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द्रोण पर्व · अध्याय 54

मृत्यु का कार्य-स्वीकार और अकम्पन को नारद की सान्त्वना

राजा अकम्पन को मृत्यु का रहस्य समझाते हुए नारद बताते हैं कि ब्रह्मा के क्रोध से उत्पन्न उस नारी ने प्राणियों को मारने से डरकर इस कार्य से छूट माँगी। अनेक तीर्थों में दीर्घ तप करने के बाद ब्रह्मा उसे आश्वासन देते हैं कि उसे कोई पाप नहीं लगेगा, और उनके हाथों में रुके आँसू प्राणियों के अपने ही भीतर से उत्पन्न व्याधियाँ बनकर उनका अन्त करेंगे। वह मान जाती है, और नारद अकम्पन से पुत्र का शोक छोड़ने को कहते हैं। अन्त में व्यास युधिष्ठिर से कहते हैं कि अभिमन्यु को स्वर्ग मिला है, इसलिए वे धैर्य धरकर फिर युद्ध के लिए तैयार हों।

अध्याय 53अध्याय-सूचीअध्याय 55

नारद उवाच

श्लोक 1 (7.54.1)

विनीय दुःखमबला आत्मन्येव प्रजापतिम् । उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा लतेवावर्जिता पुनः ॥

vinīya duḥkhamabalā ātmanyeva prajāpatim | uvāca prāñjalirbhūtvā latevāvarjitā punaḥ

अपने दुःख को अपने भीतर ही दबाकर वह अबला हाथ जोड़े, झुकी हुई लता की तरह, प्रजापति से फिर बोली।

मृत्युरुवाच

श्लोक 2 (7.54.2)

त्वया सृष्टा कथं नारी ईदृशी वदतां वर । क्रूरं कर्माहितं कुर्यां मूढेव परिजानती ॥

tvayā sṛṣṭā kathaṃ nārī īdṛśī vadatāṃ vara | krūraṃ karmāhitaṃ kuryāṃ mūḍheva parijānatī

हे वक्ताओं में श्रेष्ठ, आपने मुझ जैसी नारी की रचना कैसे कर दी? सब जानती-समझती हुई भी मैं किसी मूढ़ की तरह यह क्रूर और अहितकारी कर्म कैसे करूँ?

श्लोक 3 (7.54.3)

बिभेम्यहमधर्माद्धि प्रसीद भगवन्प्रभो । प्रियान्पुत्रान्वयस्यांश्च भ्रातॄन्मातॄः पितॄन्पतीन् ॥

bibhemyahamadharmāddhi prasīda bhagavanprabho | priyānputrānvayasyāṃśca bhrātṝnmātṝḥ pitṝnpatīn

हे भगवन्, हे प्रभो, मैं अधर्म से डरती हूँ; मुझ पर प्रसन्न हों। प्रिय पुत्रों, मित्रों, भाइयों, माताओं, पिताओं और पतियों—

श्लोक 4 (7.54.4)

अपध्यास्यन्ति ये देव मृतांस्तेभ्यो बिभेम्यहम् । कृपणानां हि रुदतां ये पतन्त्यश्रुबिन्दवः ॥

apadhyāsyanti ye deva mṛtāṃstebhyo bibhemyaham | kṛpaṇānāṃ hi rudatāṃ ye patantyaśrubindavaḥ

हे देव, उनके मर जाने पर जो लोग मेरे प्रति बुरा सोचेंगे, उनसे मैं डरती हूँ; और रोते हुए दुखियों की आँखों से जो आँसू की बूँदें गिरती हैं, उनसे भी।

श्लोक 5 (7.54.5)

तेभ्योऽहं भगवन्भीता शरणं त्वाऽहमागता । यमस्य भवनं देव गच्छेयं न सुरोत्तम ॥

tebhyo'haṃ bhagavanbhītā śaraṇaṃ tvā'hamāgatā | yamasya bhavanaṃ deva gaccheyaṃ na surottama

हे भगवन्, उन्हीं से डरकर मैं आपकी शरण में आई हूँ। हे देव, हे देवश्रेष्ठ, मुझे यम के भवन में न जाना पड़े।

श्लोक 6 (7.54.6)

कायेन विनयोपेता मूर्ध्नोदग्रनखेन च । एतदिच्छाम्यहं कामं त्वत्तो लोकपितामह ॥

kāyena vinayopetā mūrdhnodagranakhena ca | etadicchāmyahaṃ kāmaṃ tvatto lokapitāmaha

