द्रोण पर्व · अध्याय 190
दुर्योधन और सात्यकि; युधिष्ठिर द्वारा पाञ्चालों को प्रोत्साहन
धृष्टद्युम्न, यमजों से रक्षित होकर, चार कौरव रथियों के बीच से धर्मपूर्ण, निर्मल युद्ध करता हुआ द्रोण की ओर बढ़ता है। दुर्योधन और सात्यकि आमने-सामने आकर बचपन की मित्रता का स्मरण करते और क्षत्रिय-जीवन को धिक्कारते हैं, फिर लड़ते हैं, यहाँ तक कि दुर्योधन घायल होकर हट जाता है। कर्ण उसकी सहायता को आता है और भीम से भिड़ता है; भीम की गदा कर्ण के रथ का एक पहिया तोड़ देती है। युधिष्ठिर पाञ्चालों और मत्स्यों को द्रोण पर चढ़ाई के लिए उभारते हैं, और भीम तथा यमज अर्जुन से कौरवों को द्रोण के पास से हटाने की पुकार करते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.190.1)
तस्मिंस्तथा वर्तमाने गजाश्वनरसंक्षये । दुःशासनो महाराज धृष्टद्युम्नमयोधयत् ॥
tasmiṃstathā vartamāne gajāśvanarasaṃkṣaye | duḥśāsano mahārāja dhṛṣṭadyumnamayodhayat
हे महाराज! हाथी, घोड़ों और मनुष्यों का वह संहार जब चल रहा था, तब दुःशासन ने धृष्टद्युम्न से युद्ध किया।
श्लोक 2 (7.190.2)
स तु रुक्मरथासक्तो दुःशासनशरार्दितः । अमर्षात्तव पुत्रस्य शरैर्वाहानवाकिरत् ॥
sa tu rukmarathāsakto duḥśāsanaśarārditaḥ | amarṣāttava putrasya śarairvāhānavākirat
अपने सुनहरे रथ पर जमे हुए धृष्टद्युम्न ने, दुःशासन के बाणों से पीड़ित होकर, क्रोध में आपके पुत्र के घोड़ों को बाणों से ढक दिया।
श्लोक 3 (7.190.3)
क्षणेन स रथस्तस्य सध्वजः सहसारथिः । नादृश्यत महाराज पार्षतस्य शरैश्चितः ॥
kṣaṇena sa rathastasya sadhvajaḥ sahasārathiḥ | nādṛśyata mahārāja pārṣatasya śaraiścitaḥ
हे महाराज! क्षण भर में ध्वजा और सारथि सहित वह रथ पृषत के पुत्र के बाणों से ऐसा ढक गया कि दिखाई ही न दिया।
श्लोक 4 (7.190.4)
दुःशासनस्तु राजेन्द्र पाञ्चाल्यस्य महात्मनः । नाशकत्प्रमुखे स्थातुं शरजालप्रपीडितः ॥
duḥśāsanastu rājendra pāñcālyasya mahātmanaḥ | nāśakatpramukhe sthātuṃ śarajālaprapīḍitaḥ
हे राजेन्द्र! बाणों के जाल से पीड़ित दुःशासन उस महात्मा पाञ्चाल के सामने टिक न सका।
श्लोक 5 (7.190.5)
स तु दुःशासनं बाणैर्विमुखीकृत्य पार्षतः । किरञ्छरसहस्राणि द्रोणमेवाभ्ययाद्रणे ॥
sa tu duḥśāsanaṃ bāṇairvimukhīkṛtya pārṣataḥ | kirañcharasahasrāṇi droṇamevābhyayādraṇe
तब पार्षत धृष्टद्युम्न बाणों से दुःशासन को विमुख करके, हज़ारों बाण बरसाता हुआ युद्ध में द्रोण की ओर बढ़ा।
श्लोक 6 (7.190.6)
अभ्यपद्यत हार्दिक्यः कृतवर्मा त्वनन्तरम् । सोदर्याणां त्रयश्चैव त एनं पर्यवारयन् ॥
abhyapadyata hārdikyaḥ kṛtavarmā tvanantaram | sodaryāṇāṃ trayaścaiva ta enaṃ paryavārayan
फिर हृदिक-पुत्र कृतवर्मा आ पहुँचा, और तीन सगे भाई भी; उन्होंने उसे घेर लिया।
श्लोक 7 (7.190.7)
तं यमौ पृष्ठतोऽन्वैतां रक्षन्तौ पुरुषर्षभौ । द्रोणायाभिमुखं यान्तं दीप्यमानमिवानलम् ॥
taṃ yamau pṛṣṭhato'nvaitāṃ rakṣantau puruṣarṣabhau | droṇāyābhimukhaṃ yāntaṃ dīpyamānamivānalam
द्रोण की ओर जाते हुए, प्रज्वलित अग्नि जैसे उस धृष्टद्युम्न की रक्षा करते हुए दोनों पुरुषश्रेष्ठ यमज उसके पीछे-पीछे चले।
श्लोक 8 (7.190.8)
सम्प्रहारमकुर्वंस्ते सर्वे च सुमहारथाः । अमर्षिताः सत्त्ववन्तः कृत्वा मरणमग्रतः ॥
samprahāramakurvaṃste sarve ca sumahārathāḥ | amarṣitāḥ sattvavantaḥ kṛtvā maraṇamagrataḥ
