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द्रोण पर्व · अध्याय 191

अश्वत्थामा की मृत्यु का झूठ

ब्रह्मास्त्र से द्रोण पाञ्चालों का संहार करते हैं और पाण्डव निराश हो जाते हैं। कृष्ण उन्हें धर्म छोड़कर द्रोण को अश्वत्थामा के मारे जाने की खबर देने को कहते हैं। भीम उसी नाम के एक हाथी को मारकर यह घोषणा करते हैं, और ऋषि द्रोण से शस्त्र रखने को कहने आते हैं। द्रोण उस एकमात्र पुरुष युधिष्ठिर से पूछते हैं जिस पर उन्हें विश्वास है; कृष्ण और भीम के आग्रह पर युधिष्ठिर कहते हैं कि अश्वत्थामा मारा गया, और अस्पष्ट स्वर में "हाथी" जोड़ देते हैं। द्रोण का साहस टूट जाता है।

अध्याय 190अध्याय-सूचीअध्याय 192

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.191.1)

पाञ्चालानां ततो द्रोणोऽप्यकरोत्कदनं महत् । यथा क्रुद्धो रणे शक्रो दानवानां क्षयं पुरा ॥

pāñcālānāṃ tato droṇo'pyakarotkadanaṃ mahat | yathā kruddho raṇe śakro dānavānāṃ kṣayaṃ purā

तब द्रोण ने भी पाञ्चालों का भारी संहार किया, जैसे पूर्वकाल में क्रुद्ध इन्द्र ने रण में दानवों का विनाश किया था।

श्लोक 2 (7.191.2)

द्रोणास्त्रेण महाराज वध्यमानाः परे युधि । नात्रसन्त रणे द्रोणात्सत्ववन्तो महारथाः ॥

droṇāstreṇa mahārāja vadhyamānāḥ pare yudhi | nātrasanta raṇe droṇātsatvavanto mahārathāḥ

हे महाराज, द्रोण के अस्त्र से युद्ध में मारे जाते हुए भी वे शत्रु-पक्ष के पराक्रमी महारथी द्रोण से भयभीत नहीं हुए।

श्लोक 3 (7.191.3)

युध्यमाना महाराज पाञ्चालाः सृञ्जयास्तथा । द्रोणमेवाभ्ययुर्युद्धे योधयन्तो महारथाः ॥

yudhyamānā mahārāja pāñcālāḥ sṛñjayāstathā | droṇamevābhyayuryuddhe yodhayanto mahārathāḥ

हे महाराज, पाञ्चाल और सृञ्जय लड़ते रहे; वे महारथी युद्ध में द्रोण को ही लक्ष्य बनाकर उन पर टूट पड़े और उनसे जूझते रहे।

श्लोक 4 (7.191.4)

तेषां तु च्छाद्यमानानां पाञ्चालानां समन्ततः । अभवद्भैरवो नादो वध्यतां शरवृष्टिभिः ॥

teṣāṃ tu cchādyamānānāṃ pāñcālānāṃ samantataḥ | abhavadbhairavo nādo vadhyatāṃ śaravṛṣṭibhiḥ

चारों ओर से बाणों की वर्षा में ढके हुए और मारे जाते हुए उन पाञ्चालों का भयंकर कोलाहल उठा।

श्लोक 5 (7.191.5)

वध्यमानेषु सङ्ग्रामे पाञ्चालेषु महात्मना । उदीर्यमाणे द्रोणास्त्रे पाण्डवान्भयमाविशत् ॥

vadhyamāneṣu saṅgrāme pāñcāleṣu mahātmanā | udīryamāṇe droṇāstre pāṇḍavānbhayamāviśat

उस महात्मा द्वारा युद्ध में पाञ्चालों के मारे जाने और द्रोणास्त्र के निरन्तर छूटते रहने पर पाण्डवों के मन में भय समा गया।

श्लोक 6 (7.191.6)

दृष्ट्वाऽश्वनरयोधानां विपुलं च क्षयं युधि । पाण्डवेया महाराज नाशशंसुर्जयं तदा ॥

dṛṣṭvā'śvanarayodhānāṃ vipulaṃ ca kṣayaṃ yudhi | pāṇḍaveyā mahārāja nāśaśaṃsurjayaṃ tadā

हे महाराज, युद्ध में हाथी-घोड़ों और पैदल-रथी योद्धाओं का भारी विनाश देखकर पाण्डवों को तब विजय की आशा नहीं रही।

श्लोक 7 (7.191.7)

कच्चिद्द्रोणो न नः सर्वान्क्षपयेत्परमास्त्रवित् । समिद्धः शिशिरापाये दहन्कक्षमिवानलः ॥

kacciddroṇo na naḥ sarvānkṣapayetparamāstravit | samiddhaḥ śiśirāpāye dahankakṣamivānalaḥ

"कहीं ऐसा न हो कि परम अस्त्रों के ज्ञाता द्रोण हम सबका संहार कर दें, जैसे शिशिर बीतने पर प्रज्वलित अग्नि सूखी घास के ढेर को जला डालती है!"

