द्रोण पर्व · अध्याय 32
भीम और द्रोण का युद्ध, अर्जुन का लौटना और कर्ण का उद्धार
सेना के पीछे हटाए जाने को न सह पाने के कारण भीम द्रोण और कर्ण पर प्रहार करते हैं, और बदले में द्रोण, कर्ण, अश्वत्थामा और दुर्योधन उन्हें बाणों से बेधते हैं। युधिष्ठिर के प्रेरित करने पर पाण्डव वीर उनकी सहायता को दौड़ पड़ते हैं, और घुड़सवारों, रथियों, हाथियों तथा पैदलों का मर्यादाहीन, घमासान युद्ध छिड़ जाता है, जिसमें चारों ओर "हाय तात! हाय पुत्र!" की पुकारें सुनाई देती हैं। संशप्तकों को हराकर अर्जुन लौटते हैं और कौरव-पंक्तियों को जलाने लगते हैं, तब कर्ण आग्नेयास्त्र लेकर उनके सामने आता है; अर्जुन के हाथों कर्ण के तीन भाई मारे जाते हैं, और धृष्टद्युम्न, भीम तथा सात्यकि से घिरे कर्ण को दुर्योधन, द्रोण और जयद्रथ बचा ले जाते हैं। सूर्यास्त होने पर दोनों सेनाएँ अपने शिविरों को लौट जाती हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.32.1)
प्रतिघातं तु सैन्यस्य नामृष्यत वृकोदरः । सोऽभ्याहनद्गुरुं षष्ट्या कर्णं च दशभिः शरैः ॥
pratighātaṃ tu sainyasya nāmṛṣyata vṛkodaraḥ | so'bhyāhanadguruṃ ṣaṣṭyā karṇaṃ ca daśabhiḥ śaraiḥ
अपनी सेना का प्रतिरोध भीम से सहा नहीं गया। उन्होंने गुरु द्रोण को साठ बाणों से और कर्ण को दस बाणों से घायल किया।
श्लोक 2 (7.32.2)
तस्य द्रोणः शितैर्बाणैस्तीक्ष्णधारैरजिह्मगैः । जीवितान्तमभिप्रेप्सुर्मर्मण्याशु जघान ह ॥
tasya droṇaḥ śitairbāṇaistīkṣṇadhārairajihmagaiḥ | jīvitāntamabhiprepsurmarmaṇyāśu jaghāna ha
द्रोण ने उनके प्राण लेने की इच्छा से तीखी धार वाले, सीधे जाने वाले पैने बाणों से उनके मर्मस्थानों पर शीघ्र प्रहार किया।
श्लोक 3 (7.32.3)
आनन्तर्यमभिप्रेप्सुः षड्विंशत्या समार्पयत् । कर्णो द्वादशभिर्बाणैरश्वत्थामा च सप्तभिः ॥
ānantaryamabhiprepsuḥ ṣaḍviṃśatyā samārpayat | karṇo dvādaśabhirbāṇairaśvatthāmā ca saptabhiḥ
निरन्तर प्रहार करने की इच्छा से द्रोण ने उन्हें छब्बीस बाणों से बेधा; कर्ण ने बारह बाणों से और अश्वत्थामा ने सात से,
श्लोक 4 (7.32.4)
षड्भिर्दुर्योधनो राजा तत एनमथाकिरत् । भीमसेनोऽपि तान्सर्वान्प्रत्यविध्यन्महाबलः ॥
ṣaḍbhirduryodhano rājā tata enamathākirat | bhīmaseno'pi tānsarvānpratyavidhyanmahābalaḥ
और राजा दुर्योधन ने छह बाणों से उन पर बाणवर्षा की। तब महाबली भीमसेन ने भी उन सबको बदले में बेधा —
श्लोक 5 (7.32.5)
द्रोणं पञ्चाशतेषूणां कर्णं च दशभिः शरैः । दुर्योधनं द्वादशभिर्द्रौणिमष्टाभिराशुगैः ॥
droṇaṃ pañcāśateṣūṇāṃ karṇaṃ ca daśabhiḥ śaraiḥ | duryodhanaṃ dvādaśabhirdrauṇimaṣṭābhirāśugaiḥ
द्रोण को पचास बाणों से, कर्ण को दस बाणों से, दुर्योधन को बारह से और द्रोणपुत्र को आठ शीघ्रगामी बाणों से,
श्लोक 6 (7.32.6)
आरावं तुमुलं कुर्वन्नभ्यवर्तत तान्रणे । तस्मिन्सन्त्यजति प्राणान्मृत्युसाधारणीकृते ॥
ārāvaṃ tumulaṃ kurvannabhyavartata tānraṇe | tasminsantyajati prāṇānmṛtyusādhāraṇīkṛte
भयंकर गर्जना करते हुए वे रण में उन पर टूट पड़े। जब वे मृत्यु के समान दशा में पहुँचकर प्राण छोड़ने ही वाले थे,
श्लोक 7 (7.32.7)
अजातशत्रुस्तान्योधान्भीमं त्रातेत्यचोदयत् । ते ययुर्भीमसेनस्य समीपममितौजसः ॥
ajātaśatrustānyodhānbhīmaṃ trātetyacodayat | te yayurbhīmasenasya samīpamamitaujasaḥ
तब अजातशत्रु युधिष्ठिर ने उन योद्धाओं को "भीम को बचाओ!" कहकर प्रेरित किया। और वे अमित तेजस्वी वीर भीमसेन के पास जा पहुँचे:
श्लोक 8 (7.32.8)
युयुधानप्रभृतयो माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ । ते समेत्य सुसंरब्धाः सहिताः पुरुषर्षभाः ॥
yuyudhānaprabhṛtayo mādrīputrau ca pāṇḍavau | te sametya susaṃrabdhāḥ sahitāḥ puruṣarṣabhāḥ
युयुधान आदि वीर और माद्री के दोनों पुत्र, पाण्डव नकुल-सहदेव। वे पुरुषश्रेष्ठ एकजुट होकर अत्यन्त क्रोध में भरे हुए एकत्र हुए,
श्लोक 9 (7.32.9)
