द्रोण पर्व · अध्याय 23
पाण्डव-सेना के अश्व और ध्वज
धृतराष्ट्र के कहने पर सञ्जय उन योद्धाओं के रथ-चिह्न बताते हैं जो द्रोण पर चढ़ आए थे। वे सात्यकि, युधामन्यु और धृष्टद्युम्न से लेकर युधिष्ठिर, द्रुपद, विराट, केकयों, पाण्ड्यराज, घटोत्कच और युयुत्सु तक हर वीर का नाम और उसे ले जाने वाले घोड़ों का रंग गिनाते हैं। फिर वे द्रोण, भीम, युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव, द्रौपदी के पुत्रों, अभिमन्यु और घटोत्कच की ध्वजाओं तथा पाण्डवों और उनके पुत्रों के दिव्य धनुषों का वर्णन करते हैं, और अन्त में ध्वजाओं से ठसाठस भरी उस सेना का चित्र खींचते हैं जिसमें वीरों के नाम और गोत्र पुकारे जा रहे थे।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (7.23.1)
सर्वेषामेव मे ब्रूहि रथचिह्नानि सञ्जय । ये द्रोणमभ्यवर्तन्त क्रुद्धा भीमपुरोगमाः । तान्यहं श्रोतुमिच्छामि विस्तरेण पृथक्पृथक् ॥
sarveṣāmeva me brūhi rathacihnāni sañjaya | ye droṇamabhyavartanta kruddhā bhīmapurogamāḥ | tānyahaṃ śrotumicchāmi vistareṇa pṛthakpṛthak
"सञ्जय, भीम को आगे करके क्रोध में जो द्रोण पर चढ़ आए थे, उन सबके रथ-चिह्न मुझे बताओ। मैं उन्हें विस्तार से, एक-एक करके सुनना चाहता हूँ।"
श्लोक 2 (7.23.2)
दूयते मे मनस्तात द्रोणं प्रति परन्तपम् । श्रुत्वा भीष्मस्य निधनं तद्वदेतद्भविष्यति ॥
dūyate me manastāta droṇaṃ prati parantapam | śrutvā bhīṣmasya nidhanaṃ tadvadetadbhaviṣyati
"तात, शत्रुओं को तपाने वाले द्रोण के लिए मेरा मन जल रहा है। भीष्म की मृत्यु सुनकर जैसा हुआ था, वैसा ही अब भी होगा।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 3 (7.23.3)
ऋक्षवर्णैर्हयैर्दृष्ट्वा व्यायच्छन्तं वृकोदरम् । रजताश्वस्ततः शूरः शैनेयः सन्न्यवर्तत ॥
ṛkṣavarṇairhayairdṛṣṭvā vyāyacchantaṃ vṛkodaram | rajatāśvastataḥ śūraḥ śaineyaḥ sannyavartata
रीछ के रंग के घोड़ों के साथ वृकोदर को रण में जूझते देखकर चाँदी जैसे श्वेत घोड़ोंवाला शूर शैनेय (सात्यकि) लौट पड़ा।
श्लोक 4 (7.23.4)
सारङ्गाश्वो युधामन्युः स्वयं प्रत्वरयन्हयान् । पर्यवर्तत दुर्धर्षः क्रुद्धो द्रोणरथं प्रति ॥
sāraṅgāśvo yudhāmanyuḥ svayaṃ pratvarayanhayān | paryavartata durdharṣaḥ kruddho droṇarathaṃ prati
चितकबरे घोड़ोंवाला दुर्धर्ष युधामन्यु स्वयं घोड़ों को हाँकता हुआ क्रोध से द्रोण के रथ की ओर मुड़ा।
श्लोक 5 (7.23.5)
पारावतसवर्णैस्तु हेमभाण्डैर्महाजवैः । पाञ्चालराजस्य सुतो धृष्टद्युम्नो न्यवर्तत ॥
pārāvatasavarṇaistu hemabhāṇḍairmahājavaiḥ | pāñcālarājasya suto dhṛṣṭadyumno nyavartata
पाञ्चालराज का पुत्र धृष्टद्युम्न कबूतर के रंग के, सोने के साज से सजे और अति वेगवान् घोड़ों पर लौट आया।
श्लोक 6 (7.23.6)
पितरं तु परिप्रेप्सुः क्षत्रधर्मा यतव्रतः । सिद्धिं चास्य परां काङ्क्षञ्शोणाश्वः सन्न्यवर्तत ॥
pitaraṃ tu pariprepsuḥ kṣatradharmā yatavrataḥ | siddhiṃ cāsya parāṃ kāṅkṣañśoṇāśvaḥ sannyavartata
पिता की रक्षा चाहने वाला, क्षत्रिय-धर्म का पालक और दृढ़व्रती वह लाल घोड़ोंवाला वीर, उनकी परम सिद्धि की कामना करता हुआ लौटा।
श्लोक 7 (7.23.7)
पद्मपत्रनिभांश्चाश्वान्मल्लिकाक्षान्स्वलङ्कृतान् । शैखण्डिः क्षत्रदेवस्तु स्वयं प्रत्वरयन्ययौ ॥
padmapatranibhāṃścāśvānmallikākṣānsvalaṅkṛtān | śaikhaṇḍiḥ kṣatradevastu svayaṃ pratvarayanyayau
शिखण्डी का पुत्र क्षत्रदेव कमल-पत्र के रंग के, निर्मल नेत्रों वाले और सुसज्जित घोड़ों को स्वयं हाँकता हुआ आगे बढ़ा।
श्लोक 8 (7.23.8)
दर्शनीयास्तु काम्भोजाः शुकपत्रपरिच्छदाः । वहन्तो नकुलं शीघ्रं तावकानभिदुद्रुवुः ॥
darśanīyāstu kāmbhojāḥ śukapatraparicchadāḥ | vahanto nakulaṃ śīghraṃ tāvakānabhidudruvuḥ
तोते के पंख जैसे हरे रोमों वाले सुन्दर काम्भोज घोड़े नकुल को शीघ्रता से लेकर आपके योद्धाओं पर टूट पड़े।
श्लोक 9 (7.23.9)
कृष्णास्तु मेघसङ्काशा अवहन्नुत्तमौजसम् । दुर्धर्षायाभिसन्धाय क्रुद्धं युद्धाय भारत ॥
kṛṣṇāstu meghasaṅkāśā avahannuttamaujasam | durdharṣāyābhisandhāya kruddhaṃ yuddhāya bhārata
हे भारत, मेघ जैसे काले घोड़े उत्तमौजा को ले चले, जो क्रोध में उस दुर्धर्ष शत्रु से युद्ध करने को तत्पर था।
श्लोक 10 (7.23.10)
तथा तित्तिरिकल्माषा हया वातसमा जवे । अवहंस्तुमुले युद्धे सहदेवमुदायुधम् ॥
tathā tittirikalmāṣā hayā vātasamā jave | avahaṃstumule yuddhe sahadevamudāyudham
इसी प्रकार तीतर जैसे चितकबरे, वायु के समान वेगवान् घोड़े अस्त्र उठाए हुए सहदेव को उस घमासान युद्ध में ले चले।
