द्रोण पर्व · अध्याय 52
व्यास का युधिष्ठिर को सान्त्वना देना; अकम्पन को नारद की कथा का आरम्भ
व्यास युधिष्ठिर के पास आते हैं। युधिष्ठिर अभिमन्यु के अन्यायपूर्ण वध की बात कहकर पूछते हैं कि ऐसे बलवान् राजाओं को भी मृत्यु कैसे ले जाती है — मृत्यु कौन है और प्राणियों को किसके द्वारा हर ले जाती है? व्यास उत्तर में वह पुरानी कथा सुनाते हैं जो नारद ने राजा अकम्पन को सुनाई थी, जिनके पुत्र हरि पिता को छुड़ाकर रण में मारे गए थे। नारद कहते हैं: ब्रह्मा ने जगत् को असंहृत देखकर क्रोध किया, उनसे अग्नि निकली और सृष्टि को जलाने लगी। रुद्र (स्थाणु) शरण में ब्रह्मा के पास आए और ब्रह्मा ने पूछा कि वे उनके लिए क्या करें।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.52.1)
एवं विलपमाने तु कुन्तीपुत्रे युधिष्ठिरे । कृष्णद्वैपायनस्तत्र आजगाम महानृषिः ॥
evaṃ vilapamāne tu kuntīputre yudhiṣṭhire | kṛṣṇadvaipāyanastatra ājagāma mahānṛṣiḥ
कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर के इस प्रकार विलाप करते समय महर्षि कृष्णद्वैपायन वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 2 (7.52.2)
अथ दृष्ट्वा महात्मानं पाण्डुपुत्रो युधिष्ठिरः । युक्तासनो दीनमनाः पूजां चक्रे महात्मनः ॥
atha dṛṣṭvā mahātmānaṃ pāṇḍuputro yudhiṣṭhiraḥ | yuktāsano dīnamanāḥ pūjāṃ cakre mahātmanaḥ
तब पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर ने उन महात्मा को देखकर आसन की व्यवस्था की और दुखी मन से उनका सत्कार किया।
श्लोक 3 (7.52.3)
अर्चयित्वा यथान्यायमुपविष्टं युधिष्ठिरः । अब्रवीच्छोकसन्तप्तो भ्रातुः पुत्रवधेन च ॥
arcayitvā yathānyāyamupaviṣṭaṃ yudhiṣṭhiraḥ | abravīcchokasantapto bhrātuḥ putravadhena ca
विधिपूर्वक पूजा करके उन्हें बैठा लेने पर युधिष्ठिर भाई के पुत्र के वध से शोकसन्तप्त होकर बोले।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 4 (7.52.4)
अधर्मयुक्तैर्बहुभिः परिवार्य महारथैः । युध्यमानो महेष्वासैः सौभद्रो निहतो रणे ॥
adharmayuktairbahubhiḥ parivārya mahārathaiḥ | yudhyamāno maheṣvāsaiḥ saubhadro nihato raṇe
अधर्म से युद्ध करने वाले बहुत-से महारथी महाधनुर्धरों ने उसे घेर लिया और लड़ते हुए सुभद्रापुत्र रण में मारा गया।
श्लोक 5 (7.52.5)
बालश्च बालबुद्धिश्च वीरश्च परवीरहा । अनुपायेन सङ्ग्रामे युध्यमानो विनाशितः ॥
bālaśca bālabuddhiśca vīraśca paravīrahā | anupāyena saṅgrāme yudhyamāno vināśitaḥ
वह बालक था, उसकी बुद्धि भी बालक जैसी थी, फिर भी वह वीर और शत्रुवीरों का संहारक था; अनुचित उपाय से लड़ते हुए रण में उसका नाश कर दिया गया।
श्लोक 6 (7.52.6)
मया प्रोक्तः स सङ्ग्रामे द्वारं सञ्जनयस्व नः । प्रविष्टेऽभ्यन्तरे तस्मिन्सैन्धवेन निवारिताः ॥
mayā proktaḥ sa saṅgrāme dvāraṃ sañjanayasva naḥ | praviṣṭe'bhyantare tasminsaindhavena nivāritāḥ