श्लोक 8 (7.191.8)

न चैनं संयुगे कश्चित्समर्थः प्रतिवीक्षितुम् । न चैनमर्जुनो जातु प्रतियुध्येत धर्मवित् ॥

na cainaṃ saṃyuge kaścitsamarthaḥ prativīkṣitum | na cainamarjuno jātu pratiyudhyeta dharmavit

"युद्ध में कोई उन्हें आँख उठाकर देख भी नहीं सकता; और धर्म को जाननेवाले अर्जुन तो उनसे कभी लड़ेंगे ही नहीं।"

श्लोक 9 (7.191.9)

त्रस्तान्कुन्तीसुतान्दृष्ट्वा द्रोणसायकपीडितान् । मतिमाञ्श्रेयसे युक्तः केशवोऽर्जुनमब्रवीत् ॥

trastānkuntīsutāndṛṣṭvā droṇasāyakapīḍitān | matimāñśreyase yuktaḥ keśavo'rjunamabravīt

कुन्ती के पुत्रों को द्रोण के बाणों से पीड़ित और भयभीत देखकर कल्याण में तत्पर बुद्धिमान केशव ने अर्जुन से कहा।

वासुदेव उवाच

श्लोक 10 (7.191.10)

नैष युद्धेन सङ्ग्रामे जेतुं शक्यः कथञ्चन । सधनुर्धन्विनां श्रेष्ठो देवैरपि सवासवैः ॥

naiṣa yuddhena saṅgrāme jetuṃ śakyaḥ kathañcana | sadhanurdhanvināṃ śreṣṭho devairapi savāsavaiḥ

"धनुर्धारियों में श्रेष्ठ यह द्रोण युद्ध में लड़कर किसी भी प्रकार नहीं जीते जा सकते, इन्द्र सहित देवता भी उन्हें नहीं जीत सकते।"

श्लोक 11 (7.191.11)

न्यस्तशस्त्रस्तु सङ्ग्रामे शक्यो हन्तुं भवेन्नृभिः । आस्थीयतां जये योगो धर्ममुत्सृज्य पाण्डवाः । यथा न संयुगे सर्वान्निहन्याद्रुक्मवाहनः ॥

nyastaśastrastu saṅgrāme śakyo hantuṃ bhavennṛbhiḥ | āsthīyatāṃ jaye yogo dharmamutsṛjya pāṇḍavāḥ | yathā na saṃyuge sarvānnihanyādrukmavāhanaḥ

"किन्तु यदि वे युद्ध में शस्त्र रख दें, तो मनुष्य उन्हें मार सकते हैं। हे पाण्डवो, धर्म को छोड़कर विजय का उपाय अपनाओ, जिससे स्वर्णरथ वाले द्रोण युद्ध में तुम सबको न मार डालें।"

श्लोक 12 (7.191.12)

अश्वत्थाम्नि हते नैष युध्येदिति मतिर्मम । तं हतं संयुगे कश्चिदस्मै शंसतु मानवः ॥

aśvatthāmni hate naiṣa yudhyediti matirmama | taṃ hataṃ saṃyuge kaścidasmai śaṃsatu mānavaḥ

"मेरा मत है कि अश्वत्थामा के मारे जाने पर ये युद्ध नहीं करेंगे। इसलिए कोई मनुष्य युद्ध में इन्हें जाकर कह दे कि अश्वत्थामा मारा गया।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 13 (7.191.13)

एतन्नारोचयद्राजन्कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः । अन्ये त्वरोचयन्सर्वे कृच्छ्रेण तु युधिष्ठिरः ॥

etannārocayadrājankuntīputro dhanañjayaḥ | anye tvarocayansarve kṛcchreṇa tu yudhiṣṭhiraḥ

