Skip to main content

द्रोण पर्व · अध्याय 25

द्रोण के चारों ओर द्वन्द्व-युद्ध

सञ्जय बताते हैं कि जब पाण्डव लौट आए और द्रोण दिखाई देना बन्द हो गए, तब कौरवों में कैसा भय फैला, और दुर्योधन ने सबको उन्हें रोकने का आदेश दिया। फिर द्वन्द्व-युद्धों की लम्बी कड़ी चलती है: दुर्मर्षण और भीम, कृतवर्मा और सात्यकि, जयद्रथ और क्षत्रवर्मा, युयुत्सु और सुबाहु, शल्य और युधिष्ठिर, तथा और भी बहुत-से, जिनमें विकर्ण और शिखण्डी, कर्ण और केकय, कृप और वार्धक्षेमि भी हैं। घटोत्कच कौरव-सेना पर टूट पड़ता है और अलम्बुष उससे राक्षसों के युद्ध में भिड़ता है; अन्त में सञ्जय कहते हैं कि ऐसा युद्ध न पहले देखा गया, न सुना गया।

अध्याय 24अध्याय-सूचीअध्याय 26

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.25.1)

महद्भैरवमासीन्नः सन्निवृत्तेषु पाण्डुषु । दृष्ट्वा द्रोणं छाद्यमानं तैर्भास्करमिवाम्बुदैः ॥

mahadbhairavamāsīnnaḥ sannivṛtteṣu pāṇḍuṣu | dṛṣṭvā droṇaṃ chādyamānaṃ tairbhāskaramivāmbudaiḥ

जब पाण्डव लौट आए और हमने द्रोण को उनसे वैसे ही ढकते देखा जैसे बादल सूर्य को ढक लेते हैं, तब हम पर भारी भय छा गया।

श्लोक 2 (7.25.2)

तैश्चोद्भूतं रजस्तीव्रमवचक्रे चमूं तव । ततो हतममंस्याम द्रोणं दृष्टिपथे हते ॥

taiścodbhūtaṃ rajastīvramavacakre camūṃ tava | tato hatamamaṃsyāma droṇaṃ dṛṣṭipathe hate

उनकी उठाई हुई घनी धूल ने आपकी सेना को ढक लिया; तब द्रोण की ओर दृष्टि रुक जाने पर हमने समझा कि वे मारे गए।

श्लोक 3 (7.25.3)

तांस्तु शूरान्महेष्वासान्क्रूरं कर्म चिकीर्षतः । दृष्ट्वा दुर्योधनस्तूर्णं स्वसैन्यं समचूचुदत् ॥

tāṃstu śūrānmaheṣvāsānkrūraṃ karma cikīrṣataḥ | dṛṣṭvā duryodhanastūrṇaṃ svasainyaṃ samacūcudat

उन शूर महाधनुर्धरों को क्रूर कर्म करने पर उतारू देखकर दुर्योधन ने शीघ्र अपनी सेना को उभारा।

दुर्योधन उवाच

श्लोक 4 (7.25.4)

यथाशक्ति यथोत्साहं यथासत्वं नराधिपाः । वारयध्वं यथायोगं पाण्डवानामनीकिनीम् ॥

yathāśakti yathotsāhaṃ yathāsatvaṃ narādhipāḥ | vārayadhvaṃ yathāyogaṃ pāṇḍavānāmanīkinīm

"हे राजाओ, अपनी शक्ति, उत्साह और पराक्रम के अनुसार, जिसे जो उचित जान पड़े, पाण्डवों की सेना को रोको।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 5 (7.25.5)

ततो दुर्मर्षणो भीममभ्यगच्छत्सुतस्तव । आराद्दृष्ट्वा किरन्बाणैरिच्छन्द्रोणस्य जीवितम् ॥

tato durmarṣaṇo bhīmamabhyagacchatsutastava | ārāddṛṣṭvā kiranbāṇairicchandroṇasya jīvitam

तब आपके पुत्र दुर्मर्षण ने भीम को दूर से देखकर, द्रोण के प्राण बचाने की इच्छा से, बाण बरसाते हुए उनकी ओर प्रस्थान किया।

श्लोक 6 (7.25.6)

तं बाणैरवतस्तार क्रुद्धो मृत्युरिवाहवे । तं च भीमोऽतुदद्बाणैस्तदाऽऽसीत्तुमुलं महत् ॥

taṃ bāṇairavatastāra kruddho mṛtyurivāhave | taṃ ca bhīmo'tudadbāṇaistadā''sīttumulaṃ mahat

रण में मृत्यु के समान क्रुद्ध होकर उसने भीम को बाणों से ढक दिया, और भीम ने भी उसे बाणों से पीड़ित किया; तब बड़ा घमासान मचा।

श्लोक 7 (7.25.7)

त ईश्वरसमादिष्टाः प्राज्ञाः शूराः प्रहारिणः । राज्यं मृत्युभयं त्यक्त्वा प्रत्यतिष्ठन्परान्युधि ॥

ta īśvarasamādiṣṭāḥ prājñāḥ śūrāḥ prahāriṇaḥ | rājyaṃ mṛtyubhayaṃ tyaktvā pratyatiṣṭhanparānyudhi

