द्रोण पर्व · अध्याय 38
अभिमन्यु द्वारा शल्य के छोटे भाई का वध
धृतराष्ट्र पूछते हैं कि अर्जुन के पुत्र को किसने रोका, और सञ्जय बताते हैं कि शल्य का छोटा भाई अभिमन्यु पर टूट पड़ता है और अभिमन्यु के बाणों से कटकर गिर जाता है। उसके सैनिक एक साथ अभिमन्यु पर दौड़ते हैं, और वह कृष्ण तथा अर्जुन से प्राप्त अस्त्रों से उन्हें उत्तर देता है — पहले कोमलता से, फिर भयंकर बल से — और अन्त में द्रोण के देखते-देखते उनकी रथ-सेना को बाणों से ढक देता है, जिससे सेना विमुख हो जाती है।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (7.38.1)
तथा प्रमथमानं तं महेष्वासानजिह्मगैः । आर्जुनिं मामकाः सङ्ख्ये के त्वेनं समवारयन् ॥
tathā pramathamānaṃ taṃ maheṣvāsānajihmagaiḥ | ārjuniṃ māmakāḥ saṅkhye ke tvenaṃ samavārayan
इस प्रकार सीधे जाने वाले बाणों से महान् धनुर्धरों को रौंदते हुए अर्जुन के उस पुत्र को युद्ध में मेरे पक्ष के कौन-से वीरों ने रोका?
सञ्जय उवाच
श्लोक 2 (7.38.2)
शृणु राजन्कुमारस्य रणे विक्रीडितं महत् । बिभित्सतो रथानीकं भारद्वाजेन रक्षितम् ॥
śṛṇu rājankumārasya raṇe vikrīḍitaṃ mahat | bibhitsato rathānīkaṃ bhāradvājena rakṣitam
हे राजन्, सुनिए — भारद्वाज (द्रोण) से रक्षित रथ-सेना को भेदने की इच्छा करने वाले उस कुमार की युद्ध-क्रीड़ा कैसी महान् थी।
श्लोक 3 (7.38.3)
मद्रेशं सादितं दृष्ट्वा सौभद्रेणाशुगै रणे । शल्यादवरजः क्रुद्धः किरन्बाणान्समभ्ययात् ॥
madreśaṃ sāditaṃ dṛṣṭvā saubhadreṇāśugai raṇe | śalyādavarajaḥ kruddhaḥ kiranbāṇānsamabhyayāt
सुभद्रा-पुत्र के शीघ्रगामी बाणों से मद्रराज शल्य को रणभूमि में गिरा हुआ देखकर शल्य का छोटा भाई क्रोध में भरकर बाण बरसाता हुआ उस पर टूट पड़ा।
श्लोक 4 (7.38.4)
स विद्ध्वा दशभिर्बाणैः साश्वयन्तारमार्जुनिम् । उदक्रोशन्महाशब्दं तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत् ॥
sa viddhvā daśabhirbāṇaiḥ sāśvayantāramārjunim | udakrośanmahāśabdaṃ tiṣṭhatiṣṭheti cābravīt
उसने अर्जुन-पुत्र को घोड़ों और सारथि सहित दस बाणों से बींध दिया, फिर बड़ी गर्जना की और कहा — “ठहर, ठहर!”
श्लोक 5 (7.38.5)
तस्यार्जुनिः शिरोग्रीवं पाणिपादं धनुर्हयान् । छत्रं ध्वजं नियन्तारं त्रिवेणुं चाप्युपस्करम् ॥
tasyārjuniḥ śirogrīvaṃ pāṇipādaṃ dhanurhayān | chatraṃ dhvajaṃ niyantāraṃ triveṇuṃ cāpyupaskaram
उसके सिर और गर्दन, हाथ और पैर, धनुष और घोड़े, छत्र, ध्वज, सारथि, त्रिवेणु (रथ का तिहरा दण्ड) और रथ की सामग्री को,
श्लोक 6 (7.38.6)
चक्रं युगं च तूणीरं ह्यनुकर्षं सायकैः । पताकां चक्रगोप्तारौ सर्वोपकरणानि च ॥
cakraṃ yugaṃ ca tūṇīraṃ hyanukarṣaṃ sāyakaiḥ | patākāṃ cakragoptārau sarvopakaraṇāni ca