वे सब महारथी, साहसी और अमर्ष से भरे हुए, मृत्यु को सामने रखकर परस्पर युद्ध करने लगे।
श्लोक 9 (7.190.9)
शुद्धात्मानः शुद्धवृत्ता राजन्स्वर्गपुरस्कृताः । आर्यं युद्धमकुर्वन्त परस्परजिगीषवः ॥
śuddhātmānaḥ śuddhavṛttā rājansvargapuraskṛtāḥ | āryaṃ yuddhamakurvanta parasparajigīṣavaḥ
हे राजन्! शुद्ध मन वाले, शुद्ध आचरण वाले, स्वर्ग को सामने रखे हुए वे एक-दूसरे को जीतने की इच्छा से आर्य-युद्ध करने लगे।
श्लोक 10 (7.190.10)
शुक्लाभिजनकर्माणो मतिमन्तो जनाधिप । धर्मयुद्धमयुध्यन्त प्रेप्सन्तो गतिमुत्तमाम् ॥
śuklābhijanakarmāṇo matimanto janādhipa | dharmayuddhamayudhyanta prepsanto gatimuttamām
हे जनाधिप! निर्मल कुल और कर्म वाले, बुद्धिमान वे परम गति पाने की इच्छा से धर्मयुद्ध करते रहे।
श्लोक 11 (7.190.11)
न तत्रासीदधर्मिष्ठमशस्तं युद्धमेव च । नात्र कर्णी न नालीको न लिप्तो न च बस्तिकः ॥
na tatrāsīdadharmiṣṭhamaśastaṃ yuddhameva ca | nātra karṇī na nālīko na lipto na ca bastikaḥ
उस युद्ध में कुछ भी अधर्म्य या निन्दित नहीं था: न कर्णी बाण, न नालीक, न विष लगा हुआ बाण, न ढीली गाँठ वाला बाण,
श्लोक 12 (7.190.12)
न सूची कपिशो नैव न गवास्थिर्गजास्थिजः । न चूली बलिशस्तत्र न यमी नापि पाचकः । इषुरासीन्न संश्लिष्टो न पूतिर्न च जिह्मगः ॥
na sūcī kapiśo naiva na gavāsthirgajāsthijaḥ | na cūlī baliśastatra na yamī nāpi pācakaḥ | iṣurāsīnna saṃśliṣṭo na pūtirna ca jihmagaḥ
न सूची, न कपिश, न गाय की हड्डी या हाथी की हड्डी से बना, न चूली, बलिश, यमी या पाचक नामक बाण; और कोई बाण ढीला जुड़ा, सड़ा हुआ या टेढ़ा चलने वाला नहीं था।
श्लोक 13 (7.190.13)
ऋजून्येव विशुद्धानि सर्वे शस्त्राण्यधारयन् । सुयुद्धेन पराँल्लोकानीप्सन्तः कीर्तिमेव च ॥
ṛjūnyeva viśuddhāni sarve śastrāṇyadhārayan | suyuddhena parām̐llokānīpsantaḥ kīrtimeva ca
सबने सीधे और निर्मल शस्त्र धारण किए थे, और उत्तम युद्ध से परलोक तथा कीर्ति पाना चाहते थे।
श्लोक 14 (7.190.14)
तदासीत्तुमुलं युद्धं सर्वदोषविवर्जितम् । चतुर्णां तव योधानां तैस्त्रिभिः पाण्डवैः सह ॥
tadāsīttumulaṃ yuddhaṃ sarvadoṣavivarjitam | caturṇāṃ tava yodhānāṃ taistribhiḥ pāṇḍavaiḥ saha
वह तुमुल युद्ध सब दोषों से रहित था, जो आपके चार योद्धाओं और उन तीन पाण्डवों के बीच हो रहा था।
श्लोक 15 (7.190.15)
धृष्टद्युम्नस्तु तान्दृष्ट्वा तव राजन्रथर्षभान् । यमाभ्यां वारितान्वीराञ्छीघ्रास्त्रो द्रोणमभ्ययात् ॥
dhṛṣṭadyumnastu tāndṛṣṭvā tava rājanratharṣabhān | yamābhyāṃ vāritānvīrāñchīghrāstro droṇamabhyayāt
शीघ्र अस्त्र चलाने वाला धृष्टद्युम्न, हे राजन्! आपके उन रथश्रेष्ठ वीरों को यमजों से रोके हुए देखकर द्रोण की ओर चला गया।
श्लोक 16 (7.190.16)
निवारितास्तु ते वीरास्तयोः पुरुषसिंहयोः । समसज्जन्त चत्वारो वाताः पर्वतयोरिव ॥
nivāritāstu te vīrāstayoḥ puruṣasiṃhayoḥ | samasajjanta catvāro vātāḥ parvatayoriva
उन दोनों पुरुषसिंहों से रोके गए वे चारों वीर उनसे वैसे ही भिड़ गए, जैसे चार हवाएँ दो पर्वतों से टकराएँ।
श्लोक 17 (7.190.17)
द्वाभ्यां द्वाभ्यां यमौ सार्धं रथाभ्यां रथपुङ्गवौ । समासक्तौ ततो द्रोणं धृष्टद्युम्नोऽभ्यवर्तत ॥