अपने स्वामी की आज्ञा पाए हुए वे बुद्धिमान् और पराक्रमी प्रहारकर्ता राज्य और मृत्यु का भय त्यागकर रण में शत्रुओं के सामने डट गए।

श्लोक 8 (7.25.8)

कृतवर्मा शिनेः पौत्रं द्रोणं प्रेप्सुं विशाम्पते । पर्यवारयदायान्तं शूरं समरशोभिनम् ॥

kṛtavarmā śineḥ pautraṃ droṇaṃ prepsuṃ viśāmpate | paryavārayadāyāntaṃ śūraṃ samaraśobhinam

हे प्रजापालक, कृतवर्मा ने द्रोण तक पहुँचना चाहने वाले, रण की शोभा बढ़ाने वाले शूर शिनिपौत्र (सात्यकि) को आते हुए रोका।

श्लोक 9 (7.25.9)

तं शैनेयः शरव्रातैः क्रुद्धः क्रुद्धमवारयत् । कृतवर्मा च शैनेयं मत्तो मत्तमिव द्विपम् ॥

taṃ śaineyaḥ śaravrātaiḥ kruddhaḥ kruddhamavārayat | kṛtavarmā ca śaineyaṃ matto mattamiva dvipam

शैनेय ने क्रोध में बाणों की झड़ी से उसे रोका, और कृतवर्मा ने क्रोध में शैनेय को रोका, जैसे एक मदमत्त हाथी दूसरे मदमत्त हाथी को रोकता है।

श्लोक 10 (7.25.10)

सैन्धवः क्षत्रवर्माणमायान्तं निशितैः शरैः । उग्रधन्वा महेष्वासं यत्तो द्रोणादवारयत् ॥

saindhavaḥ kṣatravarmāṇamāyāntaṃ niśitaiḥ śaraiḥ | ugradhanvā maheṣvāsaṃ yatto droṇādavārayat

तब उग्र धनुषवाले सैन्धव (जयद्रथ) ने तत्पर होकर आते हुए महाधनुर्धर क्षत्रवर्मा को तीखे बाणों से द्रोण के पास पहुँचने से रोक दिया।

श्लोक 11 (7.25.11)

क्षत्रवर्मा सिन्धुपतेश्छित्त्वा केतनकार्मुके । नाराचैर्दशभिः क्रुद्धः सर्वमर्मस्वताडयत् ॥

kṣatravarmā sindhupateśchittvā ketanakārmuke | nārācairdaśabhiḥ kruddhaḥ sarvamarmasvatāḍayat

क्षत्रवर्मा ने सिन्धुराज की ध्वजा और धनुष काटकर क्रोध में उसके सब मर्मस्थानों पर दस नाराचों से प्रहार किया।

श्लोक 12 (7.25.12)

अथान्यद्धनुरादाय सैन्धवः कृतहस्तवत् । विव्याध क्षत्रवर्माणं रणे सर्वायसैः शरैः ॥

athānyaddhanurādāya saindhavaḥ kṛtahastavat | vivyādha kṣatravarmāṇaṃ raṇe sarvāyasaiḥ śaraiḥ

तब दूसरा धनुष लेकर सैन्धव ने सधे हाथों से रण में क्षत्रवर्मा को पूर्णतः लोहे के बने बाणों से बींध दिया।

श्लोक 13 (7.25.13)

युयुत्सुं पाण्डवार्थाय यतमानं महारथम् । सुबाहुर्भारतं शूरं यत्तो द्रोणादवारयत् ॥

yuyutsuṃ pāṇḍavārthāya yatamānaṃ mahāratham | subāhurbhārataṃ śūraṃ yatto droṇādavārayat

पाण्डवों के हित के लिए प्रयत्न करते हुए वीर भरतवंशी महारथी युयुत्सु को सुबाहु ने तत्पर होकर द्रोण के पास जाने से रोका।

श्लोक 14 (7.25.14)

सुबाहोः सधनुर्बाणावस्यतः परिघोपमौ । युयुत्सुः शितपीताभ्यां क्षुराभ्यामच्छिनद्भुजौ ॥

subāhoḥ sadhanurbāṇāvasyataḥ parighopamau | yuyutsuḥ śitapītābhyāṃ kṣurābhyāmacchinadbhujau

बाण चलाते हुए सुबाहु की दोनों भुजाओं को, जो परिघ के समान थीं, युयुत्सु ने धनुष-बाण सहित दो तेज़, पीली आभावाले क्षुर बाणों से काट डाला।

श्लोक 15 (7.25.15)

राजानं पाण्डवश्रेष्ठं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् । वेलेव सागरं क्षुब्धं मद्रराट् समवारयत् ॥

rājānaṃ pāṇḍavaśreṣṭhaṃ dharmātmānaṃ yudhiṣṭhiram | veleva sāgaraṃ kṣubdhaṃ madrarāṭ samavārayat

