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द्रोण पर्व · अध्याय 187

द्रोण द्वारा द्रुपद और विराट का वध

रात का अन्तिम तीसरा भाग बीतते ही भोर आकाश को लाल कर देती है और दोनों सेनाएँ युद्ध रोककर सूर्य की उपासना करती हैं। फिर युद्ध छिड़ता है; कृष्ण के कहने पर अर्जुन कौरवों को अपनी बाईं ओर रखते हैं और भीम उन्हें सेना चीर डालने को उकसाते हैं, जिससे धूल और बाणों में रणभूमि ढक जाती है। द्रोण हटकर खड़े होते हैं, फिर द्रुपद के तीन पौत्रों, विराट और द्रुपद को मार गिराते हैं। धृष्टद्युम्न भयंकर शपथ लेते हैं, भीम उन्हें ललकारकर आगे बढ़ाते हैं, और पाञ्चाल तथा पाण्डव द्रोण पर टूट पड़ते हैं, यहाँ तक कि सूर्य सन्ध्या-वेला को पहुँच जाता है।

अध्याय 186अध्याय-सूचीअध्याय 188

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.187.1)

त्रिभागमात्रशेषायां रात्र्यां युद्धमवर्तत । कुरूणां पाण्डवानां च संहृष्टानां विशाम्पते ॥

tribhāgamātraśeṣāyāṃ rātryāṃ yuddhamavartata | kurūṇāṃ pāṇḍavānāṃ ca saṃhṛṣṭānāṃ viśāmpate

हे प्रजापालक, रात का केवल तीसरा भाग शेष रहने पर भी हर्ष से भरे हुए कौरवों और पाण्डवों का युद्ध चलता रहा।

श्लोक 2 (7.187.2)

अथ चन्द्रप्रभां मुष्णन्नादित्यस्य पुरःसरः । अरुणोऽभ्युदयाञ्चक्रे ताम्रीकुर्वन्निवाम्बरम् ॥

atha candraprabhāṃ muṣṇannādityasya puraḥsaraḥ | aruṇo'bhyudayāñcakre tāmrīkurvannivāmbaram

तब सूर्य के अग्रदूत अरुण ने चन्द्रमा की कान्ति को हरते हुए उदय होकर आकाश को ताँबे के रंग का लाल कर दिया।

श्लोक 3 (7.187.3)

प्रकाशमकरोद्व्योम जगत्संरञ्जयन्निव । प्राच्यां दिशि सहस्रांशोररुणेनारुणीकृतम् । तापनीयं यथा चक्रं भ्राजते रविमण्डलम् ॥

prakāśamakarodvyoma jagatsaṃrañjayanniva | prācyāṃ diśi sahasrāṃśoraruṇenāruṇīkṛtam | tāpanīyaṃ yathā cakraṃ bhrājate ravimaṇḍalam

आकाश मानो सारे जगत् को रँगता हुआ प्रकाशित हो उठा; पूर्व दिशा में अरुण से लाल किया हुआ सूर्यमण्डल तपे हुए सोने के चक्र की तरह दमकने लगा।

श्लोक 4 (7.187.4)

ततो रथाश्वांश्च मनुष्ययाना- । न्युत्सृज्य सर्वे कुरुपाण्डुयोधाः । दिवाकरस्याभिमुखं जपन्तः । सन्ध्यागताः प्राञ्जलयो बभूवुः ॥

tato rathāśvāṃśca manuṣyayānā- | nyutsṛjya sarve kurupāṇḍuyodhāḥ | divākarasyābhimukhaṃ japantaḥ | sandhyāgatāḥ prāñjalayo babhūvuḥ

तब कौरवों और पाण्डवों के सभी योद्धा रथ, घोड़े और पालकियाँ छोड़कर सूर्य की ओर मुख किए, जप करते हुए, हाथ जोड़े सन्ध्या-उपासना में खड़े हो गए।

श्लोक 5 (7.187.5)

ततो द्वैधीकृते सैन्ये द्रोणः सोमकपाण्डवान् । अभ्यद्रवत्सपाञ्चालान्दुर्योधनपुरोगमः ॥

tato dvaidhīkṛte sainye droṇaḥ somakapāṇḍavān | abhyadravatsapāñcālānduryodhanapurogamaḥ

फिर सेना के दो भागों में बँट जाने पर दुर्योधन को आगे करके द्रोण सोमकों और पाञ्चालों सहित पाण्डवों पर टूट पड़े।

श्लोक 6 (7.187.6)