dvābhyāṃ dvābhyāṃ yamau sārdhaṃ rathābhyāṃ rathapuṅgavau | samāsaktau tato droṇaṃ dhṛṣṭadyumno'bhyavartata
दोनों रथश्रेष्ठ यमज दो-दो रथों से एक साथ भिड़ गए, और धृष्टद्युम्न द्रोण की ओर बढ़ा।
श्लोक 18 (7.190.18)
दृष्ट्वा द्रोणाय पाञ्चाल्यं व्रजन्तं युद्धदुर्मदम् । यमाभ्यां तांश्च संसक्तांस्तदन्तरमुपाद्रवत् ॥
dṛṣṭvā droṇāya pāñcālyaṃ vrajantaṃ yuddhadurmadam | yamābhyāṃ tāṃśca saṃsaktāṃstadantaramupādravat
युद्ध में मदमत्त पाञ्चाल को द्रोण की ओर जाते और उन योद्धाओं को यमजों से उलझा देखकर वह बीच के अवसर में दौड़ पड़ा।
श्लोक 19 (7.190.19)
दुर्योधनो महाराज किरञ्छोणितभोजनान् । तं सात्यकिः शीघ्रतरं पुनरेवाभ्यवर्तत ॥
duryodhano mahārāja kirañchoṇitabhojanān | taṃ sātyakiḥ śīghrataraṃ punarevābhyavartata
हे महाराज! वह दुर्योधन था, जो रक्त पीने वाले बाण बिखेर रहा था; किन्तु सात्यकि बहुत शीघ्र फिर उसकी ओर मुड़ पड़ा।
श्लोक 20 (7.190.20)
तौ परस्परमासाद्य समीपे कुरुमाधवौ । हसमानौ नृशार्दूलावभीतौ समसज्जताम् ॥
tau parasparamāsādya samīpe kurumādhavau | hasamānau nṛśārdūlāvabhītau samasajjatām
आमने-सामने आकर वे दोनों नरव्याघ्र, कुरुवंशी और माधव, निर्भय होकर हँसते हुए एक-दूसरे से भिड़ गए।
श्लोक 21 (7.190.21)
बाल्यवृत्तानि सर्वाणि प्रीयमाणौ विचिन्त्य तौ । अन्योन्यं प्रेक्षमाणौ च स्मयमानौ पुनःपुनः ॥
bālyavṛttāni sarvāṇi prīyamāṇau vicintya tau | anyonyaṃ prekṣamāṇau ca smayamānau punaḥpunaḥ
बचपन की सारी बातें याद करके वे दोनों प्रसन्न होते हुए, एक-दूसरे को देखते हुए बार-बार मुस्कुराते रहे।
श्लोक 22 (7.190.22)
अथ दुर्योधनो राजा सात्यकिं समभाषत । प्रियं सखायं सततं गर्हयन्वृत्तमात्मनः ॥
atha duryodhano rājā sātyakiṃ samabhāṣata | priyaṃ sakhāyaṃ satataṃ garhayanvṛttamātmanaḥ
तब राजा दुर्योधन ने अपने प्रिय मित्र सात्यकि से बात की और अपने ही आचरण की निन्दा की।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 23 (7.190.23)
धिक् क्रोधं धिक्सखे लोभं धिङ्मोहं धिगमर्षितम् । धिगस्तु क्षात्रमाचारं धिगस्तु बलमौरसम् ॥
dhik krodhaṃ dhiksakhe lobhaṃ dhiṅmohaṃ dhigamarṣitam | dhigastu kṣātramācāraṃ dhigastu balamaurasam
"हे मित्र! क्रोध को धिक्कार है, लोभ को धिक्कार है; मोह को धिक्कार है, अमर्ष को धिक्कार है; क्षत्रिय के आचार को धिक्कार है, जन्मजात बल को भी धिक्कार है।
श्लोक 24 (7.190.24)
यत्र मामभिसन्धत्से त्वां चाहं शिनिपुङ्गव । त्वं हि प्राणैः प्रियतरो ममाहं च सदा तव ॥
yatra māmabhisandhatse tvāṃ cāhaṃ śinipuṅgava | tvaṃ hi prāṇaiḥ priyataro mamāhaṃ ca sadā tava
हे शिनिपुङ्गव! कि तुम मुझ पर निशाना साधो और मैं तुम पर! तुम मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय हो, और मैं सदा तुम्हें।
श्लोक 25 (7.190.25)
स्मरामि तानि सर्वाणि बाल्यवृत्तानि यानि नौ । तानि सर्वाणि जीर्णानि साम्प्रतं नो रणाजिरे । किमन्यत्क्रोधलोभाभ्यां युद्धमेवाद्य सात्वत ॥
smarāmi tāni sarvāṇi bālyavṛttāni yāni nau | tāni sarvāṇi jīrṇāni sāmprataṃ no raṇājire | kimanyatkrodhalobhābhyāṃ yuddhamevādya sātvata
हमारे बचपन की वे सब बातें मुझे याद हैं; अब इस रणभूमि में वे सब पुरानी पड़ गई हैं। क्रोध और लोभ के सिवा अब और क्या है? आज तो बस युद्ध ही है, हे सात्वत!"
