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द्रोण पर्व · अध्याय 29

भगदत्त का वध

धृतराष्ट्र पूछते हैं कि अर्जुन ने भगदत्त के साथ क्या किया। सञ्जय बताते हैं कि अर्जुन और हाथी पर बैठे भगदत्त का द्वन्द्व उग्र होता जाता है: भगदत्त वैष्णवास्त्र छोड़ता है, कृष्ण उसे अपनी छाती पर ले लेते हैं और वह माला बन जाता है। अर्जुन के उलाहना देने पर कृष्ण उन्हें उस अस्त्र की कथा सुनाते हैं, जिसे विष्णु ने पृथ्वी के पुत्र नरक को दिया था और जो भगदत्त तक पहुँचा, और बताते हैं कि उन्होंने उसे क्यों रोका। फिर अर्जुन हाथी को बेधते हैं, वृद्ध राजा की पलकें उठाए रखने वाली पट्टी काट देते हैं और अर्धचन्द्र बाण से भगदत्त को मार डालते हैं।

अध्याय 28अध्याय-सूचीअध्याय 30

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 1 (7.29.1)

तथा क्रुद्धः किमकरोद्भगदत्तस्य पाण्डवः । प्राग्ज्योतिषो वा पार्थस्य तन्मे शंस यथातथम् ॥

tathā kruddhaḥ kimakarodbhagadattasya pāṇḍavaḥ | prāgjyotiṣo vā pārthasya tanme śaṃsa yathātatham

क्रुद्ध पाण्डव ने भगदत्त के साथ क्या किया? और प्राग्ज्योतिषराज ने पार्थ के साथ क्या किया? जैसा हुआ वैसा ही मुझे बताओ।

सञ्जय उवाच

श्लोक 2 (7.29.2)

प्राग्ज्योतिषेण संसक्तावुभौ दाशार्हपाण्डवौ । मृत्युदंष्ट्रान्तिकं प्राप्तौ सर्वभूतानि मेनिरे ॥

prāgjyotiṣeṇa saṃsaktāvubhau dāśārhapāṇḍavau | mṛtyudaṃṣṭrāntikaṃ prāptau sarvabhūtāni menire

जब दाशार्ह और पाण्डव प्राग्ज्योतिषराज से भिड़ गए, तब सब प्राणियों ने समझा कि वे दोनों मृत्यु की दाढ़ों के निकट पहुँच गए हैं।

श्लोक 3 (7.29.3)

तथा तु शरवर्षाणि पातयत्यनिशं प्रभो । गजस्कन्धान्महाराज कृष्णयोः स्यन्दनस्थयोः ॥

tathā tu śaravarṣāṇi pātayatyaniśaṃ prabho | gajaskandhānmahārāja kṛṣṇayoḥ syandanasthayoḥ

हे प्रभो, इस प्रकार, हे महाराज, वह हाथी की पीठ से रथ पर बैठे दोनों कृष्णों पर निरन्तर बाणों की वर्षा करता रहा।

श्लोक 4 (7.29.4)

अथ कार्ष्णायसैर्बाणैः पूर्णकार्मुकनिःसृतैः । अविध्यद्देवकीपुत्रं हेमपुङ्खैः शिलाशितैः ॥

atha kārṣṇāyasairbāṇaiḥ pūrṇakārmukaniḥsṛtaiḥ | avidhyaddevakīputraṃ hemapuṅkhaiḥ śilāśitaiḥ

फिर पूरी तरह खिंचे धनुष से छूटे हुए, सोने के पंखों वाले और शिला पर तेज़ किए हुए लोहे के बाणों से उसने देवकीपुत्र को बेध दिया।

श्लोक 5 (7.29.5)

अग्निस्पर्शसमास्तीक्ष्णा भगदत्तेन चोदिताः । निर्भिद्य देवकीपुत्रं क्षितिं जग्मुः सुवाससः ॥

agnisparśasamāstīkṣṇā bhagadattena coditāḥ | nirbhidya devakīputraṃ kṣitiṃ jagmuḥ suvāsasaḥ

भगदत्त के चलाए हुए, अग्नि के स्पर्श जैसे तीक्ष्ण वे सुन्दर पंखों वाले बाण देवकीपुत्र को भेदकर धरती में जा गिरे।

श्लोक 6 (7.29.6)

