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द्रोण पर्व · अध्याय 194

कौरव-सेना का पलायन और कृप द्वारा द्रोण-वध का वर्णन

द्रोण के गिरने पर कौरव-सेना टूट जाती है और उसके नायक चारों ओर भाग निकलते हैं; केवल अश्वत्थामा शत्रुओं की ओर लौटकर दुर्योधन से पूछता है कि सेना क्यों भाग रही है। दुर्योधन उत्तर नहीं दे पाता, तब कृप बताते हैं कि द्रोण ने ब्रह्मास्त्र से कैसा संहार किया, कृष्ण ने पाण्डवों को विजय के लिए धर्म त्यागने की सलाह कैसे दी, युधिष्ठिर ने अश्वत्थामा की मृत्यु की बात अधूरे सत्य के रूप में कैसे कही, और धृष्टद्युम्न ने शोक से विह्वल द्रोण का सिर कैसे काट डाला। यह सुनकर अश्वत्थामा क्रोध से जल उठता है।

अध्याय 193अध्याय-सूचीअध्याय 195

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.194.1)

ततो द्रोणे हते राजन्कुरवः शस्त्रपीडिताः । हतप्रवीरा विध्वस्ता भृशं शोकपरायणाः ॥

tato droṇe hate rājankuravaḥ śastrapīḍitāḥ | hatapravīrā vidhvastā bhṛśaṃ śokaparāyaṇāḥ

हे राजन्, तब द्रोण के मारे जाने पर शस्त्रों से घायल कौरव, जिनके प्रमुख वीर मर चुके थे, बिखर गए और गहरे शोक में डूब गए।

श्लोक 2 (7.194.2)

उदीर्णांश्च परान्दृष्ट्वा हर्षमाणान्पुनः पुनः । अश्रुपूर्णेक्षणास्त्रस्ता दीनास्त्वासन्विशाम्पते ॥

udīrṇāṃśca parāndṛṣṭvā harṣamāṇānpunaḥ punaḥ | aśrupūrṇekṣaṇāstrastā dīnāstvāsanviśāmpate

शत्रुओं को उमड़ते और बार-बार हर्षित होते देखकर, हे प्रजापति, वे आँखों में आँसू भरे, भयभीत और दीन हो गए।

श्लोक 3 (7.194.3)

विचेतसो हतोत्साहाः कश्मलाभिहतौजसः । आर्तस्वरेण महता पुत्रं ते पर्यवारयन् ॥

vicetaso hatotsāhāḥ kaśmalābhihataujasaḥ | ārtasvareṇa mahatā putraṃ te paryavārayan

होश खोए, उत्साह गँवाए, मूर्च्छा से ओज नष्ट हुए वे बड़े आर्तनाद के साथ आपके पुत्र को घेरकर खड़े हो गए।

श्लोक 4 (7.194.4)

विषण्णवदना दीना वीक्षमाणा दिशो दश । अश्रुकण्ठा यथा दैत्या हिरण्याक्षे पुरा हते ॥

viṣaṇṇavadanā dīnā vīkṣamāṇā diśo daśa | aśrukaṇṭhā yathā daityā hiraṇyākṣe purā hate

उदास मुखवाले, दीन, दसों दिशाओं की ओर ताकते और आँसुओं से रुँधे कण्ठवाले वे ऐसे लगते थे जैसे पूर्वकाल में हिरण्याक्ष के मारे जाने पर दैत्य।

श्लोक 5 (7.194.5)

स तैः परिवृतो राजा त्रस्तैः क्षुद्रमृगैरिव । अशक्नुवन्नवस्थातुमपायात्तनयस्तव ॥

sa taiḥ parivṛto rājā trastaiḥ kṣudramṛgairiva | aśaknuvannavasthātumapāyāttanayastava

छोटे मृगों की तरह डरे हुए उन लोगों से घिरा आपका पुत्र राजा वहाँ ठहर न सका और पीछे हट गया।

श्लोक 6 (7.194.6)

क्षुत्पिपासापरिम्लानास्ते योधास्तव भारत । आदित्येनेव सन्तप्ता भृशं विमनसोऽभवन् ॥

kṣutpipāsāparimlānāste yodhāstava bhārata | ādityeneva santaptā bhṛśaṃ vimanaso'bhavan

हे भारत, भूख-प्यास से मुरझाए हुए और मानो सूर्य के ताप से झुलसे हुए आपके वे योद्धा अत्यन्त उदास हो गए।

श्लोक 7 (7.194.7)

भास्करस्येव पतनं समुद्रस्येव शोषणम् । विपर्यासं यथा मेरोर्वासवस्येव निर्जयम् ॥

bhāskarasyeva patanaṃ samudrasyeva śoṣaṇam | viparyāsaṃ yathā merorvāsavasyeva nirjayam

वह पतन ऐसा था जैसे सूर्य का गिरना, समुद्र का सूख जाना, मेरु का उलट जाना या इन्द्र की पराजय।

श्लोक 8 (7.194.8)

अप्रेक्षणीयं तद्दृष्ट्वा भारद्वाजस्य पातनम् । त्रस्तरूपतरा राजन्कौरवाः प्राद्रवन्भयात् ॥

aprekṣaṇīyaṃ taddṛṣṭvā bhāradvājasya pātanam | trastarūpatarā rājankauravāḥ prādravanbhayāt