सञ्जय उवाच
श्लोक 26 (7.190.26)
तं तथावादिनं तत्र सात्यकिः प्रत्यभाषत । प्रहसन्विशिखांस्तीक्ष्णानुद्यम्य परमास्त्रवित् ॥
taṃ tathāvādinaṃ tatra sātyakiḥ pratyabhāṣata | prahasanviśikhāṃstīkṣṇānudyamya paramāstravit
इस प्रकार कहने वाले उससे परम अस्त्रों के ज्ञाता सात्यकि ने तीखे बाण उठाकर हँसते हुए उत्तर दिया।
सात्यकिरुवाच
श्लोक 27 (7.190.27)
नेयं सभा राजपुत्र नाचार्यस्य निवेशनम् । यत्र क्रीडितमस्माभिस्तदा राजन्समागतैः ॥
neyaṃ sabhā rājaputra nācāryasya niveśanam | yatra krīḍitamasmābhistadā rājansamāgataiḥ
"हे राजकुमार! यह वह सभा नहीं है, न आचार्य का घर, जहाँ हम सब मिलकर खेले थे, हे राजन्!"
दुर्योधन उवाच
श्लोक 28 (7.190.28)
क्व सा क्रीडा गताऽस्माकं बाल्ये वै शिनिपुङ्गव । क्व च युद्धमिदं भूयः कालो हि दुरतिक्रमः ॥
kva sā krīḍā gatā'smākaṃ bālye vai śinipuṅgava | kva ca yuddhamidaṃ bhūyaḥ kālo hi duratikramaḥ
"हे शिनिपुङ्गव! बचपन का हमारा वह खेल कहाँ चला गया? और फिर यह युद्ध कहाँ से आ गया? काल को लाँघना बड़ा कठिन है।
श्लोक 29 (7.190.29)
किन्तु नो विद्यते कृत्यं धनेन धनलिप्सया । यत्र युध्यामहे सर्वे धनलोभात्समागताः ॥
kintu no vidyate kṛtyaṃ dhanena dhanalipsayā | yatra yudhyāmahe sarve dhanalobhātsamāgatāḥ
धन की लालसा से धन का हमारे लिए क्या काम, जब हम सब धन के लोभ से यहाँ इकट्ठे होकर युद्ध कर रहे हैं?"