तस्य पार्थो धनुश्छित्त्वा परिवारं निहत्य च । लालयन्निव राजानं भगदत्तमयोधयत् ॥

tasya pārtho dhanuśchittvā parivāraṃ nihatya ca | lālayanniva rājānaṃ bhagadattamayodhayat

पार्थ ने उसका धनुष काटकर और उसके परिजनों को मारकर राजा भगदत्त से मानो खेल करते हुए युद्ध किया।

श्लोक 7 (7.29.7)

सोऽर्करश्मिनिभांस्तीक्ष्णांस्तोमरान्वै चतुर्दश । अप्रेषयत्सव्यसाची द्विधैकैकमथाच्छिनत् ॥

so'rkaraśminibhāṃstīkṣṇāṃstomarānvai caturdaśa | apreṣayatsavyasācī dvidhaikaikamathācchinat

उसने सूर्य-किरणों जैसे चमकते चौदह तीखे तोमर फेंके; सव्यसाची ने उनमें से हर एक को दो टुकड़े कर दिया।

श्लोक 8 (7.29.8)

ततो नागस्य तद्वर्म व्यधमत्पाकशासनिः । शरजालेन महता तद्व्यशीर्यत भूतले ॥

tato nāgasya tadvarma vyadhamatpākaśāsaniḥ | śarajālena mahatā tadvyaśīryata bhūtale

तब पाकशासन के पुत्र ने बाणों के विशाल जाल से हाथी का कवच तोड़ डाला, और वह टुकड़े-टुकड़े होकर धरती पर बिखर गया।

श्लोक 9 (7.29.9)

शीर्णवर्मा स तु गजः शरैः सुभृशमर्दितः । बभौ धारानिपाताक्तो व्यभ्रः पर्वतराडिव ॥

śīrṇavarmā sa tu gajaḥ śaraiḥ subhṛśamarditaḥ | babhau dhārānipātākto vyabhraḥ parvatarāḍiva

कवच टूट जाने और बाणों से बुरी तरह पीड़ित होने पर वह हाथी रक्त की धाराओं से लथपथ होकर ऐसा शोभित हुआ जैसे बादलों के हट जाने पर मूसलाधार वर्षा से धुला हुआ कोई महान् पर्वत।

श्लोक 10 (7.29.10)

ततः प्राग्ज्योतिषः शक्तिं हेमदण्डामयस्मयीम् । व्यसृजद्वासुदेवाय द्विधा तामर्जुनोऽच्छिनत् ॥

tataḥ prāgjyotiṣaḥ śaktiṃ hemadaṇḍāmayasmayīm | vyasṛjadvāsudevāya dvidhā tāmarjuno'cchinat

तब प्राग्ज्योतिषराज ने वासुदेव पर सोने के दण्ड वाली एक लोहे की शक्ति फेंकी; अर्जुन ने उसे दो टुकड़े कर दिया।

श्लोक 11 (7.29.11)

ततश्छत्रं ध्वजं चैव च्छित्त्वा राज्ञोऽर्जुनः शरैः । विव्याध दशभिस्तूर्णमुत्स्मयन्पर्वतेश्वरम् ॥

tataśchatraṃ dhvajaṃ caiva cchittvā rājño'rjunaḥ śaraiḥ | vivyādha daśabhistūrṇamutsmayanparvateśvaram

तब अर्जुन ने बाणों से राजा का छत्र और ध्वज काटकर मुसकराते हुए पर्वतेश्वर को शीघ्र ही दस बाणों से बेध दिया।

श्लोक 12 (7.29.12)

सोऽतिविद्धोऽर्जुनशरैः सुपुङ्खैः कङ्कपत्रिभिः । भगदत्तस्ततः क्रुद्धः पाण्डवस्य जनाधिपः ॥

so'tividdho'rjunaśaraiḥ supuṅkhaiḥ kaṅkapatribhiḥ | bhagadattastataḥ kruddhaḥ pāṇḍavasya janādhipaḥ

अर्जुन के सुन्दर पंखों और कंक पक्षी के पत्रों वाले बाणों से गहरे घायल होकर नरेश भगदत्त तब पाण्डव पर क्रोध से भर उठा।

श्लोक 13 (7.29.13)

व्यसृजत्तोमरान्मूर्ध्नि श्वेताश्वस्योन्ननाद च । तैरर्जुनस्य समरे किरीटं परिवर्तितम् ॥

vyasṛjattomarānmūrdhni śvetāśvasyonnanāda ca | tairarjunasya samare kirīṭaṃ parivartitam

