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द्रोण पर्व · अध्याय 185

रात्रि-युद्ध में निद्रा-विश्राम और चन्द्रोदय के बाद पुनः युद्ध

घटोत्कच के शोक में डूबे युधिष्ठिर धृष्टद्युम्न और समूची सेना को द्रोण पर टूट पड़ने की आज्ञा देते हैं, और रात का युद्ध चलता रहता है; थके हुए, नींद से अन्धे सैनिक मित्र और शत्रु में भेद किए बिना एक-दूसरे को मारते हैं। अर्जुन दोनों सेनाओं से कहते हैं कि चन्द्रमा के उगने तक जहाँ हैं वहीं रुककर सो जाएँ, और मनुष्य, हाथी और घोड़े सब सो जाते हैं। उदित चन्द्रमा संसार को प्रकाश से भर देता है, सेनाएँ जाग उठती हैं और युद्ध फिर शुरू हो जाता है।

अध्याय 184अध्याय-सूचीअध्याय 186

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.185.1)

व्यासेनैवमथोक्तस्तु धर्मराजो युधिष्ठिरः । स्वयं कर्णवधाद्वीरो निवृत्तो भरतर्षभ ॥

vyāsenaivamathoktastu dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | svayaṃ karṇavadhādvīro nivṛtto bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, व्यास के इस प्रकार कहने पर वीर धर्मराज युधिष्ठिर स्वयं कर्ण के वध से रुक गए।

श्लोक 2 (7.185.2)

घटोत्कचे तु निहते सूतपुत्रेण ता निशाम् । दुःखामर्षवशं प्राप्तो धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥

ghaṭotkace tu nihate sūtaputreṇa tā niśām | duḥkhāmarṣavaśaṃ prāpto dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ

उस रात सूतपुत्र के हाथों घटोत्कच के मारे जाने पर धर्मराज युधिष्ठिर दुःख और क्रोध के वश में हो गए।

श्लोक 3 (7.185.3)

दृष्ट्वा भीमेन महतीं वार्यमाणां चमूं तव । धृष्टद्युम्नमुवाचेदं कुम्भयोनिं निवारय ॥

dṛṣṭvā bhīmena mahatīṃ vāryamāṇāṃ camūṃ tava | dhṛṣṭadyumnamuvācedaṃ kumbhayoniṃ nivāraya

भीमसेन द्वारा तुम्हारी विशाल सेना को रोका जाता देखकर उन्होंने धृष्टद्युम्न से यह कहा — "कुम्भज द्रोण को रोको।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 4 (7.185.4)

त्वं हि द्रोणविनाशाय समुत्पन्नो हुताशनात् । सशरः कवची खड्गी धन्वी च परतापनः । अभिद्रव रणे हृष्टो मा च ते भीः कथञ्चन ॥

tvaṃ hi droṇavināśāya samutpanno hutāśanāt | saśaraḥ kavacī khaḍgī dhanvī ca paratāpanaḥ | abhidrava raṇe hṛṣṭo mā ca te bhīḥ kathañcana

तुम तो द्रोण के विनाश के लिए अग्नि से उत्पन्न हुए हो — बाण, कवच, खड्ग और धनुष से सुसज्जित, शत्रुओं को तपाने वाले। हर्ष के साथ रण में उन पर टूट पड़ो; तुम्हें किसी प्रकार का भय न हो।

श्लोक 5 (7.185.5)

जनमेजयः शिखण्डी च दौर्मुखिश्च यशोधरः । अभिद्रवन्तु संहृष्टाः कुम्भयोनिं समन्ततः ॥

janamejayaḥ śikhaṇḍī ca daurmukhiśca yaśodharaḥ | abhidravantu saṃhṛṣṭāḥ kumbhayoniṃ samantataḥ

जनमेजय, शिखण्डी, दौर्मुखि और यशोधर — ये सब प्रसन्न होकर चारों ओर से कुम्भज द्रोण पर टूट पड़ें।

श्लोक 6 (7.185.6)

नकुलः सहदेवश्च द्रौपदेयाः प्रभद्रकाः । द्रुपदश्च विराटश्च पुत्रभातृसमन्वितौ ॥

nakulaḥ sahadevaśca draupadeyāḥ prabhadrakāḥ | drupadaśca virāṭaśca putrabhātṛsamanvitau

