द्रोण पर्व · अध्याय 196
अश्वत्थामा की प्रतिज्ञा और नारायणास्त्र
सञ्जय बताते हैं कि दुर्योधन से बात करते समय अश्वत्थामा शोक और क्रोध से भरा हुआ है। अश्वत्थामा उस छल की निन्दा करता है जिससे उसके पिता से शस्त्र रखवाए गए और उनके केश पकड़े गए, और पाञ्चालों तथा धृष्टद्युम्न को मारने की शपथ लेता है। वह बताता है कि द्रोण को नारायणास्त्र देवता से कैसे मिला, इस चेतावनी के साथ कि उसे कभी जल्दबाज़ी में प्रयोग न किया जाए और वह केवल रथ तथा शस्त्र छोड़कर शत्रु की शरण जाने से ही शान्त होता है। कौरव-सेना लौटकर शंख और भेरियाँ बजाती है, और अश्वत्थामा आचमन करके उस अस्त्र को प्रकट करता है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.196.1)
छद्मना निहतं श्रुत्वा पितरं पापकर्मणा । बाष्पेणापूर्यत द्रौणी रोषेण च नरर्षभ ॥
chadmanā nihataṃ śrutvā pitaraṃ pāpakarmaṇā | bāṣpeṇāpūryata drauṇī roṣeṇa ca nararṣabha
पिता को पापकर्मी के हाथों छल से मारा गया सुनकर द्रोणपुत्र, हे नरश्रेष्ठ, आँसुओं और क्रोध से भर गया।
श्लोक 2 (7.196.2)
तस्य क्रुद्धस्य राजेन्द्र वपुर्दीप्तमदृश्यत । अन्तकस्येव भूतानि जिहीर्षोः कालपर्यये ॥
tasya kruddhasya rājendra vapurdīptamadṛśyata | antakasyeva bhūtāni jihīrṣoḥ kālaparyaye
हे राजेन्द्र, क्रोध में भरे उसके शरीर पर दीप्त रूप दिखाई देने लगा, जैसे युग के बदलने पर प्राणियों को हर ले जाने की इच्छा करनेवाले यमराज का।
श्लोक 3 (7.196.3)
अश्रुपूर्णे ततो नेत्रे व्यपमृज्य पुनः पुनः । उवाच कोपान्निःश्वस्य दुर्योधनमिदं वचः ॥
aśrupūrṇe tato netre vyapamṛjya punaḥ punaḥ | uvāca kopānniḥśvasya duryodhanamidaṃ vacaḥ
आँसुओं से भरी आँखों को बार-बार पोंछकर, क्रोध से साँस भरकर उसने दुर्योधन से ये वचन कहे—
अश्वत्थामोवाच
श्लोक 4 (7.196.4)
पिता मम यथा क्षुद्रैर्न्यस्तशस्त्रो निपातितः । धर्मध्वजवता पापं कृतं तद्विदितं मम । अनार्यं सुनृशंसं च धर्मपुत्रस्य मे श्रुतम् ॥
pitā mama yathā kṣudrairnyastaśastro nipātitaḥ | dharmadhvajavatā pāpaṃ kṛtaṃ tadviditaṃ mama | anāryaṃ sunṛśaṃsaṃ ca dharmaputrasya me śrutam
मेरे पिता, जिन्होंने शस्त्र रख दिए थे, कैसे नीच लोगों के हाथों मारे गए, और धर्म की ध्वजा उठानेवाले ने जो पाप किया—वह मुझे ज्ञात है; और धर्मपुत्र का वह अनार्य तथा अत्यन्त क्रूर कर्म भी मैंने सुना है।
श्लोक 5 (7.196.5)
युद्धेष्वपि प्रवृत्तानां ध्रुवं जयपराजयौ । द्वयमेतद्भवेद्राजन्वधस्तत्र प्रशस्यते ॥
yuddheṣvapi pravṛttānāṃ dhruvaṃ jayaparājayau | dvayametadbhavedrājanvadhastatra praśasyate