विनय से शरीर झुकाकर, सिर नवाकर और जुड़े हाथ ऊपर उठाकर, हे लोकपितामह, मैं आपसे यही वर माँगती हूँ।

श्लोक 7 (7.54.7)

इच्छेयं त्वत्प्रसादाद्धि तपस्तप्तुं प्रजेश्वर । प्रदिशेमं वरं देव त्वं मह्यं भगवन्प्रभो ॥

iccheyaṃ tvatprasādāddhi tapastaptuṃ prajeśvara | pradiśemaṃ varaṃ deva tvaṃ mahyaṃ bhagavanprabho

हे प्रजेश्वर, आपकी कृपा से मैं तप करना चाहती हूँ। हे देव, हे भगवन्, हे प्रभो, मुझे यही वर दीजिए।

श्लोक 8 (7.54.8)

त्वया ह्युक्ता गमिष्यामि धेनुकाश्रममुत्तमम् । तत्र तप्स्ये तपस्तीव्रं तवैवाराधने रता ॥

tvayā hyuktā gamiṣyāmi dhenukāśramamuttamam | tatra tapsye tapastīvraṃ tavaivārādhane ratā

आपकी आज्ञा पाकर मैं उत्तम धेनुकाश्रम को जाऊँगी। वहाँ आपकी ही आराधना में लगी हुई मैं कठोर तप करूँगी।

श्लोक 9 (7.54.9)

न हि शक्ष्यामि देवेश प्राणान्प्राणभृतां प्रियान् । हर्तुं विलपमानानामधर्मादभिरक्ष माम् ॥

na hi śakṣyāmi deveśa prāṇānprāṇabhṛtāṃ priyān | hartuṃ vilapamānānāmadharmādabhirakṣa mām

हे देवेश, विलाप करते हुए प्राणियों के प्रिय प्राण मैं नहीं हर सकूँगी। अधर्म से मेरी रक्षा कीजिए।

ब्रह्मोवाच

श्लोक 10 (7.54.10)

मृत्यो सङ्कल्पिताऽसि त्वं प्रजासंहारहेतुना । गच्छ संहर सर्वास्त्वं प्रजा मा ते विचारणा ॥

mṛtyo saṅkalpitā'si tvaṃ prajāsaṃhārahetunā | gaccha saṃhara sarvāstvaṃ prajā mā te vicāraṇā

मृत्यो, तुम प्रजा के संहार के लिए ही संकल्पित की गई हो। जाओ, सब प्राणियों का संहार करो; इसमें कोई संदेह मत रखो।

श्लोक 11 (7.54.11)

भविता त्वेतदेवं हि नैतज्जात्वन्यथा भवेत् । भव त्वनिन्दिता लोके कुरुष्व वचनं मम ॥

bhavitā tvetadevaṃ hi naitajjātvanyathā bhavet | bhava tvaninditā loke kuruṣva vacanaṃ mama

यह ऐसा ही होगा; यह कभी अन्यथा नहीं हो सकता। संसार में निर्दोष रहो और मेरा कहा करो।

नारद उवाच

श्लोक 12 (7.54.12)

एवमुक्ता भगवता प्राञ्जलिश्चाप्यवाङ्मुखी । संहारे नाकरोद्बुद्धिं प्रजानां हितकाम्यया ॥

evamuktā bhagavatā prāñjaliścāpyavāṅmukhī | saṃhāre nākarodbuddhiṃ prajānāṃ hitakāmyayā

भगवान् के ऐसा कहने पर वह हाथ जोड़े, मुख नीचा किए खड़ी रही; प्राणियों के हित की कामना से उसने संहार करने का मन नहीं बनाया।

श्लोक 13 (7.54.13)

तूष्णीमासीत्तदा देवः प्रजानामीश्वरेश्वरः । प्रसादं चागमत्क्षिप्रमात्मनैव प्रजापतिः ॥

tūṣṇīmāsīttadā devaḥ prajānāmīśvareśvaraḥ | prasādaṃ cāgamatkṣipramātmanaiva prajāpatiḥ

तब प्रजाओं के भी स्वामियों के स्वामी वे देव चुप रह गए, और प्रजापति शीघ्र ही अपने आप प्रसन्न हो गए।

श्लोक 14 (7.54.14)

स्मयमानश्च देवेशो लोकान्सर्वानवेक्ष्य च । लोकास्त्वासन्यथापूर्वं दृष्टास्तेनापमन्युना ॥

smayamānaśca deveśo lokānsarvānavekṣya ca | lokāstvāsanyathāpūrvaṃ dṛṣṭāstenāpamanyunā

