Skip to main content

द्रोण पर्व · अध्याय 40

अभिमन्यु द्वारा दुःशासन और कर्ण की पराजय

अभिमन्यु दुःशासन का धनुष काट देता है और द्यूत-सभा में युधिष्ठिर तथा भीम के प्रति किए गए अपमान का स्मरण कराकर उसे ऐसा बाण मारता है कि वह अचेत होकर रणभूमि से हटाया जाता है। पाण्डव और उनके मित्र सिंहनाद करके द्रोण की सेना पर चढ़ दौड़ते हैं। दुर्योधन कर्ण को अभिमन्यु के सामने भेजता है; अभिमन्यु कर्ण के अस्त्रों को सह लेता है और उसका धनुष काट गिराता है, तब कर्ण का अनुज उसकी सहायता को आता है और पाण्डव जयघोष करते हैं।

अध्याय 39अध्याय-सूचीअध्याय 41

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.40.1)

ततः समभवद्युद्धं तयोः पुरुषसिंहयोः । तस्मिन्काले महाबाहुः सौभद्रः परवीरहा ॥

tataḥ samabhavadyuddhaṃ tayoḥ puruṣasiṃhayoḥ | tasminkāle mahābāhuḥ saubhadraḥ paravīrahā

तब उन दोनों पुरुषसिंहों के बीच युद्ध छिड़ गया। उसी समय शत्रु-वीरों का संहार करने वाले महाबाहु सुभद्रा-पुत्र ने

श्लोक 2 (7.40.2)

सशरं कार्मुकं छित्त्वा लाघवेन व्यपातयत् । दुःशासनं शरैस्तीक्ष्णैः संततक्ष समन्ततः ॥

saśaraṃ kārmukaṃ chittvā lāghavena vyapātayat | duḥśāsanaṃ śaraistīkṣṇaiḥ saṃtatakṣa samantataḥ

बाण सहित धनुष को काट गिराया और अपनी फुर्ती से दुःशासन के चारों ओर तीखे बाणों से घाव कर दिए।

श्लोक 3 (7.40.3)

शरविक्षतगात्रं तु प्रत्यमित्रमवस्थितम् । अभिमन्युः स्मयन्धीमान्दुःशासनमथाब्रवीत् ॥

śaravikṣatagātraṃ tu pratyamitramavasthitam | abhimanyuḥ smayandhīmānduḥśāsanamathābravīt

बाणों से घायल शरीर वाला दुःशासन सामने डटा खड़ा था; तब बुद्धिमान् अभिमन्यु ने मुस्कराकर उससे कहा —

अभिमन्युरुवाच

श्लोक 4 (7.40.4)

दिष्ट्या पश्यामि सङ्ग्रामे मानिनं शूरमागतम् । निष्ठुरं त्यक्तधर्माणमाक्रोशनपरायणम् ॥

diṣṭyā paśyāmi saṅgrāme māninaṃ śūramāgatam | niṣṭhuraṃ tyaktadharmāṇamākrośanaparāyaṇam

सौभाग्य से मैं युद्ध में उस अभिमानी “शूर” को सामने आया देख रहा हूँ — जो निष्ठुर है, जिसने धर्म को त्याग दिया है और गाली-गलौज में ही लगा रहता है!

श्लोक 5 (7.40.5)

यत्सभायां त्वया राज्ञो धृतराष्ट्रस्य शृण्वतः । कोपितः परुषैर्वाक्यैर्धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥

yatsabhāyāṃ tvayā rājño dhṛtarāṣṭrasya śṛṇvataḥ | kopitaḥ paruṣairvākyairdharmarājo yudhiṣṭhiraḥ

जब राजा धृतराष्ट्र के सुनते-सुनते तूने सभा में धर्मराज युधिष्ठिर को कठोर वचनों से क्रोधित किया,

श्लोक 6 (7.40.6)