युद्ध में लगे लोगों के लिए जय और पराजय निश्चित हैं; इन दोनों में से एक होगी, हे राजन्, और उनमें मृत्यु ही प्रशंसनीय है।
श्लोक 6 (7.196.6)
न्यायवृत्तो वधो यस्तु सङ्ग्रामे युध्यतो भवेत् । न स दुःखाय भवति तथा दृष्टो हि स द्विजैः ॥
nyāyavṛtto vadho yastu saṅgrāme yudhyato bhavet | na sa duḥkhāya bhavati tathā dṛṣṭo hi sa dvijaiḥ
युद्ध में लड़ते हुए जो मृत्यु न्यायोचित आचरण के अनुसार हो, वह दुःख का कारण नहीं बनती; द्विजों ने उसे ऐसा ही देखा है।
श्लोक 7 (7.196.7)
गतः स वीरलोकाय पिता मम न संशयः । न शोच्यः पुरुषव्याघ्र यस्तदा निधनं गतः ॥
gataḥ sa vīralokāya pitā mama na saṃśayaḥ | na śocyaḥ puruṣavyāghra yastadā nidhanaṃ gataḥ
मेरे पिता वीरों के लोक को गए हैं, इसमें सन्देह नहीं; जो इस प्रकार मृत्यु को प्राप्त हुआ, उसके लिए शोक नहीं करना चाहिए, हे पुरुषव्याघ्र।
श्लोक 8 (7.196.8)
यत्तु धर्मप्रवृत्तः सन्केशग्रहणमाप्तवान् । पश्यतां सर्वसैन्यानां तन्मे मर्माणि कृन्तति ॥
yattu dharmapravṛttaḥ sankeśagrahaṇamāptavān | paśyatāṃ sarvasainyānāṃ tanme marmāṇi kṛntati
पर यह कि धर्म में लगे रहते हुए भी उन्हें समस्त सेनाओं के देखते-देखते केश पकड़े जाने का अपमान सहना पड़ा—यही मेरे मर्मों को काटता है।
श्लोक 9 (7.196.9)
मयि जीवति यत्तातः केशग्रहमवाप्तवान् । कथमन्ये करिष्यन्ति पुत्रेभ्यः पुत्रिणः स्पृहाम् ॥
mayi jīvati yattātaḥ keśagrahamavāptavān | kathamanye kariṣyanti putrebhyaḥ putriṇaḥ spṛhām
मेरे जीते-जी मेरे पिता के केश पकड़े गए—तब दूसरे पिता अपने पुत्रों से कैसे आशा रखेंगे?
श्लोक 10 (7.196.10)
कामात्क्रोधादविज्ञानाद्दर्पाद्बाल्येन वा पुनः । विधर्मकाणि कुर्वन्ति तथा परिभवन्ति च ॥
kāmātkrodhādavijñānāddarpādbālyena vā punaḥ | vidharmakāṇi kurvanti tathā paribhavanti ca
काम, क्रोध, अज्ञान, अभिमान या लड़कपन के कारण लोग धर्म-विरुद्ध कर्म करते हैं और दूसरों का अपमान भी करते हैं।
श्लोक 11 (7.196.11)
तदिदं पार्षतेनेह महदाधर्मिकं कृतम् । अवज्ञाय च मां नूनं नृशंसेन दुरात्मना ॥
tadidaṃ pārṣateneha mahadādharmikaṃ kṛtam | avajñāya ca māṃ nūnaṃ nṛśaṃsena durātmanā
पार्षत ने, उस नृशंस और दुष्टात्मा ने, निश्चय ही मेरा तिरस्कार करके यह बड़ा अधर्म का कार्य किया है।
श्लोक 12 (7.196.12)
तस्यानुबन्धं द्रष्टाऽसौ धृष्टद्युम्नः सुदारुणम् । अकार्यं परमं कृत्वा मिथ्यावादी च पाण्डवः ॥
tasyānubandhaṃ draṣṭā'sau dhṛṣṭadyumnaḥ sudāruṇam | akāryaṃ paramaṃ kṛtvā mithyāvādī ca pāṇḍavaḥ
यह धृष्टद्युम्न अपने उस घोर कर्म का अत्यन्त भयंकर फल देखेगा, क्योंकि उसने अत्यन्त निषिद्ध कर्म किया है—और असत्य बोलनेवाला पाण्डव भी देखेगा।
