द्रोण पर्व · अध्याय 186
दुर्योधन का उलाहना और द्रोण का उत्तर
दुर्योधन द्रोण के पास जाकर उलाहना देता है कि शिष्यों के प्रति उनके स्नेह के कारण विश्राम पाए हुए पाण्डव बढ़ते जा रहे हैं। चोट खाए द्रोण बिना संकोच लड़ने का वचन देते हैं, पर देवताओं, यक्षों, गन्धर्वों और दानवों के विरुद्ध अर्जुन के पराक्रम गिनाते हैं और दुर्योधन से कहते हैं कि वह जैसी बार-बार डींग मारता रहा है, वैसे ही कर्ण, दुःशासन और शकुनि के साथ स्वयं जाकर अर्जुन का सामना करे। फिर द्रोण युद्ध में लौट जाते हैं और सेना दो भागों में बँट जाती है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.186.1)
ततो दुर्योधनो द्रोणमभिगम्याब्रवीदिदम् । अमर्षवशमापन्नो जनयन्हर्षतेजसी ॥
tato duryodhano droṇamabhigamyābravīdidam | amarṣavaśamāpanno janayanharṣatejasī
तब अधीरता के वश में आए दुर्योधन ने द्रोण के पास जाकर, उनमें उत्साह और तेज जगाते हुए, यह कहा।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 2 (7.186.2)
न मर्षणीयाः सङ्ग्रामे विश्रमन्तः श्रमान्विताः । सपत्ना ग्लानमनसो लब्धलक्षा विशेषतः ॥
na marṣaṇīyāḥ saṅgrāme viśramantaḥ śramānvitāḥ | sapatnā glānamanaso labdhalakṣā viśeṣataḥ
युद्ध में जो शत्रु थककर विश्राम कर रहे हों, जिनका मन खिन्न हो, और विशेषकर जिन्होंने अपना लक्ष्य पा लिया हो, उन्हें क्षमा नहीं करना चाहिए।
श्लोक 3 (7.186.3)
यत्तु मर्षितमस्माभिर्भवतः प्रियकाम्यया । त एते परिविश्रान्ताः पाण्डवा बलवत्तराः ॥
yattu marṣitamasmābhirbhavataḥ priyakāmyayā | ta ete pariviśrāntāḥ pāṇḍavā balavattarāḥ
पर आपको प्रसन्न करने की इच्छा से हमने जो उन्हें क्षमा किया, उसका फल यह है कि अब ये पाण्डव पूरी तरह विश्राम पाकर पहले से अधिक बलवान हो गए हैं।
श्लोक 4 (7.186.4)
सर्वथा परिहीनाः स्म तेजसा च बलेन च । भवता पाल्यमानास्ते विवर्धन्ते पुनःपुनः ॥
sarvathā parihīnāḥ sma tejasā ca balena ca | bhavatā pālyamānāste vivardhante punaḥpunaḥ
हम तेज और बल दोनों में सर्वथा क्षीण हो गए हैं, जबकि आपके द्वारा रक्षित होकर वे बार-बार बढ़ते जा रहे हैं।
श्लोक 5 (7.186.5)
दिव्यान्यस्त्राणि सर्वाणि ब्राह्मादीनि च यानि ह । तानि सर्वाणि तिष्ठन्ति भवत्येव विशेषतः ॥
divyānyastrāṇi sarvāṇi brāhmādīni ca yāni ha | tāni sarvāṇi tiṣṭhanti bhavatyeva viśeṣataḥ
सभी दिव्य अस्त्र, ब्रह्मास्त्र आदि, वे सब विशेष रूप से आप ही में स्थित हैं।
श्लोक 6 (7.186.6)
न पाण्डवेया न वयं नान्ये लोके धनुर्धराः । युध्यमानस्य ते तुल्याः सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥
na pāṇḍaveyā na vayaṃ nānye loke dhanurdharāḥ | yudhyamānasya te tulyāḥ satyametadbravīmi te
न पाण्डवगण, न हम, न संसार के दूसरे धनुर्धर — युद्ध करते हुए आपके बराबर कोई नहीं है; यह मैं आपसे सच कहता हूँ।
श्लोक 7 (7.186.7)
ससुरासुरगन्धर्वानिमाँल्लोकान्द्विजोत्तम । सर्वास्त्रविद्भवान्हन्याद्दिव्यैरस्त्रैर्न संशयः ॥
sasurāsuragandharvānimām̐llokāndvijottama | sarvāstravidbhavānhanyāddivyairastrairna saṃśayaḥ
हे द्विजश्रेष्ठ, सब अस्त्रों के ज्ञाता आप देवताओं, असुरों और गन्धर्वों सहित इन लोकों को दिव्य अस्त्रों से नष्ट कर सकते हैं; इसमें सन्देह नहीं।
श्लोक 8 (7.186.8)
स भवान्मर्षयत्येनांस्तव तुल्यानवेत्य च । शिष्यत्वं वा पुरस्कृत्य मम वा मन्दभाग्यताम् ॥
sa bhavānmarṣayatyenāṃstava tulyānavetya ca | śiṣyatvaṃ vā puraskṛtya mama vā mandabhāgyatām
फिर भी आप इन्हें क्षमा कर देते हैं — या तो इन्हें अपने समान मानकर, या इनके शिष्य होने का ध्यान रखकर, या मेरे अभाग्य के कारण।
सञ्जय उवाच
श्लोक 9 (7.186.9)
एवमुद्धर्षितो द्रोणः कोपितश्च सुतेन ते । समन्युरब्रवीद्राजन्दुर्योधनमिदं वचः ॥
evamuddharṣito droṇaḥ kopitaśca sutena te | samanyurabravīdrājanduryodhanamidaṃ vacaḥ
हे राजन्, तुम्हारे पुत्र के इस प्रकार उकसाने और क्रोधित करने पर द्रोण ने रोष से भरकर दुर्योधन से ये वचन कहे।
द्रोण उवाच
श्लोक 10 (7.186.10)
स्थविरः सन्परं शक्त्या घटे दुर्योधनाहवे । अतः परं मया कार्यं क्षुद्रं विजयगृद्धिना । अनस्त्रविदयं सर्वो हन्तव्योऽस्त्रविदा जनः ॥
sthaviraḥ sanparaṃ śaktyā ghaṭe duryodhanāhave | ataḥ paraṃ mayā kāryaṃ kṣudraṃ vijayagṛddhinā | anastravidayaṃ sarvo hantavyo'stravidā janaḥ
दुर्योधन, वृद्ध होते हुए भी मैं इस युद्ध में अपनी पूरी शक्ति से जूझ रहा हूँ। पर अब से, विजय की लालसा में, मुझे एक हीन कर्म करना होगा: अस्त्रों को न जानने वाले इन सब लोगों को अस्त्र जानने वाले के हाथों मरना ही होगा।
श्लोक 11 (7.186.11)
यद्भवान्मन्यते चापि शुभं वा यदि वाऽशुभम् । तद्वै कर्ताऽस्मि कौरव्य वचनात्तव नान्यथा ॥
yadbhavānmanyate cāpi śubhaṃ vā yadi vā'śubham | tadvai kartā'smi kauravya vacanāttava nānyathā
हे कुरुवंशी, आप जो भी शुभ या अशुभ समझें, वही मैं आपके कहने से करूँगा, अन्यथा नहीं।
श्लोक 12 (7.186.12)
निहत्य सर्वपाञ्चालान्युद्धे कृत्वा पराक्रमम् । विमोक्ष्ये कवचं राजन्सत्येनायुधमालभे ॥
nihatya sarvapāñcālānyuddhe kṛtvā parākramam | vimokṣye kavacaṃ rājansatyenāyudhamālabhe
