द्रोण पर्व · अध्याय 53
रुद्र की ब्रह्मा से प्रार्थना; मृत्यु की उत्पत्ति
स्थाणु (रुद्र) ब्रह्मा से प्रार्थना करते हैं कि वे अपनी रची प्रजाओं को जलाना बन्द करें। ब्रह्मा बताते हैं कि वे संहार नहीं चाहते थे; उनका क्रोध तब उत्पन्न हुआ जब भार से दबी पृथ्वी ने उन्हें संहार के लिए प्रेरित किया। रुद्र फिर कोई और उपाय खोजने की विनती करते हैं, तब ब्रह्मा अपनी अग्नि को अपने ही भीतर समेट लेते हैं और प्रवृत्ति तथा निवृत्ति का विधान करते हैं। उनकी इन्द्रियों के छिद्रों से लाल-काली, लाल आँखों और स्वर्णाभूषणों वाली एक नारी प्रकट होती है। ब्रह्मा उसे 'मृत्यु' कहकर पुकारते हैं और आदेश देते हैं कि वह ज्ञानी-अज्ञानी सब प्रजाओं का संहार करे; वह रो पड़ती है और ब्रह्मा उसके आँसू अपने हाथों में लेकर उसे समझाते हैं।
स्थाणुरुवाच
श्लोक 1 (7.53.1)
प्रजासर्गनिमित्तं हि कृतो यत्नस्त्वया विभो । त्वया सृष्टाश्च वृद्धाश्च भूतग्रामाः पृथग्विधाः ॥
prajāsarganimittaṃ hi kṛto yatnastvayā vibho | tvayā sṛṣṭāśca vṛddhāśca bhūtagrāmāḥ pṛthagvidhāḥ
हे विभो, आपने प्रजा की सृष्टि के लिए प्रयत्न किया था; आपके ही द्वारा नाना प्रकार के प्राणिसमूह रचे गए और बढ़े।
श्लोक 2 (7.53.2)
तास्तवेह पुनः क्रोधात्प्रजा नश्यन्ति सर्वशः । ता दृष्ट्वा मम कारुण्यं प्रसीद भगवन्प्रभो ॥
tāstaveha punaḥ krodhātprajā naśyanti sarvaśaḥ | tā dṛṣṭvā mama kāruṇyaṃ prasīda bhagavanprabho
अब आपके क्रोध से वे ही प्रजाएँ सब ओर नष्ट हो रही हैं। उन्हें देखकर मुझमें करुणा उत्पन्न हुई है; हे भगवन्, प्रभो, प्रसन्न होइए।
ब्रह्मोवाच
श्लोक 3 (7.53.3)
संहर्तुं न च मे काम एतदेवं भवेदिति । पृथिव्या हितकामं तु ततो मां मन्युराविशत् ॥
saṃhartuṃ na ca me kāma etadevaṃ bhavediti | pṛthivyā hitakāmaṃ tu tato māṃ manyurāviśat
मेरी इच्छा संहार करने की नहीं थी कि ऐसा हो; किन्तु पृथ्वी के हित की कामना से मुझमें क्रोध समा गया।
श्लोक 4 (7.53.4)
इयं सन्ना तदा देवी भारार्ता समचूचुदत् । संहारार्थं महादेव भारेणाभिहता सती ॥
iyaṃ sannā tadā devī bhārārtā samacūcudat | saṃhārārthaṃ mahādeva bhāreṇābhihatā satī
तब भार से पीड़ित और धँसती हुई इस देवी (पृथ्वी) ने, हे महादेव, भार से दबकर संहार के लिए मुझे प्रेरित किया।
श्लोक 5 (7.53.5)
ततोऽहं नाधिगच्छामि बुद्ध्या बहु विचारयन् । संहारमप्रमेयस्य ततो मां मन्युराविशत् ॥
tato'haṃ nādhigacchāmi buddhyā bahu vicārayan | saṃhāramaprameyasya tato māṃ manyurāviśat
तब मैंने बुद्धि से बहुत विचार किया, पर उस अप्रमेय का संहार करने का उपाय मुझे नहीं सूझा; इसीलिए मुझमें क्रोध समा गया।
रुद्र उवाच
श्लोक 6 (7.53.6)
संहारार्थं प्रसीदस्व मारुषो वसुधाधिप । मा प्रजाः स्थावराश्चैव जङ्गमाश्च व्यनीनशः ॥
saṃhārārthaṃ prasīdasva māruṣo vasudhādhipa | mā prajāḥ sthāvarāścaiva jaṅgamāśca vyanīnaśaḥ
संहार के लिए रोष न कीजिए, हे पृथ्वीपति, प्रसन्न हो जाइए। स्थावर और जंगम प्राणियों का नाश न कीजिए।
श्लोक 7 (7.53.7)
तव प्रसादाद्भगवन्निदं वर्तेत्त्रिधा जगत् । अनागतमतीतं च यच्च सम्प्रति वर्तते ॥
tava prasādādbhagavannidaṃ vartettridhā jagat | anāgatamatītaṃ ca yacca samprati vartate