महेष्वासवरैर्गुप्तं द्रोणानीकं बिभित्सवः । समापेतुर्महावीर्या भीमप्रभृतयो रथाः ॥
maheṣvāsavarairguptaṃ droṇānīkaṃ bibhitsavaḥ | samāpeturmahāvīryā bhīmaprabhṛtayo rathāḥ
श्रेष्ठ महाधनुर्धरों से रक्षित द्रोण की सेना को भेदने की इच्छा से, भीम आदि वे महापराक्रमी रथी उस पर एक साथ टूट पड़े।
श्लोक 10 (7.32.10)
तान्प्रत्यगृह्णादव्यग्रो द्रोणोऽपि रथिनां वरः । महारथानतिबलान्वीरान्समरयोधिनः ॥
tānpratyagṛhṇādavyagro droṇo'pi rathināṃ varaḥ | mahārathānatibalānvīrānsamarayodhinaḥ
रथियों में श्रेष्ठ द्रोण ने भी विचलित हुए बिना उनका सामना किया — उन अत्यन्त बलवान महारथी वीरों का, जो युद्ध में लड़ने वाले योद्धा थे।
श्लोक 11 (7.32.11)
बाह्यं मृत्युभयं कृत्वा तावकान्पाण्डवा ययुः । सादिनः सादिनोऽभ्यघ्नंस्तथैव रथिनो रथान् ॥
bāhyaṃ mṛtyubhayaṃ kṛtvā tāvakānpāṇḍavā yayuḥ | sādinaḥ sādino'bhyaghnaṃstathaiva rathino rathān
मृत्यु के भय को एक ओर रखकर पाण्डव आपके योद्धाओं पर चढ़ आए। घुड़सवारों ने घुड़सवारों को मारा और उसी प्रकार रथियों ने रथियों को।
श्लोक 12 (7.32.12)
असिशक्त्यृष्टिसङ्घातैर्युद्धमासीत्परश्वथैः । प्रकृष्टमसियुद्धं च बभूव कटुकोदयम् ॥
asiśaktyṛṣṭisaṅghātairyuddhamāsītparaśvathaiḥ | prakṛṣṭamasiyuddhaṃ ca babhūva kaṭukodayam
तलवारों, शक्तियों, ऋष्टियों और फरसों की बौछारों के साथ युद्ध होने लगा, और अत्यन्त उग्र असि-युद्ध छिड़ गया, जिसका परिणाम कटु था।
श्लोक 13 (7.32.13)
कुञ्जराणां च सम्पाते युद्धमासीत्सुदारुणम् । अपतत्कुञ्जरादन्यो हयादन्यस्त्ववाक्शिराः ॥
kuñjarāṇāṃ ca sampāte yuddhamāsītsudāruṇam | apatatkuñjarādanyo hayādanyastvavākśirāḥ
हाथियों की भिड़ंत होने पर युद्ध अत्यन्त भयंकर हो गया। कोई हाथी से गिरा, कोई सिर नीचे किए हुए घोड़े से,
श्लोक 14 (7.32.14)
नरो बाणविनिर्भिन्नो रथादन्यश्च मारिष । तत्रान्यस्य च सम्मर्दे पतितस्य विवर्मणः ॥
naro bāṇavinirbhinno rathādanyaśca māriṣa | tatrānyasya ca sammarde patitasya vivarmaṇaḥ
कोई बाणों से बिंधा हुआ रथ से गिरा, हे मारिष; और वहाँ भीड़ में जब एक और योद्धा कवचहीन होकर गिरा पड़ा था,
श्लोक 15 (7.32.15)
शिरः प्रध्वंसयामास वक्षस्याक्रम्य कुञ्जरः । अपरांश्चापरेऽमृद्नन्वारणाः पतितान्नरान् ॥
śiraḥ pradhvaṃsayāmāsa vakṣasyākramya kuñjaraḥ | aparāṃścāpare'mṛdnanvāraṇāḥ patitānnarān
तो एक हाथी ने उसकी छाती पर पैर रखकर उसका सिर कुचल डाला; और दूसरे हाथियों ने दूसरे गिरे हुए लोगों को रौंद दिया।
श्लोक 16 (7.32.16)
विषाणैश्चावनिं गत्वा व्यभिन्दन्रथिनो बहून् । नरान्त्रैः केचिदपरे विषाणालग्नसंश्रयैः ॥
viṣāṇaiścāvaniṃ gatvā vyabhindanrathino bahūn | narāntraiḥ kecidapare viṣāṇālagnasaṃśrayaiḥ
कुछ हाथी अपने दाँतों से धरती तक पहुँचकर बहुत-से रथियों को चीर डालते थे; दूसरे हाथी, जिनके दाँतों में मनुष्यों की आँतें अटककर लटक रही थीं,
श्लोक 17 (7.32.17)
बभ्रमुः समरे नागा मृद्नन्तः शतशो नरान् । कार्ष्णायसतनुत्राणान्नराश्वरथकुञ्जरान् ॥
babhramuḥ samare nāgā mṛdnantaḥ śataśo narān | kārṣṇāyasatanutrāṇānnarāśvarathakuñjarān
रणभूमि में घूमते हुए सैकड़ों मनुष्यों को कुचल रहे थे — काले लोहे के कवचों से सजे मनुष्यों, घोड़ों, रथों और हाथियों को।
श्लोक 18 (7.32.18)
पतितान्पोथयाञ्चक्रुर्द्विपाः स्थूलनलानिव । गृध्रपत्राधिवासांसि शयनानि नराधिपाः ॥
patitānpothayāñcakrurdvipāḥ sthūlanalāniva | gṛdhrapatrādhivāsāṃsi śayanāni narādhipāḥ
हाथी गिरे हुओं को मोटे नरकटों की भाँति कुचल रहे थे। राजा लोग गिद्ध के पंखों से ढकी शय्याओं पर लेटे थे —
श्लोक 19 (7.32.19)
हीमन्तः कालसम्पर्कात्सुदुःखान्यनुशेरते । हन्ति स्मात्र पिता पुत्रं रथेनाभ्येत्य संयुगे ॥
hīmantaḥ kālasamparkātsuduḥkhānyanuśerate | hanti smātra pitā putraṃ rathenābhyetya saṃyuge
