द्रोण पर्व · अध्याय 24
धृतराष्ट्र का विलाप और फिर वृत्तान्त का आग्रह
धृतराष्ट्र दैव पर, युधिष्ठिर के लम्बे वनवास और बाद में मिले उनके सहायकों पर, और पृथ्वी के विषय में दुर्योधन की पुरानी डींग पर विचार करते हैं। वे शोक करते हैं कि भीष्म की तरह द्रोण भी मारे गए, और मानते हैं कि वे अपने पुत्र को त्याग नहीं सके। वे सञ्जय से स्पष्ट बताने को कहते हैं कि किसने युद्ध किया और कौन भागे, अर्जुन और भीम ने क्या किया, और पाण्डवों के लौटने पर उनके कौन-से योद्धा किन्हें रोके रहे।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (7.24.1)
व्यथयेयुरिमे सेनां देवानामपि सञ्जय । आहवे ये न्यवर्तन्त वृकोदरमुखा नृपाः ॥
vyathayeyurime senāṃ devānāmapi sañjaya | āhave ye nyavartanta vṛkodaramukhā nṛpāḥ
"सञ्जय, ये राजा, जो वृकोदर को आगे रखकर रण में लौट आए, देवताओं की सेना को भी हिला सकते हैं।"
श्लोक 2 (7.24.2)
सम्प्रयुक्तः किलैवायं दिष्टैर्भवति पूरुषः । तस्मिन्नेव च सर्वार्थाः प्रदृश्यन्ते पृथग्विधाः ॥
samprayuktaḥ kilaivāyaṃ diṣṭairbhavati pūruṣaḥ | tasminneva ca sarvārthāḥ pradṛśyante pṛthagvidhāḥ
"मनुष्य निश्चय ही दैव के विधान से जुड़ा हुआ है, और भाँति-भाँति के सब प्रयोजन उसी पर आधारित दिखाई देते हैं।"
श्लोक 3 (7.24.3)
दीर्घं विप्रोषितः कालमरण्ये जटिलोऽजिनी । अज्ञातश्चैव लोकस्य विजहार युधिष्ठिरः ॥
dīrghaṃ viproṣitaḥ kālamaraṇye jaṭilo'jinī | ajñātaścaiva lokasya vijahāra yudhiṣṭhiraḥ
"युधिष्ठिर बहुत समय तक वन में जटा बढ़ाए, मृगचर्म पहने, लोगों से अज्ञात रहकर दूर रहे।"
श्लोक 4 (7.24.4)
स एव महतीं सेनां समावर्तयदाहवे । किमन्यद्दैवसंयोगान्मम पुत्राभवाय च ॥
sa eva mahatīṃ senāṃ samāvartayadāhave | kimanyaddaivasaṃyogānmama putrābhavāya ca
"उसी ने अब रण में विशाल सेना जुटा ली है। मेरे पुत्रों के विनाश के लिए यह दैव के संयोग के सिवा और क्या है?"
