द्रोण पर्व · अध्याय 30
अर्जुन द्वारा वृषक-अचल का वध और शकुनि की मायाओं का नाश
भगदत्त का वध करने के बाद अर्जुन पर शकुनि के भाई वृषक और अचल आक्रमण करते हैं और अर्जुन एक ही बाण से दोनों को मार डालते हैं। तब शकुनि शस्त्रों, पशुओं, राक्षसों, अन्धकार और जल-प्रलय की मायाएँ रचता है; अर्जुन अपने दिव्यास्त्रों से हर माया को नष्ट कर देते हैं और शकुनि भाग खड़ा होता है। फिर अर्जुन कौरव-सेना को छिन्न-भिन्न कर देते हैं; वह दो भागों में बँटकर बिखर जाती है, और सञ्जय दक्षिण में गाण्डीव की गर्जना तथा संहार का वर्णन करते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.30.1)
प्रियमिन्द्रस्य सततं सखायममितौजसम् । हत्वा प्राग्ज्योतिषं पार्थः प्रदक्षिणमवर्तत ॥
priyamindrasya satataṃ sakhāyamamitaujasam | hatvā prāgjyotiṣaṃ pārthaḥ pradakṣiṇamavartata
इन्द्र के सदा प्रिय मित्र, अपार तेजस्वी प्राग्ज्योतिष-नरेश भगदत्त को मारकर पार्थ ने उन्हें अपनी दाहिनी ओर रखते हुए परिक्रमा की।
श्लोक 2 (7.30.2)
ततो गान्धारराजस्य सुतौ परपुरञ्जयौ । अर्देतामर्जुनं सङ्ख्ये भ्रातरौ वृषकाचलौ ॥
tato gāndhārarājasya sutau parapurañjayau | ardetāmarjunaṃ saṅkhye bhrātarau vṛṣakācalau
तब गान्धारराज के दो पुत्र, शत्रुओं के नगर जीतने वाले भाई वृषक और अचल, युद्ध में अर्जुन को पीड़ित करने लगे।
श्लोक 3 (7.30.3)
तौ समेत्यार्जुनं वीरौ पुरः पश्चाच्च धन्वितौ । अविध्येतां महावेगैर्निशितैराशुगैर्भृशम् ॥
tau sametyārjunaṃ vīrau puraḥ paścācca dhanvitau | avidhyetāṃ mahāvegairniśitairāśugairbhṛśam
धनुष लिए हुए उन दोनों वीरों ने अर्जुन के सामने और पीछे से आकर उन्हें अत्यन्त वेगवान्, तीखे और शीघ्रगामी बाणों से बुरी तरह बींधा।
श्लोक 4 (7.30.4)
वृषकस्य हयान्सूतं धनुश्छत्रं रथं ध्वजम् । तिलशो व्यधमत्पार्थः सौबलस्य शितैः शरैः ॥
vṛṣakasya hayānsūtaṃ dhanuśchatraṃ rathaṃ dhvajam | tilaśo vyadhamatpārthaḥ saubalasya śitaiḥ śaraiḥ
पार्थ ने अपने तीखे बाणों से सुबलपुत्र वृषक के घोड़ों, सारथि, धनुष, छत्र, रथ और ध्वज के तिल-तिल जितने टुकड़े कर दिए।
श्लोक 5 (7.30.5)
ततोऽर्जुनः शरव्रातैर्नानाप्रहरणैरपि । गान्धारानाकुलांश्चक्रे सौबलप्रमुखान्पुनः ॥
tato'rjunaḥ śaravrātairnānāpraharaṇairapi | gāndhārānākulāṃścakre saubalapramukhānpunaḥ
तब अर्जुन ने बाणों की वर्षा और नाना प्रकार के शस्त्रों से शकुनि के नेतृत्व वाले गान्धारों को फिर व्याकुल कर दिया।
श्लोक 6 (7.30.6)
ततः पञ्चशतान्वीरान्गान्धारानुद्यतायुधान् । प्राहिणोन्मृत्युलोकाय क्रुद्धो बाणैर्धनञ्जयः ॥
