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द्रोण पर्व · अध्याय 189

कर्ण और भीम; द्रोण और अर्जुन का द्वन्द्व

दुःशासन सहदेव पर टूट पड़ता है और उसके हाथों अपना सारथि खो बैठता है; उधर कर्ण और भीम पहले बाणों से और फिर गदाओं से लड़ते हैं, यहाँ तक कि भीम का रथ नष्ट हो जाता है और वह नकुल के रथ पर कूद जाता है। फिर द्रोण और अर्जुन दिव्यास्त्रों का द्वन्द्व करते हैं, जिसे देखते हुए देवता, गन्धर्व और ऋषि अनुपम कहते हैं। द्रोण के ब्रह्मास्त्र छोड़ने पर अर्जुन उसी अस्त्र से उसे शान्त करता है; पृथ्वी काँप उठती है और बाणों से ढके आकाश के नीचे युद्ध सामान्य संकुल लड़ाई में बदल जाता है.

अध्याय 188अध्याय-सूचीअध्याय 190

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.189.1)

ततो दुःशासनः क्रुद्धः सहदेवमुपाद्रवत् । रथवेगेन तीव्रेण कम्पयन्निव मेदिनीम् ॥

tato duḥśāsanaḥ kruddhaḥ sahadevamupādravat | rathavegena tīvreṇa kampayanniva medinīm

तब क्रोध से भरा दुःशासन अपने रथ के तीव्र वेग से मानो पृथ्वी को कँपाता हुआ सहदेव पर टूट पड़ा।

श्लोक 2 (7.189.2)

तस्यापतत एवाशु भल्लेनामित्रकर्शनः । माद्रीपुत्रः शिरो यन्तुः सशिरस्त्राणमच्छिनत् ॥

tasyāpatata evāśu bhallenāmitrakarśanaḥ | mādrīputraḥ śiro yantuḥ saśirastrāṇamacchinat

उसके झपटते ही शत्रुओं का नाश करने वाले माद्रीपुत्र ने एक भल्ल से उसके सारथि का सिर शिरस्त्राण-सहित काट डाला।

श्लोक 3 (7.189.3)

नैनं दुःशासनः सूतं नापि कश्चन सैनिकः । कृत्तोत्तमाङ्गमाशुत्वात्सहदेवेन बुद्धवान् ॥

nainaṃ duḥśāsanaḥ sūtaṃ nāpi kaścana sainikaḥ | kṛttottamāṅgamāśutvātsahadevena buddhavān

यह इतनी शीघ्रता से हुआ कि सहदेव द्वारा सारथि का सिर काट दिए जाने का पता न दुःशासन को चला, न किसी सैनिक को।

श्लोक 4 (7.189.4)

यदा त्वसङ्गृहीतत्वात्प्रयान्त्यश्वा यथासुखम् । ततो दुःशासनः सूतं बुबुधे गतचेतसम् ॥

yadā tvasaṅgṛhītatvātprayāntyaśvā yathāsukham | tato duḥśāsanaḥ sūtaṃ bubudhe gatacetasam

जब बिना सँभाले हुए घोड़े अपनी इच्छा से इधर-उधर जाने लगे, तभी दुःशासन ने जाना कि उसका सारथि चेतनाहीन हो गया है।

श्लोक 5 (7.189.5)

स हयान्सन्निगृह्याजौ स्वयं हयविशारदः । युयुधे रथिनां श्रेष्ठो लघु चित्रं च सुष्ठु च ॥

sa hayānsannigṛhyājau svayaṃ hayaviśāradaḥ | yuyudhe rathināṃ śreṣṭho laghu citraṃ ca suṣṭhu ca

घोड़ों को हाँकने में निपुण उस श्रेष्ठ रथी ने स्वयं ही युद्ध में घोड़ों को थामकर फुर्ती से, अद्भुत और उत्तम ढंग से लड़ना जारी रखा।

श्लोक 6 (7.189.6)

तदस्यापूजयन्कर्म स्वे परे चापि संयुगे । हतसूतरथेनाजौ व्यचरद्यदभीतवत् ॥

tadasyāpūjayankarma sve pare cāpi saṃyuge | hatasūtarathenājau vyacaradyadabhītavat