मैंने उससे रण में कहा था, "हमारे लिए द्वार बना दो"; पर जब वह भीतर घुस गया, तब सैन्धव (जयद्रथ) ने हमें रोक लिया।
श्लोक 7 (7.52.7)
ननु नाम समं युद्धमेष्टव्यं युद्धजीविभिः । इदं चैवासमं युद्धमीदृशं यत्कृतं परैः ॥
nanu nāma samaṃ yuddhameṣṭavyaṃ yuddhajīvibhiḥ | idaṃ caivāsamaṃ yuddhamīdṛśaṃ yatkṛtaṃ paraiḥ
युद्ध पर जीने वालों को निश्चय ही बराबरी का युद्ध चाहिए; पर शत्रुओं ने तो यह ऐसा अनुचित युद्ध किया है।
श्लोक 8 (7.52.8)
तेनास्मि भृशसन्तप्तः शोकबाष्पसमाकुलः । शमं नैवाधिगच्छामि चिन्तयानः पुनः पुनः ॥
tenāsmi bhṛśasantaptaḥ śokabāṣpasamākulaḥ | śamaṃ naivādhigacchāmi cintayānaḥ punaḥ punaḥ
इसी से मैं अत्यन्त सन्तप्त हूँ, शोक के आँसुओं से व्याकुल हूँ और बार-बार सोचते हुए मुझे शान्ति नहीं मिलती।
सञ्जय उवाच
श्लोक 9 (7.52.9)
तं तथा विलपन्तं वै शोकव्याकुलमानसम् । उवाच सान्त्वयन्व्यासो युधिष्ठिरमिदं वचः ॥
taṃ tathā vilapantaṃ vai śokavyākulamānasam | uvāca sāntvayanvyāso yudhiṣṭhiramidaṃ vacaḥ
इस प्रकार शोक से व्याकुल मन से विलाप करते हुए युधिष्ठिर को सान्त्वना देते हुए व्यास ने यह वचन कहा।
व्यास उवाच
श्लोक 10 (7.52.10)
युधिष्ठिर महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद । व्यसनेषु न मुह्यन्ति त्वादृशा भरतर्षभ ॥
yudhiṣṭhira mahāprājña sarvaśāstraviśārada | vyasaneṣu na muhyanti tvādṛśā bharatarṣabha
हे महाप्राज्ञ युधिष्ठिर, सब शास्त्रों के ज्ञाता, हे भरतश्रेष्ठ, आपके जैसे लोग विपत्तियों में मोह में नहीं पड़ते।
श्लोक 11 (7.52.11)
स्वर्गमेष गतः शूरः शत्रून्हत्वा बहून्रणे । अबालसदृशं कर्म कृत्वा वै पुरुषोत्तमः ॥
svargameṣa gataḥ śūraḥ śatrūnhatvā bahūnraṇe | abālasadṛśaṃ karma kṛtvā vai puruṣottamaḥ
वह शूर पुरुषोत्तम रण में बहुत-से शत्रुओं को मारकर और बालक के योग्य न होने वाला कर्म करके स्वर्ग चला गया है।
श्लोक 12 (7.52.12)
अनतिक्रमणीयो वै विधिरेष युधिष्ठिर । देवदानवगन्धर्वान्मृत्युर्हरति भारत ॥
anatikramaṇīyo vai vidhireṣa yudhiṣṭhira | devadānavagandharvānmṛtyurharati bhārata
हे युधिष्ठिर, यह विधान लाँघा नहीं जा सकता; हे भारत, मृत्यु देवताओं, दानवों और गन्धर्वों तक को हर ले जाती है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 13 (7.52.13)
इमे वै पृथिवीपालाः शेरते पृथिवीतले । निहताः पृतनामध्ये मृतसंज्ञा महाबलाः ॥
ime vai pṛthivīpālāḥ śerate pṛthivītale | nihatāḥ pṛtanāmadhye mṛtasaṃjñā mahābalāḥ
पृथ्वी के ये राजा सेना के बीच मारे जाकर भूमि पर पड़े हैं; ये महाबली 'मृत' कहलाते हैं।
श्लोक 14 (7.52.14)
नागायुतबलाश्चान्ये वायुवेगबलास्तथा । त एते निहताः सङ्ख्ये तुल्यरूपा नरैर्नराः ॥
nāgāyutabalāścānye vāyuvegabalāstathā | ta ete nihatāḥ saṅkhye tulyarūpā narairnarāḥ