द्वैधीकृतान्कुरून्दृष्ट्वा माधवोऽर्जुनमब्रवीत् । सपत्नान्सव्यतः कुर्याः सव्यसाचिन्निमान्कुरून् ॥

dvaidhīkṛtānkurūndṛṣṭvā mādhavo'rjunamabravīt | sapatnānsavyataḥ kuryāḥ savyasācinnimānkurūn

कौरवों को दो भागों में बँटा देखकर माधव ने अर्जुन से कहा — “हे सव्यसाची, इन शत्रु कौरवों को तुम अपनी बाईं ओर रखो।”

श्लोक 7 (7.187.7)

स माधवमनुज्ञाय कुरुष्वेति धनञ्जयः । द्रोणकर्णौ महेष्वासौ सव्यतः पर्यवर्तत ॥

sa mādhavamanujñāya kuruṣveti dhanañjayaḥ | droṇakarṇau maheṣvāsau savyataḥ paryavartata

“ऐसा ही करता हूँ” — माधव से यह कहकर धनञ्जय दोनों महाधनुर्धरों, द्रोण और कर्ण, को बाईं ओर रखते हुए घूम गए।

श्लोक 8 (7.187.8)

अभिप्रायं तु कृष्णस्य ज्ञात्वा परपुरञ्जयः । आजिशीर्षगतं पार्थं भीमसेनोऽभ्युवाच ह ॥

abhiprāyaṃ tu kṛṣṇasya jñātvā parapurañjayaḥ | ājiśīrṣagataṃ pārthaṃ bhīmaseno'bhyuvāca ha

कृष्ण का अभिप्राय जानकर शत्रुनगरों को जीतने वाले भीमसेन ने युद्ध के अग्रभाग में पहुँचे हुए पार्थ से कहा।

भीमसेन उवाच

श्लोक 9 (7.187.9)

अर्जुनार्जुन बीभत्सो शृणुष्वैतद्वचो मम । यदर्थं क्षत्रिया सूते तस्य कालोऽयमागतः ॥

arjunārjuna bībhatso śṛṇuṣvaitadvaco mama | yadarthaṃ kṣatriyā sūte tasya kālo'yamāgataḥ

अर्जुन, अर्जुन, बीभत्सु! मेरी यह बात सुनो — क्षत्राणी जिस काम के लिए पुत्र को जन्म देती है, उसका वह समय अब आ गया है।

श्लोक 10 (7.187.10)

अस्मिंश्चेदागते काले श्रेयो न प्रतिपत्स्यसे । असम्भावितरूपस्त्वं सुनृशंसं करिष्यसि ॥

asmiṃścedāgate kāle śreyo na pratipatsyase | asambhāvitarūpastvaṃ sunṛśaṃsaṃ kariṣyasi

यदि इस अवसर के आने पर भी तुम कल्याणकारी मार्ग नहीं अपनाओगे, तो तुम, जिनका स्वभाव अकल्पनीय है, एक अत्यन्त निर्दय कर्म कर बैठोगे।

श्लोक 11 (7.187.11)

सत्यश्रीधर्मयशसां वीर्येणानृण्यमाप्नुहि । भिन्ध्यनीकं युधांश्रेष्ठ प्रतिज्ञां सफलां कुरु ॥

satyaśrīdharmayaśasāṃ vīryeṇānṛṇyamāpnuhi | bhindhyanīkaṃ yudhāṃśreṣṭha pratijñāṃ saphalāṃ kuru

सत्य, श्री, धर्म और यश के ऋण से अपने पराक्रम द्वारा उऋण हो जाओ। हे योद्धाओं में श्रेष्ठ, सेना को चीर डालो और अपनी प्रतिज्ञा सफल करो।

सञ्जय उवाच

श्लोक 12 (7.187.12)

स सव्यसाची भीमेन चोदितः केशवेन च । कर्णद्रोणावतिक्रम्य समन्तात्पर्यवारयत् ॥

sa savyasācī bhīmena coditaḥ keśavena ca | karṇadroṇāvatikramya samantātparyavārayat

भीम और केशव की प्रेरणा पाकर उस सव्यसाची ने कर्ण और द्रोण को लाँघकर शत्रुओं को चारों ओर से घेर लिया।

श्लोक 13 (7.187.13)

तमाजिशीर्षमायान्तं दहन्तं क्षत्रियर्षभान् । पराक्रान्तं पराक्रम्य ततः क्षत्रियपुङ्गवाः । नाशक्नुवन्वारयितुं वर्धमानमिवानलम् ॥

tamājiśīrṣamāyāntaṃ dahantaṃ kṣatriyarṣabhān | parākrāntaṃ parākramya tataḥ kṣatriyapuṅgavāḥ | nāśaknuvanvārayituṃ vardhamānamivānalam