श्लोक 13 (7.196.13)
यो ह्यसौ छद्मनाऽऽचार्यं शस्त्रं सन्न्यासयत्तदा । तस्याद्य धर्मराजस्य भूमिः पास्यति शोणितम् ॥
yo hyasau chadmanā''cāryaṃ śastraṃ sannyāsayattadā | tasyādya dharmarājasya bhūmiḥ pāsyati śoṇitam
जिस धर्मराज ने छल से आचार्य के शस्त्र रखवाए, आज पृथ्वी उसका रक्त पिएगी।
श्लोक 14 (7.196.14)
शपे सत्येन कौरव्य इष्टापूर्तेन चैव ह । अहत्वा सर्वपाञ्चालाञ्जीवेयं न कथञ्चन ॥
śape satyena kauravya iṣṭāpūrtena caiva ha | ahatvā sarvapāñcālāñjīveyaṃ na kathañcana
हे कौरव्य, मैं सत्य की और अपने यज्ञ तथा पुण्य-कर्मों की शपथ लेता हूँ कि सब पाञ्चालों को मारे बिना मैं किसी प्रकार जीवित नहीं रहूँगा।
श्लोक 15 (7.196.15)
सर्वोपायैर्यतिष्यामि पाञ्चालानामहं वधे । धृष्टद्युम्नं च समरे हन्ताऽहं पापकारिणम् ॥
sarvopāyairyatiṣyāmi pāñcālānāmahaṃ vadhe | dhṛṣṭadyumnaṃ ca samare hantā'haṃ pāpakāriṇam
मैं सब उपायों से पाञ्चालों के वध का यत्न करूँगा, और उस पापी धृष्टद्युम्न को युद्ध में मारूँगा।
श्लोक 16 (7.196.16)
कर्मणा येन तेनेह मृदुना दारुणेन च । पाञ्चालानां वधं कृत्वा शान्तिं लब्धास्मि कौरव ॥
karmaṇā yena teneha mṛdunā dāruṇena ca | pāñcālānāṃ vadhaṃ kṛtvā śāntiṃ labdhāsmi kaurava
हे कौरव, जिस भी कर्म से, कोमल हो या भयंकर, पाञ्चालों का वध करके मैं शान्ति पाऊँगा।
श्लोक 17 (7.196.17)
यदर्थं पुरुषव्याघ्र पुत्रानिच्छन्ति मानवाः । प्रेत्य चेह च सम्प्राप्तात्त्रायन्ते महतो भयात् ॥
yadarthaṃ puruṣavyāghra putrānicchanti mānavāḥ | pretya ceha ca samprāptāttrāyante mahato bhayāt
हे पुरुषव्याघ्र, जिस प्रयोजन से लोग पुत्र चाहते हैं—कि वे इस लोक में और परलोक में आ पड़े महान् भय से उनकी रक्षा करें—
श्लोक 18 (7.196.18)
पित्रा तु मम साऽवस्था प्राप्ता निर्बन्धुना यथा । मयि शैलप्रतीकाशे पुत्रे शिष्ये च जीवति ॥
pitrā tu mama sā'vasthā prāptā nirbandhunā yathā | mayi śailapratīkāśe putre śiṣye ca jīvati
मेरे पिता की ऐसी दशा हुई मानो उनका कोई सगा ही न हो, जबकि मैं, पर्वत के समान दृढ़ उनका पुत्र और शिष्य, जीवित था।
श्लोक 19 (7.196.19)
धिङ्ममास्त्राणि दिव्यानि धिग्बाहू धिक्पराक्रमम् । यं स्म द्रोणः सुतं प्राप्य केशग्रहमवाप्तवान् ॥
dhiṅmamāstrāṇi divyāni dhigbāhū dhikparākramam | yaṃ sma droṇaḥ sutaṃ prāpya keśagrahamavāptavān
धिक्कार है मेरे दिव्य अस्त्रों को, धिक्कार है मेरी भुजाओं को, धिक्कार है मेरे पराक्रम को, कि मुझ-जैसे पुत्र को पाकर भी द्रोण के केश पकड़े गए!