उसने श्वेत घोड़ों वाले अर्जुन के सिर पर तोमर फेंके और गर्जना की; उनसे युद्ध में अर्जुन का किरीट घूम गया।

श्लोक 14 (7.29.14)

परिवृत्तं किरीटं तद्यमयन्नेव पाण्डवः । सुदृष्टः क्रियतां लोक इति राजानमब्रवीत् ॥

parivṛttaṃ kirīṭaṃ tadyamayanneva pāṇḍavaḥ | sudṛṣṭaḥ kriyatāṃ loka iti rājānamabravīt

घूमे हुए उस किरीट को ठीक करते हुए पाण्डव ने राजा से कहा, "इस संसार को भली-भाँति देख लो!"

श्लोक 15 (7.29.15)

एवमुक्तस्तु सङ्क्रुद्धः शरवर्षेण पाण्डवम् । अभ्यवर्षत्स गोविन्दं धनुरादाय भास्वरम् ॥

evamuktastu saṅkruddhaḥ śaravarṣeṇa pāṇḍavam | abhyavarṣatsa govindaṃ dhanurādāya bhāsvaram

यह सुनकर अत्यन्त क्रुद्ध होकर उसने अपना चमकता धनुष उठाया और पाण्डव तथा गोविन्द पर बाणों की वर्षा कर दी।

श्लोक 16 (7.29.16)

तस्य पार्थो धनुश्छित्त्वा तूणीरान्सन्निकृत्य च । त्वरमाणो द्विसप्तत्या सर्वमर्मस्वताडयत् ॥

tasya pārtho dhanuśchittvā tūṇīrānsannikṛtya ca | tvaramāṇo dvisaptatyā sarvamarmasvatāḍayat

पार्थ ने उसका धनुष काट दिया, उसके तूणीर टुकड़े कर दिए और शीघ्रता से बहत्तर बाणों से उसके सब मर्मस्थानों पर प्रहार किया।

श्लोक 17 (7.29.17)

विद्धस्ततोऽतिव्यथितो वैष्णवास्त्रमुदीरयन् । अभिमन्त्र्याङ्कुशं क्रुद्धो व्यसृजत्पाण्डवोरसि ॥

viddhastato'tivyathito vaiṣṇavāstramudīrayan | abhimantryāṅkuśaṃ kruddho vyasṛjatpāṇḍavorasi

बेधे जाने से अत्यन्त व्यथित होकर उसने वैष्णवास्त्र का आवाहन किया; क्रोध में अंकुश को उसी से अभिमन्त्रित करके पाण्डव की छाती पर फेंका।

श्लोक 18 (7.29.18)

विसृष्टं भगदत्तेन तदस्त्रं सर्वघाति वै । उरसा प्रतिजग्राह पार्थं सञ्छाद्य केशवः ॥

visṛṣṭaṃ bhagadattena tadastraṃ sarvaghāti vai | urasā pratijagrāha pārthaṃ sañchādya keśavaḥ

भगदत्त के छोड़े हुए उस सर्वसंहारक अस्त्र को केशव ने पार्थ को ढककर अपनी छाती पर ले लिया।

श्लोक 19 (7.29.19)

वैजयन्त्यभवन्माला तदस्त्रं केशवोरसि । पद्मकोशविचित्रा सा सर्वर्तुकुसुमोत्करा ॥

vaijayantyabhavanmālā tadastraṃ keśavorasi | padmakośavicitrā sā sarvartukusumotkarā

केशव की छाती पर वह अस्त्र वैजयन्ती माला बन गया, जो कमल की कलियों से चित्रित थी और सब ऋतुओं के फूलों के समूह से भरी थी,

श्लोक 20 (7.29.20)

ज्वलनार्केन्दुवर्णाभा पावकोज्ज्वलपल्लवा । तया पद्मपलाशिन्या वातकम्पितपत्रया ॥

jvalanārkenduvarṇābhā pāvakojjvalapallavā | tayā padmapalāśinyā vātakampitapatrayā

अग्नि, सूर्य और चन्द्रमा जैसी दीप्ति वाली, अग्नि-सी चमकते पल्लवों वाली; और वायु से काँपते पत्तों वाली उस कमल-पंखुड़ियों की माला से

श्लोक 21 (7.29.21)

