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द्रोण पर्व · अध्याय 193

धृष्टद्युम्न द्वारा द्रोण का वध

सात्यकि को दुर्योधन, कर्ण, कृप आदि घेर लेते हैं, तब पाण्डव उसके पास जुट जाते हैं; और युधिष्ठिर अपशकुनों के बीच सृञ्जयों को द्रोण पर चढ़ाई का आदेश देते हैं। द्रोण क्षत्रियों की पंक्तियाँ जला डालते हैं; भीम रथहीन धृष्टद्युम्न को अपने रथ में बिठाकर उसे उकसाते हैं और फिर ब्राह्मण होकर संहार करने के लिए द्रोण को फटकारते हैं। द्रोण शस्त्र त्यागकर योग में स्थित होते हैं और ज्योति बनकर ब्रह्मलोक को चले जाते हैं, जिसे केवल सञ्जय, अर्जुन, कृप, कृष्ण और युधिष्ठिर देख पाते हैं; अर्जुन के पुकारते रहने पर भी धृष्टद्युम्न उनका सिर काट लेता है, कौरव-सेना बिखरकर भाग खड़ी होती है, और भीम तथा धृष्टद्युम्न एक-दूसरे को गले लगाते हैं।

अध्याय 192अध्याय-सूचीअध्याय 194

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.193.1)

सात्वतस्य तु तत्कर्म दृष्ट्वा दुर्योधनादयः । शैनेयं सर्वतः क्रुद्धा वारयामासुरञ्जसा ॥

sātvatasya tu tatkarma dṛṣṭvā duryodhanādayaḥ | śaineyaṃ sarvataḥ kruddhā vārayāmāsurañjasā

सात्वत (सात्यकि) के उस पराक्रम को देखकर दुर्योधन आदि क्रोध में भरकर चारों ओर से शैनेय को तुरन्त घेरकर रोकने लगे।

श्लोक 2 (7.193.2)

कृपकर्णौ च समरे पुत्राश्च तव मारिष । शैनेयं त्वरयाऽभ्येत्य विनिघ्नन्निशितैः शरैः ॥

kṛpakarṇau ca samare putrāśca tava māriṣa | śaineyaṃ tvarayā'bhyetya vinighnanniśitaiḥ śaraiḥ

हे मान्यवर, कृप और कर्ण तथा आपके पुत्र युद्ध में शीघ्रता से शैनेय पर चढ़ आए और तीखे बाणों से उसे मारने लगे।

श्लोक 3 (7.193.3)

युधिष्ठिरस्ततो राजा माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ । भीमसेनश्च बलवान्सात्यकिं पर्यवारयन् ॥

yudhiṣṭhirastato rājā mādrīputrau ca pāṇḍavau | bhīmasenaśca balavānsātyakiṃ paryavārayan

तब राजा युधिष्ठिर, माद्री के दोनों पाण्डव-पुत्र और बलवान् भीमसेन सात्यकि के चारों ओर आ जुटे।

श्लोक 4 (7.193.4)

कर्णश्च शरवर्षेण गौतमश्च महारथः । दुर्योधनादयस्ते च शैनेयं पर्यवारयन् ॥

karṇaśca śaravarṣeṇa gautamaśca mahārathaḥ | duryodhanādayaste ca śaineyaṃ paryavārayan

कर्ण ने बाणों की वर्षा करते हुए, महारथी गौतम (कृप) ने और दुर्योधन आदि उन सबने शैनेय को घेर लिया।

श्लोक 5 (7.193.5)

तां वृष्टिं सहसा राजन्नुत्थितां घोररूपिणीम् । वारयामास शैनेयो योधयंस्तान्महारथान् ॥

tāṃ vṛṣṭiṃ sahasā rājannutthitāṃ ghorarūpiṇīm | vārayāmāsa śaineyo yodhayaṃstānmahārathān

हे राजन्, अचानक उठी हुई उस भयंकर बाण-वर्षा को शैनेय ने उन महारथियों से लड़ते हुए रोक दिया।

श्लोक 6 (7.193.6)

तेषामस्त्राणि दिव्यानि संहितानि महात्मनाम् । वारयामास विधिवद्दिव्यैरस्त्रैर्महामृधे ॥

teṣāmastrāṇi divyāni saṃhitāni mahātmanām | vārayāmāsa vidhivaddivyairastrairmahāmṛdhe

उन महात्माओं के धनुष पर चढ़ाए हुए दिव्य अस्त्रों को उसने उस महायुद्ध में विधिपूर्वक अपने दिव्य अस्त्रों से रोक दिया।

श्लोक 7 (7.193.7)

क्रूरमायोधनं जज्ञे तस्मिन्राजसमागमे । रुद्रस्येव हि क्रुद्धस्य निघ्नतस्तान्पशून्पुरा ॥

krūramāyodhanaṃ jajñe tasminrājasamāgame | rudrasyeva hi kruddhasya nighnatastānpaśūnpurā

राजाओं के उस समागम में भयंकर संग्राम छिड़ गया, जैसा प्राचीन काल में क्रुद्ध रुद्र ने पशुओं का संहार करते हुए मचाया था।

श्लोक 8 (7.193.8)

हस्तानामुत्तमाङ्गानां कार्मुकाणां च भारत । छत्राणां चापविद्धानां चामराणां च सञ्चयैः । राशयः स्म व्यदृश्यन्त तत्रतत्र रणाजिरे ॥

hastānāmuttamāṅgānāṃ kārmukāṇāṃ ca bhārata | chatrāṇāṃ cāpaviddhānāṃ cāmarāṇāṃ ca sañcayaiḥ | rāśayaḥ sma vyadṛśyanta tatratatra raṇājire

हे भारत, कटे हुए हाथों, सिरों, धनुषों, फेंके हुए छत्रों और चँवरों के ढेर रणभूमि में जहाँ-तहाँ दिखाई देते थे।

श्लोक 9 (7.193.9)

भग्नचक्रै रथैश्चापि पातितैश्च महाध्वजैः । सादिभिश्च हतैः शूरैः सङ्कीर्णा वसुधाऽभवत् ॥

bhagnacakrai rathaiścāpi pātitaiśca mahādhvajaiḥ | sādibhiśca hataiḥ śūraiḥ saṅkīrṇā vasudhā'bhavat

टूटे पहियों वाले रथों, गिराई गई बड़ी ध्वजाओं और मारे गए घुड़सवारों तथा शूरवीरों से पृथ्वी पट गई थी।

श्लोक 10 (7.193.10)