नकुल और सहदेव, द्रौपदी के पुत्र, प्रभद्रक, तथा अपने पुत्रों और भाइयों के साथ द्रुपद और विराट —

श्लोक 7 (7.185.7)

सात्यकिः केकयाश्चैव पाण्डवश्च धनञ्जयः । अभिद्रवन्तु वेगेन कुम्भयोनिवधेप्सया ॥

sātyakiḥ kekayāścaiva pāṇḍavaśca dhanañjayaḥ | abhidravantu vegena kumbhayonivadhepsayā

सात्यकि, केकय और पाण्डुपुत्र धनञ्जय — ये सब कुम्भज द्रोण को मारने की इच्छा से वेगपूर्वक टूट पड़ें।

श्लोक 8 (7.185.8)

तथैव रथिनः सर्वे हस्त्यश्वं यच्च किञ्चन । पदाताश्च रणे द्रोणं पातयन्तु महारथम् ॥

tathaiva rathinaḥ sarve hastyaśvaṃ yacca kiñcana | padātāśca raṇe droṇaṃ pātayantu mahāratham

इसी प्रकार सभी रथी, हाथी, घोड़े और जो कुछ भी सेना में है, तथा पैदल सैनिक — सब रणभूमि में महारथी द्रोण को गिरा दें।

सञ्जय उवाच

श्लोक 9 (7.185.9)

तथाऽऽज्ञप्तास्तु ते सर्वे पाण्डवेन महात्मना । अभ्यद्रवन्त वेगेन कुम्भयोनिवधेप्सया ॥

tathā''jñaptāstu te sarve pāṇḍavena mahātmanā | abhyadravanta vegena kumbhayonivadhepsayā

महात्मा पाण्डव के इस प्रकार आज्ञा देने पर वे सब कुम्भज द्रोण को मारने की इच्छा से वेग से उन पर टूट पड़े।

श्लोक 10 (7.185.10)

आगच्छतस्तान्सहसा सर्वोद्योगेन पाण्डवान् । प्रतिजग्राह समरे द्रोणः शस्त्रभृतां वरः ॥

āgacchatastānsahasā sarvodyogena pāṇḍavān | pratijagrāha samare droṇaḥ śastrabhṛtāṃ varaḥ

पाण्डवों को पूरे उद्योग के साथ अचानक अपनी ओर आते देखकर शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ द्रोण ने रण में उनका सामना किया।

श्लोक 11 (7.185.11)

ततो दुर्योधनो राजा सर्वोद्योगेन पाण्डवान् । अभ्यद्रवत्सुसङ्क्रुद्ध इच्छन्द्रोणस्य जीवितम् ॥

tato duryodhano rājā sarvodyogena pāṇḍavān | abhyadravatsusaṅkruddha icchandroṇasya jīvitam

तब राजा दुर्योधन अत्यन्त क्रोधित होकर द्रोण के प्राण बचाने की इच्छा से पूरी शक्ति लगाकर पाण्डवों पर टूट पड़ा।

श्लोक 12 (7.185.12)

ततः प्रववृते युद्धं श्रान्तवाहनसैनिकम् । पाण्डवानां कुरूणां च गर्जतामितरेतरम् ॥

tataḥ pravavṛte yuddhaṃ śrāntavāhanasainikam | pāṇḍavānāṃ kurūṇāṃ ca garjatāmitaretaram

तब एक-दूसरे पर गरजते हुए पाण्डवों और कौरवों के बीच ऐसा युद्ध छिड़ा जिसमें सैनिक और वाहन सब थक चुके थे।

श्लोक 13 (7.185.13)

निद्रान्धास्ते महाराज परिश्रान्ताश्च संयुगे । नाभ्यपद्यन्त समरे काञ्चिच्चेष्टां महारथाः ॥

nidrāndhāste mahārāja pariśrāntāśca saṃyuge | nābhyapadyanta samare kāñcicceṣṭāṃ mahārathāḥ

हे महाराज, नींद से अन्धे और युद्ध में थककर चूर वे महारथी रण में कोई भी चेष्टा नहीं कर पा रहे थे।

श्लोक 14 (7.185.14)

त्रियामा रजनी चैषा घोररूपा भयानका । सहस्रयामप्रतिमा बभूव प्राणहारिणी ॥

triyāmā rajanī caiṣā ghorarūpā bhayānakā | sahasrayāmapratimā babhūva prāṇahāriṇī