मद्रराज ने पाण्डवों में श्रेष्ठ, धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर को वैसे ही रोका जैसे तट उमड़ते समुद्र को रोकता है।

श्लोक 16 (7.25.16)

तं धर्मराजो बहुभिर्मर्मभिद्भिरवाकिरत् । मद्रेशस्तं चतुःषष्ट्या शरैर्विद्ध्वाऽनदद्भृशम् ॥

taṃ dharmarājo bahubhirmarmabhidbhiravākirat | madreśastaṃ catuḥṣaṣṭyā śarairviddhvā'nadadbhṛśam

धर्मराज ने उसे मर्म भेदने वाले बहुत-से बाणों से ढक दिया, और मद्रराज ने उसे चौंसठ बाणों से बींधकर ज़ोर से गर्जना की।

श्लोक 17 (7.25.17)

तस्य नानदतः केतुमुच्चकर्त च कार्मुकम् । क्षुराभ्यां पाण्डवो ज्येष्ठस्तत उच्चुक्रुशुर्जनाः ॥

tasya nānadataḥ ketumuccakarta ca kārmukam | kṣurābhyāṃ pāṇḍavo jyeṣṭhastata uccukruśurjanāḥ

गर्जना करते हुए उसकी ध्वजा और धनुष को ज्येष्ठ पाण्डव ने दो क्षुर बाणों से काट डाला; तब लोग चिल्ला उठे।

श्लोक 18 (7.25.18)

तथैव राजा बाह्लीको राजानं द्रुपदं शरैः । आद्रवन्तं सहानीकः सहानीकं न्यवारयत् ॥

tathaiva rājā bāhlīko rājānaṃ drupadaṃ śaraiḥ | ādravantaṃ sahānīkaḥ sahānīkaṃ nyavārayat

इसी प्रकार राजा बाह्लीक ने अपनी सेना के साथ, सेना सहित आक्रमण करते हुए राजा द्रुपद को रोका।

श्लोक 19 (7.25.19)

तद्युद्धमभवद्धोरं वृद्धयोः सहसेनयोः । यथा महायूथपयोर्द्विपयोः सम्प्रभिन्नयोः ॥

tadyuddhamabhavaddhoraṃ vṛddhayoḥ sahasenayoḥ | yathā mahāyūthapayordvipayoḥ samprabhinnayoḥ

उन दोनों वृद्ध राजाओं का सेनाओं सहित वह युद्ध भयंकर हुआ, जैसे यूथों के दो महान् नायक मदमत्त हाथियों का होता है।

श्लोक 20 (7.25.20)

विन्दानुविन्दावावन्त्यौ विराटं मत्स्यमार्च्छताम् । सहसैन्यौ सहानीकं यथेन्द्राग्नी पुरा बलिम् ॥

vindānuvindāvāvantyau virāṭaṃ matsyamārcchatām | sahasainyau sahānīkaṃ yathendrāgnī purā balim

अवन्ति के विन्द और अनुविन्द भाई अपनी सेनाओं के साथ मत्स्यराज विराट पर टूट पड़े, जैसे पूर्वकाल में इन्द्र और अग्नि बलि पर टूटे थे।

श्लोक 21 (7.25.21)

तदुत्पिञ्जलकं युद्धमासीद्देवासुरोपमम् । मत्स्यानां केकयैः सार्धमभीताश्वरथद्विपम् ॥

tadutpiñjalakaṃ yuddhamāsīddevāsuropamam | matsyānāṃ kekayaiḥ sārdhamabhītāśvarathadvipam

मत्स्यों का केकयों के साथ वह घमासान युद्ध देवासुर-संग्राम के समान हुआ, जिसमें घोड़े, रथ और हाथी निडर थे।

श्लोक 22 (7.25.22)

नाकुलिं तु शतानीकं भूतकर्मा सभापतिः । अस्यन्तमिषुजालानि यान्तं द्रोणादवारयत् ॥

nākuliṃ tu śatānīkaṃ bhūtakarmā sabhāpatiḥ | asyantamiṣujālāni yāntaṃ droṇādavārayat

सभापति भूतकर्मा ने बाणों के जाल बरसाते हुए द्रोण की ओर जाते नकुलपुत्र शतानीक को रोका।

श्लोक 23 (7.25.23)

ततो नकुलदायादस्त्रिभिर्भल्लैः सुसंशितैः । चक्रे विबाहुशिरसं भूतकर्माणमाहवे ॥

tato nakuladāyādastribhirbhallaiḥ susaṃśitaiḥ | cakre vibāhuśirasaṃ bhūtakarmāṇamāhave

तब नकुल के पुत्र ने तीन खूब तेज़ भल्ल बाणों से रण में भूतकर्मा को भुजाओं और सिर से रहित कर दिया।

श्लोक 24 (7.25.24)

सुतसोमं तु विक्रान्तमायान्तं तं शरौघिणम् । द्रोणायाभिमुखं वीरं साल्वो बाणैरवारयत् ॥

sutasomaṃ tu vikrāntamāyāntaṃ taṃ śaraughiṇam | droṇāyābhimukhaṃ vīraṃ sālvo bāṇairavārayat

