Skip to main content

द्रोण पर्व · अध्याय 39

दुःशासन का अभिमन्यु से भिड़ना

शोक और हर्ष के बीच डोलते हुए धृतराष्ट्र सञ्जय से अभिमन्यु के युद्ध का विस्तार से वर्णन करने को कहते हैं। अभिमन्यु के पराक्रम से कौरव सेनाएँ काँप उठती हैं और द्रोण कृपाचार्य से उसकी प्रशंसा करते हैं। इससे चिढ़कर दुर्योधन अपने वीरों को उस बालक को मार डालने के लिए उकसाता है; दुःशासन राहु के सूर्य को निगलने की भाँति उसे निगल जाने की प्रतिज्ञा करके उस पर चढ़ आता है, और दोनों नगाड़ों और शंखों की गूँज के बीच रथ-कौशल का घोर द्वन्द्व करते हैं।

अध्याय 38अध्याय-सूचीअध्याय 40

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 1 (7.39.1)

द्वैधीभवति मे चित्तं शुचा तुष्ट्या च सञ्जय । मम पुत्रस्य यत्सैन्यं सौभद्रः समवारयत् ॥

dvaidhībhavati me cittaṃ śucā tuṣṭyā ca sañjaya | mama putrasya yatsainyaṃ saubhadraḥ samavārayat

सञ्जय, शोक और हर्ष के बीच मेरा मन दो ओर खिंच रहा है, क्योंकि सुभद्रा-पुत्र ने मेरे पुत्र की सेना को रोक दिया।

श्लोक 2 (7.39.2)

विस्तरेणैव मे शंस सर्वं गावल्गणे पुनः । विक्रीडितं कुमारस्य स्कन्दस्येवासुरैः सह ॥

vistareṇaiva me śaṃsa sarvaṃ gāvalgaṇe punaḥ | vikrīḍitaṃ kumārasya skandasyevāsuraiḥ saha

हे गावल्गणि, असुरों के बीच स्कन्द की क्रीड़ा के समान उस कुमार की युद्ध-लीला मुझे फिर विस्तार से सब बताओ।

सञ्जय उवाच

श्लोक 3 (7.39.3)

हन्त ते सम्प्रवक्ष्यामि विमर्दमतिदारुणम् । एकस्य च बहूनां च यथासीत्तुमुलो रणः ॥

hanta te sampravakṣyāmi vimardamatidāruṇam | ekasya ca bahūnāṃ ca yathāsīttumulo raṇaḥ

अच्छा, मैं आपको उस अत्यन्त भयंकर संघर्ष का वर्णन सुनाता हूँ — कैसे एक और अनेक के बीच घोर युद्ध हुआ।

श्लोक 4 (7.39.4)

अभिमन्युः कृतोत्साहः कृतोत्साहानरिन्दमान् । रथस्थो रथिनः सर्वांस्तावकानभ्यवर्षयत् ॥

abhimanyuḥ kṛtotsāhaḥ kṛtotsāhānarindamān | rathastho rathinaḥ sarvāṃstāvakānabhyavarṣayat

उत्साह से भरे अभिमन्यु ने रथ पर खड़े होकर, उत्साह से भरे और शत्रुओं का दमन करने वाले आपके सब रथियों पर बाणों की वर्षा कर दी।

श्लोक 5 (7.39.5)

द्रोणं कर्णं कृपं शल्यं द्रौणिं भोजं बृहद्बलम् । दुर्योधनं सौमदत्तिं शकुनिं च महाबलम् ॥

droṇaṃ karṇaṃ kṛpaṃ śalyaṃ drauṇiṃ bhojaṃ bṛhadbalam | duryodhanaṃ saumadattiṃ śakuniṃ ca mahābalam

द्रोण, कर्ण, कृप, शल्य, द्रोणपुत्र (अश्वत्थामा), भोज, बृहद्बल, दुर्योधन, सोमदत्त के पुत्र और महाबली शकुनि —

श्लोक 6 (7.39.6)

