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द्रोण पर्व · अध्याय 181

घटोत्कच के वध पर श्रीकृष्ण के हर्ष का कारण

धृतराष्ट्र पूछते हैं कि घटोत्कच के गिरने पर पाण्डवों और कौरवों ने क्या किया। सञ्जय बताते हैं कि पाण्डव शोक में डूबे थे जबकि श्रीकृष्ण हर्ष से गर्जना करके नाचने लगे, और अर्जुन ने उनसे इस शोक के समय हर्ष का कारण पूछा। श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं कि इन्द्र की शक्ति घटोत्कच पर व्यर्थ हो जाने से कर्ण मानो मर चुका है; अब वह कवच, कुण्डल और अमोघ शक्ति से रहित है और उसे केवल अर्जुन मार सकते हैं, जैसे उन्होंने जरासन्ध, चेदिराज, एकलव्य और राक्षसों को पाण्डवों के हित में पहले मारा।

अध्याय 180अध्याय-सूचीअध्याय 182

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 1 (7.181.1)

तस्मिन्हते महामाये महातेजसि राक्षसे । अमर्षिताः पाण्डवेयाः किमकुर्वन्महारणे ॥

tasminhate mahāmāye mahātejasi rākṣase | amarṣitāḥ pāṇḍaveyāḥ kimakurvanmahāraṇe

उस महामायावी और महातेजस्वी राक्षस के मारे जाने पर क्रोधित पाण्डवों ने उस महायुद्ध में क्या किया?

श्लोक 2 (7.181.2)

मर्दिताश्च भृशं युद्धे किमकुर्वन्त सञ्जय ॥

marditāśca bhṛśaṃ yuddhe kimakurvanta sañjaya

और सञ्जय, युद्ध में इस प्रकार बुरी तरह कुचले जाने पर उन्होंने क्या किया?

श्लोक 3 (7.181.3)

ये च तेऽभ्यद्रवन्द्रोणं व्यूढानीकं प्रहारिणः । सृञ्जयाः सह पाञ्चालैस्तेऽकुर्वन्किं महारणे ॥

ye ca te'bhyadravandroṇaṃ vyūḍhānīkaṃ prahāriṇaḥ | sṛñjayāḥ saha pāñcālaiste'kurvankiṃ mahāraṇe

और जो प्रहार करने वाले सृञ्जय पाञ्चालों के साथ व्यूह रचकर खड़े द्रोण पर टूट पड़े थे, उन्होंने उस महायुद्ध में क्या किया?

श्लोक 4 (7.181.4)

सौमदत्तिवधाद्द्रोणमायत्तं सैन्धवस्य च । अमर्षाज्जीवितं त्यक्त्वा गाहमानं वरूथिनीम् ॥

saumadattivadhāddroṇamāyattaṃ saindhavasya ca | amarṣājjīvitaṃ tyaktvā gāhamānaṃ varūthinīm

सोमदत्त के पुत्र और सिन्धुराज के वध के कारण क्रोध से भरे हुए द्रोण प्राणों का मोह छोड़कर उनकी सेना में घुस पड़े थे,

श्लोक 5 (7.181.5)

जृम्भमाणमिव व्याघ्रं व्यात्ताननमिवान्तकम् । कथं प्रत्युद्ययुर्द्रोणमजय्यं कुरुसृञ्जयाः ॥

jṛmbhamāṇamiva vyāghraṃ vyāttānanamivāntakam | kathaṃ pratyudyayurdroṇamajayyaṃ kurusṛñjayāḥ

वे जँभाई लेते बाघ के समान और मुँह फैलाये यमराज के समान थे; उन अजेय द्रोण का सामना कुरु और सृञ्जयों ने कैसे किया?

श्लोक 6 (7.181.6)

आचार्यं ये च रक्षन्ति दुर्योधनपुरोगमाः । द्रौणिकर्णकृपास्तात ते ह्यकुर्वन्किमाहवे ॥

ācāryaṃ ye ca rakṣanti duryodhanapurogamāḥ | drauṇikarṇakṛpāstāta te hyakurvankimāhave

और प्रिय सञ्जय, आचार्य की रक्षा करने वाले दुर्योधन आदि, अश्वत्थामा, कर्ण और कृपाचार्य ने युद्ध में क्या किया?