उसके इस कर्म की अपने और शत्रु, दोनों पक्षों ने प्रशंसा की, क्योंकि वह मारे गए सारथि वाले रथ पर भी युद्ध में निर्भय होकर विचरता रहा।

श्लोक 7 (7.189.7)

सहदेवस्तु तानश्वांस्तीक्ष्णैर्बाणैरवाकिरत् । पीड्यमानाः शरैश्चाशु प्राद्रवंस्ते ततस्ततः ॥

sahadevastu tānaśvāṃstīkṣṇairbāṇairavākirat | pīḍyamānāḥ śaraiścāśu prādravaṃste tatastataḥ

किन्तु सहदेव ने उन घोड़ों पर तीखे बाण बरसाए; बाणों से पीड़ित होकर वे इधर-उधर भाग चले।

श्लोक 8 (7.189.8)

स रश्मिषु विषक्तत्वादुत्ससर्ज शरासनम् । धनुषा कर्म कुर्वंस्तु रश्मींश्च पुनरुत्सृजत् ॥

sa raśmiṣu viṣaktatvādutsasarja śarāsanam | dhanuṣā karma kurvaṃstu raśmīṃśca punarutsṛjat

लगामों में उलझे रहने के कारण उसने धनुष छोड़ दिया; फिर धनुष से काम लेने लगा तो उसने लगामें फिर छोड़ दीं।

श्लोक 9 (7.189.9)

छिद्रेष्वेतेषु तं बाणैर्माद्रीपुत्रोऽभ्यवाकिरत् । परीप्संस्त्वत्सुतं कर्णस्तदन्तरमवापतत् ॥

chidreṣveteṣu taṃ bāṇairmādrīputro'bhyavākirat | parīpsaṃstvatsutaṃ karṇastadantaramavāpatat

उन्हीं अवसरों में माद्रीपुत्र ने उस पर बाणों की वर्षा की, और आपके पुत्र की रक्षा चाहने वाला कर्ण उस बीच में आ पहुँचा।

श्लोक 10 (7.189.10)

वृकोदरस्ततः कर्णं त्रिभिर्भल्लैः समाहितः । आकर्णपूर्णैरभ्यघ्नद्बाह्वोरुरसि चानदत् ॥

vṛkodarastataḥ karṇaṃ tribhirbhallaiḥ samāhitaḥ | ākarṇapūrṇairabhyaghnadbāhvorurasi cānadat

तब वृकोदर ने स्थिर चित्त होकर कान तक खींचे हुए तीन भल्लों से कर्ण की भुजाओं और छाती पर प्रहार किया और गर्जना की।

श्लोक 11 (7.189.11)

स निवृत्तस्ततः कर्णः सङ्घट्टित इवोरगः । भीममावारयामास विकिरन्निशिताञ्छरान् । ततोऽभूत्तुमुलं युद्धं भीमराधेययोस्तदा ॥

sa nivṛttastataḥ karṇaḥ saṅghaṭṭita ivoragaḥ | bhīmamāvārayāmāsa vikiranniśitāñcharān | tato'bhūttumulaṃ yuddhaṃ bhīmarādheyayostadā

तब चोट खाए सर्प की तरह कर्ण लौट पड़ा और तीखे बाण बिखेरते हुए उसने भीम को रोक लिया; भीम और कर्ण में घमासान युद्ध छिड़ गया।

श्लोक 12 (7.189.12)

तौ वृषाविव नर्दन्तौ विवृत्तनयनावुभौ । वेगेन महताऽन्योन्यं संरब्धावभिपेततुः ॥

tau vṛṣāviva nardantau vivṛttanayanāvubhau | vegena mahatā'nyonyaṃ saṃrabdhāvabhipetatuḥ

दोनों रोष से भरकर, आँखें घुमाते हुए, डकराते हुए दो बैलों की तरह बड़े वेग से एक-दूसरे पर टूट पड़े।

श्लोक 13 (7.189.13)

अभिसंश्लिष्टयोस्तत्र तयोराहवशौण्डयोः । विच्छिन्नशरपातत्वाद्गदायुद्धमवर्तत ॥

abhisaṃśliṣṭayostatra tayorāhavaśauṇḍayoḥ | vicchinnaśarapātatvādgadāyuddhamavartata

