द्रोण पर्व · अध्याय 26
भीम और भगदत्त का हाथी
धृतराष्ट्र पूछते हैं कि सेनाओं के लौट आने पर पाण्डवों और कौरवों ने कैसे युद्ध किया, और सञ्जय अर्जुन से दूर हुए उस दिन के युद्ध का वर्णन करते हैं। भीम दुर्योधन की गज-सेना को छिन्न-भिन्न कर देते हैं और अंगराज को मार गिराते हैं; फिर भगदत्त अपने हाथी सुप्रतीक पर चढ़कर उन पर टूट पड़ता है, और भीम उसके अंगों के बीच छिपकर उसकी पकड़ से निकल जाते हैं, जबकि पाण्डव-सेना उन्हें मरा समझकर चीख उठती है। इसके बाद भगदत्त पाण्डव और पाञ्चाल टुकड़ियों को बिखेर देता है, दशार्णराज को गिरा देता है, रुचिपर्वा को मार डालता है और पूरी सेना को भगा देता है।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (7.26.1)
तेष्वेवं सन्निवृत्तेषु प्रत्युद्यातेषु भागशः । कथं युयुधिरे पार्था मामकाश्च तरस्विनः ॥
teṣvevaṃ sannivṛtteṣu pratyudyāteṣu bhāgaśaḥ | kathaṃ yuyudhire pārthā māmakāśca tarasvinaḥ
जब वे सेनाएँ इस प्रकार लौट आईं और अलग-अलग टुकड़ियों में एक-दूसरे का सामना करने निकलीं, तब पाण्डवों और मेरे पराक्रमी योद्धाओं ने कैसे युद्ध किया?
श्लोक 2 (7.26.2)
किमर्जुनश्चाप्यकरोत्संशप्तकबलं प्रति । संशप्तका वा पार्थस्य किमकुर्वत सञ्जय ॥
kimarjunaścāpyakarotsaṃśaptakabalaṃ prati | saṃśaptakā vā pārthasya kimakurvata sañjaya
और सञ्जय, अर्जुन ने संशप्तकों की सेना के विरुद्ध क्या किया, तथा संशप्तकों ने पार्थ के साथ क्या किया?
सञ्जय उवाच
श्लोक 3 (7.26.3)
तथा तेषु निवृत्तेषु प्रत्युद्यातेषु भागशः । स्वयमभ्यद्रवद्भीमं नागानीकेन ते सुतः ॥
tathā teṣu nivṛtteṣu pratyudyāteṣu bhāgaśaḥ | svayamabhyadravadbhīmaṃ nāgānīkena te sutaḥ
जब वे सेनाएँ इस प्रकार लौट आईं और अलग-अलग टुकड़ियों में एक-दूसरे का सामना करने निकलीं, तब आपका पुत्र स्वयं गज-सेना लेकर भीम पर टूट पड़ा।
श्लोक 4 (7.26.4)
स नाग इव नागेन गोवृषेणेव गोवृषः । समाहूतः स्वयं राज्ञा नागानीकमुपाद्रवत् ॥
sa nāga iva nāgena govṛṣeṇeva govṛṣaḥ | samāhūtaḥ svayaṃ rājñā nāgānīkamupādravat
जैसे हाथी को हाथी ललकारे या साँड़ को साँड़, वैसे ही स्वयं राजा के द्वारा ललकारे जाने पर भीम गज-सेना पर झपटे।
श्लोक 5 (7.26.5)
स युद्धकुशलः पार्थो बाहुवीर्येण चान्वितः । अभिनत्कुञ्जरानीकमचिरेणैव मारिष ॥
sa yuddhakuśalaḥ pārtho bāhuvīryeṇa cānvitaḥ | abhinatkuñjarānīkamacireṇaiva māriṣa
हे मान्यवर, युद्ध में कुशल और भुजाओं के बल से सम्पन्न उस पृथापुत्र ने देखते-देखते गज-सेना को तोड़ डाला।
श्लोक 6 (7.26.6)
ते गजा गिरिसङ्काशाः क्षरन्तः सर्वतो मदम् । भीमसेनस्य नाराचैर्विमुखा विमदीकृताः ॥
te gajā girisaṅkāśāḥ kṣarantaḥ sarvato madam | bhīmasenasya nārācairvimukhā vimadīkṛtāḥ
पर्वत जैसे वे हाथी, जिनसे चारों ओर मद बह रहा था, भीमसेन के नाराच बाणों से मुँह फेरकर भागे और उनका मद उतर गया।
श्लोक 7 (7.26.7)
विधमेदभ्रजालानि यथा वायुः समुद्धतः । व्यधमत्तान्यनीकानि तथैव पवनात्मजः ॥
vidhamedabhrajālāni yathā vāyuḥ samuddhataḥ | vyadhamattānyanīkāni tathaiva pavanātmajaḥ
जैसे प्रचण्ड वायु बादलों के समूहों को उड़ा देती है, वैसे ही पवनपुत्र ने उन सेनाओं को तितर-बितर कर दिया।
श्लोक 8 (7.26.8)