भरद्वाज-पुत्र के उस न देखे जाने योग्य पतन को देखकर, हे राजन्, और भी अधिक भयभीत कौरव डर के मारे भाग चले।

श्लोक 9 (7.194.9)

गान्धारराजः शकुनिस्त्रस्तस्त्रस्ततरैः सह । हतं रुक्मरथं श्रुत्वा प्राद्रवत्सहितो रथैः ॥

gāndhārarājaḥ śakunistrastastrastataraiḥ saha | hataṃ rukmarathaṃ śrutvā prādravatsahito rathaiḥ

गान्धारराज शकुनि, अपने से भी अधिक डरे हुए साथियों के साथ, स्वर्ण-रथवाले द्रोण को मरा सुनकर रथों सहित भाग निकला।

श्लोक 10 (7.194.10)

वरूथिनीं वेगवतीं विद्रुतां सपताकिनीम् । परिगृह्य महासेनां सूतपुत्रोऽपयाद्भयात् ॥

varūthinīṃ vegavatīṃ vidrutāṃ sapatākinīm | parigṛhya mahāsenāṃ sūtaputro'payādbhayāt

सूतपुत्र कर्ण वेग से भागती, बिखरी हुई और पताकाओं से युक्त उस बड़ी सेना को साथ लेकर भय से हट गया।

श्लोक 11 (7.194.11)

रथनागाश्वकलिलां पुरस्कृत्य तु वाहिनीम् । मद्राणामीश्वरः शल्यो वीक्षमाणोऽपयाद्भयात् ॥

rathanāgāśvakalilāṃ puraskṛtya tu vāhinīm | madrāṇāmīśvaraḥ śalyo vīkṣamāṇo'payādbhayāt

मद्रों का स्वामी शल्य रथों, हाथियों और घोड़ों से भरी सेना को आगे करके, इधर-उधर देखता हुआ भय से हट गया।

श्लोक 12 (7.194.12)

हतप्रवीरैर्भूयिष्ठैर्ध्वजैर्बहुपताकिभिः । वृतः शारद्वतोऽगच्छत्कष्टङ्कष्टमिति ब्रुवन् ॥

hatapravīrairbhūyiṣṭhairdhvajairbahupatākibhiḥ | vṛtaḥ śāradvato'gacchatkaṣṭaṅkaṣṭamiti bruvan

अपने वीरों के मारे जाने से सूनी बहुत-सी ध्वजाओं और पताकाओं से घिरे हुए शारद्वत (कृपाचार्य) “हाय, कैसा कष्ट!” कहते हुए चले गए।

श्लोक 13 (7.194.13)

भोजानीकेन शिष्टेन कलिङ्गारट्टबाह्लिकैः । कृतवर्मा वृतो राजन्प्रायात्सुजवनैर्हयैः ॥

bhojānīkena śiṣṭena kaliṅgāraṭṭabāhlikaiḥ | kṛtavarmā vṛto rājanprāyātsujavanairhayaiḥ

हे राजन्, बची हुई भोज-सेना तथा कलिंगों, अरट्टों और बाह्लीकों से घिरा कृतवर्मा तेज़ घोड़ों पर सवार होकर निकल गया।

श्लोक 14 (7.194.14)

पदातिगणसंयुक्तस्त्रस्तो राजन्भयार्दितः । उलूकः प्राद्रवत्तत्र दृष्ट्वा द्रोणं निपातितम् ॥

padātigaṇasaṃyuktastrasto rājanbhayārditaḥ | ulūkaḥ prādravattatra dṛṣṭvā droṇaṃ nipātitam

हे राजन्, पैदल सैनिकों की टोली के साथ भय से पीड़ित और त्रस्त उलूक, द्रोण को गिरा देखकर वहाँ से भाग निकला।

श्लोक 15 (7.194.15)

दर्शनीयो युवा चैव शौर्येण कृतलक्षणः । दुःशासनो भृशोद्विग्नः प्राद्रवद्गजसंवृतः ॥

darśanīyo yuvā caiva śauryeṇa kṛtalakṣaṇaḥ | duḥśāsano bhṛśodvignaḥ prādravadgajasaṃvṛtaḥ

सुन्दर रूपवाला, तरुण और शूरता के लिए प्रसिद्ध दुःशासन अत्यन्त घबराकर हाथियों से घिरा भाग चला।

श्लोक 16 (7.194.16)

रथानामयुतं गृह्य त्रिसाहस्रं च दन्तिनाम् । वृषसेनो ययौ तूर्णं दृष्ट्वा द्रोणं निपातितम् ॥

rathānāmayutaṃ gṛhya trisāhasraṃ ca dantinām | vṛṣaseno yayau tūrṇaṃ dṛṣṭvā droṇaṃ nipātitam

द्रोण को गिरा देखकर वृषसेन दस हज़ार रथ और तीन हज़ार हाथी साथ लेकर तुरन्त चल पड़ा।

श्लोक 17 (7.194.17)