श्लोक 7 (7.181.7)

भारद्वाजं जिघांसन्तौ सव्यसाचिवृकोदरौ । आर्च्छतां मामकान्युद्धे कथं सञ्जय शंस मे ॥

bhāradvājaṃ jighāṃsantau savyasācivṛkodarau | ārcchatāṃ māmakānyuddhe kathaṃ sañjaya śaṃsa me

सञ्जय, मुझे बताओ कि भरद्वाज के पुत्र को मारने की इच्छा से सव्यसाची अर्जुन और वृकोदर भीम मेरे सैनिकों पर युद्ध में कैसे टूट पड़े।

श्लोक 8 (7.181.8)

सिन्धुराजवधेनेमे घटोत्कचवधेन ते । अमर्षिताश्च सङ्क्रुद्धा रणं चक्रुः कथं युधि ॥

sindhurājavadheneme ghaṭotkacavadhena te | amarṣitāśca saṅkruddhā raṇaṃ cakruḥ kathaṃ yudhi

सिन्धुराज के वध और घटोत्कच के वध से अमर्ष में भरे हुए वे क्रोध से जलते हुए युद्ध में कैसे लड़े?

सञ्जय उवाच

श्लोक 9 (7.181.9)

हैडिम्बिं निहतं दृष्ट्वा विशीर्णमिव पर्वतम् । बभूवुः पाण्डवाः सर्वे शोकबाष्पाकुलेक्षणाः ॥

haiḍimbiṃ nihataṃ dṛṣṭvā viśīrṇamiva parvatam | babhūvuḥ pāṇḍavāḥ sarve śokabāṣpākulekṣaṇāḥ

बिखरे हुए पर्वत के समान मरे पड़े हिडिम्बा के पुत्र को देखकर सब पाण्डवों की आँखें शोक के आँसुओं से भर गयीं।

श्लोक 10 (7.181.10)

वासुदेवस्तु हर्षेण महताऽभिपरिप्लुतः । ननाद सिंहवन्नादं व्यथयन्निव भारत ॥

vāsudevastu harṣeṇa mahatā'bhipariplutaḥ | nanāda siṃhavannādaṃ vyathayanniva bhārata

परन्तु हे भारत, वासुदेव महान् हर्ष में डूबकर सिंह की-सी गर्जना करने लगे, मानो सबको काँपा देना चाहते हों।

श्लोक 11 (7.181.11)

हतं घटोत्कचं ज्ञात्वा वासुदेवः प्रतापवान् । विनद्य च महानादं पर्यष्वजत फल्गुनम् ॥

hataṃ ghaṭotkacaṃ jñātvā vāsudevaḥ pratāpavān | vinadya ca mahānādaṃ paryaṣvajata phalgunam

घटोत्कच के मारे जाने का समाचार जानकर प्रतापी वासुदेव ने बड़ी गर्जना की और अर्जुन को गले लगा लिया।

श्लोक 12 (7.181.12)

स विनद्य महानादमभीशून्सन्नियम्य च । ननर्त हर्षसंवीतो वातोद्धूत इव द्रुमः ॥

sa vinadya mahānādamabhīśūnsanniyamya ca | nanarta harṣasaṃvīto vātoddhūta iva drumaḥ

जोर से गर्जना करके और घोड़ों की रास को थामकर वे हर्ष से भरे हुए, हवा से हिलते वृक्ष की तरह नाचने लगे।

श्लोक 13 (7.181.13)

ततः परिष्वज्य पुनः पार्थमास्फोट्य चासकृत् । रथोपस्थगतो धीमान्प्राणदत्पुनरच्युतः ॥

tataḥ pariṣvajya punaḥ pārthamāsphoṭya cāsakṛt | rathopasthagato dhīmānprāṇadatpunaracyutaḥ

फिर अर्जुन को बार-बार गले लगाकर और बार-बार ताल ठोंककर रथ के अग्रभाग में बैठे बुद्धिमान् अच्युत ने फिर ऊँचे स्वर में गर्जना की।

श्लोक 14 (7.181.14)

प्रहृष्टमनसं ज्ञात्वा वासुदेवं महाबलः । अर्जुनोऽथाब्रवीद्राजन्नातिहृष्टमना इव ॥

prahṛṣṭamanasaṃ jñātvā vāsudevaṃ mahābalaḥ | arjuno'thābravīdrājannātihṛṣṭamanā iva