सञ्जय उवाच
श्लोक 30 (7.190.30)
तं तथावादिनं तत्र राजानं माधवोऽब्रवीत् । एवं वृत्तं सदा क्षात्रं युध्यन्तीह गुरूनपि ॥
taṃ tathāvādinaṃ tatra rājānaṃ mādhavo'bravīt | evaṃ vṛttaṃ sadā kṣātraṃ yudhyantīha gurūnapi
इस प्रकार कहने वाले राजा से माधव ने कहा: "क्षत्रिय का आचरण सदा ऐसा ही रहा है: यहाँ वे अपने गुरुजनों से भी लड़ते हैं।
सात्यकिरुवाच
श्लोक 31 (7.190.31)
यदि तेऽहं प्रियो राजञ्जहि मां मा चिरं कृथाः । त्वत्कृते सुकृतांल्लोकान्गच्छेयं भरतर्षभ ॥
yadi te'haṃ priyo rājañjahi māṃ mā ciraṃ kṛthāḥ | tvatkṛte sukṛtāṃllokāngaccheyaṃ bharatarṣabha
हे राजन्! यदि मैं तुम्हें प्रिय हूँ तो मुझे मार डालो, देर मत करो। हे भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे हाथों मैं पुण्यात्माओं के लोकों को जाऊँ।
श्लोक 32 (7.190.32)
या ते शक्तिर्बलं यच्च तत्क्षिप्रं मयि दर्शय । नेच्छामि तदहं द्रष्टुं मित्राणां व्यसनं महत् ॥
yā te śaktirbalaṃ yacca tatkṣipraṃ mayi darśaya | necchāmi tadahaṃ draṣṭuṃ mitrāṇāṃ vyasanaṃ mahat
तुम्हारे पास जो शक्ति और बल है, उसे मुझ पर शीघ्र दिखाओ; मैं मित्रों की यह भारी विपत्ति देखना नहीं चाहता।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 33 (7.190.33)
इत्येवं व्यक्तमाभाष्य प्रतिभाष्य च सात्यकिः । अभ्ययात्तूर्णमव्यग्रो दयां नाकुरुतात्मनि ॥
ityevaṃ vyaktamābhāṣya pratibhāṣya ca sātyakiḥ | abhyayāttūrṇamavyagro dayāṃ nākurutātmani
इस प्रकार स्पष्ट कहकर और उत्तर देकर सात्यकि निश्चल भाव से तेज़ी से आगे बढ़ा; उसने मन में दया नहीं की।
श्लोक 34 (7.190.34)
तमायान्तं महाबाहुं प्रत्यगृह्णात्तवात्मजः । शरैश्चावाकिरद्राजञ्शैनेयं तनयस्तव ॥
tamāyāntaṃ mahābāhuṃ pratyagṛhṇāttavātmajaḥ | śaraiścāvākiradrājañśaineyaṃ tanayastava
आते हुए उस महाबाहु का आपके पुत्र ने सामना किया और, हे राजन्! शिनिवंशी को बाणों से ढक दिया।
श्लोक 35 (7.190.35)
ततः प्रववृते युद्धं कुरुमाधवसिंहयोः । अन्योन्यं क्रुद्धयोर्घोरं यथा द्विरदसिंहयोः ॥
tataḥ pravavṛte yuddhaṃ kurumādhavasiṃhayoḥ | anyonyaṃ kruddhayorghoraṃ yathā dviradasiṃhayoḥ
तब कुरु और माधव, उन दो सिंहों में परस्पर क्रुद्ध होकर घोर युद्ध छिड़ गया, जैसे हाथी और सिंह का।
श्लोक 36 (7.190.36)
ततः पूर्णायतोत्सृष्टैः सात्वतं युद्धदुर्मदम् । दुर्योधनः प्रत्यविध्यत्कुपितो दशभिः शरैः ॥
tataḥ pūrṇāyatotsṛṣṭaiḥ sātvataṃ yuddhadurmadam | duryodhanaḥ pratyavidhyatkupito daśabhiḥ śaraiḥ
तब पूरी खींची हुई प्रत्यंचा से छोड़े गए बाणों में से दस बाणों से कुपित दुर्योधन ने युद्ध में मदमत्त सात्वत को बींध दिया।
श्लोक 37 (7.190.37)
तं सात्यकिः प्रत्यविध्यत्तथैवावाकिरच्छरैः । पञ्चाशता पुनश्चाजौ त्रिंशता दशभिश्च ह ॥
taṃ sātyakiḥ pratyavidhyattathaivāvākiraccharaiḥ | pañcāśatā punaścājau triṃśatā daśabhiśca ha
सात्यकि ने भी उसे बदले में बींधा और उसी तरह बाणों से ढक दिया — युद्ध में फिर पचास से, फिर तीस और दस से।
श्लोक 38 (7.190.38)
सात्यकिं तु रणे राजन्प्रहसंस्तनयस्तव । आकर्णपूर्णैर्निशितैर्विव्याध त्रिंशता शरैः ॥
sātyakiṃ tu raṇe rājanprahasaṃstanayastava | ākarṇapūrṇairniśitairvivyādha triṃśatā śaraiḥ
और हे राजन्! आपके पुत्र ने युद्ध में हँसते हुए कान तक खींचे हुए तीस तीखे बाणों से सात्यकि को बींध दिया।
