द्रोण पर्व · अध्याय 184
युधिष्ठिर का शोक और व्यास का आश्वासन
धृतराष्ट्र कौरवों के अन्याय पर शोक करते हैं और पूछते हैं कि घटोत्कच के गिरने के बाद रात का युद्ध कैसे चला। सञ्जय बताते हैं कि शोक से व्याकुल युधिष्ठिर को कृष्ण उठकर युद्ध करने को कहते हैं; युधिष्ठिर घटोत्कच के पाण्डवों पर किए सब उपकार गिनाते हैं और फिर क्रोध में स्वयं कर्ण को मारने चल पड़ते हैं। मार्ग में व्यास उन्हें रोककर कहते हैं कि अर्जुन का कर्ण की शक्ति से बच जाना सौभाग्य है, और उन्हें युद्ध जारी रखने को कहते हैं, यह आश्वासन देते हुए कि पाँचवें दिन पृथ्वी उनकी होगी।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (7.184.1)
कर्णदुर्योधनादीनां शकुनेः सौबलस्य च । अपनीतं महत्तात तव चैव विशेषतः ॥
karṇaduryodhanādīnāṃ śakuneḥ saubalasya ca | apanītaṃ mahattāta tava caiva viśeṣataḥ
कर्ण, दुर्योधन आदि ने, सुबल-पुत्र शकुनि ने, और हे तात, विशेष रूप से आपने भी बड़ा अन्याय किया।
श्लोक 2 (7.184.2)
यदि जानीथ तां शक्तिमेकघ्नीं सततं रणे । अनिवार्यामसह्यां च देवैरपि सवासवैः ॥
yadi jānītha tāṃ śaktimekaghnīṃ satataṃ raṇe | anivāryāmasahyāṃ ca devairapi savāsavaiḥ
यदि आप उस शक्ति को जानते हैं, जो एक को मारने वाली है, रण में सदा तत्पर रहती है और इन्द्र सहित देवताओं से भी जिसे रोका या सहा नहीं जा सकता —
श्लोक 3 (7.184.3)
सा किमर्थं तु कर्णेन प्रवृत्ते समरे पुरा । न देवकीसुते मुक्ता फल्गुने वाऽपि सञ्जय ॥
sā kimarthaṃ tu karṇena pravṛtte samare purā | na devakīsute muktā phalgune vā'pi sañjaya
तो हे सञ्जय, पहले जब युद्ध आरम्भ हुआ, तभी कर्ण ने उसे देवकीपुत्र या फल्गुन पर क्यों नहीं छोड़ा?
सञ्जय उवाच
श्लोक 4 (7.184.4)
सङ्ग्रामाद्विनिवृत्तानां सर्वेषां नो विशाम्पते । रात्रौ कुरुकुलश्रेष्ठ मन्त्रोऽयं समजायत ॥
saṅgrāmādvinivṛttānāṃ sarveṣāṃ no viśāmpate | rātrau kurukulaśreṣṭha mantro'yaṃ samajāyata
हे प्रजापालक, हे कुरुश्रेष्ठ, युद्ध से लौटे हम सब लोगों के बीच रात में यह मन्त्रणा हुई:
श्लोक 5 (7.184.5)
प्रभातमात्रे श्वोभूते केशवायार्जुनाय वा । शक्तिरेषा हि मोक्तव्या कर्ण कर्णेति नित्यशः ॥
prabhātamātre śvobhūte keśavāyārjunāya vā | śaktireṣā hi moktavyā karṇa karṇeti nityaśaḥ
"कल प्रभात होते ही यह शक्ति केशव या अर्जुन पर छोड़नी चाहिए" — यह बात "कर्ण, कर्ण" कहकर बार-बार उससे कही जाती थी।
श्लोक 6 (7.184.6)
ततः प्रभातसमये राजन्कर्णस्य दैवतैः । अन्येषां चैव योधानां सा बुद्धिर्नाश्यते पुनः ॥
tataḥ prabhātasamaye rājankarṇasya daivataiḥ | anyeṣāṃ caiva yodhānāṃ sā buddhirnāśyate punaḥ
पर हे राजन्, प्रभात होने पर कर्ण और अन्य योद्धाओं की वह बुद्धि देवताओं द्वारा फिर नष्ट कर दी जाती थी।
श्लोक 7 (7.184.7)
दैवमेव परं मन्ये यत्कर्णो हस्तसंस्थया । न जघान रणे पार्थं कृष्णं वा देवकीसुतम् ॥
daivameva paraṃ manye yatkarṇo hastasaṃsthayā | na jaghāna raṇe pārthaṃ kṛṣṇaṃ vā devakīsutam
मैं दैव को ही सर्वोपरि मानता हूँ, क्योंकि हाथ में शक्ति होने पर भी कर्ण ने रण में न पार्थ को मारा, न देवकीपुत्र कृष्ण को।
श्लोक 8 (7.184.8)