बाणपातनिकृत्तास्तु योधास्ते कुरुसत्तम । चेष्टन्तो विविधाश्चेष्टा व्यदृश्यन्त महाहवे ॥

bāṇapātanikṛttāstu yodhāste kurusattama | ceṣṭanto vividhāśceṣṭā vyadṛśyanta mahāhave

हे कुरुश्रेष्ठ, बाणों की मार से कटे हुए वे योद्धा उस महायुद्ध में नाना प्रकार से तड़पते हुए दिखाई देते थे।

श्लोक 11 (7.193.11)

वर्तमाने तथा युद्धे घोरे देवासुरोपमे । अब्रवीत्क्षत्रियांस्तत्र धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥

vartamāne tathā yuddhe ghore devāsuropame | abravītkṣatriyāṃstatra dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ

देवासुर-संग्राम के समान वह घोर युद्ध जब चल रहा था, तब धर्मराज युधिष्ठिर ने वहाँ क्षत्रियों से कहा।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 12 (7.193.12)

अभिद्रवत संयत्ताः कुम्भयोनिं महारथाः । एषो हि पार्षतो वीरो भारद्वाजेन सङ्गतः ॥

abhidravata saṃyattāḥ kumbhayoniṃ mahārathāḥ | eṣo hi pārṣato vīro bhāradvājena saṅgataḥ

हे महारथियो, सावधान होकर कुम्भयोनि (द्रोण) पर टूट पड़ो! यह वीर पार्षत भारद्वाज से भिड़ गया है,

श्लोक 13 (7.193.13)

घटते च यथाशक्ति भारद्वाजस्य नाशने । यादृशानि हि रूपाणि दृश्यन्तेऽस्य महारणे ॥

ghaṭate ca yathāśakti bhāradvājasya nāśane | yādṛśāni hi rūpāṇi dṛśyante'sya mahāraṇe

और भारद्वाज के विनाश के लिए यथाशक्ति प्रयत्न कर रहा है; क्योंकि इस महायुद्ध में उसके जैसे रूप दिखाई दे रहे हैं।

श्लोक 14 (7.193.14)

अद्य द्रोणं रणे क्रुद्धो घातयिष्यति पार्षतः । ते यूयं सहिता भूत्वा युध्यध्वं कुम्भसम्भवम् ॥

adya droṇaṃ raṇe kruddho ghātayiṣyati pārṣataḥ | te yūyaṃ sahitā bhūtvā yudhyadhvaṃ kumbhasambhavam

आज पार्षत क्रुद्ध होकर रण में द्रोण का वध कर डालेगा। इसलिए तुम सब मिलकर कुम्भसम्भव द्रोण से युद्ध करो।

सञ्जय उवाच

श्लोक 15 (7.193.15)

युधिष्ठिरसमाज्ञप्ताः सृञ्जयानां महारथाः । अभ्यद्रवन्त संयत्ता भारद्वाजजिघांसवः ॥

yudhiṣṭhirasamājñaptāḥ sṛñjayānāṃ mahārathāḥ | abhyadravanta saṃyattā bhāradvājajighāṃsavaḥ

युधिष्ठिर की आज्ञा पाकर सृञ्जयों के महारथी दृढ़ निश्चय के साथ भारद्वाज को मार डालने की इच्छा से उस पर टूट पड़े।

श्लोक 16 (7.193.16)

तान्समापततः सर्वान्भारद्वाजो महारथः । अभ्यवर्तत वेगेन मर्तव्यमिति निश्चितः ॥

tānsamāpatataḥ sarvānbhāradvājo mahārathaḥ | abhyavartata vegena martavyamiti niścitaḥ

उन सबको आक्रमण करते देख महारथी भारद्वाज ने "मरना ही है" यह निश्चय करके वेग से उनका सामना किया।

श्लोक 17 (7.193.17)

प्रयाते सत्यसन्धे तु समकम्पत मेदिनी । ववुर्वाताः सनिर्घातास्त्रासयाना वरूथिनीम् ॥

prayāte satyasandhe tu samakampata medinī | vavurvātāḥ sanirghātāstrāsayānā varūthinīm

सत्य-प्रतिज्ञ द्रोण के चलते ही पृथ्वी काँप उठी और वज्रपात जैसी गड़गड़ाहट के साथ हवाएँ चलने लगीं, जो सेना को भयभीत कर रही थीं।

श्लोक 18 (7.193.18)

पपात महती चोल्का आदित्यान्निश्चरन्त्युत । दीपयन्ती उभे सेने शंसन्तीव महद्भयम् ॥

papāta mahatī colkā ādityānniścarantyuta | dīpayantī ubhe sene śaṃsantīva mahadbhayam

सूर्य से निकलती हुई-सी एक बड़ी उल्का गिरी; वह दोनों सेनाओं को प्रकाशित करती हुई मानो महान् भय की सूचना दे रही थी।

श्लोक 19 (7.193.19)

जज्वलुश्चैव शस्त्राणि भारद्वाजस्य मारिष । रथाः स्वनन्ति चात्यर्थं हयाश्चाश्रूण्यवासृजन् ॥

jajvaluścaiva śastrāṇi bhāradvājasya māriṣa | rathāḥ svananti cātyarthaṃ hayāścāśrūṇyavāsṛjan

हे मान्यवर, भारद्वाज के शस्त्र जल उठे, रथ ज़ोर से चरमराने लगे और घोड़े आँसू बहाने लगे।

श्लोक 20 (7.193.20)

हतौजा इव चाप्यासीद्भारद्वाजो महारथः । प्रास्फुरन्नयनं चास्य वामबाहुस्तथैव च ॥

hataujā iva cāpyāsīdbhāradvājo mahārathaḥ | prāsphurannayanaṃ cāsya vāmabāhustathaiva ca

महारथी भारद्वाज मानो तेजहीन हो गए; उनकी आँख और बायीं भुजा फड़कने लगी।

श्लोक 21 (7.193.21)

विमनाश्चाभवद्युद्धे दृष्ट्वा पार्षतमग्रतः ॥

vimanāścābhavadyuddhe dṛṣṭvā pārṣatamagrataḥ

सामने पार्षत को देखकर वे युद्ध में उदास हो गए।

श्लोक 22 (7.193.22)

ऋषीणां ब्रह्मवादानां स्वर्गस्य गमनं प्रति । सुयुद्धेन ततः प्राणानुत्स्रष्टुमुपचक्रमे ॥

ṛṣīṇāṃ brahmavādānāṃ svargasya gamanaṃ prati | suyuddhena tataḥ prāṇānutsraṣṭumupacakrame

ब्रह्मवादी ऋषियों की स्वर्ग-गमन सम्बन्धी बात का ध्यान करके, तब उन्होंने उत्तम युद्ध के द्वारा प्राण त्यागने का उपक्रम किया।

