamāstraiḥ | tayorhi vīrottamayorna kaścid | dadarśa tasminsamare viśeṣam

समान बल वाले और अनुपम प्रभावशाली वे दोनों उत्तम अस्त्रों से एक-दूसरे पर प्रहार करते रहे; उन दोनों श्रेष्ठ वीरों में उस युद्ध में कोई भी अन्तर नहीं देख सका।

श्लोक 17 (7.180.17)

अतीव तच्चित्रमतुल्यरूपं । बभूव युद्धं रविभीमसून्वोः । समाकुलं शस्त्रनिपातघोरं । दिवीव राह्वंशुमतोः प्रमत्तम् ॥

atīva taccitramatulyarūpaṃ | babhūva yuddhaṃ ravibhīmasūnvoḥ | samākulaṃ śastranipātaghoraṃ | divīva rāhvaṃśumatoḥ pramattam

सूर्यपुत्र और भीमपुत्र का वह युद्ध अत्यन्त विचित्र और अनुपम था; शस्त्रों की वर्षा से वह भयंकर और ठसाठस भरा था, मानो आकाश में राहु और सूर्य का उन्मत्त संग्राम हो रहा हो।

श्लोक 18 (7.180.18)

घटोत्कचं यदा कर्णो न विशेषयते नृप । ततः प्रादुश्चकारोग्रमस्त्रमस्त्रविदां वरः ॥

ghaṭotkacaṃ yadā karṇo na viśeṣayate nṛpa | tataḥ prāduścakārogramastramastravidāṃ varaḥ

हे राजन्, जब कर्ण घटोत्कच पर बढ़त न पा सका, तब अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ उसने एक भयंकर अस्त्र प्रकट किया।

श्लोक 19 (7.180.19)

तेनास्त्रेणावधीत्तस्य रथं सहयसारथिम् । विरथश्चापि हैडिम्बिः क्षिप्रमन्तरधीयत ॥

tenāstreṇāvadhīttasya rathaṃ sahayasārathim | virathaścāpi haiḍimbiḥ kṣipramantaradhīyata

उस अस्त्र से उसने घटोत्कच के रथ को घोड़ों और सारथि सहित नष्ट कर दिया, और रथहीन हुआ हिडिम्बापुत्र शीघ्र ही अन्तर्धान हो गया।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 20 (7.180.20)

तस्मिन्नन्तर्हिते तूर्णं कूटयोधिनि राक्षसे । मामकैः प्रतिपन्नं यत्तन्ममाचक्ष्व सञ्जय ॥

tasminnantarhite tūrṇaṃ kūṭayodhini rākṣase | māmakaiḥ pratipannaṃ yattanmamācakṣva sañjaya

जब वह छलयोधी राक्षस इस प्रकार अचानक अदृश्य हो गया, तब मेरे पक्ष के लोगों ने क्या किया, यह मुझे बताओ, सञ्जय।

सञ्जय उवाच

श्लोक 21 (7.180.21)

अन्तर्हितं राक्षसेन्द्रं विदित्वा । सम्प्राक्रोशन्कुरवः सर्व एव । कथं नायं राक्षसः कूटयोधी । हन्यात्कर्णं समरेऽदृश्यमानः ॥

antarhitaṃ rākṣasendraṃ viditvā | samprākrośankuravaḥ sarva eva | kathaṃ nāyaṃ rākṣasaḥ kūṭayodhī | hanyātkarṇaṃ samare'dṛśyamānaḥ

राक्षसराज को अदृश्य हुआ जानकर सभी कौरव चिल्ला उठे, “यह छलयोधी राक्षस अदृश्य रहकर युद्ध में कर्ण को क्यों नहीं मार डालेगा?”

श्लोक 22 (7.180.22)

ततः कर्णो लघुचित्रास्त्रयोधी । सर्वा दिशः प्रावृणोद्बाणजालैः । न वै किञ्चित्प्रापतत्तत्र भूतं । तमोभूते सायकैरन्तरिक्षे ॥

tataḥ karṇo laghucitrāstrayodhī | sarvā diśaḥ prāvṛṇodbāṇajālaiḥ | na vai kiñcitprāpatattatra bhūtaṃ | tamobhūte sāyakairantarikṣe

तब शीघ्रता से विचित्र अस्त्र चलाने वाले कर्ण ने बाणों के जालों से सब दिशाओं को ढक दिया; बाणों से अन्धकारमय हुए उस आकाश में कोई भी प्राणी नीचे नहीं गिरा।

श्लोक 23 (7.180.23)

नैवाददानो न च सन्दधानो । न चेषुधीस्पृशमानः कराग्रैः । अदृश्यद्वै लाघवात्सूतपुत्रः । सर्वं बाणैश्छादयानोऽन्तरिक्षम् ॥

naivādadāno na ca sandadhāno | na ceṣudhīspṛśamānaḥ karāgraiḥ | adṛśyadvai lāghavātsūtaputraḥ | sarvaṃ bāṇaiśchādayāno'ntarikṣam