श्लोक 39 (7.190.39)
ततोऽस्य सशरं चापं क्षुरप्रेण द्विधाऽच्छिनत् ॥
tato'sya saśaraṃ cāpaṃ kṣurapreṇa dvidhā'cchinat
तब उसने क्षुरप्र से सात्यकि के धनुष को बाण-सहित दो टुकड़े कर दिया।
श्लोक 40 (7.190.40)
सोऽन्यत्कार्मुकमादाय लघुहस्तस्ततो दृढम् । सात्यकिर्व्यसृजच्चापि शरश्रेणीं सुतस्य ते ॥
so'nyatkārmukamādāya laghuhastastato dṛḍham | sātyakirvyasṛjaccāpi śaraśreṇīṃ sutasya te
दूसरा धनुष लेकर फुर्तीले हाथों वाले सात्यकि ने फिर दृढ़ता से आपके पुत्र पर बाणों की पंक्ति छोड़ी।
श्लोक 41 (7.190.41)
तामापतन्तीं सहसा शरश्रेणीं जिघांसया । चिच्छेद बहुधा राजा तत उच्चुक्रुशुर्जनाः ॥
tāmāpatantīṃ sahasā śaraśreṇīṃ jighāṃsayā | ciccheda bahudhā rājā tata uccukruśurjanāḥ
उस आती हुई बाण-पंक्ति को राजा दुर्योधन ने उसे नष्ट करने की इच्छा से अनेक टुकड़ों में काट डाला, और लोग ऊँचे स्वर में चिल्ला उठे।
श्लोक 42 (7.190.42)
सात्यकिं च त्रिसप्तत्या पीडयामास वेगितः । स्वर्णपुङ्खैः शिलाधौतैराकर्णापूर्णनिःसृतैः ॥
sātyakiṃ ca trisaptatyā pīḍayāmāsa vegitaḥ | svarṇapuṅkhaiḥ śilādhautairākarṇāpūrṇaniḥsṛtaiḥ
फिर उसने वेग से सात्यकि को तिहत्तर बाणों से पीड़ित किया — सोने के पंखों वाले, शिला पर तेज किए हुए, कान तक खिंचे धनुष से छूटे हुए।
श्लोक 43 (7.190.43)
तस्य सन्दधतश्चेषु संहितेषु च कार्मुकम् । आच्छिनत्सात्यकिस्तूर्णं शरैश्चैवाप्यवीविधत् ॥
tasya sandadhataśceṣu saṃhiteṣu ca kārmukam | ācchinatsātyakistūrṇaṃ śaraiścaivāpyavīvidhat
जब वह बाण चढ़ा रहा था, तब सात्यकि ने बाण चढ़े हुए उसके धनुष को शीघ्र काट डाला और बाणों से उसे बींध दिया।
श्लोक 44 (7.190.44)
स गाढविद्धो व्यथितः प्रत्यपायाद्रथान्तरे । दुर्योधनो महाराज दाशार्हशरपीडितः ॥
sa gāḍhaviddho vyathitaḥ pratyapāyādrathāntare | duryodhano mahārāja dāśārhaśarapīḍitaḥ
हे महाराज! गहरी चोट खाकर व्यथित दुर्योधन, दाशार्ह के बाणों से पीड़ित होकर, दूसरे रथ में चला गया।
श्लोक 45 (7.190.45)
समाश्वस्य तु पुत्रस्ते सात्यकिं पुनरभ्ययात् । विसृजन्निषुजालानि युयुधानरथं प्रति ॥
samāśvasya tu putraste sātyakiṃ punarabhyayāt | visṛjanniṣujālāni yuyudhānarathaṃ prati
सँभलकर आपका पुत्र फिर सात्यकि पर चढ़ आया और युयुधान के रथ पर बाणों की वर्षा करने लगा।
श्लोक 46 (7.190.46)
तथैव सात्यकिर्बाणान्दुर्योधनरथं प्रति । सततं विसृजन्राजंस्तत्सङ्कुलमवर्तत ॥
tathaiva sātyakirbāṇānduryodhanarathaṃ prati | satataṃ visṛjanrājaṃstatsaṅkulamavartata
हे राजन्! उसी प्रकार सात्यकि दुर्योधन के रथ पर लगातार बाण छोड़ता रहा, और वह संघर्ष संकुल हो उठा।
श्लोक 47 (7.190.47)
तत्रेषुभिः क्षिप्यमाणैः पतद्भिश्च शरीरिषु । अग्नेरिव महाकक्षैः शब्दः समभवन्महान् ॥
tatreṣubhiḥ kṣipyamāṇaiḥ patadbhiśca śarīriṣu | agneriva mahākakṣaiḥ śabdaḥ samabhavanmahān
वहाँ शरीरों पर चलाए जाते और गिरते बाणों से बड़ी भारी ध्वनि उठी, जैसे घने झाड़-झंखाड़ में आग की धधक।
श्लोक 48 (7.190.48)
तयोः शरसहस्रैश्च सञ्छन्नं वसुधातलम् । अगम्यरूपं च शरैराकाशं समपद्यत ॥
tayoḥ śarasahasraiśca sañchannaṃ vasudhātalam | agamyarūpaṃ ca śarairākāśaṃ samapadyata
उन दोनों के हज़ारों बाणों से पृथ्वी की सतह ढक गई, और बाणों से आकाश अगम्य-सा हो गया।
श्लोक 49 (7.190.49)