हे राजन्, कुन्तीपुत्र धनञ्जय को यह बात नहीं रुची; और सबको रुची, युधिष्ठिर को भी बड़ी कठिनाई से।

श्लोक 14 (7.191.14)

ततो भीमो महाबाहुरनीकेषु महागजम् । जघान गदया राजन्नश्वत्थामानमित्युत । परप्रमथनं घोरं मालवस्येन्द्रवर्मणः ॥

tato bhīmo mahābāhuranīkeṣu mahāgajam | jaghāna gadayā rājannaśvatthāmānamityuta | parapramathanaṃ ghoraṃ mālavasyendravarmaṇaḥ

तब महाबाहु भीम ने, हे राजन्, सेना में "अश्वत्थामा" कहते हुए अपनी गदा से एक विशाल हाथी को मार डाला, जो मालव-नरेश इन्द्रवर्मा का था और शत्रुओं को कुचल डालनेवाला भयंकर था।

श्लोक 15 (7.191.15)

भीमसेनस्तु सव्रीडमुपेत्य द्रोणमाहवे । अश्वत्थामा हत इति शब्दमुच्चैश्चकार ह ॥

bhīmasenastu savrīḍamupetya droṇamāhave | aśvatthāmā hata iti śabdamuccaiścakāra ha

फिर भीमसेन लज्जित होकर युद्ध में द्रोण के पास पहुँचे और ऊँचे स्वर में बोले, "अश्वत्थामा मारा गया!"

श्लोक 16 (7.191.16)

अश्वत्थामेति हि गजः ख्यातो नाम्ना हतोऽभवत् । कृत्वा मनसि तं भीमो मिथ्या व्याहृतवांस्तदा ॥

aśvatthāmeti hi gajaḥ khyāto nāmnā hato'bhavat | kṛtvā manasi taṃ bhīmo mithyā vyāhṛtavāṃstadā

अश्वत्थामा नाम से प्रसिद्ध एक हाथी सचमुच मारा गया था; भीम ने उसी को मन में रखकर उस समय वह असत्य कहा।

श्लोक 17 (7.191.17)

भीमसेनवचः श्रुत्वा द्रोणस्तत्परमाप्रियम् । मनसा सन्नगात्रोऽभूद्यथा सैकतमम्भसि ॥

bhīmasenavacaḥ śrutvā droṇastatparamāpriyam | manasā sannagātro'bhūdyathā saikatamambhasi

भीमसेन के वे अत्यन्त अप्रिय वचन सुनकर द्रोण मन ही मन ऐसे शिथिल अंगोंवाले हो गए जैसे जल में बालू।

श्लोक 18 (7.191.18)

शङ्कमानः स तन्मिथ्या वीर्यज्ञः स्वसुतस्य वै । हतः स इति च श्रुत्वा नैव धैर्यादकम्पत ॥

śaṅkamānaḥ sa tanmithyā vīryajñaḥ svasutasya vai | hataḥ sa iti ca śrutvā naiva dhairyādakampata

परन्तु अपने पुत्र का पराक्रम जानने के कारण उन्हें उस बात के झूठ होने की शंका रही; और पुत्र के मारे जाने की बात सुनकर भी वे धैर्य के कारण बिलकुल नहीं काँपे।

श्लोक 19 (7.191.19)

स लब्ध्वा चेतनां द्रोणः क्षणेनैव समाश्वसत् । अनुचिन्त्यात्मनः पुत्रमविषह्यमरातिभिः ॥

sa labdhvā cetanāṃ droṇaḥ kṣaṇenaiva samāśvasat | anucintyātmanaḥ putramaviṣahyamarātibhiḥ

होश में आकर द्रोण क्षण भर में ही सँभल गए; उन्होंने सोचा कि उनका पुत्र शत्रुओं से परास्त नहीं हो सकता।

श्लोक 20 (7.191.20)

स पार्षतमभिद्रुत्य जिघांसुर्मृत्युमात्मनः । अवाकिरत्सहस्रेण तीक्ष्णानां कङ्कपत्रिणाम् ॥

sa pārṣatamabhidrutya jighāṃsurmṛtyumātmanaḥ | avākiratsahasreṇa tīkṣṇānāṃ kaṅkapatriṇām

फिर वे अपनी ही मृत्यु बने हुए धृष्टद्युम्न को मारने की इच्छा से उन पर झपटे और हज़ार तीखे कङ्कपत्र बाणों से उन्हें ढक दिया।