पहिया, जुआ, तरकस और अनुकर्ष (धुरी का ढाँचा), पताका, दोनों चक्ररक्षक और रथ की सारी सामग्री — बाणों के द्वारा
श्लोक 7 (7.38.7)
लघुहस्तः प्रचिच्छेद ददृशे तं न कश्चन । स पपात क्षितौ क्षीणः प्रविद्धाभरणाम्बरः ॥
laghuhastaḥ praciccheda dadṛśe taṃ na kaścana | sa papāta kṣitau kṣīṇaḥ praviddhābharaṇāmbaraḥ
इन सबको फुर्तीले हाथों वाले अर्जुन-पुत्र ने काट डाला, और किसी ने उसे ऐसा करते नहीं देखा। तब वह क्षीण होकर, आभूषण और वस्त्र बिखेरे हुए, भूमि पर गिर पड़ा,
श्लोक 8 (7.38.8)
वायुनेव महाचैत्यः समूलं चित्रवेदिकः । अनुगास्तस्य वित्रस्ताः प्राद्रवन्सर्वतो दिशः ॥
vāyuneva mahācaityaḥ samūlaṃ citravedikaḥ | anugāstasya vitrastāḥ prādravansarvato diśaḥ
जैसे वायु के झोंके से जड़ सहित उखड़ा हुआ चित्र-वेदिका वाला विशाल चैत्य-वृक्ष गिर पड़े। उसके अनुयायी भयभीत होकर चारों दिशाओं में भाग गए।
श्लोक 9 (7.38.9)
आर्जुनेः कर्म तद्दृष्ट्वा सम्प्रणेदुः समन्ततः । नादेन सर्वभूतानि साधुसाध्विति भारत ॥
ārjuneḥ karma taddṛṣṭvā sampraṇeduḥ samantataḥ | nādena sarvabhūtāni sādhusādhviti bhārata
अर्जुन-पुत्र का वह कर्म देखकर सब प्राणी चारों ओर “साधु, साधु!” की पुकार से गूँज उठे, हे भारत।
श्लोक 10 (7.38.10)
शल्यभ्रातर्यथारुग्णे बहुशस्तस्य सैनिकाः । कुलाधिवासनामानि श्रावयन्तोऽर्जुनात्मजम् ॥
śalyabhrātaryathārugṇe bahuśastasya sainikāḥ | kulādhivāsanāmāni śrāvayanto'rjunātmajam
शल्य के भाई के इस प्रकार गिर जाने पर उसके बहुत-से सैनिक अर्जुन-पुत्र को अपने कुल, निवास और नाम सुनाते हुए
श्लोक 11 (7.38.11)
अभ्यधावन्त सङ्क्रुद्धा विविधायुधपाणयः । रथैरश्वैर्गजैश्चान्ये पद्भिश्चान्ये बलोत्कटाः ॥
abhyadhāvanta saṅkruddhā vividhāyudhapāṇayaḥ | rathairaśvairgajaiścānye padbhiścānye balotkaṭāḥ
क्रोध से भरकर, हाथों में नाना प्रकार के शस्त्र लिए, उस पर दौड़ पड़े — कोई रथों पर, कोई घोड़ों और हाथियों पर, और कुछ बलोन्मत्त योद्धा पैदल,
श्लोक 12 (7.38.12)
बाणशब्देन महता रथनेमिस्वनेन च । हुंकारैः क्ष्वेडितोत्कृष्टैः सिंहनादैः सगर्जितैः ॥
bāṇaśabdena mahatā rathanemisvanena ca | huṃkāraiḥ kṣveḍitotkṛṣṭaiḥ siṃhanādaiḥ sagarjitaiḥ
बाणों की भारी सनसनाहट और रथ के पहियों की घर्घर के बीच, हुंकारों, किलकारियों, ललकारों, सिंहनादों और गर्जनाओं के साथ,
श्लोक 13 (7.38.13)
ज्यातलत्रस्वनैरन्ये गर्जन्तोऽर्जुननन्दनम् । ब्रुवन्तश्च न नो जीवन्मोक्ष्यसे जीवितादिति ॥
jyātalatrasvanairanye garjanto'rjunanandanam | bruvantaśca na no jīvanmokṣyase jīvitāditi
और दूसरे धनुष की डोरी की टंकार तथा हथेलियों की थाप से गरजते हुए अर्जुन के पुत्र से कह रहे थे — “तू हमारे हाथों से जीवित नहीं बचेगा!”