श्लोक 11 (7.23.11)
दन्तवर्णास्तु राजानं कालवाला युधिष्ठिरम् । भीमवेगा नरव्याघ्रमवहन्वातरंहसः ॥
dantavarṇāstu rājānaṃ kālavālā yudhiṣṭhiram | bhīmavegā naravyāghramavahanvātaraṃhasaḥ
हाथी-दाँत जैसे श्वेत, काली पूँछोंवाले, भयंकर वेगवाले और वायु जैसी गति के घोड़े नरव्याघ्र राजा युधिष्ठिर को ले चले।
श्लोक 12 (7.23.12)
हेमोत्तमप्रतिच्छन्नैर्हयैर्वातसमैर्जवे । अभ्यवर्तन्त सैन्यानि सर्वाण्येव युधिष्ठिरम् ॥
hemottamapraticchannairhayairvātasamairjave | abhyavartanta sainyāni sarvāṇyeva yudhiṣṭhiram
उत्तम सोने से ढके, वायु जैसे वेगवान् घोड़ों के साथ सारी सेनाएँ युधिष्ठिर को घेरकर आगे बढ़ीं।
श्लोक 13 (7.23.13)
राज्ञस्त्वनन्तरो राजा पाञ्चाल्यो द्रुपदोऽभवत् । जातरूपमयच्छत्रः सर्वैस्तैरभिरक्षितः ॥
rājñastvanantaro rājā pāñcālyo drupado'bhavat | jātarūpamayacchatraḥ sarvaistairabhirakṣitaḥ
राजा के ठीक पीछे पाञ्चालराज द्रुपद थे, जिनका छत्र सोने का था और जो उन सभी से चारों ओर से रक्षित थे।
श्लोक 14 (7.23.14)
ललामैर्हरिभिर्युक्तः सर्वशब्दक्षमैर्युधि । राज्ञां मध्ये महेष्वासः शान्तभीरभ्यवर्तत ॥
lalāmairharibhiryuktaḥ sarvaśabdakṣamairyudhi | rājñāṃ madhye maheṣvāsaḥ śāntabhīrabhyavartata
रण के सब शब्दों को सह लेने वाले, माथे पर श्वेत चिह्नवाले, पीले-भूरे घोड़ों से जुता हुआ वह निर्भय महाधनुर्धर राजाओं के बीच आगे बढ़ा।
श्लोक 15 (7.23.15)
तं विराटोऽन्वयाच्छीघ्रं सह सर्वैर्महारथैः । केकयाश्च शिखण्डी च धृष्टकेतुस्तथैव च । स्वैः स्वैः सैन्यैः परिवृता मात्स्यराजानमन्वयुः ॥
taṃ virāṭo'nvayācchīghraṃ saha sarvairmahārathaiḥ | kekayāśca śikhaṇḍī ca dhṛṣṭaketustathaiva ca | svaiḥ svaiḥ sainyaiḥ parivṛtā mātsyarājānamanvayuḥ
उनके पीछे विराट अपने सब महारथियों के साथ शीघ्र चले; और केकय, शिखण्डी तथा धृष्टकेतु अपनी-अपनी सेनाओं से घिरे हुए मत्स्यराज के पीछे चले।
श्लोक 16 (7.23.16)
तं तु पाटलिपुष्पाणां समवर्णा हयोत्तमाः । वहमाना व्यराजन्त मात्स्यस्यामित्रघातिनः ॥
taṃ tu pāṭalipuṣpāṇāṃ samavarṇā hayottamāḥ | vahamānā vyarājanta mātsyasyāmitraghātinaḥ
पाटल के फूलों के रंग के उत्तम घोड़े शत्रुघाती मत्स्यराज को वहन करते हुए शोभित हुए।
श्लोक 17 (7.23.17)
हरिद्रासमवर्णास्तु जवना हेममालिनः । पुत्रं विराटराजस्य सत्वरं समुदावहन् ॥
haridrāsamavarṇāstu javanā hemamālinaḥ | putraṃ virāṭarājasya satvaraṃ samudāvahan
हल्दी जैसे रंग के, सोने की मालाएँ पहने वेगवान् घोड़े विराटराज के पुत्र को शीघ्र ले चले।
श्लोक 18 (7.23.18)
इन्द्रगोपकवर्णैश्च भ्रातरः पञ्च केकयाः । जातरूपसमाभासाः सर्वे लोहितकध्वजाः ॥
indragopakavarṇaiśca bhrātaraḥ pañca kekayāḥ | jātarūpasamābhāsāḥ sarve lohitakadhvajāḥ
इन्द्रगोप कीट जैसे लाल घोड़ों पर पाँच केकय भाई थे, सब सोने जैसे दीप्तिमान् और सबकी ध्वजाएँ लाल थीं।
श्लोक 19 (7.23.19)
ते हेममालिनः शूराः सर्वे युद्धविशारदाः । वर्षन्त इव जीमूताः प्रत्यदृश्यन्त दंशिताः ॥
te hemamālinaḥ śūrāḥ sarve yuddhaviśāradāḥ | varṣanta iva jīmūtāḥ pratyadṛśyanta daṃśitāḥ
वे सोने की मालाएँ पहने, युद्ध में निपुण, कवचधारी शूर बरसते मेघों के समान दिखाई दे रहे थे।
श्लोक 20 (7.23.20)
आमपात्रनिकाशास्तु पाञ्चाल्यममितौजसम् । दत्तास्तुम्बुरुणा दिव्याः शिखण्डिनमुदावहन् ॥
āmapātranikāśāstu pāñcālyamamitaujasam | dattāstumburuṇā divyāḥ śikhaṇḍinamudāvahan
कच्चे मिट्टी के बर्तन के रंग के, तुम्बुरु के दिए हुए दिव्य घोड़े अपार तेजवाले पाञ्चाल शिखण्डी को ले चले।
श्लोक 21 (7.23.21)
तथा द्वादशसाहस्राः पाञ्चालानां महारथाः । तेषां तु षट्सहस्राणि ये शिखण्डिनमन्वयुः ॥
tathā dvādaśasāhasrāḥ pāñcālānāṃ mahārathāḥ | teṣāṃ tu ṣaṭsahasrāṇi ye śikhaṇḍinamanvayuḥ
वैसे ही पाञ्चालों के बारह हज़ार महारथी थे, और उनमें से छह हज़ार शिखण्डी के पीछे चले।
श्लोक 22 (7.23.22)
पुत्रं तु शिशुपालस्य नरसिंहस्य मारिष । आक्रीडन्तो वहन्ति स्म सारङ्गशबला हयाः ॥
putraṃ tu śiśupālasya narasiṃhasya māriṣa | ākrīḍanto vahanti sma sāraṅgaśabalā hayāḥ
चितकबरे-रंगबिरंगे घोड़े क्रीड़ा करते हुए नरसिंह शिशुपाल के पुत्र को ले चले, हे मान्यवर।
श्लोक 23 (7.23.23)
धृष्टकेतुस्तु चेदीनामृषभोऽतिबलोदितः । काम्भोजैः शबलैरश्वैरभ्यवर्तत दुर्जयः ॥
dhṛṣṭaketustu cedīnāmṛṣabho'tibaloditaḥ | kāmbhojaiḥ śabalairaśvairabhyavartata durjayaḥ