श्लोक 21 (7.191.21)

तं विंशतिसहस्राणि पाञ्चालानां नरर्षभाः । यथा चरन्तं सङ्ग्रामे सर्वतोऽवाकिरञ्छरैः ॥

taṃ viṃśatisahasrāṇi pāñcālānāṃ nararṣabhāḥ | yathā carantaṃ saṅgrāme sarvato'vākirañcharaiḥ

युद्ध में विचरते हुए उनको बीस हज़ार नरश्रेष्ठ पाञ्चालों ने चारों ओर से बाणों से ढक दिया।

श्लोक 22 (7.191.22)

शरैस्तैराचितं द्रोणं नापश्याम महारथम् । भास्करं जलदै रुद्धं वर्षास्विव विशाम्पते ॥

śaraistairācitaṃ droṇaṃ nāpaśyāma mahāratham | bhāskaraṃ jaladai ruddhaṃ varṣāsviva viśāmpate

हे राजन्, बाणों से ढके हुए महारथी द्रोण हमें वैसे ही नहीं दिखाई दे रहे थे जैसे वर्षा ऋतु में बादलों से ढका सूर्य।

श्लोक 23 (7.191.23)

विधूय तान्बाणगणान्पाञ्चालानां महारथः । प्रादुश्चक्रे ततो द्रोणो ब्राह्ममस्त्रं परन्तपः ॥

vidhūya tānbāṇagaṇānpāñcālānāṃ mahārathaḥ | prāduścakre tato droṇo brāhmamastraṃ parantapaḥ

तब शत्रुओं को तपानेवाले महारथी द्रोण ने पाञ्चालों की उस बाण-वर्षा को झाड़कर ब्रह्मास्त्र प्रकट किया।

श्लोक 24 (7.191.24)

वधाय तेषां शूराणां पाञ्चालानाममर्षितः । ततो व्यरोचत द्रोणो विनिघ्नन्सर्वसैनिकान् ॥

vadhāya teṣāṃ śūrāṇāṃ pāñcālānāmamarṣitaḥ | tato vyarocata droṇo vinighnansarvasainikān

उन शूर पाञ्चालों का वध करने के लिए क्रोध से भरे द्रोण सभी सैनिकों को मारते हुए तब अत्यन्त दीप्त दिखाई दिए।

श्लोक 25 (7.191.25)

शिरांस्यापातयच्चापि पाञ्चालानां महामृधे । तथैव परिघाकारान्बाहून्कनकभूषणान् ॥

śirāṃsyāpātayaccāpi pāñcālānāṃ mahāmṛdhe | tathaiva parighākārānbāhūnkanakabhūṣaṇān

उस महासंग्राम में उन्होंने पाञ्चालों के सिर भी काट गिराए, और परिघ के समान मोटी, सोने से सजी उनकी भुजाएँ भी।

श्लोक 26 (7.191.26)

ते वध्यमानाः समरे भारद्वाजेन पार्थिवाः । मेदिन्यामन्वकीर्यन्त वातनुन्ना इव द्रुमाः ॥

te vadhyamānāḥ samare bhāradvājena pārthivāḥ | medinyāmanvakīryanta vātanunnā iva drumāḥ

भारद्वाज द्रोण के हाथों युद्ध में मारे जाते हुए वे राजा आँधी से गिराए हुए वृक्षों की तरह पृथ्वी पर बिखर गए।

श्लोक 27 (7.191.27)

कुञ्जराणां च पततां हयौघानां च भारत । अगम्यरूपा पृथिवी मांसशोणितकर्दमा ॥

kuñjarāṇāṃ ca patatāṃ hayaughānāṃ ca bhārata | agamyarūpā pṛthivī māṃsaśoṇitakardamā

हे भारत, गिरते हाथियों और घोड़ों के झुंडों से पृथ्वी पर चलना असम्भव हो गया; वह मांस और रक्त के कीचड़ से भर गई।

श्लोक 28 (7.191.28)

हत्वा विंशतिसाहस्रान्पाञ्चालानां रथव्रजान् । अतिष्ठदाहवे द्रोणो विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ॥

hatvā viṃśatisāhasrānpāñcālānāṃ rathavrajān | atiṣṭhadāhave droṇo vidhūmo'gniriva jvalan

पाञ्चालों के बीस हज़ार रथ-समूहों को मारकर द्रोण युद्ध में धूम-रहित अग्नि की तरह जलते हुए खड़े रहे।