द्रोण की ओर बढ़ते हुए पराक्रमी, बाणों की बाढ़ बरसाने वाले वीर सुतसोम को शाल्व ने बाणों से रोका।

श्लोक 25 (7.25.25)

स तु भीमरथः साल्वमाशुगैरायसैः शितैः । षड्भिः साश्वनियन्तारमनयद्यमसादनम् ॥

sa tu bhīmarathaḥ sālvamāśugairāyasaiḥ śitaiḥ | ṣaḍbhiḥ sāśvaniyantāramanayadyamasādanam

पर भीमरथ ने छह तीखे लोहे के बाणों से शाल्व को घोड़ों और सारथि सहित यमलोक पहुँचा दिया।

श्लोक 26 (7.25.26)

श्रुतकीर्तिं समायान्तं मयूरसदृशैर्हयैः । चित्रसेनो महाराज तव पौत्रं न्यवारयत् ॥

śrutakīrtiṃ samāyāntaṃ mayūrasadṛśairhayaiḥ | citraseno mahārāja tava pautraṃ nyavārayat

महाराज, चित्रसेन ने मोरों जैसे घोड़ों के साथ आते हुए आपके पौत्र श्रुतकीर्ति को रोका।

श्लोक 27 (7.25.27)

तमार्जुनिः शरैश्चक्रे पितृव्यं जर्झरच्छविम् । शरैश्च द्रौपदीपुत्रं चित्रसेनः समावृणोत् ॥

tamārjuniḥ śaraiścakre pitṛvyaṃ jarjharacchavim | śaraiśca draupadīputraṃ citrasenaḥ samāvṛṇot

अर्जुन के पुत्र ने अपने चाचा चित्रसेन का शरीर बाणों से छलनी कर दिया, और चित्रसेन ने द्रौपदी के पुत्र को बाणों से ढक दिया।

श्लोक 28 (7.25.28)

किरन्तं शरजालानि प्रभिन्नमिव कुञ्जरम् । श्रुतकर्माणमायान्तं दौश्शासनिरवारयत् ॥

kirantaṃ śarajālāni prabhinnamiva kuñjaram | śrutakarmāṇamāyāntaṃ dauśśāsaniravārayat

मदमत्त हाथी की तरह बाणों के जाल बरसाते हुए आते श्रुतकर्मा को दुःशासन के पुत्र ने रोका।

श्लोक 29 (7.25.29)

तौ पौत्रौ तव दुर्धर्षौ परस्परवधैषिणौ । पितॄणामर्थसिद्ध्यर्थं चक्रतुर्युद्धमुत्तमम् ॥

tau pautrau tava durdharṣau parasparavadhaiṣiṇau | pitṝṇāmarthasiddhyarthaṃ cakraturyuddhamuttamam

आपके वे दोनों पौत्र, जो दुर्धर्ष थे और एक-दूसरे का वध चाहते थे, अपने पिताओं का उद्देश्य सिद्ध करने के लिए श्रेष्ठ युद्ध करने लगे।

श्लोक 30 (7.25.30)

तिष्ठन्तमग्रे तं दृष्ट्वा प्रतिविन्ध्यं महाहवे । द्रौणिर्मानं पितुः कुर्वन्मार्गणैः समवारयत् ॥

tiṣṭhantamagre taṃ dṛṣṭvā prativindhyaṃ mahāhave | drauṇirmānaṃ pituḥ kurvanmārgaṇaiḥ samavārayat

उस महायुद्ध में सामने खड़े प्रतिविन्ध्य को देखकर द्रोणपुत्र ने अपने पिता का मान रखते हुए उसे बाणों से रोका।

श्लोक 31 (7.25.31)

तं क्रुद्धं प्रतिविव्याध प्रतिविन्ध्यः शितैः शरैः । सिंहलाङ्गूललक्ष्माणं पितुरर्थे व्यवस्थितम् ॥

taṃ kruddhaṃ prativivyādha prativindhyaḥ śitaiḥ śaraiḥ | siṃhalāṅgūlalakṣmāṇaṃ piturarthe vyavasthitam

प्रतिविन्ध्य ने क्रुद्ध होकर उसे तीखे बाणों से बींध दिया, जिसकी ध्वजा पर सिंह की पूँछ का चिह्न था और जो पिता के लिए वहाँ डटा था।

श्लोक 32 (7.25.32)

प्रवपन्निव बीजानि बीजकाले कृषीवलः । द्रौणायनिर्द्रौपदेयं शरवर्षैरवाकिरत् ॥

pravapanniva bījāni bījakāle kṛṣīvalaḥ | drauṇāyanirdraupadeyaṃ śaravarṣairavākirat

जैसे किसान बुआई के समय बीज बोता है, वैसे ही द्रोणपुत्र ने द्रौपदीपुत्र पर बाणों की वर्षा कर दी।

श्लोक 33 (7.25.33)