tataḥ pañcaśatānvīrāngāndhārānudyatāyudhān | prāhiṇonmṛtyulokāya kruddho bāṇairdhanañjayaḥ
तब क्रोधित धनञ्जय ने शस्त्र उठाए हुए पाँच सौ गान्धार वीरों को अपने बाणों से यमलोक भेज दिया।
श्लोक 7 (7.30.7)
हताश्वात्तु रथात्तूर्णमवतीर्य महाभुजः । आरुरोह रथं भ्रातुरन्यश्च धनुराददे ॥
hatāśvāttu rathāttūrṇamavatīrya mahābhujaḥ | āruroha rathaṃ bhrāturanyaśca dhanurādade
घोड़े मारे जाने पर महाबाहु वृषक शीघ्र ही अपने रथ से उतरा, अपने भाई के रथ पर चढ़ गया और उसने दूसरा धनुष उठा लिया।
श्लोक 8 (7.30.8)
तावेकरथमारूढौ भ्रातरौ वृषकाचलौ । शरवर्षेण बीभत्सुमविध्येतां मुहुर्मुहुः ॥
tāvekarathamārūḍhau bhrātarau vṛṣakācalau | śaravarṣeṇa bībhatsumavidhyetāṃ muhurmuhuḥ
एक ही रथ पर खड़े वृषक और अचल दोनों भाई बार-बार बाणों की वर्षा से बीभत्सु को बींधने लगे।
श्लोक 9 (7.30.9)
स्यालौ तव महात्मानौ राजानौ वृषकाचलौ । भृशं विजघ्नतुः पार्थमिन्द्रं वृत्रबलाविव ॥
syālau tava mahātmānau rājānau vṛṣakācalau | bhṛśaṃ vijaghnatuḥ pārthamindraṃ vṛtrabalāviva
हे राजन्, आपके दोनों महामनस्वी साले, राजा वृषक और अचल, पार्थ पर वैसे ही प्रबल प्रहार करने लगे जैसे वृत्र और बल इन्द्र पर करते थे।
श्लोक 10 (7.30.10)
लब्धलक्षौ तु गान्धारावहतां पाण्डवं पुनः । नैदाघवार्षिकौ मासौ लोकं घर्मांशुभिर्यथा ॥
labdhalakṣau tu gāndhārāvahatāṃ pāṇḍavaṃ punaḥ | naidāghavārṣikau māsau lokaṃ gharmāṃśubhiryathā
निशाना साध लेने पर उन दोनों गान्धारों ने पाण्डुपुत्र पर फिर प्रहार किया, जैसे ग्रीष्म और वर्षा के दो महीने अपनी तपती किरणों से संसार को सताते हैं।
श्लोक 11 (7.30.11)
तौ रथस्थौ नरव्याघ्रौ राजानौ वृषकाचलौ । संश्चिष्टाङ्गौ स्थितौ राजञ्जघानैकेषुणाऽर्जुनः ॥
tau rathasthau naravyāghrau rājānau vṛṣakācalau | saṃściṣṭāṅgau sthitau rājañjaghānaikeṣuṇā'rjunaḥ
हे राजन्, रथ पर एक-दूसरे से सटकर खड़े उन दोनों पुरुषसिंह राजाओं को अर्जुन ने एक ही बाण से मार डाला।
श्लोक 12 (7.30.12)
तौ रथात्सिंहसंकाशौ लोहिताक्षौ महाभुजौ । राजन्सम्पेततुर्वीरौ सोदर्यावेकलक्षणौ ॥
tau rathātsiṃhasaṃkāśau lohitākṣau mahābhujau | rājansampetaturvīrau sodaryāvekalakṣaṇau
सिंह के समान, लाल नेत्रों वाले और विशाल भुजाओं वाले वे दोनों सगे भाई, जिनके लक्षण एक-से थे, हे राजन्, प्राणहीन होकर रथ से गिर पड़े।
श्लोक 13 (7.30.13)
तयोर्भूमिं गतौ देहौ रथाद्बन्धुजनप्रियौ । यशो दश दिशः पुण्यं गमयित्वा व्यवस्थितौ ॥
tayorbhūmiṃ gatau dehau rathādbandhujanapriyau | yaśo daśa diśaḥ puṇyaṃ gamayitvā vyavasthitau