स तेषु विसृजन्बाणान्भीमो नागेष्वशोभत । भुवनेष्विव सर्वेषु गभस्तीनुदितो रविः ॥
sa teṣu visṛjanbāṇānbhīmo nāgeṣvaśobhata | bhuvaneṣviva sarveṣu gabhastīnudito raviḥ
हाथियों पर बाण बरसाते हुए भीम ऐसे शोभित हुए जैसे उदित सूर्य समस्त लोकों पर अपनी किरणें फैला रहा हो।
श्लोक 9 (7.26.9)
ते भीमबाणाभिहताः संस्यूता विबभुर्गजाः । गभस्तिभिरिवार्कस्य व्योम्नि नानाबलाहकाः ॥
te bhīmabāṇābhihatāḥ saṃsyūtā vibabhurgajāḥ | gabhastibhirivārkasya vyomni nānābalāhakāḥ
भीम के बाणों से बिंधे हुए वे हाथी ऐसे दिखाई दिए जैसे आकाश में सूर्य की किरणों से पिरोए हुए अनेक बादल हों।
श्लोक 10 (7.26.10)
तथा गजानां कदनं कुर्वाणमनिलात्मजम् । क्रुद्धो दुर्योधनोऽभ्येत्य प्रत्यविध्यच्छितैः शरैः ॥
tathā gajānāṃ kadanaṃ kurvāṇamanilātmajam | kruddho duryodhano'bhyetya pratyavidhyacchitaiḥ śaraiḥ
जब पवनपुत्र भीम इस प्रकार हाथियों का संहार कर रहे थे, तब क्रुद्ध दुर्योधन ने पास आकर तीखे बाणों से उन पर प्रहार किया।
श्लोक 11 (7.26.11)
ततः क्षणेन क्षितिपं क्षतजप्रतिमेक्षणः । क्षयं निनीषुर्निशितैर्भीमो विव्याध पत्रिभिः ॥
tataḥ kṣaṇena kṣitipaṃ kṣatajapratimekṣaṇaḥ | kṣayaṃ ninīṣurniśitairbhīmo vivyādha patribhiḥ
तब क्षण भर में रक्त के समान लाल नेत्रों वाले भीम ने राजा का नाश करने की इच्छा से उसे तीखे बाणों से बेध दिया।
श्लोक 12 (7.26.12)
स शराचितसर्वाङ्गः क्रुद्धो विव्याध पाण्डवम् । नाराचैरर्करश्म्याभैर्भीमसेनं स्मयन्निव ॥
sa śarācitasarvāṅgaḥ kruddho vivyādha pāṇḍavam | nārācairarkaraśmyābhairbhīmasenaṃ smayanniva
बाणों से सारा शरीर ढक जाने पर भी क्रुद्ध दुर्योधन ने मानो मुसकराते हुए सूर्य-किरणों जैसे दीप्त नाराचों से पाण्डव भीमसेन को बेध दिया।
श्लोक 13 (7.26.13)
तस्य नागं मणिमयं रत्नचित्रध्वजे स्थितम् । भल्लाभ्यां कार्मुकं चैव क्षिप्रं चिच्छेद पाण्डवः ॥
tasya nāgaṃ maṇimayaṃ ratnacitradhvaje sthitam | bhallābhyāṃ kārmukaṃ caiva kṣipraṃ ciccheda pāṇḍavaḥ
पाण्डव ने दो भल्लों से रत्नों से चित्रित ध्वज पर स्थित उसके मणिमय हाथी के चिह्न को और उसके धनुष को भी शीघ्र काट डाला।
श्लोक 14 (7.26.14)
दुर्योधनं पीड्यमानं दृष्ट्वा भीमेन मारिष । चुक्षोभयिषुरभ्यागादङ्गो मातङ्गमास्थितः ॥
duryodhanaṃ pīḍyamānaṃ dṛṣṭvā bhīmena māriṣa | cukṣobhayiṣurabhyāgādaṅgo mātaṅgamāsthitaḥ
हे मारिष, भीम से दुर्योधन को पीड़ित होते देखकर अंगराज हाथी पर सवार होकर भीम को विचलित करने की इच्छा से आगे आया।
श्लोक 15 (7.26.15)
तमापतन्तं नागेन्द्रमम्बुदप्रतिमस्वनम् । कुम्भान्तरे भीमसेनो नाराचैरार्दयद्भृशम् ॥
tamāpatantaṃ nāgendramambudapratimasvanam | kumbhāntare bhīmaseno nārācairārdayadbhṛśam
बादल की-सी गर्जना करते हुए आते उस गजराज के मस्तक के बीच भीमसेन ने नाराचों से कसकर प्रहार किया।
श्लोक 16 (7.26.16)
तस्य कायं विनिर्भिद्य न्यमज्जद्धरणीतले । ततः पपात द्विरदो वज्राहत इवाचलः ॥
tasya kāyaṃ vinirbhidya nyamajjaddharaṇītale | tataḥ papāta dvirado vajrāhata ivācalaḥ
वह बाण उसके शरीर को भेदकर पृथ्वी में धँस गया, और हाथी वज्र से मारे हुए पर्वत की भाँति गिर पड़ा।
श्लोक 17 (7.26.17)
तस्यावर्जितनागस्य म्लेच्छस्याधः पतिष्यतः । शिरश्चिच्छेद भल्लेन क्षिप्रकारी वृकोदरः ॥