देवों के स्वामी ने मुसकराते हुए सब लोकों की ओर देखा; क्रोध से रहित उनकी दृष्टि पड़ने पर लोक पहले जैसे ही हो गए।

श्लोक 15 (7.54.15)

निवृत्तरोषे तस्मिंस्तु भगवत्यपराजिते । सा कन्याऽपि जगामाऽथ समीपात्तस्य धीमतः ॥

nivṛttaroṣe tasmiṃstu bhagavatyaparājite | sā kanyā'pi jagāmā'tha samīpāttasya dhīmataḥ

उन अपराजित भगवान् का क्रोध शान्त हो जाने पर वह कन्या भी उन बुद्धिमान् के पास से चली गई।

श्लोक 16 (7.54.16)

अपसृत्याप्रतिश्रुत्य प्रजासंहरणं तदा । त्वरमाणा च राजेन्द्र मृत्युर्धेनुकमभ्यगात् ॥

apasṛtyāpratiśrutya prajāsaṃharaṇaṃ tadā | tvaramāṇā ca rājendra mṛtyurdhenukamabhyagāt

प्रजा का संहार करना स्वीकार किए बिना ही खिसककर, हे राजेन्द्र, मृत्यु उस समय शीघ्रता से धेनुक की ओर चल पड़ी।

श्लोक 17 (7.54.17)

सा तत्र परमं तीव्रं चचार व्रतमुत्तमम् । सा तदा ह्येकपादेन तस्थौ पद्मानि षोडश ॥

sā tatra paramaṃ tīvraṃ cacāra vratamuttamam | sā tadā hyekapādena tasthau padmāni ṣoḍaśa

वहाँ उसने अत्यन्त कठोर और उत्तम व्रत का आचरण किया; वह उस समय एक पैर पर सोलह पद्म खड़ी रही,

श्लोक 18 (7.54.18)

पञ्च चाब्दानि कारुण्यात्प्रजानां तु हितैषिणी । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यः प्रियेभ्यः सन्निवर्त्य सा ॥

pañca cābdāni kāruṇyātprajānāṃ tu hitaiṣiṇī | indriyāṇīndriyārthebhyaḥ priyebhyaḥ sannivartya sā

और पाँच वर्ष और, प्राणियों पर दया करके उनका हित चाहती हुई, इन्द्रियों को उनके प्रिय विषयों से हटाकर।

श्लोक 19 (7.54.19)

ततस्त्वेकेन पादेन पुनरन्यानि सप्त वै । तस्थौ पद्मानि षट् चैव सप्त चैकं च पार्थिव ॥

tatastvekena pādena punaranyāni sapta vai | tasthau padmāni ṣaṭ caiva sapta caikaṃ ca pārthiva

फिर एक पैर पर वह और सात पद्म खड़ी रही—छह पद्म, सात और एक भी—हे राजन्।

श्लोक 20 (7.54.20)

ततः पद्मायुतं तात मृगैः सह चचार सा । पुनर्गत्वा ततो नन्दां पुण्यां शीतामलोदकाम् ॥

tataḥ padmāyutaṃ tāta mṛgaiḥ saha cacāra sā | punargatvā tato nandāṃ puṇyāṃ śītāmalodakām

फिर, हे तात, वह दस हज़ार पद्म तक मृगों के साथ विचरती रही; और फिर शीतल, निर्मल जलवाली पुण्यमयी नन्दा के पास जाकर

श्लोक 21 (7.54.21)

अप्सु वर्षसहस्राणि सप्त चैकं च साऽनयत् । धारयित्वा तु नियमं नन्दायां वीतकल्मषा ॥

apsu varṣasahasrāṇi sapta caikaṃ ca sā'nayat | dhārayitvā tu niyamaṃ nandāyāṃ vītakalmaṣā

वह नन्दा के जल में सात हज़ार और एक वर्ष तक नियम धारण किए रही, निष्पाप होकर।

श्लोक 22 (7.54.22)

सा पूर्वं कौशिकीं पुण्यां जगाम नियमैधिता । तत्र वायुजलाहारा चचार नियमं पुनः ॥

sā pūrvaṃ kauśikīṃ puṇyāṃ jagāma niyamaidhitā | tatra vāyujalāhārā cacāra niyamaṃ punaḥ

इससे पहले वह नियमों में बढ़ती हुई पुण्यमयी कौशिकी के पास गई थी; वहाँ वायु और जल का ही आहार करती हुई उसने फिर से नियमों का पालन किया।

श्लोक 23 (7.54.23)