सूतपुत्र अपनी फुर्ती के कारण न तीर उठाता दिखाई देता था, न उसे चढ़ाता, न उँगलियों से तरकश छूता, और वह सारे आकाश को बाणों से पाटता जा रहा था।

श्लोक 24 (7.180.24)

ततो मायां दारुणामन्तरिक्षे । घोरां भीमां विहितां राक्षसेन । अपश्याम लोहिताभ्रप्रकाशां । देदीप्यन्तीमग्निशिखामिवोग्राम् ॥

tato māyāṃ dāruṇāmantarikṣe | ghorāṃ bhīmāṃ vihitāṃ rākṣasena | apaśyāma lohitābhraprakāśāṃ | dedīpyantīmagniśikhāmivogrām

तब हमने आकाश में राक्षस की रची हुई एक माया देखी, जो भयानक, घोर और दारुण थी, लाल बादल के समान चमक रही थी और आग की भीषण लपट के समान जल रही थी।

श्लोक 25 (7.180.25)

ततस्तस्यां विद्युतः प्रादुरासन् । उल्काश्चापि ज्वलिताः कौरवेन्द्र । घोषश्चान्यः प्रादुरासीत्सुघोरः । सहस्रशो नदतां दुन्दुभीनाम् ॥

tatastasyāṃ vidyutaḥ prādurāsan | ulkāścāpi jvalitāḥ kauravendra | ghoṣaścānyaḥ prādurāsītsughoraḥ | sahasraśo nadatāṃ dundubhīnām

हे कुरुश्रेष्ठ, उस माया में बिजलियाँ कौंधने लगीं और जलती हुई उल्काएँ गिरने लगीं, और हज़ारों गरजते नगाड़ों जैसा एक और अत्यन्त भयंकर शब्द उठा।

श्लोक 26 (7.180.26)

ततः शराः प्रापतन्रुक्मपुङ्खाः । शक्त्यृष्टिप्रासमुसलान्यायुधानि । परश्वथास्तैलधौताश्च खड्गाः । प्रदीप्ताग्रास्तोमराः पट्टसाश्च ॥

tataḥ śarāḥ prāpatanrukmapuṅkhāḥ | śaktyṛṣṭiprāsamusalānyāyudhāni | paraśvathāstailadhautāśca khaḍgāḥ | pradīptāgrāstomarāḥ paṭṭasāśca

फिर सुनहरे पंखों वाले बाण गिरने लगे, और शक्ति, ऋष्टि, प्रास तथा मूसल आदि आयुध, फरसे, तेल से चमकाई हुई तलवारें, जलती नोंक वाले तोमर और पट्टिश भी बरसने लगे।

श्लोक 27 (7.180.27)

मयूखिनः परिघा लोहबद्धा । गदाश्चित्राः शितधाराश्च शूलाः । गुर्व्यो गदा हेमपट्टावनद्धाः । शतघ्न्यश्च प्रादुरासन्समन्तात् ॥

mayūkhinaḥ parighā lohabaddhā | gadāścitrāḥ śitadhārāśca śūlāḥ | gurvyo gadā hemapaṭṭāvanaddhāḥ | śataghnyaśca prādurāsansamantāt

चमकते हुए लोहे से मढ़े परिघ, रंग-बिरंगी गदाएँ, तीखी धार वाले शूल, सोने की पट्टियों से मढ़ी भारी गदाएँ और शतघ्नियाँ चारों ओर प्रकट हो गयीं।

श्लोक 28 (7.180.28)

महाशिलाश्चापतंस्तत्रतत्र । सहस्रशः साशनयश्च वज्राः । चक्राणि चानेकशतक्षुराणि । प्रादुर्बभूवुर्ज्वलनप्रभाणि ॥

mahāśilāścāpataṃstatratatra | sahasraśaḥ sāśanayaśca vajrāḥ | cakrāṇi cānekaśatakṣurāṇi | prādurbabhūvurjvalanaprabhāṇi

यहाँ-वहाँ बड़ी-बड़ी शिलाएँ गिरने लगीं, हज़ारों बिजलियों सहित वज्र गिरे, और सैकड़ों धारों वाले अग्नि के समान दहकते चक्र प्रकट हुए।

श्लोक 29 (7.180.29)

तां शक्तिपाषाणपरश्वथानां । प्रासासिवज्राशनिमुद्गराणाम् । वृष्टिं विशालां ज्वलितां पतन्तीं । कर्णः शरौघैर्न शशाक हन्तुम् ॥

tāṃ śaktipāṣāṇaparaśvathānāṃ | prāsāsivajrāśanimudgarāṇām | vṛṣṭiṃ viśālāṃ jvalitāṃ patantīṃ | karṇaḥ śaraughairna śaśāka hantum