tasyāvarjitanāgasya mlecchasyādhaḥ patiṣyataḥ | śiraściccheda bhallena kṣiprakārī vṛkodaraḥ
जिसका हाथी झुककर गिरने वाला था और जो स्वयं नीचे गिरने को था, उस म्लेच्छ का सिर शीघ्रकारी वृकोदर ने भल्ल से काट डाला।
श्लोक 18 (7.26.18)
तस्मिन्निपतिते वीरे सम्प्राद्रवत सा चमूः । सम्भ्रान्ताश्वद्विपरथा पदातीनवमृद्नती ॥
tasminnipatite vīre samprādravata sā camūḥ | sambhrāntāśvadviparathā padātīnavamṛdnatī
उस वीर के गिरते ही उसकी सेना भाग खड़ी हुई; उसके हाथी, घोड़े और रथ घबरा गए और वे अपने ही पैदल सैनिकों को कुचलते जाते थे।
श्लोक 19 (7.26.19)
तेष्वनीकेषु भग्नेषु विद्रवत्सु समन्ततः । प्राग्ज्योतिषस्ततो भीमं कुञ्जरेण समाद्रवत् ॥
teṣvanīkeṣu bhagneṣu vidravatsu samantataḥ | prāgjyotiṣastato bhīmaṃ kuñjareṇa samādravat
जब वे सेनाएँ टूटकर चारों ओर भागने लगीं, तब प्राग्ज्योतिषराज हाथी पर चढ़कर भीम पर चढ़ आया।
श्लोक 20 (7.26.20)
येन नागेन मघवानजयद्दैत्यदानवान् । तदन्वयेन नागेन भीमसेनमुपाद्रवत् ॥
yena nāgena maghavānajayaddaityadānavān | tadanvayena nāgena bhīmasenamupādravat
जिस हाथी से इन्द्र ने दैत्यों और दानवों को जीता था, उसी के वंश के हाथी पर चढ़कर वह भीमसेन पर टूट पड़ा।
श्लोक 21 (7.26.21)
स नागप्रवरो भीमं सहसा समुपाद्रवत् । श्रवणाभ्यामथो द्वाभ्यां संहतेन करेण च ॥
sa nāgapravaro bhīmaṃ sahasā samupādravat | śravaṇābhyāmatho dvābhyāṃ saṃhatena kareṇa ca
वह श्रेष्ठ हाथी अपने दोनों कानों और सिकोड़ी हुई सूँड़ के साथ सहसा भीम पर झपटा,
श्लोक 22 (7.26.22)
व्यावृत्तनयनः क्रुद्धः प्रमथन्निव पाण्डवम् । वृकोदररथं साश्वमविशेषमचूर्णयत् ॥
vyāvṛttanayanaḥ kruddhaḥ pramathanniva pāṇḍavam | vṛkodararathaṃ sāśvamaviśeṣamacūrṇayat
उसकी आँखें घूम रही थीं, वह क्रोध में भरा था, मानो पाण्डव को मसल डालेगा; और उसने घोड़ों सहित वृकोदर के रथ को ऐसा चूर किया कि उसका कुछ भी पहचाना न जा सका।
श्लोक 23 (7.26.23)
पद्भ्यां भीमोऽप्यथो धावंस्तस्य गात्रेष्वलीयत । जानन्नञ्जलिकावेधं नापाक्रामत पाण्डवः ॥
padbhyāṃ bhīmo'pyatho dhāvaṃstasya gātreṣvalīyata | jānannañjalikāvedhaṃ nāpākrāmata pāṇḍavaḥ
भीम भी पैदल दौड़ते हुए उस हाथी के अंगों के बीच छिप गए; अञ्जलिका-वेध को जानने वाले पाण्डव पीछे नहीं हटे।
श्लोक 24 (7.26.24)
गात्राभ्यन्तरगो भूत्वा करेणाताडयन्मुहुः । लालयामास तं नागं वधाकाङ्क्षिणमव्ययम् ॥
gātrābhyantarago bhūtvā kareṇātāḍayanmuhuḥ | lālayāmāsa taṃ nāgaṃ vadhākāṅkṣiṇamavyayam
उसके अंगों के भीतर जाकर वे बार-बार हाथ से उस पर प्रहार करते रहे और इस प्रकार वध की इच्छा रखने वाले, अक्षीण बल वाले उस हाथी से खिलवाड़ करते रहे।
श्लोक 25 (7.26.25)
कुलालचक्रवन्नागस्तदा तूर्णमथाभ्रमत् । नागायुतबलः श्रीमान्कालयानो वृकोदरम् ॥
kulālacakravannāgastadā tūrṇamathābhramat | nāgāyutabalaḥ śrīmānkālayāno vṛkodaram
तब दस हज़ार हाथियों के बल वाला वह तेजस्वी हाथी वृकोदर को खदेड़ता हुआ कुम्हार के चाक की तरह तेज़ी से घूमने लगा।
श्लोक 26 (7.26.26)
भीमोऽपि निष्क्रम्य ततः सुप्रतीकाग्रतोऽभवत् । भीमं करेणावनम्य जानुभ्यामभ्यताडयत् ॥