श्लोक 20 (7.196.20)
स तथाहं करिष्यामि यथा भरतसत्तम । परलोकगतस्यापि भविष्याम्यनृणः पितुः ॥
sa tathāhaṃ kariṣyāmi yathā bharatasattama | paralokagatasyāpi bhaviṣyāmyanṛṇaḥ pituḥ
हे भरतश्रेष्ठ, मैं ऐसा करूँगा कि परलोक में गए हुए पिता के ऋण से भी मैं मुक्त हो जाऊँगा।
श्लोक 21 (7.196.21)
आर्येण हि न वक्तव्या कदाचित्स्तुतिरात्मनः । पितुर्वधममृष्यंस्तु वक्ष्याम्यद्येह पौरुषम् ॥
āryeṇa hi na vaktavyā kadācitstutirātmanaḥ | piturvadhamamṛṣyaṃstu vakṣyāmyadyeha pauruṣam
श्रेष्ठ पुरुष को कभी अपनी स्तुति नहीं करनी चाहिए; पर पिता का वध सहन न कर पाने के कारण मैं आज यहाँ अपना पौरुष बताऊँगा।
श्लोक 22 (7.196.22)
अद्य पश्यन्तु मे वीर्यं पाण्डवाः सजनार्दनाः । मृद्नतः सर्वसैन्यानि युगान्तमिव कुर्वतः ॥
adya paśyantu me vīryaṃ pāṇḍavāḥ sajanārdanāḥ | mṛdnataḥ sarvasainyāni yugāntamiva kurvataḥ
आज पाण्डव जनार्दन के साथ मेरा पराक्रम देखें, जब मैं युगान्त की तरह उनकी सारी सेनाओं को रौंदूँगा।
श्लोक 23 (7.196.23)
न हि देवा न गन्धर्वा नासुरा न च राक्षसाः । अद्य शक्ता रणे जेतुं रथस्थं मां नरर्षभाः ॥
na hi devā na gandharvā nāsurā na ca rākṣasāḥ | adya śaktā raṇe jetuṃ rathasthaṃ māṃ nararṣabhāḥ
हे नरश्रेष्ठ, आज रथ पर खड़े मुझ को युद्ध में न देवता, न गन्धर्व, न असुर और न राक्षस ही जीत सकते हैं।
श्लोक 24 (7.196.24)
मदन्यो नास्ति लोकेऽस्मिन्नर्जुनाद्वाऽस्त्रवित्क्वचित् । अहं हि ज्वलतां मध्ये मयूखानामिवांशुमान् । प्रयोक्ता देवसृष्टानामस्त्राणां पृतनागतः ॥
madanyo nāsti loke'sminnarjunādvā'stravitkvacit | ahaṃ hi jvalatāṃ madhye mayūkhānāmivāṃśumān | prayoktā devasṛṣṭānāmastrāṇāṃ pṛtanāgataḥ
इस लोक में मेरे और अर्जुन के सिवा अस्त्रों को जाननेवाला कोई नहीं है। मैं दहकती किरणों के बीच सूर्य की तरह, सेना में खड़ा, देवताओं के रचे अस्त्रों का प्रयोग करनेवाला हूँ।
श्लोक 25 (7.196.25)
भृशमिष्वसनादद्य मत्प्रयुक्ता महाहवे । दर्शयन्तः शरा वीर्यं प्रमथिष्यन्ति पाण्डवान् ॥
bhṛśamiṣvasanādadya matprayuktā mahāhave | darśayantaḥ śarā vīryaṃ pramathiṣyanti pāṇḍavān
आज महायुद्ध में धनुष से बड़े वेग से छोड़े गए मेरे बाण अपना बल दिखाते हुए पाण्डवों को कुचल डालेंगे।
श्लोक 26 (7.196.26)
अद्य सर्वा दिशो राजन्धाराभिरिव सङ्कुलाः । आवृताः पत्रिभिस्तीक्ष्णैर्द्रष्टारो मामकैरिह ॥
adya sarvā diśo rājandhārābhiriva saṅkulāḥ | āvṛtāḥ patribhistīkṣṇairdraṣṭāro māmakairiha
हे राजन्, आज सब दिशाएँ मानो वर्षा की धाराओं से भरी-सी, तीखे पंखदार बाणों से ढँकी हुई होंगी; यहाँ के दर्शक उन्हें मेरे ही बाणों से भरा देखेंगे।