वे मर्यादाशील पुरुष काल के संस्पर्श से अत्यन्त कष्टदायक शय्याओं पर सोए पड़े थे। वहाँ युद्ध में पिता रथ से पास आकर पुत्र को मार रहा था,
श्लोक 20 (7.32.20)
पुत्रश्च पितरं मोहान्निर्मर्यादमवर्तत । रथो भग्नो ध्वजश्छिन्नश्छत्रमुर्व्यां निपातितम् ॥
putraśca pitaraṃ mohānnirmaryādamavartata | ratho bhagno dhvajaśchinnaśchatramurvyāṃ nipātitam
और पुत्र मोह में पड़कर पिता को मार रहा था — सब मर्यादाएँ टूट गई थीं। कहीं रथ टूटा पड़ा था, ध्वज कट गया था, छत्र धरती पर गिरा था;
श्लोक 21 (7.32.21)
युगार्धं च्छिन्नमादाय प्रदुद्राव तथा हयः । सासिर्बाहुर्निपतितः शिरश्छिन्नं सकुण्डलम् ॥
yugārdhaṃ cchinnamādāya pradudrāva tathā hayaḥ | sāsirbāhurnipatitaḥ śiraśchinnaṃ sakuṇḍalam
कटे हुए आधे जुए को घसीटता हुआ घोड़ा भाग रहा था; तलवार-सहित एक भुजा गिरी पड़ी थी और कुण्डल-सहित कटा हुआ सिर पड़ा था।
श्लोक 22 (7.32.22)
गजेनाक्षिप्य बलिना रथः सञ्चूर्णितः क्षितौ । रथिना ताडितो नागो नाराचेनापतत्क्षितौ ॥
gajenākṣipya balinā rathaḥ sañcūrṇitaḥ kṣitau | rathinā tāḍito nāgo nārācenāpatatkṣitau
बलवान हाथी द्वारा पटककर धरती पर चूर-चूर कर दिया गया रथ पड़ा था; रथी के नाराच-बाण से मारा गया हाथी धरती पर गिर पड़ा,
श्लोक 23 (7.32.23)
सारोहश्चापतद्वाजी गजेनाभ्याहतो भृशम् । निर्मर्यादं महद्युद्धमवर्तत सुदारुणम् ॥
sārohaścāpatadvājī gajenābhyāhato bhṛśam | nirmaryādaṃ mahadyuddhamavartata sudāruṇam
और सवार-सहित एक घोड़ा हाथी की भयंकर मार से गिर पड़ा। वह महायुद्ध सब मर्यादाओं को लाँघकर अत्यन्त भयानक रूप से चलता रहा।
श्लोक 24 (7.32.24)
हा तात हा पुत्र सखे क्वासि तिष्ठ क्व धावसि । प्रहराहर जह्येनं स्मितश्वेडितगर्जितैः । इत्येवमुच्चैरत्यर्थं श्रूयन्ते विविधा गिरः ॥
hā tāta hā putra sakhe kvāsi tiṣṭha kva dhāvasi | praharāhara jahyenaṃ smitaśveḍitagarjitaiḥ | ityevamuccairatyarthaṃ śrūyante vividhā giraḥ
"हाय पिता! हाय पुत्र! मित्र, तुम कहाँ हो? ठहरो, कहाँ भागे जा रहे हो? मारो! पकड़ो! इसे मार डालो!" — मुस्कानों, ललकारों और गर्जनाओं के बीच ऐसी अनेक पुकारें ऊँचे स्वर में अविराम सुनाई दे रही थीं।
श्लोक 25 (7.32.25)
नरस्याश्वस्य नागस्य समसञ्जत शोणितम् । उपाशाम्यद्रजो भौमं भीरून्कश्मलमाविशत् ॥
narasyāśvasya nāgasya samasañjata śoṇitam | upāśāmyadrajo bhaumaṃ bhīrūnkaśmalamāviśat
मनुष्यों, घोड़ों और हाथियों का रक्त जम-सा गया; धरती की धूल शान्त हो गई और डरपोकों पर मूर्च्छा छा गई।
श्लोक 26 (7.32.26)
चक्रेण चक्रमासाद्य वीरो वीरस्य संयुगे । अतीतेषुपथे काले जहार गदया शिरः ॥
cakreṇa cakramāsādya vīro vīrasya saṃyuge | atīteṣupathe kāle jahāra gadayā śiraḥ
रण में एक वीर ने दूसरे वीर के रथ से अपना रथ भिड़ाकर, जब बाणों की पहुँच का अवसर निकल चुका था, गदा से उसका सिर उड़ा दिया।
श्लोक 27 (7.32.27)
आसीत्केशपरामर्शो मुष्टियुद्धं च दारुणम् । नखैर्दन्तैश्च शूराणामद्वीपे द्वीपमिच्छताम् ॥
āsītkeśaparāmarśo muṣṭiyuddhaṃ ca dāruṇam | nakhairdantaiśca śūrāṇāmadvīpe dvīpamicchatām
बाल पकड़कर खींचना और भयानक मुक्कामुक्की होने लगी; जहाँ कोई द्वीप नहीं था, वहाँ द्वीप ढूँढ़ने वाले शूर नाखूनों और दाँतों से लड़ रहे थे।
श्लोक 28 (7.32.28)
तत्राच्छिद्यत शूरस्य सखड्गो बाहुरुद्यतः । सधनुश्चापरस्यापि सशरः साङ्कुशस्तथा ॥
tatrācchidyata śūrasya sakhaḍgo bāhurudyataḥ | sadhanuścāparasyāpi saśaraḥ sāṅkuśastathā
वहाँ एक शूर की उठी हुई भुजा तलवार-सहित कट गई; दूसरे की भी भुजा धनुष, बाण और अंकुश-सहित कट गई।
श्लोक 29 (7.32.29)
आक्रोशदन्यमन्योऽत्र तथाऽन्यो विमुखोऽद्रवत् । अन्यः प्राप्तस्य चान्यस्य शिरः कायादपाहरत् ॥
ākrośadanyamanyo'tra tathā'nyo vimukho'dravat | anyaḥ prāptasya cānyasya śiraḥ kāyādapāharat
एक ने दूसरे को पुकारा; कोई मुँह फेरकर भाग गया; और किसी ने पास आए हुए एक दूसरे का सिर धड़ से काट लिया।