श्लोक 23 (7.193.23)

ततश्चतुर्दिशं सैन्यैर्द्रुपदस्याभिसंवृतः । निर्दहन्क्षत्रियव्रातान्द्रोणः पर्यचरद्रणे ॥

tataścaturdiśaṃ sainyairdrupadasyābhisaṃvṛtaḥ | nirdahankṣatriyavrātāndroṇaḥ paryacaradraṇe

तब चारों दिशाओं से द्रुपद की सेनाओं से घिरे हुए द्रोण क्षत्रियों के समूहों को भस्म करते हुए रण में विचरने लगे।

श्लोक 24 (7.193.24)

हत्वा विंशतिसाहस्रान्क्षत्रियानरिमर्दनः । दशायुतानि करिणामवधीद्विशिखैः शितैः ॥

hatvā viṃśatisāhasrānkṣatriyānarimardanaḥ | daśāyutāni kariṇāmavadhīdviśikhaiḥ śitaiḥ

शत्रुओं का मर्दन करने वाले द्रोण ने बीस हज़ार क्षत्रियों को मारकर तीखे बाणों से दस अयुत (एक लाख) हाथियों को भी मार डाला।

श्लोक 25 (7.193.25)

सोऽतिष्ठदाहवे यत्तो विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् । क्षत्रियाणामभावाय ब्राह्ममस्त्रं समास्थितः ॥

so'tiṣṭhadāhave yatto vidhūmo'gniriva jvalan | kṣatriyāṇāmabhāvāya brāhmamastraṃ samāsthitaḥ

वे धुएँ से रहित अग्नि के समान जलते हुए, क्षत्रियों के विनाश के लिए ब्रह्मास्त्र का आश्रय लेकर युद्ध में सजग खड़े रहे।

श्लोक 26 (7.193.26)

पाञ्चाल्यं विरथं भीमो हतसर्वायुधं बली । सुविपण्णं महात्मानं त्वरमाणः समभ्ययात् ॥

pāñcālyaṃ virathaṃ bhīmo hatasarvāyudhaṃ balī | suvipaṇṇaṃ mahātmānaṃ tvaramāṇaḥ samabhyayāt

बलवान् भीम रथहीन, सारे शस्त्र खो चुके और अत्यन्त व्याकुल उन महात्मा पाञ्चाल (धृष्टद्युम्न) के पास जल्दी से जा पहुँचे।

श्लोक 27 (7.193.27)

ततः स्वरथमारोप्य पाञ्चाल्यमरिमर्दनः । अब्रवीदभिसम्प्रेक्ष्य द्रोणमस्यन्तमन्तिकात् ॥

tataḥ svarathamāropya pāñcālyamarimardanaḥ | abravīdabhisamprekṣya droṇamasyantamantikāt

तब शत्रुमर्दन भीम ने पाञ्चाल को अपने रथ पर चढ़ा लिया और पास से बाण चलाते हुए द्रोण की ओर देखकर कहा।

भीमसेन उवाच

श्लोक 28 (7.193.28)

न त्वदन्य इहाचार्यं योद्धुमुत्सहते पुमान् । त्वरस्व प्राग्वधायैव त्वयि भारः समाहितः ॥

na tvadanya ihācāryaṃ yoddhumutsahate pumān | tvarasva prāgvadhāyaiva tvayi bhāraḥ samāhitaḥ

तुम्हारे सिवा यहाँ कोई और पुरुष आचार्य से युद्ध करने का साहस नहीं करता। उनके वध के लिए शीघ्रता करो; सारा भार तुम्हीं पर रखा है।

सञ्जय उवाच

श्लोक 29 (7.193.29)

स तथोक्तो महाबाहुः सर्वभारसहं धनुः । अभिपत्याददे क्षिप्रमायुधप्रवरं दृढम् ॥

sa tathokto mahābāhuḥ sarvabhārasahaṃ dhanuḥ | abhipatyādade kṣipramāyudhapravaraṃ dṛḍham

ऐसा कहे जाने पर उस महाबाहु ने झपटकर शीघ्र ही अपना सब भार सह सकने वाला, शस्त्रों में श्रेष्ठ, दृढ़ धनुष उठा लिया।

श्लोक 30 (7.193.30)

संरब्धश्च शरानस्यन्द्रोणं दुर्वारणं रणे । विवारयिषुराचार्यं शरवर्षैरवाकिरत् ॥

saṃrabdhaśca śarānasyandroṇaṃ durvāraṇaṃ raṇe | vivārayiṣurācāryaṃ śaravarṣairavākirat

क्रोध में भरे हुए उसने युद्ध में दुर्धर्ष द्रोण पर बाण छोड़े और आचार्य को रोकने की इच्छा से उन्हें बाणों की वर्षा से ढक दिया।

श्लोक 31 (7.193.31)

तौ न्यवारयतां श्रेष्ठौ संरब्धौ रणशोभिनौ । उदीरयेतां ब्राह्माणि दिव्यान्यस्त्राण्यनेकशः ॥

tau nyavārayatāṃ śreṣṭhau saṃrabdhau raṇaśobhinau | udīrayetāṃ brāhmāṇi divyānyastrāṇyanekaśaḥ

रण में शोभा पाने वाले वे दोनों श्रेष्ठ योद्धा क्रोध में भरकर एक-दूसरे को रोकते रहे और बार-बार दिव्य ब्रह्मास्त्र छोड़ते रहे।

श्लोक 32 (7.193.32)

स महास्त्रैर्महाराज द्रोणमाच्छादयद्रणे । निहत्य सर्वाण्यस्त्राणि भारद्वाजस्य पार्षतः ॥

sa mahāstrairmahārāja droṇamācchādayadraṇe | nihatya sarvāṇyastrāṇi bhāradvājasya pārṣataḥ

हे महाराज, पार्षत ने भारद्वाज के सब अस्त्रों को नष्ट करके महान् अस्त्रों से द्रोण को रण में ढक दिया।

श्लोक 33 (7.193.33)

स वसातीञ्शिवींश्चैव वाह्लीकान्कौरवानपि । रक्षिष्यमाणान्सङ्ग्रामे द्रोणं व्यधमदच्युतः ॥

sa vasātīñśivīṃścaiva vāhlīkānkauravānapi | rakṣiṣyamāṇānsaṅgrāme droṇaṃ vyadhamadacyutaḥ

उस अडिग वीर ने रण में द्रोण की रक्षा करने को तत्पर वसातियों, शिबियों, बाह्लीकों और कौरवों को भी तितर-बितर कर दिया।

श्लोक 34 (7.193.34)