नानानृपान्नृपसुतान्सैन्यानि विविधानि च । अलातचक्रवत्सर्वांश्चरन्बाणैः समार्पयत् ॥

nānānṛpānnṛpasutānsainyāni vividhāni ca | alātacakravatsarvāṃścaranbāṇaiḥ samārpayat

तथा नाना राजाओं, राजकुमारों और विविध सेनाओं को — इन सबको वह जलते कुन्दे के घूमते चक्र की तरह चारों ओर घूमता हुआ बाणों से बींधता गया।

श्लोक 7 (7.39.7)

निघ्नन्नमित्रान्सौभद्रः परमास्त्रैः प्रतापवान् । अदर्शयत तेजस्वी दिक्षु सर्वासु भारत ॥

nighnannamitrānsaubhadraḥ paramāstraiḥ pratāpavān | adarśayata tejasvī dikṣu sarvāsu bhārata

श्रेष्ठ अस्त्रों से शत्रुओं को मारता हुआ तेजस्वी और प्रतापी सुभद्रा-पुत्र सभी दिशाओं में अपना पराक्रम दिखाने लगा, हे भारत।

श्लोक 8 (7.39.8)

तद्दृष्ट्वा चरितं तस्य सौभद्रस्यामितौजसः । समकम्पन्त सैन्यानि त्वदीयानि सहस्रशः ॥

taddṛṣṭvā caritaṃ tasya saubhadrasyāmitaujasaḥ | samakampanta sainyāni tvadīyāni sahasraśaḥ

अपार तेज वाले उस सुभद्रा-पुत्र का यह कर्म देखकर आपकी सहस्रों सेनाएँ काँप उठीं।

श्लोक 9 (7.39.9)

अथाब्रवीन्महाप्राज्ञो भारद्वाजः प्रतापवान् । हर्षेणोत्फुल्लनयनः कृपमाभाष्य सत्वरम् ॥

athābravīnmahāprājño bhāradvājaḥ pratāpavān | harṣeṇotphullanayanaḥ kṛpamābhāṣya satvaram

तब बुद्धिमान् और प्रतापी भारद्वाज-पुत्र (द्रोण) ने हर्ष से खिले नेत्रों से कृप को सम्बोधित करके शीघ्रता से कहा —

श्लोक 10 (7.39.10)

घटयन्निव मर्माणि पुत्रस्य तव भारत । अभिमन्युं रणे दृष्ट्वा तदा रणविशारदम् ॥

ghaṭayanniva marmāṇi putrasya tava bhārata | abhimanyuṃ raṇe dṛṣṭvā tadā raṇaviśāradam

हे भारत, युद्ध में कुशल अभिमन्यु को रणभूमि में देखकर वे मानो आपके पुत्र के मर्मस्थलों को छेड़ते हुए बोले —

द्रोण उवाच

श्लोक 11 (7.39.11)

एष गच्छति सौभद्रः पार्थानां प्रथितो युवा । नन्दयन्सुहृदः सर्वान्राजानं च युधिष्ठिरम् ॥

eṣa gacchati saubhadraḥ pārthānāṃ prathito yuvā | nandayansuhṛdaḥ sarvānrājānaṃ ca yudhiṣṭhiram

वह जा रहा है पार्थों का प्रसिद्ध युवा वीर सुभद्रा-पुत्र, अपने सब सुहृदों और राजा युधिष्ठिर को आनन्दित करता हुआ,

श्लोक 12 (7.39.12)

नकुलं सहदेवं च भीमसेनं च पाण्डवम् । बन्धून्सम्बन्धिनश्चान्यान्मध्यस्थान्सुहृदस्तथा ॥

nakulaṃ sahadevaṃ ca bhīmasenaṃ ca pāṇḍavam | bandhūnsambandhinaścānyānmadhyasthānsuhṛdastathā

तथा नकुल, सहदेव और पाण्डव भीमसेन को, और अपने बन्धुओं, सम्बन्धियों, मध्यस्थों तथा सुहृदों को भी।

श्लोक 13 (7.39.13)