जयोन्मत्तेन भीमश्च बह्वबद्धं प्रभाषितः । अक्षकूटं समाश्रित्य सौबलस्यात्मनो बलम् ॥

jayonmattena bhīmaśca bahvabaddhaṃ prabhāṣitaḥ | akṣakūṭaṃ samāśritya saubalasyātmano balam

और विजय के मद में उन्मत्त होकर भीम से बहुत असंगत बातें कहीं, शकुनि के अपने ही बल — जुए की कपटविद्या — का सहारा लेकर।

श्लोक 7 (7.40.7)

तत्त्वयेदमनुप्राप्तं तस्य कोपान्महात्मनः । परवित्तापहारस्य क्रोधस्याप्रशमस्य च ॥

tattvayedamanuprāptaṃ tasya kopānmahātmanaḥ | paravittāpahārasya krodhasyāpraśamasya ca

उस महात्मा के क्रोध से यही फल तुझ पर आ पड़ा है — दूसरों का धन हड़पने, कभी शान्त न होने वाले क्रोध,

श्लोक 8 (7.40.8)

लोभस्य ज्ञाननाशस्य द्रोहस्यात्याहितस्य च । पितॄणां मम राज्यस्य हरणस्योग्रधन्विनाम् ॥

lobhasya jñānanāśasya drohasyātyāhitasya ca | pitṝṇāṃ mama rājyasya haraṇasyogradhanvinām

लोभ, विवेक के नाश, द्रोह और भारी अपराध के कारण, तथा मेरे पिताओं — उन उग्र धनुर्धरों — के राज्य के हरण के कारण,

श्लोक 9 (7.40.9)

तत्त्वयेदमनुप्राप्तं प्रकोपाद्वै महात्मनाम् । स तस्योग्रमधर्मस्य फलं प्राप्नुहि दुर्मते ॥

tattvayedamanuprāptaṃ prakopādvai mahātmanām | sa tasyogramadharmasya phalaṃ prāpnuhi durmate

उन महात्माओं के कोप से यह फल तुझ पर आ पड़ा है। दुर्मते, उस अधर्म का भयंकर फल अब पा।

श्लोक 10 (7.40.10)

शासिताऽस्म्यद्य ते बाणैः सर्वसैन्यस्य पश्यतः । अद्याहमनृणस्तस्य कोपस्य भविता रणे ॥

śāsitā'smyadya te bāṇaiḥ sarvasainyasya paśyataḥ | adyāhamanṛṇastasya kopasya bhavitā raṇe

आज सारी सेना के देखते-देखते मैं तुझे अपने बाणों से दण्ड दूँगा। आज रणभूमि में मैं उस क्रोध के ऋण से उऋण हो जाऊँगा।

श्लोक 11 (7.40.11)

अमर्षितायाः कृष्णायाः काङ्क्षितस्य च मे पितुः । अद्य कौरव्य भीमस्य भवितास्म्यनृणो युधि । न हि मे मोक्ष्यसे जीवन्यदि नोत्सृजसे रणं ॥

amarṣitāyāḥ kṛṣṇāyāḥ kāṅkṣitasya ca me pituḥ | adya kauravya bhīmasya bhavitāsmyanṛṇo yudhi | na hi me mokṣyase jīvanyadi notsṛjase raṇaṃ

आज मैं क्रोधित द्रौपदी के और अपने पिता की अभिलाषा के ऋण से, तथा हे कुरुवंशी, आज युद्ध में भीम के ऋण से भी उऋण हो जाऊँगा। यदि तू रण नहीं छोड़ देता तो मेरे हाथ से जीवित नहीं बचेगा।

सञ्जय उवाच

श्लोक 12 (7.40.12)

एवमुक्त्वा महाबाहुर्बाणं दुःशासनान्तकम् । संदधे परवीरघ्नः कालाग्न्यनिलवर्चसम् ॥

evamuktvā mahābāhurbāṇaṃ duḥśāsanāntakam | saṃdadhe paravīraghnaḥ kālāgnyanilavarcasam