श्लोक 30 (7.32.30)
सशब्दमद्रवच्चान्यः शब्दादन्योऽत्रसद्भृशम् । स्वानन्योऽथ परानन्यो जघान निशितैः शरैः ॥
saśabdamadravaccānyaḥ śabdādanyo'trasadbhṛśam | svānanyo'tha parānanyo jaghāna niśitaiḥ śaraiḥ
कोई चिल्लाता हुआ भागा; किसी दूसरे को शोर से बड़ा भय हुआ; कोई अपनों को और कोई शत्रुओं को पैने बाणों से मारता रहा।
श्लोक 31 (7.32.31)
गिरिशृङ्गोपमश्चात्र नाराचेन निपातितः । मातङ्गो न्यपतद्भूमौ नदीरोध इवोष्णगे ॥
giriśṛṅgopamaścātra nārācena nipātitaḥ | mātaṅgo nyapatadbhūmau nadīrodha ivoṣṇage
पर्वत-शिखर जैसा विशाल हाथी नाराच-बाण से गिराया जाकर धरती पर इस प्रकार ढह पड़ा, जैसे ग्रीष्म में नदी का कगार ढह जाता है।
श्लोक 32 (7.32.32)
तथैव रथिनं नागः क्षरन्गिरिरिवारुजन् । अभ्यतिष्ठत्पदा भूमौ सहाश्वं सहसारथिम् ॥
tathaiva rathinaṃ nāgaḥ kṣarangiririvārujan | abhyatiṣṭhatpadā bhūmau sahāśvaṃ sahasārathim
इसी प्रकार मद बहाता, पर्वत की भाँति सब कुछ कुचलता हुआ एक हाथी रथी को घोड़ों और सारथि-सहित पैरों से धरती पर रौंदने लगा।
श्लोक 33 (7.32.33)
शूरान्प्रहरतो दृष्ट्वा कृतास्त्रान्रुधिरोक्षितान् । बहूनप्याविशन्मोहो भीरून्हृदयदुर्बलान् ॥
śūrānpraharato dṛṣṭvā kṛtāstrānrudhirokṣitān | bahūnapyāviśanmoho bhīrūnhṛdayadurbalān
अस्त्रविद्या में निपुण, रक्त से लथपथ शूरों को प्रहार करते देखकर बहुत-से डरपोक और दुर्बल हृदय वालों पर मोह छा गया।
श्लोक 34 (7.32.34)
सर्वमाविग्नमभवन्न प्राज्ञायत किञ्चन । सैन्येन रजसा ध्वस्तं निर्मर्यादमवर्तत ॥
sarvamāvignamabhavanna prājñāyata kiñcana | sainyena rajasā dhvastaṃ nirmaryādamavartata
सब कुछ व्याकुल हो उठा और कुछ भी पहचाना नहीं जा रहा था। सेना की उड़ाई धूल से ढका सब कुछ मर्यादा लाँघकर चलने लगा।
श्लोक 35 (7.32.35)
ततः सेनापतिः शीघ्रमयं काल इति ब्रुवन् । नित्याभित्वरितानेव त्वरयामास पाण्डवान् ॥
tataḥ senāpatiḥ śīghramayaṃ kāla iti bruvan | nityābhitvaritāneva tvarayāmāsa pāṇḍavān
तब सेनापति ने शीघ्रता से "यही समय है!" कहते हुए उन पाण्डवों को, जो सदा ही उतावले रहते थे, और भी प्रेरित किया।
श्लोक 36 (7.32.36)
कुर्वन्तः शासनं तस्य पाण्डवा बाहुशालिनः । सरो हंसा इवापेतुर्घ्नन्तो द्रोणरथं प्रति ॥
kurvantaḥ śāsanaṃ tasya pāṇḍavā bāhuśālinaḥ | saro haṃsā ivāpeturghnanto droṇarathaṃ prati
उसकी आज्ञा मानते हुए भुजबल से सम्पन्न पाण्डव सरोवर पर उतरते हंसों की भाँति प्रहार करते हुए द्रोण के रथ की ओर टूट पड़े।
श्लोक 37 (7.32.37)
गृह्णीताद्रवतान्योन्यं विभीता विनिकृन्तत । इत्यासीत्तुमुलः शब्दो दुर्धर्षस्य रथं प्रति ॥
gṛhṇītādravatānyonyaṃ vibhītā vinikṛntata | ityāsīttumulaḥ śabdo durdharṣasya rathaṃ prati
"पकड़ो! एक-दूसरे पर टूट पड़ो! निर्भय होकर काट डालो!" — दुर्धर्ष द्रोण के रथ के चारों ओर ऐसा भीषण कोलाहल हो रहा था।
श्लोक 38 (7.32.38)
ततो द्रोणः कृपः कर्णो द्रौणी राजा जयद्रथः । विन्दानुविन्दावावन्त्यौ शल्यश्चैतान्न्यवारयन् ॥
tato droṇaḥ kṛpaḥ karṇo drauṇī rājā jayadrathaḥ | vindānuvindāvāvantyau śalyaścaitānnyavārayan
तब द्रोण, कृप, कर्ण, द्रोणपुत्र अश्वत्थामा, राजा जयद्रथ, अवन्ती के दोनों राजा विन्द और अनुविन्द तथा शल्य ने उन्हें रोका।
श्लोक 39 (7.32.39)
ते त्वार्यधर्मसंरब्धा दुर्निवारा दुरासदाः । शरार्ता न जहुर्द्रोणं पाञ्चालाः पाण्डवैः सह ॥
te tvāryadharmasaṃrabdhā durnivārā durāsadāḥ | śarārtā na jahurdroṇaṃ pāñcālāḥ pāṇḍavaiḥ saha
परन्तु आर्य-धर्म से उत्तेजित, दुर्निवार और दुर्धर्ष पाञ्चालों ने पाण्डवों के साथ बाणों से पीड़ित होते हुए भी द्रोण का पीछा नहीं छोड़ा।
श्लोक 40 (7.32.40)
ततो द्रोणोऽतिसंक्रुद्धो विसृजञ्शतशः शरान् । चेदिपाञ्चालपाण्डूनामकरोत्कदनं महत् ॥
tato droṇo'tisaṃkruddho visṛjañśataśaḥ śarān | cedipāñcālapāṇḍūnāmakarotkadanaṃ mahat