कुछ में दस हज़ार हाथियों का बल था, कुछ में वायु के वेग का; वे ही युद्ध में मारे गए हैं, जो रूप में दूसरे मनुष्यों जैसे ही मनुष्य थे।
श्लोक 15 (7.52.15)
नैषां पश्यामि हन्तारं प्राणिनां संयुगे क्वचित् । विक्रमेणोपसम्पन्नास्तपोबलसमन्विताः ॥
naiṣāṃ paśyāmi hantāraṃ prāṇināṃ saṃyuge kvacit | vikrameṇopasampannāstapobalasamanvitāḥ
रण में कहीं भी मुझे इन प्राणियों का कोई मारने वाला दिखाई नहीं देता; वे पराक्रम से सम्पन्न और तपोबल से युक्त थे।
श्लोक 16 (7.52.16)
जेतव्यमिति चान्योन्यं येषां नित्यं हृदि स्थितम् । अथ चेमे हताः प्राज्ञाः शेरते विगतायुषः ॥
jetavyamiti cānyonyaṃ yeṣāṃ nityaṃ hṛdi sthitam | atha ceme hatāḥ prājñāḥ śerate vigatāyuṣaḥ
जिनके हृदय में सदा यही रहता था कि दूसरे को जीतना है — वही ये बुद्धिमान् अब आयुहीन होकर पड़े हैं।
श्लोक 17 (7.52.17)
मृता इति च शब्दोयं वर्तते च ततोऽर्थवत् । इमे मृता महीपालाः प्रायशो भीमविक्रमाः ॥
mṛtā iti ca śabdoyaṃ vartate ca tato'rthavat | ime mṛtā mahīpālāḥ prāyaśo bhīmavikramāḥ
'मृत' यह शब्द प्रचलित है और इसीलिए सार्थक है। ये राजा मृत हैं, जिनमें अधिकांश भयंकर पराक्रमी थे —
श्लोक 18 (7.52.18)
निश्चेष्टा निरभिमानाः शूराः शत्रुवशंगताः । राजपुत्राश्च संरब्धा वैश्वानरमुखं गताः ॥
niśceṣṭā nirabhimānāḥ śūrāḥ śatruvaśaṃgatāḥ | rājaputrāśca saṃrabdhā vaiśvānaramukhaṃ gatāḥ
निश्चेष्ट, अभिमानरहित होकर शत्रुओं के वश में पड़े वीर, और क्रोध से भरे राजकुमार वैश्वानर (अग्नि) के मुख में चले गए हैं।
श्लोक 19 (7.52.19)
अत्र मे संशयः प्राप्तः कुतः संज्ञा मृता इति । कस्य मृत्युः कुतो मृत्युः केन मृत्युरिमाः प्रजाः । हरत्यमरसङ्काश तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
atra me saṃśayaḥ prāptaḥ kutaḥ saṃjñā mṛtā iti | kasya mṛtyuḥ kuto mṛtyuḥ kena mṛtyurimāḥ prajāḥ | haratyamarasaṅkāśa tanme brūhi pitāmaha
यहाँ मुझे एक शंका हुई है: 'मृत' यह संज्ञा कहाँ से आई? मृत्यु किसकी है? मृत्यु कहाँ से आती है? किसके द्वारा मृत्यु इन प्रजाओं को हर ले जाती है? हे अमर-तुल्य पितामह, यह मुझे बताइए।
सञ्जय उवाच
श्लोक 20 (7.52.20)
तं तथा परिपृच्छन्तं कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् । आश्वासनमिदं वाक्यमुवाच भगवानृषिः ॥
taṃ tathā paripṛcchantaṃ kuntīputraṃ yudhiṣṭhiram | āśvāsanamidaṃ vākyamuvāca bhagavānṛṣiḥ
कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर के इस प्रकार पूछने पर भगवान् ऋषि व्यास ने ये आश्वासन देने वाले वचन कहे।
व्यास उवाच
श्लोक 21 (7.52.21)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । अकम्पनस्य कथितं नारदेन पुरा नृप ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | akampanasya kathitaṃ nāradena purā nṛpa