युद्ध के लिए उत्सुक वे दोनों वहाँ आपस में गुँथ गए; बाणों का गिरना थम जाने से गदायुद्ध होने लगा।

श्लोक 14 (7.189.14)

गदया भीमसेनस्तु कर्णस्य रथकूबरम् । बिभेद शतधा राजंस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥

gadayā bhīmasenastu karṇasya rathakūbaram | bibheda śatadhā rājaṃstadadbhutamivābhavat

हे राजन्! भीमसेन ने गदा से कर्ण के रथ का कूबर सौ टुकड़े कर दिया, और वह बड़े आश्चर्य की बात लगी।

श्लोक 15 (7.189.15)

ततो भीमस्य राधेयो गदामाविध्य वीर्यवान् । अवासृजद्रथे तां तु बिभेद गदया गदाम् ॥

tato bhīmasya rādheyo gadāmāvidhya vīryavān | avāsṛjadrathe tāṃ tu bibheda gadayā gadām

तब पराक्रमी राधापुत्र ने गदा घुमाकर उसे रथ पर फेंका, पर भीम ने अपनी गदा से उस गदा को तोड़ डाला।

श्लोक 16 (7.189.16)

ततो भीमः पुनर्गुर्वीं चिक्षेपाधिरथेर्गदाम् । तां गदां बहुभिः कर्णः सुपुङ्खैः सुप्रवेजितैः ॥

tato bhīmaḥ punargurvīṃ cikṣepādhirathergadām | tāṃ gadāṃ bahubhiḥ karṇaḥ supuṅkhaiḥ supravejitaiḥ

तब भीम ने अधिरथ के पुत्र पर फिर एक भारी गदा फेंकी, और कर्ण ने उस गदा को बहुत-से सुन्दर पंखों वाले, भली-भाँति चलाए हुए बाणों से मारा,

श्लोक 17 (7.189.17)

प्रत्यविध्यत्पुनश्चान्यैः सा भीमं पुनराव्रजत् । व्यालीव मन्त्राभिहता कर्णबाणैरभिद्रुता ॥

pratyavidhyatpunaścānyaiḥ sā bhīmaṃ punarāvrajat | vyālīva mantrābhihatā karṇabāṇairabhidrutā

और दूसरे बाणों से फिर मारा; फिर भी मन्त्र से मारी गई सर्पिणी की तरह, कर्ण के बाणों से खदेड़ी जाती हुई वह गदा भीम की ओर लौट आई।

श्लोक 18 (7.189.18)

तस्याः प्रतिनिपातेन भीमस्य विपुलो ध्वजः । पपात सारथिश्चास्य मुमोह च गदाहतः ॥

tasyāḥ pratinipātena bhīmasya vipulo dhvajaḥ | papāta sārathiścāsya mumoha ca gadāhataḥ

उस गदा के लौटकर गिरने से भीम की विशाल ध्वजा गिर पड़ी और गदा से आहत उसका सारथि मूर्छित हो गया।

श्लोक 19 (7.189.19)

स कर्णं सायकानष्टौ व्यसृजत्क्रोधमूर्च्छितः । तैस्तस्य निशितैस्तीक्ष्णैर्भीमसेनो महाबलः ॥

sa karṇaṃ sāyakānaṣṭau vyasṛjatkrodhamūrcchitaḥ | taistasya niśitaistīkṣṇairbhīmaseno mahābalaḥ

क्रोध से मूर्छित-सा होकर भीम ने कर्ण पर आठ बाण छोड़े, और उन तीखे, तीव्र बाणों से महाबली भीमसेन ने,

श्लोक 20 (7.189.20)

चिच्छेद परवीरघ्नः प्रहसन्निव भारत । ध्वजं शरासनं चैव शरावापं च भारत ॥

ciccheda paravīraghnaḥ prahasanniva bhārata | dhvajaṃ śarāsanaṃ caiva śarāvāpaṃ ca bhārata

शत्रुवीरों के संहारक ने मानो हँसते हुए, हे भारत! कर्ण की ध्वजा, धनुष और तूणीर काट डाले।

श्लोक 21 (7.189.21)