शुशुभेऽभ्यधिकं शौरिरतसीपुष्पसन्निभः । ततोऽर्जुनः क्लान्तमनाः केशवं प्रत्यभाषत ॥

śuśubhe'bhyadhikaṃ śauriratasīpuṣpasannibhaḥ | tato'rjunaḥ klāntamanāḥ keśavaṃ pratyabhāṣata

शौरि अलसी के फूल जैसे श्यामवर्ण होकर अत्यन्त शोभित हुए। तब खिन्न मन वाले अर्जुन ने केशव से कहा:

अर्जुन उवाच

श्लोक 22 (7.29.22)

अयुध्यमानस्तुरगान्संयन्तास्मि जनार्दन । इत्युक्त्वा पुण्डरीकाक्ष प्रतिज्ञां स्वां न रक्षसि ॥

ayudhyamānasturagānsaṃyantāsmi janārdana | ityuktvā puṇḍarīkākṣa pratijñāṃ svāṃ na rakṣasi

"हे जनार्दन, मैं बिना लड़े घोड़ों का सारथि रहूँगा, यह कहकर, हे कमलनयन, आप अपनी ही प्रतिज्ञा की रक्षा नहीं कर रहे।"

श्लोक 23 (7.29.23)

यद्यहं व्यसनी वा स्यामशक्तो वा निवारणे । ततस्त्वयैवं कार्यं स्यान्न तु कार्यं मयि स्थिते ॥

yadyahaṃ vyasanī vā syāmaśakto vā nivāraṇe | tatastvayaivaṃ kāryaṃ syānna tu kāryaṃ mayi sthite

"यदि मैं संकट में होता या रोकने में असमर्थ होता, तब आपको ऐसा करना उचित होता; पर मेरे रहते यह करना आवश्यक नहीं।"

श्लोक 24 (7.29.24)

सबाणः सधनुश्चाहं ससुरासुरमानुषान् । शक्तो लोकानिमाञ्जेतुं तच्चापि विदितं तव ॥

sabāṇaḥ sadhanuścāhaṃ sasurāsuramānuṣān | śakto lokānimāñjetuṃ taccāpi viditaṃ tava

"धनुष और बाणों के साथ मैं देवताओं, असुरों और मनुष्यों सहित इन लोकों को जीतने में समर्थ हूँ; यह भी आपको ज्ञात है।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 25 (7.29.25)

ततोऽर्जुनं वासुदेवः प्रत्युवाचार्यवद्वचः । शृणु गुह्यमिदं पार्थ पुरावृत्तं यथाऽनघ ॥

tato'rjunaṃ vāsudevaḥ pratyuvācāryavadvacaḥ | śṛṇu guhyamidaṃ pārtha purāvṛttaṃ yathā'nagha

तब वासुदेव ने अर्जुन को सार्थक वचनों में उत्तर दिया: "हे पार्थ, हे निष्पाप, यह गुप्त बात सुनो, जैसी पूर्वकाल में घटी थी।"

वासुदेव उवाच

श्लोक 26 (7.29.26)

येयं भूतधरा देवी सर्वभूतधरा धरा । सकामा लोककर्तारं नारायणमुपस्थिता ॥

yeyaṃ bhūtadharā devī sarvabhūtadharā dharā | sakāmā lokakartāraṃ nārāyaṇamupasthitā

"जो यह प्राणियों को धारण करने वाली, सब भूतों की आधार, धरा देवी है, वह मन में कामना लेकर लोकस्रष्टा नारायण के पास पहुँची।"

श्लोक 27 (7.29.27)

स सङ्गत्य तया सार्धं प्रीतस्तस्या वरं ददौ । सा वव्रे विष्णुसदृशं पुत्रमस्त्रं च वैष्णवम् ॥

sa saṅgatya tayā sārdhaṃ prītastasyā varaṃ dadau | sā vavre viṣṇusadṛśaṃ putramastraṃ ca vaiṣṇavam

"उसके साथ संयोग करके प्रसन्न हुए नारायण ने उसे वर दिया। उसने विष्णु के समान पुत्र और वैष्णव अस्त्र माँगा।"

श्लोक 28 (7.29.28)

बभूव च सुतस्तस्या नरको नाम विश्रुतः । अस्त्रं च वैष्णवं तस्मै ददौ नारायणः स्वयम् ॥

babhūva ca sutastasyā narako nāma viśrutaḥ | astraṃ ca vaiṣṇavaṃ tasmai dadau nārāyaṇaḥ svayam