तीन प्रहर की वह रात भयंकर रूप वाली और भयानक थी; प्राणों को हरने वाली वह रात हज़ार प्रहरों के समान लम्बी हो गई।

श्लोक 15 (7.185.15)

वध्यतां च तथा तेषां क्षतानां च विशेषतः । घोरा रात्रिः समाजज्ञे निद्रान्धानां विशेषतः ॥

vadhyatāṃ ca tathā teṣāṃ kṣatānāṃ ca viśeṣataḥ | ghorā rātriḥ samājajñe nidrāndhānāṃ viśeṣataḥ

मारे जा रहे और विशेषतः घायल हुए उन सैनिकों के लिए, और उनमें भी विशेष रूप से नींद से अन्धे हुओं के लिए, वह रात बड़ी भयानक हो उठी।

श्लोक 16 (7.185.16)

सर्वे ह्यासन्निरुत्साहाः क्षत्रिया दीनचेतसः । तव चैव परेषां च गतास्त्रा विगतेषवः ॥

sarve hyāsannirutsāhāḥ kṣatriyā dīnacetasaḥ | tava caiva pareṣāṃ ca gatāstrā vigateṣavaḥ

तुम्हारे और शत्रुओं के भी सभी क्षत्रिय उत्साहहीन और खिन्न मन के हो गए थे; उनके अस्त्र चुक गए थे और बाण समाप्त हो गए थे।

श्लोक 17 (7.185.17)

ते तदा पारयन्तश्च भ्रमन्तश्च विशेषतः । स्वधर्ममनुपश्यन्तो न जहुः स्वामनीकिनीम् ॥

te tadā pārayantaśca bhramantaśca viśeṣataḥ | svadharmamanupaśyanto na jahuḥ svāmanīkinīm

फिर भी वे टिके रहे और विशेष रूप से इधर-उधर घूमते रहे; अपने धर्म का ध्यान रखते हुए उन्होंने अपनी सेना को नहीं छोड़ा।

श्लोक 18 (7.185.18)

अस्त्राण्यन्ये समुत्सृज्य निद्रान्धाः शेरते जनाः । रथेष्वन्ये गजेष्वन्ये हयेष्वन्ये च भारत ॥

astrāṇyanye samutsṛjya nidrāndhāḥ śerate janāḥ | ratheṣvanye gajeṣvanye hayeṣvanye ca bhārata

हे भारत, कुछ लोग अस्त्र फेंककर नींद से अन्धे होकर सो गए — कुछ रथों पर, कुछ हाथियों पर और कुछ घोड़ों पर।

श्लोक 19 (7.185.19)

निद्रान्धा नो बुबुधिरे काञ्चिच्चेष्टां नराधिप । तानन्ये समरे योधाः प्रेषयन्ति यमक्षयम् ॥

nidrāndhā no bubudhire kāñcicceṣṭāṃ narādhipa | tānanye samare yodhāḥ preṣayanti yamakṣayam

हे नरेश्वर, नींद से अन्धे हुए वे कोई भी चेष्टा नहीं कर पा रहे थे, और दूसरे योद्धा उन्हें रण में यमलोक भेज रहे थे।

श्लोक 20 (7.185.20)

स्वप्नायमानांस्त्वपरे परानतिविचेतसः । आत्मानं समरे जघ्नुः स्वानेव च परानपि ॥

svapnāyamānāṃstvapare parānativicetasaḥ | ātmānaṃ samare jaghnuḥ svāneva ca parānapi

अन्य लोग, पूरी तरह बेसुध होकर, रण में ऊँघते हुए शत्रुओं पर प्रहार करते थे, और अपने आप पर, अपने ही लोगों पर और शत्रुओं पर भी वार कर बैठते थे।

श्लोक 21 (7.185.21)

नानावाचो विमुञ्चन्तो निद्रान्धास्ते महारणे ॥

nānāvāco vimuñcanto nidrāndhāste mahāraṇe

उस महायुद्ध में वे नींद से अन्धे लोग तरह-तरह की बातें बोल रहे थे —

श्लोक 22 (7.185.22)