हे राजन्, रण में पराक्रम दिखाकर सब पाञ्चालों को मारने के बाद ही मैं कवच उतारूँगा; मैं सत्य की शपथ लेकर शस्त्र को स्पर्श करता हूँ।
श्लोक 13 (7.186.13)
मन्यसे यच्च कौन्तेयमर्जुनं श्रान्तमाहवे । तस्य वीर्यं महाबाहो शृणु सत्येन कौरव ॥
manyase yacca kaunteyamarjunaṃ śrāntamāhave | tasya vīryaṃ mahābāho śṛṇu satyena kaurava
और आप जो यह मानते हैं कि कुन्तीपुत्र अर्जुन युद्ध में थक गया है — हे महाबाहो कौरव, उसके पराक्रम का सच सुनिए।
श्लोक 14 (7.186.14)
तं न देवा न गन्धर्वा न यक्षा न च राक्षसाः । उत्सहन्ते रणे जेतुं कुपितं सव्यसाचिनम् ॥
taṃ na devā na gandharvā na yakṣā na ca rākṣasāḥ | utsahante raṇe jetuṃ kupitaṃ savyasācinam
क्रोधित सव्यसाची को रण में न देवता, न गन्धर्व, न यक्ष और न राक्षस जीत सकते हैं।
श्लोक 15 (7.186.15)
खाण्डवे येन भगवान्प्रत्युद्यातः सुरेश्वरः । सायकैर्वारितश्चापि वर्षमाणो महात्मना ॥
khāṇḍave yena bhagavānpratyudyātaḥ sureśvaraḥ | sāyakairvāritaścāpi varṣamāṇo mahātmanā
खाण्डव वन में जब भगवान देवराज इन्द्र वर्षा करते हुए उसका सामना करने आए, तब उस महात्मा ने उन्हें अपने बाणों से रोक दिया।
श्लोक 16 (7.186.16)
यक्षा नागास्तथा दैत्या ये चान्ये बलगर्विताः । निहताः पुरुषेन्द्रेण तच्चापि विदितं तव ॥
yakṣā nāgāstathā daityā ye cānye balagarvitāḥ | nihatāḥ puruṣendreṇa taccāpi viditaṃ tava
यक्ष, नाग, दैत्य और बल के अभिमानी दूसरे जो भी थे, उन्हें उस पुरुषश्रेष्ठ ने मार डाला; यह भी आपको ज्ञात है।
श्लोक 17 (7.186.17)
गन्धर्वा घोषयात्रायां चित्रसेनादयो जिताः । यूयं तैर्ह्रियमाणाश्च मोक्षिता दृढधन्वना ॥
gandharvā ghoṣayātrāyāṃ citrasenādayo jitāḥ | yūyaṃ tairhriyamāṇāśca mokṣitā dṛḍhadhanvanā
घोषयात्रा में चित्रसेन आदि गन्धर्वों को उसने हराया, और उनके द्वारा हर लिए जाते हुए आपको उस दृढ़ धनुर्धर ने छुड़ाया।
श्लोक 18 (7.186.18)
निवातकवचाश्चापि देवानां शत्रवस्तथा । सुरैरवध्याः सङ्ग्रामे तेन वीरेण निर्जिताः ॥
nivātakavacāścāpi devānāṃ śatravastathā | surairavadhyāḥ saṅgrāme tena vīreṇa nirjitāḥ
देवताओं के शत्रु निवातकवच, जिन्हें देवता भी युद्ध में नहीं मार सकते थे, उसी वीर ने जीत लिए।
श्लोक 19 (7.186.19)
दानवानां सहस्राणि हिरण्यपुरवासिनाम् । विजिग्ये पुरुषव्याघ्रः स शक्यो मानुषैः कथम् ॥
dānavānāṃ sahasrāṇi hiraṇyapuravāsinām | vijigye puruṣavyāghraḥ sa śakyo mānuṣaiḥ katham
उस पुरुषसिंह ने हिरण्यपुर में रहने वाले हज़ारों दानवों को जीत लिया; ऐसा वह मनुष्यों से कैसे जीता जा सकता है?