सप्तगङ्गासु सा पुण्या कन्या वेतसकेषु च । तपोविशेषैर्बहुभिः कर्षयद्देहमात्मनः ॥

saptagaṅgāsu sā puṇyā kanyā vetasakeṣu ca | tapoviśeṣairbahubhiḥ karṣayaddehamātmanaḥ

सप्तगंगा और वेतसवनों में उस पुण्यशीला कन्या ने अनेक विशेष तपों से अपने शरीर को सुखा डाला।

श्लोक 24 (7.54.24)

ततो गत्वा तु सा गङ्गां महामेरुं च केवलम् । तस्थौ चाश्मेव निश्चेष्टा प्राणायामपरायणा ॥

tato gatvā tu sā gaṅgāṃ mahāmeruṃ ca kevalam | tasthau cāśmeva niśceṣṭā prāṇāyāmaparāyaṇā

फिर वह गंगा और केवल महामेरु पर गई, और पत्थर की तरह निश्चल खड़ी रही; प्राणायाम में ही लगी रही।

श्लोक 25 (7.54.25)

पुनर्हिमवतो मूर्ध्नि यत्र देवाः पुराऽयजन् । तत्राङ्गुष्ठेन सा तस्थौ निखर्वं परमा शुभा ॥

punarhimavato mūrdhni yatra devāḥ purā'yajan | tatrāṅguṣṭhena sā tasthau nikharvaṃ paramā śubhā

फिर हिमालय की चोटी पर, जहाँ पहले देवताओं ने यज्ञ किया था, वह परम शुभा अँगूठे के बल पर एक निखर्व तक खड़ी रही।

श्लोक 26 (7.54.26)

पुष्करेष्वथ गोकर्णे नैमिषे मलये तथा । अकर्शयत्स्वकं देहं नियमैर्मानसप्रियैः ॥

puṣkareṣvatha gokarṇe naimiṣe malaye tathā | akarśayatsvakaṃ dehaṃ niyamairmānasapriyaiḥ

पुष्कर, गोकर्ण, नैमिष और मलय में भी उसने अपने मन को प्रिय नियमों से अपना शरीर कृश किया।

श्लोक 27 (7.54.27)

अनन्यदेवता नित्यं दृढभक्ता पितामहे । तस्थौ पितामहं चैव तोषयामास धर्मतः ॥

ananyadevatā nityaṃ dṛḍhabhaktā pitāmahe | tasthau pitāmahaṃ caiva toṣayāmāsa dharmataḥ

किसी अन्य देवता को न मानने वाली, पितामह में दृढ़ भक्ति रखने वाली वह वहीं टिकी रही और धर्मपूर्वक पितामह को प्रसन्न कर लिया।

श्लोक 28 (7.54.28)

ततस्तामब्रवीत्प्रीतो लोकानां प्रभवोऽव्ययः । सौम्येन मनसा राजन्प्रीतः प्रीतमनास्तदा ॥

tatastāmabravītprīto lokānāṃ prabhavo'vyayaḥ | saumyena manasā rājanprītaḥ prītamanāstadā

तब लोकों के उत्पत्तिस्थान, अविनाशी पितामह ने प्रसन्न होकर, हे राजन्, सौम्य मन और प्रसन्न चित्त से उससे कहा:

श्लोक 29 (7.54.29)

मृत्यो किमिदमत्यन्तं तपांसि चरसीति ह । ततोऽब्रवीत्पुनर्मृत्युर्भगवन्तं पितामहम् ॥

mṛtyo kimidamatyantaṃ tapāṃsi carasīti ha | tato'bravītpunarmṛtyurbhagavantaṃ pitāmaham

'मृत्यो, यह अत्यन्त तप तुम क्यों कर रही हो?' तब मृत्यु ने भगवान् पितामह से फिर कहा।

मृत्युरुवाच

श्लोक 30 (7.54.30)

नाऽहं हन्यां प्रजा देव स्वस्थाश्चाक्रोशतीस्तथा । एतदिच्छामि सर्वेश त्वत्तो वरमहं प्रभो ॥

nā'haṃ hanyāṃ prajā deva svasthāścākrośatīstathā | etadicchāmi sarveśa tvatto varamahaṃ prabho

हे देव, स्वस्थ और चीखती-चिल्लाती प्रजा को मैं नहीं मारूँगी। हे सर्वेश्वर, मैं आपसे यही वर चाहती हूँ।

श्लोक 31 (7.54.31)

अधर्मभयभीताऽस्मि ततोऽहं तप आस्थिता । भीतायास्तु महाभाग प्रयच्छाभयमव्यय ॥

adharmabhayabhītā'smi tato'haṃ tapa āsthitā | bhītāyāstu mahābhāga prayacchābhayamavyaya

