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द्रोण पर्व · अध्याय 183

कर्ण ने अर्जुन पर शक्ति क्यों नहीं चलाई

धृतराष्ट्र सञ्जय से पूछते हैं कि कर्ण की अमोघ शक्ति जब घटोत्कच पर व्यर्थ चली गई, तो उसने उसे अर्जुन पर क्यों नहीं चलाया; वे यह भी सोचते हैं कि कृष्ण ने राक्षस की मृत्यु को पाण्डवों के लाभ में बदल दिया। सञ्जय बताते हैं कि कौरव हर रात कर्ण को अर्जुन या कृष्ण को मारने के लिए उकसाते थे, पर कृष्ण सदा अर्जुन की रक्षा करते और कर्ण की बुद्धि को मोहित कर देते थे। फिर सात्यकि वही प्रश्न कृष्ण से पूछते हैं, और कृष्ण उत्तर देते हैं कि अर्जुन को मृत्यु से बचाने के लिए उन्होंने कर्ण को मोहित किया और उसके सामने घटोत्कच को भेजा।

अध्याय 182अध्याय-सूचीअध्याय 184

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 1 (7.183.1)

एकवीरवधे मोघा शक्तिः सूतात्मजे यदा । कस्मात्सर्वान्समुत्सृज्य स तां पार्थे न मुक्तवान् ॥

ekavīravadhe moghā śaktiḥ sūtātmaje yadā | kasmātsarvānsamutsṛjya sa tāṃ pārthe na muktavān

जब सूतपुत्र की वह शक्ति केवल एक वीर के वध में व्यर्थ चली गई, तब उसने सब को छोड़कर उसे पार्थ पर क्यों नहीं चलाया?

श्लोक 2 (7.183.2)

तस्मिन्हते हता हि स्युः सर्वे पाण्डवसृञ्जयाः । एकवीरवधे कस्माद्युद्धे न जयमादधे ॥

tasminhate hatā hi syuḥ sarve pāṇḍavasṛñjayāḥ | ekavīravadhe kasmādyuddhe na jayamādadhe

उसके मारे जाने पर सभी पाण्डव और सृञ्जय मारे जाते। उस एक वीर का वध करके उसने युद्ध में विजय क्यों नहीं पा ली?

श्लोक 3 (7.183.3)

आहूतो न निवर्तेयमिति तस्य महाव्रतम् । स्वयं मार्गयितव्यः स सूतपुत्रेण फल्गुनः ॥

āhūto na nivarteyamiti tasya mahāvratam | svayaṃ mārgayitavyaḥ sa sūtaputreṇa phalgunaḥ

"बुलाए जाने पर मैं पीछे नहीं हटूँगा" — यह उस अर्जुन का महान् व्रत है; इसलिए सूतपुत्र को स्वयं फल्गुन को खोजकर ललकारना चाहिए था।

श्लोक 4 (7.183.4)

ततो द्वैरथमानीय फल्गुनं शक्रदत्तया । जघान न वृषा कस्मात्तन्ममाचक्ष्व सञ्जय ॥

tato dvairathamānīya phalgunaṃ śakradattayā | jaghāna na vṛṣā kasmāttanmamācakṣva sañjaya

तब फल्गुन को द्वैरथ युद्ध में लाकर वृष (कर्ण) ने इन्द्र की दी हुई शक्ति से उसे क्यों नहीं मारा? हे सञ्जय, यह मुझे बताओ।

श्लोक 5 (7.183.5)

नूनं बुद्धिविहीनश्चाप्यसहायश्च मे सुतः । शत्रुभिर्व्यंसितः पापः कथं नु स जयेदरीन् ॥

nūnaṃ buddhivihīnaścāpyasahāyaśca me sutaḥ | śatrubhirvyaṃsitaḥ pāpaḥ kathaṃ nu sa jayedarīn

निश्चय ही मेरा पुत्र बुद्धिहीन और असहाय है; शत्रुओं ने उसे छल लिया है। ऐसा पापी शत्रुओं को कैसे जीतेगा?