युद्ध के अग्रभाग में आते, क्षत्रियश्रेष्ठों को जलाते हुए उस पराक्रमी पर पराक्रम दिखाते हुए भी क्षत्रियों के सरदार उसे बढ़ती हुई आग की तरह रोक न सके।

श्लोक 14 (7.187.14)

अथ दुर्योधनः कर्णः शकुनिश्चापि सौबलः । अभ्यवर्षञ्छरव्रातैः कुन्तीपुत्रं धनञ्जयम् ॥

atha duryodhanaḥ karṇaḥ śakuniścāpi saubalaḥ | abhyavarṣañcharavrātaiḥ kuntīputraṃ dhanañjayam

तब दुर्योधन, कर्ण और सुबलपुत्र शकुनि ने कुन्तीपुत्र धनञ्जय पर बाणों के समूहों की वर्षा की।

श्लोक 15 (7.187.15)

तेषामस्त्राणि सर्वेषामुत्तमास्त्रविदां वरः । कदर्थीकृत्य राजेन्द्र शरवर्षैरवाकिरत् ॥

teṣāmastrāṇi sarveṣāmuttamāstravidāṃ varaḥ | kadarthīkṛtya rājendra śaravarṣairavākirat

श्रेष्ठ अस्त्रविदों में सर्वश्रेष्ठ उसने, हे राजेन्द्र, उन सबके अस्त्रों को तुच्छ कर दिया और बाणों की वर्षा से उन्हें ढक दिया।

श्लोक 16 (7.187.16)

अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य लघुहस्तो धनञ्जयः । सर्वानविध्यन्निशितैर्दशभिर्दशभिः शरैः ॥

astrairastrāṇi saṃvārya laghuhasto dhanañjayaḥ | sarvānavidhyanniśitairdaśabhirdaśabhiḥ śaraiḥ

फुर्तीले हाथों वाले धनञ्जय ने अपने अस्त्रों से उनके अस्त्रों को रोककर उन सबको दस-दस तीखे बाणों से बींध दिया।

श्लोक 17 (7.187.17)

उद्धूता रजसो वृष्टिः शरवृष्टिस्तथैव च । तमश्च घोरं शब्दश्च तदा समभवन्महान् ॥

uddhūtā rajaso vṛṣṭiḥ śaravṛṣṭistathaiva ca | tamaśca ghoraṃ śabdaśca tadā samabhavanmahān

उठी हुई धूल की वर्षा और बाणों की वर्षा, घना अन्धकार और भारी कोलाहल — ये सब उस समय एक साथ उत्पन्न हो गए।

श्लोक 18 (7.187.18)

न द्यौर्न भूमिर्न दिशः प्राज्ञायन्त तथागते । सैन्येन रजसा मूढं सर्वमन्धमिवाभवत् ॥

na dyaurna bhūmirna diśaḥ prājñāyanta tathāgate | sainyena rajasā mūḍhaṃ sarvamandhamivābhavat

ऐसी दशा में न आकाश, न पृथ्वी, न दिशाएँ पहचानी जाती थीं; सेना और धूल से मोहित हुआ सब कुछ मानो अन्धा हो गया था।

श्लोक 19 (7.187.19)

नैव ते न वयं राजन्प्राज्ञासिष्म परस्परम् । शब्दमात्रेण जानीमो वयं ते च परस्परम् । उद्देशेन हि तेन स्म समयुध्यन्त पार्थिवाः ॥

naiva te na vayaṃ rājanprājñāsiṣma parasparam | śabdamātreṇa jānīmo vayaṃ te ca parasparam | uddeśena hi tena sma samayudhyanta pārthivāḥ

हे राजन्, न वे हमें पहचानते थे, न हम उन्हें। हम और वे केवल आवाज़ से एक-दूसरे को जान पाते थे। केवल ऐसे ही संकेतों के सहारे राजा लोग लड़ रहे थे।

श्लोक 20 (7.187.20)

विरथा रथिनो राजन्समासाद्य परस्परम् । केशेषु समसज्जन्त कवचेषु भुजेषु च ॥

virathā rathino rājansamāsādya parasparam | keśeṣu samasajjanta kavaceṣu bhujeṣu ca

हे राजन्, रथहीन हुए रथी एक-दूसरे के पास पहुँचकर केशों, कवचों और भुजाओं से गुँथ गए।

श्लोक 21 (7.187.21)

हताश्वा हतसूताश्च निश्चेष्टा रथिनो हताः । जीवन्त इव तत्र स्म व्यदृश्यन्त भयार्दिताः ॥

hatāśvā hatasūtāśca niśceṣṭā rathino hatāḥ | jīvanta iva tatra sma vyadṛśyanta bhayārditāḥ