मैं अधर्म के भय से डरी हुई हूँ, इसी कारण मैंने तप का आश्रय लिया है। हे महाभाग, हे अविनाशी, मुझ भयभीत को अभय दीजिए।

नारद उवाच

श्लोक 32 (7.54.32)

आर्ता चानागसी नारी याचामि भव मे गतिः । तामब्रवीत्ततो देवो भूतभव्यभविष्यवित् ॥

ārtā cānāgasī nārī yācāmi bhava me gatiḥ | tāmabravīttato devo bhūtabhavyabhaviṣyavit

'मैं पीड़ित और निर्दोष नारी हूँ, आपसे याचना करती हूँ—आप मेरी शरण बनें।' तब भूत, भविष्य और वर्तमान को जानने वाले देव ने उससे कहा:

ब्रह्मोवाच

श्लोक 33 (7.54.33)

अधर्मो नास्ति ते मृत्यो संहरन्त्या इमाः प्रजाः । मया चोक्तं मृषा भद्रे भविता न कथञ्चन ॥

adharmo nāsti te mṛtyo saṃharantyā imāḥ prajāḥ | mayā coktaṃ mṛṣā bhadre bhavitā na kathañcana

मृत्यो, इन प्रजाओं का संहार करते हुए तुम्हें अधर्म नहीं लगेगा। मैंने जो कहा है, हे भद्रे, वह किसी प्रकार मिथ्या नहीं होगा।

श्लोक 34 (7.54.34)

तस्मात्संहर कल्याणि प्रजाः सर्वाश्चतुर्विधाः । धर्मः सनातनश्च त्वां सर्वथा पावयिष्यति ॥

tasmātsaṃhara kalyāṇi prajāḥ sarvāścaturvidhāḥ | dharmaḥ sanātanaśca tvāṃ sarvathā pāvayiṣyati

इसलिए, हे कल्याणी, चारों प्रकार के सब प्राणियों का संहार करो; सनातन धर्म सब प्रकार से तुम्हें पवित्र करेगा।

श्लोक 35 (7.54.35)

लोकपालो यमश्चैव सहाया व्याधयश्च ते । अहं च विबुधाश्चैव पुनर्दास्याम ते वरम् ॥

lokapālo yamaścaiva sahāyā vyādhayaśca te | ahaṃ ca vibudhāścaiva punardāsyāma te varam

लोकपाल यम और व्याधियाँ तुम्हारे सहायक होंगे; मैं और देवता तुम्हें फिर एक वर देंगे—

श्लोक 36 (7.54.36)

यथा त्वमेनसा मुक्ता विरजाः ख्यातिमेष्यसि ॥

yathā tvamenasā muktā virajāḥ khyātimeṣyasi

जिससे तुम पाप से मुक्त होकर निर्मल बनोगी और यश पाओगी।

नारद उवाच

श्लोक 37 (7.54.37)

सैवमुक्ता महाराज कृताञ्जलिरिदं विभुम् । पुनरेवाब्रवीद्वाक्यं प्रसाद्य शिरसा तदा । यद्येवमेतत्कर्तव्यं धर्मतो नास्त्यतो भयम् ॥

saivamuktā mahārāja kṛtāñjaliridaṃ vibhum | punarevābravīdvākyaṃ prasādya śirasā tadā | yadyevametatkartavyaṃ dharmato nāstyato bhayam

हे महाराज, इस प्रकार कहे जाने पर उसने हाथ जोड़ सिर झुकाकर विभु को प्रसन्न किया और उनसे फिर यह वचन कहा: 'यदि ऐसा ही करना है, तो धर्म के अनुसार होने से इसमें मुझे कोई भय नहीं।'

मृत्युरुवाच

श्लोक 38 (7.54.38)

तवाज्ञा मूर्ध्नि मे न्यस्ता यत्ते वक्ष्यामि तच्छृणु । लोभः क्रोधोऽभ्यसूयेर्ष्या द्रोहो मोहश्च देहिनां ॥

tavājñā mūrdhni me nyastā yatte vakṣyāmi tacchṛṇu | lobhaḥ krodho'bhyasūyerṣyā droho mohaśca dehināṃ

आपकी आज्ञा मैंने सिर पर धारण कर ली है; मैं जो कहती हूँ, सुनिए। देहधारियों के लोभ, क्रोध, असूया, ईर्ष्या, द्रोह और मोह,

श्लोक 39 (7.54.39)