तब अत्यन्त क्रुद्ध द्रोण ने सैकड़ों बाण छोड़ते हुए चेदियों, पाञ्चालों और पाण्डवों का भारी संहार किया।
श्लोक 41 (7.32.41)
तस्य ज्यातलनिर्घोषः शुश्रुवे दिक्षु मारिष । वज्रसंह्रादसङ्काशस्त्रासयन्मानवान्बहून् ॥
tasya jyātalanirghoṣaḥ śuśruve dikṣu māriṣa | vajrasaṃhrādasaṅkāśastrāsayanmānavānbahūn
हे मारिष, उसकी प्रत्यंचा और हथेली की आवाज़ सब दिशाओं में वज्र के गर्जन के समान सुनाई दी, जो बहुत-से लोगों को डरा रही थी।
श्लोक 42 (7.32.42)
एतस्मिन्नन्तरे जिष्णुर्जित्वा संशप्तकान्बहून् । अभ्ययात्तत्र यत्रासौ द्रोणः पाण्डून्प्रमर्दति ॥
etasminnantare jiṣṇurjitvā saṃśaptakānbahūn | abhyayāttatra yatrāsau droṇaḥ pāṇḍūnpramardati
इसी बीच बहुत-से संशप्तकों को जीतकर जिष्णु अर्जुन वहाँ पहुँचे, जहाँ द्रोण पाण्डवों को कुचल रहे थे।
श्लोक 43 (7.32.43)
ताञ्शरौघान्महावर्ताञ्शोणितोदान्महाहदान् । तीर्णः संशप्तकान्हत्वा प्रत्यदृश्यत फल्गुनः ॥
tāñśaraughānmahāvartāñśoṇitodānmahāhadān | tīrṇaḥ saṃśaptakānhatvā pratyadṛśyata phalgunaḥ
संशप्तकों को मारकर, बाणों के उन उमड़ते प्रवाहों को, जिनमें बड़े भँवर थे और जो रक्त के जल से भरी विशाल झीलें थीं, पार करके फल्गुन दिखाई दिए।
श्लोक 44 (7.32.44)
तस्य कीर्तिमतो लक्ष्म सूर्यप्रतिमतेजसः । दीप्यमानमपश्याम तेजसा वानरध्वजम् ॥
tasya kīrtimato lakṣma sūryapratimatejasaḥ | dīpyamānamapaśyāma tejasā vānaradhvajam
सूर्य के समान तेजस्वी उन यशस्वी वीर का चिह्न, वानर-ध्वज, हमने अपने तेज से देदीप्यमान होते देखा।
श्लोक 45 (7.32.45)
संशप्तकसमुद्रं तमुच्छोष्यास्त्रगभस्तिभिः । स पाण्डवयुगान्तार्कः कुरूनप्यभ्यतीतपत् ॥
saṃśaptakasamudraṃ tamucchoṣyāstragabhastibhiḥ | sa pāṇḍavayugāntārkaḥ kurūnapyabhyatītapat
अपने अस्त्ररूपी किरणों से संशप्तकों के उस समुद्र को सुखाकर युगान्त के सूर्य के समान वे पाण्डव अब कौरवों को भी तपाने लगे।
श्लोक 46 (7.32.46)
प्रददाह कुरून्सर्वानर्जुनः शस्त्रतेजसा । युगान्ते सर्वभूतानि धूमकेतुरिवोत्थितः ॥
pradadāha kurūnsarvānarjunaḥ śastratejasā | yugānte sarvabhūtāni dhūmaketurivotthitaḥ
अर्जुन ने अपने शस्त्रों के तेज से सब कौरवों को जला डाला, मानो युगान्त में समस्त प्राणियों को जलाने के लिए धूमकेतु उदित हुआ हो।
श्लोक 47 (7.32.47)
तेन बाणसहस्रौधैर्गजाश्वरथयोधिनः । ताड्यमानाः क्षितिं जग्मुर्मुक्तकेशाः शरार्दिताः ॥
tena bāṇasahasraudhairgajāśvarathayodhinaḥ | tāḍyamānāḥ kṣitiṃ jagmurmuktakeśāḥ śarārditāḥ
उनके हज़ारों बाणों की बाढ़ से पीटे जाते हुए हाथी, घोड़े और रथों पर लड़ने वाले योद्धा, बिखरे केशों वाले और बाणों से पीड़ित होकर धरती पर गिर पड़े।
श्लोक 48 (7.32.48)
केचिदार्तस्वनं चक्रुर्विनेशुरपरे पुनः । पार्थबाणहताः केचिन्निपेतुर्विगतासवः ॥
kecidārtasvanaṃ cakrurvineśurapare punaḥ | pārthabāṇahatāḥ kecinnipeturvigatāsavaḥ
कुछ ने आर्तनाद किया, कुछ फिर नष्ट हो गए; कुछ पार्थ के बाणों से मारे जाकर निष्प्राण गिर पड़े।
श्लोक 49 (7.32.49)
तेषामुत्पतितान्कांश्चित्पतितांश्च पराङ्मुखान् । न जघानार्जुनो योधान्योधव्रतमनुस्मरन् ॥
teṣāmutpatitānkāṃścitpatitāṃśca parāṅmukhān | na jaghānārjuno yodhānyodhavratamanusmaran
योद्धा के व्रत का स्मरण करके अर्जुन ने उन योद्धाओं में से कूदकर भागने वालों, गिरे हुओं और पीठ दिखाने वालों को नहीं मारा।
श्लोक 50 (7.32.50)
ते विकीर्णरथाश्चित्राः प्रायशश्च पराङ्मुखाः । कुरवः कर्णकर्णेति हाहेति च विचुक्रुशुः ॥
te vikīrṇarathāścitrāḥ prāyaśaśca parāṅmukhāḥ | kuravaḥ karṇakarṇeti hāheti ca vicukruśuḥ
जिनके रंग-बिरंगे रथ बिखर गए थे और जो प्रायः पीठ फेर चुके थे, वे कौरव "कर्ण! कर्ण!" और "हाय!" कहकर चिल्लाने लगे।
श्लोक 51 (7.32.51)
तमाधिरथिराक्रन्दं विज्ञाय शरणैषिणाम् । मा भैष्टेति प्रतिश्रुत्य ययावभिमुखोऽर्जुनम् ॥