तस्य हस्तस्थिता शक्तिः कालरात्रिरिवोद्यता । दैवोपहतबुद्धित्वान्न तां कर्णो विमुक्तवान् ॥
tasya hastasthitā śaktiḥ kālarātririvodyatā | daivopahatabuddhitvānna tāṃ karṇo vimuktavān
उसके हाथ में पड़ी शक्ति उठी हुई कालरात्रि के समान थी; फिर भी दैव से मारी गई बुद्धि के कारण कर्ण ने उसे नहीं छोड़ा।
श्लोक 9 (7.184.9)
कृष्णे वा देवकीपुत्रे मोहितो देवमायया । पार्थे वा शक्रकल्पे वै वधार्थं वासवीं प्रभो ॥
kṛṣṇe vā devakīputre mohito devamāyayā | pārthe vā śakrakalpe vai vadhārthaṃ vāsavīṃ prabho
हे प्रभु, दैवी माया से मोहित होकर उसने देवकीपुत्र कृष्ण या इन्द्र के समान पार्थ को मारने के लिए इन्द्र की वह शक्ति नहीं छोड़ी।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 10 (7.184.10)
दैवेनोपहता यूयं स्वबुद्ध्या केशवस्य च । गता हि वासवी हत्वा तृणभूतं घटोत्कचम् ॥
daivenopahatā yūyaṃ svabuddhyā keśavasya ca | gatā hi vāsavī hatvā tṛṇabhūtaṃ ghaṭotkacam
आप लोग दैव से और केशव की अपनी बुद्धि से मारे गए। तिनके के समान घटोत्कच को मारकर इन्द्र की वह शक्ति चली गई।
श्लोक 11 (7.184.11)
कर्णश्च मम पुत्राश्च सर्वे चान्ये च पार्थिवाः । तेन वै दुष्प्रणीतेन गता वैवस्वतक्षयम् ॥
karṇaśca mama putrāśca sarve cānye ca pārthivāḥ | tena vai duṣpraṇītena gatā vaivasvatakṣayam
उसी बुरी योजना के कारण कर्ण, मेरे पुत्र और अन्य सब राजा वैवस्वत यम के लोक को चले गए।
श्लोक 12 (7.184.12)
भूय एव तु मे शंस यथा युद्धमवर्तत । कुरूणां पाण्डवानां च हैडिम्बे निहते तदा ॥
bhūya eva tu me śaṃsa yathā yuddhamavartata | kurūṇāṃ pāṇḍavānāṃ ca haiḍimbe nihate tadā
हिडिम्बा-पुत्र के मारे जाने पर कौरवों और पाण्डवों का युद्ध फिर कैसे चला, यह मुझे फिर बताओ।
श्लोक 13 (7.184.13)
ये च तेऽभ्यद्रवन्द्रोणं व्यूढानीकाः प्रहारिणः । सृञ्जयाः सह पाञ्चालैस्तेऽप्यकुर्वन्कथं रणम् ॥
ye ca te'bhyadravandroṇaṃ vyūḍhānīkāḥ prahāriṇaḥ | sṛñjayāḥ saha pāñcālaiste'pyakurvankathaṃ raṇam
और जो व्यूह बनाए हुए प्रहार करने वाले सृञ्जय पाञ्चालों सहित द्रोण पर टूट पड़े थे, उन्होंने कैसे युद्ध किया?
श्लोक 14 (7.184.14)
सौमदत्तेर्वधाद्द्रोणमायान्तं सैन्धवस्य च । अमर्षाज्जीवितं त्यक्त्वा गाहमानं वरूथिनीम् ॥
saumadattervadhāddroṇamāyāntaṃ saindhavasya ca | amarṣājjīvitaṃ tyaktvā gāhamānaṃ varūthinīm
सोमदत्त-पुत्र और सैन्धव के वध के कारण क्रोध से जीवन की चिन्ता छोड़कर सेना में घुसते हुए द्रोण बढ़े आ रहे थे —
श्लोक 15 (7.184.15)
जृम्भमाणमिव व्याघ्रं व्यात्ताननमिवान्तकम् । कथं प्रत्युद्ययुर्द्रोणमस्यन्तं पाण्डुसृञ्जयाः ॥
jṛmbhamāṇamiva vyāghraṃ vyāttānanamivāntakam | kathaṃ pratyudyayurdroṇamasyantaṃ pāṇḍusṛñjayāḥ
जम्हाई लेते बाघ के समान, मुँह फाड़े यमराज के समान, बाण बरसाते हुए उन द्रोण का पाण्डवों और सृञ्जयों ने कैसे सामना किया?
श्लोक 16 (7.184.16)
आचार्यं ये च तेऽरक्षन्दुर्योधनपुरोगमाः । द्रौणिकर्णकृपास्तात ते वाऽकुर्वन्किमाहवे ॥
ācāryaṃ ye ca te'rakṣanduryodhanapurogamāḥ | drauṇikarṇakṛpāstāta te vā'kurvankimāhave
और जिन दुर्योधन आदि ने आचार्य की रक्षा की, हे तात, द्रोण-पुत्र, कर्ण और कृप ने उस युद्ध में क्या किया?