श्लोक 29 (7.191.29)

तथैव च पुनः क्रुद्धो भारद्वाजः प्रतापवान् । वसुदानस्य भल्लेन शिरः कायादपाहरत् ॥

tathaiva ca punaḥ kruddho bhāradvājaḥ pratāpavān | vasudānasya bhallena śiraḥ kāyādapāharat

फिर क्रुद्ध होकर तेजस्वी भारद्वाज ने एक भल्ल से वसुदान का सिर धड़ से काट डाला।

श्लोक 30 (7.191.30)

पुनः पञ्चशतान्मात्स्यान्षट्सहस्रांश्च सृञ्जयान् । हस्तिनामयुतं हत्वा जघानाश्वायुतं पुनः ॥

punaḥ pañcaśatānmātsyānṣaṭsahasrāṃśca sṛñjayān | hastināmayutaṃ hatvā jaghānāśvāyutaṃ punaḥ

फिर उन्होंने पाँच सौ मत्स्यों और छह हज़ार सृञ्जयों को मारा, और दस हज़ार हाथियों को मारकर फिर दस हज़ार घोड़ों को मार डाला।

श्लोक 31 (7.191.31)

क्षत्रियाणामभावाय दृष्ट्वा द्रोणमवस्थितम् । ऋषयोऽभ्यागतास्तूर्णं हव्यवाहपुरोगमाः ॥

kṣatriyāṇāmabhāvāya dṛṣṭvā droṇamavasthitam | ṛṣayo'bhyāgatāstūrṇaṃ havyavāhapurogamāḥ

क्षत्रियों के विनाश के लिए द्रोण को डटे हुए देखकर अग्नि को आगे करके ऋषि शीघ्र ही वहाँ आ पहुँचे,

श्लोक 32 (7.191.32)

विश्वामित्रो जमदग्निर्भरद्वाजोऽथ गौतमः । वसिष्ठः कश्यपोऽत्रिश्च ब्रह्मलोकं निनीषवः ॥

viśvāmitro jamadagnirbharadvājo'tha gautamaḥ | vasiṣṭhaḥ kaśyapo'triśca brahmalokaṃ ninīṣavaḥ

विश्वामित्र, जमदग्नि, भरद्वाज, गौतम, वसिष्ठ, कश्यप और अत्रि, जो उन्हें ब्रह्मलोक ले जाना चाहते थे;

श्लोक 33 (7.191.33)

सिकताः पृश्नयो गर्गा वालखिल्या मरीचिपाः । भृगवोऽङ्गिरसश्चैव सूक्ष्माश्चान्ये महर्षयः ॥

sikatāḥ pṛśnayo gargā vālakhilyā marīcipāḥ | bhṛgavo'ṅgirasaścaiva sūkṣmāścānye maharṣayaḥ

सिकत, पृश्नि, गर्ग, वालखिल्य और मरीचिप, भृगु और अङ्गिरा, सूक्ष्म नामक ऋषि तथा और भी महर्षि।

श्लोक 34 (7.191.34)

त एनमब्रुवन्सर्वे द्रोणमाहवशोभिनम् । अधर्मतः कृतं युद्धं समयो निधनस्य ते ॥

ta enamabruvansarve droṇamāhavaśobhinam | adharmataḥ kṛtaṃ yuddhaṃ samayo nidhanasya te

उन सबने रण में शोभित द्रोण से कहा, "तुमने अधर्म से युद्ध किया है; अब तुम्हारी मृत्यु का समय आ गया है।

ऋषय ऊचुः

श्लोक 35 (7.191.35)

न्यस्यायुधं रणे द्रोण समीक्षास्मानवस्थितान् । नातः क्रूरतरं कर्म पुनः कर्तुमिहार्हसि ॥

nyasyāyudhaṃ raṇe droṇa samīkṣāsmānavasthitān | nātaḥ krūrataraṃ karma punaḥ kartumihārhasi

हे द्रोण, रण में शस्त्र रख दो और हम खड़े हुओं को देखो। इससे बढ़कर क्रूर कर्म तुम्हें फिर नहीं करना चाहिए।

श्लोक 36 (7.191.36)

वेदवेदाङ्गविदुषः सत्यधर्मरतस्य ते । ब्राह्मणस्य विशेषेण तवैतन्नोपपद्यते ॥

vedavedāṅgaviduṣaḥ satyadharmaratasya te | brāhmaṇasya viśeṣeṇa tavaitannopapadyate

