द्रोण पर्व · अध्याय 192
धृष्टद्युम्न का द्रोण पर आक्रमण; सात्यकि द्वारा रक्षा
द्रोण को शोक से टूटा देखकर धृष्टद्युम्न उन पर टूट पड़ता है। जिनके अस्त्र अब उनका साथ नहीं देते, उन द्रोण ने धृष्टद्युम्न का धनुष, घोड़े और गदा काट डाले; तब रथहीन धृष्टद्युम्न खड्ग और ढाल लेकर उन पर चढ़ता है और अपने इक्कीस खड्ग-मार्ग दिखाता है। द्रोण हज़ार बाणों से उसका खड्ग और ढाल गिरा देते हैं और उसे मारने के लिए एक और बाण चढ़ाते हैं, पर सात्यकि उसे काटकर धृष्टद्युम्न को छुड़ा लेता है। अर्जुन कृष्ण को सात्यकि का पराक्रम दिखाते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.192.1)
तं दृष्ट्वा परमोद्विग्नं शोकोपहतचेतसम् । पाञ्चालराजस्य सुतो धृष्टद्युम्नः समाद्रवत् ॥
taṃ dṛṣṭvā paramodvignaṃ śokopahatacetasam | pāñcālarājasya suto dhṛṣṭadyumnaḥ samādravat
उन्हें अत्यन्त उद्विग्न और शोक से व्याकुल चित्तवाला देखकर पाञ्चालराज का पुत्र धृष्टद्युम्न उन पर झपटा।
श्लोक 2 (7.192.2)
य इष्ट्वा मनुजेन्द्रेण द्रुपदेन महामखे । लब्धो द्रोणविनाशाय समिद्धाद्धव्यवाहनात् ॥
ya iṣṭvā manujendreṇa drupadena mahāmakhe | labdho droṇavināśāya samiddhāddhavyavāhanāt
जिसे राजा द्रुपद ने महायज्ञ करके द्रोण के विनाश के लिए प्रज्वलित हव्यवाहन अग्नि से प्राप्त किया था।
श्लोक 3 (7.192.3)
स धनुर्जैत्रमादाय घोरं जलदनिःस्वनम् । दृढज्यमजरं दिव्यं शरं चाशीविषोपमम् ॥
sa dhanurjaitramādāya ghoraṃ jaladaniḥsvanam | dṛḍhajyamajaraṃ divyaṃ śaraṃ cāśīviṣopamam
जयशील, भयंकर, मेघ-गर्जन के समान ध्वनिवाला धनुष और दृढ़ डोरी तथा सर्प जैसा विषैला, अजर, दिव्य बाण लेकर,
श्लोक 4 (7.192.4)
सन्दधे कार्मुके तस्मिंस्ततस्तमनलोपमम् । द्रोणं जिघांसुः पाञ्चाल्यो महाज्वालमिवानलम् ॥
sandadhe kārmuke tasmiṃstatastamanalopamam | droṇaṃ jighāṃsuḥ pāñcālyo mahājvālamivānalam
द्रोण को मारने की इच्छा से पाञ्चाल्य ने उस धनुष पर अग्नि के समान उस बाण को चढ़ाया; उस समय द्रोण महान ज्वालाओं वाली अग्नि के समान थे।
श्लोक 5 (7.192.5)
तस्य रूपं शरस्यासीद्धनुर्ज्यामण्डलान्तरे । द्योततो भास्करस्येव घनान्ते परिवेषिणः ॥
tasya rūpaṃ śarasyāsīddhanurjyāmaṇḍalāntare | dyotato bhāskarasyeva ghanānte pariveṣiṇaḥ
धनुष और डोरी के घेरे के भीतर उस बाण का रूप ऐसा था जैसे वर्षा के अन्त में घेरे से घिरा हुआ चमकता सूर्य।
श्लोक 6 (7.192.6)