जिनके घोड़े और सारथि मारे जा चुके थे और जो निश्चेष्ट पड़े थे, ऐसे मरे हुए रथी भय से पीड़ित जीवित-से दिखाई देते थे।

श्लोक 22 (7.187.22)

हतान्गजान्समाश्लिष्य पर्वतानिव वाजिनः । गतसत्वा व्यदृश्यन्त तथैव सह सादिभिः ॥

hatāngajānsamāśliṣya parvatāniva vājinaḥ | gatasatvā vyadṛśyanta tathaiva saha sādibhiḥ

मरे हुए हाथियों को पर्वतों की तरह अँकवार में लिए हुए घोड़े अपने सवारों सहित प्राणहीन दिखाई देते थे।

श्लोक 23 (7.187.23)

ततस्त्वभ्यवसृत्यैव सङ्ग्रामादुत्तरां दिशम् । आतिष्ठदाहवे द्रोणो विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ॥

tatastvabhyavasṛtyaiva saṅgrāmāduttarāṃ diśam | ātiṣṭhadāhave droṇo vidhūmo'gniriva jvalan

फिर संग्राम से उत्तर दिशा की ओर हटकर द्रोण धुएँ से रहित अग्नि की तरह जलते हुए युद्धभूमि में डटे रहे।

श्लोक 24 (7.187.24)

तमाजिशीर्षादेकान्तमपक्रान्तं निशम्य तु । समकम्पन्त सैन्यानि पाण्डवानां विशाम्पते ॥

tamājiśīrṣādekāntamapakrāntaṃ niśamya tu | samakampanta sainyāni pāṇḍavānāṃ viśāmpate

हे प्रजानाथ, उन्हें युद्ध के अग्रभाग से एक ओर हटा हुआ देखकर पाण्डवों की सेनाएँ काँप उठीं।

श्लोक 25 (7.187.25)

भ्राजमानं श्रिया युक्तं ज्वलन्तमिव तेजसा । द्रोणं दृष्ट्वा परे त्रेसुश्चेलुर्मम्लुश्च भारत ॥

bhrājamānaṃ śriyā yuktaṃ jvalantamiva tejasā | droṇaṃ dṛṣṭvā pare tresuścelurmamluśca bhārata

हे भारत, तेज से जलते-से और शोभा से दीप्त द्रोण को देखकर शत्रु थर्रा उठे, डगमगा गए और मुरझा गए।

श्लोक 26 (7.187.26)

आह्वयन्तं परानीकं प्रभिन्नमिव वारणम् । नैनमाशंसिरे जेतुं दानवा वासवं यथा ॥

āhvayantaṃ parānīkaṃ prabhinnamiva vāraṇam | nainamāśaṃsire jetuṃ dānavā vāsavaṃ yathā

मदमत्त हाथी की तरह शत्रुसेना को ललकारते हुए उन्हें जीतने की आशा उन्होंने वैसे ही नहीं की, जैसे दानव इन्द्र को जीतने की आशा नहीं करते।

श्लोक 27 (7.187.27)

केचिदासन्निरुत्साहाः केचित्क्रुद्धा मनस्विनः । विस्मिताश्चाभवन्केचित्केचिद्धृष्टाऽभवन्युधि ॥

kecidāsannirutsāhāḥ kecitkruddhā manasvinaḥ | vismitāścābhavankecitkeciddhṛṣṭā'bhavanyudhi

कुछ उत्साहहीन हो गए, कुछ स्वाभिमानी क्रोध से भर उठे, कुछ चकित रह गए और कुछ युद्ध में निडर हो उठे।

श्लोक 28 (7.187.28)

हस्तैर्हस्ताग्रमपरे प्रत्यपिंषन्नराधिपाः । अपरे दशनैरोष्ठानदशन्क्रोधमूर्च्छिताः ॥

hastairhastāgramapare pratyapiṃṣannarādhipāḥ | apare daśanairoṣṭhānadaśankrodhamūrcchitāḥ

कुछ राजा अपने हाथों से दूसरे हाथ की उँगलियाँ मसलने लगे; दूसरे क्रोध से मूर्च्छित-से होकर दाँतों से होंठ चबाने लगे।

श्लोक 29 (7.187.29)

व्याक्षिपन्नायुधान्यन्ये ममृदुश्चापरे भुजान् । अन्ये चान्वपतन्द्रोणं त्यक्तात्मानो महौजसः ॥

vyākṣipannāyudhānyanye mamṛduścāpare bhujān | anye cānvapatandroṇaṃ tyaktātmāno mahaujasaḥ