श्लोक 17 (7.184.17)
भारद्वाजं जिघांसन्तौ सव्यसाचिवृकोदरौ । समार्च्छन्मामका युद्धे कथं सञ्जय शंस मे ॥
bhāradvājaṃ jighāṃsantau savyasācivṛkodarau | samārcchanmāmakā yuddhe kathaṃ sañjaya śaṃsa me
भरद्वाज-पुत्र द्रोण को मारना चाहने वाले सव्यसाची और वृकोदर से मेरे लोग युद्ध में कैसे भिड़े? हे सञ्जय, मुझे बताओ।
श्लोक 18 (7.184.18)
सिन्धुराजवधेनेमे घटोत्कचवधेन ते । अमर्षिताः सुसङ्क्रुद्धा रणं चक्रुः कथं निशि ॥
sindhurājavadheneme ghaṭotkacavadhena te | amarṣitāḥ susaṅkruddhā raṇaṃ cakruḥ kathaṃ niśi
ये सिन्धुराज के वध से और वे घटोत्कच के वध से असहनशील और अत्यन्त क्रुद्ध होकर रात में कैसे लड़े?
सञ्जय उवाच
श्लोक 19 (7.184.19)
हते घटोत्कचे राजन्कर्णेन निशि राक्षसे । प्रणदत्सु च हृष्टेषु तावकेषु युयुत्सुषु ॥
hate ghaṭotkace rājankarṇena niśi rākṣase | praṇadatsu ca hṛṣṭeṣu tāvakeṣu yuyutsuṣu
हे राजन्, रात में कर्ण द्वारा राक्षस घटोत्कच के मारे जाने पर, जब आपके हर्षित और युद्ध के इच्छुक योद्धा गरज रहे थे,
श्लोक 20 (7.184.20)
आपतत्सु च वेगेन वध्यमाने बलेऽपि च । विगाढायां रजन्यां च राजा दैन्यं परं गतः ॥
āpatatsu ca vegena vadhyamāne bale'pi ca | vigāḍhāyāṃ rajanyāṃ ca rājā dainyaṃ paraṃ gataḥ
और वेग से टूट पड़ रहे थे तथा पाण्डव-सेना का वध हो रहा था, रात्रि के गहरी होने पर राजा युधिष्ठिर अत्यन्त दीन हो गए।
श्लोक 21 (7.184.21)
अब्रवीच्च महाबाहुर्भीमसेनमिदं वचः । आवारय महाबाहो धार्तराष्ट्रस्य वाहिनीम् ॥
abravīcca mahābāhurbhīmasenamidaṃ vacaḥ | āvāraya mahābāho dhārtarāṣṭrasya vāhinīm
और महाबाहु ने भीमसेन से यह वचन कहा — "हे महाबाहु, धृतराष्ट्र-पुत्र की सेना को रोको।
श्लोक 22 (7.184.22)
हैडिम्बेश्चैव घातेन मोहो मामाविशन्महान् । एवं भीमं समादिश्य स्वरथे समुपाविशत् ॥
haiḍimbeścaiva ghātena moho māmāviśanmahān | evaṃ bhīmaṃ samādiśya svarathe samupāviśat
हिडिम्बा-पुत्र के मारे जाने से मुझ पर बड़ा मोह छा गया है।" इस प्रकार भीम को आदेश देकर वे अपने रथ में बैठ गए।
श्लोक 23 (7.184.23)
अश्रुपूर्णमुखो राजा निःश्वसंश्च पुनःपुनः । कश्मलं प्राविशद्धोरं दृष्ट्वा कर्णस्य विक्रमम् ॥
aśrupūrṇamukho rājā niḥśvasaṃśca punaḥpunaḥ | kaśmalaṃ prāviśaddhoraṃ dṛṣṭvā karṇasya vikramam
आँसुओं से भरे मुख वाले राजा बार-बार आहें भरते हुए कर्ण का पराक्रम देखकर भयंकर विषाद में डूब गए।
श्लोक 24 (7.184.24)
तं तथा व्यथितं दृष्ट्वा कृष्णो वचनमब्रवीत् ॥
taṃ tathā vyathitaṃ dṛṣṭvā kṛṣṇo vacanamabravīt
उन्हें इस प्रकार व्यथित देखकर कृष्ण ने यह वचन कहा।
वासुदेव उवाच
श्लोक 25 (7.184.25)
मा व्यथां कुरु कौन्तेय नैतत्त्वय्युपपद्यते । वैक्लव्यं भरतश्रेष्ठ यथा प्राकृतपूरुषे ॥
mā vyathāṃ kuru kaunteya naitattvayyupapadyate | vaiklavyaṃ bharataśreṣṭha yathā prākṛtapūruṣe
हे कुन्तीपुत्र, शोक मत करो; हे भरतश्रेष्ठ, साधारण मनुष्य की तरह यह घबराहट तुम्हें शोभा नहीं देती।
श्लोक 26 (7.184.26)