पार्षतेन परामृष्टं ज्वलन्तमिव तद्धनुः । अन्तकालमनुप्राप्तं मेनिरे वीक्ष्य सैनिकाः ॥
pārṣatena parāmṛṣṭaṃ jvalantamiva taddhanuḥ | antakālamanuprāptaṃ menire vīkṣya sainikāḥ
पार्षत के छूते ही वह धनुष जलता-सा प्रतीत हुआ; उसे देखकर सैनिकों ने समझा कि मृत्यु का समय आ पहुँचा।
श्लोक 7 (7.192.7)
तमिषुं संहतं तेन भारद्वाजः प्रतापवान् । दृष्ट्वाऽमन्यत देहस्य कालपर्यायमागतम् ॥
tamiṣuṃ saṃhataṃ tena bhāradvājaḥ pratāpavān | dṛṣṭvā'manyata dehasya kālaparyāyamāgatam
उसके द्वारा चढ़ाए हुए उस बाण को देखकर प्रतापी भारद्वाज ने माना कि उनके शरीर के काल का परिवर्तन आ पहुँचा है।
श्लोक 8 (7.192.8)
ततः प्रयत्नमातिष्ठदाचार्यस्तस्य वारणे । न चास्यास्त्राणि राजेन्द्र प्रादुरासन्महात्मनः ॥
tataḥ prayatnamātiṣṭhadācāryastasya vāraṇe | na cāsyāstrāṇi rājendra prādurāsanmahātmanaḥ
तब आचार्य ने उसे रोकने का यत्न किया, पर हे राजेन्द्र, उन महात्मा के अस्त्र प्रकट नहीं हुए।
श्लोक 9 (7.192.9)
तस्य त्वहानि चत्वारि क्षपा चैकाऽस्यतो गता । तस्य चाह्नस्त्रिभागेन क्षयं जग्मुः पतत्रिणः ॥
tasya tvahāni catvāri kṣapā caikā'syato gatā | tasya cāhnastribhāgena kṣayaṃ jagmuḥ patatriṇaḥ
बाण चलाते हुए उन्हें चार दिन और एक रात बीत चुकी थी, और दिन के तीसरे भाग में उनके बाण समाप्त हो गए।
श्लोक 10 (7.192.10)
स शरक्षयमासाद्य पुत्रशोकेन चार्दितः । विविधानां च दिव्यानामस्त्राणामप्रसादतः ॥
sa śarakṣayamāsādya putraśokena cārditaḥ | vividhānāṃ ca divyānāmastrāṇāmaprasādataḥ
बाण समाप्त हो जाने पर, पुत्र के शोक से पीड़ित होकर और नाना दिव्य अस्त्रों के प्रसन्न न रहने के कारण,
श्लोक 11 (7.192.11)
उत्स्रष्टुकामः शस्त्राणि ऋषिवाक्यप्रचोदितः । तेजसा पूर्यमाणश्च युयुधे न यथा पुरा ॥
utsraṣṭukāmaḥ śastrāṇi ṛṣivākyapracoditaḥ | tejasā pūryamāṇaśca yuyudhe na yathā purā
शस्त्र छोड़ देने की इच्छा करते हुए, ऋषियों के वचन से प्रेरित होकर, और तेज से भरे होने पर भी वे पहले की तरह नहीं लड़े।
श्लोक 12 (7.192.12)
भूयश्चान्यत्समादाय दिव्यमाङ्गिरसं धनुः । शरांश्च ब्रह्मदण्डाभान्धृष्टद्युम्नमयोधयत् ॥
bhūyaścānyatsamādāya divyamāṅgirasaṃ dhanuḥ | śarāṃśca brahmadaṇḍābhāndhṛṣṭadyumnamayodhayat
फिर एक और दिव्य आङ्गिरस धनुष और ब्रह्मदण्ड जैसे बाण लेकर उन्होंने फिर धृष्टद्युम्न से युद्ध किया।
श्लोक 13 (7.192.13)