इस विषय में लोग एक पुरानी कथा कहते हैं, जो पूर्वकाल में नारद ने अकम्पन से कही थी, हे राजन्।
श्लोक 22 (7.52.22)
स चापि राजा राजेन्द्र पुत्रव्यसनमुत्तमम् । अप्रसह्यतमं लोके प्राप्तवानिति नः श्रुतम् ॥
sa cāpi rājā rājendra putravyasanamuttamam | aprasahyatamaṃ loke prāptavāniti naḥ śrutam
हे राजेन्द्र, वह राजा भी पुत्रशोक के उस परम दुःख को प्राप्त हुआ था जो संसार में सबसे अधिक असह्य है — ऐसा हमने सुना है।
श्लोक 23 (7.52.23)
तदहं सम्प्रवक्ष्यामि मृत्योः प्रभवमुत्तमम् । ततस्त्वं मोक्ष्यसे दुःखात्स्नेहबन्धनसंश्रयात् ॥
tadahaṃ sampravakṣyāmi mṛtyoḥ prabhavamuttamam | tatastvaṃ mokṣyase duḥkhātsnehabandhanasaṃśrayāt
मैं तुम्हें मृत्यु की उत्पत्ति की वह उत्तम कथा सुनाऊँगा, जिससे तुम स्नेह-बन्धन पर टिके इस दुःख से मुक्त हो जाओगे।
श्लोक 24 (7.52.24)
समस्तपापराशिघ्नं शृणु कीर्तयतो मम । धन्यमाख्यानमायुष्यं शोकघ्नं पुष्टिवर्धनम् ॥
samastapāparāśighnaṃ śṛṇu kīrtayato mama | dhanyamākhyānamāyuṣyaṃ śokaghnaṃ puṣṭivardhanam
जब मैं इसका कीर्तन करूँ तो सुनो: यह आख्यान समस्त पाप-राशि का नाश करने वाला, धन्य, आयु देने वाला, शोक मिटाने वाला और पुष्टि बढ़ाने वाला है।
श्लोक 25 (7.52.25)
पवित्रमरिसङ्घघ्नं मङ्गलानां च मङ्गलम् । यथैव वेदाध्ययनमुपाख्यानमिदं तथा ॥
pavitramarisaṅghaghnaṃ maṅgalānāṃ ca maṅgalam | yathaiva vedādhyayanamupākhyānamidaṃ tathā
यह पवित्र है, शत्रुओं के समूहों का नाश करने वाला है, मंगलों में भी मंगल है; यह उपाख्यान वेदाध्ययन के समान है।
श्लोक 26 (7.52.26)
श्रवणीयं महाराज प्रातर्नित्यं नृपोत्तमैः । पुत्रानायुष्मतो राज्यमीहमानैः श्रियं तथा ॥
śravaṇīyaṃ mahārāja prātarnityaṃ nṛpottamaiḥ | putrānāyuṣmato rājyamīhamānaiḥ śriyaṃ tathā
हे महाराज, आयुष्मान् पुत्रों, राज्य और लक्ष्मी की इच्छा रखने वाले श्रेष्ठ राजाओं को इसे प्रतिदिन प्रातः सुनना चाहिए।
श्लोक 27 (7.52.27)
पुरा कृतयुगे तात आसीद्राजा ह्यकम्पनः । स शत्रुवशमापन्नो मध्ये सङ्ग्राममूर्धनि । योधयामास बलवान्बद्धश्चासीदकम्पनः ॥
purā kṛtayuge tāta āsīdrājā hyakampanaḥ | sa śatruvaśamāpanno madhye saṅgrāmamūrdhani | yodhayāmāsa balavānbaddhaścāsīdakampanaḥ
हे तात, पूर्वकाल में कृतयुग में अकम्पन नाम का एक राजा था। वह युद्ध के अग्रभाग के बीच शत्रुओं के वश में पड़ गया। उस बलवान् ने लड़ना जारी रखा और अकम्पन बन्दी बना लिया गया।
श्लोक 28 (7.52.28)
तस्य पुत्रो हरिर्नाम नारायणसमो बले । श्रीमान्कृतास्त्रो मेधावी युधि शक्रोपमो बली ॥
tasya putro harirnāma nārāyaṇasamo bale | śrīmānkṛtāstro medhāvī yudhi śakropamo balī
उसका पुत्र हरि नाम का था, जो बल में नारायण के समान, श्रीमान्, अस्त्रविद्या में निपुण, बुद्धिमान्, युद्ध में इन्द्र के समान और बलवान् था।
श्लोक 29 (7.52.29)