श्लोक 6 (7.183.6)

या ह्यस्य परमा शक्तिर्जयस्य च परायणम् । सा शक्तिर्वासुदेवेन व्यंसिता च घटोत्कचे ॥

yā hyasya paramā śaktirjayasya ca parāyaṇam | sā śaktirvāsudevena vyaṃsitā ca ghaṭotkace

जो शक्ति उसका सबसे बड़ा बल और विजय का आधार थी, उसे वासुदेव ने घटोत्कच पर व्यर्थ करा दिया।

श्लोक 7 (7.183.7)

कुणेर्यथा हस्तगतं हियेद्बिल्वं बलीयसा । तथा शक्तिरमोघा सा मोघीभूता घटोत्कचे ॥

kuṇeryathā hastagataṃ hiyedbilvaṃ balīyasā | tathā śaktiramoghā sā moghībhūtā ghaṭotkace

जैसे कोई बलवान् पुरुष टुण्डे के हाथ में आया बेल का फल छीन ले, वैसे ही वह अमोघ शक्ति घटोत्कच पर व्यर्थ हो गई।

श्लोक 8 (7.183.8)

यथा वराहस्य शुनश्च युध्यतोस् । तयोरभावे श्वपचस्य लाभः । मन्ये विद्वन्वासुदेवस्य तद्वद् । युद्धे लाभः कर्णहैडिम्बयोर्वै ॥

yathā varāhasya śunaśca yudhyatos | tayorabhāve śvapacasya lābhaḥ | manye vidvanvāsudevasya tadvad | yuddhe lābhaḥ karṇahaiḍimbayorvai

जैसे सूअर और कुत्ते के लड़ने पर दोनों के न रहने से चाण्डाल को लाभ होता है, हे विद्वान् सञ्जय, मैं मानता हूँ कि वैसे ही कर्ण और हिडिम्बा-पुत्र के युद्ध में वासुदेव को लाभ है।

श्लोक 9 (7.183.9)

घटोत्कचो यदि हन्याद्धि कर्णं । परो लाभः स भवेत्पाण्डवानाम् । वैकर्तनो वा यदि तं निहन्यात् । तथापि कृत्यं शक्तिनाशात्कृतं स्यात् ॥

ghaṭotkaco yadi hanyāddhi karṇaṃ | paro lābhaḥ sa bhavetpāṇḍavānām | vaikartano vā yadi taṃ nihanyāt | tathāpi kṛtyaṃ śaktināśātkṛtaṃ syāt

यदि घटोत्कच कर्ण को मार दे, तो पाण्डवों का सबसे बड़ा लाभ होगा; और यदि वैकर्तन उसे मार दे, तब भी शक्ति के नष्ट हो जाने से काम सध जाएगा।

श्लोक 10 (7.183.10)

इति प्राज्ञः प्रज्ञयैतद्विचिन्त्य । घटोत्कचं सूतपुत्रेण युद्धे । अघातयद्वासुदेवो नृसिंहः । प्रियं कुर्वन्पाण्डवानां हितं च ॥

iti prājñaḥ prajñayaitadvicintya | ghaṭotkacaṃ sūtaputreṇa yuddhe | aghātayadvāsudevo nṛsiṃhaḥ | priyaṃ kurvanpāṇḍavānāṃ hitaṃ ca

इस प्रकार अपनी सूझ से यह सोचकर नरसिंह वासुदेव ने, जो प्रज्ञावान् हैं, पाण्डवों का प्रिय और हित करते हुए युद्ध में घटोत्कच को सूतपुत्र के हाथ मरवा दिया।

सञ्जय उवाच

श्लोक 11 (7.183.11)

एतच्चिकीर्षितं ज्ञात्वा कर्णे मधुनिहा नृप । नियोजयामास तदा द्वैरथे राक्षसेश्वरम् ॥

etaccikīrṣitaṃ jñātvā karṇe madhunihā nṛpa | niyojayāmāsa tadā dvairathe rākṣaseśvaram

हे राजन्, कर्ण का यह अभिप्राय जानकर मधुसूदन ने तब द्वैरथ युद्ध में राक्षसराज को उसके सामने लगा दिया।

श्लोक 12 (7.183.12)

घटोत्कचं महावीर्यं महाबुद्धिर्जनार्दनः । अमोघाया विघातार्थं राजन्दुर्मन्त्रिते तव ॥

ghaṭotkacaṃ mahāvīryaṃ mahābuddhirjanārdanaḥ | amoghāyā vighātārthaṃ rājandurmantrite tava