कुछ ने अपने शस्त्र फेंक दिए, कुछ अपनी भुजाएँ मलने लगे, और कुछ महातेजस्वी योद्धा प्राणों की परवाह छोड़कर द्रोण पर टूट पड़े।

श्लोक 30 (7.187.30)

पाञ्चालास्तु विशेषेण द्रोणसायकपीडिताः । समसज्जन्त राजेन्द्र समरे भृशवेदनाः ॥

pāñcālāstu viśeṣeṇa droṇasāyakapīḍitāḥ | samasajjanta rājendra samare bhṛśavedanāḥ

हे राजेन्द्र, पाञ्चाल तो विशेष रूप से द्रोण के बाणों से पीड़ित थे; वे घोर वेदना सहते हुए भी रणभूमि में उनसे भिड़ गए।

श्लोक 31 (7.187.31)

ततो विराटद्रुपदौ द्रोणं प्रति ययू रणे । तथा चरन्तं सङ्ग्रामे भृशं समरदुर्जयम् ॥

tato virāṭadrupadau droṇaṃ prati yayū raṇe | tathā carantaṃ saṅgrāme bhṛśaṃ samaradurjayam

तब विराट और द्रुपद रणभूमि में विचरते हुए द्रोण पर चढ़ आए, जो युद्ध में अत्यन्त दुर्जय थे।

श्लोक 32 (7.187.32)

द्रुपदस्य ततः पौत्रास्त्रय एव विशाम्पते । चेदयश्च महेष्वासा द्रोणमेवाभ्ययुर्युधि ॥

drupadasya tataḥ pautrāstraya eva viśāmpate | cedayaśca maheṣvāsā droṇamevābhyayuryudhi

हे प्रजानाथ, तब द्रुपद के तीन पौत्र और महाधनुर्धर चेदि भी युद्ध में द्रोण पर ही टूट पड़े।

श्लोक 33 (7.187.33)

तेषां द्रुपदपौत्राणां त्रयाणां निशितैः शरैः । त्रिभिर्द्रोणोऽहरत्प्राणांस्ते हता न्यपतन्भुवि ॥

teṣāṃ drupadapautrāṇāṃ trayāṇāṃ niśitaiḥ śaraiḥ | tribhirdroṇo'haratprāṇāṃste hatā nyapatanbhuvi

द्रोण ने तीन तीखे बाणों से द्रुपद के उन तीनों पौत्रों के प्राण हर लिए, और वे मरकर भूमि पर गिर पड़े।

श्लोक 34 (7.187.34)

ततो द्रोणोऽजयद्युद्धे चेदिकैकेयसृञ्जयान् । मात्स्यांश्चैवाजयत्कृत्स्नान्भारद्वाजो महारथान् ॥

tato droṇo'jayadyuddhe cedikaikeyasṛñjayān | mātsyāṃścaivājayatkṛtsnānbhāradvājo mahārathān

तब द्रोण ने युद्ध में चेदियों, केकयों और सृञ्जयों को जीत लिया, और भरद्वाज के पुत्र ने सब मत्स्य महारथियों को भी जीत लिया।

श्लोक 35 (7.187.35)

ततस्तु द्रुपदः क्रोधाच्छरवर्षमवासृजत् । द्रोणं प्रति महाराज विराटश्चैव संयुगे ॥

tatastu drupadaḥ krodhāccharavarṣamavāsṛjat | droṇaṃ prati mahārāja virāṭaścaiva saṃyuge

तब, हे महाराज, द्रुपद ने क्रोध से और विराट ने भी युद्ध में द्रोण पर बाणों की वर्षा की।

श्लोक 36 (7.187.36)

तं निहत्येषुवर्षं तु द्रोणः क्षत्रियमर्दनः । तौ शरैश्छादयामास विराटद्रुपदावुभौ ॥

taṃ nihatyeṣuvarṣaṃ tu droṇaḥ kṣatriyamardanaḥ | tau śaraiśchādayāmāsa virāṭadrupadāvubhau

क्षत्रियों का संहार करने वाले द्रोण ने उस बाण-वर्षा को काटकर विराट और द्रुपद दोनों को बाणों से ढक दिया।

श्लोक 37 (7.187.37)

द्रोणेन च्छाद्यमानौ तु क्रुद्धौ सङ्ग्राममूर्धनि । द्रोणं शरैर्विव्यधतुः परमं क्रोधमास्थितौ ॥

droṇena cchādyamānau tu kruddhau saṅgrāmamūrdhani | droṇaṃ śarairvivyadhatuḥ paramaṃ krodhamāsthitau