शक्ति, पत्थर, फरसे, प्रास, तलवार, वज्र, अशनि और मुद्गरों की उस विशाल, जलती हुई वर्षा को गिरते देखकर भी कर्ण बाणों की बौछार से उसे नष्ट न कर सका।

श्लोक 30 (7.180.30)

शराहतानां पततां हयानां । वज्राहतानां च तथा गजानाम् । शिलाहतानां च महारथानां । महान्निनादः पततां बभूव ॥

śarāhatānāṃ patatāṃ hayānāṃ | vajrāhatānāṃ ca tathā gajānām | śilāhatānāṃ ca mahārathānāṃ | mahānninādaḥ patatāṃ babhūva

बाणों से मारे गये गिरते घोड़ों, वज्रों से मारे गये हाथियों और शिलाओं से मारे गये महारथियों के गिरने से बड़ा भारी शब्द हुआ।

श्लोक 31 (7.180.31)

सुभीमनानाविधशस्त्रपातैः । घटोत्कचेनाभिहतं समन्तात् । दौर्योधनं वै बलमार्तरूपम् । आवर्तमानं ददृशे भ्रमत्तत् ॥

subhīmanānāvidhaśastrapātaiḥ | ghaṭotkacenābhihataṃ samantāt | dauryodhanaṃ vai balamārtarūpam | āvartamānaṃ dadṛśe bhramattat

घटोत्कच द्वारा चारों ओर से भाँति-भाँति के भयंकर शस्त्रों की मार से पीड़ित दुर्योधन की सेना व्याकुल होकर चक्कर खाती हुई दिखाई दी।

श्लोक 32 (7.180.32)

हाहाकृतं सम्परिवर्तमानं । संलीयमानं च विषण्णरूपम् । ते त्वार्यभावात्पुरुषप्रवीराः । पराङ्मुखा नो बभूवुस्तदानीम् ॥

hāhākṛtaṃ samparivartamānaṃ | saṃlīyamānaṃ ca viṣaṇṇarūpam | te tvāryabhāvātpuruṣapravīrāḥ | parāṅmukhā no babhūvustadānīm

‘हाय-हाय’ करती, इधर-उधर घूमती, सिकुड़ती और दुःखी होती हुई उस सेना के श्रेष्ठ वीर अपने आर्य-स्वभाव के कारण उस समय भी पीठ दिखाकर नहीं भागे।

श्लोक 33 (7.180.33)

तां राक्षसीं भीमरूपां सुघोरां । वृष्टिं महाशस्त्रमयीं पतन्तीम् । दृष्ट्वा बलौघांश्च निपात्यमानान् । महद्भयं तव पुत्रान्विवेश ॥

tāṃ rākṣasīṃ bhīmarūpāṃ sughorāṃ | vṛṣṭiṃ mahāśastramayīṃ patantīm | dṛṣṭvā balaughāṃśca nipātyamānān | mahadbhayaṃ tava putrānviveśa

भयंकर रूप वाली, अत्यन्त घोर, महान् शस्त्रों की उस गिरती हुई वर्षा को और कटती हुई सेनाओं को देखकर आपके पुत्रों के मन में भारी भय समा गया।

श्लोक 34 (7.180.34)

शिवाश्च वैश्वानरदीप्तजिह्वाः । सुभीमनादाः शतशो नदन्तीः । रक्षोगणान्नर्दतश्चापि वीक्ष्य । नरेन्द्र योधा व्यथिता बभूवुः ॥

śivāśca vaiśvānaradīptajihvāḥ | subhīmanādāḥ śataśo nadantīḥ | rakṣogaṇānnardataścāpi vīkṣya | narendra yodhā vyathitā babhūvuḥ

आग की तरह दहकती जीभों वाली सैकड़ों सियारिनों को भयानक स्वर में चीखते और राक्षसों के समूहों को गरजते देखकर, हे नरेन्द्र, योद्धा व्यथित हो उठे।

श्लोक 35 (7.180.35)

ते दीप्तजिह्वानलतीक्ष्णदंष्ट्रा । विभीषणाः शैलनिकाशकायाः । नभोगताः शक्तिविषक्तहस्ता । मेघा व्यमुञ्चन्निव वृष्टिमुग्राम् ॥

te dīptajihvānalatīkṣṇadaṃṣṭrā | vibhīṣaṇāḥ śailanikāśakāyāḥ | nabhogatāḥ śaktiviṣaktahastā | meghā vyamuñcanniva vṛṣṭimugrām

वे राक्षस, जिनकी जीभें दहक रही थीं, दाढ़ें आग की तरह तीखी थीं, शरीर पर्वत के समान विशाल और भयानक थे, हाथों में शक्तियाँ थामे आकाश में उड़ते हुए बादलों की भाँति भीषण वर्षा करने लगे।