श्लोक 27 (7.196.27)
विकिरञ्छरजालानि सर्वतो भैरवस्वनान् । शत्रून्निपातयिष्यामि महावात इव द्रुमान् ॥
vikirañcharajālāni sarvato bhairavasvanān | śatrūnnipātayiṣyāmi mahāvāta iva drumān
चारों ओर भयंकर ध्वनिवाले बाणों के जाल बिखेरता हुआ मैं शत्रुओं को वैसे ही गिरा दूँगा जैसे प्रचण्ड वायु वृक्षों को।
श्लोक 28 (7.196.28)
न हि जानाति बीभत्सुस्तदस्त्रं न जनार्दनः । न भीमसेनो न यमौ न च राजा युधिष्ठिरः ॥
na hi jānāti bībhatsustadastraṃ na janārdanaḥ | na bhīmaseno na yamau na ca rājā yudhiṣṭhiraḥ
उस अस्त्र को न बीभत्सु जानता है, न जनार्दन, न भीमसेन, न दोनों जुड़वाँ भाई, और न राजा युधिष्ठिर,
श्लोक 29 (7.196.29)
न पार्षतो दुरात्माऽसौ न शिखण्डी न सात्यकिः । यदिदं मयि कौरव्य सकल्यं सनिवर्तनम् ॥
na pārṣato durātmā'sau na śikhaṇḍī na sātyakiḥ | yadidaṃ mayi kauravya sakalyaṃ sanivartanam
न दुष्ट पार्षत, न शिखण्डी, न सात्यकि—हे कौरव्य, वह अस्त्र जो मेरे पास है, अपने प्रयोग और उपसंहार, दोनों सहित पूर्ण।
श्लोक 30 (7.196.30)
नारायणाय मे पित्रा प्रणम्य विधिपूर्वकम् । उपहारः पुरा दत्तो ब्रह्मरूप उपस्थितः ॥
nārāyaṇāya me pitrā praṇamya vidhipūrvakam | upahāraḥ purā datto brahmarūpa upasthitaḥ
पूर्वकाल में मेरे पिता ने विधिपूर्वक नारायण को प्रणाम करके उन्हें वैदिक मन्त्रों के रूप में उपहार अर्पित किया था।
श्लोक 31 (7.196.31)
तं स्वयं प्रतिगृह्याथ भगवान्स वरं ददौ । वव्रे पिता मे परममस्त्रं नारायणं ततः ॥
taṃ svayaṃ pratigṛhyātha bhagavānsa varaṃ dadau | vavre pitā me paramamastraṃ nārāyaṇaṃ tataḥ
उसे स्वयं स्वीकार करके भगवान् ने वर दिया; तब मेरे पिता ने परम अस्त्र नारायण माँगा।
श्लोक 32 (7.196.32)
अथैनमब्रवीद्राजन्भगवान्देवसत्तमः । भविता त्वत्समो नान्यः कश्चिद्युधि नरः क्वचित् ॥
athainamabravīdrājanbhagavāndevasattamaḥ | bhavitā tvatsamo nānyaḥ kaścidyudhi naraḥ kvacit
तब, हे राजन्, देवश्रेष्ठ भगवान् ने उनसे कहा—“युद्ध में कहीं भी तुम्हारे समान कोई दूसरा मनुष्य नहीं होगा।”
नारायण उवाच
श्लोक 33 (7.196.33)
न त्विदं सहसा ब्रह्मन्प्रयोक्तव्यं कथञ्चन । न ह्येतदस्त्रमन्यत्र वधाच्छत्रोर्निवर्तते ॥
na tvidaṃ sahasā brahmanprayoktavyaṃ kathañcana | na hyetadastramanyatra vadhācchatrornivartate
पर हे ब्राह्मण, इसका प्रयोग कभी जल्दबाज़ी में न करना; क्योंकि शत्रु के वध के सिवा यह अस्त्र कहीं नहीं लौटता।
श्लोक 34 (7.196.34)
न चैतच्छक्यते जेतुं को न वध्येत वै प्रभो । अवध्यमपि हन्याद्वि तस्मान्नैतत्प्रयोजयेत् ॥
na caitacchakyate jetuṃ ko na vadhyeta vai prabho | avadhyamapi hanyādvi tasmānnaitatprayojayet