धृष्टद्युम्नस्तथा राजन्गभस्तिभिरिवांशुमान् । बभौ प्रच्छादयन्नाशाः शरजालैः समन्ततः ॥

dhṛṣṭadyumnastathā rājangabhastibhirivāṃśumān | babhau pracchādayannāśāḥ śarajālaiḥ samantataḥ

हे राजन्, धृष्टद्युम्न भी सूर्य की किरणों के समान चारों ओर बाणों के जाल से दिशाओं को ढककर शोभित हुआ।

श्लोक 35 (7.193.35)

तस्य द्रोणो धनुश्छित्त्वा विद्ध्वा चैनं शिलीमुखैः । मर्माण्यभ्यहनद्भूयः स व्यथां परमामगात् ॥

tasya droṇo dhanuśchittvā viddhvā cainaṃ śilīmukhaiḥ | marmāṇyabhyahanadbhūyaḥ sa vyathāṃ paramāmagāt

द्रोण ने उसका धनुष काट डाला, उसे बाणों से बींधा और फिर उसके मर्मस्थानों पर प्रहार किया; वह अत्यन्त पीड़ा को प्राप्त हुआ।

श्लोक 36 (7.193.36)

ततो भीमो दृढक्रोधो द्रोणस्याश्लिष्य तं रथम् । शनकैरिव राजेन्द्र द्रोणं वचनमब्रवीत् ॥

tato bhīmo dṛḍhakrodho droṇasyāśliṣya taṃ ratham | śanakairiva rājendra droṇaṃ vacanamabravīt

तब दृढ़ क्रोध वाले भीम ने द्रोण के रथ से सटकर, हे राजेन्द्र, मानो धीरे से द्रोण से यह बात कही।

भीमसेन उवाच

श्लोक 37 (7.193.37)

यदि नाम न युध्येरञ्शिक्षिता ब्रह्मबन्धवः । स्वकर्मभिरसन्तुष्टा न स्म क्षत्रं क्षयं व्रजेत् ॥

yadi nāma na yudhyerañśikṣitā brahmabandhavaḥ | svakarmabhirasantuṣṭā na sma kṣatraṃ kṣayaṃ vrajet

यदि शिक्षित होकर भी अपने कर्मों से असन्तुष्ट ये नाम के ब्राह्मण युद्ध न करते, तो क्षत्रिय-वंश का नाश न होता।

श्लोक 38 (7.193.38)

अहिंसां सर्वभूतेषु धर्मं ज्यायस्तरं विदुः । तस्य च ब्राह्मणो मूलं भवांश्च ब्रह्मवित्तमः ॥

ahiṃsāṃ sarvabhūteṣu dharmaṃ jyāyastaraṃ viduḥ | tasya ca brāhmaṇo mūlaṃ bhavāṃśca brahmavittamaḥ

सब प्राणियों के प्रति अहिंसा को ज्ञानी लोग श्रेष्ठतर धर्म मानते हैं; ब्राह्मण उसका मूल है और आप ब्रह्मवेत्ताओं में सर्वश्रेष्ठ हैं।

श्लोक 39 (7.193.39)

श्वपाकवन्म्लेच्छगणान्हत्वा चान्यान्पृथग्विधान् । भरन्ति हि सुतान्दारांस्तद्वदज्ञानमोहिताः ॥

śvapākavanmlecchagaṇānhatvā cānyānpṛthagvidhān | bharanti hi sutāndārāṃstadvadajñānamohitāḥ

श्वपाक (चाण्डाल) की भाँति म्लेच्छों के समूहों और नाना प्रकार के अन्य लोगों को मारकर — क्योंकि अज्ञान से मोहित लोग उसी प्रकार पुत्रों और स्त्रियों का भरण करते हैं।

श्लोक 40 (7.193.40)

अज्ञानान्मूढवद्ब्रह्मन्पुत्रदारधनेप्सया । एकस्यार्थे बहून्हत्वा पुत्रस्याधर्मविद्यया । स्वकर्मस्थान्विकर्मस्थो न व्यपत्रपसे कथम् ॥

ajñānānmūḍhavadbrahmanputradāradhanepsayā | ekasyārthe bahūnhatvā putrasyādharmavidyayā | svakarmasthānvikarmastho na vyapatrapase katham

हे ब्राह्मण, अज्ञान से मूढ़ की भाँति पुत्र, स्त्री और धन की इच्छा से, एक पुत्र के लिए अधर्म-विद्या के द्वारा बहुतों को मारकर, अपने धर्म में स्थित लोगों के सामने निषिद्ध कर्म में लगे हुए आपको लज्जा कैसे नहीं आती?

श्लोक 41 (7.193.41)

आचारहीन निर्लज्ज ब्रह्मबन्धो वरायुध । इदानीं तिष्ठ दुर्बुद्धे न मे जीवन्विमोक्ष्यसे ॥

ācārahīna nirlajja brahmabandho varāyudha | idānīṃ tiṣṭha durbuddhe na me jīvanvimokṣyase

ओ आचारहीन, निर्लज्ज, नाममात्र के ब्राह्मण, श्रेष्ठ शस्त्र धारण करने वाले दुर्बुद्धि! अब ठहर जा; जीवित रहकर तू मुझसे नहीं बच सकेगा।

श्लोक 42 (7.193.42)

यस्यार्थे शस्त्रमादाय यमपेक्ष्य च जीवसि । स चाद्य पतितः शेते पृष्टेनावेदितस्तव ॥

yasyārthe śastramādāya yamapekṣya ca jīvasi | sa cādya patitaḥ śete pṛṣṭenāveditastava

जिसके लिए तुमने शस्त्र उठाया और जिसकी ओर देखकर तुम जीते हो, वह आज गिरा पड़ा है — धर्मराज ने पूछे जाने पर तुम्हें यह बताया था।

श्लोक 43 (7.193.43)

स वै च निहतः शेते तव पुत्रः सुमन्दधीः । धर्मराजस्य तद्वाक्यं नाभिशङ्कितुमर्हसि ॥

sa vai ca nihataḥ śete tava putraḥ sumandadhīḥ | dharmarājasya tadvākyaṃ nābhiśaṅkitumarhasi

"तुम्हारा वह मन्दबुद्धि पुत्र निश्चय ही मारा जाकर पड़ा है" — धर्मराज के उस वचन पर तुम्हें शंका नहीं करनी चाहिए।

सञ्जय उवाच

श्लोक 44 (7.193.44)