हे राजन्, महाबुद्धिमान् जनार्दन ने अमोघ शक्ति का नाश कराने के लिए महापराक्रमी घटोत्कच को उसके सामने लगाया; यह आपकी बुरी मन्त्रणा के कारण हुआ।

श्लोक 13 (7.183.13)

तदैव कृतकार्या हि वयं स्याम कुरूद्वह । न रक्षेद्यदि कृष्णस्तं पार्थं कर्णान्महारथात् ॥

tadaiva kṛtakāryā hi vayaṃ syāma kurūdvaha | na rakṣedyadi kṛṣṇastaṃ pārthaṃ karṇānmahārathāt

हे कुरुश्रेष्ठ, यदि कृष्ण पार्थ को महारथी कर्ण से न बचाते, तो हम उसी समय कृतकार्य हो जाते।

श्लोक 14 (7.183.14)

साश्वध्वजरथः सङ्ख्ये धृतराष्ट्र पतेद्भुवि । विना जनार्दनं पार्थो योगानामीश्वरं प्रभुम् ॥

sāśvadhvajarathaḥ saṅkhye dhṛtarāṣṭra patedbhuvi | vinā janārdanaṃ pārtho yogānāmīśvaraṃ prabhum

हे धृतराष्ट्र, योगों के स्वामी प्रभु जनार्दन के बिना पार्थ घोड़ों, ध्वज और रथ सहित युद्ध में भूमि पर गिर पड़ता।

श्लोक 15 (7.183.15)

तैस्तैरुपायैर्बहुभी रक्ष्यमाणः स पार्थिव । जयत्यभिमुखः शत्रून्पार्थः कृष्णेन पालितः ॥

taistairupāyairbahubhī rakṣyamāṇaḥ sa pārthiva | jayatyabhimukhaḥ śatrūnpārthaḥ kṛṣṇena pālitaḥ

हे राजन्, कृष्ण द्वारा उन-उन अनेक उपायों से रक्षित होकर पार्थ सामने डटकर शत्रुओं को जीतता है।

श्लोक 16 (7.183.16)

सविशेषं त्वमेयात्मा कृष्णो रक्षेन्न फल्गुनम् । हन्यात्क्षिप्रं हि कौन्तेयं शक्तिर्वृक्षमिवाशनिः ॥

saviśeṣaṃ tvameyātmā kṛṣṇo rakṣenna phalgunam | hanyātkṣipraṃ hi kaunteyaṃ śaktirvṛkṣamivāśaniḥ

अपरिमित आत्मा वाले कृष्ण ने फल्गुन की विशेष रूप से रक्षा की; नहीं तो वह शक्ति कुन्तीपुत्र को वैसे ही शीघ्र मार गिराती, जैसे वज्र वृक्ष को गिरा देता है।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 17 (7.183.17)

विरोधी च कुमन्त्री च प्राज्ञमानी ममात्मजः । यस्यैष समतिक्रान्तो वधोपायो जयं प्रति ॥

virodhī ca kumantrī ca prājñamānī mamātmajaḥ | yasyaiṣa samatikrānto vadhopāyo jayaṃ prati

मेरा पुत्र विरोधी स्वभाव का, बुरी सलाह देने वाला और अपने को पण्डित समझने वाला है; उसने विजय के लिए अर्जुन के वध का यह उपाय हाथ से निकल जाने दिया।

श्लोक 18 (7.183.18)

स वा कर्णो महाबुद्धिः सर्वशस्त्रभृतां वरः । न मुक्तवान्कथं सूत ताममोघां धनञ्जये ॥

sa vā karṇo mahābuddhiḥ sarvaśastrabhṛtāṃ varaḥ | na muktavānkathaṃ sūta tāmamoghāṃ dhanañjaye

अथवा सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, महाबुद्धिमान् वह कर्ण — हे सूत, उसने उस अमोघ शक्ति को धनञ्जय पर क्यों नहीं छोड़ा?

श्लोक 19 (7.183.19)

तवापि समतिक्रान्तमेतद्गावल्गणे कथम् । एतमर्थं महाबुद्धे यत्त्वया नावबोधितः ॥

tavāpi samatikrāntametadgāvalgaṇe katham | etamarthaṃ mahābuddhe yattvayā nāvabodhitaḥ

हे गवल्गण-पुत्र, यह बात आपके ध्यान से भी निकल गई; हे महाबुद्धिमान्, आपने उसे यह क्यों नहीं समझाया?