कर्णोऽप्यन्यद्धनुर्गृह्य हेमपृष्ठं दुरासदम् । ततः पुनस्तु राधेयो हयानस्य रथेषुभिः । ऋक्षवर्णाञ्जघानाशु तथोभौ पार्ष्णिसारथी ॥

karṇo'pyanyaddhanurgṛhya hemapṛṣṭhaṃ durāsadam | tataḥ punastu rādheyo hayānasya ratheṣubhiḥ | ṛkṣavarṇāñjaghānāśu tathobhau pārṣṇisārathī

कर्ण ने भी सोने की पीठ वाला, दुर्धर्ष दूसरा धनुष लेकर अपने लम्बे बाणों से भीम के ऋक्ष-वर्ण घोड़ों को और उसके दोनों पार्ष्णि-सारथियों को शीघ्र मार डाला।

श्लोक 22 (7.189.22)

स विपन्नरथो भीमो नकुलस्याप्लुतो रथम् । हरिर्यथा गिरेः शृङ्गं समाक्रमदरिन्दमः ॥

sa vipannaratho bhīmo nakulasyāpluto ratham | hariryathā gireḥ śṛṅgaṃ samākramadarindamaḥ

रथ नष्ट हो जाने पर शत्रुओं का दमन करने वाला भीम नकुल के रथ पर वैसे ही कूद गया, जैसे सिंह पर्वत के शिखर पर चढ़ जाता है।

श्लोक 23 (7.189.23)

तथा द्रोणार्जुनौ चित्रमयुध्येतां महारथौ । आचार्यशिष्यौ राजेन्द्र कृतप्रतिकृतौ युधि ॥

tathā droṇārjunau citramayudhyetāṃ mahārathau | ācāryaśiṣyau rājendra kṛtapratikṛtau yudhi

उसी प्रकार दोनों महारथी द्रोण और अर्जुन, आचार्य और शिष्य, हे राजेन्द्र! एक-दूसरे के प्रहार का प्रत्युत्तर देते हुए अद्भुत युद्ध करने लगे।

श्लोक 24 (7.189.24)

लघुसन्धानयोगाभ्यां रथयोश्च रणेन च । मोहयन्तौ मनुष्याणां चक्षूंषि च मनांसि च ॥

laghusandhānayogābhyāṃ rathayośca raṇena ca | mohayantau manuṣyāṇāṃ cakṣūṃṣi ca manāṃsi ca

फुर्तीले सन्धान और योगकौशल से, रथों के संचालन और युद्ध से वे मनुष्यों की आँखों और मनों को मोहित करने लगे।

श्लोक 25 (7.189.25)

उपारमन्त ते सर्वे योधाऽस्माकं परे तथा । विचित्रान्पृतनामध्ये रथमार्गानुदीर्य तौ ॥

upāramanta te sarve yodhā'smākaṃ pare tathā | vicitrānpṛtanāmadhye rathamārgānudīrya tau

हमारे और शत्रु के सभी योद्धा लड़ना छोड़कर रुक गए, जबकि वे दोनों सेना के बीच विचित्र रथ-मार्गों पर रथ दौड़ा रहे थे,

श्लोक 26 (7.189.26)

अन्योन्यमपसव्यं च कर्तुं वीरौ तदेषतुः ॥

anyonyamapasavyaṃ ca kartuṃ vīrau tadeṣatuḥ

और दोनों वीर एक-दूसरे को अपने बाएँ पार्श्व में लाने का प्रयत्न कर रहे थे।

श्लोक 27 (7.189.27)

पराक्रमं तयोर्योधा ददृशुस्ते सुविस्मिताः ॥

parākramaṃ tayoryodhā dadṛśuste suvismitāḥ

योद्धा उन दोनों का पराक्रम परम विस्मय से देखते रहे।

श्लोक 28 (7.189.28)

तयोः समभवद्युद्धं द्रोणपाण्डवयोर्महत् । आमिषार्थे महाराज गगने श्येनयोरिव ॥

tayoḥ samabhavadyuddhaṃ droṇapāṇḍavayormahat | āmiṣārthe mahārāja gagane śyenayoriva

हे महाराज! द्रोण और पाण्डुपुत्र अर्जुन में बड़ा युद्ध छिड़ गया, जैसे आकाश में माँस के टुकड़े के लिए दो बाज़ लड़ते हों।