ऐसा कहकर शत्रु-वीरों का संहार करने वाले महाबाहु ने धनुष पर दुःशासन का अन्त करने वाला बाण चढ़ाया, जो प्रलयकाल की अग्नि और वायु के समान तेजस्वी था।

श्लोक 13 (7.40.13)

तस्योरस्तूर्णमासाद्य जत्रुदेशे विभिद्य तम् । जगाम सह पुङ्खेन वल्मीकमिव पन्नगः । अथैनं पञ्चविंशत्या पुनरेव समार्पयत् ॥

tasyorastūrṇamāsādya jatrudeśe vibhidya tam | jagāma saha puṅkhena valmīkamiva pannagaḥ | athainaṃ pañcaviṃśatyā punareva samārpayat

वह बाण शीघ्र ही उसकी छाती तक पहुँचकर कण्ठ-अस्थि के पास उसे भेदता हुआ पंख सहित ऐसे घुस गया जैसे साँप बाँबी में घुसता है। फिर अभिमन्यु ने उसे पच्चीस बाणों से और बींधा।

श्लोक 14 (7.40.14)

स गाढविद्धो व्यथितो रथोपस्थ उपाविशत् । दुःशासनो महाराज कश्मलं चाविशन्महत् ॥

sa gāḍhaviddho vyathito rathopastha upāviśat | duḥśāsano mahārāja kaśmalaṃ cāviśanmahat

गहरी चोट खाकर वह पीड़ा से व्याकुल हो रथ के पिछले भाग में बैठ गया; हे महाराज, दुःशासन को भारी मूर्च्छा ने घेर लिया।

श्लोक 15 (7.40.15)

सारथिस्त्वरमाणस्तु दुःशासनमचेतसम् । रणमध्यादपोवाह सौभद्रशरपीडितम् ॥

sārathistvaramāṇastu duḥśāsanamacetasam | raṇamadhyādapovāha saubhadraśarapīḍitam

सारथि ने जल्दी से अचेत दुःशासन को, जो सुभद्रा-पुत्र के बाणों से पीड़ित था, रणभूमि के बीच से हटा लिया।

श्लोक 16 (7.40.16)

पाण्डवा द्रौपदेयाश्च विराटश्च समीक्ष्य तम् । पाञ्चालाः केकयाश्चैव सिंहनादमथानदन् ॥

pāṇḍavā draupadeyāśca virāṭaśca samīkṣya tam | pāñcālāḥ kekayāścaiva siṃhanādamathānadan

पाण्डवों, द्रौपदी के पुत्रों और विराट ने उसे इस दशा में देखकर, पाञ्चालों और केकयों के साथ सिंहनाद किया।

श्लोक 17 (7.40.17)

वादित्राणि च सर्वाणि नानालिङ्गानि सर्वशः । प्रावादयन्त संहृष्टाः पाण्डूनां तत्र सैनिकाः ॥

vāditrāṇi ca sarvāṇi nānāliṅgāni sarvaśaḥ | prāvādayanta saṃhṛṣṭāḥ pāṇḍūnāṃ tatra sainikāḥ

पाण्डवों के सैनिकों ने हर्ष से भरकर वहाँ सब प्रकार के अनेक चिह्नों वाले वाद्य बजाए।

श्लोक 18 (7.40.18)

अपश्यन्स्मयमानाश्च सौभद्रस्य विचेष्टितम् । अत्यन्तवैरिणं दृप्तं दृष्ट्वा शत्रुं पराजितम् ॥

apaśyansmayamānāśca saubhadrasya viceṣṭitam | atyantavairiṇaṃ dṛptaṃ dṛṣṭvā śatruṃ parājitam

वे मुस्कराते हुए सुभद्रा-पुत्र का पराक्रम देख रहे थे, क्योंकि उन्होंने अपने अत्यन्त वैरी, अभिमानी शत्रु को हारा हुआ देखा था।

श्लोक 19 (7.40.19)