हे भगवन्, आपकी कृपा से यह जगत् तीन रूपों में टिका है — जो होने वाला है, जो बीत चुका है और जो अभी है।
श्लोक 8 (7.53.8)
भगवन्क्रोधसन्दीप्तः क्रोधादग्निमवासृजत् । स दहत्यश्मकूटानि द्रुमांश्च सरितस्तथा ॥
bhagavankrodhasandīptaḥ krodhādagnimavāsṛjat | sa dahatyaśmakūṭāni drumāṃśca saritastathā
हे भगवन्, क्रोध से दहकते हुए आपने क्रोधवश अग्नि छोड़ी है। वह पर्वत-शिखरों, वृक्षों और नदियों को भी जला रही है,
श्लोक 9 (7.53.9)
पल्वलानि च सर्वाणि सर्वे चैव तृणोलपाः । स्थावरं जङ्गमं चैव निःशेषं कुरुते जगत् ॥
palvalāni ca sarvāṇi sarve caiva tṛṇolapāḥ | sthāvaraṃ jaṅgamaṃ caiva niḥśeṣaṃ kurute jagat
सब तालाबों, सब तृणों और लताओं को; वह स्थावर और जंगम सारे जगत् को निःशेष कर रही है।
श्लोक 10 (7.53.10)
तदेतद्भस्मसाद्भूतं जगत्स्थावरजङ्गमम् । प्रसीद भगवन्स त्वं रोषो न स्याद्वरो मम ॥
tadetadbhasmasādbhūtaṃ jagatsthāvarajaṅgamam | prasīda bhagavansa tvaṃ roṣo na syādvaro mama
स्थावर-जंगम यह जगत् राख हो गया है। हे भगवन्, प्रसन्न होइए; आपका रोष न रहे — यही मेरा वर है।
श्लोक 11 (7.53.11)
सर्वे हि सृष्टा नश्यन्ति तव देव कथंचन । तस्मान्निवर्ततां तेजस्त्वय्येवेदं प्रलीयताम् ॥
sarve hi sṛṣṭā naśyanti tava deva kathaṃcana | tasmānnivartatāṃ tejastvayyevedaṃ pralīyatām
हे देव, आपके रचे हुए सब प्राणी किसी न किसी प्रकार नष्ट हो रहे हैं। इसलिए यह तेज लौट आए और आप ही में लीन हो जाए।
श्लोक 12 (7.53.12)
उपायमन्यं सम्पश्य प्रजानां हितकाम्यया । यथेमे प्राणिनः सर्वे निर्वर्तेरंस्तथा कुरु ॥
upāyamanyaṃ sampaśya prajānāṃ hitakāmyayā | yatheme prāṇinaḥ sarve nirvarteraṃstathā kuru
प्रजाओं के हित की इच्छा से कोई दूसरा उपाय सोचिए, जिससे ये सब प्राणी अपने समय पर निवृत्त हो जाएँ; वैसा कीजिए।
श्लोक 13 (7.53.13)
अभावं नेह गच्छेयुरुत्सन्नजननाः प्रजाः । भवता हि नियुक्तोऽहं प्रजानां पालने विभो । दया ते न समुत्पन्ना प्रजासु विबुधेश्वर ॥
abhāvaṃ neha gaccheyurutsannajananāḥ prajāḥ | bhavatā hi niyukto'haṃ prajānāṃ pālane vibho | dayā te na samutpannā prajāsu vibudheśvara
प्रजाएँ यहाँ समाप्त न हों, उनकी सन्तान का उच्छेद न हो। हे विभो, आपने ही मुझे प्रजाओं की रक्षा में नियुक्त किया है; फिर भी हे देवेश्वर, आपके मन में प्रजा पर दया नहीं उपजी।
श्लोक 14 (7.53.14)
मा विनश्येज्जगन्नाथ जगत्स्थावरजङ्गमम् । प्रसादाभिमुखं देवं तस्मादेवं ब्रवीम्यहम् ॥
mā vinaśyejjagannātha jagatsthāvarajaṅgamam | prasādābhimukhaṃ devaṃ tasmādevaṃ bravīmyaham
हे जगन्नाथ, स्थावर-जंगम जगत् नष्ट न हो; अनुग्रह की ओर उन्मुख देव से इसीलिए मैं ऐसा कहता हूँ।
नारद उवाच
श्लोक 15 (7.53.15)
श्रुत्वा हि वचनं देवः प्रजानां हितकारणे । तेजः सन्धारयामास पुनरेवान्तरात्मनि ॥
śrutvā hi vacanaṃ devaḥ prajānāṃ hitakāraṇe | tejaḥ sandhārayāmāsa punarevāntarātmani
प्रजाओं के हित के लिए कहे उन वचनों को सुनकर देव ने अपने तेज को फिर अपने ही भीतर समेट लिया।
श्लोक 16 (7.53.16)
ततोऽग्निमुपसंहृत्य भगवाँल्लोकसत्कृतः । प्रवृत्तं च निवृत्तं च कल्पयामास वै प्रभुः ॥
tato'gnimupasaṃhṛtya bhagavām̐llokasatkṛtaḥ | pravṛttaṃ ca nivṛttaṃ ca kalpayāmāsa vai prabhuḥ