बन्धुजनों को प्रिय उन दोनों के शरीर रथ से भूमि पर गिरे पड़े थे, पर वे अपना पवित्र यश दसों दिशाओं में फैलाकर अमर हो गए।
श्लोक 14 (7.30.14)
दृष्ट्वा विनिहतौ सङ्ख्ये मातुलावपलायिनौ । भृशं मुमुचुरश्रूणि पुत्रास्तव विशांपते ॥
dṛṣṭvā vinihatau saṅkhye mātulāvapalāyinau | bhṛśaṃ mumucuraśrūṇi putrāstava viśāṃpate
युद्ध में कभी पीठ न दिखाने वाले अपने दोनों मामाओं को मारा गया देखकर, हे प्रजापालक, आपके पुत्र बहुत आँसू बहाने लगे।
श्लोक 15 (7.30.15)
निहतौ भ्रातरौ दृष्ट्वा मायाशतविशारदः । कृष्णौ सम्मोहयन्मायां विदधे शकुनिस्ततः ॥
nihatau bhrātarau dṛṣṭvā māyāśataviśāradaḥ | kṛṣṇau sammohayanmāyāṃ vidadhe śakunistataḥ
अपने दोनों भाइयों को मरा देखकर सैकड़ों मायाओं में निपुण शकुनि ने दोनों कृष्णों को मोहित करने के लिए माया रची।
श्लोक 16 (7.30.16)
लगुडायोगुडाश्मानः शतघ्न्यश्च सशक्तयः । गदापरिघनिस्त्रिंशशूलमुद्गरपट्टसाः ॥
laguḍāyoguḍāśmānaḥ śataghnyaśca saśaktayaḥ | gadāparighanistriṃśaśūlamudgarapaṭṭasāḥ
लगुड, लोहे के गोले और पत्थर, शतघ्नियाँ और शक्तियाँ, गदाएँ, परिघ, खड्ग, शूल, मुद्गर और पट्टस;
श्लोक 17 (7.30.17)
सकम्पनर्ष्टिनखरा मुसलानि परश्वथाः । क्षुराः क्षुरप्रनालीका वत्सदन्तास्थिसन्धयः ॥
sakampanarṣṭinakharā musalāni paraśvathāḥ | kṣurāḥ kṣurapranālīkā vatsadantāsthisandhayaḥ
कम्पन, ऋष्टि, नखर, मूसल, फरसे, क्षुर, क्षुरप्र, नालीक, वत्सदन्त और अस्थिसन्धि नामक अस्त्र;
श्लोक 18 (7.30.18)
चक्राणि विशिखाः प्रासा विविधान्यायुधानि च । प्रपेतुः शतशो दिग्भ्यः प्रदिग्भ्यश्चार्जुनं प्रति ॥
cakrāṇi viśikhāḥ prāsā vividhānyāyudhāni ca | prapetuḥ śataśo digbhyaḥ pradigbhyaścārjunaṃ prati
चक्र, विशिख, प्रास और नाना प्रकार के अन्य शस्त्र सब दिशाओं और उपदिशाओं से सैकड़ों की संख्या में अर्जुन पर आ गिरे।
श्लोक 19 (7.30.19)
खरोष्ट्रमहिषाः सिंहा व्याघ्राः सृमरचित्रकाः । ऋक्षाः सालावृका गृध्राः कपयश्च सरीसृपाः ॥
kharoṣṭramahiṣāḥ siṃhā vyāghrāḥ sṛmaracitrakāḥ | ṛkṣāḥ sālāvṛkā gṛdhrāḥ kapayaśca sarīsṛpāḥ
गधे, ऊँट, भैंसे, सिंह, बाघ, सृमर, चीते, भालू, भेड़िये, गिद्ध, बन्दर और रेंगने वाले जन्तु;
श्लोक 20 (7.30.20)
विविधानि च रक्षांसि क्षुधितान्यर्जुनं प्रति । सङ्क्रुद्धान्यभ्यधावन्त विविधानि वयांसि च ॥
vividhāni ca rakṣāṃsi kṣudhitānyarjunaṃ prati | saṅkruddhānyabhyadhāvanta vividhāni vayāṃsi ca
और भूखे नाना प्रकार के राक्षस तथा नाना प्रकार के पक्षी, सभी क्रोध से भरे हुए, अर्जुन की ओर दौड़ पड़े।
श्लोक 21 (7.30.21)
ततो दिव्यास्त्रविच्छूरः कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः । विसृजन्निषुजालानि सहसा तान्यताडयत् ॥