धर्ममारुतशक्राणामश्विनोः प्रतिमास्तथा । धारयन्तो ध्वजाग्रेषु द्रौपदेया महारथाः ॥

dharmamārutaśakrāṇāmaśvinoḥ pratimāstathā | dhārayanto dhvajāgreṣu draupadeyā mahārathāḥ

द्रौपदी के महारथी पुत्र अपनी ध्वजाओं के शिखरों पर धर्म, मारुत, शक्र और दोनों अश्विनों की प्रतिमाएँ धारण किए हुए थे।

श्लोक 20 (7.40.20)

सात्यकिश्चेकितानश्च धृष्टद्युम्नशिखण्डिनौ । केकया धृष्टकेतुश्च मात्स्याः पाञ्चालसृञ्जयाः ॥

sātyakiścekitānaśca dhṛṣṭadyumnaśikhaṇḍinau | kekayā dhṛṣṭaketuśca mātsyāḥ pāñcālasṛñjayāḥ

सात्यकि, चेकितान, धृष्टद्युम्न और शिखण्डी, केकय, धृष्टकेतु, मत्स्य, पाञ्चाल और सृञ्जय,

श्लोक 21 (7.40.21)

पाण्डवाश्च मुदा युक्ता युधिष्ठिरपुरोगमाः । अभ्यद्रवन्त त्वरिता द्रोणानीकं बिभित्सवः ॥

pāṇḍavāśca mudā yuktā yudhiṣṭhirapurogamāḥ | abhyadravanta tvaritā droṇānīkaṃ bibhitsavaḥ

और युधिष्ठिर के नेतृत्व में पाण्डव भी हर्ष से भरकर, द्रोण की सेना को तोड़ने की इच्छा से, तेजी से टूट पड़े।

श्लोक 22 (7.40.22)

ततोऽभवन्महायुद्धं त्वदीयानां परैः सह । जयमाकाङ्क्षमाणानां शूराणामनिवर्तिनाम् ॥

tato'bhavanmahāyuddhaṃ tvadīyānāṃ paraiḥ saha | jayamākāṅkṣamāṇānāṃ śūrāṇāmanivartinām

तब आपके योद्धाओं और शत्रुओं के बीच महायुद्ध छिड़ गया — वे वीर विजय की आकांक्षा रखते थे और पीछे हटने वाले नहीं थे।

श्लोक 23 (7.40.23)

तथा तु वर्तमाने वै सङ्ग्रामेऽतिभयंकरे । दुर्योधनो महाराज राधेयमिदमब्रवीत् ॥

tathā tu vartamāne vai saṅgrāme'tibhayaṃkare | duryodhano mahārāja rādheyamidamabravīt

जब वह अत्यन्त भयंकर संग्राम इस प्रकार चल रहा था, तब हे महाराज, दुर्योधन ने राधेय (कर्ण) से यह कहा —

दुर्योधन उवाच

श्लोक 24 (7.40.24)

पश्य दुःशासनं वीरमभिमन्युवशंगतम् । प्रतपन्तमिवादित्यं निघ्नन्तं शात्रवान्रणे ॥

paśya duḥśāsanaṃ vīramabhimanyuvaśaṃgatam | pratapantamivādityaṃ nighnantaṃ śātravānraṇe

देखो, वीर दुःशासन अभिमन्यु के वश में पड़ गया है — वही जो सूर्य के समान तपता हुआ युद्ध में शत्रुओं को काट रहा था।

श्लोक 25 (7.40.25)

अथ चैते सुसंरब्धाः सिंहा इव बलोत्कटाः । सौभद्रमुद्यतास्त्रातुमभ्यधावन्त पाण्डवाः ॥

atha caite susaṃrabdhāḥ siṃhā iva balotkaṭāḥ | saubhadramudyatāstrātumabhyadhāvanta pāṇḍavāḥ

और ये पाण्डव, क्रोध से भरे, सिंहों की भाँति बलवान्, सुभद्रा-पुत्र की रक्षा के लिए उठ खड़े हुए दौड़े आ रहे हैं।