गजाश्वरथसंयुक्तो वृतश्चैव पदातिभिः । दुर्योधनो महाराज प्रायात्तत्र महारथः ॥

gajāśvarathasaṃyukto vṛtaścaiva padātibhiḥ | duryodhano mahārāja prāyāttatra mahārathaḥ

और हे महाराज, महारथी दुर्योधन भी हाथी, घोड़े और रथों के साथ, पैदल सैनिकों से घिरा हुआ, वहाँ से चल दिया।

श्लोक 18 (7.194.18)

संशप्तकगणाद्गृह्य हतशेषान्किरीटिना । सुशर्मा प्राद्रवद्राजन्दृष्ट्वा द्रोणं निपातितम् ॥

saṃśaptakagaṇādgṛhya hataśeṣānkirīṭinā | suśarmā prādravadrājandṛṣṭvā droṇaṃ nipātitam

हे राजन्, किरीटी (अर्जुन) के संहार से बचे हुए संशप्तकों को साथ लेकर सुशर्मा द्रोण को गिरा देखकर भाग गया।

श्लोक 19 (7.194.19)

गजान्रथान्समारुह्य व्युदस्य च हयाञ्जनाः । प्राद्रवन्सर्वतः सङ्ख्ये दृष्ट्वा रुक्मरथं हतम् ॥

gajānrathānsamāruhya vyudasya ca hayāñjanāḥ | prādravansarvataḥ saṅkhye dṛṣṭvā rukmarathaṃ hatam

स्वर्ण-रथवाले द्रोण को मरा देखकर लोग घोड़ों को छोड़कर हाथियों और रथों पर चढ़ गए और युद्धभूमि में चारों ओर भाग खड़े हुए।

श्लोक 20 (7.194.20)

त्वरयन्तः पितॄनन्ये भ्रातॄनन्येऽथ मातुलान् । पुत्रानन्ये वयस्यांश्च प्राद्रवन्कुरवस्तदा ॥

tvarayantaḥ pitṝnanye bhrātṝnanye'tha mātulān | putrānanye vayasyāṃśca prādravankuravastadā

तब कुरुवंशी योद्धा भाग चले; कोई अपने पिताओं को, कोई भाइयों और मामाओं को, और कोई पुत्रों तथा मित्रों को जल्दी चलने के लिए उकसा रहा था।

श्लोक 21 (7.194.21)

चोदयन्तश्च सैन्यानि स्वस्रीयांश्च तथाऽपरे । सम्बन्धिनस्तथाऽन्ये च प्राद्रवन्त दिशो दश ॥

codayantaśca sainyāni svasrīyāṃśca tathā'pare | sambandhinastathā'nye ca prādravanta diśo daśa

कुछ सैन्यदलों को हाँकते हुए, कुछ अपने भानजों को और कुछ अपने सम्बन्धियों को आगे बढ़ाते हुए दसों दिशाओं में भाग गए।

श्लोक 22 (7.194.22)

प्रकीर्णकेशा विध्वस्ता न द्वावेकत्र धावतः । नेदमस्तीति मन्वाना हतोत्साहा हतौजसः ॥

prakīrṇakeśā vidhvastā na dvāvekatra dhāvataḥ | nedamastīti manvānā hatotsāhā hataujasaḥ

बाल बिखरे, मनोबल टूटा हुआ, दो आदमी भी एक साथ नहीं दौड़ रहे थे; “अब सब कुछ समाप्त है” ऐसा मानकर वे उत्साह और ओज खो चुके थे।

श्लोक 23 (7.194.23)

उत्सृज्य कवचानन्ये प्राद्रवंस्तावका विभो । अन्योन्यं ते समाक्रोशन्सैनिका भरतर्षभ ॥

utsṛjya kavacānanye prādravaṃstāvakā vibho | anyonyaṃ te samākrośansainikā bharatarṣabha

हे विभो, आपके कुछ योद्धा कवच उतार फेंककर भागे; और हे भरतश्रेष्ठ, वे सैनिक एक-दूसरे को पुकारते हुए चिल्लाते थे—

श्लोक 24 (7.194.24)

तिष्ठतिष्ठेति न च ते स्वयं तत्रावतस्थिरे । धुर्यानुन्मुच्य च रथाद्धतसूतात्स्वलङ्कृतान् । अधिरुह्य हयान्योधाः क्षिप्रं पद्भिरचोदयन् ॥

tiṣṭhatiṣṭheti na ca te svayaṃ tatrāvatasthire | dhuryānunmucya ca rathāddhatasūtātsvalaṅkṛtān | adhiruhya hayānyodhāḥ kṣipraṃ padbhiracodayan

“ठहरो, ठहरो!”—पर वे स्वयं वहाँ नहीं ठहरते थे। जिन रथों के सारथी मारे जा चुके थे, उनसे सजे-सँवरे जुआ ढोनेवाले घोड़ों को खोलकर योद्धा उन पर चढ़ बैठे और पैरों की एड़ से उन्हें तेज़ दौड़ाने लगे।

श्लोक 25 (7.194.25)

द्रवमाणे तथा सैन्ये त्रस्तरूपे हतौजसि । प्रतिस्रोत इव ग्राहो द्रोणपुत्रः परानियात् ॥

dravamāṇe tathā sainye trastarūpe hataujasi | pratisrota iva grāho droṇaputraḥ parāniyāt