वेद-वेदाङ्ग के ज्ञाता, सत्य और धर्म में लगे हुए और विशेषकर ब्राह्मण होकर तुम्हारे लिए यह शोभा नहीं देता।

श्लोक 37 (7.191.37)

त्यजायुधममोधेषो तिष्ठ वर्त्मनि शाश्वते । परिपूर्णश्च कालस्ते वस्तुं लोकेऽद्य मानुषे ॥

tyajāyudhamamodheṣo tiṣṭha vartmani śāśvate | paripūrṇaśca kālaste vastuṃ loke'dya mānuṣe

हे अमोघ बाणोंवाले, शस्त्र त्याग दो और सनातन मार्ग पर स्थित हो जाओ; इस मनुष्यलोक में रहने का तुम्हारा समय अब पूरा हो चुका है।

श्लोक 38 (7.191.38)

ब्रह्मास्त्रेण त्वया दग्धा अनस्त्रज्ञा नरा भुवि । यदेतदीदृशं विप्र कृतं कर्म न साधु तत् ॥

brahmāstreṇa tvayā dagdhā anastrajñā narā bhuvi | yadetadīdṛśaṃ vipra kṛtaṃ karma na sādhu tat

तुमने ब्रह्मास्त्र से पृथ्वी पर उन मनुष्यों को जला दिया जो अस्त्र जानते ही नहीं थे। हे ब्राह्मण, तुमने जो यह कर्म किया है, वह अच्छा नहीं है।

श्लोक 39 (7.191.39)

न्यस्यायुधं रणे विप्र द्रोण मा त्वं चिरं कृथाः । मा पापिष्ठतरं कर्म करिष्यसि पुनर्द्विज ॥

nyasyāyudhaṃ raṇe vipra droṇa mā tvaṃ ciraṃ kṛthāḥ | mā pāpiṣṭhataraṃ karma kariṣyasi punardvija

हे ब्राह्मण द्रोण, रण में शस्त्र रख दो, देर मत करो। हे द्विज, इससे भी अधिक पापपूर्ण कर्म फिर मत करना।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 40 (7.191.40)

इति तेषां वचः श्रुत्वा भीमसेनवचः स्मरन् । धृष्टद्युम्नं च सम्प्रेक्ष्य रणे स विमनाऽभवत् ॥

iti teṣāṃ vacaḥ śrutvā bhīmasenavacaḥ smaran | dhṛṣṭadyumnaṃ ca samprekṣya raṇe sa vimanā'bhavat

उनकी यह बात सुनकर, भीमसेन के वचन का स्मरण करके और रण में धृष्टद्युम्न को देखकर द्रोण उदास हो गए।

श्लोक 41 (7.191.41)

सन्दिह्यमानो व्यथितः कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् । अहतं वा हतं वेति पप्रच्छ सुतमात्मनः ॥

sandihyamāno vyathitaḥ kuntīputraṃ yudhiṣṭhiram | ahataṃ vā hataṃ veti papraccha sutamātmanaḥ

सन्देह और पीड़ा से व्याकुल होकर उन्होंने कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर से अपने पुत्र के विषय में पूछा कि वह जीवित है या मारा गया।

श्लोक 42 (7.191.42)

स्थिरा बुद्धिर्हि द्रोणस्य न पार्थो वक्ष्यतेऽनृतम् । त्रयाणामपि लोकानामैश्वर्यार्थे कथञ्चन ॥

sthirā buddhirhi droṇasya na pārtho vakṣyate'nṛtam | trayāṇāmapi lokānāmaiśvaryārthe kathañcana

द्रोण का विश्वास पक्का था कि तीनों लोकों के ऐश्वर्य के लिए भी कुन्तीपुत्र किसी प्रकार असत्य नहीं बोलेंगे।

श्लोक 43 (7.191.43)

तस्मात्तं परिपप्रच्छ नान्यं कञ्चिद्द्विजर्षभः । तस्मिंस्तस्य हि सत्याशा बाल्यात्प्रभृति पाण्डवे ॥

tasmāttaṃ paripapraccha nānyaṃ kañciddvijarṣabhaḥ | tasmiṃstasya hi satyāśā bālyātprabhṛti pāṇḍave

इसीलिए उन द्विजश्रेष्ठ ने उन्हीं से पूछा, और किसी से नहीं; क्योंकि बचपन से ही उन्हें उस पाण्डव में सत्य की आशा थी।