एवमुक्तस्ततो द्रोणो भीमेनोत्सृज्य तद्धनुः । सन्न्यासाय शरीरस्य योक्ष्यमाणः स वै द्विजः । सर्वाण्यस्त्राणि धर्मात्मा हातुकामोऽभ्यभाषत ॥

evamuktastato droṇo bhīmenotsṛjya taddhanuḥ | sannyāsāya śarīrasya yokṣyamāṇaḥ sa vai dvijaḥ | sarvāṇyastrāṇi dharmātmā hātukāmo'bhyabhāṣata

भीम के ऐसा कहने पर धर्मात्मा द्रोण ने अपना वह धनुष डाल दिया — शरीर के संन्यास के लिए योग में लगने को उद्यत वे ब्राह्मण — और सभी अस्त्र त्यागने की इच्छा से पुकारकर बोले।

श्लोक 45 (7.193.45)

कर्णं दुर्योधनं राजंस्त्वरमाणः पराक्रमम् । कर्णकर्ण महेष्वास कृप दुर्योधनेति च ॥

karṇaṃ duryodhanaṃ rājaṃstvaramāṇaḥ parākramam | karṇakarṇa maheṣvāsa kṛpa duryodhaneti ca

हे राजन्, उन पराक्रमी ने शीघ्रता से कर्ण और दुर्योधन को पुकारा — "कर्ण, कर्ण, महाधनुर्धर! कृप! दुर्योधन!"

श्लोक 46 (7.193.46)

सङ्ग्रामे क्रियतां यत्नो ब्रवीम्येष पुनःपुनः । पाण्डवेभ्यः शिवं वोऽस्तु शस्त्रमभ्युत्सृजाम्यहम् । इति तत्र महाराज प्राक्रोशद्द्रौणिमेव च ॥

saṅgrāme kriyatāṃ yatno bravīmyeṣa punaḥpunaḥ | pāṇḍavebhyaḥ śivaṃ vo'stu śastramabhyutsṛjāmyaham | iti tatra mahārāja prākrośaddrauṇimeva ca

"युद्ध में प्रयत्न करो — मैं बार-बार यही कहता हूँ। पाण्डवों से तुम्हारा कल्याण हो — मैं शस्त्र त्यागता हूँ।" हे महाराज, उन्होंने वहाँ ऐसा पुकारकर कहा, और द्रोणपुत्र को भी पुकारा।

श्लोक 47 (7.193.47)

उत्सृज्य च रणे शस्त्रं रथोपस्थे निविश्य च । अभयं सर्वभूतानां प्रददौ योगमीयिवान् ॥

utsṛjya ca raṇe śastraṃ rathopasthe niviśya ca | abhayaṃ sarvabhūtānāṃ pradadau yogamīyivān

युद्ध में शस्त्र डालकर और रथ के पिछले भाग में बैठकर उन्होंने सब प्राणियों को अभय दे दिया और योग में लीन हो गए।

श्लोक 48 (7.193.48)

तस्य तच्छिद्रमाज्ञाय धृष्टद्युम्नः प्रतापवान् । सशरं तद्धनुर्घोरं सन्न्यस्याथ रथे ततः । खड्गी रथादवप्लुत्य सहसा द्रोणमभ्ययात् ॥

tasya tacchidramājñāya dhṛṣṭadyumnaḥ pratāpavān | saśaraṃ taddhanurghoraṃ sannyasyātha rathe tataḥ | khaḍgī rathādavaplutya sahasā droṇamabhyayāt

उस अवसर को जानकर प्रतापी धृष्टद्युम्न ने बाण-सहित अपना भयंकर धनुष रथ में रख दिया और खड्ग हाथ में लेकर रथ से कूदकर सहसा द्रोण पर टूट पड़ा।

श्लोक 49 (7.193.49)

प्रद्रुते त्वथ द्रोणाय धृष्टद्युम्ने महारथे । हाहाकृतानि भूतानि मानुषाणीतराणि च ॥

pradrute tvatha droṇāya dhṛṣṭadyumne mahārathe | hāhākṛtāni bhūtāni mānuṣāṇītarāṇi ca

महारथी धृष्टद्युम्न के द्रोण की ओर दौड़ पड़ने पर मनुष्य और अन्य सब प्राणी हाहाकार कर उठे।

श्लोक 50 (7.193.50)

द्रोणं तथागतं दृष्ट्वा धृष्टद्युम्नवशं गतम् । हाहाकारं भृशं चक्रुरहो धिगिति चाबुवन् ॥

droṇaṃ tathāgataṃ dṛṣṭvā dhṛṣṭadyumnavaśaṃ gatam | hāhākāraṃ bhṛśaṃ cakruraho dhigiti cābuvan

द्रोण को इस दशा में धृष्टद्युम्न के वश में पड़ा देखकर वे ज़ोर से हाहाकार करने लगे और "अहो, धिक्कार है!" कहने लगे।

श्लोक 51 (7.193.51)

द्रोणोऽपि शस्त्राण्युत्सृज्य परमं साङ्ख्यमास्थितः । तथोक्त्वा योगमास्थाय ज्योतिर्भूतो महातपाः ॥

droṇo'pi śastrāṇyutsṛjya paramaṃ sāṅkhyamāsthitaḥ | tathoktvā yogamāsthāya jyotirbhūto mahātapāḥ

द्रोण भी शस्त्र त्यागकर परम साङ्ख्य में स्थित हो गए; ऐसा कहकर और योग का आश्रय लेकर वे महातपस्वी ज्योतिर्मय हो गए।

श्लोक 52 (7.193.52)

पुराणं पुरुषं विष्णुं जगाम मनसा परम् । मुखं किञ्चित्समुन्नाम्य विष्टभ्योरस्तथाग्रतः ॥

purāṇaṃ puruṣaṃ viṣṇuṃ jagāma manasā param | mukhaṃ kiñcitsamunnāmya viṣṭabhyorastathāgrataḥ

उन्होंने मुख को थोड़ा ऊपर उठाकर और वक्ष को आगे की ओर स्थिर करके, मन से पुराणपुरुष परम विष्णु की ओर गमन किया,

श्लोक 53 (7.193.53)

निमीलिताक्षः सत्वस्थो निक्षिप्य हृदि धारणाम् । ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म ज्योतिर्भूतो महातपाः ॥

nimīlitākṣaḥ satvastho nikṣipya hṛdi dhāraṇām | omityekākṣaraṃ brahma jyotirbhūto mahātapāḥ

आँखें मूँदकर, सत्त्व में स्थित होकर, हृदय में धारणा जमाकर, एकाक्षर ब्रह्म ओम् में ध्यान लगाकर वे महातपस्वी ज्योतिर्मय हो गए,

श्लोक 54 (7.193.54)