यस्तु शूरतमो राजन्नुभयोः सेनयोर्मतः । तं पटच्चरहन्तारं लक्ष्मणः समवारयत् ॥

yastu śūratamo rājannubhayoḥ senayormataḥ | taṃ paṭaccarahantāraṃ lakṣmaṇaḥ samavārayat

हे राजन्, दोनों सेनाओं में जिसे सबसे बड़ा शूर माना जाता है, उस पटच्चरों के संहारक को लक्ष्मण ने रोका।

श्लोक 34 (7.25.34)

स लक्ष्मणस्येष्वसनं छित्त्वा लक्ष्म च भारत । लक्ष्मणे शरजालानि विसृजन्बह्वशोभत ॥

sa lakṣmaṇasyeṣvasanaṃ chittvā lakṣma ca bhārata | lakṣmaṇe śarajālāni visṛjanbahvaśobhata

हे भारत, उसने लक्ष्मण का धनुष और ध्वज काट डाला और लक्ष्मण पर बाणों के जाल छोड़ते हुए खूब शोभित हुआ।

श्लोक 35 (7.25.35)

ततोऽभिमन्युः कर्माणि कुर्वन्तं चित्रयोधिनम् । आर्जुनिः कृतिनं शूरं लक्ष्मणं समयोधयत् ॥

tato'bhimanyuḥ karmāṇi kurvantaṃ citrayodhinam | ārjuniḥ kṛtinaṃ śūraṃ lakṣmaṇaṃ samayodhayat

तब अर्जुनपुत्र अभिमन्यु ने पराक्रम दिखाते हुए उस निपुण, विचित्र ढंग से लड़ने वाले वीर लक्ष्मण से युद्ध किया।

श्लोक 36 (7.25.36)

स सम्प्रहारस्तुमुलस्तयोरासीन्महात्मनोः । श्रोतॄणामीक्षितॄणां च भृशं प्रीतिविवर्धनः ॥

sa samprahārastumulastayorāsīnmahātmanoḥ | śrotṝṇāmīkṣitṝṇāṃ ca bhṛśaṃ prītivivardhanaḥ

उन दोनों महात्माओं का वह संघर्ष घमासान था और सुनने तथा देखने वालों की प्रसन्नता को बहुत बढ़ाता था।

श्लोक 37 (7.25.37)

विकर्णस्तु महाप्राज्ञो याज्ञसेनिं शिखण्डिनम् । पर्यवारयदायान्तं युवानं समरे युवा ॥

vikarṇastu mahāprājño yājñaseniṃ śikhaṇḍinam | paryavārayadāyāntaṃ yuvānaṃ samare yuvā

महाप्रज्ञ विकर्ण ने स्वयं युवा होकर, रण में आते हुए युवा याज्ञसेनि शिखण्डी को रोका।

श्लोक 38 (7.25.38)

ततस्तमिषुजालेन याज्ञसेनिः समावृणोत् । विधूय तद्बाणजालं बभौ तव सुतो बली ॥

tatastamiṣujālena yājñaseniḥ samāvṛṇot | vidhūya tadbāṇajālaṃ babhau tava suto balī

तब याज्ञसेनि ने उसे बाणों के जाल से ढक दिया, पर आपका बलवान् पुत्र उस बाण-जाल को झटककर दीप्त हो उठा।

श्लोक 39 (7.25.39)

अङ्गदोऽभिमुखं वीरमुत्तमौजसमाहवे । द्रोणायाभिमुखं यान्तं शरौघेण न्यवारयत् ॥

aṅgado'bhimukhaṃ vīramuttamaujasamāhave | droṇāyābhimukhaṃ yāntaṃ śaraugheṇa nyavārayat

अङ्गद ने रण में वीर उत्तमौजा का सामना किया और द्रोण की ओर जाते हुए उसे बाणों की बाढ़ से रोक दिया।

श्लोक 40 (7.25.40)

स सम्प्रहारस्तुमुलस्तयोः पुरुषसिंहयोः । सैनिकानां च सर्वेषां तयोश्च प्रीतिवर्धनः ॥

sa samprahārastumulastayoḥ puruṣasiṃhayoḥ | sainikānāṃ ca sarveṣāṃ tayośca prītivardhanaḥ

उन दोनों पुरुषसिंहों का वह संघर्ष घमासान था और सब सैनिकों तथा उन दोनों का आनन्द बढ़ाता था।

श्लोक 41 (7.25.41)

दुर्मुखस्तु महेष्वासो वीरं पुरुजितं बली । द्रोणायाभिमुखं यान्तं वत्सदन्तैरवारयत् ॥

durmukhastu maheṣvāso vīraṃ purujitaṃ balī | droṇāyābhimukhaṃ yāntaṃ vatsadantairavārayat

बली महाधनुर्धर दुर्मुख ने द्रोण की ओर बढ़ते हुए वीर पुरुजित् को वत्सदन्त बाणों से रोका।

श्लोक 42 (7.25.42)