सेना के इस प्रकार भागने पर, जब वह भयभीत और ओजहीन हो चुकी थी, द्रोणपुत्र धारा के विपरीत तैरते ग्राह की तरह शत्रुओं की ओर बढ़ा।

श्लोक 26 (7.194.26)

तस्यासीत्सुमहद्युद्धं शिखण्डिप्रमुखैर्गणैः । प्रभद्रकैश्च पाञ्चालैश्चेदिभिश्च सकेकयैः ॥

tasyāsītsumahadyuddhaṃ śikhaṇḍipramukhairgaṇaiḥ | prabhadrakaiśca pāñcālaiścedibhiśca sakekayaiḥ

उसका शिखण्डी के नेतृत्व वाले दलों, प्रभद्रकों, पाञ्चालों तथा केकयों सहित चेदियों के साथ बड़ा भारी युद्ध हुआ।

श्लोक 27 (7.194.27)

हत्वा बहुविधाः सेनाः पाण्डूनां युद्धदुर्मदः । कथञ्चित्सङ्कटान्मुक्तो मत्तद्विरदविक्रमः ॥

hatvā bahuvidhāḥ senāḥ pāṇḍūnāṃ yuddhadurmadaḥ | kathañcitsaṅkaṭānmukto mattadviradavikramaḥ

पाण्डवों की अनेक प्रकार की सेनाओं का संहार करके, युद्ध-मद से उन्मत्त और मदमत्त हाथी के-से पराक्रमवाला वह किसी तरह उस संकट से निकल आया।

श्लोक 28 (7.194.28)

द्रवमाणं बलं दृष्ट्वा पलायनकृतक्षणम् । दुर्योधनं समासाद्य द्रोणपुत्रोऽब्रवीदिदम् ॥

dravamāṇaṃ balaṃ dṛṣṭvā palāyanakṛtakṣaṇam | duryodhanaṃ samāsādya droṇaputro'bravīdidam

सेना को भागने पर उतारू देखकर द्रोणपुत्र दुर्योधन के पास पहुँचा और यह बोला—

अश्वत्थामोवाच

श्लोक 29 (7.194.29)

किमियं द्रवते सेना त्रस्तरूपेव भारत । द्रवमाणां च राजेन्द्र नावस्थापयसे रणे ॥

kimiyaṃ dravate senā trastarūpeva bhārata | dravamāṇāṃ ca rājendra nāvasthāpayase raṇe

हे भारत, यह सेना भयभीत-सी होकर क्यों भाग रही है? और हे राजेन्द्र, भागती हुई इसको आप युद्ध में रोकते क्यों नहीं?

श्लोक 30 (7.194.30)

त्वं चापि न यथा पूर्वं प्रकृतिस्थो नराधिप । कर्णप्रभृतयश्चेमे नावतिष्ठन्ति पार्थिव ॥

tvaṃ cāpi na yathā pūrvaṃ prakṛtistho narādhipa | karṇaprabhṛtayaśceme nāvatiṣṭhanti pārthiva

हे नरेश्वर, आप भी पहले जैसे स्वस्थचित्त नहीं दिखते, और कर्ण आदि ये राजा भी, हे पार्थिव, ठहर नहीं रहे हैं।

श्लोक 31 (7.194.31)

अन्येष्वपि च युद्धेषु नैव सेनाऽद्रवत्तदा । कच्चित्क्षेमं महाबाहो तव सैन्यस्य भारत ॥

anyeṣvapi ca yuddheṣu naiva senā'dravattadā | kaccitkṣemaṃ mahābāho tava sainyasya bhārata

दूसरे युद्धों में भी सेना कभी इस तरह नहीं भागी थी। हे महाबाहु भारत, आपकी सेना का कुशल तो है?

श्लोक 32 (7.194.32)

कस्मिन्निदं हते राजन्रथसिंहे बलं तव । एतामवस्थां संप्राप्तं तन्ममाचक्ष्व कौरव ॥

kasminnidaṃ hate rājanrathasiṃhe balaṃ tava | etāmavasthāṃ saṃprāptaṃ tanmamācakṣva kaurava

हे राजन्, रथियों में सिंह के समान किसके मारे जाने पर आपकी सेना इस दशा को पहुँची है? हे कौरव, मुझे वह बताइए।

सञ्जय उवाच

श्लोक 33 (7.194.33)

तत्तु दुर्योधनः श्रुत्वा द्रोणपुत्रस्य भाषितम् । घोरमप्रियमाख्यातुं नाशक्नोत्पार्थिवर्षभः ॥

tattu duryodhanaḥ śrutvā droṇaputrasya bhāṣitam | ghoramapriyamākhyātuṃ nāśaknotpārthivarṣabhaḥ

पर द्रोणपुत्र की बात सुनकर नृपश्रेष्ठ दुर्योधन उस भयंकर अप्रिय समाचार को कह न सका।

श्लोक 34 (7.194.34)

भिन्ना नौरिव ते पुत्रो मग्नः शोकमहार्णवे । बाष्पेणापिहितो दृष्ट्वा द्रोणपुत्रं रथे स्थितम् ॥

bhinnā nauriva te putro magnaḥ śokamahārṇave | bāṣpeṇāpihito dṛṣṭvā droṇaputraṃ rathe sthitam