श्लोक 44 (7.191.44)

ततो निष्पाण्डवामुर्वीं करिष्यन्तं युधाम्पतिम् । द्रोणं ज्ञात्वा धर्मराजं गोविन्दो व्यथितोऽब्रवीत् ॥

tato niṣpāṇḍavāmurvīṃ kariṣyantaṃ yudhāmpatim | droṇaṃ jñātvā dharmarājaṃ govindo vyathito'bravīt

तब गोविन्द ने जान लिया कि योद्धाओं के स्वामी द्रोण पृथ्वी को पाण्डवों से रहित कर देना चाहते हैं, और व्यथित होकर उन्होंने धर्मराज से कहा।

वासुदेव उवाच

श्लोक 45 (7.191.45)

यद्यर्धदिवसं द्रोणो युध्यते मन्युमास्थितः । सत्यं ब्रवीमि ते सेना विनाशं समुपैष्यति ॥

yadyardhadivasaṃ droṇo yudhyate manyumāsthitaḥ | satyaṃ bravīmi te senā vināśaṃ samupaiṣyati

"यदि क्रोध में भरे द्रोण आधे दिन भी लड़ते रहे, तो मैं सच कहता हूँ, तुम्हारी सेना का विनाश हो जाएगा।"

श्लोक 46 (7.191.46)

स भवांस्त्रातु नो द्रोणात्सत्याज्ज्यायोऽनृतं वचः । अनृतं जीवितस्यार्थे वदन्न स्पृश्यतेऽनृतैः ॥

sa bhavāṃstrātu no droṇātsatyājjyāyo'nṛtaṃ vacaḥ | anṛtaṃ jīvitasyārthe vadanna spṛśyate'nṛtaiḥ

"इसलिए आप हमें द्रोण से बचाइए; सत्य से असत्य वचन श्रेष्ठ है। प्राण बचाने के लिए असत्य बोलनेवाला असत्य के दोष से लिप्त नहीं होता।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 47 (7.191.47)

तयोः संवदतोरेवं भीमसेनोऽब्रवीदिदम् ॥

tayoḥ saṃvadatorevaṃ bhīmaseno'bravīdidam

उन दोनों के इस प्रकार बात करते समय भीमसेन ने यह कहा।

भीमसेन उवाच

श्लोक 48 (7.191.48)

श्रुत्वैवं तु महाराज वधोपायं महात्मनः । गाहमानस्य ते सेनां मालवस्येन्द्रवर्मणः ॥

śrutvaivaṃ tu mahārāja vadhopāyaṃ mahātmanaḥ | gāhamānasya te senāṃ mālavasyendravarmaṇaḥ

"हे महाराज, उन महात्मा के वध का यह उपाय सुनकर - मालव-नरेश इन्द्रवर्मा का एक हाथी आपकी सेना में घुस रहा था;

श्लोक 49 (7.191.49)

अश्वत्थामेति विख्यातो गजः शक्रगजोपमः । निहतो युधि विक्रम्य ततोऽहं द्रोणमब्रुवम् ॥

aśvatthāmeti vikhyāto gajaḥ śakragajopamaḥ | nihato yudhi vikramya tato'haṃ droṇamabruvam

इन्द्र के हाथी के समान, अश्वत्थामा नाम से प्रसिद्ध उस हाथी को मैंने युद्ध में पराक्रम करके मार डाला, और तब द्रोण से कहा,

श्लोक 50 (7.191.50)

अश्वत्थामा हतो ब्रह्मन्निवर्तस्वाहवादिति । नूनं नाश्रद्दधद्वाक्यमेष मे पुरुषर्षभः ॥

aśvatthāmā hato brahmannivartasvāhavāditi | nūnaṃ nāśraddadhadvākyameṣa me puruṣarṣabhaḥ

'हे ब्रह्मन्, अश्वत्थामा मारा गया, युद्ध से लौट जाइए।' निश्चय ही पुरुषश्रेष्ठ द्रोण ने मेरी बात पर विश्वास नहीं किया।

श्लोक 51 (7.191.51)

स त्वं गोविन्दवाक्यानि मानयस्व जयैषिणः । द्रोणाय निहतं शंस राजञ्शारद्वतीसुतम् ॥

sa tvaṃ govindavākyāni mānayasva jayaiṣiṇaḥ | droṇāya nihataṃ śaṃsa rājañśāradvatīsutam