स दृष्ट्वा पितरं युद्धे तदवस्थं महाद्युतिः । अचिन्तयित्वा मरणं शत्रुमध्यं ततोऽविशत् ॥
sa dṛṣṭvā pitaraṃ yuddhe tadavasthaṃ mahādyutiḥ | acintayitvā maraṇaṃ śatrumadhyaṃ tato'viśat
युद्ध में पिता को उस दशा में देखकर उस महातेजस्वी ने मृत्यु की चिन्ता न करके शत्रुओं के बीच प्रवेश किया।
श्लोक 30 (7.52.30)
स शत्रुभिः परिवृतो बहुधा रणमूर्धनि । योधयामास तान्सर्वान्सर्वास्त्रकुशलो बली ॥
sa śatrubhiḥ parivṛto bahudhā raṇamūrdhani | yodhayāmāsa tānsarvānsarvāstrakuśalo balī
युद्ध के अग्रभाग में चारों ओर से शत्रुओं से घिरकर, सब अस्त्रों में कुशल उस बलवान् ने उन सबसे युद्ध किया।
श्लोक 31 (7.52.31)
वर्षन्बाणसहस्राणि शत्रुष्वमितविक्रमः । पदातिरथनागाश्वान्प्रममाथ महाबलः ॥
varṣanbāṇasahasrāṇi śatruṣvamitavikramaḥ | padātirathanāgāśvānpramamātha mahābalaḥ
शत्रुओं पर हज़ारों बाण बरसाते हुए उस अमित पराक्रमी महाबली ने पैदलों, रथों, हाथियों और घोड़ों को कुचल डाला।
श्लोक 32 (7.52.32)
स शरैराचितश्चक्रैर्गदाभिर्मुसलैरपि । मृद्गन्रथसहस्राणि पदातीन्वाजिवारणान् ॥
sa śarairācitaścakrairgadābhirmusalairapi | mṛdganrathasahasrāṇi padātīnvājivāraṇān
बाणों, चक्रों, गदाओं और मूसलों से बिंधा हुआ भी वह हज़ारों रथों, पैदलों, घोड़ों और हाथियों को कुचलता रहा,
श्लोक 33 (7.52.33)
परानीकं विभिद्याजौ मोक्षयित्वा च तं नृपम् । पुनरेवाकरोद्युद्धं शत्रुमध्यगतो बली ॥
parānīkaṃ vibhidyājau mokṣayitvā ca taṃ nṛpam | punarevākarodyuddhaṃ śatrumadhyagato balī
रण में शत्रुसेना को भेदकर और उस राजा को छुड़ाकर वह बलवान् फिर शत्रुओं के बीच जाकर युद्ध करने लगा।
श्लोक 34 (7.52.34)
ततस्ते रथिनः सर्वे समेत्य पुनराहवे । जघ्नुस्तं परिवार्यैकं तोमरैरिव कुञ्जरम् ॥
tataste rathinaḥ sarve sametya punarāhave | jaghnustaṃ parivāryaikaṃ tomarairiva kuñjaram
तब उन सब रथियों ने युद्ध में फिर इकट्ठे होकर अकेले उसे घेर लिया और जैसे हाथी को भालों से मारते हैं, वैसे उस पर प्रहार किया।
श्लोक 35 (7.52.35)
स कर्म दुष्करं कृत्वा सङ्ग्रामे शत्रुतापनः । शत्रुभिर्निहतः सङ्ख्ये पृतनायां युधिष्ठिर ॥
sa karma duṣkaraṃ kṛtvā saṅgrāme śatrutāpanaḥ | śatrubhirnihataḥ saṅkhye pṛtanāyāṃ yudhiṣṭhira
हे युधिष्ठिर, संग्राम में दुष्कर कर्म करके वह शत्रुतापन वीर उस सेना में युद्ध में शत्रुओं के हाथ मारा गया।
श्लोक 36 (7.52.36)
द्विषद्भिर्निहतं दृष्ट्वा प्रियं पुत्रमकम्पनः । अमर्षजनितक्रोध आहवात्सहसाऽऽगतः ॥
dviṣadbhirnihataṃ dṛṣṭvā priyaṃ putramakampanaḥ | amarṣajanitakrodha āhavātsahasā''gataḥ
शत्रुओं के हाथ अपने प्रिय पुत्र को मरा हुआ देखकर अमर्ष से उत्पन्न क्रोध वाला अकम्पन सहसा युद्ध से लौट आया।
श्लोक 37 (7.52.37)
स राजा प्रेतकृत्यानि तस्य कृत्वा शुचान्वितः । शोचन्नहनि रात्रौ च नालभत्सुखमात्मनः ॥