श्लोक 20 (7.186.20)
प्रत्यक्षं चैव ते सर्वं यथा बलमिदं तव । क्षपितं पाण्डुपुत्रेण चेष्टतां नो विशाम्पते ॥
pratyakṣaṃ caiva te sarvaṃ yathā balamidaṃ tava | kṣapitaṃ pāṇḍuputreṇa ceṣṭatāṃ no viśāmpate
हे प्रजापालक, आपने अपनी आँखों से सब देखा है कि हमारे प्रयत्न करते रहने पर भी पाण्डुपुत्र ने आपकी इस सेना का कैसा संहार किया।
सञ्जय उवाच
श्लोक 21 (7.186.21)
तं तदाऽभिप्रशंसन्तमर्जुनं कुपितस्तदा । द्रोणं तव सुतो राजन्पुनरेवेदमब्रवीत् ॥
taṃ tadā'bhipraśaṃsantamarjunaṃ kupitastadā | droṇaṃ tava suto rājanpunarevedamabravīt
हे राजन्, द्रोण के इस प्रकार अर्जुन की प्रशंसा करने पर तुम्हारा पुत्र क्रुद्ध होकर उनसे फिर यह बोला।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 22 (7.186.22)
अहं दुःशासनः कर्णः शकुनिर्मातुलश्च मे । हनिष्यामोऽर्जुनं सङ्ख्ये द्विधा कृत्वाऽद्य भारतीम् । तिष्ठ स त्वं महाबाहो नित्यं शिष्यः प्रियस्तव ॥
ahaṃ duḥśāsanaḥ karṇaḥ śakunirmātulaśca me | haniṣyāmo'rjunaṃ saṅkhye dvidhā kṛtvā'dya bhāratīm | tiṣṭha sa tvaṃ mahābāho nityaṃ śiṣyaḥ priyastava
मैं, दुःशासन, कर्ण और मेरे मामा शकुनि आज भरत-सेना को दो भागों में बाँटकर रण में अर्जुन को मार डालेंगे। हे महाबाहो, आप यहीं ठहरे रहिए; वह तो सदा आपका प्रिय शिष्य है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 23 (7.186.23)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा भारद्वाजो हसन्निव । अन्ववर्तत राजानं स्वस्ति तेऽस्त्विति चाब्रवीत् ॥
tasya tadvacanaṃ śrutvā bhāradvājo hasanniva | anvavartata rājānaṃ svasti te'stviti cābravīt
उसकी वह बात सुनकर भरद्वाज के पुत्र द्रोण ने मानो हँसते हुए राजा का अनुसरण किया और कहा — "तुम्हारा कल्याण हो।"
द्रोण उवाच
श्लोक 24 (7.186.24)
को हि गाण्डीवधन्वानं ज्वलन्तमिव तेजसा । अक्षयं क्षपयेत्कश्चित्क्षत्रियः क्षत्रियर्षभम् ॥
ko hi gāṇḍīvadhanvānaṃ jvalantamiva tejasā | akṣayaṃ kṣapayetkaścitkṣatriyaḥ kṣatriyarṣabham
तेज से मानो जलते हुए गाण्डीवधारी, अक्षय, क्षत्रियों में श्रेष्ठ उस अर्जुन का नाश भला कौन क्षत्रिय कर सकता है?