सञ्जय उवाच

श्लोक 20 (7.183.20)

दुर्योधनस्य शकुनेर्मम दुःशासनस्य च । रात्रौ रात्रौ भवत्येषा नित्यमेव विकत्थना ॥

duryodhanasya śakunermama duḥśāsanasya ca | rātrau rātrau bhavatyeṣā nityameva vikatthanā

दुर्योधन, शकुनि, दुःशासन और मैं — हम लोग हर रात सदा यही डींग हाँकते रहे हैं:

श्लोक 21 (7.183.21)

श्वः सर्वसैन्यानुत्सृज्य जहि कर्ण धनञ्जयम् । प्रेष्यवत्पाण्डुपाञ्चालानुपभोक्ष्यामहे ततः ॥

śvaḥ sarvasainyānutsṛjya jahi karṇa dhanañjayam | preṣyavatpāṇḍupāñcālānupabhokṣyāmahe tataḥ

"कर्ण, कल सारी सेना को छोड़कर धनञ्जय को मार डालो; फिर हम पाण्डवों और पाञ्चालों को सेवकों की तरह भोगेंगे।"

श्लोक 22 (7.183.22)

अथवा निहते पार्थे पाण्डवान्यतमं ततः । स्थापयेद्यदि वार्ष्णेयस्तस्मात्कृष्णो हि हन्यताम् ॥

athavā nihate pārthe pāṇḍavānyatamaṃ tataḥ | sthāpayedyadi vārṣṇeyastasmātkṛṣṇo hi hanyatām

"अथवा यदि पार्थ के मारे जाने पर वार्ष्णेय किसी दूसरे पाण्डव को खड़ा कर दें, तो कृष्ण को ही मार डालना चाहिए।"

श्लोक 23 (7.183.23)

कृष्णो हि मूलं पाण्डूनां पार्थः स्कन्ध इवोद्गतः । शाखा इवेतरे पार्थाः पाञ्चालाः पत्रसंज्ञिताः ॥

kṛṣṇo hi mūlaṃ pāṇḍūnāṃ pārthaḥ skandha ivodgataḥ | śākhā ivetare pārthāḥ pāñcālāḥ patrasaṃjñitāḥ

"कृष्ण पाण्डवों की जड़ हैं, पार्थ उस पर उठा हुआ तना है; अन्य पार्थ शाखाओं के समान हैं और पाञ्चाल पत्ते कहलाते हैं।"

श्लोक 24 (7.183.24)

कृष्णाश्रयाः कृष्णबलाः कृष्णनाथाश्च पाण्डवाः । कृष्णः परायणं चैषां ज्योतिषामिव चन्द्रमाः ॥

kṛṣṇāśrayāḥ kṛṣṇabalāḥ kṛṣṇanāthāśca pāṇḍavāḥ | kṛṣṇaḥ parāyaṇaṃ caiṣāṃ jyotiṣāmiva candramāḥ

"पाण्डवों का आश्रय, बल और नाथ कृष्ण ही हैं; जैसे नक्षत्रों का परम आधार चन्द्रमा है, वैसे ही इनके परम आधार कृष्ण हैं।"

श्लोक 25 (7.183.25)

तस्मात्पर्णानि शाखाश्च स्कन्धं चोत्सृज्य सूतज । कृष्णं हि विद्धि पाण्डूनां मूलं सर्वत्र सर्वदा ॥

tasmātparṇāni śākhāśca skandhaṃ cotsṛjya sūtaja | kṛṣṇaṃ hi viddhi pāṇḍūnāṃ mūlaṃ sarvatra sarvadā

"इसलिए, हे सूतपुत्र, पत्तों, शाखाओं और तने को छोड़ दो, और पाण्डवों की जड़ कृष्ण पर ही सर्वत्र और सदा प्रहार करो।"

श्लोक 26 (7.183.26)

हन्याद्यदि हि दाशार्हं कर्णो यादवनन्दनम् । कृत्स्ना वसुमती राजन्वशे तस्य न संशयः ॥

hanyādyadi hi dāśārhaṃ karṇo yādavanandanam | kṛtsnā vasumatī rājanvaśe tasya na saṃśayaḥ