श्लोक 5 (7.24.5)
युक्त एव हि भाग्येन ध्रुवमुत्पद्यते नरः । स तथाऽऽकृष्यते तेन न यथा स्वयमिच्छति ॥
yukta eva hi bhāgyena dhruvamutpadyate naraḥ | sa tathā''kṛṣyate tena na yathā svayamicchati
"मनुष्य निश्चय ही भाग्य से जुड़कर उत्पन्न होता है; और भाग्य उसे वैसे नहीं खींचता जैसा वह स्वयं चाहता है।"
श्लोक 6 (7.24.6)
द्यूतव्यसनमासाद्य क्लेशितो हि युधिष्ठिरः । स पुनर्भागधेयेन सहायानुपलब्धवान् ॥
dyūtavyasanamāsādya kleśito hi yudhiṣṭhiraḥ | sa punarbhāgadheyena sahāyānupalabdhavān
"द्यूत की विपत्ति में पड़कर युधिष्ठिर कष्ट पा चुके थे; फिर भी भाग्य से उन्हें फिर सहायक मिल गए हैं।"
श्लोक 7 (7.24.7)
अर्धं मे केकया लब्धाः काशिकाः कोसलाश्चये । चेदीनां चार्धमपरे मामेव समुपाश्रिताः ॥
ardhaṃ me kekayā labdhāḥ kāśikāḥ kosalāścaye | cedīnāṃ cārdhamapare māmeva samupāśritāḥ
"केकयों का आधा भाग मुझे मिला है, काशी और कोसल के लोग भी, और चेदियों का आधा; दूसरे भी केवल मेरे ही आश्रय में आए हैं।"
श्लोक 8 (7.24.8)
पृथिवी भूयसी तात मम पार्थस्य नो तथा । इति मामब्रवीत्सूत मन्दो दुर्योधनः पुरा ॥
pṛthivī bhūyasī tāta mama pārthasya no tathā | iti māmabravītsūta mando duryodhanaḥ purā
"'तात, पृथ्वी मेरे पास अधिक है, पार्थ के पास वैसी नहीं': सूत सञ्जय, मूर्ख दुर्योधन ने पहले मुझसे यही कहा था।"
श्लोक 9 (7.24.9)
तस्य सेनासमूहस्य मध्ये द्रोणः सुरक्षितः । निहतः पार्षतेनाजौ किमन्यद्भागधेयतः ॥
tasya senāsamūhasya madhye droṇaḥ surakṣitaḥ | nihataḥ pārṣatenājau kimanyadbhāgadheyataḥ
"अपनी सेना-समूह के बीच भली-भाँति रक्षित द्रोण पार्षत (धृष्टद्युम्न) के हाथों रण में मारे गए। यह दैव के सिवा और क्या है?"
श्लोक 10 (7.24.10)
मध्ये राज्ञां महाबाहुं सदा युद्धाभिनन्दिनम् । सर्वास्त्रपारगं द्रोणं कथं मृत्युरुपेयिवान् ॥
madhye rājñāṃ mahābāhuṃ sadā yuddhābhinandinam | sarvāstrapāragaṃ droṇaṃ kathaṃ mṛtyurupeyivān
"सदा युद्ध में आनन्द पाने वाले, सब अस्त्रों में पारंगत महाबाहु द्रोण को राजाओं के बीच मृत्यु कैसे प्राप्त हुई?"
श्लोक 11 (7.24.11)
समनुप्राप्तकृच्छ्रोऽहं मोहं परममागतः । भीष्मद्रोणौ हतौ श्रुत्वा नाहं जीवितुमुत्सहे ॥
samanuprāptakṛcchro'haṃ mohaṃ paramamāgataḥ | bhīṣmadroṇau hatau śrutvā nāhaṃ jīvitumutsahe
"मैं भारी संकट में पड़ गया हूँ और अत्यन्त मोहित हो गया हूँ। भीष्म और द्रोण के मारे जाने की बात सुनकर मैं जीवित रहना सहन नहीं कर सकता।"
श्लोक 12 (7.24.12)
यन्मां क्षत्ताऽब्रवीत्तात प्रपश्यन्पुत्रगृद्धिनम् । दुर्योधनेन तत्सर्वं प्राप्तं सूत मया सह ॥
yanmāṃ kṣattā'bravīttāta prapaśyanputragṛddhinam | duryodhanena tatsarvaṃ prāptaṃ sūta mayā saha
"तात, पुत्र के प्रति मेरी आसक्ति देखकर क्षत्ता (विदुर) ने मुझसे जो कहा था, सञ्जय, वह सब दुर्योधन पर और उसके साथ मुझ पर भी आ पड़ा है।"