श्लोक 25 (7.186.25)
तं न वित्तपतिर्नेन्द्रो न यमो न जलेश्वरः । नासुरोरगरक्षांसि क्षपयेयुः सहायुधम् ॥
taṃ na vittapatirnendro na yamo na jaleśvaraḥ | nāsuroragarakṣāṃsi kṣapayeyuḥ sahāyudham
जब तक उसके हाथ में शस्त्र है, तब तक न कुबेर, न इन्द्र, न यम, न वरुण, और न असुर, नाग या राक्षस उसका नाश कर सकते हैं।
श्लोक 26 (7.186.26)
मूढास्त्वेतानि भाषन्ते यानीमान्यात्थ भारत । युद्धे ह्यर्जुनमासाद्य स्वस्तिमान्को व्रजेद्गृहान् ॥
mūḍhāstvetāni bhāṣante yānīmānyāttha bhārata | yuddhe hyarjunamāsādya svastimānko vrajedgṛhān
हे भारत, जैसी बातें तुमने अभी कही हैं, वैसी बातें मूर्ख ही कहते हैं। युद्ध में अर्जुन का सामना करके कौन कुशल से घर लौट सकता है?
श्लोक 27 (7.186.27)
त्वं तु सर्वाभिशङ्कित्वान्निष्ठुरः पापनिश्चयः । श्रेयसस्त्वद्धिते युक्तांस्तत्तद्वक्तुमिहेच्छसि ॥
tvaṃ tu sarvābhiśaṅkitvānniṣṭhuraḥ pāpaniścayaḥ | śreyasastvaddhite yuktāṃstattadvaktumihecchasi
पर तुम सब पर शंका करने वाले, कठोर और पाप में दृढ़ संकल्प वाले हो; इसीलिए अपने हित में लगे हुए, तुमसे अच्छे व्यवहार के योग्य लोगों से भी तुम ऐसी ही बातें कहना चाहते हो।
श्लोक 28 (7.186.28)
गच्छ त्वमपि कौन्तेयमात्मार्थे जहि माचिरम् । त्वमप्याशंससे योद्धुं कुलजः क्षत्रियो ह्यसि ॥
gaccha tvamapi kaunteyamātmārthe jahi māciram | tvamapyāśaṃsase yoddhuṃ kulajaḥ kṣatriyo hyasi
तुम स्वयं जाकर कुन्तीपुत्र को मारो, अपने ही स्वार्थ के लिए, देर मत करो; तुम भी तो लड़ने की आशा रखते हो, क्योंकि तुम उत्तम कुल में जन्मे क्षत्रिय हो।
श्लोक 29 (7.186.29)
इमान्किं क्षत्रियान्सर्वान्घातयिष्यस्यनागसः । त्वमस्य मूलं वैरस्य तस्मादासादयार्जुनम् ॥
imānkiṃ kṣatriyānsarvānghātayiṣyasyanāgasaḥ | tvamasya mūlaṃ vairasya tasmādāsādayārjunam
इन सब निरपराध क्षत्रियों को तुम क्यों मरवाओगे? इस वैर की जड़ तुम ही हो; इसलिए स्वयं अर्जुन के सामने जाओ।
श्लोक 30 (7.186.30)
एष ते मातुलः प्राज्ञः क्षत्रधर्ममनुव्रतः । दुर्द्यूतदेवी गान्धारे प्रयात्वर्जुनमाहवे ॥
eṣa te mātulaḥ prājñaḥ kṣatradharmamanuvrataḥ | durdyūtadevī gāndhāre prayātvarjunamāhave
यह तुम्हारा विद्वान मामा है, क्षत्रिय-धर्म का अनुयायी, कपट-द्यूत खेलने वाला। हे गान्धारीपुत्र, यही रण में अर्जुन के सामने जाए।
श्लोक 31 (7.186.31)
एषोऽक्षकुशलो जिह्मो द्यूतकृत्कितवः शठः । देविता निकृतिप्रज्ञो युधि जेष्यति पाण्डवान् ॥