ततस्तं शरवर्षेण महता समवाकिरत् । व्यशातयच्च सङ्क्रुद्धो धृष्टद्युम्नममर्षणम् ॥
tatastaṃ śaravarṣeṇa mahatā samavākirat | vyaśātayacca saṅkruddho dhṛṣṭadyumnamamarṣaṇam
उन्होंने उसे बाणों की बड़ी वर्षा से ढक दिया और क्रोध में भरकर अमर्षी धृष्टद्युम्न को घायल कर दिया।
श्लोक 14 (7.192.14)
शरांश्च शतधा तस्य द्रोणश्चिच्छेद सायकैः । ध्वजं धनुश्च निशितैः सारथिं चाप्यपातयत् ॥
śarāṃśca śatadhā tasya droṇaściccheda sāyakaiḥ | dhvajaṃ dhanuśca niśitaiḥ sārathiṃ cāpyapātayat
द्रोण ने अपने बाणों से उसके बाणों को सौ टुकड़े कर दिया, और तीखे बाणों से ध्वज, धनुष और सारथि को गिरा दिया।
श्लोक 15 (7.192.15)
धृष्टद्युम्नः प्रहस्यान्यत्पुनरादाय कार्मुकम् । शितेन चैनं बाणेन प्रत्यविध्यत्स्तनान्तरे ॥
dhṛṣṭadyumnaḥ prahasyānyatpunarādāya kārmukam | śitena cainaṃ bāṇena pratyavidhyatstanāntare
धृष्टद्युम्न ने हँसकर दूसरा धनुष लिया और एक तीखे बाण से उनकी छाती के बीच बेध दिया।
श्लोक 16 (7.192.16)
सोऽतिविद्धो महेष्वासोऽसम्भ्रान्त इव संयुगे । भल्लेन शितधारेण चिच्छेदास्य पुनर्धनुः ॥
so'tividdho maheṣvāso'sambhrānta iva saṃyuge | bhallena śitadhāreṇa cicchedāsya punardhanuḥ
गहरी चोट खाकर भी वह महान धनुर्धर युद्ध में अविचलित-सा रहा, और तीखी धारवाले भल्ल से उसने फिर उसका धनुष काट दिया।
श्लोक 17 (7.192.17)
यच्चास्य बाणविकृतं धनूंषि च विशाम्पते । सर्वं चिच्छेद दुर्धर्षो गदां खड्गं च वर्जयन् ॥
yaccāsya bāṇavikṛtaṃ dhanūṃṣi ca viśāmpate | sarvaṃ ciccheda durdharṣo gadāṃ khaḍgaṃ ca varjayan
हे प्रजापालक, उसके पास जो भी धनुष और बाण थे, उन सबको उस अजेय ने काट डाला; केवल गदा और खड्ग को छोड़ दिया।
श्लोक 18 (7.192.18)
धृष्टद्युम्नं च विव्याध नवभिर्निशितैः शरैः । जीवितान्तकरैः क्रुद्धः शिलाधौतैः परन्तपः ॥
dhṛṣṭadyumnaṃ ca vivyādha navabhirniśitaiḥ śaraiḥ | jīvitāntakaraiḥ kruddhaḥ śilādhautaiḥ parantapaḥ
फिर शत्रुओं को तपानेवाले उन्होंने क्रोध में भरकर शिला पर तेज किए हुए, प्राण हर लेनेवाले नौ तीखे बाणों से धृष्टद्युम्न को बेध दिया।
श्लोक 19 (7.192.19)
धृष्टद्युम्नोऽथ तस्याश्वान्स्वरथाश्वैर्महारथः । व्यामिश्रयदमेयात्मा ब्राह्ममस्त्रमुदीरयन् ॥
dhṛṣṭadyumno'tha tasyāśvānsvarathāśvairmahārathaḥ | vyāmiśrayadameyātmā brāhmamastramudīrayan
तब अपरिमित आत्मबलवाले महारथी धृष्टद्युम्न ने ब्रह्मास्त्र चलाते हुए द्रोण के घोड़ों को अपने रथ के घोड़ों से मिला दिया।