श्लोक 13 (7.24.13)
नृशंसं तु परं तात त्यक्त्वा दुर्योधनं यदि । पुत्रशेषं चिकीर्षेयं कृत्स्नं न मरणं व्रजेत् ॥
nṛśaṃsaṃ tu paraṃ tāta tyaktvā duryodhanaṃ yadi | putraśeṣaṃ cikīrṣeyaṃ kṛtsnaṃ na maraṇaṃ vrajet
"तात, दुर्योधन को त्याग देना बहुत निष्ठुर काम होता; फिर भी यदि मैं शेष पुत्रों को बचाना चाहता, तो सब के सब मृत्यु को प्राप्त न होते।"
श्लोक 14 (7.24.14)
यो हि धर्मं परित्यज्य भवत्यर्थपरो नरः । सोऽस्माच्च हीयते लोकात्क्षुद्रभावं च गच्छति ॥
yo hi dharmaṃ parityajya bhavatyarthaparo naraḥ | so'smācca hīyate lokātkṣudrabhāvaṃ ca gacchati
"जो मनुष्य धर्म को छोड़कर केवल धन के पीछे लग जाता है, वह इस लोक से गिर जाता है और नीच दशा को प्राप्त होता है।"
श्लोक 15 (7.24.15)
अद्य चाप्यस्य राष्ट्रस्य कृतोच्छेदस्य सञ्जय । अवशेषं न पश्यामि ककुदे मृदिते सति ॥
adya cāpyasya rāṣṭrasya kṛtocchedasya sañjaya | avaśeṣaṃ na paśyāmi kakude mṛdite sati
"सञ्जय, इस उजड़े हुए राष्ट्र में भी मुझे अब कुछ बचा नहीं दिखता, क्योंकि इसका ककुद, इसका प्रधान, कुचल दिया गया है।"
श्लोक 16 (7.24.16)
कथं स्यादवशेषो हि धुर्ययोरभ्यतीतयोः । यौ नित्यमुपजीवामः क्षमिणौ पुरुषर्षभौ ॥
kathaṃ syādavaśeṣo hi dhuryayorabhyatītayoḥ | yau nityamupajīvāmaḥ kṣamiṇau puruṣarṣabhau
"जब दो धुरन्धर चले गए, तो शेष कैसे रहे? वे दोनों क्षमाशील पुरुषश्रेष्ठ थे, जिनके सहारे हम सदा जीते रहे।"
श्लोक 17 (7.24.17)
व्यक्तमेव च मे शंस यथा युद्धमवर्तत । केऽयुध्यन्के व्यपाकुर्वन्के क्षुद्राः प्राद्रवन्भयात् ॥
vyaktameva ca me śaṃsa yathā yuddhamavartata | ke'yudhyanke vyapākurvanke kṣudrāḥ prādravanbhayāt
"मुझे स्पष्ट बताओ कि युद्ध कैसे हुआ: किन्होंने लड़ाई की, कौन पीछे हटे, और कौन कायर भय से भाग गए।"
श्लोक 18 (7.24.18)
धनञ्जयं च मे शंस यद्यच्चक्रे रथर्षभः । तस्माद्भयं नो भूयिष्ठं भ्रातृव्याच्च वृकोदरात् ॥
dhanañjayaṃ ca me śaṃsa yadyaccakre ratharṣabhaḥ | tasmādbhayaṃ no bhūyiṣṭhaṃ bhrātṛvyācca vṛkodarāt
"और मुझे बताओ कि रथियों में श्रेष्ठ धनञ्जय ने क्या-क्या किया; क्योंकि हमें सबसे अधिक भय उसी से है, और भतीजे वृकोदर से भी।"
श्लोक 19 (7.24.19)
यथाऽसीच्च निवृत्तेषु पाण्डवेयेषु सञ्जय । मम सैन्यावशेषस्य सन्निपातः सुदारुणः ॥
yathā'sīcca nivṛtteṣu pāṇḍaveyeṣu sañjaya | mama sainyāvaśeṣasya sannipātaḥ sudāruṇaḥ
"और सञ्जय, जब पाण्डव लौट आए, तब मेरी बची-खुची सेना के साथ उनकी वह भयंकर टक्कर कैसी हुई?"
श्लोक 20 (7.24.20)
कथं च वो मनस्तात निवृत्तेष्वभवत्तदा । मामकानां च ये शूराः के कांस्तत्र न्यवारयन् ॥
kathaṃ ca vo manastāta nivṛtteṣvabhavattadā | māmakānāṃ ca ye śūrāḥ ke kāṃstatra nyavārayan
"तात, जब वे लौट आए, तब तुम लोगों के मन की क्या दशा थी? और मेरे जो शूर थे, उनमें से किसने वहाँ किन्हें रोका?"