tamādhirathirākrandaṃ vijñāya śaraṇaiṣiṇām | mā bhaiṣṭeti pratiśrutya yayāvabhimukho'rjunam
शरण चाहने वालों की उस पुकार को सुनकर अधिरथपुत्र कर्ण "डरो मत" का वचन देकर अर्जुन के सामने चल पड़ा।
श्लोक 52 (7.32.52)
स भारतरथश्रेष्ठः सर्वभारतहर्षणः । प्रादुश्चक्रे तदाग्नेयमस्त्रमस्त्रविदां वरः ॥
sa bhāratarathaśreṣṭhaḥ sarvabhārataharṣaṇaḥ | prāduścakre tadāgneyamastramastravidāṃ varaḥ
भरतवंशी रथियों में श्रेष्ठ, समस्त भरतों को हर्ष देने वाले, अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ उस कर्ण ने तब आग्नेयास्त्र प्रकट किया।
श्लोक 53 (7.32.53)
तस्य दीप्तशरौघस्य दीप्तचापधरस्य च । वारुणेन तदस्त्रेण विधूयाथ धनञ्जयः । शरौघाञ्शरजालेन विदुधाव धनञ्जयः ॥
tasya dīptaśaraughasya dīptacāpadharasya ca | vāruṇena tadastreṇa vidhūyātha dhanañjayaḥ | śaraughāñśarajālena vidudhāva dhanañjayaḥ
धनञ्जय ने वारुणास्त्र से उस दीप्त धनुषधारी और दीप्त बाण-समूह छोड़ने वाले कर्ण के अस्त्र को निष्फल करके अपने बाणों के जाल से उसके बाण-समूहों को बिखेर दिया।
श्लोक 54 (7.32.54)
तथैवाधिरथिस्तस्य बाणाञ्ज्वलिततेजसः । अस्त्रमस्त्रेण संवार्य प्राणदद्विसृजञ्शरान् ॥
tathaivādhirathistasya bāṇāñjvalitatejasaḥ | astramastreṇa saṃvārya prāṇadadvisṛjañśarān
उसी प्रकार अधिरथपुत्र कर्ण ने भी उनके प्रज्वलित तेज वाले बाणों को अस्त्र से अस्त्र को रोककर निष्फल कर दिया, और अपने बाण छोड़ते हुए गर्जना की।
श्लोक 55 (7.32.55)
धृष्टद्युम्नश्च भीमश्च सात्यकिश्च महारथः । विव्यधुः कर्णमासाद्य त्रिभिस्त्रिभिरजिह्मगैः ॥
dhṛṣṭadyumnaśca bhīmaśca sātyakiśca mahārathaḥ | vivyadhuḥ karṇamāsādya tribhistribhirajihmagaiḥ
धृष्टद्युम्न, भीम और महारथी सात्यकि ने कर्ण के पास पहुँचकर तीन-तीन सीधे जाने वाले बाणों से उसे बेधा।
श्लोक 56 (7.32.56)
अर्जुनास्त्रं तु राधेयः संवार्य शरवृष्टिभिः । तेषां त्रयाणां चापानि चिच्छेद विशिखैस्त्रिभिः ॥
arjunāstraṃ tu rādheyaḥ saṃvārya śaravṛṣṭibhiḥ | teṣāṃ trayāṇāṃ cāpāni ciccheda viśikhaistribhiḥ
राधापुत्र कर्ण ने बाणों की वर्षा से अर्जुन के अस्त्र को रोककर तीन बाणों से उन तीनों के धनुष काट डाले।
श्लोक 57 (7.32.57)
ते निकृत्तायुधाः शूरा निर्विषा भुजगा इव । रथशक्तीः समुत्क्षिप्य भृशं सिंहा इवानदन् ॥
te nikṛttāyudhāḥ śūrā nirviṣā bhujagā iva | rathaśaktīḥ samutkṣipya bhṛśaṃ siṃhā ivānadan
अपने आयुध कट जाने पर वे शूर विषहीन सर्पों की भाँति रथ की शक्तियाँ उठाकर सिंहों के समान जोर से गरजे।
श्लोक 58 (7.32.58)
ता भुजाग्रैर्महावेगा निसृष्टा भुजगोपमाः । दीप्यमाना महाशक्त्यो जग्मुराधिरथिं प्रति ॥
tā bhujāgrairmahāvegā nisṛṣṭā bhujagopamāḥ | dīpyamānā mahāśaktyo jagmurādhirathiṃ prati
उनकी भुजाओं के अग्रभाग से छोड़ी गई, अत्यन्त वेगवान, सर्पों जैसी, दीप्त वे महाशक्तियाँ अधिरथपुत्र की ओर चलीं।
श्लोक 59 (7.32.59)
ता निकृत्य शरव्रातैस्त्रिभिस्त्रिभिरजिह्मगैः । ननाद बलवान्कर्णः पार्थाय विसृजञ्शरान् ॥
tā nikṛtya śaravrātaistribhistribhirajihmagaiḥ | nanāda balavānkarṇaḥ pārthāya visṛjañśarān
तीन-तीन सीधे जाने वाले बाण-समूहों से उन शक्तियों को काटकर बलवान कर्ण ने गर्जना की और पार्थ पर बाण छोड़े।
श्लोक 60 (7.32.60)
अर्जुनश्चापि राधेयं विद्ध्वा सप्तभिराशुगैः । कर्णादवरजं बाणैर्जघान निशितैः शरैः ॥
arjunaścāpi rādheyaṃ viddhvā saptabhirāśugaiḥ | karṇādavarajaṃ bāṇairjaghāna niśitaiḥ śaraiḥ
और अर्जुन ने भी राधापुत्र को सात शीघ्रगामी बाणों से बेधकर पैने बाणों से कर्ण के छोटे भाई को मार डाला।
श्लोक 61 (7.32.61)
ततः शत्रुंजयं हत्वा पार्थः षड्भिरजिह्मगैः । जहार सद्यो भल्लेन विपाटस्य शिरो रथात् ॥
tataḥ śatruṃjayaṃ hatvā pārthaḥ ṣaḍbhirajihmagaiḥ | jahāra sadyo bhallena vipāṭasya śiro rathāt
तब पार्थ ने छह सीधे जाने वाले बाणों से शत्रुंजय को मारकर तुरन्त एक भल्ल से विपाट का सिर रथ से उतार लिया।