न इसे जीता जा सकता है। हे प्रभो, इससे कौन नहीं मारा जाएगा? यह उसे भी मार सकता है जिसे मारा नहीं जाना चाहिए; इसलिए इसका प्रयोग नहीं करना चाहिए।
श्लोक 35 (7.196.35)
अथ सङ्ख्ये रथस्यैव शस्त्राणां च विसर्जनम् । प्रयाचनं च शत्रूणां गमनं शरणस्य च ॥
atha saṅkhye rathasyaiva śastrāṇāṃ ca visarjanam | prayācanaṃ ca śatrūṇāṃ gamanaṃ śaraṇasya ca
युद्ध में रथ और शस्त्रों को छोड़ देना, शत्रुओं से याचना करना और उनकी शरण में चले जाना—
श्लोक 36 (7.196.36)
एते प्रशमने योगा महास्त्रस्य परन्तप । सर्वथा पीडितो हिंस्यादवध्यान्पीडयन्रणे ॥
ete praśamane yogā mahāstrasya parantapa | sarvathā pīḍito hiṃsyādavadhyānpīḍayanraṇe
हे परन्तप, यही इस महान् अस्त्र को शान्त करने के उपाय हैं। किसी और प्रकार से रोके जाने पर यह युद्ध में उन्हें भी पीड़ा देता हुआ मार डालेगा जो अवध्य हैं।
अश्वत्थामोवाच
श्लोक 37 (7.196.37)
तज्जग्राह पिता मह्यमब्रवीच्चैव स प्रभुः । त्वं वधिष्यसि सर्वाणि शस्त्रवर्षाण्यनेकशः । अनेनास्त्रेण सङ्ग्रामे तेजसा च ज्वलिष्यसि ॥
tajjagrāha pitā mahyamabravīccaiva sa prabhuḥ | tvaṃ vadhiṣyasi sarvāṇi śastravarṣāṇyanekaśaḥ | anenāstreṇa saṅgrāme tejasā ca jvaliṣyasi
मेरे पिता ने उसे ग्रहण किया और उन प्रभु ने उनसे यह भी कहा—“इस अस्त्र से तुम युद्ध में शस्त्रों की सभी वर्षाओं को अनेक बार नष्ट करोगे और तेज से दीप्त होओगे।”
श्लोक 38 (7.196.38)
एवमुक्त्वा स भगवान्दिवमाचक्रमे प्रभुः । एतन्नारायणादस्त्रं तत्प्राप्तं पितृबन्धुना ॥
evamuktvā sa bhagavāndivamācakrame prabhuḥ | etannārāyaṇādastraṃ tatprāptaṃ pitṛbandhunā
यह कहकर वे भगवान् प्रभु आकाश-मार्ग से चले गए। नारायण का यह अस्त्र मुझ पितृबन्धु ने प्राप्त किया है।
श्लोक 39 (7.196.39)
तेनाहं पाण्डवांश्चैव पाञ्चालान्मात्स्यकेकयान् । विद्रावयिष्यामि रणे शचीपतिरिवासुरान् ॥
tenāhaṃ pāṇḍavāṃścaiva pāñcālānmātsyakekayān | vidrāvayiṣyāmi raṇe śacīpatirivāsurān
उसके द्वारा मैं युद्ध में पाण्डवों, पाञ्चालों, मत्स्यों और केकयों को वैसे ही भगा दूँगा जैसे शचीपति इन्द्र असुरों को।
श्लोक 40 (7.196.40)
यथायथाऽहमिच्छेयं तथा भूत्वा शरा मम । निपतेयुः सपत्नेषु विक्रमत्स्वपि भारत ॥
yathāyathā'hamiccheyaṃ tathā bhūtvā śarā mama | nipateyuḥ sapatneṣu vikramatsvapi bhārata
हे भारत, मैं जैसे-जैसे चाहूँगा, मेरे बाण वैसे ही बनकर पराक्रम दिखाते हुए शत्रुओं पर भी गिरेंगे।
श्लोक 41 (7.196.41)
यथेष्टमश्मवर्षेण प्रवर्षिष्ये रणे स्थितः । अयोमुखैश्च विहगैर्द्रावयिष्ये महारथान् ॥