नास्य युद्धे समं मन्ये कञ्चिदन्यं धनुर्धरम् । इच्छन्हन्यादिमां सेनां किमर्थमपि नेच्छति ॥

nāsya yuddhe samaṃ manye kañcidanyaṃ dhanurdharam | icchanhanyādimāṃ senāṃ kimarthamapi necchati

युद्ध में मैं किसी दूसरे धनुर्धर को इसके बराबर नहीं मानता। चाहे तो वह इस सेना को नष्ट कर दे; किस कारण से वह ऐसा नहीं चाहता, यह मैं नहीं जानता।

सञ्जय उवाच

श्लोक 14 (7.39.14)

द्रोणस्य प्रीतिसंयुक्तं श्रुत्वा वाक्यं तवात्मजः । आर्जुनिं प्रति सङ्क्रुद्धो द्रोणं दृष्ट्वा स्मयन्निव ॥

droṇasya prītisaṃyuktaṃ śrutvā vākyaṃ tavātmajaḥ | ārjuniṃ prati saṅkruddho droṇaṃ dṛṣṭvā smayanniva

द्रोण के प्रेम से भरे वचन सुनकर आपका पुत्र अर्जुन-पुत्र के प्रति क्रोध से भर गया और द्रोण की ओर मानो हँसते हुए देखकर,

श्लोक 15 (7.39.15)

अथ दुर्योधनः कर्णमब्रवीद्बाह्लिकं नृपः । दुःशासनं मद्रराजं तांस्तथाऽन्यान्महारथान् ॥

atha duryodhanaḥ karṇamabravīdbāhlikaṃ nṛpaḥ | duḥśāsanaṃ madrarājaṃ tāṃstathā'nyānmahārathān

राजा दुर्योधन ने कर्ण, बाह्लीक, दुःशासन, मद्रराज और उन अन्य महारथियों से कहा।

दुर्योधन उवाच

श्लोक 16 (7.39.16)

सर्वभूर्धाभिषिक्तानामाचार्यो ब्रह्मवित्तमः । अर्जुनस्य सुतं मूढं नायं हन्तुमिहेच्छति ॥

sarvabhūrdhābhiṣiktānāmācāryo brahmavittamaḥ | arjunasya sutaṃ mūḍhaṃ nāyaṃ hantumihecchati

ये सब मूर्धाभिषिक्त राजाओं के आचार्य और ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ हैं; अर्जुन के इस मूर्ख पुत्र को ये मारना नहीं चाहते।

श्लोक 17 (7.39.17)

न ह्यस्य समरे युद्ध्येदन्तकोऽप्याततायिनः । किमङ्ग पुनरेवान्यो मर्त्यः सत्यं ब्रवीमि वः ॥

na hyasya samare yuddhyedantako'pyātatāyinaḥ | kimaṅga punarevānyo martyaḥ satyaṃ bravīmi vaḥ

आक्रमण करते हुए इनके सामने युद्ध में तो यमराज भी नहीं टिक सकता; फिर किसी दूसरे मनुष्य की क्या बात! मैं तुमसे सत्य कहता हूँ।

श्लोक 18 (7.39.18)

अर्जुनस्य सुतं त्वेष शिष्यत्वादभिरक्षति । शिष्याः पुत्राश्च दयितास्तदपत्यं च धर्मिणाम् ॥

arjunasya sutaṃ tveṣa śiṣyatvādabhirakṣati | śiṣyāḥ putrāśca dayitāstadapatyaṃ ca dharmiṇām

वे अर्जुन के पुत्र की रक्षा इसलिए करते हैं कि अर्जुन उनका शिष्य था; धर्मात्माओं को शिष्य और पुत्र प्यारे होते हैं, और उनकी सन्तान भी।

श्लोक 19 (7.39.19)

संरक्ष्यमाणो द्रोणेन मन्यते वीर्यमात्मनः । आत्मसम्भावितो मूढस्तं प्रमथ्नीत माचिरम् ॥

saṃrakṣyamāṇo droṇena manyate vīryamātmanaḥ | ātmasambhāvito mūḍhastaṃ pramathnīta māciram