bhīmo'pi niṣkramya tataḥ supratīkāgrato'bhavat | bhīmaṃ kareṇāvanamya jānubhyāmabhyatāḍayat
तब भीम भी निकलकर सुप्रतीक के सामने आ खड़े हुए; हाथी ने सूँड़ से उन्हें झुकाकर घुटनों से मारा।
श्लोक 27 (7.26.27)
ग्रीवायां वेष्टयित्वैनं स गजो हन्तुमैहत । करवेष्टं भीमसेनो भ्रमं दत्त्वा व्यमोचयत् ॥
grīvāyāṃ veṣṭayitvainaṃ sa gajo hantumaihata | karaveṣṭaṃ bhīmaseno bhramaṃ dattvā vyamocayat
सूँड़ को उनके गले में लपेटकर हाथी ने उन्हें मारना चाहा; भीमसेन ने एक झटका देकर सूँड़ के बन्धन से स्वयं को छुड़ा लिया।
श्लोक 28 (7.26.28)
पुनर्गात्राणि नागस्य प्रविवेश वृकोदरः । यावत्प्रतिगजायातं स्वबलं प्रत्यवैक्षत । भीमोऽपि नागगात्रेभ्यो विनिःसृत्यापयाज्जवात् ॥
punargātrāṇi nāgasya praviveśa vṛkodaraḥ | yāvatpratigajāyātaṃ svabalaṃ pratyavaikṣata | bhīmo'pi nāgagātrebhyo viniḥsṛtyāpayājjavāt
वृकोदर फिर हाथी के अंगों के बीच घुस गए और तब तक वहीं रहे जब तक उन्होंने अपनी सेना को हाथी का सामना करने आते नहीं देख लिया; तब भीम भी हाथी के अंगों के बीच से निकलकर तेज़ी से परे हट गए।
श्लोक 29 (7.26.29)
ततः सर्वस्य सैन्यस्य नादः समभवन्महान् । अहो धिङ्निहतो भीमः कुञ्जरेणेति मारिष ॥
tataḥ sarvasya sainyasya nādaḥ samabhavanmahān | aho dhiṅnihato bhīmaḥ kuñjareṇeti māriṣa
तब, हे मारिष, सारी सेना में बड़ा शोर उठा: "हाय! भीम हाथी के हाथों मारे गए!"
श्लोक 30 (7.26.30)
तेन नागेन सन्त्रस्ता पाण्डवानामनीकिनी । सहसाऽभ्यद्रवद्राजन्यत्र तस्यौ वृकोदरः ॥
tena nāgena santrastā pāṇḍavānāmanīkinī | sahasā'bhyadravadrājanyatra tasyau vṛkodaraḥ
हे राजन्, उस हाथी से भयभीत हुई पाण्डव-सेना सहसा उस स्थान की ओर दौड़ी जहाँ वृकोदर खड़े थे।
श्लोक 31 (7.26.31)
ततो युधिष्ठिरो राजा हतं मत्वा वृकोदरम् । भगदत्तं सपाञ्चाल्यः सर्वतः समवारयत् ॥
tato yudhiṣṭhiro rājā hataṃ matvā vṛkodaram | bhagadattaṃ sapāñcālyaḥ sarvataḥ samavārayat
तब राजा युधिष्ठिर ने वृकोदर को मारा गया मानकर पाञ्चालों के साथ चारों ओर से भगदत्त को घेर लिया।
श्लोक 32 (7.26.32)
तं रथै रथिनां श्रेष्ठाः परिवार्य परन्तपाः । अवाकिरञ्शरैस्तीक्ष्णैः शतशोऽथ सहस्रशः ॥
taṃ rathai rathināṃ śreṣṭhāḥ parivārya parantapāḥ | avākirañśaraistīkṣṇaiḥ śataśo'tha sahasraśaḥ
शत्रुओं को तपाने वाले उन श्रेष्ठ रथियों ने रथों से उसे घेरकर सैकड़ों और हज़ारों तीखे बाणों की वर्षा की।
श्लोक 33 (7.26.33)
स विघातं पृषत्कानामङ्कुशेन समाहरन् । क्षणेन पाण्डुपाञ्जालान्व्यधमत्पर्वतेश्वरः ॥
sa vighātaṃ pṛṣatkānāmaṅkuśena samāharan | kṣaṇena pāṇḍupāñjālānvyadhamatparvateśvaraḥ
अपने अंकुश से बाणों की बौछार को रोकते हुए उस पर्वतेश्वर ने क्षण भर में पाण्डवों और पाञ्चालों को तितर-बितर कर दिया।
श्लोक 34 (7.26.34)
तदद्भुतमपश्याम भगदत्तस्य संयुगे । तथा वृद्धस्य चरितं कुञ्जरेण विशाम्पते ॥
tadadbhutamapaśyāma bhagadattasya saṃyuge | tathā vṛddhasya caritaṃ kuñjareṇa viśāmpate
हे प्रजापालक, हमने युद्ध में वह अद्भुत दृश्य देखा, उस वृद्ध राजा का हाथी पर चढ़कर किया हुआ पराक्रम।
श्लोक 35 (7.26.35)
ततो राजा दशार्णानां प्राग्ज्योतिषमुपाद्रवत् । तिर्यग्यातेन नागेन समदेनाशुगामिना ॥