अह्रीश्चान्योन्यपरुषा देहं भिन्द्युः पृथग्विधाः ॥

ahrīścānyonyaparuṣā dehaṃ bhindyuḥ pṛthagvidhāḥ

लज्जाहीनता और एक-दूसरे के प्रति कठोर वाणी—ये नाना प्रकार के दोष ही उनके शरीर को तोड़ेंगे।

ब्रह्मोवाच

श्लोक 40 (7.54.40)

तथा भविष्यते मृत्यो साधु संहर भोः प्रजाः । अधर्मस्ते न भविता नापध्यास्याम्यहं शुभे ॥

tathā bhaviṣyate mṛtyo sādhu saṃhara bhoḥ prajāḥ | adharmaste na bhavitā nāpadhyāsyāmyahaṃ śubhe

मृत्यो, ऐसा ही होगा; अच्छा, तो प्रजा का संहार करो। तुम्हें अधर्म नहीं लगेगा, और हे शुभे, मैं भी तुम्हारे प्रति बुरा भाव नहीं रखूँगा।

श्लोक 41 (7.54.41)

यान्यश्रुबिन्दूनि करे ममासंस् । ते व्याधयः प्राणिनामात्मजाताः । ते मारयिष्यन्ति नरान्गतासून् । नाधर्मस्ते भविता मा स्म भैषीः ॥

yānyaśrubindūni kare mamāsaṃs | te vyādhayaḥ prāṇināmātmajātāḥ | te mārayiṣyanti narāngatāsūn | nādharmaste bhavitā mā sma bhaiṣīḥ

मेरे हाथ में जो आँसू की बूँदें थीं, वे ही व्याधियाँ होंगी, जो प्राणियों के अपने ही भीतर से उत्पन्न होंगी। वे निष्प्राणप्राय मनुष्यों को मारेंगी। तुम्हें अधर्म नहीं लगेगा; डरो मत।

श्लोक 42 (7.54.42)

नाधर्मस्ते भविता प्राणिनां वै । त्वं वै धर्मस्त्वं हि धर्मस्य चेशा । धर्म्या भूत्वा धर्मनित्या धरित्री । तस्मात्प्राणान्सर्वथेमान्नियच्छ ॥

nādharmaste bhavitā prāṇināṃ vai | tvaṃ vai dharmastvaṃ hi dharmasya ceśā | dharmyā bhūtvā dharmanityā dharitrī | tasmātprāṇānsarvathemānniyaccha

प्राणियों के विषय में तुम्हें अधर्म नहीं लगेगा। तुम ही धर्म हो, तुम ही धर्म की स्वामिनी हो; धर्मपरायण और सदा धर्म में रत रहकर, पृथ्वी को धारण करने वाली होकर, इसलिए इन प्राणों को सब प्रकार से नियन्त्रित करो।

श्लोक 43 (7.54.43)

सर्वेषां वै प्राणिनां कामरोषौ । सन्त्यज्य त्वं संहरस्वेह जीवान् । एवं धर्मस्ते भविष्यत्यनन्तो । मिथ्यावृत्तं मारयिष्यत्यधर्मः ॥

sarveṣāṃ vai prāṇināṃ kāmaroṣau | santyajya tvaṃ saṃharasveha jīvān | evaṃ dharmaste bhaviṣyatyananto | mithyāvṛttaṃ mārayiṣyatyadharmaḥ

सब प्राणियों के प्रति काम और रोष को छोड़कर तुम यहाँ जीवों का संहार करो। इस प्रकार तुम्हारा धर्म अनन्त होगा; और जो मिथ्या आचरण करता है, उसे अधर्म मार डालेगा।

श्लोक 44 (7.54.44)

तेनात्मानं पावयस्वात्मना त्वं । पापेऽऽत्मानं मज्जयिष्यन्त्यसत्यात् । तस्मात्कामं रोषमप्यागतं त्वं । सन्त्यज्यान्तः संहरस्वेति जीवान् ॥

tenātmānaṃ pāvayasvātmanā tvaṃ | pāpe''tmānaṃ majjayiṣyantyasatyāt | tasmātkāmaṃ roṣamapyāgataṃ tvaṃ | santyajyāntaḥ saṃharasveti jīvān

इसी से तुम अपने आप को अपने ही द्वारा पवित्र करो। असत्य के कारण लोग अपने को पाप में डुबो देंगे। इसलिए आए हुए काम और क्रोध को भी भीतर से त्यागकर जीवों का संहार करो।

नारद उवाच

श्लोक 45 (7.54.45)