स्मरित्वा देवदेवेशमक्षरं परमं प्रभुम् । दिवमाक्रामदाचार्यः साक्षात्सद्भिर्दुराक्रमाम् ॥

smaritvā devadeveśamakṣaraṃ paramaṃ prabhum | divamākrāmadācāryaḥ sākṣātsadbhirdurākramām

देवों के भी देव, अविनाशी परम प्रभु का स्मरण करके आचार्य उस दिव्य लोक पर चढ़ गए, जहाँ सत्पुरुष भी साक्षात् सशरीर कठिनाई से पहुँच पाते हैं।

श्लोक 55 (7.193.55)

मूर्धानं तस्य निर्भिद्य ज्योती राजन्महात्मनः । जगाम परमं स्थानं देहं न्यस्य रथोत्तमे ॥

mūrdhānaṃ tasya nirbhidya jyotī rājanmahātmanaḥ | jagāma paramaṃ sthānaṃ dehaṃ nyasya rathottame

हे राजन्, उन महात्मा का तेज उनका मस्तक भेदकर, देह को उत्तम रथ पर छोड़ता हुआ परम स्थान को चला गया।

श्लोक 56 (7.193.56)

द्वौ सूर्याविति नो बुद्धिरासीत्तस्मिंस्तथागते । एकरूपमिवाभासीज्ज्योतिर्भिः पूरितं नभः ॥

dvau sūryāviti no buddhirāsīttasmiṃstathāgate | ekarūpamivābhāsījjyotirbhiḥ pūritaṃ nabhaḥ

उनके इस प्रकार जाने पर हमें लगा कि "दो सूर्य हैं"; ज्योतियों से भरा आकाश मानो एकरूप-सा दिखाई दिया।

श्लोक 57 (7.193.57)

समपद्यत चोल्काभं द्रोणस्य निधने तदा । निमेषमात्रेण च तज्ज्योतिरन्तरधीयत ॥

samapadyata colkābhaṃ droṇasya nidhane tadā | nimeṣamātreṇa ca tajjyotirantaradhīyata

द्रोण के निधन के समय उल्का के समान आभा प्रकट हुई, और पलक झपकते ही वह ज्योति अदृश्य हो गई।

श्लोक 58 (7.193.58)

आसीत्किलकिलाशब्दः प्रहृष्टानां दिवौकसाम् । ब्रह्मलोकगते द्रोणे धृष्टद्युम्ने च मोहिते ॥

āsītkilakilāśabdaḥ prahṛṣṭānāṃ divaukasām | brahmalokagate droṇe dhṛṣṭadyumne ca mohite

द्रोण के ब्रह्मलोक चले जाने और धृष्टद्युम्न के मोहग्रस्त हो जाने पर हर्षित देवताओं का किलकिला-शब्द (हर्षनाद) होने लगा।

श्लोक 59 (7.193.59)

वयमेव तदाऽद्राक्ष्म पञ्च मानुषयोनयः । योगयुक्तं महात्मानं गच्छन्तं परमां गतिम् ॥

vayameva tadā'drākṣma pañca mānuṣayonayaḥ | yogayuktaṃ mahātmānaṃ gacchantaṃ paramāṃ gatim

मनुष्य-योनि में उत्पन्न केवल हम पाँच ही उस योगयुक्त महात्मा को परम गति की ओर जाते देख सके।

श्लोक 60 (7.193.60)

अहं धनञ्जयः पार्थः कृपः शारद्वतो द्विजः । वासुदेवश्च वार्ष्णेयो धर्मपुत्रश्च पाण्डवः ॥

ahaṃ dhanañjayaḥ pārthaḥ kṛpaḥ śāradvato dvijaḥ | vāsudevaśca vārṣṇeyo dharmaputraśca pāṇḍavaḥ

मैं, पृथापुत्र धनञ्जय, ब्राह्मण कृप शारद्वत, वृष्णिवंशी वासुदेव और धर्म के पुत्र पाण्डव युधिष्ठिर।

श्लोक 61 (7.193.61)

अन्ये तु सर्वे नापश्यन्भारद्वाजस्य धीमतः । महिमानं महाराज योगयुक्तस्य गच्छतः । ब्रह्मलोकं महद्दिव्यं देवगुह्यं हि तत्परम् ॥

anye tu sarve nāpaśyanbhāradvājasya dhīmataḥ | mahimānaṃ mahārāja yogayuktasya gacchataḥ | brahmalokaṃ mahaddivyaṃ devaguhyaṃ hi tatparam

हे महाराज, अन्य सब लोग योगयुक्त बुद्धिमान् भारद्वाज की महिमा को नहीं देख सके, जब वे उस महान् दिव्य ब्रह्मलोक को जा रहे थे, जो देवताओं का परम गुह्य है।

श्लोक 62 (7.193.62)

गतिं परमिकां प्राप्तमजानन्तो नृयोनयः । नापश्यन्गच्छमानं हि तं सार्धमृषिपुङ्गवैः । आचार्यं योगमास्थाय ब्रह्मलोकमरिन्दमम् ॥

gatiṃ paramikāṃ prāptamajānanto nṛyonayaḥ | nāpaśyangacchamānaṃ hi taṃ sārdhamṛṣipuṅgavaiḥ | ācāryaṃ yogamāsthāya brahmalokamarindamam

मनुष्य-योनि वाले लोग यह नहीं जान सके कि वे परम गति को पा गए हैं; उन्होंने शत्रुदमन आचार्य को योग का आश्रय लेकर श्रेष्ठ ऋषियों के साथ ब्रह्मलोक जाते नहीं देखा।

श्लोक 63 (7.193.63)

वितुन्नाङ्गं शरव्रातैर्न्यस्तायुधमसृक्क्षरम् । विकृष्य पार्षतः खड्गं क्रोधामर्षवशं गतः । दृश्यमानः सर्वभूतैः केशपक्षे परामृशत् ॥

vitunnāṅgaṃ śaravrātairnyastāyudhamasṛkkṣaram | vikṛṣya pārṣataḥ khaḍgaṃ krodhāmarṣavaśaṃ gataḥ | dṛśyamānaḥ sarvabhūtaiḥ keśapakṣe parāmṛśat

बाणों के समूहों से बिंधे अंगों वाले, शस्त्र रख चुके और रक्त बहाते हुए द्रोण को, क्रोध और असहनशीलता के वश में आकर पार्षत ने खड्ग खींचकर, सब प्राणियों के देखते-देखते, केश पकड़ लिया।

श्लोक 64 (7.193.64)

तस्य मूर्धानमालम्ब्य गतसत्वस्य देहिनः । किञ्चिदब्रुवतः कायाद्विचकर्तासिना शिरः ॥

tasya mūrdhānamālambya gatasatvasya dehinaḥ | kiñcidabruvataḥ kāyādvicakartāsinā śiraḥ