"और उसके एक पुत्र हुआ, प्रसिद्ध नरक; और नारायण ने स्वयं उसे वैष्णव अस्त्र दिया।"

श्लोक 29 (7.29.29)

तदेवं नरकस्यासीदस्त्रं सर्वाहितान्तकम् । तस्मात्प्राग्ज्योतिषं प्राप्तं सर्वशस्त्रविघातनम् ॥

tadevaṃ narakasyāsīdastraṃ sarvāhitāntakam | tasmātprāgjyotiṣaṃ prāptaṃ sarvaśastravighātanam

"इस प्रकार वह अस्त्र नरक का था, जो सब शत्रुओं का नाश करने वाला था; उससे वह प्राग्ज्योतिष को मिला, जो सब शस्त्रों को निष्फल कर देता है।"

श्लोक 30 (7.29.30)

नास्यावध्योऽस्ति लोकेऽस्मिन्मदन्यः कश्चिदर्जुन । तस्मान्मया कृतं ह्येतन्मा भूत्ते बुद्धिरन्यथा ॥

nāsyāvadhyo'sti loke'sminmadanyaḥ kaścidarjuna | tasmānmayā kṛtaṃ hyetanmā bhūtte buddhiranyathā

"हे अर्जुन, इस लोक में मेरे सिवा कोई ऐसा नहीं जो इससे मारा न जा सके। इसीलिए मैंने यह किया; तुम्हारे मन में कोई और बात न आए।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 31 (7.29.31)

अनुनीय तु दाशार्हः पाण्डवं त्वरितोऽब्रवीत् । जहि प्राग्ज्योतिषं क्षिप्रं वाक्यशेषं च मे शृणु ॥

anunīya tu dāśārhaḥ pāṇḍavaṃ tvarito'bravīt | jahi prāgjyotiṣaṃ kṣipraṃ vākyaśeṣaṃ ca me śṛṇu

पाण्डव को मनाकर दाशार्ह ने शीघ्रता से कहा, "प्राग्ज्योतिष को तुरन्त मार डालो, और मेरी बात का शेष भाग भी सुनो।"

वासुदेव उवाच

श्लोक 32 (7.29.32)

चतुर्मूर्तिरहं शश्वल्लोकत्राणार्थमुद्यतः । आत्मानं प्रविभज्येह लोकानां हितमादधे ॥

caturmūrtirahaṃ śaśvallokatrāṇārthamudyataḥ | ātmānaṃ pravibhajyeha lokānāṃ hitamādadhe

"मैं चार रूपों वाला हूँ और सदा लोकों की रक्षा में तत्पर रहता हूँ। अपने को बाँटकर मैं यहाँ लोकों का हित साधता हूँ।"

श्लोक 33 (7.29.33)

एका मूर्तिस्तपश्चर्यां कुरुते मे भुवि स्थिता । अपरा पश्यति जगत्कुर्वाणं साध्वसाधुनी ॥

ekā mūrtistapaścaryāṃ kurute me bhuvi sthitā | aparā paśyati jagatkurvāṇaṃ sādhvasādhunī

"मेरा एक रूप भूमि पर स्थित रहकर तपस्या करता है; दूसरा जगत् को देखता रहता है, जो भले और बुरे कर्म करने वालों को देखता है।"

श्लोक 34 (7.29.34)

अपरा कुरुते कर्म मानुषं लोकमाश्रिता । शेते चतुर्थीं त्वपरा निद्रां वर्षसहस्रिकीम् ॥

aparā kurute karma mānuṣaṃ lokamāśritā | śete caturthīṃ tvaparā nidrāṃ varṣasahasrikīm

"तीसरा मनुष्यलोक में आकर कर्म करता है; और चौथा हज़ार वर्ष की निद्रा में सोया रहता है।"

श्लोक 35 (7.29.35)

याऽसौ वर्षसहस्रान्ते मूर्तिरुत्तिष्ठते मम । वरार्हेभ्यो वराञ्श्रेष्ठांस्तस्मिन्काले ददाति सा ॥

yā'sau varṣasahasrānte mūrtiruttiṣṭhate mama | varārhebhyo varāñśreṣṭhāṃstasminkāle dadāti sā

"जो रूप हज़ार वर्ष के अन्त में उठता है, वह उस समय वर पाने योग्यों को श्रेष्ठ वर देता है।"