अस्माकं च महाराज परेभ्यो बहवो जनाः । योद्धव्यमिति तिष्ठन्तो निद्रासंरक्तलोचनाः ॥

asmākaṃ ca mahārāja parebhyo bahavo janāḥ | yoddhavyamiti tiṣṭhanto nidrāsaṃraktalocanāḥ

हे महाराज, हमारे और शत्रुओं के भी बहुत-से लोग "हमें लड़ना है" यह सोचकर नींद से लाल आँखें लिए खड़े थे।

श्लोक 23 (7.185.23)

संसर्पन्तो रणे केचिन्निद्रान्धास्ते तथापरान् । जघ्नुः शूरा रणे शूरांस्तस्मिंस्तमसि दारुणे ॥

saṃsarpanto raṇe kecinnidrāndhāste tathāparān | jaghnuḥ śūrā raṇe śūrāṃstasmiṃstamasi dāruṇe

उन नींद से अन्धे लोगों में से कुछ रण में रेंगते हुए दूसरों को मार डालते थे; उस भयानक अन्धकार में शूर योद्धा शूरों को मार रहे थे।

श्लोक 24 (7.185.24)

हन्यमानमथात्मानं परैश्च बहवो जनाः । नाभ्यजानन्त समरे निद्रया मोहिता भृशम् ॥

hanyamānamathātmānaṃ paraiśca bahavo janāḥ | nābhyajānanta samare nidrayā mohitā bhṛśam

शत्रुओं के हाथों मारे जाते हुए भी बहुत-से लोग नींद से अत्यन्त मूढ़ होने के कारण रण में यह जान ही नहीं पाते थे कि वे स्वयं मारे जा रहे हैं।

श्लोक 25 (7.185.25)

तेषामेतादृशीं चेष्टां विज्ञाय पुरुषर्षभः । उवाच वाक्यं बीभत्सुरुच्चैः सन्नादयन्दिशः ॥

teṣāmetādṛśīṃ ceṣṭāṃ vijñāya puruṣarṣabhaḥ | uvāca vākyaṃ bībhatsuruccaiḥ sannādayandiśaḥ

उनकी ऐसी दशा जानकर पुरुषश्रेष्ठ अर्जुन ने दिशाओं को गुँजाते हुए ऊँचे स्वर में कहा —

अर्जुन उवाच

श्लोक 26 (7.185.26)

श्रान्ता भवन्तो निद्रान्धाः सर्व एव सवाहनाः । तमसा च वृते सैन्ये रजसा बहुलेन च ॥

śrāntā bhavanto nidrāndhāḥ sarva eva savāhanāḥ | tamasā ca vṛte sainye rajasā bahulena ca

आप सब थके हुए हैं, अपने वाहनों समेत सभी नींद से अन्धे हो रहे हैं; और सेना अन्धकार तथा घनी धूल से ढक गई है।

श्लोक 27 (7.185.27)

ते यूयं यदि मन्यध्वमुपारमत सैनिकाः । निमीलयत चात्रैव रणभूमौ मुहूर्तकम् ॥

te yūyaṃ yadi manyadhvamupāramata sainikāḥ | nimīlayata cātraiva raṇabhūmau muhūrtakam

इसलिए, सैनिको, यदि आप उचित समझें तो युद्ध रोक दें और इसी रणभूमि में थोड़ी देर आँखें मूँद लें।

श्लोक 28 (7.185.28)

ततो विनिद्रा विश्रान्ताश्चन्द्रमस्युदिते पुनः । संसाधयिष्यथान्योन्यं स्वर्गाय कुरुपाण्डवाः ॥

tato vinidrā viśrāntāścandramasyudite punaḥ | saṃsādhayiṣyathānyonyaṃ svargāya kurupāṇḍavāḥ

फिर नींद पूरी कर, विश्राम पाकर, चन्द्रमा के पुनः उदय होने पर आप कौरव और पाण्डव एक-दूसरे को स्वर्ग भेजने का काम फिर करेंगे।

सञ्जय उवाच

श्लोक 29 (7.185.29)

तद्वचः सर्वधर्मज्ञा धार्मिकस्य विशाम्पते । अरोचयन्त सैन्यानि तथा चान्योन्यमब्रुवन् ॥

tadvacaḥ sarvadharmajñā dhārmikasya viśāmpate | arocayanta sainyāni tathā cānyonyamabruvan