उत्तिष्ठ राजन्युध्वस्व वह गुर्वीं धुरं विभो । त्वयि वैक्लव्यमापन्ने संशयो विजये भवेत् ॥
uttiṣṭha rājanyudhvasva vaha gurvīṃ dhuraṃ vibho | tvayi vaiklavyamāpanne saṃśayo vijaye bhavet
हे राजन्, उठो और युद्ध करो; हे विभु, भारी भार वहन करो। तुम्हारे घबरा जाने पर विजय संदिग्ध हो जाएगी।
सञ्जय उवाच
श्लोक 27 (7.184.27)
श्रुत्वा कृष्णस्य वचनं धर्मराजो युधिष्ठिरः । विमृज्य नेत्रे पाणिभ्यां कृष्णं वचनमब्रवीत् ॥
śrutvā kṛṣṇasya vacanaṃ dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | vimṛjya netre pāṇibhyāṃ kṛṣṇaṃ vacanamabravīt
कृष्ण के वचन सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर ने दोनों हाथों से आँखें पोंछीं और कृष्ण से कहा:
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 28 (7.184.28)
विदिता मे महाबाहो धर्माणां परमा गतिः । ब्रह्महत्याफलं तस्य यः कृतं नावबुध्यते ॥
viditā me mahābāho dharmāṇāṃ paramā gatiḥ | brahmahatyāphalaṃ tasya yaḥ kṛtaṃ nāvabudhyate
हे महाबाहु, मैं धर्मों की परम गति जानता हूँ: जो मनुष्य अपने प्रति किए गए उपकार को नहीं मानता, उसे ब्रह्महत्या का फल मिलता है।
श्लोक 29 (7.184.29)
अस्माकं हि वनस्थानां हैडिम्बेन महात्मना । बालेनापि सता तेन कृतं साह्यं जनार्दन ॥
asmākaṃ hi vanasthānāṃ haiḍimbena mahātmanā | bālenāpi satā tena kṛtaṃ sāhyaṃ janārdana
हे जनार्दन, जब हम वन में रहते थे, तब हिडिम्बा के महात्मा पुत्र ने बालक होते हुए भी हमारी सहायता की।
श्लोक 30 (7.184.30)
अस्त्रहेतोर्गतं ज्ञात्वा पाण्डवं श्वेतवाहनम् । असौ कृष्ण महेष्वासः काम्यके मामुपस्थितः ॥
astrahetorgataṃ jñātvā pāṇḍavaṃ śvetavāhanam | asau kṛṣṇa maheṣvāsaḥ kāmyake māmupasthitaḥ
श्वेत अश्वों वाले अर्जुन को अस्त्रों के लिए गया जानकर, हे कृष्ण, वह महाधनुर्धर काम्यक वन में मेरे पास आया,
श्लोक 31 (7.184.31)
उषितश्च सहास्माभिर्यावन्नासीद्धनञ्जयः । गन्धमादनयात्रायां दुर्गेभ्यश्च स्म तारिताः । पाञ्चाली च परिश्रान्ता पृष्ठेनोढा महात्मना ॥
uṣitaśca sahāsmābhiryāvannāsīddhanañjayaḥ | gandhamādanayātrāyāṃ durgebhyaśca sma tāritāḥ | pāñcālī ca pariśrāntā pṛṣṭhenoḍhā mahātmanā
और जब तक धनञ्जय नहीं था, तब तक हमारे साथ रहा। गन्धमादन की यात्रा में उसने हमें दुर्गम स्थानों से पार उतारा, और थकी हुई पाञ्चाली को उस महात्मा ने पीठ पर उठाया।
श्लोक 32 (7.184.32)
आरम्भांश्चैव युद्धानां यदेष कृतवान्प्रभो । मदर्थे दुष्करं कर्म कृतं तेन महाहवे ॥
ārambhāṃścaiva yuddhānāṃ yadeṣa kṛtavānprabho | madarthe duṣkaraṃ karma kṛtaṃ tena mahāhave
हे प्रभु, युद्धों का आरम्भ करके इसने जो-जो किया, उस महायुद्ध में इसने मेरे लिए कठिन कर्म किया।
श्लोक 33 (7.184.33)
स्वभावाद्या च मे प्रीतिः सहदेवे जनार्दन । सैव मे द्विगुणा प्रीती राक्षसेन्द्रे घटोत्कचे ॥
svabhāvādyā ca me prītiḥ sahadeve janārdana | saiva me dviguṇā prītī rākṣasendre ghaṭotkace
हे जनार्दन, सहदेव पर मेरा जो स्वाभाविक प्रेम है, वही राक्षसराज घटोत्कच पर मेरा दुगुना प्रेम था।