तब अग्नि को समेटकर लोकों से सम्मानित भगवान् प्रभु ने प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों का विधान किया।
श्लोक 17 (7.53.17)
उपसंहरतस्तस्य तमग्निं रोषजं तथा । प्रादुर्बभूव विश्वेभ्यो गोभ्यो नारी महात्मनः ॥
upasaṃharatastasya tamagniṃ roṣajaṃ tathā | prādurbabhūva viśvebhyo gobhyo nārī mahātmanaḥ
जब वे महात्मा अपने रोष से उत्पन्न उस अग्नि को समेट रहे थे, तब उनके सब छिद्रों से एक नारी प्रकट हुई।
श्लोक 18 (7.53.18)
कृष्णरक्ता तथा पिङ्गा रक्तजिह्वास्यलोचना । कुण्डलाभ्यां च राजेन्द्र तप्ताभ्यां तप्तभूषणा ॥
kṛṣṇaraktā tathā piṅgā raktajihvāsyalocanā | kuṇḍalābhyāṃ ca rājendra taptābhyāṃ taptabhūṣaṇā
वह काली-लाल और पिंगल वर्ण की थी, जीभ, मुख और नेत्र लाल थे; हे राजेन्द्र, वह तपाए हुए दो कुण्डलों और तपे सोने के आभूषणों से सजी थी।
श्लोक 19 (7.53.19)
सा निःसृत्य तथा खेभ्यो दक्षिणां दिशमाश्रिता । स्मयमाना च साऽवेक्ष्य देवौ विश्वेश्वरावुभौ ॥
sā niḥsṛtya tathā khebhyo dakṣiṇāṃ diśamāśritā | smayamānā ca sā'vekṣya devau viśveśvarāvubhau
उन छिद्रों से निकलकर वह दक्षिण दिशा में जा खड़ी हुई और मुसकराती हुई उन दोनों विश्वेश्वर देवों की ओर देखने लगी।
श्लोक 20 (7.53.20)
तां तु तत्र तदा देवीं ब्रह्मा लोकपितामहः । उक्तवान्मधुरं वाक्यं सान्त्वयित्वा पुनः पुनः । मृत्यो इति महीपाल जहि चेमाः प्रजा इति ॥
tāṃ tu tatra tadā devīṃ brahmā lokapitāmahaḥ | uktavānmadhuraṃ vākyaṃ sāntvayitvā punaḥ punaḥ | mṛtyo iti mahīpāla jahi cemāḥ prajā iti
तब लोकपितामह ब्रह्मा ने उस देवी से बार-बार सान्त्वना देकर मधुर वचन कहा — 'हे मृत्यु! इन प्रजाओं का संहार करो', हे महीपाल, ऐसा उन्होंने कहा।
ब्रह्मोवाच
श्लोक 21 (7.53.21)
त्वं हि संहारबुद्ध्याऽथ प्रादुर्भूता रुषो मम । तस्मात्संहर सर्वास्त्वं प्रजाः सजडपण्डिताः ॥
tvaṃ hi saṃhārabuddhyā'tha prādurbhūtā ruṣo mama | tasmātsaṃhara sarvāstvaṃ prajāḥ sajaḍapaṇḍitāḥ
तुम संहार की बुद्धि से मेरे रोष से उत्पन्न हुई हो; इसलिए मूर्खों और पण्डितों सहित इन सब प्रजाओं का संहार करो।
श्लोक 22 (7.53.22)
अविशेषेण चैव त्वं प्रजाः संहर भामिनि । मम त्वं हि नियोगेन ततः श्रेयो ह्यवाप्स्यासि ॥
aviśeṣeṇa caiva tvaṃ prajāḥ saṃhara bhāmini | mama tvaṃ hi niyogena tataḥ śreyo hyavāpsyāsi
हे भामिनी, बिना भेद किए प्रजाओं का संहार करो; मेरी आज्ञा का पालन करने से तुम परम कल्याण पाओगी।
नारद उवाच
श्लोक 23 (7.53.23)
एवमुक्ता तु सा तेन मृत्युः कमललोचना । प्रारुदद्भृशसंविग्ना प्रापतन्नश्रुबिन्दवः ॥
evamuktā tu sā tena mṛtyuḥ kamalalocanā | prārudadbhṛśasaṃvignā prāpatannaśrubindavaḥ
उनके ऐसा कहने पर कमलनयनी मृत्यु अत्यन्त व्याकुल होकर बहुत रोई और उसके आँसुओं की बूँदें गिरने लगीं।
श्लोक 24 (7.53.24)
पाणिभ्यां प्रतिजग्राह तान्यश्रूणि पितामहः । सर्वभूतहितार्थाय तां चाप्यनुनयत्तदा ॥
pāṇibhyāṃ pratijagrāha tānyaśrūṇi pitāmahaḥ | sarvabhūtahitārthāya tāṃ cāpyanunayattadā
पितामह ने उन आँसुओं को अपनी दोनों हथेलियों में ले लिया और सब प्राणियों के हित के लिए उसे भी समझाया।