eṣo'kṣakuśalo jihmo dyūtakṛtkitavaḥ śaṭhaḥ | devitā nikṛtiprajño yudhi jeṣyati pāṇḍavān
यह पासों में निपुण, कुटिल, जुआरी, ठग और धूर्त है, छल में बुद्धि लगाने वाला खिलाड़ी है; यही युद्ध में पाण्डवों को जीतेगा।
श्लोक 32 (7.186.32)
त्वया कथितमत्यर्थं कर्णेन सह हृष्टवत् । असकृच्छून्यवन्मोहाद्धृतराष्ट्रस्य शृण्वतः ॥
tvayā kathitamatyarthaṃ karṇena saha hṛṣṭavat | asakṛcchūnyavanmohāddhṛtarāṣṭrasya śṛṇvataḥ
तुमने कर्ण के साथ हर्ष में भरकर, मोह से, शून्य मन वाले की तरह, धृतराष्ट्र के सुनते हुए बार-बार कहा है —
श्लोक 33 (7.186.33)
अहं च तात कर्णश्च भ्राता दुःशासनश्च मे । पाण्डुपुत्रान्हनिष्यामः सहिताः समरे त्रयः ॥
ahaṃ ca tāta karṇaśca bhrātā duḥśāsanaśca me | pāṇḍuputrānhaniṣyāmaḥ sahitāḥ samare trayaḥ
"पिताजी, मैं, कर्ण और मेरा भाई दुःशासन — हम तीनों मिलकर रण में पाण्डुपुत्रों को मार डालेंगे।"
श्लोक 34 (7.186.34)
इति ते कत्थमानस्य श्रुतं संसदिसंसदि । अनुतिष्ठ प्रतिज्ञां तां सत्यवाग्भव तैः सह ॥
iti te katthamānasya śrutaṃ saṃsadisaṃsadi | anutiṣṭha pratijñāṃ tāṃ satyavāgbhava taiḥ saha
सभा-सभा में तुम्हें इस प्रकार डींग मारते हुए सुना गया है; उस प्रतिज्ञा को निभाओ और उनके साथ अपनी बात सच करके दिखाओ।
श्लोक 35 (7.186.35)
एष ते पाण्डवः शत्रुरविशङ्कोऽग्रतः स्थितः । क्षत्रधर्ममवेक्षस्व श्लाघ्यस्तव वधो जयात् ॥
eṣa te pāṇḍavaḥ śatruraviśaṅko'grataḥ sthitaḥ | kṣatradharmamavekṣasva ślāghyastava vadho jayāt
यह तुम्हारा शत्रु पाण्डव निर्भय होकर तुम्हारे सामने खड़ा है। क्षत्रिय-धर्म का विचार करो; तुम्हारे लिए उसके हाथों मरना विजय से अधिक प्रशंसनीय है।
श्लोक 36 (7.186.36)
दत्तं भुक्तमधीतं च प्राप्तमैश्वर्यमीप्सितम् । कृतकृत्योऽनृणश्चासि मा भैर्युध्यस्व पाण्डवम् ॥
dattaṃ bhuktamadhītaṃ ca prāptamaiśvaryamīpsitam | kṛtakṛtyo'nṛṇaścāsi mā bhairyudhyasva pāṇḍavam
तुमने दान दिया, भोग भोगे, अध्ययन किया और मनचाहा ऐश्वर्य पाया; तुम कृतकृत्य और ऋणमुक्त हो। डरो मत, पाण्डव से युद्ध करो।
सञ्जय उवाच
श्लोक 37 (7.186.37)
इत्युक्त्वा समरे द्रोणो न्यवर्तत यतः परे । द्वैधीकृत्य ततः सेनां युद्धं समभवत्तदा ॥
ityuktvā samare droṇo nyavartata yataḥ pare | dvaidhīkṛtya tataḥ senāṃ yuddhaṃ samabhavattadā
यह कहकर द्रोण रण में उस ओर लौट पड़े जहाँ शत्रु थे; तब सेना को दो भागों में बाँटकर युद्ध होने लगा।