सा वै भीमा मृत्युसंज्ञोपदेशाच् । छापाद्भीता बाढमित्यब्रवीत्तम् । सा च प्राणं प्राणिनामन्तकाले । कामक्रोधौ त्यज्य हरत्यसक्ता ॥

sā vai bhīmā mṛtyusaṃjñopadeśāc | chāpādbhītā bāḍhamityabravīttam | sā ca prāṇaṃ prāṇināmantakāle | kāmakrodhau tyajya haratyasaktā

मृत्यु नाम के उपदेश और शाप से भयभीत उस भयंकर देवी ने उनसे 'ऐसा ही हो' कहा; और वह प्राणियों के अन्तकाल में काम और क्रोध को छोड़कर, अनासक्त होकर उनके प्राण हर लेती है।

श्लोक 46 (7.54.46)

मृत्युस्त्वेषां व्याधयस्तत्प्रसूता । व्याधी रोगो रुज्यते येन जन्तुः । सर्वेषां च प्राणिनां प्रायणान्ते । तस्माच्छोकं माकृथा निष्फलं त्वम् ॥

mṛtyustveṣāṃ vyādhayastatprasūtā | vyādhī rogo rujyate yena jantuḥ | sarveṣāṃ ca prāṇināṃ prāyaṇānte | tasmācchokaṃ mākṛthā niṣphalaṃ tvam

इन प्राणियों के लिए मृत्यु और उससे उत्पन्न व्याधियाँ एक ही हैं; व्याधि वह है जिससे प्राणी पीड़ित होता है, और यह सभी प्राणियों के जीवन के अन्त में होती है। इसलिए आप व्यर्थ शोक मत कीजिए।

श्लोक 47 (7.54.47)

सर्वे देवाः प्राणिभिः प्रायणान्ते । गत्वा वृत्ताः सन्निवृत्तास्तथैव । एवं सर्वे प्राणिनस्तत्र गत्वा । वृत्ता देवा मर्त्यवद्राजसिंह ॥

sarve devāḥ prāṇibhiḥ prāyaṇānte | gatvā vṛttāḥ sannivṛttāstathaiva | evaṃ sarve prāṇinastatra gatvā | vṛttā devā martyavadrājasiṃha

जीवन के अन्त में सभी देवता प्राणियों के साथ जाकर वैसे ही लौट आते हैं। इसी प्रकार, हे राजसिंह, सब प्राणी वहाँ जाकर जीवित रहते हैं, और देवता भी मनुष्यों की भाँति ही रहते हैं।

श्लोक 48 (7.54.48)

वायुर्भीमो भीमनादो महौजा । भेत्ता देहान्प्राणिनां सर्वगोऽसौ । नो वा वृत्तिं कदाचित् । प्राप्नोत्युग्रोऽनन्ततेजोविशिष्टः ॥

vāyurbhīmo bhīmanādo mahaujā | bhettā dehānprāṇināṃ sarvago'sau | no vā vṛttiṃ kadācit | prāpnotyugro'nantatejoviśiṣṭaḥ

भयंकर वायु, जो भीषण गर्जना वाला और महान् बलशाली है, प्राणियों के शरीरों को तोड़ता है और सर्वत्र जाता है; उग्र और अनन्त तेज से विशिष्ट वह कभी विश्राम नहीं पाता।

श्लोक 49 (7.54.49)

सर्वे देवा मर्त्यसंज्ञाविशिष्टास् । तस्मात्पुत्रं माशुचो राजसिंह । स्वर्गं प्राप्तो मोदते ते तनूजो । नित्यं रम्यान्वीरलोकानवाप्य ॥

sarve devā martyasaṃjñāviśiṣṭās | tasmātputraṃ māśuco rājasiṃha | svargaṃ prāpto modate te tanūjo | nityaṃ ramyānvīralokānavāpya

सभी देवता भी मर्त्य नाम से ही जाने जाते हैं। इसलिए, हे राजसिंह, अपने पुत्र के लिए शोक न कीजिए। आपका पुत्र स्वर्ग पाकर आनन्द कर रहा है; वीरों के सुन्दर लोक उसे सदा के लिए मिल गए हैं।

श्लोक 50 (7.54.50)

त्यक्त्वा दुःखं सङ्गतः पुण्यकृद्भिर् । एषा मृत्युर्देवदिष्टा प्रजानाम् । प्राप्ते काले संहरन्ती यथावत् । स्वयं कृता प्राणहरा प्रजानाम् ॥

tyaktvā duḥkhaṃ saṅgataḥ puṇyakṛdbhir | eṣā mṛtyurdevadiṣṭā prajānām | prāpte kāle saṃharantī yathāvat | svayaṃ kṛtā prāṇaharā prajānām