श्लोक 34 (7.184.34)
भक्तश्च मे महाबाहुः प्रियोऽस्याहं प्रियश्च मे । तेन विन्दामि वार्ष्णेय कश्मलं शोकतापितः ॥
bhaktaśca me mahābāhuḥ priyo'syāhaṃ priyaśca me | tena vindāmi vārṣṇeya kaśmalaṃ śokatāpitaḥ
वह महाबाहु मेरा भक्त था; मैं उसे प्रिय था और वह मुझे प्रिय था। इसी से, हे वार्ष्णेय, शोक से तपा हुआ मैं मूर्च्छा-सी अनुभव कर रहा हूँ।
श्लोक 35 (7.184.35)
पश्य सैन्यानि वार्ष्णेय द्राव्यमाणानि कौरवैः । द्रोणकर्णौ तु संयत्तौ पश्य युद्धे महारथौ ॥
paśya sainyāni vārṣṇeya drāvyamāṇāni kauravaiḥ | droṇakarṇau tu saṃyattau paśya yuddhe mahārathau
हे वार्ष्णेय, देखो, कौरव हमारी सेनाओं को भगा रहे हैं; और युद्ध में तत्पर इन दोनों महारथियों द्रोण और कर्ण को देखो।
श्लोक 36 (7.184.36)
निशीथे पाण्डवं सैन्यमाभ्यां माधव मर्दितम् । गजाभ्यामिव मत्ताभ्यां यथा नलवनं महत् ॥
niśīthe pāṇḍavaṃ sainyamābhyāṃ mādhava marditam | gajābhyāmiva mattābhyāṃ yathā nalavanaṃ mahat
हे माधव, आधी रात में इन दोनों ने पाण्डव-सेना को वैसे ही रौंद डाला, जैसे दो मतवाले हाथी नरकुलों के विशाल वन को रौंद दें।
श्लोक 37 (7.184.37)
अनादृत्य बलं बाह्वोर्भीमसेनस्य माधव । चित्रास्त्रतां च पार्थस्य विक्रमन्ते च कौरवाः ॥
anādṛtya balaṃ bāhvorbhīmasenasya mādhava | citrāstratāṃ ca pārthasya vikramante ca kauravāḥ
भीमसेन की भुजाओं के बल और पार्थ की विचित्र अस्त्र-विद्या की उपेक्षा करके कौरव पराक्रम दिखा रहे हैं।
श्लोक 38 (7.184.38)
एष द्रोणश्च कर्णश्च राजा चैव सुयोधनः । निहत्य राक्षसं युद्धे हृष्टा नर्दन्ति संयुगे ॥
eṣa droṇaśca karṇaśca rājā caiva suyodhanaḥ | nihatya rākṣasaṃ yuddhe hṛṣṭā nardanti saṃyuge
ये द्रोण, कर्ण और राजा सुयोधन राक्षस को युद्ध में मारकर हर्षित होकर रणभूमि में गरज रहे हैं।
श्लोक 39 (7.184.39)
कथं वाऽस्मासु जीवत्सु त्वयि चैव जनार्दन । हैडिम्बिः प्राप्तवान्मृत्युं सूतपुत्रेण सङ्गतः ॥
kathaṃ vā'smāsu jīvatsu tvayi caiva janārdana | haiḍimbiḥ prāptavānmṛtyuṃ sūtaputreṇa saṅgataḥ
हे जनार्दन, हमारे और आपके जीवित रहते हिडिम्बा-पुत्र सूतपुत्र से भिड़कर मृत्यु को कैसे प्राप्त हुआ?
श्लोक 40 (7.184.40)
कदर्थीकृत्य नः सर्वान्पश्यतः सव्यसाचिनः । निहतो राक्षसः कृष्ण भैमसेनिर्महाबलः ॥
kadarthīkṛtya naḥ sarvānpaśyataḥ savyasācinaḥ | nihato rākṣasaḥ kṛṣṇa bhaimasenirmahābalaḥ
हे कृष्ण, हम सब का तिरस्कार करके सव्यसाची के देखते-देखते महाबली भीमसेन-पुत्र राक्षस मारा गया।
श्लोक 41 (7.184.41)
यदाऽभिमन्युर्निहतो धार्तराष्ट्रैर्दुरात्मभिः । नासीत्तत्र रणे कृष्ण सव्यसाची महारथः ॥
yadā'bhimanyurnihato dhārtarāṣṭrairdurātmabhiḥ | nāsīttatra raṇe kṛṣṇa savyasācī mahārathaḥ
हे कृष्ण, जब दुरात्मा धृतराष्ट्र-पुत्रों ने अभिमन्यु को मारा, तब महारथी सव्यसाची उस रण में नहीं था।
श्लोक 42 (7.184.42)
निरुद्वाश्च वयं सर्वे सैन्धवेन दुरात्मना । निमित्तमभवद्द्रोणः सपुत्रस्तत्र कर्मणि ॥