द्रोण से रक्षित होकर वह मूर्ख अपने ही बल को बड़ा मान रहा है; अपने बारे में ऊँची धारणा रखने वाले उस मूढ़ को तुरन्त कुचल दो।

सञ्जय उवाच

श्लोक 20 (7.39.20)

एवमुक्तास्तु ते राज्ञा सात्वतीपुत्रमभ्ययुः । संरब्धास्ते जिघांसन्तो भारद्वाजस्य पश्यतः ॥

evamuktāstu te rājñā sātvatīputramabhyayuḥ | saṃrabdhāste jighāṃsanto bhāradvājasya paśyataḥ

राजा के ऐसा कहने पर वे सात्वती के पुत्र (अभिमन्यु) पर टूट पड़े — क्रोध में भरकर, उसे मार डालने की इच्छा से, भारद्वाज के देखते-देखते।

श्लोक 21 (7.39.21)

दुःशासनस्तु तच्छ्रुत्वा दुर्योधनवचस्तदा । अब्रवीत्कुरुशार्दूल दुर्योधनमिदं वचः ॥

duḥśāsanastu tacchrutvā duryodhanavacastadā | abravītkuruśārdūla duryodhanamidaṃ vacaḥ

दुर्योधन का यह वचन सुनकर, हे कुरुश्रेष्ठ, दुःशासन ने तब दुर्योधन से यह कहा —

दुःशासन उवाच

श्लोक 22 (7.39.22)

अहमेनं हनिष्यामि महाराज ब्रवीमि ते । मिषतां पाण्डुपुत्राणां पाञ्चालानां च पश्यताम् ॥

ahamenaṃ haniṣyāmi mahārāja bravīmi te | miṣatāṃ pāṇḍuputrāṇāṃ pāñcālānāṃ ca paśyatām

महाराज, मैं आपसे कहता हूँ, पाण्डवों और पाञ्चालों के देखते-देखते मैं इसे मार डालूँगा।

सञ्जय उवाच

श्लोक 23 (7.39.23)

ग्रसिष्याम्यद्य सौभद्रं यथा राहुर्दिवाकरम् । उत्क्रुश्य चाब्रवीद्वाक्यं कुरुराजमिदं पुनः ॥

grasiṣyāmyadya saubhadraṃ yathā rāhurdivākaram | utkruśya cābravīdvākyaṃ kururājamidaṃ punaḥ

“आज मैं सुभद्रा-पुत्र को वैसे ही निगल जाऊँगा जैसे राहु सूर्य को निगलता है।” यह चिल्लाकर उसने कुरुराज से फिर यह वचन कहा —

दुःशासन उवाच

श्लोक 24 (7.39.24)

श्रुत्वा कृष्णौ मया ग्रस्तं सौभद्रमतिमानिनौ । गमिष्यतः प्रेतलोकं जीवलोकान्न संशयः ॥

śrutvā kṛṣṇau mayā grastaṃ saubhadramatimāninau | gamiṣyataḥ pretalokaṃ jīvalokānna saṃśayaḥ

“अत्यन्त अभिमानी दोनों कृष्ण यह सुनकर कि मैंने सुभद्रा-पुत्र को निगल लिया है, निःसन्देह जीवलोक से प्रेतलोक को चले जाएँगे।

श्लोक 25 (7.39.25)

तौ च श्रुत्वा मृतौ व्यक्तं पाण्डोः क्षेत्रोद्भवाः सुताः । एकाह्वा ससुहृद्वर्गाः क्लैब्याद्धास्यन्ति जीवितम् ॥

tau ca śrutvā mṛtau vyaktaṃ pāṇḍoḥ kṣetrodbhavāḥ sutāḥ | ekāhvā sasuhṛdvargāḥ klaibyāddhāsyanti jīvitam