श्लोक 36 (7.29.36)

तं तु कालमनुप्राप्तं विदित्वा पृथिवी तदा । अयाचत वरं यन्मां नरकार्थाय तच्छृणु ॥

taṃ tu kālamanuprāptaṃ viditvā pṛthivī tadā | ayācata varaṃ yanmāṃ narakārthāya tacchṛṇu

"उस समय को आया जानकर पृथ्वी ने तब नरक के लिए मुझसे जो वर माँगा, उसे सुनो।"

श्लोक 37 (7.29.37)

देवानां दानवानां च अवध्यस्तनयोऽस्तु मे । उपेतो वैष्णवास्त्रेण तन्मे त्वं दातुमर्हसि ॥

devānāṃ dānavānāṃ ca avadhyastanayo'stu me | upeto vaiṣṇavāstreṇa tanme tvaṃ dātumarhasi

"मेरा पुत्र देवताओं और दानवों के लिए अवध्य हो और वैष्णव अस्त्र से युक्त हो; वह तुम मुझे दे दो।"

श्लोक 38 (7.29.38)

एवं वरमहं श्रुत्वा जगत्यास्तनये तदा । अमोघमस्त्रं प्रायच्छं वैष्णवं परमं पुरा ॥

evaṃ varamahaṃ śrutvā jagatyāstanaye tadā | amoghamastraṃ prāyacchaṃ vaiṣṇavaṃ paramaṃ purā

"पृथ्वी की यह प्रार्थना सुनकर मैंने उसके पुत्र को पूर्वकाल में परम और अमोघ वैष्णव अस्त्र दिया।"

श्लोक 39 (7.29.39)

अवोचं चैतदस्त्रं वै ह्यमोघं भवतु क्षमे । नरकस्याभिरक्षार्थं नैनं कश्चिद्वधिष्यति ॥

avocaṃ caitadastraṃ vai hyamoghaṃ bhavatu kṣame | narakasyābhirakṣārthaṃ nainaṃ kaścidvadhiṣyati

"और मैंने कहा, 'हे क्षमा (पृथ्वी), यह अस्त्र अमोघ हो। नरक की रक्षा के लिए, उसे कोई नहीं मारेगा।'"

श्लोक 40 (7.29.40)

अनेनास्त्रेण ते गुप्तः सुतः परबलार्दनः । भविष्यति दुराधर्षः सर्वलोकेषु सर्वदा ॥

anenāstreṇa te guptaḥ sutaḥ parabalārdanaḥ | bhaviṣyati durādharṣaḥ sarvalokeṣu sarvadā

"इस अस्त्र से रक्षित तुम्हारा पुत्र शत्रु-सेनाओं को कुचलने वाला होगा और सब लोकों में सदा अजेय रहेगा।"

श्लोक 41 (7.29.41)

तथेत्युक्त्वा गता देवी कृतकामा मनस्विनी । स चाप्यासीद्दुराधर्षो नरकः शत्रुतापनः ॥

tathetyuktvā gatā devī kṛtakāmā manasvinī | sa cāpyāsīddurādharṣo narakaḥ śatrutāpanaḥ

"'ऐसा ही हो' कहकर वह मनस्विनी देवी कृतकृत्य होकर चली गई; और शत्रुओं को तपाने वाला नरक दुर्धर्ष हो गया।"

श्लोक 42 (7.29.42)

तस्मात्प्राग्ज्योतिषं प्राप्तं तदस्त्रं पार्थ मामकम् । नास्यावध्योऽस्ति लोकेषु सेन्द्ररुद्रेषु मारिष ॥

tasmātprāgjyotiṣaṃ prāptaṃ tadastraṃ pārtha māmakam | nāsyāvadhyo'sti lokeṣu sendrarudreṣu māriṣa

"हे पार्थ, उससे मेरा वह अस्त्र प्राग्ज्योतिष को मिला है; हे मारिष, इन्द्र और रुद्रों सहित सब लोकों में कोई ऐसा नहीं जो इससे अवध्य हो।"

श्लोक 43 (7.29.43)

तन्मया त्वत्कृते चैतदन्यथैवोपनिर्मितम् । वियुक्तं परमास्त्रेण जहि पार्थ महासुरम् ॥

tanmayā tvatkṛte caitadanyathaivopanirmitam | viyuktaṃ paramāstreṇa jahi pārtha mahāsuram