स दुर्मुखं भ्रुवोर्मध्ये नाराचेनाभ्यताडयत् । तस्य तद्धि बभौ वक्त्रं सनालमिव पङ्कजम् ॥

sa durmukhaṃ bhruvormadhye nārācenābhyatāḍayat | tasya taddhi babhau vaktraṃ sanālamiva paṅkajam

पुरुजित् ने दुर्मुख की भौंहों के बीच नाराच से प्रहार किया, और उसका वह मुख डंठल सहित कमल जैसा शोभित हुआ।

श्लोक 43 (7.25.43)

कर्णस्तु केकयान्भ्रातॄन्पञ्च लोहितकध्वजान् । द्रोणायाभिमुखं याताञ्शरवर्षैरवारयत् ॥

karṇastu kekayānbhrātṝnpañca lohitakadhvajān | droṇāyābhimukhaṃ yātāñśaravarṣairavārayat

कर्ण ने द्रोण की ओर बढ़ते हुए लाल ध्वजावाले पाँचों केकय भाइयों को बाणों की वर्षा से रोका।

श्लोक 44 (7.25.44)

ते चैनं भृशसन्तप्ताः शरवर्षैरवाकिरन् । स च तांश्छादयामास शरजालैः पुनः पुनः ॥

te cainaṃ bhṛśasantaptāḥ śaravarṣairavākiran | sa ca tāṃśchādayāmāsa śarajālaiḥ punaḥ punaḥ

अत्यन्त सताए जाने पर उन्होंने उसे बाणों की वर्षा से ढक दिया, और उसने भी बार-बार बाणों के जाल से उन्हें ढक दिया।

श्लोक 45 (7.25.45)

नैव कर्णो न ते पञ्च ददृशुर्बाणसंवृताः । साश्वसूतध्वजरथाः परस्परशराचिताः ॥

naiva karṇo na te pañca dadṛśurbāṇasaṃvṛtāḥ | sāśvasūtadhvajarathāḥ parasparaśarācitāḥ

बाणों से ढके हुए न कर्ण दिखाई देता था, न वे पाँच; उनके घोड़े, सारथि, ध्वज और रथ एक-दूसरे के बाणों से बिंधे हुए थे।

श्लोक 46 (7.25.46)

पुत्रास्ते दुर्जयश्चैव जयश्च विजयश्च ह । नीलकाश्यजयत्सेनांस्त्रयस्त्रीन्प्रत्यवारयन् ॥

putrāste durjayaścaiva jayaśca vijayaśca ha | nīlakāśyajayatsenāṃstrayastrīnpratyavārayan

आपके तीन पुत्र दुर्जय, जय और विजय ने नील, काश्य और जयत्सेन इन तीनों को रोका।

श्लोक 47 (7.25.47)

तद्युद्धमभवद्धोरमीक्षितृप्रीतिवर्धनम् । सिंहव्याघ्रतरक्षूणां यथर्क्षमहिषर्षभैः ॥

tadyuddhamabhavaddhoramīkṣitṛprītivardhanam | siṃhavyāghratarakṣūṇāṃ yatharkṣamahiṣarṣabhaiḥ

वह युद्ध भयंकर था और देखने वालों का आनन्द बढ़ाता था, जैसे सिंह, बाघ और तेंदुओं का रीछ, भैंसों और साँड़ों से युद्ध हो।

श्लोक 48 (7.25.48)

क्षेमधूर्तिबृहन्तौ तु भ्रातरौ सात्वतं युधि । द्रोणायाभिमुखं यान्तं शरैस्तीक्ष्णैस्ततक्षतुः ॥

kṣemadhūrtibṛhantau tu bhrātarau sātvataṃ yudhi | droṇāyābhimukhaṃ yāntaṃ śaraistīkṣṇaistatakṣatuḥ

क्षेमधूर्ति और बृहन्त दोनों भाइयों ने द्रोण की ओर जाते हुए सात्वत (सात्यकि) को तीखे बाणों से घायल किया।

श्लोक 49 (7.25.49)

तयोस्तस्य च तद्युद्धमत्यद्भुतमिवाभवत् । सिंहस्य द्विपमुख्याभ्यां प्रभिन्नाभ्यां यथा वने ॥

tayostasya ca tadyuddhamatyadbhutamivābhavat | siṃhasya dvipamukhyābhyāṃ prabhinnābhyāṃ yathā vane

उन दोनों का उसके साथ वह युद्ध बहुत अद्भुत हुआ, जैसे वन में एक सिंह का दो मुख्य मदमत्त हाथियों के साथ होता है।

श्लोक 50 (7.25.50)

राजानं तु तथाम्बष्ठमेकं युद्धाभिनन्दिनम् । चेदिराजः शरानस्यन्क्रुद्धो द्रोणादवारयत् ॥

rājānaṃ tu tathāmbaṣṭhamekaṃ yuddhābhinandinam | cedirājaḥ śarānasyankruddho droṇādavārayat

क्रुद्ध चेदिराज ने बाण बरसाते हुए अकेले युद्ध-प्रेमी अम्बष्ठराज को द्रोण के पास जाने से रोका।