चेदियों में वृषभ, अत्यन्त बलशाली, दुर्जय धृष्टकेतु चितकबरे काम्भोज घोड़ों पर आगे बढ़ा।
श्लोक 24 (7.23.24)
बृहत्क्षत्रं तु कैकेयं सुकुमारं हयोत्तमाः । पलालधूमसङ्काशाः सैन्धवाः शीघ्रमावहन् ॥
bṛhatkṣatraṃ tu kaikeyaṃ sukumāraṃ hayottamāḥ | palāladhūmasaṅkāśāḥ saindhavāḥ śīghramāvahan
पुआल के धुएँ जैसे रंग के सैन्धव घोड़े कोमल स्वभाव के केकय राजकुमार बृहत्क्षत्र को शीघ्र ले चले।
श्लोक 25 (7.23.25)
मल्लिकाक्षाः पद्मवर्णा बाह्लिजाताः स्वलङ्कृताः । शूरं शिखण्डिनः पुत्रमृक्षदेवमुदावहन् ॥
mallikākṣāḥ padmavarṇā bāhlijātāḥ svalaṅkṛtāḥ | śūraṃ śikhaṇḍinaḥ putramṛkṣadevamudāvahan
कमल के रंग के, निर्मल नेत्रोंवाले, बाह्लीक देश के जन्मे और सुसज्जित घोड़े शिखण्डी के पुत्र वीर ऋक्षदेव को ले चले।
श्लोक 26 (7.23.26)
रुक्मभाण्डप्रतिच्छन्नाः कौशेयसदृशा हयाः । क्षमावन्तोऽवहन्सङ्ख्ये सेनाबिन्दुमरिन्दमम् ॥
rukmabhāṇḍapraticchannāḥ kauśeyasadṛśā hayāḥ | kṣamāvanto'vahansaṅkhye senābindumarindamam
सुनहले साज से ढके, रेशम जैसे चमकते, शान्त स्वभाव के घोड़े शत्रुदमन सेनाबिन्दु को युद्ध में ले चले।
श्लोक 27 (7.23.27)
युवानमवहन्युद्धे क्रौञ्चवर्णा हयोत्तमाः । काश्यस्याभिभुवः पुत्रं सुकुमारं महारथम् ॥
yuvānamavahanyuddhe krauñcavarṇā hayottamāḥ | kāśyasyābhibhuvaḥ putraṃ sukumāraṃ mahāratham
क्रौञ्च पक्षी के रंग के उत्तम घोड़े काशिराज अभिभू के सुकुमार युवा महारथी पुत्र को युद्ध में ले चले।
श्लोक 28 (7.23.28)
श्वेतास्तु प्रतिविन्ध्यन्तं कृष्णग्रीवा मनोजवाः । यन्तुः प्रेष्यकरा राजन्राजपुत्रमुदावहन् ॥
śvetāstu prativindhyantaṃ kṛṣṇagrīvā manojavāḥ | yantuḥ preṣyakarā rājanrājaputramudāvahan
काली गर्दनवाले, मन जैसे वेगवान्, सारथि की आज्ञा मानने वाले श्वेत घोड़े राजपुत्र प्रतिविन्ध्य को ले चले, हे राजन्।
श्लोक 29 (7.23.29)
सुतसोमं तु योधाग्र्यं भीमपुत्रं महाबलम् । माषपुष्पसवर्णास्तमवहन्वाजिनो रणे ॥
sutasomaṃ tu yodhāgryaṃ bhīmaputraṃ mahābalam | māṣapuṣpasavarṇāstamavahanvājino raṇe
उड़द के फूल जैसे रंग के घोड़े योद्धाओं में अग्रणी, भीम के महाबली पुत्र सुतसोम को रण में ले चले।
श्लोक 30 (7.23.30)
सहस्रसोमप्रतिमो बभूव पुरे कुरूणामुदयेन्दुनाम्नि । तस्मिञ्जातः सोमसंक्रन्दमध्ये यस्मात्तस्मात्सुतसोमोऽभवत्सः ॥
sahasrasomapratimo babhūva pure kurūṇāmudayendunāmni | tasmiñjātaḥ somasaṃkrandamadhye yasmāttasmātsutasomo'bhavatsaḥ
वह हज़ार सोमों के समान था। कुरुओं के उदयेन्दु नामक नगर में सोम-यज्ञ के बीच उसका जन्म हुआ था, इसीलिए वह सुतसोम कहलाया।
श्लोक 31 (7.23.31)
नाकुलिं तु शतानीकं शालपुष्पनिभा हयाः । आदित्यतरुणप्रख्याः श्लाघनीयमुदावहन् ॥
nākuliṃ tu śatānīkaṃ śālapuṣpanibhā hayāḥ | ādityataruṇaprakhyāḥ ślāghanīyamudāvahan
शाल के फूलों के रंग के, बाल सूर्य जैसे दीप्तिमान् घोड़े नकुल के प्रशंसनीय पुत्र शतानीक को ले चले।
श्लोक 32 (7.23.32)
काञ्चनापिहितैर्योक्त्रैर्मयूरग्रीवसन्निभाः । द्रौपदेयं नरव्याघ्रं श्रुतकर्माणमाहवे ॥
kāñcanāpihitairyoktrairmayūragrīvasannibhāḥ | draupadeyaṃ naravyāghraṃ śrutakarmāṇamāhave
सोने से मढ़े जुए-बन्धनों वाले और मोर की गर्दन जैसी आभावाले घोड़े द्रौपदी के पुत्र, नरव्याघ्र श्रुतकर्मा को रण में ले चले।
श्लोक 33 (7.23.33)
श्रुतकीर्तिं श्रुतनिधिं द्रौपदेयं हयोत्तमाः । ऊहुः पार्थसमं युद्धे चाषपत्रनिभा हयाः ॥
śrutakīrtiṃ śrutanidhiṃ draupadeyaṃ hayottamāḥ | ūhuḥ pārthasamaṃ yuddhe cāṣapatranibhā hayāḥ
नीलकण्ठ पक्षी के पंखों जैसे रंग के उत्तम घोड़े द्रौपदी के पुत्र श्रुतकीर्ति को ले चले, जो शास्त्र-ज्ञान का भण्डार था और युद्ध में पार्थ के समान था।
श्लोक 34 (7.23.34)
यमाहुरध्यर्धगुणं कृष्णात्पार्थाच्च संयुगे । अभिमन्युं पिशङ्गास्तं कुमारमवहन्रणे ॥
yamāhuradhyardhaguṇaṃ kṛṣṇātpārthācca saṃyuge | abhimanyuṃ piśaṅgāstaṃ kumāramavahanraṇe
भूरे-पीले घोड़े युवा अभिमन्यु को रण में ले चले, जिसे लोग युद्ध में कृष्ण और पार्थ से भी डेढ़ गुना कहते हैं।
श्लोक 35 (7.23.35)
एकस्तु धार्तराष्ट्रेभ्यः पाण्डवान्यः समाश्रितः । तं बृहन्तो महाकाया युयुत्सुमवहन्रणे । ये तु पुष्करसारस्य तुल्यवर्णा हयोत्तमाः ॥
ekastu dhārtarāṣṭrebhyaḥ pāṇḍavānyaḥ samāśritaḥ | taṃ bṛhanto mahākāyā yuyutsumavahanraṇe | ye tu puṣkarasārasya tulyavarṇā hayottamāḥ