श्लोक 29 (7.189.29)

यद्यच्चकार द्रोणस्तु कुन्तीपुत्रजिगीषया । तत्तत्प्रतिजघानाशु प्रहसंस्तस्य पाण्डवः ॥

yadyaccakāra droṇastu kuntīputrajigīṣayā | tattatpratijaghānāśu prahasaṃstasya pāṇḍavaḥ

कुन्तीपुत्र को जीतने की इच्छा से द्रोण जो-जो करते, उसे-उसे पाण्डव हँसते हुए तुरन्त विफल कर देता।

श्लोक 30 (7.189.30)

यदा द्रोणो न शक्नोति पाण्डवं स्म विशेषितुम् । ततः प्रादुश्चकारास्त्रमस्त्रमार्गविशारदः ॥

yadā droṇo na śaknoti pāṇḍavaṃ sma viśeṣitum | tataḥ prāduścakārāstramastramārgaviśāradaḥ

जब द्रोण अर्जुन से बढ़त नहीं पा सके, तब अस्त्रों के मार्ग के ज्ञाता उन्होंने अस्त्र प्रकट किए।

श्लोक 31 (7.189.31)

ऐन्द्रं पाशुपतं त्वाष्ट्रं वायव्यमथ वारुणम् । मुक्तंमुक्तं द्रोणचापात्तज्जघान धनञ्जयः ॥

aindraṃ pāśupataṃ tvāṣṭraṃ vāyavyamatha vāruṇam | muktaṃmuktaṃ droṇacāpāttajjaghāna dhanañjayaḥ

ऐन्द्र, पाशुपत, त्वाष्ट्र, वायव्य और वारुण — द्रोण के धनुष से जो-जो अस्त्र छूटा, उसे-उसे धनंजय ने काट गिराया।

श्लोक 32 (7.189.32)

अस्त्राण्यस्त्रैर्यदा तस्य विधिवद्धन्ति पाण्डवः । ततोऽस्त्रैः परमैर्दिव्यैर्द्रोणः पार्थमवाकिरत् ॥

astrāṇyastrairyadā tasya vidhivaddhanti pāṇḍavaḥ | tato'straiḥ paramairdivyairdroṇaḥ pārthamavākirat

जब पाण्डव अर्जुन विधिपूर्वक उनके अस्त्रों को अस्त्रों से काटता गया, तब द्रोण ने श्रेष्ठ दिव्यास्त्रों से पार्थ को ढक दिया।

श्लोक 33 (7.189.33)

यद्यदस्त्रं स पार्थाय प्रयुङ्क्ते विजिगीषया । तस्यतस्य विघाताय तत्तद्धि कुरुतेऽर्जुनः ॥

yadyadastraṃ sa pārthāya prayuṅkte vijigīṣayā | tasyatasya vighātāya tattaddhi kurute'rjunaḥ

विजय की इच्छा से द्रोण पार्थ पर जो-जो अस्त्र चलाते, उस-उस के नाश के लिए अर्जुन वही-वही उपाय करता।

श्लोक 34 (7.189.34)

स वध्यमानेष्वस्त्रेषु दिव्येष्वपि यथाविधि । अर्जुनेनार्जुनं द्रोणो मनसैवाभ्यपूजयत् ॥

sa vadhyamāneṣvastreṣu divyeṣvapi yathāvidhi | arjunenārjunaṃ droṇo manasaivābhyapūjayat

अपने दिव्यास्त्रों को अर्जुन के द्वारा विधि से कटते देखकर द्रोण ने मन ही मन अर्जुन का सम्मान किया।

श्लोक 35 (7.189.35)

मेने चात्मानमधिकं पृथिव्यामधि भारत । तेन शिष्येण सर्वेभ्यः शस्त्रविद्भ्यः परन्तपः ॥

mene cātmānamadhikaṃ pṛthivyāmadhi bhārata | tena śiṣyeṇa sarvebhyaḥ śastravidbhyaḥ parantapaḥ

हे भारत! शत्रुओं को तपाने वाले द्रोण ने उस शिष्य के कारण अपने को पृथ्वी के सभी शस्त्रज्ञों से बढ़कर माना।