श्लोक 51 (7.25.51)

ततोऽम्बष्ठोऽस्थिभेदिन्या निरभिद्यच्छलाकया । स त्यक्त्वा सशरं चापं रथाद्भूमिमुपागमत् ॥

tato'mbaṣṭho'sthibhedinyā nirabhidyacchalākayā | sa tyaktvā saśaraṃ cāpaṃ rathādbhūmimupāgamat

तब अम्बष्ठ ने हड्डी तोड़ने वाली शलाका से उसे बींध दिया; और वह धनुष-बाण छोड़कर रथ से भूमि पर गिर पड़ा।

श्लोक 52 (7.25.52)

वार्धक्षेमिं तु वार्ष्णेयं कृपः शारद्वतः शरैः । अक्षुद्रः क्षुद्रकैर्बाणैः क्रुद्धरूपमवारयत् ॥

vārdhakṣemiṃ tu vārṣṇeyaṃ kṛpaḥ śāradvataḥ śaraiḥ | akṣudraḥ kṣudrakairbāṇaiḥ kruddharūpamavārayat

शरद्वान् के पुत्र कृप ने, जो स्वयं क्षुद्र नहीं थे, छोटे बाणों से क्रोधित दिखते वृष्णिवंशी वार्धक्षेमि को रोका।

श्लोक 53 (7.25.53)

युध्यन्तौ कृपवार्ष्णेयौ येऽपश्यंश्चित्रयोधिनौ । ते युद्धासक्तमनसो नान्यं बुबुधिरे क्रियाम् ॥

yudhyantau kṛpavārṣṇeyau ye'paśyaṃścitrayodhinau | te yuddhāsaktamanaso nānyaṃ bubudhire kriyām

कृप और वृष्णिवंशी, उन दोनों विचित्र योद्धाओं को लड़ते देखने वालों के मन युद्ध में ऐसे रमे कि उन्हें और कोई क्रिया सूझी ही नहीं।

श्लोक 54 (7.25.54)

सौमदत्तिस्तु राजानं मणिमन्तमतन्द्रितम् । पर्यवारयदायान्तं यशो द्रोणस्य वर्धयन् ॥

saumadattistu rājānaṃ maṇimantamatandritam | paryavārayadāyāntaṃ yaśo droṇasya vardhayan

सौमदत्ति ने अथक भाव से आते हुए राजा मणिमान् को रोका और इस प्रकार द्रोण का यश बढ़ाया।

श्लोक 55 (7.25.55)

स सौमदत्तेस्त्वरितश्चित्रेष्वसनकेतने । पुनः पताकां सूतं चच्छत्रं चापातयद्रथात् ॥

sa saumadattestvaritaścitreṣvasanaketane | punaḥ patākāṃ sūtaṃ cacchatraṃ cāpātayadrathāt

उसने शीघ्रता से सौमदत्ति के सुन्दर धनुष और ध्वज को गिरा दिया, और फिर पताका, सारथि और छत्र को रथ से नीचे फेंक दिया।

श्लोक 56 (7.25.56)

अथाप्लुत्य रथात्तूर्णं यूपकेतुरमित्रहा । साश्वसूतध्वजरथं तं चकर्त वरासिना ॥

athāplutya rathāttūrṇaṃ yūpaketuramitrahā | sāśvasūtadhvajarathaṃ taṃ cakarta varāsinā

तब शत्रुनाशक यूपकेतु रथ से तुरन्त कूदा और उसे घोड़ों, सारथि, ध्वज और रथ सहित उत्तम तलवार से काट डाला।

श्लोक 57 (7.25.57)

रथं च स्वं समास्थाय धनुरादाय चापरम् । स्वयं यच्छन्हयान्राजन्व्यधमत्पाण्डवीं चमूम् ॥

rathaṃ ca svaṃ samāsthāya dhanurādāya cāparam | svayaṃ yacchanhayānrājanvyadhamatpāṇḍavīṃ camūm

अपने रथ पर फिर चढ़कर और दूसरा धनुष लेकर, स्वयं घोड़े हाँकते हुए, हे राजन्, उसने पाण्डवों की सेना को चीर डाला।

श्लोक 58 (7.25.58)

पाण्ड्यमिन्द्रमिवायान्तमसुरान्प्रति दुर्जयम् । समर्थः सायकौघेन वृषसेनो न्यवारयत् ॥

pāṇḍyamindramivāyāntamasurānprati durjayam | samarthaḥ sāyakaughena vṛṣaseno nyavārayat

असुरों के विरुद्ध आते इन्द्र के समान दुर्जय पाण्ड्य को समर्थ वृषसेन ने बाणों की वर्षा से रोका।

श्लोक 59 (7.25.59)

अथाजगाम हैडिम्बो महामायो महाबलः । पितॄणां हितमन्विच्छन्दहन्कौरववाहिनीम् ॥

athājagāma haiḍimbo mahāmāyo mahābalaḥ | pitṝṇāṃ hitamanvicchandahankauravavāhinīm