श्लोक 20 (7.192.20)
ते मिश्रा बह्वशोभन्त जवना वातरंहसः । पारावतसवर्णाश्च शोणाश्च भरतर्षभ ॥
te miśrā bahvaśobhanta javanā vātaraṃhasaḥ | pārāvatasavarṇāśca śoṇāśca bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, वायु के समान वेगवान वे घोड़े, कबूतर के रंग के और लाल, आपस में मिलकर बहुत शोभित हुए,
श्लोक 21 (7.192.21)
यथा सविद्युतो मेघा नदन्तो जलदागमे । तथा रेजुर्महाराज मिश्रिता रणमूर्धनि ॥
yathā savidyuto meghā nadanto jaladāgame | tathā rejurmahārāja miśritā raṇamūrdhani
जैसे वर्षा के आने पर बिजली सहित गरजते बादल, वैसे ही हे महाराज, वे युद्ध के अग्रभाग में मिले हुए शोभित हुए।
श्लोक 22 (7.192.22)
ईषाबन्धं चक्रबन्धं रथबन्धं तथैव च । प्रणाशयदमेयात्मा धृष्टद्युम्नस्य स द्विजः ॥
īṣābandhaṃ cakrabandhaṃ rathabandhaṃ tathaiva ca | praṇāśayadameyātmā dhṛṣṭadyumnasya sa dvijaḥ
उन अपरिमित आत्मबलवाले द्विज ने धृष्टद्युम्न के ईषा-बन्धन, चक्र-बन्धन और रथ-बन्धन को नष्ट कर दिया।
श्लोक 23 (7.192.23)
स च्छिन्नधन्वा पाञ्चाल्यो निकृत्तध्वजसारथिः । उत्तमामापदं प्राप्य गदां वीरः परामृशत् ॥
sa cchinnadhanvā pāñcālyo nikṛttadhvajasārathiḥ | uttamāmāpadaṃ prāpya gadāṃ vīraḥ parāmṛśat
धनुष कट जाने, ध्वज और सारथि के कट जाने पर, परम विपत्ति में पड़कर उस पाञ्चाल वीर ने गदा उठाई।
श्लोक 24 (7.192.24)
तामस्य विशिखैस्तीक्ष्णैः क्षिप्यमाणां महारथः । निजघान शरैर्द्रोणः क्रुद्धः सत्यपराक्रमः ॥
tāmasya viśikhaistīkṣṇaiḥ kṣipyamāṇāṃ mahārathaḥ | nijaghāna śarairdroṇaḥ kruddhaḥ satyaparākramaḥ
फेंकी जाती हुई उस गदा को क्रोध में भरे, सत्य पराक्रमी महारथी द्रोण ने अपने तीखे बाणों से गिरा दिया।
श्लोक 25 (7.192.25)
तां तु दृष्ट्वा नरव्याघ्रो द्रोणेन निहतां शरैः । विमलं खड्गमादत्त शतचन्द्रं च भानुमत् ॥
tāṃ tu dṛṣṭvā naravyāghro droṇena nihatāṃ śaraiḥ | vimalaṃ khaḍgamādatta śatacandraṃ ca bhānumat
बाणों से गिराई हुई उसे देखकर पुरुषव्याघ्र ने निर्मल खड्ग और सौ चन्द्रों वाली चमकती ढाल उठा ली।
श्लोक 26 (7.192.26)
असंशयं तथाभूतः पाञ्चाल्यः साध्वमन्यत । वधमाचार्यमुख्यस्य प्राप्तकालं महात्मनः ॥
asaṃśayaṃ tathābhūtaḥ pāñcālyaḥ sādhvamanyata | vadhamācāryamukhyasya prāptakālaṃ mahātmanaḥ