तत्राप्यधिकमालक्ष्य माधवं रथसत्तमम् । क्षिप्रमभ्यपतत्कर्णः परीप्संस्तनयं तव ॥
tatrāpyadhikamālakṣya mādhavaṃ rathasattamam | kṣipramabhyapatatkarṇaḥ parīpsaṃstanayaṃ tava
वहाँ रथश्रेष्ठ माधव को बढ़ता देखकर कर्ण आपके पुत्र की रक्षा करने की इच्छा से शीघ्र आ पहुँचा।
श्लोक 50 (7.190.50)
न तु तं मर्षयामास भीमसेनो महाबलः । सोऽभ्ययात्त्वरितः कर्णं विसृजन्सायकान्बहून् ॥
na tu taṃ marṣayāmāsa bhīmaseno mahābalaḥ | so'bhyayāttvaritaḥ karṇaṃ visṛjansāyakānbahūn
किन्तु महाबली भीमसेन यह सह न सका; वह बहुत-से बाण छोड़ता हुआ तेज़ी से कर्ण की ओर बढ़ा।
श्लोक 51 (7.190.51)
तस्य कर्णः शितान्बाणान्प्रतिहन्य हसन्निव । धनुः शरांश्च चिच्छेद सूतं चाभ्यहनच्छरैः ॥
tasya karṇaḥ śitānbāṇānpratihanya hasanniva | dhanuḥ śarāṃśca ciccheda sūtaṃ cābhyahanaccharaiḥ
कर्ण ने मानो हँसते हुए उसके तीखे बाणों को काट दिया, उसके धनुष और बाणों को काट डाला और बाणों से उसके सारथि को मारा।
श्लोक 52 (7.190.52)
भीमसेनस्तु सङ्क्रुद्धो गदामादाय पाण्डवः । ध्वजं धनुश्च सूतं च सम्ममर्दाहवे रिपोः ॥
bhīmasenastu saṅkruddho gadāmādāya pāṇḍavaḥ | dhvajaṃ dhanuśca sūtaṃ ca sammamardāhave ripoḥ
क्रुद्ध पाण्डव भीमसेन ने गदा लेकर युद्ध में शत्रु की ध्वजा, धनुष और सारथि को कुचल डाला।
श्लोक 53 (7.190.53)
रथचक्रं च कर्णस्य बभञ्ज स महाबलः । भग्नचक्रे रथेऽतिष्ठदकम्पः शैलराडिव ॥
rathacakraṃ ca karṇasya babhañja sa mahābalaḥ | bhagnacakre rathe'tiṣṭhadakampaḥ śailarāḍiva
उस महाबली ने कर्ण के रथ का पहिया भी तोड़ डाला; पहिया टूटे रथ पर कर्ण पर्वतराज की तरह अडिग खड़ा रहा।
श्लोक 54 (7.190.54)
एकचक्रं रथं तस्य तमूहुः सुचिरं हयाः । एकचक्रमिवार्कस्य रथं सप्त हया यथा ॥
ekacakraṃ rathaṃ tasya tamūhuḥ suciraṃ hayāḥ | ekacakramivārkasya rathaṃ sapta hayā yathā
घोड़े उसके एक पहिये वाले रथ को बहुत देर तक वैसे ही खींचते रहे, जैसे सात घोड़े सूर्य के एक पहिये वाले रथ को खींचते हैं।
श्लोक 55 (7.190.55)
अमृष्यमाणः कर्णस्तु भीमसेनमयुध्यत । विविधैरिषुजालैश्च नानाशस्त्रैश्च संयुगे ॥
amṛṣyamāṇaḥ karṇastu bhīmasenamayudhyata | vividhairiṣujālaiśca nānāśastraiśca saṃyuge
असहनशील कर्ण ने युद्ध में नाना प्रकार की बाण-वर्षा और अनेक शस्त्रों से भीमसेन से युद्ध किया।
श्लोक 56 (7.190.56)
भीमसेनस्तु सङ्क्रुद्धः सूतपुत्रमयोधयत् । तस्मिंस्तथा वर्तमाने क्रुद्धो धर्मसुतोऽब्रवीत् । पाञ्चालानां नरव्याघ्रान्मात्स्यांश्च पुरुषर्षभान् ॥
bhīmasenastu saṅkruddhaḥ sūtaputramayodhayat | tasmiṃstathā vartamāne kruddho dharmasuto'bravīt | pāñcālānāṃ naravyāghrānmātsyāṃśca puruṣarṣabhān
क्रुद्ध भीमसेन ने सूतपुत्र से युद्ध किया। यह चलते रहने पर धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर ने क्रोध में नरव्याघ्र पाञ्चालों और पुरुषश्रेष्ठ मत्स्यों से कहा:
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 57 (7.190.57)
ये नः प्राणाः शिरो ये च ये नो योधा महारथाः । त एते धार्तराष्ट्रेषु विषक्ताः पुरुषर्षभाः ॥
ye naḥ prāṇāḥ śiro ye ca ye no yodhā mahārathāḥ | ta ete dhārtarāṣṭreṣu viṣaktāḥ puruṣarṣabhāḥ
"जो हमारे प्राण हैं, जो हमारे शिर हैं, और जो हमारे महारथी योद्धा हैं, वे सब धृतराष्ट्र के पुत्रों से जूझ रहे हैं, हे पुरुषश्रेष्ठो!