प्राण निकल चुके और कुछ भी न बोलते हुए उस देहधारी का सिर पकड़कर उसने तलवार से धड़ से अलग कर दिया।

श्लोक 65 (7.193.65)

हर्षेण महता युक्तो भारद्वाजे निपातिते । सिंहनादरवं चक्रे भ्रामयन्खड्गमाहवे ॥

harṣeṇa mahatā yukto bhāradvāje nipātite | siṃhanādaravaṃ cakre bhrāmayankhaḍgamāhave

भारद्वाज के गिरने पर बड़े हर्ष से भरकर वह रण में खड्ग घुमाता हुआ सिंहनाद करने लगा।

श्लोक 66 (7.193.66)

आकर्णपलितः श्यामो वयसाऽशीतिपञ्चकः । त्वत्कृते व्यचरत्सङ्ख्ये स तु षोडशवर्षवत् ॥

ākarṇapalitaḥ śyāmo vayasā'śītipañcakaḥ | tvatkṛte vyacaratsaṅkhye sa tu ṣoḍaśavarṣavat

कानों तक पके केशों वाले, श्याम वर्ण, पचासी वर्ष की आयु के द्रोण आपके लिए युद्ध में सोलह वर्ष के तरुण की तरह विचरते रहे थे।

श्लोक 67 (7.193.67)

उक्तवांश्च महाबाहुः कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः । जीवन्तमानयाचार्यं मा वधीर्द्रुपदात्मज ॥

uktavāṃśca mahābāhuḥ kuntīputro dhanañjayaḥ | jīvantamānayācāryaṃ mā vadhīrdrupadātmaja

और कुन्तीपुत्र महाबाहु धनञ्जय ने पुकारकर कहा था, "आचार्य को जीवित ले आओ! हे द्रुपदपुत्र, उन्हें मत मारो!"

श्लोक 68 (7.193.68)

न हन्तव्यो न हन्तव्य इति ते सैनिकाश्च ह । उत्क्रोशन्नर्जुनश्चैव सानुक्रोशस्तमाव्रजत् ॥

na hantavyo na hantavya iti te sainikāśca ha | utkrośannarjunaścaiva sānukrośastamāvrajat

"वध मत करो, वध मत करो!" — सैनिक भी यही चिल्ला रहे थे; और अर्जुन भी पुकारते हुए दया से भरे उनकी ओर दौड़े।

श्लोक 69 (7.193.69)

क्रोशमानेऽर्जुने चैव पार्थिवेषु च सर्वशः । धृष्टद्युम्नोऽवधीद्द्रोणं रथतल्पे नरर्षभम् ॥

krośamāne'rjune caiva pārthiveṣu ca sarvaśaḥ | dhṛṣṭadyumno'vadhīddroṇaṃ rathatalpe nararṣabham

अर्जुन और सब ओर के राजाओं के चिल्लाते रहने पर भी धृष्टद्युम्न ने रथ के तल पर नरश्रेष्ठ द्रोण को मार डाला।

श्लोक 70 (7.193.70)

शोणितेन परिक्लिन्नो रथाद्भूमिमथापतत् । लोहिताङ्ग इवादित्यो दुर्धर्षः समपद्यत ॥

śoṇitena pariklinno rathādbhūmimathāpatat | lohitāṅga ivādityo durdharṣaḥ samapadyata

रक्त से भीगे हुए वे रथ से भूमि पर गिर पड़े; उस समय वे लाल अंगों वाले सूर्य के समान दुर्धर्ष दिखाई दिए।

श्लोक 71 (7.193.71)

एवं तं निहतं सङ्ख्ये ददृशे सैनिको जनः । धृष्टद्युम्नस्तु तद्राजन्भारद्वाजशिरोऽहरत् ॥

evaṃ taṃ nihataṃ saṅkhye dadṛśe sainiko janaḥ | dhṛṣṭadyumnastu tadrājanbhāradvājaśiro'harat

इस प्रकार सैनिकों ने उन्हें युद्ध में मरा हुआ देखा; और हे राजन्, धृष्टद्युम्न ने भारद्वाज का सिर काट लिया।

श्लोक 72 (7.193.72)

तावकानां महेष्वासः प्रमुखे तत्समाक्षिपत् । ते तु दृष्ट्वा शिरो राजन्भारद्वाजस्य तावकाः ॥

tāvakānāṃ maheṣvāsaḥ pramukhe tatsamākṣipat | te tu dṛṣṭvā śiro rājanbhāradvājasya tāvakāḥ

उस महाधनुर्धर ने उसे आपकी सेना के आगे फेंक दिया; और हे राजन्, आपके योद्धा भारद्वाज का सिर देखकर

श्लोक 73 (7.193.73)

पलायनकृतोत्साहा दुद्रुवः सर्वतोदिशम् । द्रोणस्तु दिवमास्थाय नक्षत्रपथमाविशत् ॥

palāyanakṛtotsāhā dudruvaḥ sarvatodiśam | droṇastu divamāsthāya nakṣatrapathamāviśat

भागने को उत्सुक होकर सब दिशाओं में दौड़ पड़े। परन्तु द्रोण स्वर्ग में पहुँचकर नक्षत्रों के मार्ग में प्रविष्ट हो गए।

श्लोक 74 (7.193.74)

अहमेव तदाऽद्राक्षं द्रोणस्य निधनं नृप । ऋषेः प्रसादात्कृष्णस्य सत्यवत्याः सुतस्य च ॥

ahameva tadā'drākṣaṃ droṇasya nidhanaṃ nṛpa | ṛṣeḥ prasādātkṛṣṇasya satyavatyāḥ sutasya ca

हे राजन्, मैंने स्वयं उस समय द्रोण का निधन देखा, सत्यवती के पुत्र ऋषि कृष्ण (व्यास) की कृपा से।

श्लोक 75 (7.193.75)

विधूमामिह संयान्तीमुल्कां प्रज्वलितामिव । अपश्याम दिवं स्तब्ध्वा गच्छन्तं तं महाद्युतिम् ॥

vidhūmāmiha saṃyāntīmulkāṃ prajvalitāmiva | apaśyāma divaṃ stabdhvā gacchantaṃ taṃ mahādyutim

हमने उस महातेजस्वी को धुएँ से रहित जलती हुई उल्का के समान आकाश को व्याप्त करते हुए ऊपर जाते देखा।

श्लोक 76 (7.193.76)