yatheṣṭamaśmavarṣeṇa pravarṣiṣye raṇe sthitaḥ | ayomukhaiśca vihagairdrāvayiṣye mahārathān
युद्ध में खड़ा होकर मैं इच्छानुसार पत्थरों की वर्षा करूँगा, और लोहे की नोकवाले पक्षी-रूपी बाणों से महारथियों को भगा दूँगा।
श्लोक 42 (7.196.42)
परश्वथांश्च निशितानुत्स्रक्ष्येऽहमसंशयम् ॥
paraśvathāṃśca niśitānutsrakṣye'hamasaṃśayam
और निःसन्देह तीखे फरसे भी फेंकूँगा।
श्लोक 43 (7.196.43)
सोऽहं नारायणास्त्रेण महता शत्रुतापनः । शत्रून्विध्वंसयिष्यामि कदर्थीकृत्य पाण्डवान् ॥
so'haṃ nārāyaṇāstreṇa mahatā śatrutāpanaḥ | śatrūnvidhvaṃsayiṣyāmi kadarthīkṛtya pāṇḍavān
ऐसा मैं, शत्रुओं को तपानेवाला, महान् नारायणास्त्र से पाण्डवों को तुच्छ बनाकर शत्रुओं का नाश करूँगा।
श्लोक 44 (7.196.44)
मित्रब्रह्मगुरुद्रोही जाल्मकः सुविगर्हितः । पाञ्चालापशदश्चाद्य न मे जीवन्विमोक्ष्यते ॥
mitrabrahmagurudrohī jālmakaḥ suvigarhitaḥ | pāñcālāpaśadaścādya na me jīvanvimokṣyate
मित्र, ब्राह्मण और गुरु से द्रोह करनेवाला, अत्यन्त निन्दित वह नीच, पाञ्चालों की वह कलङ्क-सन्तान—आज वह जीता हुआ मुझसे नहीं बचेगा।
सञ्जय उवाच
श्लोक 45 (7.196.45)
तच्छ्रुत्वा द्रोणपुत्रस्य पर्यवर्तत वाहिनी । ततः सर्वे महाशङ्खान्दध्मुः पुरुषसत्तमाः । भेरीश्चाभ्यहनन्हृष्टा डिण्डिभांश्च सहस्रशः ॥
tacchrutvā droṇaputrasya paryavartata vāhinī | tataḥ sarve mahāśaṅkhāndadhmuḥ puruṣasattamāḥ | bherīścābhyahananhṛṣṭā ḍiṇḍibhāṃśca sahasraśaḥ
द्रोणपुत्र की बात सुनकर सेना लौट पड़ी; तब उन सब पुरुषश्रेष्ठों ने बड़े शंख बजाए, और हर्षित होकर भेरियाँ तथा हज़ारों डिण्डिम बजाए।
श्लोक 46 (7.196.46)
तथा ननाद वसुधा खुरनेमिप्रपीडिता । स शब्दस्तुमुलः खं द्यां पृथिवीं च व्यनादयत् ॥
tathā nanāda vasudhā khuranemiprapīḍitā | sa śabdastumulaḥ khaṃ dyāṃ pṛthivīṃ ca vyanādayat
तब खुरों और रथ-चक्रों की नेमियों से दबी हुई पृथ्वी गूँज उठी, और उस तुमुल ध्वनि ने आकाश, स्वर्ग और पृथ्वी को गुँजा दिया।
श्लोक 47 (7.196.47)
तं शब्दं पाण्डवाः श्रुत्वा पर्जन्यनिनदोपमम् । समेत्य रथिनां श्रेष्ठाः सहिताश्चाप्यमन्त्रयन् ॥
taṃ śabdaṃ pāṇḍavāḥ śrutvā parjanyaninadopamam | sametya rathināṃ śreṣṭhāḥ sahitāścāpyamantrayan
मेघ की गर्जना के समान उस ध्वनि को सुनकर रथियों में श्रेष्ठ पाण्डव एकत्र हुए और मिलकर विचार करने लगे।
श्लोक 48 (7.196.48)
तथोक्त्वा द्रोणपुत्रस्तु वार्युपस्पृश्य भारत । प्रादुश्चकार तद्दिव्यमस्त्रं नारायणं तदा ॥
tathoktvā droṇaputrastu vāryupaspṛśya bhārata | prāduścakāra taddivyamastraṃ nārāyaṇaṃ tadā
यह कहकर, हे भारत, द्रोणपुत्र ने आचमन किया और तब उस दिव्य नारायणास्त्र को प्रकट किया।