श्लोक 62 (7.32.62)
पश्यतां धार्तराष्ट्राणामेकेनैव किरीटिना । प्रमुखे सूतपुत्रस्य सोदर्या निहतास्त्रयः ॥
paśyatāṃ dhārtarāṣṭrāṇāmekenaiva kirīṭinā | pramukhe sūtaputrasya sodaryā nihatāstrayaḥ
धृतराष्ट्र के पुत्रों के देखते-देखते, अकेले किरीटधारी अर्जुन के हाथों सूतपुत्र कर्ण के सामने ही उसके तीन सहोदर भाई मारे गए।
श्लोक 63 (7.32.63)
ततो भीमः समुत्पत्य स्वरथाद्वैनतेयवत् । वरासिना कर्णपक्षाञ्जधान दश पञ्च च ॥
tato bhīmaḥ samutpatya svarathādvainateyavat | varāsinā karṇapakṣāñjadhāna daśa pañca ca
तब भीम वैनतेय (गरुड़) की भाँति अपने रथ से कूदकर उत्तम तलवार से कर्ण के पन्द्रह पक्षधर योद्धाओं को मार गिराया।
श्लोक 64 (7.32.64)
पुनस्तु रथमास्थाय धनुरादाय चापरम् । विव्याध दशभिः कर्णं सूतमश्वांश्च पञ्चभिः ॥
punastu rathamāsthāya dhanurādāya cāparam | vivyādha daśabhiḥ karṇaṃ sūtamaśvāṃśca pañcabhiḥ
फिर रथ पर चढ़कर और दूसरा धनुष लेकर उसने कर्ण को दस बाणों से और उसके सारथि तथा घोड़ों को पाँच बाणों से बेधा।
श्लोक 65 (7.32.65)
धृष्टद्युम्नोऽप्यसिवरं चर्म चादाय भास्वरम् । जघान चन्द्रवर्माणं बृहत्क्षत्रं च नैषधम् ॥
dhṛṣṭadyumno'pyasivaraṃ carma cādāya bhāsvaram | jaghāna candravarmāṇaṃ bṛhatkṣatraṃ ca naiṣadham
धृष्टद्युम्न ने भी श्रेष्ठ तलवार और चमकती ढाल लेकर चन्द्रवर्मा को और निषध-देश के राजा बृहत्क्षत्र को मार डाला।
श्लोक 66 (7.32.66)
ततः स्वरथमास्थाय पाञ्चाल्योऽन्यच्च कार्मुकम् । आदाय कर्णं विव्याध त्रिसप्तत्या नदन्रणे ॥
tataḥ svarathamāsthāya pāñcālyo'nyacca kārmukam | ādāya karṇaṃ vivyādha trisaptatyā nadanraṇe
तब पाञ्चाल-राजकुमार ने अपने रथ पर चढ़कर और दूसरा धनुष लेकर रण में गर्जना करते हुए कर्ण को तिहत्तर बाणों से बेधा।
श्लोक 67 (7.32.67)
शैनेयोऽप्यन्यदादाय धनुरिन्दुसमद्युतिः । सूतपुत्रं चतुःषष्ट्या विद्ध्वा सिंह इवानदत् ॥
śaineyo'pyanyadādāya dhanurindusamadyutiḥ | sūtaputraṃ catuḥṣaṣṭyā viddhvā siṃha ivānadat
शैनेय सात्यकि ने भी चन्द्रमा के समान चमकता दूसरा धनुष लेकर सूतपुत्र को चौंसठ बाणों से बेधा और सिंह की भाँति गरजे।
श्लोक 68 (7.32.68)
भल्लाभ्यां साधु मुक्ताभ्यां छित्त्वा कर्णस्य कार्मुकम् । पुनः कर्णं त्रिभिर्बाणैर्बाह्वोरुरसि चार्पयत् ॥
bhallābhyāṃ sādhu muktābhyāṃ chittvā karṇasya kārmukam | punaḥ karṇaṃ tribhirbāṇairbāhvorurasi cārpayat
भली-भाँति छोड़े गए दो भल्लों से कर्ण का धनुष काटकर उसने फिर तीन बाणों से कर्ण की भुजाओं और छाती को बेधा।
श्लोक 69 (7.32.69)
ततो दुर्योधनो द्रोणो राजा चैव जयद्रथः । निमज्जमानं राधेयमुज्जह्रुः सात्यकार्णवात् ॥
tato duryodhano droṇo rājā caiva jayadrathaḥ | nimajjamānaṃ rādheyamujjahruḥ sātyakārṇavāt
तब दुर्योधन, द्रोण और राजा जयद्रथ ने सात्यकि रूपी समुद्र में डूबते हुए राधापुत्र कर्ण को बाहर निकाल लिया।
श्लोक 70 (7.32.70)
पत्त्यश्वरथमातङ्गास्त्वदीयाः शतशोऽपरे । कर्णमेवाभ्यधावन्त त्रास्यमानाः प्रहारिणः ॥
pattyaśvarathamātaṅgāstvadīyāḥ śataśo'pare | karṇamevābhyadhāvanta trāsyamānāḥ prahāriṇaḥ
आपके और सैकड़ों योद्धा — पैदल, घुड़सवार, रथी और हाथी — भयभीत होकर कर्ण की ही ओर दौड़े।
श्लोक 71 (7.32.71)
धृष्टद्युम्नश्च भीमश्च सौभद्रोऽर्जुन एव च । नकुलः सहदेवश्च सात्यकिं जुगुपू रणे ॥
dhṛṣṭadyumnaśca bhīmaśca saubhadro'rjuna eva ca | nakulaḥ sahadevaśca sātyakiṃ jugupū raṇe
धृष्टद्युम्न, भीम, सुभद्रापुत्र, अर्जुन, नकुल और सहदेव ने रण में सात्यकि की रक्षा की।
श्लोक 72 (7.32.72)
एवमेष महारौद्रः क्षयार्थं सर्वधन्विनाम् । तावकानां परेषां च त्यक्त्वा प्राणानभूद्रणः ॥
evameṣa mahāraudraḥ kṣayārthaṃ sarvadhanvinām | tāvakānāṃ pareṣāṃ ca tyaktvā prāṇānabhūdraṇaḥ