सञ्जय उवाच

श्लोक 26 (7.40.26)

ततः कर्णः शरैस्तीक्ष्णैरभिमन्युं दुरासदम् । अभ्यवर्षत सङ्क्रुद्धः पुत्रस्य हितकृत्तव ॥

tataḥ karṇaḥ śaraistīkṣṇairabhimanyuṃ durāsadam | abhyavarṣata saṅkruddhaḥ putrasya hitakṛttava

तब आपके पुत्र का हित चाहने वाले कर्ण ने क्रोध में भरकर दुर्जय अभिमन्यु पर तीखे बाणों की वर्षा कर दी।

श्लोक 27 (7.40.27)

तस्य चानुचरांस्तीक्ष्णैर्विव्याघ परमेषुभिः । अवज्ञापूर्वकं शूरः सौभद्रस्य रणाजिरे ॥

tasya cānucarāṃstīkṣṇairvivyāgha parameṣubhiḥ | avajñāpūrvakaṃ śūraḥ saubhadrasya raṇājire

और उस वीर ने रणभूमि में अवज्ञा के साथ सुभद्रा-पुत्र के अनुचरों को उत्तम तीखे बाणों से बींध दिया।

श्लोक 28 (7.40.28)

अभिमन्युस्तु राधेयं त्रिसप्तत्या शिलीमुखैः । अविध्यत्त्वरितो राजन्द्रोणं प्रेप्सुर्महामनाः ॥

abhimanyustu rādheyaṃ trisaptatyā śilīmukhaiḥ | avidhyattvarito rājandroṇaṃ prepsurmahāmanāḥ

परन्तु हे राजन्, द्रोण तक पहुँचने की इच्छा वाले उदार-चित्त अभिमन्यु ने तुरंत राधेय को तिहत्तर बाणों से बींध दिया।

श्लोक 29 (7.40.29)

तं तथा नाशकत्कश्चिद्दोणाद्वारयितुं रथी । आरुजन्तं रथव्रातान्वज्रहस्तात्मजात्मजम् ॥

taṃ tathā nāśakatkaściddoṇādvārayituṃ rathī | ārujantaṃ rathavrātānvajrahastātmajātmajam

रथों के समूहों को कुचलते हुए वज्रधारी इन्द्र के उस पौत्र को कोई भी रथी द्रोण की ओर जाने से रोक न सका।

श्लोक 30 (7.40.30)

ततः कर्णो जयप्रेप्सुर्मानी सर्वधनुष्मताम् । सौभद्रं शतशोऽविध्यदुत्तमास्त्राणि दर्शयन् ॥

tataḥ karṇo jayaprepsurmānī sarvadhanuṣmatām | saubhadraṃ śataśo'vidhyaduttamāstrāṇi darśayan

तब सब धनुर्धारियों में अभिमानी, विजय चाहने वाले कर्ण ने अपने उत्तम अस्त्र दिखाते हुए सुभद्रा-पुत्र को सैकड़ों बाणों से बींधा।

श्लोक 31 (7.40.31)

सोऽस्त्रैरस्त्रविदां श्रेष्ठो रामशिष्यः प्रतापवान् । समरे शत्रुदुर्धर्षमभिमन्युमपीडयत् ॥

so'strairastravidāṃ śreṣṭho rāmaśiṣyaḥ pratāpavān | samare śatrudurdharṣamabhimanyumapīḍayat

अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ, परशुराम के उस प्रतापी शिष्य ने युद्ध में शत्रुओं के लिए दुर्धर्ष अभिमन्यु को अपने अस्त्रों से पीड़ा दी।

श्लोक 32 (7.40.32)

स तथा पीड्यमानस्तु राधेयेनास्त्रवृष्टिभिः । समरेऽमरसङ्काशः सौभद्रो न व्यशीर्यत ॥

sa tathā pīḍyamānastu rādheyenāstravṛṣṭibhiḥ | samare'marasaṅkāśaḥ saubhadro na vyaśīryata