हे प्रजापालक, सब धर्मों को जानने वाली सेनाओं को उस धर्मात्मा की बात अच्छी लगी, और वे आपस में भी वैसा ही कहने लगीं।

श्लोक 30 (7.185.30)

चुक्रुशुः कर्णकर्णेति तथा दुर्योधनेति च । उपारमत पाण्डूनां विरता हि वरूथिनी ॥

cukruśuḥ karṇakarṇeti tathā duryodhaneti ca | upāramata pāṇḍūnāṃ viratā hi varūthinī

वे "कर्ण! कर्ण!" और "दुर्योधन!" पुकार उठे; और पाण्डवों की सेना भी लड़ना छोड़कर रुक गई।

श्लोक 31 (7.185.31)

तथा विक्रोशमानस्य फल्गुनस्य ततस्ततः । उपारमत पाण्डूनां सेना तव च भारत ॥

tathā vikrośamānasya phalgunasya tatastataḥ | upāramata pāṇḍūnāṃ senā tava ca bhārata

हे भारत, अर्जुन के इधर-उधर इस प्रकार पुकारते रहने पर पाण्डवों की सेना रुक गई, और तुम्हारी भी।

श्लोक 32 (7.185.32)

तामस्य वाचं देवाश्च ऋषयश्च महात्मनः । सर्वसैन्यानि चाक्षुद्रां प्रहृष्टाः प्रत्यपूजयन् ॥

tāmasya vācaṃ devāśca ṛṣayaśca mahātmanaḥ | sarvasainyāni cākṣudrāṃ prahṛṣṭāḥ pratyapūjayan

देवताओं, ऋषियों और सभी सेनाओं ने हर्षित होकर उन महात्मा के उस उदार वचन का सत्कार किया।

श्लोक 33 (7.185.33)

तत्सम्पूज्य वचोऽक्रूरं सर्वसैन्यानि भारत । मुहूर्तमस्वपन्राजञ्श्रान्तानि भरतर्षभ ॥

tatsampūjya vaco'krūraṃ sarvasainyāni bhārata | muhūrtamasvapanrājañśrāntāni bharatarṣabha

हे राजन्, हे भरतश्रेष्ठ, उस कोमल वचन का आदर करके सभी थकी हुई सेनाएँ थोड़ी देर के लिए सो गईं।

श्लोक 34 (7.185.34)

सा तु सम्प्राप्य विश्रामं ध्वजिनी तव भारत । सुखमाप्तवती वीरमर्जुनं प्रत्यपूजयत् ॥

sā tu samprāpya viśrāmaṃ dhvajinī tava bhārata | sukhamāptavatī vīramarjunaṃ pratyapūjayat

हे भारत, विश्राम पाकर तुम्हारी वह सेना सुखी हुई और उसने वीर अर्जुन की सराहना की।

योधा ऊचुः

श्लोक 35 (7.185.35)

त्वयि वेदास्तथास्त्राणि त्वयि बुद्धिपराक्रमौ । धर्मस्त्वयि महाबाहो दया भूतेषु चानघ ॥

tvayi vedāstathāstrāṇi tvayi buddhiparākramau | dharmastvayi mahābāho dayā bhūteṣu cānagha

आप में वेद हैं और अस्त्र भी, आप में बुद्धि और पराक्रम हैं; हे महाबाहो, आप में धर्म है और, हे निष्पाप, प्राणियों पर दया भी।

श्लोक 36 (7.185.36)

यच्चाश्वस्तास्तवेच्छामः शर्म पार्थ तदस्तु ते । मनसश्च प्रियानर्थान्वीर क्षिप्रमवाप्नुहि ॥

yaccāśvastāstavecchāmaḥ śarma pārtha tadastu te | manasaśca priyānarthānvīra kṣipramavāpnuhi

हे पार्थ, आश्वस्त होकर हम आपके लिए जिस कल्याण की कामना करते हैं, वह आपको प्राप्त हो; और हे वीर, अपने मन के प्रिय मनोरथ आप शीघ्र पाएँ।

सञ्जय उवाच

श्लोक 37 (7.185.37)

इति ते तं नरव्याघ्रं प्रशंसन्तो महारथाः । निद्रया समवाक्षिप्तास्तूष्णीमासन्विशाम्पते ॥

iti te taṃ naravyāghraṃ praśaṃsanto mahārathāḥ | nidrayā samavākṣiptāstūṣṇīmāsanviśāmpate