इस प्रकार वह अत्यन्त भयंकर युद्ध आपके और शत्रुओं के सब धनुर्धारियों के संहार के लिए हुआ, जिसमें योद्धाओं ने प्राणों का मोह त्याग दिया था।
श्लोक 73 (7.32.73)
पदातिरथनागाश्वा गजाश्वरथपत्तिभिः । रथिनो नागपत्त्यश्वैरथ पत्तीरथ द्विपैः ॥
padātirathanāgāśvā gajāśvarathapattibhiḥ | rathino nāgapattyaśvairatha pattīratha dvipaiḥ
पैदल, रथ, हाथी और घोड़े हाथियों, घोड़ों, रथों और पैदलों से भिड़ गए; रथी हाथियों, पैदलों और घोड़ों से; और फिर पैदल तथा रथ हाथियों से।
श्लोक 74 (7.32.74)
अश्वैरश्वा गजैर्नागा रथिनो रथिभिः सह । संयुक्ताः समदृश्यन्त पत्तयश्चापि पत्तिभिः ॥
aśvairaśvā gajairnāgā rathino rathibhiḥ saha | saṃyuktāḥ samadṛśyanta pattayaścāpi pattibhiḥ
घोड़े घोड़ों से, हाथी हाथियों से, रथी रथियों से और पैदल पैदलों से गुँथे हुए दिखाई देते थे।
श्लोक 75 (7.32.75)
एवं सुकलिलं युद्धमासीत्क्रव्यादहर्षणम् । महद्भिस्तैरभीतानां यमराष्ट्रविवर्धनम् ॥
evaṃ sukalilaṃ yuddhamāsītkravyādaharṣaṇam | mahadbhistairabhītānāṃ yamarāṣṭravivardhanam
इस प्रकार वह युद्ध घोर उलझन-भरा हो गया, जो मांसभक्षी जीवों को हर्ष देने वाला था और उन निर्भय महावीरों से यमलोक को भरने वाला था।
श्लोक 76 (7.32.76)
ततो हता नररथवाजिकुञ्जरै । रनेकशो द्विपरथपत्तिवाजिनः । गजैर्गजा रथिभिरुदायुधा रथा । हयैर्हयाः पत्तिगणैश्च पत्तयः ॥
tato hatā nararathavājikuñjarai | ranekaśo dviparathapattivājinaḥ | gajairgajā rathibhirudāyudhā rathā | hayairhayāḥ pattigaṇaiśca pattayaḥ
तब मनुष्यों, रथों, घोड़ों और हाथियों के अनेक प्रहारों से हाथी, रथ, पैदल और घोड़े मारे गए: हाथी हाथियों से, उठे हुए शस्त्रों वाले रथ रथियों से, घोड़े घोड़ों से और पैदल पैदलों के दलों से।
श्लोक 77 (7.32.77)
रथैर्द्विपा द्विरदवरैर्महाहया । हयैर्नरा वररथिभिश्च वाजिनः । निरस्तजिह्वादशनेक्षणाः क्षितौ । क्षयं गताः प्रमथितवर्मभूषणाः ॥
rathairdvipā dviradavarairmahāhayā | hayairnarā vararathibhiśca vājinaḥ | nirastajihvādaśanekṣaṇāḥ kṣitau | kṣayaṃ gatāḥ pramathitavarmabhūṣaṇāḥ
हाथी रथों से, बड़े घोड़े श्रेष्ठ हाथियों से, मनुष्य घोड़ों से और घोड़े उत्तम रथियों से मारे गए; जीभ, दाँत और आँखें बाहर निकल आई थीं, और कवच तथा आभूषण कुचले जाकर वे धरती पर नष्ट पड़े थे।
श्लोक 78 (7.32.78)
तथा परैर्बहुकरणैर्वरायुधै- । र्हता गताः प्रतिभयदर्शनाः क्षितिम् । विपोथिता हयगजपादताडिता । भृशाकुला रथमुखनेमिभिः क्षताः ॥
tathā parairbahukaraṇairvarāyudhai- | rhatā gatāḥ pratibhayadarśanāḥ kṣitim | vipothitā hayagajapādatāḍitā | bhṛśākulā rathamukhanemibhiḥ kṣatāḥ
इसी प्रकार अनेक कौशल वाले और उत्तम शस्त्रधारी शत्रुओं से मारे गए दूसरे योद्धा भयानक दिखते हुए धरती पर गिरे; वे कुचले गए, घोड़ों और हाथियों के पैरों से रौंदे गए, अत्यन्त व्याकुल हुए और प्रमुख रथों के पहियों की धारों से कटे।
श्लोक 79 (7.32.79)
प्रमोदने श्वापदपक्षिरक्षसां । जनक्षये वर्तति तत्र दारुणे । महाबलास्ते कुपिताः परस्परं । निषूदयन्तः प्रविचेरुरोजसा ॥
pramodane śvāpadapakṣirakṣasāṃ | janakṣaye vartati tatra dāruṇe | mahābalāste kupitāḥ parasparaṃ | niṣūdayantaḥ pravicerurojasā
जब वह भयंकर जन-संहार, जो हिंस्र पशुओं, पक्षियों और राक्षसों को आनन्द देने वाला था, चल रहा था, तब वे महाबली योद्धा क्रुद्ध होकर एक-दूसरे को मारते हुए पराक्रम से विचरते रहे।
श्लोक 80 (7.32.80)
ततो बले भृशलुलिते परस्परं । निरीक्षमाणे रुधिरौघसम्प्लुते । दिवाकरेऽस्तंगिरिमास्थिते शनै । रुभे प्रयाते शिबिराय भारत ॥
tato bale bhṛśalulite parasparaṃ | nirīkṣamāṇe rudhiraughasamplute | divākare'staṃgirimāsthite śanai | rubhe prayāte śibirāya bhārata
तब सूर्य धीरे-धीरे अस्ताचल पर पहुँचा, और रक्त की धाराओं में डूबी, अत्यन्त क्षुब्ध दोनों सेनाएँ एक-दूसरे को देखती हुई, हे भारत, अपने शिविरों को लौट गईं।