हे राजन्, वासुदेव को इतना प्रसन्न देखकर स्वयं बहुत प्रसन्न न दीखते हुए महाबली अर्जुन ने कहा।

अर्जुन उवाच

श्लोक 15 (7.181.15)

अतिहर्षोऽयमस्थाने तवाद्य मधुसूदन । शोकस्थाने तु सम्प्राप्ते हैडिम्बस्य वधेन तु ॥

atiharṣo'yamasthāne tavādya madhusūdana | śokasthāne tu samprāpte haiḍimbasya vadhena tu

मधुसूदन, हिडिम्बा के पुत्र के वध से शोक का अवसर आने पर आज आपका यह अत्यधिक हर्ष अनुचित है।

श्लोक 16 (7.181.16)

विमुखानीह सैन्यानि हतं दृष्ट्वा घटोत्कचम् । वयं च भृशमुद्विग्ना हैडिम्बेस्तु निपातनात् ॥

vimukhānīha sainyāni hataṃ dṛṣṭvā ghaṭotkacam | vayaṃ ca bhṛśamudvignā haiḍimbestu nipātanāt

घटोत्कच को मरा देखकर यहाँ हमारी सेनाएँ विमुख हो गयी हैं, और हिडिम्बापुत्र के गिरने से हम भी अत्यन्त उद्विग्न हैं।

श्लोक 17 (7.181.17)

नैतत्कारणमल्पं हि भविष्यति जनार्दन । तदद्य शंस मे पृष्टः सत्यं सत्यवतां वर ॥

naitatkāraṇamalpaṃ hi bhaviṣyati janārdana | tadadya śaṃsa me pṛṣṭaḥ satyaṃ satyavatāṃ vara

जनार्दन, इसका कारण छोटा नहीं हो सकता। इसलिए सत्यवादियों में श्रेष्ठ, मेरे पूछने पर आज मुझे सच-सच बताइए।

श्लोक 18 (7.181.18)

यद्येतन्न रहस्यं ते वक्तुमर्हस्यरिन्दम । धैर्यस्य विकृतिं ब्रूहि त्वमद्य मधुसूदन ॥

yadyetanna rahasyaṃ te vaktumarhasyarindama | dhairyasya vikṛtiṃ brūhi tvamadya madhusūdana

शत्रुनाशक मधुसूदन, यदि यह गोपनीय न हो तो आज मुझे अपने धैर्य में आये इस विकार का कारण बताइए।

श्लोक 19 (7.181.19)

समुद्रस्येव संशोषं मेरोरिव विसर्पणम् । तथैतदद्य मन्येऽहं तव कर्म जनार्दन ॥

samudrasyeva saṃśoṣaṃ meroriva visarpaṇam | tathaitadadya manye'haṃ tava karma janārdana

जनार्दन, आपका यह कार्य मुझे आज समुद्र के सूख जाने या मेरु पर्वत के अपनी जगह से हिल जाने जैसा आश्चर्यजनक लगता है।

वासुदेव उवाच

श्लोक 20 (7.181.20)

अतिहर्षमिमं प्राप्तं शृणु मे त्वं धनञ्जय । अतीव मनसः सद्यः प्रसादकरमुत्तमम् ॥

atiharṣamimaṃ prāptaṃ śṛṇu me tvaṃ dhanañjaya | atīva manasaḥ sadyaḥ prasādakaramuttamam

धनञ्जय, मुझे जो यह महान् हर्ष हुआ है, उसे मुझसे सुनो; यह अत्यन्त उत्तम है और मन को तुरन्त प्रसन्न करने वाला है।

श्लोक 21 (7.181.21)

शक्तिं घटोत्कचेनेमां व्यंसयित्वा महाद्युते । कर्णं निहतमेवाजौ विद्धि सद्यो धनञ्जय ॥

śaktiṃ ghaṭotkacenemāṃ vyaṃsayitvā mahādyute | karṇaṃ nihatamevājau viddhi sadyo dhanañjaya

हे महाद्युति, जान लो कि घटोत्कच के द्वारा इस शक्ति को व्यर्थ करा देने से कर्ण युद्ध में तुरन्त ही मरा हुआ-सा हो गया है, धनञ्जय।

श्लोक 22 (7.181.22)

शक्तिहस्तं पुनः कर्णं को लोकेऽस्ति पुमानिह । य एनमभितस्तिष्ठेत्कार्तिकेयमिवाहवे ॥

śaktihastaṃ punaḥ karṇaṃ ko loke'sti pumāniha | ya enamabhitastiṣṭhetkārtikeyamivāhave

शक्ति हाथ में रहते कार्तिकेय के समान खड़े कर्ण के सामने युद्ध में टिकने वाला इस संसार में कौन पुरुष है?