sa rājā pretakṛtyāni tasya kṛtvā śucānvitaḥ | śocannahani rātrau ca nālabhatsukhamātmanaḥ
उस राजा ने पुत्र का प्रेतकर्म करके शोक में डूबे हुए दिन-रात शोक किया और उसे अपने लिए सुख नहीं मिला।
श्लोक 38 (7.52.38)
तस्य शोकं विदित्वा तु पुत्रव्यसनसम्भवम् । आजगामाथ देवर्षिर्नारदोऽस्य समीपतः ॥
tasya śokaṃ viditvā tu putravyasanasambhavam | ājagāmātha devarṣirnārado'sya samīpataḥ
पुत्र की विपत्ति से उत्पन्न उसके शोक को जानकर देवर्षि नारद तब उसके पास आए।
श्लोक 39 (7.52.39)
स तु राजा महाभागो दृष्ट्वा देवर्षिसत्तमम् । पूजयित्वा यथान्यायं कथामकथयत्तदा ॥
sa tu rājā mahābhāgo dṛṣṭvā devarṣisattamam | pūjayitvā yathānyāyaṃ kathāmakathayattadā
उस महाभाग राजा ने देवर्षियों में श्रेष्ठ को देखकर विधिपूर्वक उनकी पूजा की और तब अपनी कथा कह सुनाई।
श्लोक 40 (7.52.40)
तस्य सर्वं समाचष्ट यथावृत्तं युधिष्ठिर । शत्रुभिर्विजयं सङ्ख्ये पुत्रस्य च वधं तथा ॥
tasya sarvaṃ samācaṣṭa yathāvṛttaṃ yudhiṣṭhira | śatrubhirvijayaṃ saṅkhye putrasya ca vadhaṃ tathā
हे युधिष्ठिर, उसने जैसा हुआ था वैसा सब बताया: युद्ध में शत्रुओं की विजय और पुत्र का वध।
अकम्पन उवाच
श्लोक 41 (7.52.41)
मम पुत्रो महावीर्य इन्द्रविष्णुसमद्युतिः । शत्रुभिर्बहुभिः सङ्ख्ये पराक्रम्य हतो बली ॥
mama putro mahāvīrya indraviṣṇusamadyutiḥ | śatrubhirbahubhiḥ saṅkhye parākramya hato balī
इन्द्र और विष्णु के समान तेज वाला, महापराक्रमी मेरा पुत्र बहुत-से शत्रुओं से युद्ध में पराक्रम दिखाकर बलवान् होते हुए भी मारा गया।
श्लोक 42 (7.52.42)
शृणु मे प्राणिनां चापि मृत्युः प्रभवते किल । क एष मृत्युर्भगवन्किंवीर्यबलपौरुषः । एतदिच्छामि तत्त्वेन श्रोतुं मतिमतां वर ॥
śṛṇu me prāṇināṃ cāpi mṛtyuḥ prabhavate kila | ka eṣa mṛtyurbhagavankiṃvīryabalapauruṣaḥ | etadicchāmi tattvena śrotuṃ matimatāṃ vara
मेरी सुनिए: कहते हैं कि प्राणियों पर मृत्यु भी आती है। हे भगवन्, यह मृत्यु कौन है और इसका वीर्य, बल और पौरुष कैसा है? हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, मैं इसे यथार्थ रूप में सुनना चाहता हूँ।
व्यास उवाच
श्लोक 43 (7.52.43)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा नारदो वरदः प्रभुः । आख्यानमिदमाचष्ट पुत्रशोकापहं महत् ॥
tasya tadvacanaṃ śrutvā nārado varadaḥ prabhuḥ | ākhyānamidamācaṣṭa putraśokāpahaṃ mahat
उसके वचन सुनकर वरदानी प्रभु नारद ने पुत्रशोक को हरने वाला यह महान् आख्यान कहा।
नारद उवाच
श्लोक 44 (7.52.44)
शृणु राजन्महाबाहो आख्यानं बहुविस्तरम् । यथावृत्तं श्रुतं चैव मयाऽपि वसुधाधिप ॥
śṛṇu rājanmahābāho ākhyānaṃ bahuvistaram | yathāvṛttaṃ śrutaṃ caiva mayā'pi vasudhādhipa
हे महाबाहु राजन्, जैसा हुआ और जैसा मैंने भी सुना है, वह बहुत विस्तार वाला आख्यान सुनो, हे पृथ्वीपति।