हे प्रजापालक, इस प्रकार उन नरश्रेष्ठ की प्रशंसा करते हुए वे महारथी नींद से दबकर चुप हो गए।

श्लोक 38 (7.185.38)

वीरा वारणकुम्भेषु सुषुपुर्युद्धकर्शिताः । रात्रौ रतिपरिश्रान्ताः कामिनीनां कुचेष्विव ॥

vīrā vāraṇakumbheṣu suṣupuryuddhakarśitāḥ | rātrau ratipariśrāntāḥ kāminīnāṃ kuceṣviva

युद्ध से थके हुए वीर हाथियों के कुम्भस्थलों पर ऐसे सो गए, जैसे रात में रति से थके प्रेमी अपनी प्रेयसियों के वक्ष पर सो जाते हैं।

श्लोक 39 (7.185.39)

अश्वपृष्ठेषु चाप्यन्ये रथनीडेषु चापरे । गजस्कन्धगताश्चान्ये शेरते चापरे क्षितौ ॥

aśvapṛṣṭheṣu cāpyanye rathanīḍeṣu cāpare | gajaskandhagatāścānye śerate cāpare kṣitau

कुछ और घोड़ों की पीठ पर, कुछ रथों के आसनों में, कुछ हाथियों के कन्धों पर और कुछ भूमि पर सो रहे थे।

श्लोक 40 (7.185.40)

सायुधाः सगदाश्चैव सखड्गाः सपरश्वथाः । सप्रासकवचाश्चान्ये नराः सुप्ताः पृथक्पृथक् ॥

sāyudhāḥ sagadāścaiva sakhaḍgāḥ saparaśvathāḥ | saprāsakavacāścānye narāḥ suptāḥ pṛthakpṛthak

कुछ लोग हथियार, गदाएँ, खड्ग और फरसे लिए, तथा बरछे और कवच पहने ही अलग-अलग जगह सो गए थे।

श्लोक 41 (7.185.41)

गजास्ते पन्नगाभोगैर्हस्तैर्भूरेणुगुण्ठितैः । निद्रान्धा वसुधां चक्रुर्घ्राणनिःश्वासशीतलाम् ॥

gajāste pannagābhogairhastairbhūreṇuguṇṭhitaiḥ | nidrāndhā vasudhāṃ cakrurghrāṇaniḥśvāsaśītalām

साँपों की कुण्डली जैसी, धूल से सनी सूँड़ों वाले वे नींद से अन्धे हाथी अपनी नाक की साँस से पृथ्वी को ठंडा कर रहे थे।

श्लोक 42 (7.185.42)

सुप्ताः शुशुभिरे तत्र निःश्वसन्तो महीतले । विकीर्णा गिरयो यद्वन्निःश्वसद्भिर्महोरगैः ॥

suptāḥ śuśubhire tatra niḥśvasanto mahītale | vikīrṇā girayo yadvanniḥśvasadbhirmahoragaiḥ

वहाँ भूमि पर सोए हुए और साँस लेते हुए वे ऐसे शोभित हो रहे थे, जैसे साँस लेते महासर्पों वाले बिखरे हुए पर्वत।

श्लोक 43 (7.185.43)

समां च विषमां चक्रुः खुराग्रैर्विकृतां महीम् । हयाः काञ्चनयोक्त्रास्ते केसरालम्बिभिर्युगैः । सुषुपुस्तत्र राजेन्द्र युक्ता वाहेषु सर्वशः ॥

samāṃ ca viṣamāṃ cakruḥ khurāgrairvikṛtāṃ mahīm | hayāḥ kāñcanayoktrāste kesarālambibhiryugaiḥ | suṣupustatra rājendra yuktā vāheṣu sarvaśaḥ

घोड़ों ने अपने खुरों की नोकों से भूमि को उखाड़कर कहीं समतल और कहीं ऊबड़-खाबड़ कर दिया था; सोने के रस्सों वाले वे घोड़े, जिनके जुए अयालों पर टिके थे, हे राजेन्द्र, सब ओर अपने वाहनों में जुते हुए ही सो गए।

श्लोक 44 (7.185.44)