टूटी नाव की तरह आपका पुत्र शोक के महासागर में डूब गया; रथ पर खड़े द्रोणपुत्र को देखकर उसकी आँखें आँसुओं से ढँक गईं।

श्लोक 35 (7.194.35)

ततः शारद्वतं राजा सव्रीडमिदमब्रवीत् । शंसात्र भद्रं ते सर्वं यथा सैन्यमिदं द्रुतम् ॥

tataḥ śāradvataṃ rājā savrīḍamidamabravīt | śaṃsātra bhadraṃ te sarvaṃ yathā sainyamidaṃ drutam

तब राजा ने लज्जित होकर शारद्वत से यह कहा—“आपका कल्याण हो; यहाँ सब बताइए कि यह सेना कैसे भाग खड़ी हुई।”

श्लोक 36 (7.194.36)

अथ शारद्वतो राजन्नार्तिमार्च्छन्पुनःपुनः । शशंस द्रोणपुत्राय यथा द्रोणो निपातितः ॥

atha śāradvato rājannārtimārcchanpunaḥpunaḥ | śaśaṃsa droṇaputrāya yathā droṇo nipātitaḥ

तब, हे राजन्, शारद्वत ने बार-बार पीड़ा से कराहते हुए द्रोणपुत्र को बताया कि द्रोण किस प्रकार मार गिराए गए।

कृप उवाच

श्लोक 37 (7.194.37)

वयं द्रोणं पुरस्कृत्य पृथिव्यां प्रवरं रथम् । प्रावर्तयाम सङ्ग्रामं पाञ्चालैरेव केवलम् ॥

vayaṃ droṇaṃ puraskṛtya pṛthivyāṃ pravaraṃ ratham | prāvartayāma saṅgrāmaṃ pāñcālaireva kevalam

पृथ्वी के सर्वश्रेष्ठ रथी द्रोण को आगे रखकर हमने केवल पाञ्चालों के साथ ही युद्ध चलाया।

श्लोक 38 (7.194.38)

ततः प्रवृत्ते सङ्ग्रामे विमिश्राः कुरुसोमकाः । अन्योन्यमभिगर्जन्तः शस्त्रैर्देहानपातयन् ॥

tataḥ pravṛtte saṅgrāme vimiśrāḥ kurusomakāḥ | anyonyamabhigarjantaḥ śastrairdehānapātayan

फिर युद्ध छिड़ने पर कुरु और सोमक आपस में मिल गए और एक-दूसरे को ललकारते हुए शस्त्रों से शरीर गिराने लगे।

श्लोक 39 (7.194.39)

वर्तमाने तथा युद्धे क्षीयमाणेषु संयुगे । धार्तराष्ट्रेषु सङ्क्रुद्धः पिता तेऽस्त्रमुदैरयत् ॥

vartamāne tathā yuddhe kṣīyamāṇeṣu saṃyuge | dhārtarāṣṭreṣu saṅkruddhaḥ pitā te'stramudairayat

इस प्रकार युद्ध चलते और संग्राम में धृतराष्ट्र-पुत्रों के क्षीण होते जाने पर आपके पिता ने क्रुद्ध होकर अस्त्र चलाया।

श्लोक 40 (7.194.40)

ततो द्रोणो ब्राह्ममस्त्रं विकुर्वाणो नरर्षभः । व्यहनच्छात्रवान्भल्लैः शतशोऽथ सहस्रशः ॥

tato droṇo brāhmamastraṃ vikurvāṇo nararṣabhaḥ | vyahanacchātravānbhallaiḥ śataśo'tha sahasraśaḥ

तब नरश्रेष्ठ द्रोण ने ब्रह्मास्त्र प्रकट करके सैकड़ों-हज़ारों शत्रुओं को भल्ल नामक बाणों से मार गिराया।

श्लोक 41 (7.194.41)

पाण्डवाः केकया मात्स्याः पाञ्चालाश्च विशेषतः । सङ्ख्ये द्रोणरथं प्राप्य व्यनशन्कालचोदिताः ॥

pāṇḍavāḥ kekayā mātsyāḥ pāñcālāśca viśeṣataḥ | saṅkhye droṇarathaṃ prāpya vyanaśankālacoditāḥ

पाण्डव, केकय, मत्स्य और विशेषकर पाञ्चाल युद्ध में द्रोण के रथ के पास पहुँचकर काल की प्रेरणा से नष्ट हो गए।

श्लोक 42 (7.194.42)

सहस्रं नरसिंहानां द्विसाहस्रं च दन्तिनाम् । द्रोणो ब्रह्मास्त्रयोगेन प्रेषयामास मृत्यवे ॥

sahasraṃ narasiṃhānāṃ dvisāhasraṃ ca dantinām | droṇo brahmāstrayogena preṣayāmāsa mṛtyave

ब्रह्मास्त्र के प्रयोग से द्रोण ने एक हज़ार नरसिंहों और दो हज़ार हाथियों को मृत्यु के पास भेज दिया।

श्लोक 43 (7.194.43)