श्लोक 36 (7.180.36)

तैराहतास्ते शरशक्तिशूलैः । गदाभिरुग्रैः परिघैश्च दीप्तैः । वज्रैः पिनाकैरशनिप्रहारैः । शतघ्निचक्रैर्भथिताश्च पेतुः ॥

tairāhatāste śaraśaktiśūlaiḥ | gadābhirugraiḥ parighaiśca dīptaiḥ | vajraiḥ pinākairaśaniprahāraiḥ | śataghnicakrairbhathitāśca petuḥ

उन राक्षसों के बाणों, शक्तियों, शूलों, उग्र गदाओं, जलते परिघों, वज्रों, पिनाकों, बिजली के प्रहारों और शतघ्नी-चक्रों से आहत होकर वे योद्धा कुचले जाकर गिर पड़े।

श्लोक 37 (7.180.37)

शूला भुशुण्ड्योऽश्मगुडाः शतघ्न्यः । स्थूलाश्च कार्ष्णायसपट्टनद्वाः । तेऽवाकिरंस्तव पुत्रस्य सैन्यं । ततो रौद्रं कश्मलं प्रादुरासीत् ॥

śūlā bhuśuṇḍyo'śmaguḍāḥ śataghnyaḥ | sthūlāśca kārṣṇāyasapaṭṭanadvāḥ | te'vākiraṃstava putrasya sainyaṃ | tato raudraṃ kaśmalaṃ prādurāsīt

शूल, भुशुण्डियाँ, पत्थर के गोले, शतघ्नियाँ और काले लोहे की पट्टियों से मढ़ी मोटी गदाएँ आपके पुत्र की सेना पर बरस पड़ीं, और तब भयंकर मूर्च्छा-सी छा गयी।

श्लोक 38 (7.180.38)

विकीर्णान्त्रा विहतैरुत्तमाङ्गैः । सम्भग्नाङ्गाः शिश्यिरे तत्र शूराः । छिन्ना हयाः कुञ्जराश्चापि भग्ना । न मुच्यन्ते याचमानाः सुभीताः ॥

vikīrṇāntrā vihatairuttamāṅgaiḥ | sambhagnāṅgāḥ śiśyire tatra śūrāḥ | chinnā hayāḥ kuñjarāścāpi bhagnā | na mucyante yācamānāḥ subhītāḥ

वहाँ आँतें बिखरी हुईं, सिर कुचले हुए और अंग टूटे हुए शूरवीर पड़े थे; घोड़े कटे पड़े थे और हाथी टूट-फूट गये थे, और डर के मारे गिड़गिड़ाने वाले भी छोड़े नहीं जाते थे।

श्लोक 39 (7.180.39)

एवं महच्छस्त्रवर्षं सृजन्तः । ते यातुधाना भुवि घोररूपाः । मायाः सृष्टास्तत्र घटोत्कचेन । नामुञ्चन्वै याचमानं न भीतम् ॥

evaṃ mahacchastravarṣaṃ sṛjantaḥ | te yātudhānā bhuvi ghorarūpāḥ | māyāḥ sṛṣṭāstatra ghaṭotkacena | nāmuñcanvai yācamānaṃ na bhītam

इस प्रकार घटोत्कच की रची हुई मायारूप वे भयंकर आकृति वाले यातुधान पृथ्वी पर शस्त्रों की महान् वर्षा करते हुए न गिड़गिड़ाने वाले को छोड़ते थे, न डरे हुए को।

श्लोक 40 (7.180.40)

तस्मिन्घोरे कुरुवीरावमर्दे । कालोत्सृष्टे क्षत्रियाणामभावे । ते वै भग्नाः सहसा व्यद्रवन्त । प्राक्रोशन्तः कौरवाः सर्व एव ॥

tasminghore kuruvīrāvamarde | kālotsṛṣṭe kṣatriyāṇāmabhāve | te vai bhagnāḥ sahasā vyadravanta | prākrośantaḥ kauravāḥ sarva eva

कुरुवीरों के उस भयंकर संहार में, जो काल का छोड़ा हुआ था और जिसमें क्षत्रियों का नाश हो रहा था, सब कौरव चीखते हुए टूटकर अचानक भाग खड़े हुए।

श्लोक 41 (7.180.41)

पलायध्वं कुरवो नैतदस्ति । सेन्द्रा देवा घ्नन्ति नः पाण्डवार्थे । तथा तेषां मज्जतां भारतानां । तस्मिन्द्वीपः सूतपुत्रो बभूव ॥

palāyadhvaṃ kuravo naitadasti | sendrā devā ghnanti naḥ pāṇḍavārthe | tathā teṣāṃ majjatāṃ bhāratānāṃ | tasmindvīpaḥ sūtaputro babhūva