श्लोक 58 (7.190.58)
किं तिष्ठत यथा मूढाः सर्वे विगतचेतसः । तत्र गच्छत यत्रैते युध्यन्ते मामका रथाः ॥
kiṃ tiṣṭhata yathā mūḍhāḥ sarve vigatacetasaḥ | tatra gacchata yatraite yudhyante māmakā rathāḥ
तुम सब मूर्खों की तरह, होश खोए हुए क्यों खड़े हो? वहाँ जाओ जहाँ मेरे ये रथी लड़ रहे हैं।
श्लोक 59 (7.190.59)
क्षत्रधर्मं पुरस्कृत्य सर्व एव गतज्वराः । जयन्तो वध्यमानाश्च गतिमिष्टां गमिष्यथ ॥
kṣatradharmaṃ puraskṛtya sarva eva gatajvarāḥ | jayanto vadhyamānāśca gatimiṣṭāṃ gamiṣyatha
क्षत्रिय-धर्म को आगे रखकर, चिन्ता छोड़कर तुम सब जीतते हुए या मारे जाते हुए अपनी इच्छित गति को पाओगे।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 60 (7.190.60)
ते राज्ञा चोदिता वीरा योत्स्यमाना महारथाः । चतुर्धा वाहिनीं कृत्वा त्वरिता द्रोणमभ्ययुः ॥
te rājñā coditā vīrā yotsyamānā mahārathāḥ | caturdhā vāhinīṃ kṛtvā tvaritā droṇamabhyayuḥ
राजा से प्रेरित होकर लड़ने को तत्पर वे महारथी वीर अपनी सेना को चार भागों में बाँटकर शीघ्रता से द्रोण पर चढ़ आए।
श्लोक 61 (7.190.61)
पाञ्चालास्त्वेकतो द्रोणमभ्यघ्नन्निशितैः शरैः । भीमसेनपुरोगाश्चाप्येकतः पर्यवारयन् ॥
pāñcālāstvekato droṇamabhyaghnanniśitaiḥ śaraiḥ | bhīmasenapurogāścāpyekataḥ paryavārayan
पाञ्चालों ने एक ओर से तीखे बाणों से द्रोण पर प्रहार किया, और भीमसेन के नेतृत्व वाले योद्धाओं ने दूसरी ओर से उन्हें घेर लिया।
श्लोक 62 (7.190.62)
आसंस्तु पाण्डुपुत्राणां त्रयोऽजिह्मा महारथाः । यमौ च भीमसेनश्च प्राक्रोशंस्ते धनञ्जयम् ॥
āsaṃstu pāṇḍuputrāṇāṃ trayo'jihmā mahārathāḥ | yamau ca bhīmasenaśca prākrośaṃste dhanañjayam
पाण्डुपुत्रों में तीन सरल स्वभाव वाले महारथी थे — दोनों यमज और भीमसेन; उन्होंने धनंजय को पुकारा:
भीमसेननकुलसहदेवा ऊचुः
श्लोक 63 (7.190.63)
अभिद्रवार्जुन क्षिप्रं कुरून्द्रोणादपानुद । तत एनं हनिष्यन्ति पाञ्चाला हतरक्षिणम् ॥
abhidravārjuna kṣipraṃ kurūndroṇādapānuda | tata enaṃ haniṣyanti pāñcālā hatarakṣiṇam
"अर्जुन! शीघ्र धावा बोलो! कौरवों को द्रोण के पास से हटा दो! तब पाञ्चाल रक्षकहीन हुए उन्हें मार डालेंगे।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 64 (7.190.64)
कौरवेयांस्ततः पार्थः सहसा समुपाद्रवत् । पाञ्चालानेव तु द्रोणो धृष्टद्युम्नपुरोगमान् । ममर्दुस्तरसा वीराः पञ्चमेऽहनि भारत ॥
kauraveyāṃstataḥ pārthaḥ sahasā samupādravat | pāñcālāneva tu droṇo dhṛṣṭadyumnapurogamān | mamardustarasā vīrāḥ pañcame'hani bhārata
तब पार्थ अचानक कौरवों पर टूट पड़ा, और द्रोण ने अन्य वीरों के साथ धृष्टद्युम्न के नेतृत्व वाले पाञ्चालों को वेग से कुचल डाला — उस पाँचवें दिन, हे भारत!