आकर्णपलितश्यामो वयसाऽशीतिपञ्चकः । रणे पर्यचरद्द्रोणो वृद्धः षोडशवर्षवत् ॥

ākarṇapalitaśyāmo vayasā'śītipañcakaḥ | raṇe paryacaraddroṇo vṛddhaḥ ṣoḍaśavarṣavat

कानों तक पके केशोंवाले, साँवले, पचासी वर्ष की आयु के वृद्ध द्रोण युद्ध में सोलह वर्ष के युवक की तरह विचरते थे।

श्लोक 44 (7.194.44)

क्लिश्यमानेषु सैन्येषु वध्यमानेषु राजसु । अमर्षवशमापन्नाः पाञ्चाला विमुखाऽभवन् ॥

kliśyamāneṣu sainyeṣu vadhyamāneṣu rājasu | amarṣavaśamāpannāḥ pāñcālā vimukhā'bhavan

सेनाओं के सताए जाने और राजाओं के मारे जाने पर क्रोध के वश में आए पाञ्चाल युद्ध से मुँह मोड़ बैठे।

श्लोक 45 (7.194.45)

तेषु किञ्चित्प्रभग्नेषु विमुखेषु सपत्नजित् । दिव्यमस्त्रं विकुर्वाणो बभूवार्क इवोदितः ॥

teṣu kiñcitprabhagneṣu vimukheṣu sapatnajit | divyamastraṃ vikurvāṇo babhūvārka ivoditaḥ

उनमें से कुछ के टूटकर विमुख हो जाने पर शत्रुविजयी द्रोण दिव्य अस्त्र का प्रयोग करते हुए उदित सूर्य के समान चमक उठे।

श्लोक 46 (7.194.46)

स मध्यं प्राप्य पाण्डूनां शररश्मिः प्रतापवान् । मध्यं गत इवादित्यो दुष्प्रेक्ष्यस्ते पिताऽभवत् ॥

sa madhyaṃ prāpya pāṇḍūnāṃ śararaśmiḥ pratāpavān | madhyaṃ gata ivādityo duṣprekṣyaste pitā'bhavat

बाणरूपी किरणोंवाले वे प्रतापी आपके पिता पाण्डवों के बीच पहुँचकर दोपहर के सूर्य की तरह देखने में असह्य हो गए।

श्लोक 47 (7.194.47)

ते दह्यमाना द्रोणेन सूर्येणेव विराजता । दग्धवीर्या निरुत्साहा बभूवुर्गतचेतसाः ॥

te dahyamānā droṇena sūryeṇeva virājatā | dagdhavīryā nirutsāhā babhūvurgatacetasāḥ

चमकते सूर्य के समान द्रोण से जलाए जाते हुए वे वीर्यहीन, निरुत्साह और अचेत-से हो गए।

श्लोक 48 (7.194.48)

तान्दृष्ट्वा पीडितान्बाणैर्द्रोणेन मधुसूदनः । जयैषी पाण्डुपुत्राणामिदं वचनमब्रवीत् ॥

tāndṛṣṭvā pīḍitānbāṇairdroṇena madhusūdanaḥ | jayaiṣī pāṇḍuputrāṇāmidaṃ vacanamabravīt

उन्हें द्रोण के बाणों से पीड़ित देखकर पाण्डवों की जय चाहनेवाले मधुसूदन ने यह बात कही—

वासुदेव उवाच

श्लोक 49 (7.194.49)

नैष जातु नरैः शक्यो जेतुं शस्त्रभृतां वरः । अपि वृत्रहणा सङ्ख्ये रथयूथपयूथपः ॥

naiṣa jātu naraiḥ śakyo jetuṃ śastrabhṛtāṃ varaḥ | api vṛtrahaṇā saṅkhye rathayūthapayūthapaḥ

शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ ये द्रोण मनुष्यों से कभी जीते नहीं जा सकते; रथ-समूहों के नायकों के भी नायक इन्हें युद्ध में वृत्रहन्ता इन्द्र भी नहीं जीत सकते।

श्लोक 50 (7.194.50)

ते यूयं धर्ममुत्सृज्य जयं रक्षत पाण्डवाः । यथा वः संयुगे सर्वान्न हन्याद्रुक्मवाहनः ॥

te yūyaṃ dharmamutsṛjya jayaṃ rakṣata pāṇḍavāḥ | yathā vaḥ saṃyuge sarvānna hanyādrukmavāhanaḥ

इसलिए हे पाण्डवो, तुम धर्म को छोड़कर विजय की रक्षा करो, ताकि वह स्वर्ण-रथवाला युद्ध में तुम सबको मार न डाले।

श्लोक 51 (7.194.51)

अश्वत्थाम्नि हते नैष युध्येदिति मतिर्मम । हतं तं संयुगे कश्चिदाख्यात्वस्मै मृषा नरः ॥

aśvatthāmni hate naiṣa yudhyediti matirmama | hataṃ taṃ saṃyuge kaścidākhyātvasmai mṛṣā naraḥ

मेरा विचार है कि अश्वत्थामा के मारे जाने पर ये युद्ध नहीं करेंगे। इसलिए कोई मनुष्य युद्ध में उसके मारे जाने की झूठी बात इनसे कह दे।

कृप उवाच

श्लोक 52 (7.194.52)