“कौरवो, भागो! यह लड़ने योग्य नहीं है; इन्द्र सहित देवता पाण्डवों के लिए हमें मार रहे हैं!” इस प्रकार डूबते हुए भरतवंशियों के लिए सूतपुत्र वहाँ द्वीप बन गया।

श्लोक 42 (7.180.42)

तस्मिन्सङ्क्रन्दे तुमुले वर्तमाने । सैन्ये भग्ने लीयमाने कुरूणाम् । अनीकानां प्रविभागेऽप्रकाशे । न ज्ञायन्ते कुरवो नेतरे च ॥

tasminsaṅkrande tumule vartamāne | sainye bhagne līyamāne kurūṇām | anīkānāṃ pravibhāge'prakāśe | na jñāyante kuravo netare ca

उस कोलाहलपूर्ण चीत्कार में, जब कौरव सेना टूट रही और बिखर रही थी और अन्धकार में सैन्य-टुकड़ियों का विभाग दिखाई नहीं देता था, तब कौरव और दूसरे पहचाने नहीं जाते थे।

श्लोक 43 (7.180.43)

निर्मर्यादे विद्रवे घोररूपे । सर्वा दिशः प्रेक्षमाणाः स्म शून्याः । तां शस्त्रवृष्टिमुरसा गाहमानं । कर्णं स्मैकं तत्र राजन्नपश्यन् ॥

nirmaryāde vidrave ghorarūpe | sarvā diśaḥ prekṣamāṇāḥ sma śūnyāḥ | tāṃ śastravṛṣṭimurasā gāhamānaṃ | karṇaṃ smaikaṃ tatra rājannapaśyan

उस मर्यादाहीन, भयंकर भगदड़ में सब दिशाओं की ओर देखने पर वे सूनी ही दिखीं; और वहाँ, हे राजन्, उन्होंने उस शस्त्र-वर्षा में छाती अड़ाकर डटे केवल कर्ण को ही देखा।

श्लोक 44 (7.180.44)

ततो बाणैरावृणोदन्तरिक्षं । दिव्यां मायां योधयन्राक्षसस्य । ह्रीमान्कुर्वन्दुष्करं चार्यकर्म । नैवामुह्यत्संयुगे सूतपुत्रः ॥

tato bāṇairāvṛṇodantarikṣaṃ | divyāṃ māyāṃ yodhayanrākṣasasya | hrīmānkurvanduṣkaraṃ cāryakarma | naivāmuhyatsaṃyuge sūtaputraḥ

तब कर्ण ने राक्षस की दिव्य माया से लड़ते हुए बाणों से आकाश को ढक दिया; लज्जाशील वह सूतपुत्र दुष्कर आर्य-कर्म करते हुए भी युद्ध में मोहित नहीं हुआ।

श्लोक 45 (7.180.45)

ततो भीताः समुदैक्षन्त कर्णं । राजन्सर्वे सैन्धवा बाह्लिकाश्च । असम्मोहं पूजयन्तोऽस्य सङ्ख्ये । सम्पश्यन्तो विजयं राक्षसस्य ॥

tato bhītāḥ samudaikṣanta karṇaṃ | rājansarve saindhavā bāhlikāśca | asammohaṃ pūjayanto'sya saṅkhye | sampaśyanto vijayaṃ rākṣasasya

तब भयभीत हुए सभी सैन्धव और बाह्लीक, हे राजन्, राक्षस की विजय देखते हुए युद्ध में कर्ण की अविचलता की सराहना करते हुए उसी की ओर देखने लगे।

श्लोक 46 (7.180.46)

तेनोत्सृष्टा चक्रयुक्ता शतघ्नी । समं सर्वांश्चतुरोऽश्वाञ्जघान । ते जानुभिर्जगतीमन्वपद्यन् । गतासवो निर्दशनाक्षिजिह्वाः ॥

tenotsṛṣṭā cakrayuktā śataghnī | samaṃ sarvāṃścaturo'śvāñjaghāna | te jānubhirjagatīmanvapadyan | gatāsavo nirdaśanākṣijihvāḥ

उसके छोड़े हुए चक्रयुक्त शतघ्नी ने चारों घोड़ों को एक साथ मार डाला; वे प्राणहीन होकर, दाँत, आँखें और जीभ बाहर निकाले, घुटनों के बल धरती पर गिर पड़े।

श्लोक 47 (7.180.47)

ततो हताश्वादवरुह्य यानात् । अन्तर्मनाः कुरुषु प्राद्रुवत्सु । दिव्ये चास्त्रे मायया वध्यमाने । नैवामुह्यच्चिन्तयन्प्राप्तकालम् ॥

tato hatāśvādavaruhya yānāt | antarmanāḥ kuruṣu prādruvatsu | divye cāstre māyayā vadhyamāne | naivāmuhyaccintayanprāptakālam