श्लोक 14 (7.38.14)
तांस्तथा ब्रुवतो दृष्ट्वा सौभद्रः प्रहसन्निव । यो योऽस्मै प्राहरत्पूर्वं तं तं विव्याध पत्रिभिः ॥
tāṃstathā bruvato dṛṣṭvā saubhadraḥ prahasanniva | yo yo'smai prāharatpūrvaṃ taṃ taṃ vivyādha patribhiḥ
उन्हें ऐसा कहते देखकर सुभद्रा-पुत्र ने मानो हँसते हुए, जिस-जिसने पहले उस पर प्रहार किया था, उस-उसको बाणों से बींध दिया।
श्लोक 15 (7.38.15)
सन्दर्शयिष्यन्नस्त्राणि विचित्राणि लघूनि च । आर्जुनिः समरे शूरो मृदुपूर्वमयुध्यत ॥
sandarśayiṣyannastrāṇi vicitrāṇi laghūni ca | ārjuniḥ samare śūro mṛdupūrvamayudhyata
अपने विचित्र और शीघ्रगामी अस्त्र दिखाने की इच्छा से वीर अर्जुन-पुत्र ने युद्ध में पहले कोमलता से लड़ना आरम्भ किया।
श्लोक 16 (7.38.16)
वासुदेवादुपात्तं यदस्त्रं यच्च धनञ्जयात् । अदर्शयत तत्कार्ष्णिः कृष्णाभ्यामविशेषवत् ॥
vāsudevādupāttaṃ yadastraṃ yacca dhanañjayāt | adarśayata tatkārṣṇiḥ kṛṣṇābhyāmaviśeṣavat
वासुदेव से उसने जो अस्त्र पाया था और धनञ्जय (अर्जुन) से जो, उन्हें कार्ष्णि (अभिमन्यु) ने दोनों कृष्णों से अभिन्न की भाँति प्रकट किया।
श्लोक 17 (7.38.17)
दूरमस्य गुरुं भारं साध्वसं च पुनः पुनः । सन्दधद्विसृजंश्चेषून्निर्विशेषमदृश्यत ॥
dūramasya guruṃ bhāraṃ sādhvasaṃ ca punaḥ punaḥ | sandadhadvisṛjaṃśceṣūnnirviśeṣamadṛśyata
भारी बोझ और भय को दूर फेंककर, बार-बार बाणों को चढ़ाते और छोड़ते हुए वह ऐसा दिखाई दिया कि चढ़ाने और छोड़ने में कोई अन्तर नहीं जान पड़ता था।
श्लोक 18 (7.38.18)
चापमण्डलमेवास्य विस्फुरद्दिक्ष्वदृश्यत । सुदीप्तस्य शरत्काले सवितुर्मण्डलं यथा ॥
cāpamaṇḍalamevāsya visphuraddikṣvadṛśyata | sudīptasya śaratkāle saviturmaṇḍalaṃ yathā
दिशाओं में चमकता हुआ उसका धनुष-मण्डल ही दिखाई देता था, मानो शरद् ऋतु में दीप्तिमान सूर्य का मण्डल हो।
श्लोक 19 (7.38.19)
ज्याशब्दः शुश्रुवे तस्य तलशब्दश्च दारुणः । महाशनिमुचः काले पयोदस्येव निःस्वनः ॥
jyāśabdaḥ śuśruve tasya talaśabdaśca dāruṇaḥ | mahāśanimucaḥ kāle payodasyeva niḥsvanaḥ
उसकी प्रत्यंचा की टंकार और हथेली की भयंकर थाप सुनाई देती थी, जैसे समय आने पर महान् वज्र गिराने वाले बादल की गड़गड़ाहट।
श्लोक 20 (7.38.20)
ह्रीमानमर्षी सौभद्रो मानकृत्प्रियदर्शनः । सम्मिमानयिषुर्वीरानिष्वस्त्रैश्चाप्ययुध्यत ॥
hrīmānamarṣī saubhadro mānakṛtpriyadarśanaḥ | sammimānayiṣurvīrāniṣvastraiścāpyayudhyata
लज्जाशील पर असहनशील, सबको मान देने वाला और देखने में प्रिय सुभद्रा-पुत्र वीरों का सम्मान करने की इच्छा से बाणों और अस्त्रों से भी लड़ा।
श्लोक 21 (7.38.21)
मृदुर्भूत्वा महाराज दारुणः समपद्यत । वर्षाभ्यतीतो भगवाञ्शरदीव दिवाकरः ॥
mṛdurbhūtvā mahārāja dāruṇaḥ samapadyata | varṣābhyatīto bhagavāñśaradīva divākaraḥ
हे महाराज, पहले कोमल रहकर वह उग्र हो उठा, जैसे वर्षा बीत जाने पर शरद् ऋतु में भगवान् सूर्य प्रखर हो उठते हैं।
श्लोक 22 (7.38.22)
शरान्विचित्रान्सुबहून्रुक्मपुङ्खाञ्शिलाशितान् । मुमोच शतशः क्रुद्धो गभस्तीनिव भास्करः ॥
śarānvicitrānsubahūnrukmapuṅkhāñśilāśitān | mumoca śataśaḥ kruddho gabhastīniva bhāskaraḥ
क्रोध में आकर उसने सैकड़ों विचित्र, बहुत-से, सोने के पंखों वाले और शिला पर तेज किए हुए बाण छोड़े, जैसे सूर्य अपनी किरणें बिखेरता है।
श्लोक 23 (7.38.23)
क्षुरप्रैर्वत्सदन्तैश्च विपाठैश्च महायशाः । नाराचैरर्धचन्द्राभैर्भल्लैरञ्जलिकैरपि ॥
kṣuraprairvatsadantaiśca vipāṭhaiśca mahāyaśāḥ | nārācairardhacandrābhairbhallairañjalikairapi
क्षुरप्र, वत्सदन्त और विपाठ बाणों से, तथा नाराचों, अर्धचन्द्राकार बाणों, भल्लों और अञ्जलिकों से भी, उस महायशस्वी ने
श्लोक 24 (7.38.24)
अवाकिरद्रथानीकं भारद्वाजस्य पश्यतः । ततस्तत्सैन्यमभवद्विमुखं शरपीडितम् ॥
avākiradrathānīkaṃ bhāradvājasya paśyataḥ | tatastatsainyamabhavadvimukhaṃ śarapīḍitam
भारद्वाज (द्रोण) के देखते-देखते उनकी रथ-सेना को ढक दिया। तब बाणों से पीड़ित वह सेना विमुख हो गई।