निःसन्देह उस अवस्था में पाञ्चाल्य ने उचित माना कि आचार्यों में प्रमुख उन महात्मा के वध का समय आ गया है।
श्लोक 27 (7.192.27)
ततः स रथनीडस्थं स्वरथस्य रथेषया । अगच्छदसिमुद्यम्य शतचन्द्रं च भानुमत् ॥
tataḥ sa rathanīḍasthaṃ svarathasya ratheṣayā | agacchadasimudyamya śatacandraṃ ca bhānumat
फिर वह अपने रथ के ईषा-दण्ड के सहारे रथ के बीच खड़े द्रोण की ओर खड्ग और सौ चन्द्रों वाली चमकती ढाल उठाए हुए बढ़ा।
श्लोक 28 (7.192.28)
चिकीर्षुर्दुष्करं कर्म धृष्टद्युम्नो महारथः । इयेष वक्षो भेत्तुं स भारद्वाजस्य संयुगे ॥
cikīrṣurduṣkaraṃ karma dhṛṣṭadyumno mahārathaḥ | iyeṣa vakṣo bhettuṃ sa bhāradvājasya saṃyuge
कठिन कर्म करने की इच्छा से महारथी धृष्टद्युम्न युद्ध में भारद्वाज की छाती भेदना चाहता था।
श्लोक 29 (7.192.29)
सोऽतिष्ठद्युगमध्ये वै युगसन्नहनेषु च । जघनार्धेषु चाश्वानां तत्सैन्याः समपूजयन् ॥
so'tiṣṭhadyugamadhye vai yugasannahaneṣu ca | jaghanārdheṣu cāśvānāṃ tatsainyāḥ samapūjayan
वह जुए के बीच, जुए के बन्धनों पर और घोड़ों के पिछले भागों पर खड़ा रहा, और उसके सैनिकों ने उसकी प्रशंसा की।
श्लोक 30 (7.192.30)
तिष्ठतो युगपालीषु शोणानप्यधितिष्ठतः । नापश्यदन्तरं द्रोणस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥
tiṣṭhato yugapālīṣu śoṇānapyadhitiṣṭhataḥ | nāpaśyadantaraṃ droṇastadadbhutamivābhavat
जुए के किनारों पर और लाल घोड़ों पर भी खड़े हुए उसमें द्रोण को कोई छिद्र नहीं मिला; और यह बड़ी अद्भुत बात हुई।
श्लोक 31 (7.192.31)
क्षिप्रं श्येनस्य चरतो यथैवामिषगृद्धिनः । तद्वदासीदभीसारो द्रोणपार्षतयो रणे ॥
kṣipraṃ śyenasya carato yathaivāmiṣagṛddhinaḥ | tadvadāsīdabhīsāro droṇapārṣatayo raṇe
जैसे मांस के लोभी बाज का शीघ्र झपटना, वैसा ही युद्ध में द्रोण और पार्षत का एक-दूसरे पर आक्रमण हुआ।
श्लोक 32 (7.192.32)
तस्य पारावतानश्वान्रथशक्त्या पराभिनत् । सर्वानेकैकशो द्रोणो रक्तानश्वान्विवर्जयन् ॥
tasya pārāvatānaśvānrathaśaktyā parābhinat | sarvānekaikaśo droṇo raktānaśvānvivarjayan
द्रोण ने उसके कबूतरी रंग के घोड़ों को रथशक्ति से एक-एक करके मार डाला, केवल लाल घोड़ों को छोड़ दिया।
श्लोक 33 (7.192.33)
ते हता न्यपतन्भूमौ धृष्टद्युम्नस्य वाजिनः । शोणास्तु पर्यमुच्यन्त रथबन्धाद्विशाम्पते ॥
te hatā nyapatanbhūmau dhṛṣṭadyumnasya vājinaḥ | śoṇāstu paryamucyanta rathabandhādviśāmpate