श्लोक 36 (7.189.36)

वार्यमाणस्तु पार्थेन तथा मध्ये महात्मनाम् । यतमानोऽर्जुनं प्रीत्या प्रीयते स्मार्जुनेन सः ॥

vāryamāṇastu pārthena tathā madhye mahātmanām | yatamāno'rjunaṃ prītyā prīyate smārjunena saḥ

महात्माओं के बीच पार्थ से रोके जाने पर भी स्नेह से अर्जुन का सामना करते हुए वे अर्जुन से प्रसन्न ही होते रहे।

श्लोक 37 (7.189.37)

ततोऽन्तरिक्षे देवाश्च गन्धर्वाश्च सहस्रशः । ऋषयः सिद्धसङ्घाश्च व्यतिष्ठन्त दिदृक्षया ॥

tato'ntarikṣe devāśca gandharvāśca sahasraśaḥ | ṛṣayaḥ siddhasaṅghāśca vyatiṣṭhanta didṛkṣayā

तब आकाश में हज़ारों देवता और गन्धर्व, ऋषि और सिद्धों के समूह देखने की इच्छा से आ खड़े हुए।

श्लोक 38 (7.189.38)

तदप्सरोभिराकीर्णं यक्षगन्धर्वसङ्कुलम् । श्रीमदाकाशमभवद्भूयो मेघाकुलं यथा ॥

tadapsarobhirākīrṇaṃ yakṣagandharvasaṅkulam | śrīmadākāśamabhavadbhūyo meghākulaṃ yathā

अप्सराओं से भरा और यक्षों तथा गन्धर्वों से ठसाठस वह शोभायमान आकाश फिर मेघों से घिरे आकाश-सा हो गया।

श्लोक 39 (7.189.39)

तत्र स्मान्तर्हिता वाचो व्यचरन्त पुनः पुनः । द्रोणपार्थस्तवोपेता व्यश्रूयन्त नराधिप ॥

tatra smāntarhitā vāco vyacaranta punaḥ punaḥ | droṇapārthastavopetā vyaśrūyanta narādhipa

हे नराधिप! वहाँ द्रोण और पार्थ की स्तुति से भरी अदृश्य वाणियाँ बार-बार सुनाई देती रहीं।

श्लोक 40 (7.189.40)

विसृज्यमानेष्वस्त्रेषु ज्वालयस्तु दिशो दश । अब्रुवंस्तत्र सिद्धाश्च ऋषयश्च समागताः ॥

visṛjyamāneṣvastreṣu jvālayastu diśo daśa | abruvaṃstatra siddhāśca ṛṣayaśca samāgatāḥ

अस्त्रों के छूटते समय जब ज्वालाओं ने दसों दिशाओं को प्रकाशित कर दिया, तब वहाँ एकत्र सिद्ध और ऋषि बोले:

श्लोक 41 (7.189.41)

नैवेदं मानुषं युद्धं नासुरं न च राक्षसम् । न दैवं न च गान्धर्वं ब्राह्मणं ध्रुवमिदं परम् ॥

naivedaṃ mānuṣaṃ yuddhaṃ nāsuraṃ na ca rākṣasam | na daivaṃ na ca gāndharvaṃ brāhmaṇaṃ dhruvamidaṃ param

"यह न मनुष्यों का युद्ध है, न असुरों का, न राक्षसों का; न देवताओं का, न गन्धर्वों का — निश्चय ही यह कोई उच्चतर ब्राह्म युद्ध है।

श्लोक 42 (7.189.42)

विचित्रमिदमाश्चर्यं न नो दृष्टं न च श्रुतम् । अति पाण्डवमाचार्यो द्रोणं चाप्यति पाण्डवः ॥

vicitramidamāścaryaṃ na no dṛṣṭaṃ na ca śrutam | ati pāṇḍavamācāryo droṇaṃ cāpyati pāṇḍavaḥ

यह विचित्र और आश्चर्यजनक है; न हमने ऐसा देखा, न सुना। आचार्य अर्जुन से बढ़कर हैं और अर्जुन द्रोण से बढ़कर।

श्लोक 43 (7.189.43)