धृतराष्ट्र के पुत्रों में से जिसने अकेले पाण्डवों का आश्रय लिया, उस युयुत्सु को विशाल, ऊँचे घोड़े रण में ले चले। और जो उत्तम घोड़े कमल के गर्भ के रंग के थे।
श्लोक 36 (7.23.36)
पलालकाण्डवर्णास्तु वार्धक्षेमिं तरस्विनम् । ऊहुः सुतुमुले युद्धे हया हृष्टाः स्वलङ्कृताः ॥
palālakāṇḍavarṇāstu vārdhakṣemiṃ tarasvinam | ūhuḥ sutumule yuddhe hayā hṛṣṭāḥ svalaṅkṛtāḥ
पुआल के डंठल जैसे रंग के, हर्ष से भरे और सुसज्जित घोड़े वेगवान् वार्धक्षेमि को उस घमासान युद्ध में ले चले।
श्लोक 37 (7.23.37)
कुमारं शितिपादास्तु रुक्मचित्रैरुरश्छदैः । सौचित्तिमवहन्युद्धे यन्तुः प्रेष्यकरा हयाः ॥
kumāraṃ śitipādāstu rukmacitrairuraśchadaiḥ | saucittimavahanyuddhe yantuḥ preṣyakarā hayāḥ
श्वेत पैरोंवाले, सुनहले चित्रित वक्ष-कवचवाले, सारथि के आज्ञाकारी घोड़े युवा सौचित्ति को युद्ध में ले चले।
श्लोक 38 (7.23.38)
रुक्मपीठावकीर्णास्तु कौशेयसदृशा हयाः । सुवर्णमालिनः क्षान्ताः श्रेणिमन्तमुदावहन् ॥
rukmapīṭhāvakīrṇāstu kauśeyasadṛśā hayāḥ | suvarṇamālinaḥ kṣāntāḥ śreṇimantamudāvahan
सोने की पीठ-झूलों से ढके, रेशम जैसे रंग के, सोने की मालाएँ पहने और सहनशील घोड़े श्रेणिमान् को ले चले।
श्लोक 39 (7.23.39)
रुक्ममालाधराः शूरा हेमपृष्ठाः स्वलङ्कृताः । काशिराजं नरश्रेष्ठं श्लाघनीयमुदावहन् ॥
rukmamālādharāḥ śūrā hemapṛṣṭhāḥ svalaṅkṛtāḥ | kāśirājaṃ naraśreṣṭhaṃ ślāghanīyamudāvahan
सोने की मालाएँ धारण किए, शूर, सुनहली पीठवाले और सुसज्जित घोड़े नरश्रेष्ठ, प्रशंसनीय काशिराज को ले चले।
श्लोक 40 (7.23.40)
अस्त्राणां च धनुर्वेदे ब्राह्मे वेदे च पारगम् । तं सत्यधृतिमायान्तमरुणाः समुपावहन् ॥
astrāṇāṃ ca dhanurvede brāhme vede ca pāragam | taṃ satyadhṛtimāyāntamaruṇāḥ samupāvahan
लालिमा लिए घोड़े आते हुए सत्यधृति को ले चले, जो अस्त्रों, धनुर्वेद और ब्रह्मवेद में पारंगत था।
श्लोक 41 (7.23.41)
यः स पाञ्चालसेनानीर्द्रोणमंशमकल्पयत् । पारावतसवर्णास्तं धृष्टद्युम्नमुदावहन् ॥
yaḥ sa pāñcālasenānīrdroṇamaṃśamakalpayat | pārāvatasavarṇāstaṃ dhṛṣṭadyumnamudāvahan
कबूतर जैसे रंग के घोड़े उस धृष्टद्युम्न को ले चले, जिसने पाञ्चाल सेना का नायक होकर द्रोण को अपने हिस्से में ले लिया था।
श्लोक 42 (7.23.42)
तमन्वयात्सत्यधृतिः सौचित्तिर्युद्धदुर्मदः । श्रेणिमान्वसुदानश्च पुत्रः काश्यस्य चाभिभूः ॥
tamanvayātsatyadhṛtiḥ saucittiryuddhadurmadaḥ | śreṇimānvasudānaśca putraḥ kāśyasya cābhibhūḥ
उसके पीछे सत्यधृति, युद्ध के लिए मतवाला सौचित्ति, श्रेणिमान्, वसुदान और काशिराज का पुत्र अभिभू चले।
श्लोक 43 (7.23.43)
युक्तैः परमकाम्भोजैर्जवनैर्हेममालिभिः । भीषयन्तो द्विषत्सैन्यं यमवैश्रवणोपमाः ॥
yuktaiḥ paramakāmbhojairjavanairhemamālibhiḥ | bhīṣayanto dviṣatsainyaṃ yamavaiśravaṇopamāḥ
वे उत्तम काम्भोज घोड़ों पर, जो वेगवान् थे और सोने की मालाएँ पहने थे, शत्रु-सेना को डराते हुए यम और कुबेर के समान चले।
श्लोक 44 (7.23.44)
प्रभद्रकास्तु काम्भोजाः षट्सहस्राण्युदायुधाः । नानावर्णैर्हयैः श्रेष्ठैर्हेमवर्णरथध्वजाः ॥
prabhadrakāstu kāmbhojāḥ ṣaṭsahasrāṇyudāyudhāḥ | nānāvarṇairhayaiḥ śreṣṭhairhemavarṇarathadhvajāḥ
प्रभद्रक काम्भोज छह हज़ार की संख्या में, अस्त्र उठाए, नाना रंगों के उत्तम घोड़ों पर सवार थे, और उनके रथों की ध्वजाएँ सुनहरे रंग की थीं।
श्लोक 45 (7.23.45)
शरव्रातैर्विधुन्वन्तः शत्रून्विततकार्मुकाः । समानमृत्यवो भूत्वा धृष्टद्युम्नं समन्वयुः ॥
śaravrātairvidhunvantaḥ śatrūnvitatakārmukāḥ | samānamṛtyavo bhūtvā dhṛṣṭadyumnaṃ samanvayuḥ
बाणों की वर्षा से शत्रुओं को कँपाते, धनुष तानते हुए, एक ही मृत्यु के साझी बनने का संकल्प लेकर वे धृष्टद्युम्न के पीछे चले।
श्लोक 46 (7.23.46)
बभ्रुकौशेयवर्णास्तु सुवर्णवरमालिनः । ऊहुरम्लानमनसश्चेकितानं हयोत्तमाः ॥
babhrukauśeyavarṇāstu suvarṇavaramālinaḥ | ūhuramlānamanasaścekitānaṃ hayottamāḥ
भूरे रेशम के रंग के, सोने की उत्तम मालाएँ पहने घोड़े अविचल मनवाले चेकितान को ले चले।
श्लोक 47 (7.23.47)
इन्द्रायुधसवर्णैस्तु कुन्तिभोजो हयोत्तमैः । आयात्सदश्वैः पुरुजिन्मातुलः सव्यसाचिनः ॥
indrāyudhasavarṇaistu kuntibhojo hayottamaiḥ | āyātsadaśvaiḥ purujinmātulaḥ savyasācinaḥ
सव्यसाची के मामा कुन्तिभोज इन्द्रधनुष जैसे रंग के उत्तम, आज्ञाकारी घोड़ों पर आए, वही पुरुजित्।
श्लोक 48 (7.23.48)
अन्तरिक्षसवर्णास्तु तारकाचित्रिता इव । राजानं रोचमानं ते हयाः सङ्ख्ये समावहन् ॥