tato rājā daśārṇānāṃ prāgjyotiṣamupādravat | tiryagyātena nāgena samadenāśugāminā
तब दशार्णों का राजा मदमत्त और तेज़ चलने वाले, तिरछी चाल से चलते हाथी पर चढ़कर प्राग्ज्योतिषराज पर चढ़ आया।
श्लोक 36 (7.26.36)
तयोर्युद्धं समभवन्नागयोर्भीमरूपयोः । सपक्षयोः पर्वतयोर्यथा सद्रुमयोः पुरा ॥
tayoryuddhaṃ samabhavannāgayorbhīmarūpayoḥ | sapakṣayoḥ parvatayoryathā sadrumayoḥ purā
उन दोनों भयंकर हाथियों के बीच ऐसा युद्ध हुआ जैसे पूर्वकाल में वृक्षों सहित दो पंखधारी पर्वतों के बीच हुआ था।
श्लोक 37 (7.26.37)
प्राग्ज्योतिषपतेर्नागः सन्निवृत्त्यापसृत्य च । पार्श्वे दशार्णाधिपतेर्भित्त्वा नागमपातयत् ॥
prāgjyotiṣapaternāgaḥ sannivṛttyāpasṛtya ca | pārśve daśārṇādhipaterbhittvā nāgamapātayat
प्राग्ज्योतिषराज का हाथी मुड़कर पीछे हटा और फिर दशार्णराज के हाथी की बगल में प्रहार करके उसे चीरकर गिरा दिया।
श्लोक 38 (7.26.38)
तोमरैः सूर्यरश्म्याभैर्भगदत्तोऽथ सप्तभिः । जघान द्विरदस्थं तं शत्रुं प्रचलितासनम् ॥
tomaraiḥ sūryaraśmyābhairbhagadatto'tha saptabhiḥ | jaghāna dviradasthaṃ taṃ śatruṃ pracalitāsanam
तब भगदत्त ने हाथी पर बैठे उस शत्रु को, जिसका आसन डगमगा गया था, सूर्य-किरणों जैसे दीप्त सात तोमरों से मारा।
श्लोक 39 (7.26.39)
व्यवच्छिद्य तु राजानं भगदत्तं युधिष्ठिरः । रथानीकेन महता सर्वतः पर्यवारयत् ॥
vyavacchidya tu rājānaṃ bhagadattaṃ yudhiṣṭhiraḥ | rathānīkena mahatā sarvataḥ paryavārayat
राजा भगदत्त को घायल करके युधिष्ठिर ने रथों की विशाल सेना से उसे चारों ओर से घेर लिया।
श्लोक 40 (7.26.40)
स कुञ्जरस्थो रथिभिः शुशुभे सर्वतो वृतः । पर्वते वनमध्यस्थो ज्वलन्निव हुताशनः ॥
sa kuñjarastho rathibhiḥ śuśubhe sarvato vṛtaḥ | parvate vanamadhyastho jvalanniva hutāśanaḥ
हाथी पर बैठा हुआ और चारों ओर से रथियों से घिरा हुआ वह पर्वत पर वन के बीच प्रज्वलित अग्नि की तरह शोभित हुआ।
श्लोक 41 (7.26.41)
मण्डलं सर्वतः श्लिष्टं रथिनामुग्रधन्विनाम् । किरतां शरवर्षाणि स नागः पर्यवर्तत ॥
maṇḍalaṃ sarvataḥ śliṣṭaṃ rathināmugradhanvinām | kiratāṃ śaravarṣāṇi sa nāgaḥ paryavartata
बाणों की वर्षा करते हुए उग्र धनुर्धारी रथियों के सब ओर सटे हुए घेरे के बीच वह हाथी चक्कर काटता रहा।
श्लोक 42 (7.26.42)
ततः प्राग्ज्योतिषो राजा परिगृह्य महागजम् । प्रेषयामास सहसा युयुधानरथं प्रति ॥
tataḥ prāgjyotiṣo rājā parigṛhya mahāgajam | preṣayāmāsa sahasā yuyudhānarathaṃ prati
तब राजा प्राग्ज्योतिष ने अपने महान् हाथी को सँभालकर सहसा युयुधान के रथ की ओर बढ़ाया।
श्लोक 43 (7.26.43)
आपतन्तं च सम्प्रेक्ष्य नागं सात्वतपुङ्गवः । अविध्यत्पञ्चभिर्बाणैः शितैराशीविषोपमैः ॥
āpatantaṃ ca samprekṣya nāgaṃ sātvatapuṅgavaḥ | avidhyatpañcabhirbāṇaiḥ śitairāśīviṣopamaiḥ
हाथी को अपने ऊपर आता देखकर सात्वतों के सिरमौर ने विषैले सर्पों जैसे पाँच तीखे बाणों से उसे बेध दिया।
श्लोक 44 (7.26.44)
शिनेः पौत्रस्य तु रथं परिगृह्य महाद्विपः । अभिचिक्षेप वेगेन युयुधानस्त्वपाक्रमत् ॥
śineḥ pautrasya tu rathaṃ parigṛhya mahādvipaḥ | abhicikṣepa vegena yuyudhānastvapākramat
विशाल हाथी ने शिनि के पौत्र के रथ को पकड़कर बड़े वेग से फेंक दिया, किन्तु युयुधान पहले ही हट गए थे।