मारे गए धृष्टद्युम्न के वे घोड़े भूमि पर गिर पड़े, और हे प्रजापालक, लाल घोड़े रथ के बन्धन से छूट गए।
श्लोक 34 (7.192.34)
तान्हयान्निहतान्दृष्ट्वा द्विजाग्र्येण स पार्षतः । नामृष्यत युधां श्रेष्ठो याज्ञसेनिर्महारथः ॥
tānhayānnihatāndṛṣṭvā dvijāgryeṇa sa pārṣataḥ | nāmṛṣyata yudhāṃ śreṣṭho yājñasenirmahārathaḥ
द्विजश्रेष्ठ द्वारा अपने घोड़ों को मारा गया देखकर योद्धाओं में श्रेष्ठ, महारथी पार्षत, यज्ञसेन का पुत्र, सह न सका।
श्लोक 35 (7.192.35)
विरथः स गृहीत्वा तु खड्गं खड्गभृतां वरः । द्रोणमभ्यपतद्राजन्वैनतेय इवोरगम् ॥
virathaḥ sa gṛhītvā tu khaḍgaṃ khaḍgabhṛtāṃ varaḥ | droṇamabhyapatadrājanvainateya ivoragam
रथहीन होकर खड्गधारियों में श्रेष्ठ उसने खड्ग लेकर, हे राजन्, द्रोण पर वैसे ही आक्रमण किया जैसे गरुड़ सर्प पर।
श्लोक 36 (7.192.36)
तस्य रूपं बभौ राजन्भारद्वाजं जिघांसतः । यथा रूपं पुरा विष्णोर्हिरण्यकशिपोर्वधे ॥
tasya rūpaṃ babhau rājanbhāradvājaṃ jighāṃsataḥ | yathā rūpaṃ purā viṣṇorhiraṇyakaśiporvadhe
भारद्वाज को मारने की इच्छा करते हुए उसका रूप, हे राजन्, वैसा शोभित हुआ जैसा हिरण्यकशिपु के वध के समय विष्णु का परम रूप था।
श्लोक 37 (7.192.37)
स तदा विविधान्मार्गान्प्रवरांश्चैकविंशतिम् । दर्शयामास कौरव्य पार्षतो विचरन्रणे ॥
sa tadā vividhānmārgānpravarāṃścaikaviṃśatim | darśayāmāsa kauravya pārṣato vicaranraṇe
तब, हे कौरव्य, रण में विचरते हुए पार्षत ने नाना प्रकार के इक्कीस श्रेष्ठ मार्ग दिखाए।
श्लोक 38 (7.192.38)
भ्रान्तमुद्भ्रान्तमाविद्धमाप्लुतं प्रसृतं सृतम् । परिवृत्तं निवृत्तं च खड्गं चर्म च धारयन् ॥
bhrāntamudbhrāntamāviddhamāplutaṃ prasṛtaṃ sṛtam | parivṛttaṃ nivṛttaṃ ca khaḍgaṃ carma ca dhārayan
भ्रान्त, उद्भ्रान्त, आविद्ध, आप्लुत, प्रसृत, सृत, परिवृत्त और निवृत्त गतियाँ, खड्ग और ढाल धारण किए हुए,
श्लोक 39 (7.192.39)
सम्पातं समुदीर्णं च दर्शयामास पार्षतः । भारतं कौशिकं चैव सात्वतं चैव शिक्षया ॥
sampātaṃ samudīrṇaṃ ca darśayāmāsa pārṣataḥ | bhārataṃ kauśikaṃ caiva sātvataṃ caiva śikṣayā
सम्पात और समुदीर्ण गतियाँ पार्षत ने दिखाईं, और अपनी शिक्षा से भारत, कौशिक तथा सात्वत शैलियाँ भी।
श्लोक 40 (7.192.40)
दर्शयन्व्यचरद्युद्धे द्रोणस्यान्तचिकीर्षया । चरतस्तस्य तान्मार्गान्विचित्रान्खड्गचर्मिणः । व्यस्मयन्त रणे योधा देवताश्च समागताः ॥