इसलिए विजय चाहनेवाले आप गोविन्द की बातों का मान रखिए। हे राजन्, द्रोण से कह दीजिए कि शारद्वती का पुत्र मारा गया।

श्लोक 52 (7.191.52)

त्वयोक्ते नैव युध्येत जातु राजन्द्विजर्षभः । सत्यवागिति लोकेऽस्मिन्भवान्ख्यातो जनाधिप ॥

tvayokte naiva yudhyeta jātu rājandvijarṣabhaḥ | satyavāgiti loke'sminbhavānkhyāto janādhipa

आपके कह देने पर वे द्विजश्रेष्ठ निश्चय ही फिर नहीं लड़ेंगे; क्योंकि हे जनाधिप, आप इस लोक में सत्यवादी के रूप में प्रसिद्ध हैं।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 53 (7.191.53)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा कृष्णवाक्यप्रचोदितः । भावित्वाच्च महाराज वक्तुं समुपचक्रमे ॥

tasya tadvacanaṃ śrutvā kṛṣṇavākyapracoditaḥ | bhāvitvācca mahārāja vaktuṃ samupacakrame

उनकी वह बात सुनकर, कृष्ण के वचनों से प्रेरित होकर और होनहार के कारण, हे महाराज, युधिष्ठिर कहने को तैयार हुए।

श्लोक 54 (7.191.54)

तमतथ्यभये मग्नो जये सक्तो युधिष्ठिरः । अश्वत्थामा हत इति शब्दमुच्चैश्चकार ह । अव्यक्तमब्रवीद्राजन्हतः कुञ्जर इत्युत ॥

tamatathyabhaye magno jaye sakto yudhiṣṭhiraḥ | aśvatthāmā hata iti śabdamuccaiścakāra ha | avyaktamabravīdrājanhataḥ kuñjara ityuta

तब असत्य के भय में डूबे और विजय में आसक्त युधिष्ठिर ने उनसे ऊँचे स्वर में कहा, "अश्वत्थामा मारा गया," और फिर, हे राजन्, अस्पष्ट स्वर में कहा, "हाथी।"

श्लोक 55 (7.191.55)

तस्य पूर्वं रथः पृथ्व्याश्चतुरङ्गुलमुच्छ्रितः । बभूवैवं च तेनोक्ते तस्य वाहाः स्पृशन्महीम् ॥

tasya pūrvaṃ rathaḥ pṛthvyāścaturaṅgulamucchritaḥ | babhūvaivaṃ ca tenokte tasya vāhāḥ spṛśanmahīm

इससे पहले उनका रथ पृथ्वी से चार अङ्गुल ऊपर रहता था; पर उनके ऐसा कहते ही उनके घोड़े भूमि को छूने लगे।

श्लोक 56 (7.191.56)

युधिष्ठिरात्तु तद्वाक्यं श्रुत्वा द्रोणो महारथः । पुत्रव्यसनसन्तप्तो निराशो जीवितेऽभवत् ॥

yudhiṣṭhirāttu tadvākyaṃ śrutvā droṇo mahārathaḥ | putravyasanasantapto nirāśo jīvite'bhavat

युधिष्ठिर से वह बात सुनकर महारथी द्रोण पुत्र के शोक से सन्तप्त हो गए और जीवन से निराश हो गए।

श्लोक 57 (7.191.57)

आगस्कृतमिवात्मानं पाण्डवानां महात्मनाम् । ऋषिवाक्येन मन्वानः श्रुत्वा च निहतं सुतम् ॥

āgaskṛtamivātmānaṃ pāṇḍavānāṃ mahātmanām | ṛṣivākyena manvānaḥ śrutvā ca nihataṃ sutam

ऋषियों की बात से, और पुत्र के मारे जाने की बात सुनकर, वे अपने को महात्मा पाण्डवों का अपराधी मानने लगे,

श्लोक 58 (7.191.58)

विचेताः परमोद्विग्नो धृष्टद्युम्नमवेक्ष्य च । योद्धुं नाशक्नुवद्राजन्यथापूर्वमरिन्दमः ॥

vicetāḥ paramodvigno dhṛṣṭadyumnamavekṣya ca | yoddhuṃ nāśaknuvadrājanyathāpūrvamarindamaḥ

और व्याकुल, अत्यन्त उद्विग्न होकर तथा धृष्टद्युम्न को देखकर वे शत्रुदमन द्रोण, हे राजन्, पहले की तरह युद्ध नहीं कर सके।

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