nirudvāśca vayaṃ sarve saindhavena durātmanā | nimittamabhavaddroṇaḥ saputrastatra karmaṇi
हम सब दुरात्मा सैन्धव द्वारा रोक दिए गए थे, और उस कार्य में पुत्र सहित द्रोण निमित्त बने।
श्लोक 43 (7.184.43)
उपदिष्टो वधोपायः कर्णस्य गुरुणा स्वयम् । व्यायच्छतश्च खड्गेन द्विधा खड्गं चकार ह ॥
upadiṣṭo vadhopāyaḥ karṇasya guruṇā svayam | vyāyacchataśca khaḍgena dvidhā khaḍgaṃ cakāra ha
उसे मारने का उपाय कर्ण को उसके गुरु ने स्वयं बताया था, और जब वह तलवार लेकर जूझ रहा था, तब उसकी तलवार के दो टुकड़े कर दिए गए।
श्लोक 44 (7.184.44)
व्यसने वर्तमानस्य कृतवर्मा नृशंसवत् । अश्वाञ्जघान सहसा तथोभौ पार्ष्णिसारथी । तथेतरे महेष्वासाः सौभद्रं युध्यपातयन् ॥
vyasane vartamānasya kṛtavarmā nṛśaṃsavat | aśvāñjaghāna sahasā tathobhau pārṣṇisārathī | tathetare maheṣvāsāḥ saubhadraṃ yudhyapātayan
जब वह संकट में था, तब निर्दयी कृतवर्मा ने अचानक उसके घोड़ों को मार डाला, तथा उसके दोनों पार्ष्णि-रक्षक और सारथि को भी; और इसी तरह अन्य महाधनुर्धरों ने युद्ध में सुभद्रा-पुत्र को गिरा दिया।
श्लोक 45 (7.184.45)
अल्पे च कारणे कृष्ण हतो गाण्डीवधन्वना । सैन्धवो यादवश्रेष्ठ तच्च नातिप्रियं मम ॥
alpe ca kāraṇe kṛṣṇa hato gāṇḍīvadhanvanā | saindhavo yādavaśreṣṭha tacca nātipriyaṃ mama
हे यादवश्रेष्ठ कृष्ण, एक छोटे-से कारण पर गाण्डीवधारी ने सैन्धव को मारा था, और वह मुझे बहुत प्रिय नहीं लगा।
श्लोक 46 (7.184.46)
यदि शत्रुवधो न्याय्यो भवेत्कर्तुं हि पाण्डवैः । कर्णद्रोणौ रणे पूर्वं हन्तव्याविति मे मतिः ॥
yadi śatruvadho nyāyyo bhavetkartuṃ hi pāṇḍavaiḥ | karṇadroṇau raṇe pūrvaṃ hantavyāviti me matiḥ
यदि पाण्डवों द्वारा शत्रुओं का वध करना उचित हो, तो रण में पहले कर्ण और द्रोण को मारना चाहिए था — ऐसा मेरा मत है।
श्लोक 47 (7.184.47)
एतौ हि मूलं दुःखानामस्माकं पुरुषर्षभ । एतौ रणे समासाद्य समाश्वस्तः सुयोधनः ॥
etau hi mūlaṃ duḥkhānāmasmākaṃ puruṣarṣabha | etau raṇe samāsādya samāśvastaḥ suyodhanaḥ
हे पुरुषश्रेष्ठ, ये दोनों ही हमारे दुःखों की जड़ हैं; इन दोनों को रण में पाकर सुयोधन आश्वस्त हो गया है।
श्लोक 48 (7.184.48)
यत्र वध्यो भवेद्द्रोणः सूतपुत्रश्च सानुगः । तत्रावधीन्महाबाहुः सैन्धवं दूरवासिनम् ॥
yatra vadhyo bhaveddroṇaḥ sūtaputraśca sānugaḥ | tatrāvadhīnmahābāhuḥ saindhavaṃ dūravāsinam
जहाँ द्रोण और अनुचरों सहित सूतपुत्र को मारना चाहिए था, वहाँ महाबाहु अर्जुन ने दूर रहने वाले सैन्धव को मारा।
श्लोक 49 (7.184.49)
अवश्यं तु मया कार्यः सूतपुत्रस्य निग्रहः । ततो यास्याम्यहं वीर स्वयं कर्णजिघांसया ॥
avaśyaṃ tu mayā kāryaḥ sūtaputrasya nigrahaḥ | tato yāsyāmyahaṃ vīra svayaṃ karṇajighāṃsayā
पर सूतपुत्र का दमन मुझे अवश्य करना है; इसलिए हे वीर, मैं स्वयं कर्ण को मारने की इच्छा से जाऊँगा।
श्लोक 50 (7.184.50)
भीमसेनो महाबाहुर्द्रोणानीकेन सङ्गतः ॥
bhīmaseno mahābāhurdroṇānīkena saṅgataḥ