darśayanvyacaradyuddhe droṇasyāntacikīrṣayā | caratastasya tānmārgānvicitrānkhaḍgacarmiṇaḥ | vyasmayanta raṇe yodhā devatāśca samāgatāḥ
उन्हें दिखाते हुए वह द्रोण का अन्त करने की इच्छा से युद्ध में विचरता रहा; खड्ग-चर्मधारी उसके उन विचित्र मार्गों को देखकर रण में योद्धा और वहाँ आए हुए देवता भी विस्मित हो गए।
श्लोक 41 (7.192.41)
ततः शरसहस्रेण शतचन्द्रमपातयत् । चर्म खड्गं च सम्बाधे धृष्टद्युम्नस्य स द्विजः ॥
tataḥ śarasahasreṇa śatacandramapātayat | carma khaḍgaṃ ca sambādhe dhṛṣṭadyumnasya sa dvijaḥ
तब उन द्विज ने हज़ार बाणों से धृष्टद्युम्न की सौ चन्द्रों वाली ढाल को, और संकट में उसकी ढाल और खड्ग को भी गिरा दिया।
श्लोक 42 (7.192.42)
ये तु वैतस्तिका नाम शरा आसन्नयोधिनः । निकृष्टयुद्धे द्रोणस्य नान्येषां सन्ति ते शराः ॥
ye tu vaitastikā nāma śarā āsannayodhinaḥ | nikṛṣṭayuddhe droṇasya nānyeṣāṃ santi te śarāḥ
वैतस्तिक नाम के वे बाण, जो वितस्ति भर के हैं और पास से मारनेवाले हैं, पास की लड़ाई में द्रोण के पास हैं; दूसरों के पास वे बाण नहीं हैं।
श्लोक 43 (7.192.43)
ऋते शारद्वतात्पार्थाद्द्रौणेर्वैकर्तनात्तथा । प्रद्युम्नयुयुधानाभ्यामभिमन्योश्च भारत ॥
ṛte śāradvatātpārthāddrauṇervaikartanāttathā | pradyumnayuyudhānābhyāmabhimanyośca bhārata
हे भारत, शरद्वान् के पुत्र कृप, पार्थ, द्रोणपुत्र, कर्ण, प्रद्युम्न, युयुधान और अभिमन्यु को छोड़कर और किसी के पास वे नहीं हैं।
श्लोक 44 (7.192.44)
अथास्येषुं समाधत्त दृढं परमसम्मतम् । अन्तेवासिनमाचार्यो जिघांसुः पुत्रसम्मितम् ॥
athāsyeṣuṃ samādhatta dṛḍhaṃ paramasammatam | antevāsinamācāryo jighāṃsuḥ putrasammitam
फिर पुत्र के समान माने हुए अपने शिष्य को मारने की इच्छा से आचार्य ने अपने धनुष पर एक दृढ़, अत्यन्त मूल्यवान बाण चढ़ाया।
श्लोक 45 (7.192.45)
तं शरैर्दशभिस्तीक्ष्णैश्चिच्छेद शिनिपुङ्गवः । पश्यतस्तव पुत्रस्य कर्णस्य च महात्मनः । ग्रस्तमाचार्यमुख्येन धृष्टद्युम्नममोचयत् ॥
taṃ śarairdaśabhistīkṣṇaiściccheda śinipuṅgavaḥ | paśyatastava putrasya karṇasya ca mahātmanaḥ | grastamācāryamukhyena dhṛṣṭadyumnamamocayat
तुम्हारे पुत्र और महात्मा कर्ण के देखते-देखते शिनि-वंश के सिंह सात्यकि ने दस तीखे बाणों से उसे काट दिया और आचार्य के चंगुल में फँसे धृष्टद्युम्न को छुड़ा लिया।
श्लोक 46 (7.192.46)