tato divyāstravicchūraḥ kuntīputro dhanañjayaḥ | visṛjanniṣujālāni sahasā tānyatāḍayat
तब दिव्यास्त्रों के ज्ञाता वीर कुन्तीपुत्र धनञ्जय ने बाणों के जाल छोड़ते हुए अचानक उन सबको मार गिराया।
श्लोक 22 (7.30.22)
ते हन्यमानाः शूरेण प्रवरैः सायकैर्दृढैः । विरुवन्तो महारावान्विनेशुः सर्वतो हताः ॥
te hanyamānāḥ śūreṇa pravaraiḥ sāyakairdṛḍhaiḥ | viruvanto mahārāvānvineśuḥ sarvato hatāḥ
उस शूर के पैने, उत्तम बाणों की मार खाकर वे बड़े-बड़े चीत्कार करते हुए चारों ओर से मरकर नष्ट हो गए।
श्लोक 23 (7.30.23)
ततस्तमः प्रादुरभूदर्जुनस्य रथं प्रति । तस्माच्च तमसो वाचः क्रूराः पार्थमभर्त्सयन् ॥
tatastamaḥ prādurabhūdarjunasya rathaṃ prati | tasmācca tamaso vācaḥ krūrāḥ pārthamabhartsayan
तब अर्जुन के रथ की ओर अन्धकार छा गया, और उस अन्धकार से क्रूर वाणियाँ पार्थ को धिक्कारने लगीं।
श्लोक 24 (7.30.24)
तत्तमो भैरवं घोरं भयकर्तृ महाहवे । उत्तमास्त्रेण महता ज्यौतिषेणार्जुनोऽवधीत् ॥
tattamo bhairavaṃ ghoraṃ bhayakartṛ mahāhave | uttamāstreṇa mahatā jyautiṣeṇārjuno'vadhīt
महायुद्ध में भय उत्पन्न करने वाले उस भयंकर, घोर अन्धकार को अर्जुन ने ज्यौतिष नामक महान् उत्तम अस्त्र से नष्ट कर दिया।
श्लोक 25 (7.30.25)
हते तस्मिञ्जलौघास्तु प्रादुरासन्भयानकाः । अम्भसस्तस्य नाशार्थमादित्यास्त्रमथार्जुनः । प्रायुङ्क्ताम्भस्ततस्तेन प्रायशोऽस्त्रेण शोषितम् ॥
hate tasmiñjalaughāstu prādurāsanbhayānakāḥ | ambhasastasya nāśārthamādityāstramathārjunaḥ | prāyuṅktāmbhastatastena prāyaśo'streṇa śoṣitam
उसके नष्ट होने पर भयानक जल-प्रवाह प्रकट हुए। उस जल को नष्ट करने के लिए अर्जुन ने आदित्यास्त्र चलाया, और उस अस्त्र से वह जल प्रायः सूख गया।
श्लोक 26 (7.30.26)
एवं बहुविधा मायाः सौबलस्य कृताः कृताः । जघानास्त्रबलेनाशु प्रहसन्नर्जुनोऽब्रवीत् ॥
evaṃ bahuvidhā māyāḥ saubalasya kṛtāḥ kṛtāḥ | jaghānāstrabalenāśu prahasannarjuno'bravīt
इस प्रकार शकुनि की रची हुई अनेक प्रकार की मायाओं को एक-एक करके अर्जुन ने अस्त्रबल से तुरन्त नष्ट कर दिया और हँसते हुए कहा:
अर्जुन उवाच
श्लोक 27 (7.30.27)
दुर्द्यूतदेविन्गान्धारे नाक्षान्क्षिपति गाण्डिवम् । ज्वलितान्निशितांस्तीक्ष्णाञ्शरान्क्षिपति गाण्डिवम् ॥
durdyūtadevingāndhāre nākṣānkṣipati gāṇḍivam | jvalitānniśitāṃstīkṣṇāñśarānkṣipati gāṇḍivam
"हे गान्धार, कपट से जुआ खेलने वाले! गाण्डीव पासे नहीं फेंकता; वह चमकते हुए, सान चढ़े, तीखे बाण फेंकता है — गाण्डीव ही फेंकता है!"