एतन्नारोचयद्वाक्यं कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः । अरोचयंस्तु सर्वेऽन्ये कृच्छ्रेण तु युधिष्ठिरः ॥

etannārocayadvākyaṃ kuntīputro dhanañjayaḥ | arocayaṃstu sarve'nye kṛcchreṇa tu yudhiṣṭhiraḥ

कुन्तीपुत्र धनञ्जय को यह बात नहीं रुची; बाक़ी सबको रुची, और युधिष्ठिर को कठिनाई से।

श्लोक 53 (7.194.53)

भीमसेनस्तु सव्रीडमब्रवीत्पितरं तव । अश्वत्थामा हत इति तं नाबुध्यत ते पिता ॥

bhīmasenastu savrīḍamabravītpitaraṃ tava | aśvatthāmā hata iti taṃ nābudhyata te pitā

भीमसेन ने लज्जित होकर आपके पिता से कहा, “अश्वत्थामा मारा गया”; पर आपके पिता ने उस पर विश्वास नहीं किया।

श्लोक 54 (7.194.54)

स शङ्कमानस्तन्मिथ्या धर्मराजमपृच्छत । हतं वाऽप्यहतं वाऽऽजौ त्वां पिता पुत्रवत्सलः ॥

sa śaṅkamānastanmithyā dharmarājamapṛcchata | hataṃ vā'pyahataṃ vā''jau tvāṃ pitā putravatsalaḥ

उसे झूठ समझने की शंका करते हुए पुत्रवत्सल आपके पिता ने धर्मराज से पूछा कि युद्ध में आप मारे गए हैं या नहीं।

श्लोक 55 (7.194.55)

तमतथ्यभये मग्नो जये सक्तो युधिष्ठिरः । अश्वत्थामानमायोधे हतं दृष्ट्वा महागजम् ॥

tamatathyabhaye magno jaye sakto yudhiṣṭhiraḥ | aśvatthāmānamāyodhe hataṃ dṛṣṭvā mahāgajam

तब असत्य के भय में डूबे हुए पर विजय में आसक्त युधिष्ठिर ने युद्ध में अश्वत्थामा नामक महान् हाथी को मरा देखा—

श्लोक 56 (7.194.56)

भीमेन गिरिवर्ष्माणं मालवस्येन्द्रवर्मणः । उपसृत्य तदा द्रोणमुच्चैरिदमुवाच ह ॥

bhīmena girivarṣmāṇaṃ mālavasyendravarmaṇaḥ | upasṛtya tadā droṇamuccairidamuvāca ha

मालव-नरेश इन्द्रवर्मा के पर्वत-जैसे शरीरवाले उस हाथी को, जिसे भीम ने मारा था; और तब द्रोण के पास जाकर उसने ऊँचे स्वर में यह कहा—

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 57 (7.194.57)

यस्यार्थे शस्त्रमादत्से यमवेक्ष्य च जीवसि । पुत्रस्ते दयितो नित्यं सोश्वत्थामा निपातितः ॥

yasyārthe śastramādatse yamavekṣya ca jīvasi | putraste dayito nityaṃ sośvatthāmā nipātitaḥ

जिसके लिए आप शस्त्र उठाते हैं, जिसे देखकर आप जीते हैं, आपका वह सदा प्रिय पुत्र अश्वत्थामा मारा गया।

श्लोक 58 (7.194.58)

शेते विनिहतो भूमौ वने सिंहशिशुर्यथा ॥

śete vinihato bhūmau vane siṃhaśiśuryathā

वह वन में सिंह के बच्चे की तरह मरकर भूमि पर पड़ा है।

कृप उवाच

श्लोक 59 (7.194.59)

जानन्नप्यनृतस्याथ दोषान्स द्विजसत्तमम् । अव्यक्तमब्रवीद्राजा हतः कुञ्जर इत्युत ॥

jānannapyanṛtasyātha doṣānsa dvijasattamam | avyaktamabravīdrājā hataḥ kuñjara ityuta

असत्य के दोषों को जानते हुए भी राजा ने उन द्विजश्रेष्ठ से अस्पष्ट स्वर में कहा—“मारा गया—हाथी।”

श्लोक 60 (7.194.60)

स त्वां निहतमाक्रन्दे श्रुत्वा सन्तापतापितः । नियम्य दिव्यान्यस्त्राणि नायुध्यत यथा पुरा ॥

sa tvāṃ nihatamākrande śrutvā santāpatāpitaḥ | niyamya divyānyastrāṇi nāyudhyata yathā purā

कोलाहल में आपके मारे जाने की बात सुनकर वे सन्ताप से जल उठे; उन्होंने अपने दिव्य अस्त्र समेट लिए और पहले की तरह युद्ध नहीं किया।

श्लोक 61 (7.194.61)

तं दृष्ट्वा परमोद्विग्नं शोकातुरमचेतसम् । पाञ्चालराजस्य सुतः क्रूरकर्मा समाद्रवत् ॥

taṃ dṛṣṭvā paramodvignaṃ śokāturamacetasam | pāñcālarājasya sutaḥ krūrakarmā samādravat