antarikṣasavarṇāstu tārakācitritā iva | rājānaṃ rocamānaṃ te hayāḥ saṅkhye samāvahan
आकाश जैसे रंग के, मानो तारों से जड़े घोड़े राजा रोचमान को युद्ध में ले चले।
श्लोक 49 (7.23.49)
कर्बुराः शितिपादास्तु स्वर्णजालपरिच्छदाः । जारासन्धिं हयाः श्रेष्ठाः सहदेवमुदावहन् ॥
karburāḥ śitipādāstu svarṇajālaparicchadāḥ | jārāsandhiṃ hayāḥ śreṣṭhāḥ sahadevamudāvahan
चितकबरे, श्वेत पैरोंवाले, सोने की जाली के साज से ढके श्रेष्ठ घोड़े जरासन्ध के पुत्र सहदेव को ले चले।
श्लोक 50 (7.23.50)
ये तु पुष्करनालस्य समवर्णा हयोत्तमाः । जवे श्येनसमाश्चित्राः सुदामानमुदावहन् ॥
ye tu puṣkaranālasya samavarṇā hayottamāḥ | jave śyenasamāścitrāḥ sudāmānamudāvahan
कमल-नाल के रंग के, रंगबिरंगे और बाज जैसे वेगवान् उत्तम घोड़े सुदामा को ले चले।
श्लोक 51 (7.23.51)
शशलोहितवर्णास्तु पाण्डुरोद्गतराजयः । पाञ्चाल्यं गोपतेः पुत्रं सिंहसेनमुदावहन् ॥
śaśalohitavarṇāstu pāṇḍurodgatarājayaḥ | pāñcālyaṃ gopateḥ putraṃ siṃhasenamudāvahan
खरगोश जैसे लाल रंग के, ऊपर उठी सफ़ेद रेखाओं वाले घोड़े गोपति के पुत्र पाञ्चाल सिंहसेन को ले चले।
श्लोक 52 (7.23.52)
पाञ्चालानां नरव्याघ्रो यः ख्यातो जनमेजयः । तस्य सर्षपपुष्पाणां तुल्यवर्णा हयोत्तमाः ॥
pāñcālānāṃ naravyāghro yaḥ khyāto janamejayaḥ | tasya sarṣapapuṣpāṇāṃ tulyavarṇā hayottamāḥ
पाञ्चालों में एक नरव्याघ्र प्रसिद्ध जनमेजय था; उसके उत्तम घोड़े सरसों के फूलों के रंग के थे,
श्लोक 53 (7.23.53)
माषवर्णाश्च जवना बृहन्तो हेममालिनः । दधिपृष्ठाश्चित्रमुखाः पाञ्चाल्यमवहन्द्रुतम् ॥
māṣavarṇāśca javanā bṛhanto hemamālinaḥ | dadhipṛṣṭhāścitramukhāḥ pāñcālyamavahandrutam
उड़द जैसे काले, वेगवान्, विशाल, सोने की मालाएँ पहने, दही जैसी सफ़ेद पीठ और रंग-बिरंगे मुखवाले वे घोड़े उस पाञ्चाल को शीघ्र ले चले।
श्लोक 54 (7.23.54)
शूराश्च भद्रकाश्चैव शरकाण्डनिभा हयाः । पद्मकिञ्जल्कवर्णाभा दण्डधारमुदावहन् ॥
śūrāśca bhadrakāścaiva śarakāṇḍanibhā hayāḥ | padmakiñjalkavarṇābhā daṇḍadhāramudāvahan
शूर, सुन्दर सिरोंवाले, सरकण्डे के डंठल जैसे सफ़ेद-गोरे और कमल के केसर जैसी आभावाले घोड़े दण्डधार को ले चले।
श्लोक 55 (7.23.55)
रासभारुणवर्णाभाः पृष्ठतो मूषिकप्रभाः । वल्गन्त इव संयत्ता व्याघ्रदत्तमुदावहन् ॥
rāsabhāruṇavarṇābhāḥ pṛṣṭhato mūṣikaprabhāḥ | valganta iva saṃyattā vyāghradattamudāvahan
गधे जैसे धूसर-लाल और पीठ पर चूहे जैसे भूरे घोड़े, मानो उछलते हुए तैयार होकर, व्याघ्रदत्त को ले चले।
श्लोक 56 (7.23.56)
हरयः कालकाश्चित्राश्चित्रमाल्यविभूषिताः । सुधन्वानं नरव्याघ्रं पाञ्चाल्यं समुदावहन् ॥
harayaḥ kālakāścitrāścitramālyavibhūṣitāḥ | sudhanvānaṃ naravyāghraṃ pāñcālyaṃ samudāvahan
बादामी, काले सिरोंवाले, रंग-बिरंगे और नाना प्रकार की मालाओं से सजे घोड़े नरव्याघ्र पाञ्चाल सुधन्वा को ले चले।
श्लोक 57 (7.23.57)
इन्द्राशनिसमस्पर्शा इन्द्रगोपकसन्निभाः । काये चित्रान्तराश्चित्राश्चित्रायुधमुदावहन् ॥
indrāśanisamasparśā indragopakasannibhāḥ | kāye citrāntarāścitrāścitrāyudhamudāvahan
इन्द्र के वज्र जैसे स्पर्शवाले, इन्द्रगोप कीट जैसे, शरीर पर विचित्र धारियों वाले अद्भुत घोड़े चित्रायुध को ले चले।
श्लोक 58 (7.23.58)
बिभ्रतो हेममालास्तु चक्रवाकोदरा हयाः । कोसलाधिपतेः पुत्रं सुक्षत्रं वाजिनोऽवहन् ॥
bibhrato hemamālāstu cakravākodarā hayāḥ | kosalādhipateḥ putraṃ sukṣatraṃ vājino'vahan
सोने की मालाएँ धारण किए, चकवे जैसे उदरवाले घोड़े कोसलराज के पुत्र सुक्षत्र को ले चले।
श्लोक 59 (7.23.59)
शबलास्तु बृहन्तोऽश्वा दान्ता जाम्बूनदस्रजः । युद्धे सत्यधृतिं क्षेमिमवहन्प्रांशवः शुभाः ॥
śabalāstu bṛhanto'śvā dāntā jāmbūnadasrajaḥ | yuddhe satyadhṛtiṃ kṣemimavahanprāṃśavaḥ śubhāḥ
बड़े चितकबरे, सधे हुए, जाम्बूनद सोने की मालाएँ पहने, ऊँचे और सुन्दर घोड़े सत्यधृति क्षेमि को युद्ध में ले चले।
श्लोक 60 (7.23.60)
एकवर्णेन सर्वेण ध्वजेन कवचेन च । अश्वैश्च धनुषा चैव शुक्लैः शुक्लो न्यवर्तत ॥
ekavarṇena sarveṇa dhvajena kavacena ca | aśvaiśca dhanuṣā caiva śuklaiḥ śuklo nyavartata
ध्वजा, कवच, घोड़े और धनुष, सब एक ही रंग के, श्वेत; ऐसे श्वेत साज के साथ शुक्ल नामक वीर लौट आया।
श्लोक 61 (7.23.61)
समुद्रसेनपुत्रं तु सामुद्रा रुद्रतेजसम् । अश्वाः शशाङ्कसदृशाश्चन्द्रसेनमुदावहन् ॥
samudrasenaputraṃ tu sāmudrā rudratejasam | aśvāḥ śaśāṅkasadṛśāścandrasenamudāvahan