श्लोक 23 (7.181.23)

दिष्ट्याऽपनीतकवचो दिष्ट्याऽपहृतकुण्डलः । दिष्ट्या सा व्यंसिता शक्तिरमोघाऽस्य घटोत्कचे ॥

diṣṭyā'panītakavaco diṣṭyā'pahṛtakuṇḍalaḥ | diṣṭyā sā vyaṃsitā śaktiramoghā'sya ghaṭotkace

सौभाग्य से उसका कवच उतर गया, सौभाग्य से उसके कुण्डल छिन गये, और सौभाग्य से उसकी वह अमोघ शक्ति घटोत्कच पर व्यर्थ हो गयी।

श्लोक 24 (7.181.24)

यदि हि स्यात्सकवचस्तथैव स्यात्सकुण्डलः । सामरानपि लोकांस्त्रीनेकः कर्णो जयेद्रणे ॥

yadi hi syātsakavacastathaiva syātsakuṇḍalaḥ | sāmarānapi lokāṃstrīnekaḥ karṇo jayedraṇe

यदि उसके पास कवच और कुण्डल वैसे ही रहते, तो अकेला कर्ण देवताओं सहित तीनों लोकों को युद्ध में जीत लेता।

श्लोक 25 (7.181.25)

वासवो वा कुबेरो वा वरुणो वा जलेश्वरः । यमो वा नोत्सहेत्कर्णं रणे प्रतिसमासितुम् ॥

vāsavo vā kubero vā varuṇo vā jaleśvaraḥ | yamo vā notsahetkarṇaṃ raṇe pratisamāsitum

इन्द्र, कुबेर, जल के स्वामी वरुण या यम, कोई भी युद्ध में कर्ण का सामना करने का साहस न करता।

श्लोक 26 (7.181.26)

गाण्डीवमुद्यम्य भवांश्चक्रं चाहं सुदर्शनम् । न शक्तौ स्वो रणे जेतुं तथायुक्तं नरर्षभम् ॥

gāṇḍīvamudyamya bhavāṃścakraṃ cāhaṃ sudarśanam | na śaktau svo raṇe jetuṃ tathāyuktaṃ nararṣabham

यदि आप गाण्डीव उठा लें और मैं सुदर्शन चक्र, तो भी हम दोनों इस प्रकार सज्ज उस नरश्रेष्ठ को युद्ध में नहीं जीत सकते।

श्लोक 27 (7.181.27)

त्वद्धितार्थं तु शक्रेण मायापहृतकुण्डलः । विहीनकवचश्चायं कृतः परपुरञ्जयः ॥

tvaddhitārthaṃ tu śakreṇa māyāpahṛtakuṇḍalaḥ | vihīnakavacaścāyaṃ kṛtaḥ parapurañjayaḥ

आपके हित के लिए ही इन्द्र ने माया से उसके कुण्डल हर लिये और शत्रुनगरों को जीतने वाले इस कर्ण को कवचहीन कर दिया।

श्लोक 28 (7.181.28)

उत्कृत्य कवचं यस्मात्कुण्डले विमले च ते । प्रादाच्छक्राय वै कर्णस्तस्माद्वैकर्तनः स्मृतः ॥

utkṛtya kavacaṃ yasmātkuṇḍale vimale ca te | prādācchakrāya vai karṇastasmādvaikartanaḥ smṛtaḥ

क्योंकि कर्ण ने अपना कवच काटकर निकाला और दोनों निर्मल कुण्डल इन्द्र को दे दिये, इसीलिए वह वैकर्तन कहलाता है।

श्लोक 29 (7.181.29)

आशीविष इव क्रुद्धः स्तम्भितो मन्त्रतेजसा । तथाऽद्य भाति कर्णो मे शान्तज्वाल इवानलः ॥

āśīviṣa iva kruddhaḥ stambhito mantratejasā | tathā'dya bhāti karṇo me śāntajvāla ivānalaḥ

मन्त्र के तेज से जकड़े हुए क्रुद्ध विषधर सर्प की तरह, या जिसकी लपटें शान्त हो गयी हों ऐसी अग्नि की तरह, कर्ण मुझे आज दिखाई देता है।