महाबाहु भीमसेन द्रोण की सेना से भिड़े हुए हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 51 (7.184.51)
एवमुक्त्वा ययौ तूर्णं त्वरमाणो युधिष्ठिरः । स विष्फार्य महच्चापं शङ्खं प्रध्माप्य भैरवम् ॥
evamuktvā yayau tūrṇaṃ tvaramāṇo yudhiṣṭhiraḥ | sa viṣphārya mahaccāpaṃ śaṅkhaṃ pradhmāpya bhairavam
यह कहकर युधिष्ठिर अपने विशाल धनुष को तानते और भयंकर शंख बजाते हुए शीघ्रता से चल पड़े।
श्लोक 52 (7.184.52)
ततो रथसहस्रेण गजानां च शतैस्त्रिभिः । वाजिभिः पञ्चसाहस्रैः पाञ्चालैः सप्रभद्रकैः । वृतः शिखण्डी त्वरितो राजानं पृष्ठतोऽन्वयात् ॥
tato rathasahasreṇa gajānāṃ ca śataistribhiḥ | vājibhiḥ pañcasāhasraiḥ pāñcālaiḥ saprabhadrakaiḥ | vṛtaḥ śikhaṇḍī tvarito rājānaṃ pṛṣṭhato'nvayāt
तब एक हजार रथों, तीन सौ हाथियों, पाँच हजार घोड़ों तथा प्रभद्रकों सहित पाञ्चालों से घिरा शिखण्डी शीघ्रता से राजा के पीछे-पीछे चला।
श्लोक 53 (7.184.53)
ततो भेरीः समाजघ्नुः पणवानकगोमुखान् । शङ्खशब्दरवांश्चैव पाणिशब्दांश्च दंशिताः । पाञ्चालाः पाण्डवाश्चैव युधिष्ठिरपुरोगमाः ॥
tato bherīḥ samājaghnuḥ paṇavānakagomukhān | śaṅkhaśabdaravāṃścaiva pāṇiśabdāṃśca daṃśitāḥ | pāñcālāḥ pāṇḍavāścaiva yudhiṣṭhirapurogamāḥ
तब युधिष्ठिर को आगे किए हुए कवचधारी पाञ्चालों और पाण्डवों ने भेरी, पणव, आनक और गोमुख बजाए, तथा शंखों की ध्वनि और ताली की गड़गड़ाहट की।
श्लोक 54 (7.184.54)
ततोऽब्रवीन्महाबाहुर्वासुदेवो धनञ्जयम् ॥
tato'bravīnmahābāhurvāsudevo dhanañjayam
तब महाबाहु वासुदेव ने धनञ्जय से कहा:
वासुदेव उवाच
श्लोक 55 (7.184.55)
एष प्रयाति त्वरितः क्रोधाविष्टो युधिष्ठिरः । जिघांसुः सूतपुत्रस्य तस्योपेक्षा न युज्यते ॥
eṣa prayāti tvaritaḥ krodhāviṣṭo yudhiṣṭhiraḥ | jighāṃsuḥ sūtaputrasya tasyopekṣā na yujyate
क्रोध से भरे युधिष्ठिर सूतपुत्र को मारने की इच्छा से शीघ्र जा रहे हैं; उनकी उपेक्षा करना उचित नहीं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 56 (7.184.56)
एवमुक्त्वा हृषीकेशः शीघ्रमश्वानचोदयत् । दूरं प्रयान्तं राजानमन्वगच्छज्जनार्दनः ॥
evamuktvā hṛṣīkeśaḥ śīghramaśvānacodayat | dūraṃ prayāntaṃ rājānamanvagacchajjanārdanaḥ
यह कहकर हृषीकेश ने शीघ्र घोड़ों को हाँका और जनार्दन दूर निकल चुके राजा के पीछे चले।
श्लोक 57 (7.184.57)
तं दृष्ट्वा सहसा यान्तं सूतपुत्रजिघांसया । शोकोपहतसङ्कल्पं दह्यमानमिवाग्निना । अभिगम्याब्रवीद्व्यासो धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥
taṃ dṛṣṭvā sahasā yāntaṃ sūtaputrajighāṃsayā | śokopahatasaṅkalpaṃ dahyamānamivāgninā | abhigamyābravīdvyāso dharmaputraṃ yudhiṣṭhiram
सूतपुत्र को मारने की इच्छा से अचानक जाते हुए, शोक से दबे संकल्प वाले और मानो आग में जलते हुए धर्मपुत्र युधिष्ठिर को देखकर व्यास उनके पास आए और बोले।
व्यास उवाच
श्लोक 58 (7.184.58)
कर्णमासाद्य सङ्ग्रामे दिष्ट्या जीवति फल्गुनः ॥
karṇamāsādya saṅgrāme diṣṭyā jīvati phalgunaḥ
सौभाग्य है कि कर्ण से रण में भिड़कर भी फल्गुन जीवित है!