श्लोक 45 (7.26.45)
बृहतः सैन्धवानश्वान्समुत्थाप्यथ सारथिः । तस्थौ सात्यकिमासाद्य सम्प्लुतस्तं रथं प्रति ॥
bṛhataḥ saindhavānaśvānsamutthāpyatha sārathiḥ | tasthau sātyakimāsādya samplutastaṃ rathaṃ prati
बड़े-बड़े सिन्धुदेशीय घोड़ों को सँभालकर सारथि कूदकर सात्यकि के पास पहुँचा और उसी रथ के निकट खड़ा हो गया।
श्लोक 46 (7.26.46)
स तु लब्ध्वान्तरं नागस्त्वरितो रथमण्डलात् । निष्पतन्सततं सर्वान्परिचिक्षेप पार्थिवान् ॥
sa tu labdhvāntaraṃ nāgastvarito rathamaṇḍalāt | niṣpatansatataṃ sarvānparicikṣepa pārthivān
अवसर पाकर वह हाथी तुरन्त रथों के घेरे से निकला और बाहर आते ही सब राजाओं को घेरता हुआ चक्कर काटने लगा।
श्लोक 47 (7.26.47)
ते त्वाशुगतिना तेन त्रास्यमाना नरर्षभाः । तमेकं द्विरदं सङ्ख्ये मेनिरे शतशो द्विपान् ॥
te tvāśugatinā tena trāsyamānā nararṣabhāḥ | tamekaṃ dviradaṃ saṅkhye menire śataśo dvipān
तेज़ चलने वाले उस हाथी से डरे हुए वे नरश्रेष्ठ युद्ध में उस एक ही हाथी को सैकड़ों हाथी समझने लगे।
श्लोक 48 (7.26.48)
ते गजस्थेन काल्यन्ते भगदत्तेन पार्थिवाः । ऐरावतस्थेन यथा देवराजेन दानवाः ॥
te gajasthena kālyante bhagadattena pārthivāḥ | airāvatasthena yathā devarājena dānavāḥ
हाथी पर बैठे भगदत्त के द्वारा वे राजा वैसे ही खदेड़े गए जैसे ऐरावत पर बैठे देवराज इन्द्र ने दानवों को खदेड़ा था।
श्लोक 49 (7.26.49)
तेषां प्रद्रवतां भीमः पाञ्चालानामितस्ततः । गजवाजिकृतः शब्दः सुमहान्समजायत ॥
teṣāṃ pradravatāṃ bhīmaḥ pāñcālānāmitastataḥ | gajavājikṛtaḥ śabdaḥ sumahānsamajāyata
इधर-उधर भागते हुए उन पाञ्चालों के बीच हाथियों और घोड़ों का भयंकर और बहुत बड़ा शोर उठा।
श्लोक 50 (7.26.50)
भगदत्तेन समरे काल्यमानेषु पाण्डुषु । प्राग्ज्योतिषमभिक्रुद्धः पुनर्भीमः समभ्ययात् ॥
bhagadattena samare kālyamāneṣu pāṇḍuṣu | prāgjyotiṣamabhikruddhaḥ punarbhīmaḥ samabhyayāt
युद्ध में भगदत्त के द्वारा पाण्डवों के खदेड़े जाने पर क्रोध से भरे भीम फिर प्राग्ज्योतिषराज पर चढ़ आए।
श्लोक 51 (7.26.51)
तस्याभिद्रवतो वाहान्हस्तमुक्तेन वारिणा । सिक्त्वा व्यत्रासयन्नागस्ते पार्थमहरंस्ततः ॥
tasyābhidravato vāhānhastamuktena vāriṇā | siktvā vyatrāsayannāgaste pārthamaharaṃstataḥ
भीम के झपटते ही हाथी ने सूँड़ से छोड़े गए जल से उनके घोड़ों को भिगोकर डरा दिया, और वे घोड़े पार्थ को वहाँ से दूर ले गए।
श्लोक 52 (7.26.52)
ततस्तमभ्ययात्तूर्णं रुचिपर्वा कृतीसुतः । समघ्नञ्छरवर्षेण रथस्थोऽन्तकसन्निभः ॥
tatastamabhyayāttūrṇaṃ ruciparvā kṛtīsutaḥ | samaghnañcharavarṣeṇa rathastho'ntakasannibhaḥ
तब कृति का पुत्र रुचिपर्वा यम के समान रथ पर खड़ा होकर बाणों की वर्षा करता हुआ तुरन्त उसकी ओर बढ़ा।
श्लोक 53 (7.26.53)
ततः स रुचिपर्वाणं शरेणानतपर्वणा । सुपर्वा पर्वतपतिर्निन्ये वैवस्वतक्षयम् ॥
tataḥ sa ruciparvāṇaṃ śareṇānataparvaṇā | suparvā parvatapatirninye vaivasvatakṣayam
तब सुन्दर अंग-सन्धियों वाले उस पर्वतपति ने सीधी गाँठ वाले बाण से रुचिपर्वा को वैवस्वत यम के लोक भेज दिया।
श्लोक 54 (7.26.54)
तस्मिन्निपतिते वीरे सौभद्रो द्रौपदीसुताः । चेकितानो धृष्टकेतुर्युयुत्सुश्चार्दयन्द्विपम् ॥