हते द्रोणे निरुत्साहाः कुरुपाण्डवसृञ्जयाः । अभ्यद्रवन्महावेगास्ततः सैन्यं व्यदीर्यत ॥

hate droṇe nirutsāhāḥ kurupāṇḍavasṛñjayāḥ | abhyadravanmahāvegāstataḥ sainyaṃ vyadīryata

द्रोण के मारे जाने पर निरुत्साह हुए कौरव, पाण्डव और सृञ्जय अत्यन्त वेग से इधर-उधर दौड़ पड़े, और सेना बिखर गई।

श्लोक 77 (7.193.77)

निहता हतभूयिष्ठाः सङ्ग्रामे निशितैः शरैः । तावका निहते द्रोणे गतासव इवाभवन् ॥

nihatā hatabhūyiṣṭhāḥ saṅgrāme niśitaiḥ śaraiḥ | tāvakā nihate droṇe gatāsava ivābhavan

तीखे बाणों से रण में अधिकांश मारे गए आपके योद्धा द्रोण के मरने पर मानो निष्प्राण हो गए।

श्लोक 78 (7.193.78)

पराजयमथावाप्य परत्र च महद्भयम् । उभयेनैव ते हीना व्यनिन्दन्मतिमात्मनः ॥

parājayamathāvāpya paratra ca mahadbhayam | ubhayenaiva te hīnā vyanindanmatimātmanaḥ

पराजय पाकर और परलोक का भी महान् भय पाकर, दोनों लोकों से वंचित हुए वे अपनी ही बुद्धि को धिक्कारने लगे।

श्लोक 79 (7.193.79)

अन्विच्छन्तः शरीरं तु भारद्वाजस्य पार्थिवाः । नान्वगच्छन्महाराज कबन्धायुतसङ्कुले ॥

anvicchantaḥ śarīraṃ tu bhāradvājasya pārthivāḥ | nānvagacchanmahārāja kabandhāyutasaṅkule

हे महाराज, भारद्वाज का शरीर ढूँढ़ते हुए राजा दस हज़ार कबन्धों से भरे उस रणक्षेत्र में उसे न पा सके।

श्लोक 80 (7.193.80)

पतिते त्वथ संरब्धे सेनायां तत्र भारत । उदतिष्ठन्कबन्धानां सहस्राण्येकविंशतिः ॥

patite tvatha saṃrabdhe senāyāṃ tatra bhārata | udatiṣṭhankabandhānāṃ sahasrāṇyekaviṃśatiḥ

हे भारत, वहाँ क्रोध से भरी सेना के गिर जाने पर इक्कीस हज़ार कबन्ध उठ खड़े हुए।

श्लोक 81 (7.193.81)

शोणितेन परिक्लिन्ना रणभूमिश्च भारत । लोहितार्द्र इवादित्यो दुर्दर्शश्चाभवत्तदा ॥

śoṇitena pariklinnā raṇabhūmiśca bhārata | lohitārdra ivādityo durdarśaścābhavattadā

हे भारत, रणभूमि रक्त से भीग गई, और लाल रंग से आर्द्र-सा सूर्य उस समय देखने में कठिन हो गया।

श्लोक 82 (7.193.82)

पाण्डवास्तु जयं लब्ध्वा परत्र च महद्यशः । बाणशङ्खरवांश्चक्रुः सिंहनादांश्च पुष्कलान् ॥

pāṇḍavāstu jayaṃ labdhvā paratra ca mahadyaśaḥ | bāṇaśaṅkharavāṃścakruḥ siṃhanādāṃśca puṣkalān

पाण्डवों ने विजय और परलोक में भी महान् यश पाकर बाणों और शंखों की ध्वनि की तथा बहुत-से सिंहनाद किए।

श्लोक 83 (7.193.83)

भीमसेनस्ततो राजन्धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः । वरूथिन्यामनृत्येतां परिष्वज्य परस्परम् ॥

bhīmasenastato rājandhṛṣṭadyumnaśca pārṣataḥ | varūthinyāmanṛtyetāṃ pariṣvajya parasparam

हे राजन्, तब भीमसेन और पार्षत धृष्टद्युम्न एक-दूसरे को गले लगाकर सेना के बीच नाचने लगे।

श्लोक 84 (7.193.84)

अब्रवीच्च तदा भीमः पार्षतं शत्रुतापनम् । भूयोऽहं त्वां परिष्वज्य परिवक्ष्यामि पार्षत । सूतपुत्रे हते पापे धार्तराष्ट्रे च संयुगे ॥

abravīcca tadā bhīmaḥ pārṣataṃ śatrutāpanam | bhūyo'haṃ tvāṃ pariṣvajya parivakṣyāmi pārṣata | sūtaputre hate pāpe dhārtarāṣṭre ca saṃyuge

और तब भीम ने शत्रुतापन पार्षत से कहा, "हे पार्षत, जब पापी सूतपुत्र और धृतराष्ट्र-पुत्र युद्ध में मारे जाएँगे, तब मैं फिर तुम्हें गले लगाकर तुमसे बात करूँगा।"

श्लोक 85 (7.193.85)

एतावदुक्त्वा भीमस्तु हर्षेण महता युतः । बाहुशब्देन पृथिवीं कम्पयामास पाण्डवः ॥

etāvaduktvā bhīmastu harṣeṇa mahatā yutaḥ | bāhuśabdena pṛthivīṃ kampayāmāsa pāṇḍavaḥ

बस इतना कहकर महान् हर्ष से भरे पाण्डुपुत्र भीम ने अपनी भुजाओं की गर्जना से पृथ्वी को कँपा दिया।

श्लोक 86 (7.193.86)

तस्य शब्देन वित्रस्ताः प्राद्रवंस्तावका युधि । क्षत्रधर्मं समुत्सृज्य पलायनपरायणाः ॥

tasya śabdena vitrastāḥ prādravaṃstāvakā yudhi | kṣatradharmaṃ samutsṛjya palāyanaparāyaṇāḥ

उस ध्वनि से भयभीत होकर आपके योद्धा क्षत्रिय-धर्म छोड़कर केवल भागने में लगे हुए युद्ध से भाग चले।

श्लोक 87 (7.193.87)

पाण्डवास्तु जयं लब्ध्वा हृष्टा ह्यासन्विशाम्पते । अरिक्षयं च सङ्ग्रामे तेन ते सुखमाप्नुवन् ॥

pāṇḍavāstu jayaṃ labdhvā hṛṣṭā hyāsanviśāmpate | arikṣayaṃ ca saṅgrāme tena te sukhamāpnuvan

हे प्रजानाथ, पाण्डव विजय पाकर हर्षित हुए, और संग्राम में शत्रुओं के नाश से उन्हें सुख प्राप्त हुआ।

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