द्रोण के बाणों से ढके जाने पर वे दोनों युद्ध के अग्रभाग में क्रुद्ध होकर, अत्यन्त क्रोध में भरे हुए, द्रोण को बाणों से बींधने लगे।

श्लोक 38 (7.187.38)

ततो द्रोणो महाराज क्रोधामर्षसमन्वितः । भल्लाभ्यां भृशतीक्ष्णाभ्यां चिच्छेद धनुषी तयोः ॥

tato droṇo mahārāja krodhāmarṣasamanvitaḥ | bhallābhyāṃ bhṛśatīkṣṇābhyāṃ ciccheda dhanuṣī tayoḥ

तब, हे महाराज, क्रोध और असहनशीलता से भरे द्रोण ने दो अत्यन्त तीखे भल्लों से उन दोनों के धनुष काट डाले।

श्लोक 39 (7.187.39)

ततो विराटः कुपितः समरे तोमरान्दश । दश चिक्षेप च शरान्द्रोणस्य वधकाङ्क्षया ॥

tato virāṭaḥ kupitaḥ samare tomarāndaśa | daśa cikṣepa ca śarāndroṇasya vadhakāṅkṣayā

तब विराट ने कुपित होकर द्रोण को मार डालने की इच्छा से रणभूमि में दस तोमर और दस बाण चलाए।

श्लोक 40 (7.187.40)

शक्तिं च द्रुपदो घोरामायसीं स्वर्णभूषिताम् । चिक्षेप भुजगेन्द्राभां क्रुद्धो द्रोणरथं प्रति ॥

śaktiṃ ca drupado ghorāmāyasīṃ svarṇabhūṣitām | cikṣepa bhujagendrābhāṃ kruddho droṇarathaṃ prati

और द्रुपद ने क्रोध में भरकर द्रोण के रथ पर सर्पराज के समान चमकती हुई, सोने से जड़ी, भयंकर लोहे की शक्ति फेंकी।

श्लोक 41 (7.187.41)

ततो भल्लैः सुनिशितैश्छित्त्वा तांस्तोमरान्दश । शक्तिं कनकवैदूर्यां द्रोणश्चिच्छेद सायकैः ॥

tato bhallaiḥ suniśitaiśchittvā tāṃstomarāndaśa | śaktiṃ kanakavaidūryāṃ droṇaściccheda sāyakaiḥ

तब द्रोण ने तीखे भल्लों से उन दसों तोमरों को काट डाला और बाणों से सोने तथा वैदूर्य से जड़ी उस शक्ति को भी काट दिया।

श्लोक 42 (7.187.42)

ततो द्रोणः सुपीताभ्यां भल्लाभ्यामरिमर्दनः । द्रुपदं च विराटं च प्रेषयामास मृत्यवे ॥

tato droṇaḥ supītābhyāṃ bhallābhyāmarimardanaḥ | drupadaṃ ca virāṭaṃ ca preṣayāmāsa mṛtyave

फिर शत्रुओं का मर्दन करने वाले द्रोण ने दो पीले-से चमकते भल्लों से द्रुपद और विराट को मृत्यु के पास भेज दिया।

श्लोक 43 (7.187.43)

हते विराटे द्रुपदे केकयेषु तथैव च । तथैव चेदिमात्स्येषु पाञ्चालेषु तथैव च ॥

hate virāṭe drupade kekayeṣu tathaiva ca | tathaiva cedimātsyeṣu pāñcāleṣu tathaiva ca

विराट और द्रुपद के मारे जाने पर, और केकयों के, तथा चेदियों, मत्स्यों और पाञ्चालों के भी मारे जाने पर —

श्लोक 44 (7.187.44)

हतेषु त्रिषु वीरेषु द्रुपदस्य च नप्तृषु । द्रोणस्य कर्म तद्दृष्ट्वा कोपदुःखसमन्वितः । शशाप रथिनां मध्ये धृष्टद्युम्नो महामनाः ॥

hateṣu triṣu vīreṣu drupadasya ca naptṛṣu | droṇasya karma taddṛṣṭvā kopaduḥkhasamanvitaḥ | śaśāpa rathināṃ madhye dhṛṣṭadyumno mahāmanāḥ

और द्रुपद के तीनों पौत्र वीरों के मारे जाने पर, द्रोण का वह कर्म देखकर क्रोध और शोक से भरे महामना धृष्टद्युम्न ने रथियों के बीच शपथ ली।

धृष्टद्युम्न उवाच

श्लोक 45 (7.187.45)