"तुम्हारे लिए मैंने इसे दूसरा ही कर दिया है; उस परम अस्त्र से रहित हो चुके महान् असुर को, हे पार्थ, मार डालो।"

श्लोक 44 (7.29.44)

अवध्योऽयं महास्त्रेण भगदत्तः सुरासुरैः । वैरिणं जहि दुर्धर्षं भगदत्तं सुरद्विषम् । यथाऽहं जघ्निवान्पूर्वं हितार्थं नरकं तथा ॥

avadhyo'yaṃ mahāstreṇa bhagadattaḥ surāsuraiḥ | vairiṇaṃ jahi durdharṣaṃ bhagadattaṃ suradviṣam | yathā'haṃ jaghnivānpūrvaṃ hitārthaṃ narakaṃ tathā

"उस महान् अस्त्र से सुरक्षित यह भगदत्त देवताओं और असुरों से अवध्य है। इस दुर्धर्ष शत्रु और देवद्रोही भगदत्त को मार डालो, जैसे मैंने पूर्वकाल में लोक के हित के लिए नरक को मारा था।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 45 (7.29.45)

एवमुक्तस्तदा पार्थः केशवेन महात्मना । भगदत्तं शितैर्बाणैः सहसा समवाकिरत् ॥

evamuktastadā pārthaḥ keśavena mahātmanā | bhagadattaṃ śitairbāṇaiḥ sahasā samavākirat

महात्मा केशव के यों कहने पर पार्थ ने तुरन्त तीखे बाणों से भगदत्त को ढक दिया।

श्लोक 46 (7.29.46)

ततः पार्थो महाबाहुरसम्भ्रान्तो महामनाः । कुम्भयोरन्तरे नागं नाराचेन समार्पयत् ॥

tataḥ pārtho mahābāhurasambhrānto mahāmanāḥ | kumbhayorantare nāgaṃ nārācena samārpayat

तब महाबाहु, अविचलित और महामना पार्थ ने नाराच बाण से हाथी के दोनों कुम्भों के बीच प्रहार किया।

श्लोक 47 (7.29.47)

स समासाद्य तं नागं बाणो वज्र इवाचलम् । अभ्यगात्सह पुङ्खेन वल्मीकमिव पन्नगः ॥

sa samāsādya taṃ nāgaṃ bāṇo vajra ivācalam | abhyagātsaha puṅkhena valmīkamiva pannagaḥ

उस हाथी तक पहुँचकर वह बाण पंखों सहित उसमें समा गया, जैसे वज्र पर्वत में या साँप बाँबी में समा जाता है।

श्लोक 48 (7.29.48)

स करी भगदत्तेन प्रेर्यमाणो मुहुर्मुहुः । न करोति वचस्तस्य दरिद्रस्येव योषिता ॥

sa karī bhagadattena preryamāṇo muhurmuhuḥ | na karoti vacastasya daridrasyeva yoṣitā

भगदत्त के बार-बार प्रेरित करने पर भी वह हाथी उसकी बात नहीं मानता था, जैसे स्त्री निर्धन पुरुष की बात नहीं मानती।

श्लोक 49 (7.29.49)

स तु विष्टभ्य गात्राणि दन्ताभ्यामवनिं ययौ । नदन्नार्तस्वनं प्राणानुत्ससर्ज महाद्विपः ॥

sa tu viṣṭabhya gātrāṇi dantābhyāmavaniṃ yayau | nadannārtasvanaṃ prāṇānutsasarja mahādvipaḥ

वह अपने अंगों को अकड़ाकर दाँतों के बल धरती पर गिर पड़ा, और आर्त स्वर में चिंघाड़ता हुआ उस महान् हाथी ने प्राण त्याग दिए।

श्लोक 50 (7.29.50)

ततो गाण्डीवधन्वानमभ्यभाषत केशवः । अयं महत्तरः पार्थ पलितेन समावृतः ॥

tato gāṇḍīvadhanvānamabhyabhāṣata keśavaḥ | ayaṃ mahattaraḥ pārtha palitena samāvṛtaḥ

तब केशव ने गाण्डीवधारी से कहा: "हे पार्थ, यह राजा बहुत वृद्ध और पके बालों से ढका हुआ है।"

वासुदेव उवाच

श्लोक 51 (7.29.51)