एवं हयाश्च नागाश्च योधाश्च भरतर्षभ । युद्धाद्विरम्य सुषुपुः श्रमेण महताऽन्विताः ॥

evaṃ hayāśca nāgāśca yodhāśca bharatarṣabha | yuddhādviramya suṣupuḥ śrameṇa mahatā'nvitāḥ

हे भरतश्रेष्ठ, इस प्रकार घोड़े, हाथी और योद्धा सब भारी थकान से भरकर युद्ध से रुककर सो गए।

श्लोक 45 (7.185.45)

तत्तथा निद्रया भग्नं तद्बभौ निःस्वनं बलम् । कुशलैः शिल्पिभिर्न्यस्तं पटे चित्रमिवाद्भुतम् ॥

tattathā nidrayā bhagnaṃ tadbabhau niḥsvanaṃ balam | kuśalaiḥ śilpibhirnyastaṃ paṭe citramivādbhutam

इस प्रकार नींद से टूटी हुई वह चुप सेना ऐसी लग रही थी जैसे कुशल शिल्पियों द्वारा कपड़े पर रचा हुआ कोई अद्भुत चित्र।

श्लोक 46 (7.185.46)

ते क्षत्रियाः कुण्डलिनो युवानः । परस्परं सायकविक्षताङ्गाः । कुम्भेषु लीनाः सुषुपुर्गजानां । कुचेषु लग्ना इव कामिनीनाम् ॥

te kṣatriyāḥ kuṇḍalino yuvānaḥ | parasparaṃ sāyakavikṣatāṅgāḥ | kumbheṣu līnāḥ suṣupurgajānāṃ | kuceṣu lagnā iva kāminīnām

कुण्डल पहने वे युवा क्षत्रिय, जिनके अंग एक-दूसरे के बाणों से घायल थे, हाथियों के कुम्भस्थलों में धँसे हुए ऐसे सो रहे थे जैसे प्रेमी अपनी प्रेयसियों के वक्ष से लगे हों।

श्लोक 47 (7.185.47)

ततः कुमुदनाथेन कामिनीगण्डपाण्डुना । नेत्रानन्देन चन्द्रेण माहेन्द्री दिगलङ्कृता ॥

tataḥ kumudanāthena kāminīgaṇḍapāṇḍunā | netrānandena candreṇa māhendrī digalaṅkṛtā

तब कुमुदों के स्वामी, कामिनियों के कपोलों जैसे पीले, नेत्रों को आनन्द देने वाले चन्द्रमा से इन्द्र की दिशा (पूर्व) सज उठी।

श्लोक 48 (7.185.48)

दशशताक्षककुब्दरिनिःसृतः । किरणकेसरभासुरपिञ्जरः । तिमिरवारणयूथविदारणः । समुदियादुदयाचलकेसरी ॥

daśaśatākṣakakubdariniḥsṛtaḥ | kiraṇakesarabhāsurapiñjaraḥ | timiravāraṇayūthavidāraṇaḥ | samudiyādudayācalakesarī

सहस्राक्ष इन्द्र की दिशा रूपी गुफा से निकला हुआ, किरणों की अयाल से दमकता और पीला-सा, अन्धकार रूपी हाथियों के झुण्डों को चीरता हुआ, उदयाचल का सिंह उदित हुआ।

श्लोक 49 (7.185.49)

हरवृषोत्तमगात्रसमद्युतिः । स्मरशरासनपूर्णसमप्रभः । नववधृस्मितचारुमनोहरः । प्रविसृतः कुमुदाकरबान्धवः ॥

haravṛṣottamagātrasamadyutiḥ | smaraśarāsanapūrṇasamaprabhaḥ | navavadhṛsmitacārumanoharaḥ | pravisṛtaḥ kumudākarabāndhavaḥ

शिव के श्रेष्ठ वृषभ के शरीर के समान कान्ति वाला, कामदेव के पूरे खिंचे धनुष जैसी आभा वाला, नववधू की मुस्कान की तरह सुन्दर और मनोहर, कुमुद-सरोवरों का वह बन्धु चन्द्रमा चारों ओर फैल गया।

श्लोक 50 (7.185.50)

ततो मुहूर्ताद्भगवान्पुरस्ताच्छशलक्षणः । अरुणं दर्शयामास ग्रसञ्ज्योतिः प्रभां प्रभुः ॥

tato muhūrtādbhagavānpurastācchaśalakṣaṇaḥ | aruṇaṃ darśayāmāsa grasañjyotiḥ prabhāṃ prabhuḥ