तब घोड़े मारे जाने पर कर्ण रथ से उतर पड़ा; कौरवों के भागते समय और माया द्वारा उसके दिव्य अस्त्र के नष्ट किये जाने पर भी वह मन ही मन शान्त रहा, घबराया नहीं और समयोचित कर्तव्य का विचार करने लगा।

श्लोक 48 (7.180.48)

ततोऽब्रुवन्कुरवः सर्व एव । कर्णं दृष्ट्वा घोररूपां च मायाम् । शक्त्या रक्षो जहि कर्णाद्य तूर्णं । नश्यन्त्येते कुरवो धार्तराष्ट्राः ॥

tato'bruvankuravaḥ sarva eva | karṇaṃ dṛṣṭvā ghorarūpāṃ ca māyām | śaktyā rakṣo jahi karṇādya tūrṇaṃ | naśyantyete kuravo dhārtarāṣṭrāḥ

तब कर्ण को और उस घोर माया को देखकर सभी कौरव उससे बोले, “कर्ण, अब शीघ्र अपनी शक्ति से इस राक्षस को मार डालो! ये धृतराष्ट्र के पुत्र कौरव नष्ट हो रहे हैं!”

श्लोक 49 (7.180.49)

करिष्यतः किञ्च नो भीमपार्थौ । तपन्तमेनं जहि पापं निशीथे । यो नः सङ्ग्रामाद्धोररूपाद्विमुच्येत् । स नः पार्थान्सबालान्योधयेत ॥

kariṣyataḥ kiñca no bhīmapārthau | tapantamenaṃ jahi pāpaṃ niśīthe | yo naḥ saṅgrāmāddhorarūpādvimucyet | sa naḥ pārthānsabālānyodhayeta

“भीम और अर्जुन हमारा क्या कर लेंगे? रात में तप रहे इस पापी को मारो। हममें से जो इस भयंकर युद्ध से छूट जायेगा, वही बाद में पार्थों से उनके पुत्रों सहित लड़ लेगा।”

श्लोक 50 (7.180.50)

तस्मादेनं राक्षसं घोररूपं । शक्त्या जहि त्वं दत्तया वासवेन । मा कौरवाः सर्व एवेन्द्रकल्पा । रात्रियुद्धे कर्ण नेशुः सयोधाः ॥

tasmādenaṃ rākṣasaṃ ghorarūpaṃ | śaktyā jahi tvaṃ dattayā vāsavena | mā kauravāḥ sarva evendrakalpā | rātriyuddhe karṇa neśuḥ sayodhāḥ

“इसलिए कर्ण, वासव की दी हुई शक्ति से इस भयंकर राक्षस को मार डालो, कहीं ऐसा न हो कि इन्द्र के समान ये सब कौरव योद्धाओं सहित रात्रि-युद्ध में नष्ट हो जायँ।”

श्लोक 51 (7.180.51)

स वध्यमानो रक्षसा वै निशीथे । दृष्ट्वा राजंस्त्रास्यमानं बलं च । महच्छ्रुत्वा निनदं कौरवाणां । मतिं दध्रे शक्तिमोक्षाय कर्णः ॥

sa vadhyamāno rakṣasā vai niśīthe | dṛṣṭvā rājaṃstrāsyamānaṃ balaṃ ca | mahacchrutvā ninadaṃ kauravāṇāṃ | matiṃ dadhre śaktimokṣāya karṇaḥ

हे राजन्, रात में राक्षस से पीड़ित होते हुए कर्ण ने सेना को त्रस्त देखकर और कौरवों का बड़ा आर्तनाद सुनकर शक्ति छोड़ने का निश्चय कर लिया।

श्लोक 52 (7.180.52)

स वै क्रुद्धः सिंह इवात्यमर्षी । नामर्षयन्प्रतिघातं रणेऽसौ । शक्तिं श्रेष्ठां वैजयन्तीमसह्यां । समाददे तस्य वधं चिकीर्षन् ॥

sa vai kruddhaḥ siṃha ivātyamarṣī | nāmarṣayanpratighātaṃ raṇe'sau | śaktiṃ śreṣṭhāṃ vaijayantīmasahyāṃ | samādade tasya vadhaṃ cikīrṣan

क्रुद्ध सिंह के समान अमर्षशील कर्ण रण में उस आघात को न सहता हुआ उसे मारने की इच्छा से वैजयन्ती नामक श्रेष्ठ और दुःसह शक्ति उठा लाया।

श्लोक 53 (7.180.53)