और उन दोनों को मरा सुनकर पाण्डु के क्षेत्र से उत्पन्न हुए पुत्र निश्चय ही दुर्बलता के कारण अपने सुहृदों-सहित एक ही दिन में प्राण त्याग देंगे।

श्लोक 26 (7.39.26)

तस्मादस्मिन्हते शत्रौ हताः सर्वेऽहितास्तव । शिवेन मां ध्याहि राजन्नेष हन्मि रिपूंस्तव ॥

tasmādasminhate śatrau hatāḥ sarve'hitāstava | śivena māṃ dhyāhi rājanneṣa hanmi ripūṃstava

इसलिए इस एक शत्रु के मारे जाने पर आपके सभी शत्रु मारे जाएँगे। हे राजन्, शुभ कामना से मेरा ध्यान कीजिए; मैं आपके शत्रुओं को मारने जा रहा हूँ।”

सञ्जय उवाच

श्लोक 27 (7.39.27)

एवमुक्त्वाऽनदद्राजन्पुत्रो दुःशासनस्तव । सौभद्रमभ्ययात्क्रुद्धः शरवर्षैरवाकिरन् ॥

evamuktvā'nadadrājanputro duḥśāsanastava | saubhadramabhyayātkruddhaḥ śaravarṣairavākiran

हे राजन्, ऐसा कहकर आपका पुत्र दुःशासन गरजा और क्रोध में भरकर बाणों की वर्षा से ढकता हुआ सुभद्रा-पुत्र पर चढ़ आया।

श्लोक 28 (7.39.28)

तमतिक्रुद्धमायान्तं तव पुत्रमरिंदमः । अभिमन्युः शरैस्तीक्ष्णैः षड्विंशत्या समार्पयत् ॥

tamatikruddhamāyāntaṃ tava putramariṃdamaḥ | abhimanyuḥ śaraistīkṣṇaiḥ ṣaḍviṃśatyā samārpayat

अत्यन्त क्रुद्ध होकर आते हुए आपके उस पुत्र को शत्रुदमन अभिमन्यु ने छब्बीस तीखे बाणों से बींध दिया।

श्लोक 29 (7.39.29)

दुःशासनस्तु सङ्क्रुद्धः प्रभिन्न इव कुञ्जरः । अयोधयत सौभद्रमभिमन्युश्च तं रणे ॥

duḥśāsanastu saṅkruddhaḥ prabhinna iva kuñjaraḥ | ayodhayata saubhadramabhimanyuśca taṃ raṇe

मदमत्त हाथी के समान क्रुद्ध दुःशासन सुभद्रा-पुत्र से लड़ने लगा, और अभिमन्यु भी रणभूमि में उससे लड़ा।

श्लोक 30 (7.39.30)

तौ मण्डलानि चित्राणि रथाभ्यां सव्यदक्षिणम् । चरमाणावयुध्येतां रथशिक्षाविशारदौ ॥

tau maṇḍalāni citrāṇi rathābhyāṃ savyadakṣiṇam | caramāṇāvayudhyetāṃ rathaśikṣāviśāradau

रथ-संचालन की कला में निपुण वे दोनों अपने रथों को बाएँ-दाएँ विचित्र मण्डलों में घुमाते हुए लड़ते रहे।

श्लोक 31 (7.39.31)

अथ पणवमृदङ्गदुन्दुभीनां । क्रकचमहानकभेरिझर्झराणाम् । निनदमतिभृशं नराः प्रचक्रु- । र्लवणजलोद्भवसिंहनादमिश्रम् ॥

atha paṇavamṛdaṅgadundubhīnāṃ | krakacamahānakabherijharjharāṇām | ninadamatibhṛśaṃ narāḥ pracakru- | rlavaṇajalodbhavasiṃhanādamiśram

तब योद्धाओं ने पणव, मृदंग, दुन्दुभि, क्रकच, महान् आनक, भेरी और झर्झर की अत्यन्त भीषण ध्वनि की, जिसमें सिंहनाद और समुद्र से उत्पन्न शंखों की गूँज मिली हुई थी।

अध्याय 38अध्याय-सूचीअध्याय 40