वलीसञ्छन्ननयनः शूरः परमदुर्जयः । अक्ष्णोरुन्मीलनार्थाय बद्धपट्टो ह्यसौ नृपः ॥

valīsañchannanayanaḥ śūraḥ paramadurjayaḥ | akṣṇorunmīlanārthāya baddhapaṭṭo hyasau nṛpaḥ

"उसकी आँखें झुर्रियों से ढकी हैं और वह अत्यन्त दुर्जय वीर है; इस राजा ने अपनी पलकें खुली रखने के लिए पट्टी बाँध रखी है।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 52 (7.29.52)

देववाक्यात्प्रचिच्छेद शरेण भृशमर्जुनः । छिन्नमात्रेऽंशुके तस्मिन्रुद्धनेत्रो बभूव सः ॥

devavākyātpraciccheda śareṇa bhṛśamarjunaḥ | chinnamātre'ṃśuke tasminruddhanetro babhūva saḥ

देव के वचन पर अर्जुन ने बाण से उसे काट दिया; और कपड़े के कटते ही उसकी आँखें बन्द हो गईं।

श्लोक 53 (7.29.53)

तमोमयं जगन्मेने भगदत्तः प्रतापवान् । ततश्चन्द्रार्धबिम्बेन बाणेन नतपर्वणा ॥

tamomayaṃ jaganmene bhagadattaḥ pratāpavān | tataścandrārdhabimbena bāṇena nataparvaṇā

प्रतापी भगदत्त ने जगत् को अन्धकार से भरा समझा। तब सीधी गाँठ वाले अर्धचन्द्राकार बाण से

श्लोक 54 (7.29.54)

बिभेद हृदयं राज्ञो भगदत्तस्य पाण्डवः । स भिन्नहृदयो राजा भगदत्तः किरीटिना ॥

bibheda hṛdayaṃ rājño bhagadattasya pāṇḍavaḥ | sa bhinnahṛdayo rājā bhagadattaḥ kirīṭinā

पाण्डव ने राजा भगदत्त का हृदय विदीर्ण कर दिया। किरीटी के द्वारा हृदय विदीर्ण होने पर राजा भगदत्त

श्लोक 55 (7.29.55)

शरासनं शरांश्चैव गतासुः प्रमुमोच ह । शिरसस्तस्य विभ्रष्टं पपात च वरांशुकम् । नालताडनविभ्रष्टं पलाशं नलिनादिव ॥

śarāsanaṃ śarāṃścaiva gatāsuḥ pramumoca ha | śirasastasya vibhraṣṭaṃ papāta ca varāṃśukam | nālatāḍanavibhraṣṭaṃ palāśaṃ nalinādiva

प्राणहीन होकर धनुष और बाण छोड़ बैठा। उसके सिर से सुन्दर वस्त्र खिसककर गिर पड़ा, जैसे कमल से डंठल की चोट से गिरी हुई पंखुड़ी।

श्लोक 56 (7.29.56)

स हेममाली तपनीयभाण्डात्पपात नागाद्गिरिसन्निकाशात् । सुपुष्पितो मारुतवेगभग्नो महीधराग्रादिव कर्णिकारः ॥

sa hemamālī tapanīyabhāṇḍātpapāta nāgādgirisannikāśāt | supuṣpito mārutavegabhagno mahīdharāgrādiva karṇikāraḥ

सोने की माला पहने वह पर्वत जैसे विशाल हाथी और उसके सुनहरे साज से नीचे गिर पड़ा, जैसे वायु के वेग से टूटा हुआ फूलों से लदा कर्णिकार वृक्ष पर्वत की चोटी से गिरता है।

श्लोक 57 (7.29.57)

निहत्य तं नरपतिमिन्द्रविक्रमं सखायमिन्द्रस्य तदैन्द्रिराहवे । ततोऽपरांस्तव जयकाङ्क्षिणो नरान् बभञ्ज वायुर्बलवान्द्रुमानिव ॥

nihatya taṃ narapatimindravikramaṃ sakhāyamindrasya tadaindrirāhave | tato'parāṃstava jayakāṅkṣiṇo narān babhañja vāyurbalavāndrumāniva

इन्द्र के समान पराक्रमी और इन्द्र के सखा उस राजा को मारकर इन्द्रपुत्र अर्जुन ने उस युद्ध में आपकी विजय चाहने वाले अन्य पुरुषों को वैसे ही तोड़ डाला जैसे प्रबल वायु वृक्षों को तोड़ देती है।

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