याऽसौ राजन्निहिता वर्षपूगान् । वधायाजौ सत्कृता फल्गुनस्य । यां वै प्रादात्सूत पुत्राय शक्रः । शक्तिं श्रेष्ठां कुण्डलाभ्यां निमाय ॥

yā'sau rājannihitā varṣapūgān | vadhāyājau satkṛtā phalgunasya | yāṃ vai prādātsūta putrāya śakraḥ | śaktiṃ śreṣṭhāṃ kuṇḍalābhyāṃ nimāya

हे राजन्, वह श्रेष्ठ शक्ति, जिसे उसने वर्षों से अर्जुन के वध के लिए सम्मानपूर्वक रख छोड़ा था, और जिसे इन्द्र ने कुण्डलों के बदले सूतपुत्र को दिया था,

श्लोक 54 (7.180.54)

तां वै शक्तिं लेलिहानां प्रदीप्तां । पाशैर्युक्तामन्तकस्येव जिह्वाम् । मृत्योः स्वसारं ज्वलितामिवोल्कां । वैकर्तनः प्राहिणोद्राक्षसाय ॥

tāṃ vai śaktiṃ lelihānāṃ pradīptāṃ | pāśairyuktāmantakasyeva jihvām | mṛtyoḥ svasāraṃ jvalitāmivolkāṃ | vaikartanaḥ prāhiṇodrākṣasāya

लपलपाती, जलती हुई, पाशों से युक्त, अन्तक की जीभ के समान, मृत्यु की बहन और दहकती उल्का के समान उस शक्ति को वैकर्तन ने राक्षस पर चला दिया।

श्लोक 55 (7.180.55)

तामुत्तमां परकायावहन्त्रीं । दृष्ट्वा शक्तिं बाहुसंस्थां ज्वलन्तीम् । भीतं रक्षो विप्रदुद्राव राजन् । कृत्वाऽऽत्मानं विन्ध्यतुल्यप्रमाणम् ॥

tāmuttamāṃ parakāyāvahantrīṃ | dṛṣṭvā śaktiṃ bāhusaṃsthāṃ jvalantīm | bhītaṃ rakṣo vipradudrāva rājan | kṛtvā''tmānaṃ vindhyatulyapramāṇam

शत्रुओं के शरीरों का नाश करने वाली उस उत्तम शक्ति को कर्ण के हाथ में जलता देखकर, हे राजन्, भयभीत राक्षस अपने को विन्ध्य पर्वत के समान विशाल बनाकर भाग चला।

श्लोक 56 (7.180.56)

दृष्ट्वा शक्तिं कर्णबाह्वन्तरस्थां । नेदुर्भूतान्यन्तरिक्षे नरेन्द्र । ववुर्वातास्तुमुलाश्चापि राजन् । सनिर्घाता चाशनिर्गां जगाम ॥

dṛṣṭvā śaktiṃ karṇabāhvantarasthāṃ | nedurbhūtānyantarikṣe narendra | vavurvātāstumulāścāpi rājan | sanirghātā cāśanirgāṃ jagāma

कर्ण की भुजा के भीतर शक्ति को देखकर, हे नरेन्द्र, आकाश में प्राणी चीख उठे; प्रचण्ड आँधियाँ चलीं और गड़गड़ाहट के साथ बिजली पृथ्वी पर गिरी।

श्लोक 57 (7.180.57)

सा तां मायां भस्म कृत्वा ज्वलन्ती । भित्त्वा गाढं हृदयं राक्षसस्य । ऊर्ध्वं ययौ दीप्यमाना निशायां । नक्षत्राणामन्तराण्याविवेश ॥

sā tāṃ māyāṃ bhasma kṛtvā jvalantī | bhittvā gāḍhaṃ hṛdayaṃ rākṣasasya | ūrdhvaṃ yayau dīpyamānā niśāyāṃ | nakṣatrāṇāmantarāṇyāviveśa

वह जलती हुई शक्ति उस माया को भस्म करके और राक्षस के हृदय को गहरा बेधकर रात में चमकती हुई ऊपर उठी और नक्षत्रों के बीच जा समायी।

श्लोक 58 (7.180.58)

स निर्भिन्नो विविधैरस्त्रपूगैः । दिव्यैर्नागैर्मानुषै राक्षसैश्च । नदन्नादान्विविधान्भैरवांश्च । प्राणानिष्टांस्त्याजितः शक्रशक्त्या ॥

sa nirbhinno vividhairastrapūgaiḥ | divyairnāgairmānuṣai rākṣasaiśca | nadannādānvividhānbhairavāṃśca | prāṇāniṣṭāṃstyājitaḥ śakraśaktyā

वह घटोत्कच दिव्य, नागीय, मानुष और राक्षसी नाना प्रकार के अस्त्रों के समूहों से बिंधा हुआ, भाँति-भाँति की भयंकर चीखें मारता हुआ, इन्द्र की शक्ति से अपने प्रिय प्राणों को त्यागने को विवश हुआ।