समुद्र की नस्ल के, चन्द्रमा जैसे श्वेत घोड़े रुद्र के समान तेजस्वी समुद्रसेन के पुत्र चन्द्रसेन को ले चले।
श्लोक 62 (7.23.62)
नीलोत्पलसवर्णास्तु तपनीयविभूषिताः । शैब्यं चित्ररथं सङ्ख्ये चित्रमाल्याऽवहन्हयाः ॥
nīlotpalasavarṇāstu tapanīyavibhūṣitāḥ | śaibyaṃ citrarathaṃ saṅkhye citramālyā'vahanhayāḥ
नीलकमल जैसे नीले, शुद्ध सोने से सजे और विचित्र मालाएँ पहने घोड़े शैब्य चित्ररथ को युद्ध में ले चले।
श्लोक 63 (7.23.63)
कलायपुष्पवर्णास्तु श्वेतलोहितराजयः । रथसेनं हयश्रेष्ठाः समूहुर्युद्धदुर्मदम् ॥
kalāyapuṣpavarṇāstu śvetalohitarājayaḥ | rathasenaṃ hayaśreṣṭhāḥ samūhuryuddhadurmadam
मटर के फूल जैसे रंग के, सफ़ेद-लाल धारियों वाले, श्रेष्ठ घोड़े युद्ध के मद में चूर रथसेन को ले चले।
श्लोक 64 (7.23.64)
यं तु सर्वमनुष्येभ्यः प्राहुः शूरतरं नृपम् । तं पटच्चरहन्तारं शुकवर्णाऽवहन्हयाः ॥
yaṃ tu sarvamanuṣyebhyaḥ prāhuḥ śūrataraṃ nṛpam | taṃ paṭaccarahantāraṃ śukavarṇā'vahanhayāḥ
तोते जैसे हरे रंग के घोड़े उस राजा को ले चले, जिसे सब मनुष्यों में सबसे बड़ा शूर कहा जाता है और जिसने पटच्चरों का वध किया था।
श्लोक 65 (7.23.65)
चित्रायुधं चित्रमाल्यं चित्रवर्मायुधध्वजम् । ऊहुः किंशुकपुष्पाणां समवर्णा हयोत्तमाः ॥
citrāyudhaṃ citramālyaṃ citravarmāyudhadhvajam | ūhuḥ kiṃśukapuṣpāṇāṃ samavarṇā hayottamāḥ
किंशुक (पलाश) के फूलों जैसे रंग के उत्तम घोड़े विचित्र माला, कवच, आयुध और ध्वजावाले चित्रायुध को ले चले।
श्लोक 66 (7.23.66)
एकवर्णेन सर्वेण ध्वजेन कवचेन च । धनुषा रथवाहैश्च नीलैर्नीलोऽभ्यवर्तत ॥
ekavarṇena sarveṇa dhvajena kavacena ca | dhanuṣā rathavāhaiśca nīlairnīlo'bhyavartata
ध्वजा, कवच, धनुष और रथ के घोड़े, सब एक ही रंग के, नीले; ऐसे नीले साज के साथ नील नामक वीर आगे बढ़ा।
श्लोक 67 (7.23.67)
नानारूपै रत्नचिह्नैर्वरूथरथकार्मुकैः । वाजिध्वजपताकाभिश्चित्रैश्चित्रोऽभ्यवर्तत ॥
nānārūpai ratnacihnairvarūtharathakārmukaiḥ | vājidhvajapatākābhiścitraiścitro'bhyavartata
नाना रूपों और रत्नजटित चिह्नों के साथ, रथ के आवरणों, रथों और धनुषों के साथ, तथा घोड़ों, ध्वजाओं और पताकाओं के साथ, सब विचित्र, चित्र नामक वीर आगे बढ़ा।
श्लोक 68 (7.23.68)
ये तु पुष्करवर्णस्य तुल्यवर्णा हयोत्तमाः । ते रोचमानस्य सुतं हेमवर्णमुदावहन् ॥
ye tu puṣkaravarṇasya tulyavarṇā hayottamāḥ | te rocamānasya sutaṃ hemavarṇamudāvahan
कमल के रंग के जो उत्तम घोड़े थे, वे रोचमान के सुनहरे रंगवाले पुत्र हेमवर्ण को ले चले।
श्लोक 69 (7.23.69)
योधाश्च भद्रकाराश्च शरदण्डानुदण्डयः । श्वेताण्डाः कुक्कुटाण्डाभा दण्डकेतुं हयाऽवहन् ॥
yodhāśca bhadrakārāśca śaradaṇḍānudaṇḍayaḥ | śvetāṇḍāḥ kukkuṭāṇḍābhā daṇḍaketuṃ hayā'vahan
युद्ध में समर्थ, सुन्दर चालवाले, सरकण्डे के डंठल जैसी सीधी पीठवाले, मुर्गी के अण्डे जैसे श्वेत-पीले घोड़े दण्डकेतु को ले चले।
श्लोक 70 (7.23.70)
केशवेन हते सङ्ख्ये पितर्यथ नराधिपे । भिन्ने कपाटे पाण्ड्यानां विद्रुतेषु च बन्धुषु ॥
keśavena hate saṅkhye pitaryatha narādhipe | bhinne kapāṭe pāṇḍyānāṃ vidruteṣu ca bandhuṣu
जब उसके पिता राजा को केशव ने युद्ध में मार डाला, जब पाण्ड्यों का कपाट नगर टूट गया और बन्धु-बान्धव भाग खड़े हुए,
श्लोक 71 (7.23.71)
भीष्मादवाप्य चास्त्राणि द्रोणाद्रामात्कृपात्तथा । अस्त्रैः समत्वं सम्प्राप्य रुक्मिकर्णार्जुनाच्युतैः ॥
bhīṣmādavāpya cāstrāṇi droṇādrāmātkṛpāttathā | astraiḥ samatvaṃ samprāpya rukmikarṇārjunācyutaiḥ
तब भीष्म, द्रोण, राम और कृप से अस्त्र पाकर तथा अस्त्रविद्या में रुक्मी, कर्ण, अर्जुन और अच्युत की बराबरी पाकर,
श्लोक 72 (7.23.72)
इयेष द्वारकां हन्तुं कृत्स्नां जेतुं च मेदिनीम् । निवारितस्ततः प्राज्ञैः सुहृद्भिर्हितकाम्यया ॥
iyeṣa dvārakāṃ hantuṃ kṛtsnāṃ jetuṃ ca medinīm | nivāritastataḥ prājñaiḥ suhṛdbhirhitakāmyayā
उसने द्वारका को नष्ट करने और सारी पृथ्वी को जीतने की इच्छा की; पर तब हितैषी बुद्धिमान् मित्रों ने उसे रोक लिया।
श्लोक 73 (7.23.73)
वैरानुबन्धमुत्सृज्य स्वराज्यमनुशास्ति यः । स सागरध्वजः पाण्ड्यश्चन्द्ररश्मिनिभैर्हयैः ॥
vairānubandhamutsṛjya svarājyamanuśāsti yaḥ | sa sāgaradhvajaḥ pāṇḍyaścandraraśminibhairhayaiḥ
वैर की परम्परा छोड़कर जो अब अपने राज्य पर शासन करता है, वही समुद्र-ध्वजवाला पाण्ड्य चन्द्रकिरणों जैसे घोड़ों पर,
श्लोक 74 (7.23.74)