इष्टापूर्तात्तथा क्षात्राद्ब्राह्मण्याच्च स नश्यतु । द्रोणो यस्याद्य मुच्येत यं वा द्रोणः पराभवेत् ॥

iṣṭāpūrtāttathā kṣātrādbrāhmaṇyācca sa naśyatu | droṇo yasyādya mucyeta yaṃ vā droṇaḥ parābhavet

जिससे आज द्रोण बच निकलें, अथवा जिसे द्रोण परास्त कर दें, उसके इष्ट-पूर्त के पुण्य, क्षात्रधर्म और ब्राह्मणत्व नष्ट हो जाएँ।

सञ्जय उवाच

श्लोक 46 (7.187.46)

इति तेषां प्रतिश्रुत्य मध्ये सर्वधनुष्मताम् । आयाद्द्रोणं सहानीकाः पाञ्चाल्यः परवीरहा ॥

iti teṣāṃ pratiśrutya madhye sarvadhanuṣmatām | āyāddroṇaṃ sahānīkāḥ pāñcālyaḥ paravīrahā

सब धनुर्धारियों के बीच इस प्रकार प्रतिज्ञा करके शत्रुवीरों का संहार करने वाला वह पाञ्चाल राजकुमार अपनी सेना के साथ द्रोण पर चढ़ आया।

श्लोक 47 (7.187.47)

पाञ्चालास्त्वेकतो द्रोणमभ्यघ्नन्पाण्डवैः सह । दुर्योधनश्च कर्णश्च शकुनिश्चापि सौबलः । सोदर्याश्च यथा मुख्यास्तेऽरक्षन्द्रोणमाहवे ॥

pāñcālāstvekato droṇamabhyaghnanpāṇḍavaiḥ saha | duryodhanaśca karṇaśca śakuniścāpi saubalaḥ | sodaryāśca yathā mukhyāste'rakṣandroṇamāhave

एक ओर पाञ्चाल पाण्डवों के साथ द्रोण पर प्रहार कर रहे थे; और दुर्योधन, कर्ण, सुबलपुत्र शकुनि तथा उसके प्रमुख भाई युद्ध में द्रोण की रक्षा कर रहे थे।

श्लोक 48 (7.187.48)

रक्ष्यमाणं तथा द्रोणं सर्वैस्तैस्तु महारथैः । यतमानास्तु पाञ्चाला न शेकुः प्रतिवीक्षितुम् ॥

rakṣyamāṇaṃ tathā droṇaṃ sarvaistaistu mahārathaiḥ | yatamānāstu pāñcālā na śekuḥ prativīkṣitum

उन सब महारथियों से रक्षित द्रोण की ओर प्रयत्न करते हुए भी पाञ्चाल आँख उठाकर देख तक न सके।

श्लोक 49 (7.187.49)

तत्राक्रुध्यद्भीमसेनो धृष्टद्युम्नस्य मारिष । स एनं वाग्भिरुग्राभिस्ततक्ष पुरुषर्षभः ॥

tatrākrudhyadbhīmaseno dhṛṣṭadyumnasya māriṣa | sa enaṃ vāgbhirugrābhistatakṣa puruṣarṣabhaḥ

हे मारिष, तब भीमसेन धृष्टद्युम्न पर क्रुद्ध हो उठे और उन पुरुषश्रेष्ठ ने उन्हें कठोर वचनों से छील डाला।

भीमसेन उवाच

श्लोक 50 (7.187.50)

द्रुपदस्य कुले जातः सर्वास्त्रेष्वस्त्रवित्तमः । कः क्षत्रियो मन्यमानः प्रेक्षेतारिमवस्थितम् ॥

drupadasya kule jātaḥ sarvāstreṣvastravittamaḥ | kaḥ kṣatriyo manyamānaḥ prekṣetārimavasthitam

द्रुपद के कुल में जन्मे, सब अस्त्रों में अस्त्रविदों में श्रेष्ठ! अपने को क्षत्रिय मानने वाला कौन होगा जो शत्रु को सामने डटा देखकर भी चुपचाप देखता रहे?

श्लोक 51 (7.187.51)

पितृपुत्रवधं प्राप्य पुंस्त्वं को वा प्रहर्षयेत् । विशेषतस्तु शपथं शपित्वा राजसंसदि ॥

pitṛputravadhaṃ prāpya puṃstvaṃ ko vā praharṣayet | viśeṣatastu śapathaṃ śapitvā rājasaṃsadi

पिता और पुत्र का वध पाकर कौन पुरुष अपनी पौरुष-भावना को प्रसन्न रख सकेगा — विशेषतः राजसभा में शपथ लेने के बाद?