श्लोक 30 (7.181.30)

यदाप्रभृति कर्णाय शक्तिर्दत्ता महात्मना । वासवेन महाबाहो क्षिप्ता याऽसौ घटोत्कचे ॥

yadāprabhṛti karṇāya śaktirdattā mahātmanā | vāsavena mahābāho kṣiptā yā'sau ghaṭotkace

महाबाहो, जब से महात्मा इन्द्र ने कर्ण को वह शक्ति दी थी, जो अब घटोत्कच पर चलायी गयी है,

श्लोक 31 (7.181.31)

कुण्डलाभ्यां निमायाथ दिव्येन कवचेन च । तां प्राप्यामन्यत वृषा सततं त्वां हतं रणे ॥

kuṇḍalābhyāṃ nimāyātha divyena kavacena ca | tāṃ prāpyāmanyata vṛṣā satataṃ tvāṃ hataṃ raṇe

तभी से अपने दिव्य कुण्डल और कवच के बदले उसे पाकर वृष कर्ण आपको युद्ध में सदा मरा हुआ ही मानता रहा।

श्लोक 32 (7.181.32)

एवं गतोऽपि शक्योऽयं हन्तुं नान्येन केनचित् । ऋते त्वां पुरुषव्याघ्र शपे सत्येन चानघ ॥

evaṃ gato'pi śakyo'yaṃ hantuṃ nānyena kenacit | ṛte tvāṃ puruṣavyāghra śape satyena cānagha

पुरुषसिंह, अब भी उसे आपके सिवा कोई दूसरा नहीं मार सकता; हे निष्पाप, मैं सत्य की शपथ लेकर कहता हूँ।

श्लोक 33 (7.181.33)

ब्रह्मण्यः सत्यवादी च तपस्वी नियतव्रतः । रिपुष्वपि दयावांश्च तस्मात्कर्णो वृषा स्मृतः ॥

brahmaṇyaḥ satyavādī ca tapasvī niyatavrataḥ | ripuṣvapi dayāvāṃśca tasmātkarṇo vṛṣā smṛtaḥ

ब्राह्मणों का भक्त, सत्यवादी, दृढ़ व्रत वाला तपस्वी और शत्रुओं पर भी दयालु होने के कारण कर्ण वृष, अर्थात् धर्मपरायण, कहलाता है।

श्लोक 34 (7.181.34)

युद्धशौण्डो महाबाहुर्नित्योद्यतशरासनः । केसरीव वने नर्दन्मत्तमातङ्गयूथपान् । विमर्दन्रथशार्दूलान्राजते रणमूर्धनि ॥

yuddhaśauṇḍo mahābāhurnityodyataśarāsanaḥ | kesarīva vane nardanmattamātaṅgayūthapān | vimardanrathaśārdūlānrājate raṇamūrdhani

युद्ध में निपुण, महाबाहु और सदा धनुष उठाये रहने वाला कर्ण वन में मतवाले हाथियों के यूथपतियों के बीच गरजते सिंह के समान रथियों में बाघों को कुचलता हुआ रणभूमि के अग्रभाग में शोभा पाता है।

श्लोक 35 (7.181.35)

मध्यंगत इवादित्यो यो न शक्यो निरीक्षितुम् । त्वदीयैः पुरुषव्याघ्र योधमुख्यैर्महात्मभिः ॥

madhyaṃgata ivādityo yo na śakyo nirīkṣitum | tvadīyaiḥ puruṣavyāghra yodhamukhyairmahātmabhiḥ

पुरुषसिंह, दोपहर के सूर्य की भाँति वह आपके महात्मा प्रमुख योद्धाओं से भी देखा नहीं जा सकता,

श्लोक 36 (7.181.36)

शरजालसहस्रांशुः शरदीव दिवाकरः ॥

śarajālasahasrāṃśuḥ śaradīva divākaraḥ

वह हज़ारों किरणों की तरह बाणजालों वाला, शरद् ऋतु के सूर्य के समान है।

श्लोक 37 (7.181.37)

तपान्ते जलदो यद्वच्छरधाराः क्षरन्मुहुः । दिव्यास्त्रजलदः कर्णः पर्जन्य इव वृष्टिमान् ॥

tapānte jalado yadvaccharadhārāḥ kṣaranmuhuḥ | divyāstrajaladaḥ karṇaḥ parjanya iva vṛṣṭimān