उन्हें अत्यन्त उद्विग्न और शोक से अचेत देखकर पाञ्चालराज का क्रूरकर्मा पुत्र (धृष्टद्युम्न) उन पर दौड़ पड़ा।

श्लोक 62 (7.194.62)

तं दृष्ट्वा विहितं मृत्युं लोकतत्त्वविचक्षणः । दिव्यान्यस्त्राण्यथोत्सृज्य रणे प्रायमुपाविशत् ॥

taṃ dṛṣṭvā vihitaṃ mṛtyuṃ lokatattvavicakṣaṇaḥ | divyānyastrāṇyathotsṛjya raṇe prāyamupāviśat

अपनी मृत्यु को विधाता से निश्चित देखकर लोक का तत्त्व जाननेवाले उन्होंने दिव्य अस्त्र त्याग दिए और मरने का संकल्प लेकर रणभूमि में ही बैठ गए।

श्लोक 63 (7.194.63)

ततोऽस्य केशान्सव्येन गृहीत्वा पाणिना तदा । पार्षतः क्रोशमानानां वीराणामच्छिनच्छिरः ॥

tato'sya keśānsavyena gṛhītvā pāṇinā tadā | pārṣataḥ krośamānānāṃ vīrāṇāmacchinacchiraḥ

तब पार्षत (धृष्टद्युम्न) ने बायें हाथ से उनके केश पकड़कर, चिल्लाते हुए वीरों के देखते-देखते उनका सिर काट डाला।

श्लोक 64 (7.194.64)

न हन्तव्यो न हन्तव्य इति ते सर्वतोऽब्रुवन् । तथैव चार्जुनो वाहादवरुह्यैनमाद्रवत् ॥

na hantavyo na hantavya iti te sarvato'bruvan | tathaiva cārjuno vāhādavaruhyainamādravat

“इन्हें न मारो, न मारो!”—सब ओर से लोग चिल्लाए; अर्जुन भी रथ से कूदकर उसकी ओर दौड़ा।

श्लोक 65 (7.194.65)

उद्यम्य त्वरितो बाहुं ब्रुवाणश्च पुनःपुनः । जीवन्तमानयाचार्यं मावधीरिति धर्मवित् ॥

udyamya tvarito bāhuṃ bruvāṇaśca punaḥpunaḥ | jīvantamānayācāryaṃ māvadhīriti dharmavit

धर्म को जाननेवाला अर्जुन हाथ उठाए, जल्दी में बार-बार कह रहा था—“आचार्य को जीवित ले आओ, उन्हें मत मारो!”

श्लोक 66 (7.194.66)

तथा निवार्यमाणेन कौरवैरर्जुनेन च । हत एव नृशंसेन पिता तव नरर्षभ ॥

tathā nivāryamāṇena kauravairarjunena ca | hata eva nṛśaṃsena pitā tava nararṣabha

पर हे नरश्रेष्ठ, कौरवों और अर्जुन के रोकने पर भी उस नृशंस ने आपके पिता को मार ही डाला।

श्लोक 67 (7.194.67)

सैनिकाश्च ततः सर्वे प्राद्रवन्त भयार्दिताः । वयं चापि निरुत्साहा हते पितरि तेऽनघ ॥

sainikāśca tataḥ sarve prādravanta bhayārditāḥ | vayaṃ cāpi nirutsāhā hate pitari te'nagha

तब सब सैनिक भय से पीड़ित होकर भाग खड़े हुए, और हे निष्पाप, आपके पिता के मारे जाने पर हम भी हतोत्साह हो गए।

सञ्जय उवाच

श्लोक 68 (7.194.68)

तच्छ्रुत्वा द्रोणपुत्रस्तु निधनं पितुराहवे । क्रोधमाहारयत्तीव्रं दण्डाहत इवोरगः ॥

tacchrutvā droṇaputrastu nidhanaṃ piturāhave | krodhamāhārayattīvraṃ daṇḍāhata ivoragaḥ

पिता का युद्ध में निधन सुनकर द्रोणपुत्र ने डंडे से मारे गए सर्प की तरह तीव्र क्रोध धारण कर लिया।

श्लोक 69 (7.194.69)

ततः क्रुद्धो रणे द्रौणिर्भृशं जज्वाल मारिष । यथेन्धनं महत्प्राप्य प्राज्वलद्धव्यवाहनः ॥

tataḥ kruddho raṇe drauṇirbhṛśaṃ jajvāla māriṣa | yathendhanaṃ mahatprāpya prājvaladdhavyavāhanaḥ

तब हे मान्यवर, युद्ध में क्रुद्ध द्रौणि अत्यन्त प्रज्वलित हो उठा, जैसे बहुत-सा ईंधन पाकर हव्य ले जानेवाली अग्नि भड़क उठती है।

श्लोक 70 (7.194.70)

तलं तलेन निष्पिष्य दन्तैर्दन्तानुपास्पृशत् । निःश्वसन्नुरगो यद्वल्लोहिताक्षोऽभवत्तदा ॥

talaṃ talena niṣpiṣya dantairdantānupāspṛśat | niḥśvasannurago yadvallohitākṣo'bhavattadā

हथेली से हथेली को मलकर और दाँत से दाँत पीसकर, साँप की तरह फुफकारता हुआ वह लाल आँखोंवाला हो गया।

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