"हे राजन्, यदि कर्ण यदुकुल को आनन्द देने वाले दाशार्ह को मार दे, तो सारी पृथ्वी निस्सन्देह उसके वश में हो जाएगी।"

श्लोक 27 (7.183.27)

यदि हि स निहतः शयीत भूमौ । यदुकुलपाण्डवनन्दनो महात्मा । ननु तव वसुधा नरेन्द्र सर्वा । सगिरिसमुद्रवना वशं व्रजेत ॥

yadi hi sa nihataḥ śayīta bhūmau | yadukulapāṇḍavanandano mahātmā | nanu tava vasudhā narendra sarvā | sagirisamudravanā vaśaṃ vrajeta

"यदि यदुकुल और पाण्डवों को आनन्द देने वाले वे महात्मा मारे जाकर भूमि पर सो जाएँ, तो हे नरेन्द्र, पर्वतों, समुद्रों और वनों सहित यह सारी पृथ्वी निश्चय ही आपके वश में आ जाए।"

श्लोक 28 (7.183.28)

सा तु बुद्धिः कृताऽप्येवं जाग्रति त्रिदशेश्वरे । अप्रमेये हृषीकेशे युद्धकाले व्यमुह्यत ॥

sā tu buddhiḥ kṛtā'pyevaṃ jāgrati tridaśeśvare | aprameye hṛṣīkeśe yuddhakāle vyamuhyata

पर यह निश्चय इस प्रकार किए जाने पर भी युद्ध के समय भ्रमित हो गया, क्योंकि देवेश्वर अप्रमेय हृषीकेश जाग रहे थे।

श्लोक 29 (7.183.29)

अर्जुनं चापि राधेयात्सदा रक्षति केशवः । न ह्येनमैच्छत्प्रमुखे सौतेः स्थापयितुं रणे ॥

arjunaṃ cāpi rādheyātsadā rakṣati keśavaḥ | na hyenamaicchatpramukhe sauteḥ sthāpayituṃ raṇe

केशव सदा अर्जुन की राधापुत्र से रक्षा करते हैं; उन्होंने रण में उसे सूतपुत्र के सामने खड़ा करना कभी नहीं चाहा।

श्लोक 30 (7.183.30)

अन्यांश्चास्मै रथोदारानुपास्थापयदच्युतः । अमोघां तां कथं शक्तिं मोघां कुर्यामिति प्रभो ॥

anyāṃścāsmai rathodārānupāsthāpayadacyutaḥ | amoghāṃ tāṃ kathaṃ śaktiṃ moghāṃ kuryāmiti prabho

हे प्रभु, "उस अमोघ शक्ति को मैं कैसे निष्फल करूँ" — यह सोचकर अच्युत ने उसके सामने दूसरे श्रेष्ठ रथी खड़े किए।

श्लोक 31 (7.183.31)

यश्चैवं रक्षते पार्थं कर्णात्कृष्णो महामनाः । आत्मानं स कथं राजन्न रक्षेत्पुरुषोत्तमः ॥

yaścaivaṃ rakṣate pārthaṃ karṇātkṛṣṇo mahāmanāḥ | ātmānaṃ sa kathaṃ rājanna rakṣetpuruṣottamaḥ

हे राजन्, जो महामना पुरुषोत्तम कृष्ण पार्थ की कर्ण से इस प्रकार रक्षा करते हैं, वे अपनी रक्षा कैसे न करेंगे?

श्लोक 32 (7.183.32)

परिचिन्त्य तु पश्यामि चक्रायुधमरिन्दमम् । न सोऽस्ति त्रिषु लोकेषु यो जयेत जनार्दनम् ॥

paricintya tu paśyāmi cakrāyudhamarindamam | na so'sti triṣu lokeṣu yo jayeta janārdanam

सोचने पर मैं देखता हूँ कि चक्रधारी, शत्रुदमन जनार्दन को जीत सके, ऐसा कोई तीनों लोकों में नहीं है।

श्लोक 33 (7.183.33)