नानयोरन्तरं शक्यं द्रष्टुमन्येन केनचित् ॥

nānayorantaraṃ śakyaṃ draṣṭumanyena kenacit

इन दोनों में कोई अन्तर देख पाना किसी दूसरे के लिए सम्भव नहीं है।"

श्लोक 44 (7.189.44)

यदि रुद्रो द्विधाकृत्य युध्येतात्मानमात्मना । तत्र शक्योपमा कर्तुमन्यत्र तु न विद्यते ॥

yadi rudro dvidhākṛtya yudhyetātmānamātmanā | tatra śakyopamā kartumanyatra tu na vidyate

"यदि रुद्र अपने को दो भागों में बाँटकर स्वयं से ही लड़ें, तब कहीं उपमा दी जा सकती है; और कहीं कोई उपमा नहीं मिलती।

श्लोक 45 (7.189.45)

ज्ञानमेकस्थमाचार्ये ज्ञानं योगश्च पाण्डवे । शौर्यमेकस्थमाचार्ये बलं शौर्यं च पाण्डवे ॥

jñānamekasthamācārye jñānaṃ yogaśca pāṇḍave | śauryamekasthamācārye balaṃ śauryaṃ ca pāṇḍave

आचार्य में ज्ञान एक स्थान पर समाया है, पाण्डव में ज्ञान और योग हैं; आचार्य में शौर्य एक स्थान पर समाया है, पाण्डव में बल और शौर्य हैं।

श्लोक 46 (7.189.46)

नेमौ शक्यौ महेष्वासौ युद्धे क्षपयितुं परैः । इच्छमानौ पुनरिमौ हन्येतां सामरं जगत् ॥

nemau śakyau maheṣvāsau yuddhe kṣapayituṃ paraiḥ | icchamānau punarimau hanyetāṃ sāmaraṃ jagat

ये दोनों महाधनुर्धर युद्ध में दूसरों से क्षीण नहीं किए जा सकते; यदि ये चाहें तो देवताओं सहित जगत् का संहार कर दें।"

श्लोक 47 (7.189.47)

इत्यब्रुवन्महाराज दृष्ट्वा तौ पुरुषर्षभौ । अन्तर्हितानि भूतानि प्रकाशानि च सर्वशः ॥

ityabruvanmahārāja dṛṣṭvā tau puruṣarṣabhau | antarhitāni bhūtāni prakāśāni ca sarvaśaḥ

हे महाराज! उन दोनों पुरुषश्रेष्ठों को देखकर वे ऐसा कहने लगे; और अदृश्य तथा दृश्य, दोनों प्रकार के प्राणी चारों ओर उपस्थित थे।

श्लोक 48 (7.189.48)

यदा द्रोणं महाराज विशेषयति पाण्डवः । ततो द्रोणो ब्राह्ममस्त्रं प्रादुश्चक्रे महामतिः ॥

yadā droṇaṃ mahārāja viśeṣayati pāṇḍavaḥ | tato droṇo brāhmamastraṃ prāduścakre mahāmatiḥ

हे महाराज! जब पाण्डव अर्जुन द्रोण से बढ़ने लगा, तब बुद्धिमान द्रोण ने ब्रह्मास्त्र प्रकट किया।

श्लोक 49 (7.189.49)

तदस्त्रं संहितं राजन्घोररूपं महाहवे । सन्तापयद्रणे पार्थं भूतान्यन्तर्हितानि च ॥

tadastraṃ saṃhitaṃ rājanghorarūpaṃ mahāhave | santāpayadraṇe pārthaṃ bhūtānyantarhitāni ca

हे राजन्! धनुष पर चढ़ा हुआ वह भयंकर रूप वाला अस्त्र उस महायुद्ध में पार्थ को और छिपे हुए प्राणियों को भी तपाने लगा।

श्लोक 50 (7.189.50)

ततश्चचाल पृथिवी सपर्वतवनद्रुमा । सरितश्च प्रतिस्रोतः प्रवहुर्वै क्षणान्तरम् । ववौ च विषमो वायुः सागराश्चापि चुक्षुभुः ॥

tataścacāla pṛthivī saparvatavanadrumā | saritaśca pratisrotaḥ pravahurvai kṣaṇāntaram | vavau ca viṣamo vāyuḥ sāgarāścāpi cukṣubhuḥ