श्लोक 45 (7.52.45)
प्रजाः सृष्ट्वा तदा ब्रह्मा आदिसर्गे पितामहः । असंहृतं महातेजा दृष्ट्वा जगदिदं प्रभुः ॥
prajāḥ sṛṣṭvā tadā brahmā ādisarge pitāmahaḥ | asaṃhṛtaṃ mahātejā dṛṣṭvā jagadidaṃ prabhuḥ
आदि सृष्टि में प्रजाओं को रचकर महातेजस्वी प्रभु पितामह ब्रह्मा ने देखा कि यह जगत् संहृत नहीं हो रहा है।
श्लोक 46 (7.52.46)
तस्य चिन्ता समुत्पन्ना संहारं प्रति पार्थिव । चिन्तयन्न ह्यसौ वेद संहारं वसुधाधिप ॥
tasya cintā samutpannā saṃhāraṃ prati pārthiva | cintayanna hyasau veda saṃhāraṃ vasudhādhipa
हे राजन्, उसके मन में संहार के विषय में चिन्ता उत्पन्न हुई; पर सोचते हुए भी वह संहार का उपाय नहीं जान पाया, हे पृथ्वीपति।
श्लोक 47 (7.52.47)
तस्य रोषान्महाराज मुखेभ्योऽग्निरजायत । तेन सर्वा दिशो व्याप्ताः सान्तर्देशा दिधक्षता ॥
tasya roṣānmahārāja mukhebhyo'gnirajāyata | tena sarvā diśo vyāptāḥ sāntardeśā didhakṣatā
हे महाराज, उसके रोष से उसके मुखों से अग्नि उत्पन्न हुई; जलाने की इच्छा वाली उस अग्नि से सब दिशाएँ और उनके कोने भर गए।
श्लोक 48 (7.52.48)
ततो दिवं भुवं चैव ज्वालामालासमाकुलम् । चराचरं जगत्सर्वं ददाह भगवान्प्रभुः ॥
tato divaṃ bhuvaṃ caiva jvālāmālāsamākulam | carācaraṃ jagatsarvaṃ dadāha bhagavānprabhuḥ
तब उस भगवान् प्रभु ने ज्वाला की मालाओं से भरे स्वर्ग और पृथ्वी सहित सारे चराचर जगत् को जला डाला।
श्लोक 49 (7.52.49)
ततो हतानि भूतानि चराणि स्थावराणि च । महता क्रोधवेगेन त्रासयन्निव वीर्यवान् ॥
tato hatāni bhūtāni carāṇi sthāvarāṇi ca | mahatā krodhavegena trāsayanniva vīryavān
तब उसके क्रोध के महान् वेग से चर और स्थावर प्राणी नष्ट हो गए, मानो वह बलशाली उन्हें त्रास दे रहा हो।
श्लोक 50 (7.52.50)
ततो रुद्रो जटी स्थाणुर्निशाचरपतिर्हरः । जगाम शरणं देवं ब्रह्माणं परमेष्ठिनम् ॥
tato rudro jaṭī sthāṇurniśācarapatirharaḥ | jagāma śaraṇaṃ devaṃ brahmāṇaṃ parameṣṭhinam
तब जटाधारी रुद्र स्थाणु, निशाचरों के स्वामी हर, परमेष्ठी देव ब्रह्मा की शरण में गए।
श्लोक 51 (7.52.51)
तस्मिन्नापतिते स्थाणौ प्रजानां हितकाम्यया । अब्रवीत्परमो देवो ज्वलन्निव महामुनिः ॥
tasminnāpatite sthāṇau prajānāṃ hitakāmyayā | abravītparamo devo jvalanniva mahāmuniḥ
जब स्थाणु उनके पास आ पहुँचे, तब प्रजाओं के हित की कामना से जलते हुए-से परम देव महामुनि ब्रह्मा बोले।
ब्रह्मोवाच
श्लोक 52 (7.52.52)
किं कर्म कामं कामार्ह कामाज्जातोऽसि पुत्रक । करिष्यामि प्रियं सर्वं ब्रूहि स्थाणो यदिच्छसि ॥
kiṃ karma kāmaṃ kāmārha kāmājjāto'si putraka | kariṣyāmi priyaṃ sarvaṃ brūhi sthāṇo yadicchasi
क्या कार्य है, क्या कामना है, हे कामना के योग्य? तुम तो मेरी कामना से उत्पन्न हुए हो, पुत्र। मैं तुम्हारा सब प्रिय करूँगा; हे स्थाणु, जो चाहते हो वह कहो।