ततः कृष्णं महाबाहुं सात्यकिः सत्यविक्रमः । पप्रच्छ रथशार्दूलः कर्णं प्रति महारथः ॥

tataḥ kṛṣṇaṃ mahābāhuṃ sātyakiḥ satyavikramaḥ | papraccha rathaśārdūlaḥ karṇaṃ prati mahārathaḥ

तब सत्य पराक्रम वाले, रथियों में सिंह महारथी सात्यकि ने महाबाहु कृष्ण से कर्ण के विषय में पूछा।

सात्यकिरुवाच

श्लोक 34 (7.183.34)

अयं च प्रत्ययः कर्णे शक्तिश्चामितविक्रमा । किमर्थं सूतपुत्रेण न मुक्ता फल्गुने तु सा ॥

ayaṃ ca pratyayaḥ karṇe śaktiścāmitavikramā | kimarthaṃ sūtaputreṇa na muktā phalgune tu sā

कर्ण को यह विश्वास था, और वह शक्ति अपार पराक्रम वाली थी; फिर सूतपुत्र ने उसे फल्गुन पर क्यों नहीं छोड़ा?

वासुदेव उवाच

श्लोक 35 (7.183.35)

दुःशासनश्च कर्णश्च शकुनिश्च ससैन्धवः । सततं मन्त्रयन्ति स्म दुर्योधनपुरोगमाः ॥

duḥśāsanaśca karṇaśca śakuniśca sasaindhavaḥ | satataṃ mantrayanti sma duryodhanapurogamāḥ

दुर्योधन को आगे रखकर दुःशासन, कर्ण और सैन्धव सहित शकुनि निरन्तर मन्त्रणा करते रहते थे।

श्लोक 36 (7.183.36)

कर्ण कर्ण महेष्वास रणेऽमितपराक्रम । नान्यस्य शक्तिरेषा ते मोक्तव्या जयतां वर ॥

karṇa karṇa maheṣvāsa raṇe'mitaparākrama | nānyasya śaktireṣā te moktavyā jayatāṃ vara

"कर्ण, कर्ण! हे महाधनुर्धर, रण में अपार पराक्रम वाले, विजेताओं में श्रेष्ठ, तुम्हारी यह शक्ति किसी और पर नहीं छोड़नी चाहिए —

श्लोक 37 (7.183.37)

ऋते महारथात्कर्ण कुन्तीपुत्राद्धनञ्जयात् । स हि तेषामतियशा देवानामिव वासवः ॥

ṛte mahārathātkarṇa kuntīputrāddhanañjayāt | sa hi teṣāmatiyaśā devānāmiva vāsavaḥ

केवल महारथी कुन्तीपुत्र धनञ्जय को छोड़कर, हे कर्ण; क्योंकि जैसे देवताओं में इन्द्र, वैसे ही उन लोगों में वही सबसे अधिक यशस्वी है।

श्लोक 38 (7.183.38)

तस्मिन्विनिहते पार्थे पाण्डवाः सृञ्जयैः सह । भविष्यन्ति गतात्मानः सुरा इव निरग्नयः ॥

tasminvinihate pārthe pāṇḍavāḥ sṛñjayaiḥ saha | bhaviṣyanti gatātmānaḥ surā iva niragnayaḥ

उसके मारे जाने पर सृञ्जयों सहित पाण्डव अग्निहीन देवताओं की तरह प्राणहीन हो जाएँगे।"

श्लोक 39 (7.183.39)

तथेति च प्रतिज्ञातं कर्णेन शिनिपुङ्गव । हृदि नित्यं च कर्णस्य वधो गाण्डीवधन्वनः ॥

tatheti ca pratijñātaṃ karṇena śinipuṅgava | hṛdi nityaṃ ca karṇasya vadho gāṇḍīvadhanvanaḥ

हे शिनिप्रवर, कर्ण ने "ऐसा ही हो" कहकर प्रतिज्ञा की थी; और गाण्डीवधारी का वध कर्ण के हृदय में सदा बना रहता है।

श्लोक 40 (7.183.40)

अहमेव तु राधेयं मोहयामि युधांवर । ततो नावासृजच्छक्तिं पाण्डवे श्वेतवाहने ॥

ahameva tu rādheyaṃ mohayāmi yudhāṃvara | tato nāvāsṛjacchaktiṃ pāṇḍave śvetavāhane