तब हिडिम्बा का पुत्र, महामायावी और महाबली, अपने पिताओं का हित चाहता हुआ और कौरव-सेना को जलाता हुआ वहाँ आया।

श्लोक 60 (7.25.60)

गदापरिघनिस्त्रिंशपट्टसायोघनोपलैः । कडङ्गरैर्भुशुण्डीभिः प्रासैस्तोमरसायकैः ॥

gadāparighanistriṃśapaṭṭasāyoghanopalaiḥ | kaḍaṅgarairbhuśuṇḍībhiḥ prāsaistomarasāyakaiḥ

गदाओं, परिघों, तलवारों, पट्टसों, लोहे के मुद्गरों और पत्थरों से, कडङ्गरों, भुशुण्डियों, प्रासों, तोमरों और बाणों से,

श्लोक 61 (7.25.61)

मुसलैर्मुद्गरैश्चक्रैर्भिण्डिपालपरश्वथैः । पांसुवाताग्निसलिलैर्भस्मलोष्ठतृणद्रुमैः ॥

musalairmudgaraiścakrairbhiṇḍipālaparaśvathaiḥ | pāṃsuvātāgnisalilairbhasmaloṣṭhatṛṇadrumaiḥ

मूसलों, हथौड़ों, चक्रों, भिण्डिपालों और फरसों से, धूल, वायु, अग्नि और जल से, राख, ढेलों, घास और वृक्षों से,

श्लोक 62 (7.25.62)

आतुदन्प्ररुजन्भञ्जन्निघ्नन्विद्रावयन्क्षिपन् । सेनां विभीषयन्नायाद्द्रोणप्रेप्सुर्घटोत्कचः ॥

ātudanprarujanbhañjannighnanvidrāvayankṣipan | senāṃ vibhīṣayannāyāddroṇaprepsurghaṭotkacaḥ

सताता, कुचलता, तोड़ता, मारता, भगाता और फेंकता हुआ, सेना को डराता हुआ घटोत्कच द्रोण को पाने की इच्छा से आया।

श्लोक 63 (7.25.63)

तं तु नानाप्रहरणैर्नानायुद्धविशेषणैः । राक्षसं राक्षसः क्रुद्धः समाजघ्ने ह्यलम्बुसः ॥

taṃ tu nānāpraharaṇairnānāyuddhaviśeṣaṇaiḥ | rākṣasaṃ rākṣasaḥ kruddhaḥ samājaghne hyalambusaḥ

अलम्बुष राक्षस ने क्रुद्ध होकर उस राक्षस पर नाना प्रकार के शस्त्रों और युद्ध की विविध विशेष रीतियों से प्रहार किया।

श्लोक 64 (7.25.64)

तयोस्तदभवद्युद्धं रक्षोग्रामणिमुख्ययोः । तादृग्यादृक्पुरावृत्तं शम्बरामरराजयोः ॥

tayostadabhavadyuddhaṃ rakṣogrāmaṇimukhyayoḥ | tādṛgyādṛkpurāvṛttaṃ śambarāmararājayoḥ

राक्षस-दलों के उन दोनों प्रमुख नायकों का वह युद्ध वैसा ही था जैसा पूर्वकाल में शम्बर और देवराज इन्द्र के बीच हुआ था।

श्लोक 65 (7.25.65)

एवं द्वन्द्वशतान्यासन्रथवारणवाजिनाम् । पदातीनां च भद्रं ते तव तेषां च सङ्कुले ॥

evaṃ dvandvaśatānyāsanrathavāraṇavājinām | padātīnāṃ ca bhadraṃ te tava teṣāṃ ca saṅkule

इस प्रकार रथों, हाथियों, घोड़ों और पैदलों के बीच सैकड़ों द्वन्द्व-युद्ध होने लगे, आपका कल्याण हो, आपके और उनके सैनिकों की उस भीड़ में।

श्लोक 66 (7.25.66)

नैतादृशो दृष्टपूर्वः सङ्ग्रामो नैव च श्रुतः । द्रोणस्याभावभावे तु प्रसक्तानां परस्परम् ॥

naitādṛśo dṛṣṭapūrvaḥ saṅgrāmo naiva ca śrutaḥ | droṇasyābhāvabhāve tu prasaktānāṃ parasparam

द्रोण के जीवित रहने या न रहने के प्रश्न पर एक-दूसरे से भिड़े हुए लोगों का जैसा युद्ध हुआ, वैसा न पहले कभी देखा गया, न सुना गया।

श्लोक 67 (7.25.67)

इदं घोरमिदं चित्रमिदं रौद्रमिति प्रभो । तत्र युद्धान्यदृश्यन्त प्रततानि बहूनि च ॥

idaṃ ghoramidaṃ citramidaṃ raudramiti prabho | tatra yuddhānyadṛśyanta pratatāni bahūni ca

"यह भयंकर है, यह विचित्र है, यह रौद्र है": हे प्रभो, वहाँ बहुत-से फैले हुए युद्ध इसी प्रकार दिखाई देते थे।

अध्याय 24अध्याय-सूचीअध्याय 26