तब पर्वत, वन और वृक्षों सहित पृथ्वी हिल उठी; नदियाँ क्षण भर के लिए उलटी धारा में बहने लगीं; विषम वायु चली और समुद्र भी क्षुब्ध हो गए।

श्लोक 51 (7.189.51)

ततस्त्रासो महानासीत्कुरुपाण्डवसेनयोः । सर्वेषां चैव भूतानामुद्यतेऽस्त्रे महात्मना ॥

tatastrāso mahānāsītkurupāṇḍavasenayoḥ | sarveṣāṃ caiva bhūtānāmudyate'stre mahātmanā

तब उस महात्मा के अस्त्र उठाने पर कौरवों और पाण्डवों की सेनाओं में और समस्त प्राणियों में भारी भय छा गया।

श्लोक 52 (7.189.52)

ततः पार्थोऽप्यसम्भ्रान्तस्तदस्त्रं प्रतिजघ्निवान् । ब्रह्मास्त्रेणैव राजेन्द्र ततः सर्वमशीशमत् ॥

tataḥ pārtho'pyasambhrāntastadastraṃ pratijaghnivān | brahmāstreṇaiva rājendra tataḥ sarvamaśīśamat

तब पार्थ ने भी विचलित हुए बिना, हे राजेन्द्र! ब्रह्मास्त्र से ही उस अस्त्र को काट दिया और सब कुछ शान्त कर दिया।

श्लोक 53 (7.189.53)

यदा न गम्यते पारं तयोरन्यतरस्य वा । ततः सङ्कुलयुद्धेन तद्युद्धं व्याकुलीकृतम् ॥

yadā na gamyate pāraṃ tayoranyatarasya vā | tataḥ saṅkulayuddhena tadyuddhaṃ vyākulīkṛtam

जब उन दोनों में से कोई किसी का पार न पा सका, तब सामान्य संकुल युद्ध से वह युद्ध उलझ गया।

श्लोक 54 (7.189.54)

नाज्ञायत ततः किञ्चित्पुनरेव विशाम्पते । प्रवृत्ते तुमुले युद्धे द्रोणपाण्डवयोर्नृप ॥

nājñāyata tataḥ kiñcitpunareva viśāmpate | pravṛtte tumule yuddhe droṇapāṇḍavayornṛpa

हे विशाम्पते! द्रोण और अर्जुन का तुमुल युद्ध चलते रहने पर, हे राजन्! फिर कुछ भी पहचाना नहीं जा सका।

श्लोक 55 (7.189.55)

द्रोणो मुक्त्वा रणे पार्थं पाञ्चालानन्वधावत । अर्जुनोपि रणे द्रोणं त्यक्त्वा प्राद्रवयत्कुरून् ॥

droṇo muktvā raṇe pārthaṃ pāñcālānanvadhāvata | arjunopi raṇe droṇaṃ tyaktvā prādravayatkurūn

द्रोण पार्थ को छोड़कर पाञ्चालों के पीछे दौड़े, और अर्जुन भी द्रोण को छोड़कर कौरवों को खदेड़ने लगा।

श्लोक 56 (7.189.56)

शरौघैरथ ताभ्यां तु छायाभूतं महामृधे । तुमुलं प्रबभौ राजन्सर्वस्य जगतो भयम् ॥

śaraughairatha tābhyāṃ tu chāyābhūtaṃ mahāmṛdhe | tumulaṃ prababhau rājansarvasya jagato bhayam

उन दोनों के बाण-समूहों से वह महायुद्ध छाया-सा अँधेरा हो गया; हे राजन्! समस्त जगत् के लिए भयंकर तुमुल प्रकट हो उठा।

श्लोक 57 (7.189.57)

शरजालैः समाकीर्णे मेघजालैरिवाम्बरे । नापतच्च ततः कश्चिदन्तरिक्षचरस्तदा ॥

śarajālaiḥ samākīrṇe meghajālairivāmbare | nāpatacca tataḥ kaścidantarikṣacarastadā

आकाश के बाणों के जालों से भर जाने पर, मानो मेघ-जालों से घिर गया हो, उस समय आकाशचारी कोई भी प्राणी नीचे नहीं उतर सका।

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