श्लोक 59 (7.180.59)

इदं चान्यच्चित्रमाश्चर्यरूपं । चकारासौ कर्म शत्रुक्षयाय । तस्मिन्काले शक्तिनिर्भिन्नमर्मा । बभौ राजञ्शैलमेघप्रकाशः ॥

idaṃ cānyaccitramāścaryarūpaṃ | cakārāsau karma śatrukṣayāya | tasminkāle śaktinirbhinnamarmā | babhau rājañśailameghaprakāśaḥ

और शत्रुओं के नाश के लिए उसने एक और विचित्र तथा आश्चर्यजनक कार्य किया; उस समय शक्ति से मर्मस्थल बिंध जाने पर, हे राजन्, वह पर्वत-जैसे मेघ की तरह शोभित हुआ।

श्लोक 60 (7.180.60)

ततोऽन्तरिक्षादपतद्गतासुः । स राक्षसेन्द्रो भुवि भिन्नदेहः । अवाक्शिराः स्तब्धगात्रो विजिह्वो । घटोत्कचो महदास्थाय रूपम् ॥

tato'ntarikṣādapatadgatāsuḥ | sa rākṣasendro bhuvi bhinnadehaḥ | avākśirāḥ stabdhagātro vijihvo | ghaṭotkaco mahadāsthāya rūpam

तब वह राक्षसराज घटोत्कच विशाल रूप धारण करके आकाश से प्राणहीन होकर गिरा; उसका शरीर फट चुका था, सिर नीचे की ओर था, अंग अकड़ गये थे और जीभ बाहर निकली थी।

श्लोक 61 (7.180.61)

स तद्रूपं भैरवं भीमकर्मा । भीमं कृत्वा भैमसेनिः पपात । हतोऽप्येवं तव सैन्यैकदेशम् । अपोथयत्स्वेन देहेन राजन् ॥

sa tadrūpaṃ bhairavaṃ bhīmakarmā | bhīmaṃ kṛtvā bhaimaseniḥ papāta | hato'pyevaṃ tava sainyaikadeśam | apothayatsvena dehena rājan

भयंकर कर्म करने वाला भीमसेन का पुत्र उस भैरव रूप को और भी भयानक बनाकर गिरा, और मरकर भी, हे राजन्, अपने शरीर से उसने आपकी सेना के एक भाग को कुचल डाला।

श्लोक 62 (7.180.62)

पतद्रक्षः स्वेन कायेन तूर्णम् । अतिप्रमाणेन विवर्धता च । प्रियं कुर्वन्पाण्डवानां गतासुः । अक्षौहिणीं तव तूर्णं जघान ॥

patadrakṣaḥ svena kāyena tūrṇam | atipramāṇena vivardhatā ca | priyaṃ kurvanpāṇḍavānāṃ gatāsuḥ | akṣauhiṇīṃ tava tūrṇaṃ jaghāna

गिरते हुए उस राक्षस ने अपने शरीर को सहसा अत्यन्त विशाल करके, प्राणहीन होकर भी पाण्डवों का प्रिय करते हुए, आपकी एक अक्षौहिणी सेना को तुरन्त मार डाला।

श्लोक 63 (7.180.63)

ततो मिश्राः प्राणदन्सिंहनादैः । भेर्यः शङ्खा मुरजाश्चानकाश्च । दग्धां मायां निहतं राक्षसं च । दृष्ट्वा हृष्टाः प्राणदन्कौरवेयाः ॥

tato miśrāḥ prāṇadansiṃhanādaiḥ | bheryaḥ śaṅkhā murajāścānakāśca | dagdhāṃ māyāṃ nihataṃ rākṣasaṃ ca | dṛṣṭvā hṛṣṭāḥ prāṇadankauraveyāḥ

तब सिंहनादों के साथ मिले हुए नगाड़े, शंख, मृदंग और आनक बज उठे; माया को भस्म हुई और राक्षस को मरा देखकर प्रसन्न कौरव जयघोष करने लगे।

श्लोक 64 (7.180.64)

ततः कर्णः कुरुभिः पूज्यमानो । यथा शक्रो वृत्रवधे मरुद्भिः । अन्वारूढस्तव पुत्रस्य यानं । हृष्टश्चापि प्राविशत्तत्स्वसैन्यम् ॥

tataḥ karṇaḥ kurubhiḥ pūjyamāno | yathā śakro vṛtravadhe marudbhiḥ | anvārūḍhastava putrasya yānaṃ | hṛṣṭaścāpi prāviśattatsvasainyam

तब वृत्र के वध के समय मरुद्गणों से सम्मानित इन्द्र की भाँति कौरवों से सम्मान पाता हुआ कर्ण आपके पुत्र के रथ पर चढ़ा और प्रसन्न होकर अपनी सेना में प्रविष्ट हुआ।

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