सञ्जय उवाच
श्लोक 28 (7.30.28)
तदा हतासु मायासु त्रस्तोऽर्जुनशराहतः । अपायाञ्जवनैरश्वैः शकुनिः प्राकृतो यथा ॥
tadā hatāsu māyāsu trasto'rjunaśarāhataḥ | apāyāñjavanairaśvaiḥ śakuniḥ prākṛto yathā
मायाएँ नष्ट हो जाने पर अर्जुन के बाणों से घायल और भयभीत शकुनि किसी साधारण मनुष्य की भाँति तेज़ घोड़ों पर भाग गया।
श्लोक 29 (7.30.29)
ततोऽर्जुनोऽस्त्रविच्छैघ्र्यं दर्शयन्नात्मनोऽरिषु । अभ्यवर्षच्छरौधेण कौरवाणामनीकिनीम् ॥
tato'rjuno'stravicchaighryaṃ darśayannātmano'riṣu | abhyavarṣaccharaudheṇa kauravāṇāmanīkinīm
तब अर्जुन ने शत्रुओं पर अपनी अस्त्र-कुशलता दिखाते हुए कौरव-सेना पर बाणों की बाढ़ बरसा दी।
श्लोक 30 (7.30.30)
सा हन्यमाना पार्थेन तव पुत्रस्य वाहिनी । द्वैधीभूता महाराज गङ्गेवासाद्य पर्वतम् ॥
sā hanyamānā pārthena tava putrasya vāhinī | dvaidhībhūtā mahārāja gaṅgevāsādya parvatam
हे महाराज, पार्थ की मार से आपके पुत्र की वह सेना पर्वत से टकराई गङ्गा की तरह दो भागों में बँट गई।
श्लोक 31 (7.30.31)
द्रोणमेवान्वपद्यन्त केचित्तत्र नरर्षभाः । केचिद्दुर्योधनं राजन्नर्द्यमानाः किरीटिना ॥
droṇamevānvapadyanta kecittatra nararṣabhāḥ | kecidduryodhanaṃ rājannardyamānāḥ kirīṭinā
हे राजन्, वहाँ कुछ श्रेष्ठ योद्धा द्रोण की शरण में गए, और कुछ किरीटी से पीड़ित होकर दुर्योधन के पास चले गए।
श्लोक 32 (7.30.32)
नापश्याम ततस्त्वेनं सैन्ये वै रजसावृते । गाण्डीवस्य च निर्घोषः श्रुतो दक्षिणतो मया ॥
nāpaśyāma tatastvenaṃ sainye vai rajasāvṛte | gāṇḍīvasya ca nirghoṣaḥ śruto dakṣiṇato mayā
उसके बाद धूल से ढकी सेना में हम उन्हें देख नहीं सके; किन्तु मैंने दक्षिण की ओर गाण्डीव की गर्जना सुनी।
श्लोक 33 (7.30.33)
शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषं वादित्राणां च निःस्वनम् । गाण्डीवस्य तु निर्घोषो व्यतिक्रम्यास्पृशद्दिवम् ॥
śaṅkhadundubhinirghoṣaṃ vāditrāṇāṃ ca niḥsvanam | gāṇḍīvasya tu nirghoṣo vyatikramyāspṛśaddivam
शङ्खों और दुन्दुभियों की ध्वनि तथा वाद्यों के शब्द को लाँघकर गाण्डीव की गर्जना आकाश तक जा पहुँची।
श्लोक 34 (7.30.34)
ततः पुनर्दक्षिणतः सङ्ग्रामश्चित्रयोधिनाम् । सुयुद्धं चार्जुनस्यासीदहं द्रोणमन्वियाम् ॥
tataḥ punardakṣiṇataḥ saṅgrāmaścitrayodhinām | suyuddhaṃ cārjunasyāsīdahaṃ droṇamanviyām
फिर दक्षिण की ओर विचित्र ढंग से लड़ने वाले योद्धाओं का संग्राम हुआ और अर्जुन का युद्ध बहुत उत्कृष्ट रहा; और मैं द्रोण के पास चला गया।
श्लोक 35 (7.30.35)
यौधिष्ठिराण्यनीकानि प्रहरन्ति ततस्ततः । नानाविधान्यनीकानि पुत्राणां तव भारत । अर्जुनो व्यधमत्काले दिवीवाभ्राणि मारुतः ॥
yaudhiṣṭhirāṇyanīkāni praharanti tatastataḥ | nānāvidhānyanīkāni putrāṇāṃ tava bhārata | arjuno vyadhamatkāle divīvābhrāṇi mārutaḥ
युधिष्ठिर की सेनाएँ इधर-उधर प्रहार कर रही हैं; और हे भारत, आपके पुत्रों की नाना प्रकार की सेनाओं को अर्जुन ने समय आने पर वैसे ही बिखेर दिया जैसे आकाश में हवा बादलों को बिखेर देती है।