वैडूर्यजालसञ्छन्नैर्वीर्यद्रविणमाश्रितः । दिव्यं विस्फारयंश्चापं द्रोणमभ्यद्रवद्बली ॥
vaiḍūryajālasañchannairvīryadraviṇamāśritaḥ | divyaṃ visphārayaṃścāpaṃ droṇamabhyadravadbalī
वैदूर्य की जालियों से ढके घोड़ों पर, अपने पराक्रम और धन के भरोसे, दिव्य धनुष खींचता हुआ वह बली द्रोण पर टूट पड़ा।
श्लोक 75 (7.23.75)
आरकूटकवर्णाश्च हयाः पाण्ड्यानुयायिनाम् । अवहन्रथमुख्यानामयुतानि चतुर्दश ॥
ārakūṭakavarṇāśca hayāḥ pāṇḍyānuyāyinām | avahanrathamukhyānāmayutāni caturdaśa
पाण्ड्य के अनुयायियों के पीतल के रंग के घोड़े चौदह अयुत (एक लाख चालीस हज़ार) प्रमुख रथियों को ले चले।
श्लोक 76 (7.23.76)
नानावर्णेन रूपेण नानाकृतिमुखा हयाः । रथचक्रध्वजं वीरं घटोत्कचमुदावहन् ॥
nānāvarṇena rūpeṇa nānākṛtimukhā hayāḥ | rathacakradhvajaṃ vīraṃ ghaṭotkacamudāvahan
नाना रंग-रूप और अनेक आकृति के मुखोंवाले घोड़े रथ-चक्र की ध्वजावाले वीर घटोत्कच को ले चले।
श्लोक 77 (7.23.77)
भारतानां समेतानामुत्सृज्यैको मतानि यः । गतो युधिष्ठिरं भक्त्या त्यक्त्वा सर्वमभीप्सितम् ॥
bhāratānāṃ sametānāmutsṛjyaiko matāni yaḥ | gato yudhiṣṭhiraṃ bhaktyā tyaktvā sarvamabhīpsitam
जो अकेला एकत्र हुए भरतवंशियों की सम्मति छोड़कर, सब प्रिय वस्तुओं को त्यागकर, भक्तिभाव से युधिष्ठिर के पास चला गया,
श्लोक 78 (7.23.78)
लोहिताक्षं महाबाहुं युयुत्सुं मकरध्वजम् । महासत्वा महाकायाः सौवर्णस्यन्दने स्थितम् ॥
lohitākṣaṃ mahābāhuṃ yuyutsuṃ makaradhvajam | mahāsatvā mahākāyāḥ sauvarṇasyandane sthitam
उस लाल नेत्रोंवाले, महाबाहु, मकर-ध्वजवाले युयुत्सु को, जो सोने के रथ में खड़ा था, बलवान् और विशाल घोड़े ले चले।
श्लोक 79 (7.23.79)
सुवर्णवर्णा धर्मज्ञमनीकस्थं युधिष्ठिरम् । राजश्रेष्ठं हयश्रेष्ठाः सर्वतः पृष्ठतोऽन्वयुः ॥
suvarṇavarṇā dharmajñamanīkasthaṃ yudhiṣṭhiram | rājaśreṣṭhaṃ hayaśreṣṭhāḥ sarvataḥ pṛṣṭhato'nvayuḥ
सुनहरे रंग के श्रेष्ठ घोड़े सेना के आगे खड़े धर्मज्ञ, राजाओं में श्रेष्ठ युधिष्ठिर के चारों ओर पीछे-पीछे चले।
श्लोक 80 (7.23.80)
वर्णैरुच्चावचैरन्यैः सदश्वानां प्रभद्रकाः । सन्न्यवर्तन्त युद्धाय बहवो देवरूपिणः ॥
varṇairuccāvacairanyaiḥ sadaśvānāṃ prabhadrakāḥ | sannyavartanta yuddhāya bahavo devarūpiṇaḥ
सुन्दर घोड़ों पर नाना ऊँचे-नीचे रंगों में, देवताओं जैसे रूपवाले बहुत-से प्रभद्रक युद्ध के लिए लौट पड़े।
श्लोक 81 (7.23.81)
ते यत्ता भीमसेनेन सहिताः काञ्चनध्वजाः । प्रत्यदृश्यन्त राजेन्द्र सेन्द्रा इव दिवौकसः ॥
te yattā bhīmasenena sahitāḥ kāñcanadhvajāḥ | pratyadṛśyanta rājendra sendrā iva divaukasaḥ
वे सोने की ध्वजावाले यत्नशील वीर भीमसेन के साथ मिलकर इन्द्र सहित देवताओं के समान दिखाई दिए, हे राजेन्द्र।
श्लोक 82 (7.23.82)
अत्यरोचत तान्सर्वान्धृष्टद्युम्नः समागतान् । सर्वाण्यति च सैन्यानि भारद्वाजो व्यरोचत ॥
atyarocata tānsarvāndhṛṣṭadyumnaḥ samāgatān | sarvāṇyati ca sainyāni bhāradvājo vyarocata
धृष्टद्युम्न एकत्र हुए उन सबसे अधिक शोभित हुआ; और भारद्वाज (द्रोण) सारी सेनाओं से बढ़कर दीप्त हुए।
श्लोक 83 (7.23.83)
अतीव शुशुभे तस्य ध्वजः कृष्णाजिनोत्तरः । कमण्डलुर्महाराज जातरूपमयः शुभः ॥
atīva śuśubhe tasya dhvajaḥ kṛṣṇājinottaraḥ | kamaṇḍalurmahārāja jātarūpamayaḥ śubhaḥ
हे महाराज, द्रोण की ध्वजा अत्यन्त शोभित थी, जिस पर काला मृगचर्म पड़ा था और सोने का कमण्डलु बना था।
श्लोक 84 (7.23.84)
ध्वजं तु भीमसेनस्य वैडूर्यमणिलोचनम् । भ्राजमानं महासिंहं राजन्तं दृष्टवानहम् ॥
dhvajaṃ tu bhīmasenasya vaiḍūryamaṇilocanam | bhrājamānaṃ mahāsiṃhaṃ rājantaṃ dṛṣṭavānaham
मैंने भीमसेन की ध्वजा देखी: वैदूर्य मणि के नेत्रोंवाला, दमकता हुआ एक विशाल सिंह।
श्लोक 85 (7.23.85)
ध्वजं तु कुरुराजस्य पाण्डवस्य महौजसः । दृष्टवानस्मि सौवर्णं सोमं ग्रहगणान्वितम् ॥
dhvajaṃ tu kururājasya pāṇḍavasya mahaujasaḥ | dṛṣṭavānasmi sauvarṇaṃ somaṃ grahagaṇānvitam
मैंने महातेजस्वी पाण्डव, कुरुराज की सुनहरी ध्वजा देखी: ग्रहों के समूह से घिरा चन्द्रमा।
श्लोक 86 (7.23.86)
मृदङ्गौ चात्र विपुलौ दिव्यौ नन्दोपनन्दकौ । यन्त्रेणाहन्यमानौ च सुस्वनौ हर्षवर्धनौ ॥
mṛdaṅgau cātra vipulau divyau nandopanandakau | yantreṇāhanyamānau ca susvanau harṣavardhanau
उस पर नन्द और उपनन्द नामक दो विशाल दिव्य मृदंग भी थे, जो यन्त्र से बजाए जाते थे, मधुर स्वर वाले थे और हर्ष बढ़ाते थे।
श्लोक 87 (7.23.87)