हे योद्धाओं में श्रेष्ठ, पर मैं ही राधापुत्र को मोहित करता रहता हूँ; इसी से उसने श्वेत अश्वों वाले पाण्डव पर वह शक्ति नहीं छोड़ी।

श्लोक 41 (7.183.41)

फल्गुनस्य हि सा मृत्युरिति चिन्तयतोऽनिशम् । न निद्रा न च मे हार्षो मनसोऽस्ति युधांवर ॥

phalgunasya hi sā mṛtyuriti cintayato'niśam | na nidrā na ca me hārṣo manaso'sti yudhāṃvara

"वह शक्ति फल्गुन की मृत्यु है" — यह निरन्तर सोचते हुए मुझे, हे योद्धाओं में श्रेष्ठ, न नींद आती थी, न मन को हर्ष था।

श्लोक 42 (7.183.42)

घटोत्कचे व्यंसितां तु दृष्ट्वा तां शिनिपुङ्गव । मृत्योरास्यान्तरान्मुक्तं पश्याम्यद्य धनञ्जयम् ॥

ghaṭotkace vyaṃsitāṃ tu dṛṣṭvā tāṃ śinipuṅgava | mṛtyorāsyāntarānmuktaṃ paśyāmyadya dhanañjayam

हे शिनिप्रवर, पर घटोत्कच पर उस शक्ति को व्यर्थ हुआ देखकर आज मैं धनञ्जय को मृत्यु के मुख से छूटा हुआ देखता हूँ।

श्लोक 43 (7.183.43)

न पिता न च मे माता न यूयं भ्रातरस्तथा । न च प्राणास्तथा रक्ष्या यथा बीभत्सुराहवे ॥

na pitā na ca me mātā na yūyaṃ bhrātarastathā | na ca prāṇāstathā rakṣyā yathā bībhatsurāhave

न पिता, न माता, न तुम भाई, और न अपने प्राण ही रण में उतने रक्षणीय हैं, जितना बीभत्सु।

श्लोक 44 (7.183.44)

त्रैलोक्यराज्याद्यत्किञ्चिद्भवेदन्यत्सुदुर्लभम् । नेच्छेयं सात्वताहं तद्विना पार्थं धनञ्जयम् ॥

trailokyarājyādyatkiñcidbhavedanyatsudurlabham | neccheyaṃ sātvatāhaṃ tadvinā pārthaṃ dhanañjayam

हे सात्वत, तीनों लोकों का राज्य, या उससे भी कोई और दुर्लभ वस्तु हो, तो भी मैं पार्थ धनञ्जय के बिना उसे नहीं चाहूँगा।

श्लोक 45 (7.183.45)

अतः प्रहर्षः सुमहान्युयुधानाद्य मेऽभवत् । मृतं प्रत्यागतमिव दृष्ट्वा पार्थं धनञ्जयम् ॥

ataḥ praharṣaḥ sumahānyuyudhānādya me'bhavat | mṛtaṃ pratyāgatamiva dṛṣṭvā pārthaṃ dhanañjayam

इसीलिए, हे युयुधान, पार्थ धनञ्जय को मानो मरकर लौटा हुआ देखकर आज मुझे अत्यन्त बड़ा हर्ष हुआ है।

श्लोक 46 (7.183.46)

अतश्च प्रहितो युद्धे मया कर्णाय राक्षसः । न ह्यन्यः समरे रात्रौ शक्तः कर्णं प्रबाधितुम् ॥

ataśca prahito yuddhe mayā karṇāya rākṣasaḥ | na hyanyaḥ samare rātrau śaktaḥ karṇaṃ prabādhitum

और इसीलिए मैंने युद्ध में कर्ण के विरुद्ध राक्षस को भेजा; क्योंकि रात्रि के युद्ध में कर्ण को सताने में दूसरा कोई समर्थ नहीं था।

सञ्जय उवाच

श्लोक 47 (7.183.47)

इति सात्यकये प्राह तदा देवकिनन्दनः । धनञ्जयहिते युक्तस्तत्प्रिये सततं रतः ॥

iti sātyakaye prāha tadā devakinandanaḥ | dhanañjayahite yuktastatpriye satataṃ rataḥ

धनञ्जय के हित में लगे और उसके प्रिय कार्य में सदा रत देवकीनन्दन ने उस समय सात्यकि से यह कहा।

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