श्लोक 36 (7.30.36)
तं वासवमिवायान्तं भूरिवर्षं शरौघिणम् । महेष्वासा नरव्याघ्रा नोग्रं केचिदवारयन् ॥
taṃ vāsavamivāyāntaṃ bhūrivarṣaṃ śaraughiṇam | maheṣvāsā naravyāghrā nograṃ kecidavārayan
इन्द्र के समान आते हुए, घनघोर बाण-वर्षा करने वाले उस उग्र वीर को पुरुषव्याघ्र महाधनुर्धरों में से कोई भी नहीं रोक सका।
श्लोक 37 (7.30.37)
ते हन्यमानाः पार्थेन त्वदीया व्यथिता भृशम् । स्वानेव बहवो जघ्नुर्विद्रवन्तस्ततस्ततः ॥
te hanyamānāḥ pārthena tvadīyā vyathitā bhṛśam | svāneva bahavo jaghnurvidravantastatastataḥ
पार्थ की मार से अत्यन्त व्यथित आपके सैनिक इधर-उधर भागते हुए बहुतों के हाथ अपने ही साथियों को मार बैठे।
श्लोक 38 (7.30.38)
तेऽर्जुनेन शरा मुक्ताः कङ्कपत्रास्तनुच्छिदः । शलभा इव सम्पेतुः संवृण्वाना दिशो दश ॥
te'rjunena śarā muktāḥ kaṅkapatrāstanucchidaḥ | śalabhā iva sampetuḥ saṃvṛṇvānā diśo daśa
अर्जुन के छोड़े हुए कङ्कपत्र वाले, कवच को भेदने वाले बाण दसों दिशाओं को ढकते हुए टिड्डियों की तरह गिर रहे थे।
श्लोक 39 (7.30.39)
तुरगं रथिनं नागं पदातिमपि मारिष । विनिर्भिद्य क्षितिं जग्मुर्वल्मीकमिव पन्नगाः ॥
turagaṃ rathinaṃ nāgaṃ padātimapi māriṣa | vinirbhidya kṣitiṃ jagmurvalmīkamiva pannagāḥ
हे मान्यवर, घोड़े, रथी, हाथी और पैदल सैनिक को बींधकर वे बाण साँपों के बाँबी में घुसने की तरह धरती में समा जाते थे।
श्लोक 40 (7.30.40)
न च द्वितीयं व्यसृजत्कुञ्जराश्वनरेषु सः । पृथगेकशरारुग्णा निपेतुस्ते गतासवः ॥
na ca dvitīyaṃ vyasṛjatkuñjarāśvanareṣu saḥ | pṛthagekaśarārugṇā nipetuste gatāsavaḥ
उन्होंने किसी हाथी, घोड़े या मनुष्य पर दूसरा बाण नहीं छोड़ा; एक ही बाण से घायल होकर वे सब अलग-अलग प्राणहीन होकर गिरते गए।
श्लोक 41 (7.30.41)
हतैर्मनुष्यैर्द्विरदैश्च सर्वतः । शराभिसृष्टैश्च हयैर्निपातितैः । तदा श्वगोमायुबलाभिनादितं । विचित्रमायोधशिरो बभूव तत् ॥
hatairmanuṣyairdviradaiśca sarvataḥ | śarābhisṛṣṭaiśca hayairnipātitaiḥ | tadā śvagomāyubalābhināditaṃ | vicitramāyodhaśiro babhūva tat
चारों ओर मारे गए मनुष्यों और हाथियों के तथा बाणों की वर्षा से गिराए गए घोड़ों के पड़े रहने से वह रणभूमि उस समय कुत्तों, सियारों और मांसभक्षी पक्षियों के शब्दों से गूँजती हुई विचित्र हो उठी।
श्लोक 42 (7.30.42)
पिता सुतं त्यजति सुहृद्वरं सुहृत् । तथैव पुत्रः पितरं शरातुरः । स्वरक्षणे कृतमतयस्तदा जना । सत्यजन्ति वाहानपि पार्थपीडिताः ॥
pitā sutaṃ tyajati suhṛdvaraṃ suhṛt | tathaiva putraḥ pitaraṃ śarāturaḥ | svarakṣaṇe kṛtamatayastadā janā | satyajanti vāhānapi pārthapīḍitāḥ
बाणों से पीड़ित पिता पुत्र को छोड़ देता था, मित्र अपने प्रिय मित्र को छोड़ देता था, और उसी प्रकार पुत्र पिता को; अपनी रक्षा में लगे हुए लोग पार्थ से पीड़ित होकर अपने वाहनों तक को छोड़ देते थे।