शरभं पृष्ठसौवर्णं नकुलस्य महाध्वजम् । अपश्याम रथेत्युग्रं भीषयाणमवस्थितम् ॥
śarabhaṃ pṛṣṭhasauvarṇaṃ nakulasya mahādhvajam | apaśyāma rathetyugraṃ bhīṣayāṇamavasthitam
नकुल के रथ पर हमने उसकी महान् ध्वजा देखी: सुनहरी पीठवाला शरभ, अति उग्र, मानो डराता हुआ खड़ा हो।
श्लोक 88 (7.23.88)
हंसस्तु राजतः श्रीमान्ध्वजे घण्टापताकवान् । सहदेवस्य दुर्धर्षो द्विषतां शोकवर्धनः ॥
haṃsastu rājataḥ śrīmāndhvaje ghaṇṭāpatākavān | sahadevasya durdharṣo dviṣatāṃ śokavardhanaḥ
सहदेव की ध्वजा पर चाँदी का सुन्दर हंस था, जिसमें घण्टे और पताकाएँ थीं; वह दुर्धर्ष थी और शत्रुओं का शोक बढ़ाती थी।
श्लोक 89 (7.23.89)
पञ्चानां द्रौपदेयानां प्रतिमाध्वजभूषणम् । धर्ममारुतशक्राणामश्विनोश्च महात्मनोः ॥
pañcānāṃ draupadeyānāṃ pratimādhvajabhūṣaṇam | dharmamārutaśakrāṇāmaśvinośca mahātmanoḥ
द्रौपदी के पाँच पुत्रों की ध्वजाओं की शोभा धर्म, मरुत्, शक्र और महात्मा अश्विनीकुमारों की मूर्तियों से थी।
श्लोक 90 (7.23.90)
अभिमन्योः कुमारस्य शार्ङ्गपक्षी हिरण्मयः । रथे ध्वजवरो राजंस्तप्तचामीकरोज्ज्वलः ॥
abhimanyoḥ kumārasya śārṅgapakṣī hiraṇmayaḥ | rathe dhvajavaro rājaṃstaptacāmīkarojjvalaḥ
हे राजन्, युवा अभिमन्यु के रथ की श्रेष्ठ ध्वजा पर सोने का शार्ङ्ग पक्षी था, जो तपाए हुए सोने की तरह दमकता था।
श्लोक 91 (7.23.91)
घटोत्कचस्य राजेन्द्र ध्वजे गृध्रो व्यरोचत । अश्वाश्च कामगास्तस्य रावणस्य पुरा यथा ॥
ghaṭotkacasya rājendra dhvaje gṛdhro vyarocata | aśvāśca kāmagāstasya rāvaṇasya purā yathā
हे राजेन्द्र, घटोत्कच की ध्वजा पर गिद्ध शोभित था; और उसके घोड़े रावण के घोड़ों की तरह इच्छानुसार चलने वाले थे।
श्लोक 92 (7.23.92)
माहेन्द्रं च धनुर्दिव्यं धर्मराजे युधिष्ठिरे । वायव्यं भीमसेनस्य धनुर्दिव्यमभून्नृप ॥
māhendraṃ ca dhanurdivyaṃ dharmarāje yudhiṣṭhire | vāyavyaṃ bhīmasenasya dhanurdivyamabhūnnṛpa
धर्मराज युधिष्ठिर के पास दिव्य माहेन्द्र धनुष था, और हे राजन्, भीमसेन के पास दिव्य वायव्य धनुष था।
श्लोक 93 (7.23.93)
त्रैलोक्यरक्षणार्थाय ब्रह्मणा सृष्टमायुधम् । तद्दिव्यमजरं चैव फाल्गुनार्थाय वै धनुः ॥
trailokyarakṣaṇārthāya brahmaṇā sṛṣṭamāyudham | taddivyamajaraṃ caiva phālgunārthāya vai dhanuḥ
ब्रह्मा ने तीनों लोकों की रक्षा के लिए जो आयुध रचा था, वह दिव्य और अजर धनुष फाल्गुन (अर्जुन) के लिए था।
श्लोक 94 (7.23.94)
वैष्णवं नकुलायाथ सहदेवाय चाश्विजम् । घटोत्कचाय पौलस्त्यं धनुर्दिव्यं भयानकम् ॥
vaiṣṇavaṃ nakulāyātha sahadevāya cāśvijam | ghaṭotkacāya paulastyaṃ dhanurdivyaṃ bhayānakam
वैष्णव धनुष नकुल के लिए था, अश्विनी-सम्बन्धी सहदेव के लिए, और घटोत्कच के लिए पौलस्त्य का दिव्य, भयानक धनुष।
श्लोक 95 (7.23.95)
रौद्रमाग्नेयकौबेरं याम्यं गिरिशमेव च । पञ्चानां द्रौपदेयानां धनूरत्नानि भारत ॥
raudramāgneyakauberaṃ yāmyaṃ giriśameva ca | pañcānāṃ draupadeyānāṃ dhanūratnāni bhārata
हे भारत, द्रौपदी के पाँच पुत्रों के धनुष-रत्न रौद्र, आग्नेय, कौबेर, याम्य और गिरिश नामक थे।
श्लोक 96 (7.23.96)
रौद्रं धनुर्वरं श्रेष्ठं लेभे यद्रोहिणीसुतः । तत्तुष्टः प्रददौ रामः सौभद्राय महात्मने ॥
raudraṃ dhanurvaraṃ śreṣṭhaṃ lebhe yadrohiṇīsutaḥ | tattuṣṭaḥ pradadau rāmaḥ saubhadrāya mahātmane
रोहिणी के पुत्र (बलराम) को जो श्रेष्ठ रौद्र धनुष मिला था, उसे प्रसन्न होकर राम ने महात्मा सुभद्रापुत्र को दे दिया।
श्लोक 97 (7.23.97)
एते चान्ये च बहवो ध्वजा हेमविभूषिताः । तत्रादृश्यन्त शूराणां द्विषतां शोकवर्धनाः ॥
ete cānye ca bahavo dhvajā hemavibhūṣitāḥ | tatrādṛśyanta śūrāṇāṃ dviṣatāṃ śokavardhanāḥ
ये और दूसरी बहुत-सी सोने से सजी वीरों की ध्वजाएँ वहाँ दिखाई दीं, जो शत्रुओं का शोक बढ़ाने वाली थीं।
श्लोक 98 (7.23.98)
तदभूद्ध्वजसम्बाधमकापुरुषसेवितम् । द्रोणानीकं महाराज पटे चित्रमिवार्पितम् ॥
tadabhūddhvajasambādhamakāpuruṣasevitam | droṇānīkaṃ mahārāja paṭe citramivārpitam
हे महाराज, ध्वजाओं से ठसाठस भरी और किसी कायर के न रहने वाली द्रोण की वह सेना कपड़े पर उतारे चित्र जैसी लग रही थी।
श्लोक 99 (7.23.99)
शुश्रुवुर्नामगोत्राणि वीराणां संयुगे तदा । द्रोणमाद्रवतां राजन्स्वयंवर इवाहवे ॥
śuśruvurnāmagotrāṇi vīrāṇāṃ saṃyuge tadā | droṇamādravatāṃ rājansvayaṃvara ivāhave
द्रोण पर टूटते हुए वीरों के नाम और गोत्र उस समय युद्ध में सुने गए, हे राजन्, जैसे किसी स्वयंवर में सुने जाते हैं।