राधेय की अस्त्र-वर्षा से इस प्रकार पीड़ित होने पर भी देवता के समान सुभद्रा-पुत्र रणभूमि में विचलित नहीं हुआ।

श्लोक 33 (7.40.33)

ततः शिलाशितैस्तीक्ष्णैर्भल्लैरानतपर्वभिः । छित्त्वा धनूंषि शूराणामार्जुनिः कर्णमार्दयत् ॥

tataḥ śilāśitaistīkṣṇairbhallairānataparvabhiḥ | chittvā dhanūṃṣi śūrāṇāmārjuniḥ karṇamārdayat

तब अर्जुन-पुत्र ने शिला पर तेज किए हुए, झुकी गाँठों वाले तीखे भल्लों से शूरों के धनुष काटकर कर्ण को पीड़ित किया,

श्लोक 34 (7.40.34)

धनुर्मण्डलनिर्मुक्तैः शरैराशीविषोपमैः । सच्छत्रध्वजयन्तारं साश्वमाशु स्मयन्निव ॥

dhanurmaṇḍalanirmuktaiḥ śarairāśīviṣopamaiḥ | sacchatradhvajayantāraṃ sāśvamāśu smayanniva

धनुष-मण्डल से छूटे विषैले सर्पों जैसे बाणों से, मानो हँसते हुए, छत्र, ध्वज, सारथि और घोड़ों सहित कर्ण को शीघ्रता से बींधते हुए।

श्लोक 35 (7.40.35)

कर्णोऽपि चास्य चिक्षेप बाणान्सन्नतपर्वणः । असम्भ्रान्तश्च तान्सर्वानगृह्णात्फल्गुनात्मजः ॥

karṇo'pi cāsya cikṣepa bāṇānsannataparvaṇaḥ | asambhrāntaśca tānsarvānagṛhṇātphalgunātmajaḥ

कर्ण ने भी उस पर झुकी गाँठों वाले बाण चलाए, परन्तु अर्जुन-पुत्र ने विचलित हुए बिना उन सबको पकड़ लिया।

श्लोक 36 (7.40.36)

ततो मुहूर्तात्कर्णस्य बाणेनैकेन वीर्यवान् । सध्वजं कार्मुकं वीरश्छित्त्वा भूमावपातयत् ॥

tato muhūrtātkarṇasya bāṇenaikena vīryavān | sadhvajaṃ kārmukaṃ vīraśchittvā bhūmāvapātayat

तब क्षण भर में उस पराक्रमी वीर ने एक ही बाण से कर्ण का ध्वज सहित धनुष काटकर भूमि पर गिरा दिया।

श्लोक 37 (7.40.37)

ततः कृच्छ्रगतं कर्णं दृष्ट्वा कर्णादनन्तरः । सौभद्रमभ्ययात्तूर्णं दृढमुद्यम्य कार्मुकम् ॥

tataḥ kṛcchragataṃ karṇaṃ dṛṣṭvā karṇādanantaraḥ | saubhadramabhyayāttūrṇaṃ dṛḍhamudyamya kārmukam

तब कर्ण को संकट में पड़ा देखकर कर्ण के बाद का योद्धा अपना दृढ़ धनुष उठाकर तुरन्त सुभद्रा-पुत्र पर झपटा।

श्लोक 38 (7.40.38)

तत उच्चुक्रुशुः पार्थास्तेषां चानुचरा जनाः । वादित्राणि च सञ्जघ्नः सौभद्रं चापि तुष्टुवुः ॥

tata uccukruśuḥ pārthāsteṣāṃ cānucarā janāḥ | vāditrāṇi ca sañjaghnaḥ saubhadraṃ cāpi tuṣṭuvuḥ

तब पार्थों और उनके अनुयायियों ने जयघोष किया, वाद्य बजाए और सुभद्रा-पुत्र की स्तुति की।

अध्याय 39अध्याय-सूचीअध्याय 41