चरन्तं रथमार्गेषु सात्यकिं सत्यविक्रमम् । द्रोणकर्णान्तरगतं कृपस्यापि च भारत । अपश्येतां महात्मानौ विष्वक्सेनधनञ्जयौ ॥
carantaṃ rathamārgeṣu sātyakiṃ satyavikramam | droṇakarṇāntaragataṃ kṛpasyāpi ca bhārata | apaśyetāṃ mahātmānau viṣvaksenadhanañjayau
हे भारत, रथ-मार्गों में विचरते हुए सत्य-पराक्रमी सात्यकि को, जो द्रोण, कर्ण और कृप के बीच पहुँच गए थे, महात्मा विष्वक्सेन और धनञ्जय ने देखा।
श्लोक 47 (7.192.47)
अपूजयेतां वार्ष्णेयं ब्रुवाणौ साधुसाध्विति । दिव्यान्यस्त्राणि सर्वेषां युधि निघ्नन्तमच्युतम् ॥
apūjayetāṃ vārṣṇeyaṃ bruvāṇau sādhusādhviti | divyānyastrāṇi sarveṣāṃ yudhi nighnantamacyutam
युद्ध में सबके दिव्य अस्त्रों को काटते हुए उन अडिग वृष्णिवीर की उन्होंने "साधु, साधु" कहकर प्रशंसा की।
श्लोक 48 (7.192.48)
धनञ्जयस्ततः कृष्णमब्रवीत्पश्य केशव । आचार्यरथमुख्यानां मध्ये क्रीडन्मधूद्वहः ॥
dhanañjayastataḥ kṛṣṇamabravītpaśya keśava | ācāryarathamukhyānāṃ madhye krīḍanmadhūdvahaḥ
तब धनञ्जय ने कृष्ण से कहा, "देखो केशव, आचार्यों और प्रमुख रथियों के बीच वह मधुवंश का वीर खेल रहा है।
अर्जुन उवाच
श्लोक 49 (7.192.49)
आनन्दयति मां भूयः सात्यकिः परवीरहा । माद्रीपुत्रौ च भीमं च राजानं च युधिष्ठिरम् ॥
ānandayati māṃ bhūyaḥ sātyakiḥ paravīrahā | mādrīputrau ca bhīmaṃ ca rājānaṃ ca yudhiṣṭhiram
"शत्रु-वीरों का संहारक सात्यकि मुझे, माद्री के पुत्रों को, भीम को और राजा युधिष्ठिर को बार-बार आनन्दित कर रहा है।
श्लोक 50 (7.192.50)
यच्छिक्षयाऽनुद्धतः सन्रणे चरति सात्यकिः । महारथानुपक्रीडन्वृष्णीनां कीर्तिवर्धनः ॥
yacchikṣayā'nuddhataḥ sanraṇe carati sātyakiḥ | mahārathānupakrīḍanvṛṣṇīnāṃ kīrtivardhanaḥ
"अपनी शिक्षा के बल पर, बिना अहंकार के, सात्यकि महारथियों के साथ खेलता हुआ युद्ध में विचर रहा है, वही जो वृष्णियों की कीर्ति बढ़ाता है।
श्लोक 51 (7.192.51)
तमेते प्रतिनन्दन्ति सिद्धाः सैन्याश्च विस्मिताः । अजय्यं समरे दृष्ट्वा साधुसाध्विति सात्यकिम् । योधाश्चोभयतः सर्वे कर्मभिः समपूजयन् ॥
tamete pratinandanti siddhāḥ sainyāśca vismitāḥ | ajayyaṃ samare dṛṣṭvā sādhusādhviti sātyakim | yodhāścobhayataḥ sarve karmabhiḥ samapūjayan
"सिद्ध और विस्मित सैनिक उस अजेय सात्वत को रण में देखकर 'साधु, साधु' कहकर उसका अभिनन्दन कर रहे हैं; और दोनों ओर के सब योद्धाओं ने भी उसके कर्मों से उसका सम्मान किया।"