फिर क्षण भर में शश-चिह्न वाले भगवान चन्द्रमा ने पूर्व दिशा में अन्य ज्योतियों की आभा को निगलते हुए अरुणिमा प्रकट की।

श्लोक 51 (7.185.51)

अरुणस्य तु तस्यानु जातरूपसमप्रभम् । रश्मिजालं महच्चन्द्रो मन्दं मन्दमवासृजत् ॥

aruṇasya tu tasyānu jātarūpasamaprabham | raśmijālaṃ mahaccandro mandaṃ mandamavāsṛjat

उस अरुणिमा के पीछे चन्द्रमा ने धीरे-धीरे सुवर्ण-सी आभा वाला किरणों का विशाल जाल छोड़ा।

श्लोक 52 (7.185.52)

उत्सारयन्तः प्रभया तमस्ते चन्द्ररश्मयः । पर्यगच्छञ्छनैः सर्वा दिशः खं च क्षितिं तथा ॥

utsārayantaḥ prabhayā tamaste candraraśmayaḥ | paryagacchañchanaiḥ sarvā diśaḥ khaṃ ca kṣitiṃ tathā

अपनी प्रभा से अन्धकार को हटाती हुई वे चन्द्रकिरणें धीरे-धीरे सब दिशाओं, आकाश और पृथ्वी में फैल गईं।

श्लोक 53 (7.185.53)

ततो मुहूर्ताद्भुवनं ज्योतिर्भूतमिवाभवत् । अप्रख्यमप्रकाशं च जगामाशु तमस्तथा ॥

tato muhūrtādbhuvanaṃ jyotirbhūtamivābhavat | aprakhyamaprakāśaṃ ca jagāmāśu tamastathā

फिर क्षण भर में संसार मानो ज्योतिर्मय हो गया, और अन्धकार अदृश्य तथा प्रकाशहीन होकर शीघ्र चला गया।

श्लोक 54 (7.185.54)

प्रतिप्रकाशिते लोके दिवाभूते निशाकरे । विचेरुर्न विचेरुश्च राजन्नक्तञ्चरास्ततः ॥

pratiprakāśite loke divābhūte niśākare | vicerurna viceruśca rājannaktañcarāstataḥ

चन्द्रमा के लोक को फिर से प्रकाशित कर दिन-सा बना देने पर, हे राजन्, रात में विचरने वाले तब घूमे भी और नहीं भी घूमे।

श्लोक 55 (7.185.55)

बोध्यमानं तु तत्सैन्यं राजंश्चन्द्रस्य रश्मिभिः । बुबुधे शतपत्राणां वनं सूर्यांशुभिर्यथा ॥

bodhyamānaṃ tu tatsainyaṃ rājaṃścandrasya raśmibhiḥ | bubudhe śatapatrāṇāṃ vanaṃ sūryāṃśubhiryathā

हे राजन्, चन्द्रमा की किरणों से जगाई गई वह सेना वैसे ही जाग उठी जैसे सूर्य की किरणों से कमलों का वन जाग उठता है।

श्लोक 56 (7.185.56)

यथा चन्द्रोदयोद्धूतः क्षुभितः सागरोऽभवत् । तथा चन्द्रोदयोद्धूतः क्षुभितश्च बलार्णवः ॥

yathā candrodayoddhūtaḥ kṣubhitaḥ sāgaro'bhavat | tathā candrodayoddhūtaḥ kṣubhitaśca balārṇavaḥ

जैसे चन्द्रोदय से उद्वेलित होकर समुद्र क्षुब्ध हो उठता है, वैसे ही चन्द्रोदय से उद्वेलित होकर वह सेना-सागर क्षुब्ध हो उठा।

श्लोक 57 (7.185.57)

ततः प्रववृते युद्धं पुनरेव विशाम्पते । लोके लोकविनाशाय परं लोकमभीप्सताम् ॥

tataḥ pravavṛte yuddhaṃ punareva viśāmpate | loke lokavināśāya paraṃ lokamabhīpsatām

हे प्रजापालक, तब संसार के विनाश के लिए, परलोक की कामना करने वालों के बीच, फिर से युद्ध छिड़ गया।

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