tasminnipatite vīre saubhadro draupadīsutāḥ | cekitāno dhṛṣṭaketuryuyutsuścārdayandvipam
उस वीर के गिरने पर सौभद्र, द्रौपदी के पुत्र, चेकितान, धृष्टकेतु और युयुत्सु ने हाथी पर प्रहार किया।
श्लोक 55 (7.26.55)
त एनं शरधाराभिर्धाराभिरिव तोयदाः । सिषिचुर्भैरवान्नादान्विनदन्तो जिघांसवः ॥
ta enaṃ śaradhārābhirdhārābhiriva toyadāḥ | siṣicurbhairavānnādānvinadanto jighāṃsavaḥ
भयंकर गर्जना करते हुए, मारने की इच्छा से उन्होंने बाणों की धाराओं से उसे वैसे ही सींच दिया जैसे बादल जल की धाराओं से सींचते हैं।
श्लोक 56 (7.26.56)
ततः पार्ष्ण्यङ्कुशाङ्गुष्ठैः कृतिना चोदितो द्विपः । प्रसारितकरः प्रायात्स्तब्धकर्णेक्षणो द्रुतम् ॥
tataḥ pārṣṇyaṅkuśāṅguṣṭhaiḥ kṛtinā codito dvipaḥ | prasāritakaraḥ prāyātstabdhakarṇekṣaṇo drutam
तब कुशल महावत के एड़ी, अंकुश और अँगूठों से हाँके जाने पर हाथी सूँड़ फैलाए, कान और आँखें स्थिर किए तेज़ी से आगे बढ़ा।
श्लोक 57 (7.26.57)
सोऽधिष्ठाय पदा वाहान्युयुत्सोः सूतमारुजत् । युयुत्सुस्तु रथाद्राजन्नपाक्रामत्त्वरान्वितः ॥
so'dhiṣṭhāya padā vāhānyuyutsoḥ sūtamārujat | yuyutsustu rathādrājannapākrāmattvarānvitaḥ
उसने पैर रखकर युयुत्सु के घोड़ों को दबाया और उसके सारथि को मार डाला; हे राजन्, युयुत्सु शीघ्र रथ से कूदकर हट गया।
श्लोक 58 (7.26.58)
ततः पाण्डवयोधास्ते नागराजं शरैर्द्रुतम् । सिषिचुर्भैरवान्नादान्विनदन्तो जिघांसवः ॥
tataḥ pāṇḍavayodhāste nāgarājaṃ śarairdrutam | siṣicurbhairavānnādānvinadanto jighāṃsavaḥ
तब पाण्डव योद्धाओं ने भयंकर गर्जना करते और मारने की इच्छा रखते हुए उस गजराज को बाणों से तुरन्त सींच दिया।
श्लोक 59 (7.26.59)
पुत्रस्तु तव सम्भ्रान्तः सौभद्रस्याप्लुतो रथम् । स कुञ्जरस्थो विसृजन्निषूनरिषु पार्थिवः । बभौ रश्मीनिवादित्यो भुवनेषु समुत्सृजन् ॥
putrastu tava sambhrāntaḥ saubhadrasyāpluto ratham | sa kuñjarastho visṛjanniṣūnariṣu pārthivaḥ | babhau raśmīnivādityo bhuvaneṣu samutsṛjan
आपका पुत्र युयुत्सु घबराकर सौभद्र के रथ पर कूद गया; और हाथी पर बैठा वह राजा शत्रुओं पर बाण छोड़ता हुआ ऐसा चमका जैसे सूर्य लोकों पर अपनी किरणें बिखेर रहा हो।
श्लोक 60 (7.26.60)
तमार्जुनिर्द्वादशभिर्युयुत्सुर्दशभिः शरैः । त्रिभिस्त्रिभिर्द्रौपदेया धृष्टकेतुश्च विव्यधुः ॥
tamārjunirdvādaśabhiryuyutsurdaśabhiḥ śaraiḥ | tribhistribhirdraupadeyā dhṛṣṭaketuśca vivyadhuḥ
सौभद्र ने उसे बारह बाणों से, युयुत्सु ने दस बाणों से, तथा द्रौपदी के पुत्रों और धृष्टकेतु ने तीन-तीन बाणों से बेधा।
श्लोक 61 (7.26.61)
चेकितानः चतुःषष्ट्या सोत्तरायुधिकं पुनः । प्रत्यविध्यत्ततः सर्वान्भगदत्तस्त्रिभिस्त्रिभिः ॥
cekitānaḥ catuḥṣaṣṭyā sottarāyudhikaṃ punaḥ | pratyavidhyattataḥ sarvānbhagadattastribhistribhiḥ
चेकितान ने चौंसठ बाणों से और उससे भी अधिक बाणों से उसे फिर बेधा; तब भगदत्त ने उन सबको तीन-तीन बाणों से पलटकर बेध दिया।
श्लोक 62 (7.26.62)
सोऽतियत्नार्पितैर्बाणैराचितो द्विरदो बभौ । संस्यूत इव सूर्यस्य रश्मिभिर्जलदो महान् ॥
so'tiyatnārpitairbāṇairācito dvirado babhau | saṃsyūta iva sūryasya raśmibhirjalado mahān