श्लोक 59 (7.184.59)
सव्यसाचिवधाकाङ्क्षी शक्तिं रक्षितवान्हि सः । न चागाद्द्वैरथं जिष्णुर्दिष्ट्या तेन महारणे ॥
savyasācivadhākāṅkṣī śaktiṃ rakṣitavānhi saḥ | na cāgāddvairathaṃ jiṣṇurdiṣṭyā tena mahāraṇe
सव्यसाची को मारने की इच्छा से उसने शक्ति को सँभालकर रखा था; और सौभाग्य से उसी कारण जिष्णु महायुद्ध में द्वैरथ युद्ध में नहीं गया।
श्लोक 60 (7.184.60)
सृजेतां स्पर्धिनावेतौ दिव्यान्यस्त्राणि सर्वशः । वध्यमानेषु चास्त्रेषु पीडितः सूतनन्दनः ॥
sṛjetāṃ spardhināvetau divyānyastrāṇi sarvaśaḥ | vadhyamāneṣu cāstreṣu pīḍitaḥ sūtanandanaḥ
ये दोनों स्पर्धी सब प्रकार के दिव्य अस्त्र छोड़ते; और अस्त्रों के काटे जाने पर पीड़ित सूतपुत्र
श्लोक 61 (7.184.61)
वासवीं समरे शक्तिं ध्रुवं मुञ्चेद्युधिष्ठिर । ततो भवेत्ते व्यसनं घोरं भरतसत्तम ॥
vāsavīṃ samare śaktiṃ dhruvaṃ muñcedyudhiṣṭhira | tato bhavette vyasanaṃ ghoraṃ bharatasattama
हे युधिष्ठिर, रण में निश्चय ही इन्द्र की शक्ति छोड़ देता; तब हे भरतश्रेष्ठ, तुम पर भयंकर विपत्ति आती।
श्लोक 62 (7.184.62)
दिष्ट्या रक्षो हतं युद्धे सूतपुत्रेण मानद । वासवीं कारणं कृत्वा कालेनोपहतो ह्यसौ ॥
diṣṭyā rakṣo hataṃ yuddhe sūtaputreṇa mānada | vāsavīṃ kāraṇaṃ kṛtvā kālenopahato hyasau
हे मान देने वाले, सौभाग्य से रण में राक्षस सूतपुत्र के हाथों मारा गया; शक्ति को निमित्त बनाकर वह काल से ग्रस्त हो गया।
श्लोक 63 (7.184.63)
तवैव कारणाद्रक्षो निहतं तात संयुगे । मा क्रुधो भरतश्रेष्ठ मा च शोके मनः कृथाः ॥
tavaiva kāraṇādrakṣo nihataṃ tāta saṃyuge | mā krudho bharataśreṣṭha mā ca śoke manaḥ kṛthāḥ
हे तात, राक्षस रण में तुम्हारे ही कारण मारा गया है। हे भरतश्रेष्ठ, क्रोध मत करो और मन को शोक में मत डालो।
श्लोक 64 (7.184.64)
प्राणिनामिह सर्वेषामेषा निष्ठा युधिष्ठिर । भ्रातृभिः सहितः सर्वैः पार्थिवैश्च महात्मभिः ॥
prāṇināmiha sarveṣāmeṣā niṣṭhā yudhiṣṭhira | bhrātṛbhiḥ sahitaḥ sarvaiḥ pārthivaiśca mahātmabhiḥ
हे युधिष्ठिर, यहाँ सब प्राणियों की यही अन्तिम गति है। अपने सब भाइयों और महात्मा राजाओं के साथ
श्लोक 65 (7.184.65)
कौरवान्समरे राजन्प्रतियुध्यस्व भारत । पञ्चमे दिवसे तात पृथिवी ते भविष्यति ॥
kauravānsamare rājanpratiyudhyasva bhārata | pañcame divase tāta pṛthivī te bhaviṣyati
हे राजन्, हे भारत, रण में कौरवों से लड़ो; हे तात, पाँचवें दिन पृथ्वी तुम्हारी हो जाएगी।
श्लोक 66 (7.184.66)
नित्यं च पुरुषव्याघ्र धर्ममेवानुचिन्तय । आनृशंस्यं तपो दानं क्षमां सत्यं च पाण्डव ॥
nityaṃ ca puruṣavyāghra dharmamevānucintaya | ānṛśaṃsyaṃ tapo dānaṃ kṣamāṃ satyaṃ ca pāṇḍava
और हे पुरुषसिंह, सदा धर्म का ही चिन्तन करो — हे पाण्डव, अक्रूरता, तप, दान, क्षमा और सत्य का
श्लोक 67 (7.184.67)
सेवेथाः परमप्रीतो यतो धर्मस्ततो जयः । इत्युक्त्वा पाण्डवं व्यासस्तत्रैवान्तरधीयत ॥
sevethāḥ paramaprīto yato dharmastato jayaḥ | ityuktvā pāṇḍavaṃ vyāsastatraivāntaradhīyata
परम प्रसन्नता से पालन करो; जहाँ धर्म है, वहीं विजय है।" पाण्डव से यह कहकर व्यास वहीं अन्तर्धान हो गए।