श्लोक 52 (7.187.52)

एष वैश्वानर इव समिद्धः स्वेन तेजसा । शरचापेन्धनो द्रोणः क्षत्रं दहति तेजसा ॥

eṣa vaiśvānara iva samiddhaḥ svena tejasā | śaracāpendhano droṇaḥ kṣatraṃ dahati tejasā

यह द्रोण अपने ही तेज से प्रज्वलित वैश्वानर अग्नि की तरह, धनुष-बाण रूपी ईंधन के साथ अपने तेज से क्षत्रियों को जला रहा है।

श्लोक 53 (7.187.53)

पुरा करोति निःशेषां पाण्डवानामनीकिनीम् । स्थिताः पश्यत मे कर्म द्रोणमेव व्रजाम्यहम् ॥

purā karoti niḥśeṣāṃ pāṇḍavānāmanīkinīm | sthitāḥ paśyata me karma droṇameva vrajāmyaham

वह पाण्डवों की सेना को पूरी तरह समाप्त कर दे, उससे पहले ही तुम सब खड़े-खड़े मेरा कर्म देखो — मैं द्रोण पर ही जाता हूँ।

सञ्जय उवाच

श्लोक 54 (7.187.54)

इत्युक्त्वा प्राविशत्क्रुद्धो द्रोणानीकं वृकोदरः । शरैः पूर्णायतोत्सृष्टैर्द्रावयंस्तव वाहिनीम् ॥

ityuktvā prāviśatkruddho droṇānīkaṃ vṛkodaraḥ | śaraiḥ pūrṇāyatotsṛṣṭairdrāvayaṃstava vāhinīm

यह कहकर क्रोधित वृकोदर ने पूरी तरह खिंचे धनुष से छोड़े हुए बाणों से आपकी सेना को भगाते हुए द्रोण की सेना में प्रवेश किया।

श्लोक 55 (7.187.55)

धृष्टद्युम्नोऽपि पाञ्चाल्यः प्रविश्य महतीं चमूम् । आससाद रणे द्रोणं तदासीत्तुमुलं महत् ॥

dhṛṣṭadyumno'pi pāñcālyaḥ praviśya mahatīṃ camūm | āsasāda raṇe droṇaṃ tadāsīttumulaṃ mahat

पाञ्चाल धृष्टद्युम्न भी उस विशाल सेना में घुसकर रणभूमि में द्रोण के सामने जा पहुँचे, और तब बड़ा भयंकर कोलाहल मच गया।

श्लोक 56 (7.187.56)

नैव नस्तादृशं युद्धं दृष्टपूर्वं न च श्रुतम् । यथा सूर्योदये राजन्समुत्पिञ्जोऽभवन्महान् ॥

naiva nastādṛśaṃ yuddhaṃ dṛṣṭapūrvaṃ na ca śrutam | yathā sūryodaye rājansamutpiñjo'bhavanmahān

हे राजन्, सूर्योदय के समय जैसा भारी घमासान हुआ, वैसा युद्ध न हमने पहले कभी देखा था, न सुना था।

श्लोक 57 (7.187.57)

संसक्तान्येव चादृश्यन्रथवृन्दानि मारिष । हतानि च विकीर्णानि शरीराणि शरीरिणाम् ॥

saṃsaktānyeva cādṛśyanrathavṛndāni māriṣa | hatāni ca vikīrṇāni śarīrāṇi śarīriṇām

हे मारिष, रथों के समूह एक-दूसरे में गुँथे दिखाई देते थे, और प्राणियों के मारे हुए शरीर इधर-उधर बिखरे पड़े थे।

श्लोक 58 (7.187.58)

केचिदन्यत्र गच्छन्तः पथि चान्यैरुपद्रुताः । विमुखाः पृष्ठतश्चान्ये ताड्यन्ते पार्श्वतः परे ॥

kecidanyatra gacchantaḥ pathi cānyairupadrutāḥ | vimukhāḥ pṛṣṭhataścānye tāḍyante pārśvataḥ pare

कुछ दूसरी ओर जाते हुए मार्ग में औरों से सताए जा रहे थे; कुछ पीठ फेरकर भागते हुए पीछे से मारे जाते थे और कुछ बगल से।

श्लोक 59 (7.187.59)

तथा संसक्तयुद्धं तदभवद्भृशदारुणम् । अथ सन्ध्यागतः सूर्यः क्षणेन समपद्यत ॥

tathā saṃsaktayuddhaṃ tadabhavadbhṛśadāruṇam | atha sandhyāgataḥ sūryaḥ kṣaṇena samapadyata

इस प्रकार वह गुँथा हुआ युद्ध अत्यन्त भयंकर हो उठा; और फिर क्षण भर में सूर्य सन्ध्या-वेला को पहुँच गया।

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