बड़े प्रयत्न से चलाए गए बाणों से बिंधा हुआ वह हाथी सूर्य की किरणों से पिरोए गए किसी विशाल बादल जैसा शोभित हुआ।
श्लोक 63 (7.26.63)
नियन्तुः शिल्पयत्नाभ्यां प्रेरितोऽरिशरार्दितः । परिचिक्षेप तान्नागः स रिपून्सव्यदक्षिणम् ॥
niyantuḥ śilpayatnābhyāṃ prerito'riśarārditaḥ | paricikṣepa tānnāgaḥ sa ripūnsavyadakṣiṇam
महावत की कुशलता और प्रयत्न से प्रेरित तथा शत्रुओं के बाणों से पीड़ित वह हाथी उन शत्रुओं को बाएँ और दाएँ घेरता हुआ चक्कर काटने लगा।
श्लोक 64 (7.26.64)
गोपाल इव दण्डेन यथा पशुगणान्वने । सङ्कालयति तां सेनां भगदत्तस्तथा मुहुः ॥
gopāla iva daṇḍena yathā paśugaṇānvane | saṅkālayati tāṃ senāṃ bhagadattastathā muhuḥ
जैसे ग्वाला वन में डंडे से पशुओं के झुण्ड हाँकता है, वैसे ही भगदत्त उस सेना को बार-बार हाँकता रहा।
श्लोक 65 (7.26.65)
क्षिप्रं श्येनाभिपन्नानां वायसानामिव स्वनः । बभूव पाण्डवेयानां भृशं विद्रवतां स्वनः ॥
kṣipraṃ śyenābhipannānāṃ vāyasānāmiva svanaḥ | babhūva pāṇḍaveyānāṃ bhṛśaṃ vidravatāṃ svanaḥ
बाज़ों के झपटने पर कौओं की जैसी चीख होती है, वैसी ही बड़ी चीख भागती हुई पाण्डव-सेना में सहसा उठी।
श्लोक 66 (7.26.66)
स नागराजः प्रवराङ्कुशाहतः । पुरा सपक्षोऽद्रिवरो यथा नृप । भयं तदा रिपुषु समादधद्भृशं । वणिग्जनानां क्षुभितो यथाऽर्णवः ॥
sa nāgarājaḥ pravarāṅkuśāhataḥ | purā sapakṣo'drivaro yathā nṛpa | bhayaṃ tadā ripuṣu samādadhadbhṛśaṃ | vaṇigjanānāṃ kṣubhito yathā'rṇavaḥ
उत्तम अंकुश से प्रेरित वह गजराज, हे राजन्, पूर्वकाल के पंखधारी श्रेष्ठ पर्वत की भाँति शत्रुओं में वैसा ही भारी भय भरने लगा जैसे क्षुब्ध समुद्र व्यापारियों में भरता है।
श्लोक 67 (7.26.67)
ततो ध्वनिर्द्विरदरथाश्वपार्थिवै । र्भयाद्रवद्भिर्जनितोऽतिभैरवः । क्षितिं वियद् द्यां विदिशो दिशस्तथा । समावृणोत्पार्थिवसंयुगे ततः ॥
tato dhvanirdviradarathāśvapārthivai | rbhayādravadbhirjanito'tibhairavaḥ | kṣitiṃ viyad dyāṃ vidiśo diśastathā | samāvṛṇotpārthivasaṃyuge tataḥ
तब राजाओं के उस युद्ध में भय से भागते हुए हाथियों, रथों, घोड़ों और राजाओं का अत्यन्त भयंकर शोर उठा और उसने पृथ्वी, आकाश, स्वर्ग तथा सारी दिशाओं और विदिशाओं को भर दिया।
श्लोक 68 (7.26.68)
स तेन नागप्रवरेण पार्थिवो । भृशं जगाहे द्विषतामनीकिनीम् । पुरा सुगुप्तां विबुधैरिवाहवे । विरोचनो देववरूतिनीमिव ॥
sa tena nāgapravareṇa pārthivo | bhṛśaṃ jagāhe dviṣatāmanīkinīm | purā suguptāṃ vibudhairivāhave | virocano devavarūtinīmiva
उस श्रेष्ठ हाथी के साथ राजा शत्रु-सेना में बहुत भीतर घुस गया, जैसे पूर्वकाल में विरोचन युद्ध में देवताओं की भली-भाँति रक्षित सेना में घुसा था।
श्लोक 69 (7.26.69)
भृशं ववौ ज्वलनसखो वियद्रजः । समावृणोन्मुहुरपि चैव सैनिकान् । तमेकनागं गणशो यथा गजान् । समन्ततो द्रुतमथ मेनिरे जनाः ॥
bhṛśaṃ vavau jvalanasakho viyadrajaḥ | samāvṛṇonmuhurapi caiva sainikān | tamekanāgaṃ gaṇaśo yathā gajān | samantato drutamatha menire janāḥ
अग्नि का सखा प्रचण्ड वायु बहा, आकाश में उठी धूल बार-बार सैनिकों को ढकने लगी; और चारों ओर तेज़ी से दौड़ते उस अकेले हाथी को लोगों ने हाथियों के झुण्ड समझ लिया।