जैसे ग्रीष्म के अन्त में बादल बार-बार धाराएँ बरसाता है, वैसे ही दिव्य अस्त्रों का मेघ कर्ण वर्षा करने वाले पर्जन्य की तरह बाणों की धाराएँ बरसाता है।

श्लोक 38 (7.181.38)

त्रिदशैरपि चास्यद्भिः शरवर्षं समन्ततः । अशक्यस्तदयं जेतुं स्रवद्भिर्मांसशोणितम् ॥

tridaśairapi cāsyadbhiḥ śaravarṣaṃ samantataḥ | aśakyastadayaṃ jetuṃ sravadbhirmāṃsaśoṇitam

देवता भी यदि चारों ओर से बाणों की वर्षा करते, मांस और रक्त बहाते बाणों की, तो भी उस समय वह जीता नहीं जा सकता था।

श्लोक 39 (7.181.39)

कवचेन विहीनश्च कुण्डलाभ्यां च पाण्डव । सोऽद्य मानुषतां प्राप्तो विमुक्तः शक्रदत्तया ॥

kavacena vihīnaśca kuṇḍalābhyāṃ ca pāṇḍava | so'dya mānuṣatāṃ prāpto vimuktaḥ śakradattayā

पाण्डव, कवच और कुण्डलों से रहित वह आज मनुष्य की दशा को पहुँच गया है और इन्द्र की दी हुई शक्ति से भी मुक्त हो गया है।

श्लोक 40 (7.181.40)

एको हि योगोऽस्य भवेद्वधाय । छिद्रे ह्येनं स्वप्रमत्तः प्रमत्तम् । कृच्छ्रं प्राप्तं रथचक्रे विमग्ने । हन्याः पूर्वं त्वं तु संज्ञां विचार्य ॥

eko hi yogo'sya bhavedvadhāya | chidre hyenaṃ svapramattaḥ pramattam | kṛcchraṃ prāptaṃ rathacakre vimagne | hanyāḥ pūrvaṃ tvaṃ tu saṃjñāṃ vicārya

उसे मारने का एक ही उपाय हो सकता है: जब वह असावधान हो, किसी छिद्र में पड़ा हो और उसके रथ का पहिया धँस जाने से वह संकट में हो, तब आप स्वयं सावधान रहकर संकेत का विचार करके उस पर पहले प्रहार करें।

श्लोक 41 (7.181.41)

न ह्युद्यतास्त्रं युधि हन्यादजय्यम् । अप्येकवीरो बलभित्सवज्रः ॥

na hyudyatāstraṃ yudhi hanyādajayyam | apyekavīro balabhitsavajraḥ

वज्रधारी इन्द्र जैसा अकेला वीर भी शस्त्र उठाये हुए उस अजेय को युद्ध में नहीं मार सकता।

श्लोक 42 (7.181.42)

जरासन्धश्चेदिराजो महात्मा । महाबाहुश्चैकलव्यो निषादः । एकैकशो निहताः सर्व एते । योगैस्तैस्तैस्त्वद्धितार्थं मयैव ॥

jarāsandhaścedirājo mahātmā | mahābāhuścaikalavyo niṣādaḥ | ekaikaśo nihatāḥ sarva ete | yogaistaistaistvaddhitārthaṃ mayaiva

जरासन्ध, महात्मा चेदिराज और महाबाहु निषाद एकलव्य, इन सबको मैंने ही अकेले-अकेले भिन्न-भिन्न उपायों से आपके हित के लिए मारा।

श्लोक 43 (7.181.43)

अथापरे निहता राक्षसेन्द्रा । हिडिम्बकिर्मीरबकप्रधानाः । अलायुधः परचक्रावमर्दी । घटोत्कचश्चोग्रकर्मा तरस्वी ॥

athāpare nihatā rākṣasendrā | hiḍimbakirmīrabakapradhānāḥ | alāyudhaḥ paracakrāvamardī | ghaṭotkacaścograkarmā tarasvī

और दूसरे राक्षसराज भी मारे गये, जिनमें हिडिम्ब, किर्मीर और बक प्रमुख थे; शत्रुसेनाओं को कुचलने वाला अलायुध और उग्र कर्म वाला पराक्रमी घटोत्कच भी मारा गया।

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