दुःख त्यागकर वह पुण्यात्माओं के साथ जा मिला है। यह मृत्यु देवताओं द्वारा प्रजा के लिए निर्दिष्ट है; समय आने पर वह यथोचित रूप से संहार करती है, और वह प्राणियों के अपने ही कर्मों से रची हुई, उनके प्राण हरने वाली है।

श्लोक 51 (7.54.51)

आत्मानं वै प्राणिनो घ्नन्ति सर्वे । नैनं मृत्युर्दण्डपाणिर्हिनस्ति । तस्मान्मृतान्नानुशोचन्ति धीराः । तत्त्वं ज्ञात्वा निश्चयं ब्रह्मसृष्टम् । पुत्रान्नष्टाच्छोकमाशु त्यजस्व ॥

ātmānaṃ vai prāṇino ghnanti sarve | nainaṃ mṛtyurdaṇḍapāṇirhinasti | tasmānmṛtānnānuśocanti dhīrāḥ | tattvaṃ jñātvā niścayaṃ brahmasṛṣṭam | putrānnaṣṭācchokamāśu tyajasva

सभी प्राणी स्वयं अपना ही घात करते हैं; दण्ड हाथ में लिए मृत्यु उन्हें नहीं मारती। इसीलिए धीर पुरुष मरे हुओं के लिए शोक नहीं करते, ब्रह्मा द्वारा रचे इस निश्चित विधान के तत्त्व को जानकर। अपने खोए हुए पुत्र के शोक को शीघ्र छोड़ दीजिए।

द्वैपायन उवाच

श्लोक 52 (7.54.52)

एतच्छ्रुत्वार्थवद्वाक्यं नारदेन प्रकाशितम् । उवाचाकम्पनो राजा सखायं नारदं तथा ॥

etacchrutvārthavadvākyaṃ nāradena prakāśitam | uvācākampano rājā sakhāyaṃ nāradaṃ tathā

नारद द्वारा कहे गए इस अर्थपूर्ण वचन को सुनकर राजा अकम्पन ने अपने मित्र नारद से कहा।

अकम्पन उवाच

श्लोक 53 (7.54.53)

व्यपेतशोकः प्रीतोऽस्मि भगवन्नृषिसत्तम । श्रुत्वेतिहासं त्वत्तस्तु कृतार्थोऽस्म्यभिवादये ॥

vyapetaśokaḥ prīto'smi bhagavannṛṣisattama | śrutvetihāsaṃ tvattastu kṛtārtho'smyabhivādaye

हे भगवन्, हे ऋषिश्रेष्ठ, मेरा शोक दूर हो गया है और मैं प्रसन्न हूँ। आपसे यह इतिहास सुनकर मैं कृतार्थ हो गया हूँ; आपको प्रणाम करता हूँ।

द्वैपायन उवाच

श्लोक 54 (7.54.54)

तथोक्तो नारदस्तेन राज्ञा देवर्षिसत्तमः । जगाम नन्दनं शीघ्रमशोकवनमात्मनः ॥

tathokto nāradastena rājñā devarṣisattamaḥ | jagāma nandanaṃ śīghramaśokavanamātmanaḥ

राजा के ऐसा कहने पर देवर्षियों में श्रेष्ठ नारद शीघ्र ही नन्दन में अपने अशोकवन को चले गए।

श्लोक 55 (7.54.55)

पुण्यं यशस्यं स्वर्ग्यं च धन्यमायुष्यमेव च । अस्येतिहासस्य सदा श्रवणं श्रावणं तथा ॥

puṇyaṃ yaśasyaṃ svargyaṃ ca dhanyamāyuṣyameva ca | asyetihāsasya sadā śravaṇaṃ śrāvaṇaṃ tathā

इस इतिहास को सुनना और सुनाना सदा पुण्य देने वाला, यश बढ़ाने वाला, स्वर्ग दिलाने वाला, धन्य और आयु बढ़ाने वाला है।

श्लोक 56 (7.54.56)

एतदर्थपदं श्रुत्वा तदा राजा युधिष्ठिर । क्षत्रधर्मं च विज्ञाय शूराणां च परां गतिम् । सम्प्राप्तोऽसौ महावीर्यः स्वर्गलोकं महारथः ॥

etadarthapadaṃ śrutvā tadā rājā yudhiṣṭhira | kṣatradharmaṃ ca vijñāya śūrāṇāṃ ca parāṃ gatim | samprāpto'sau mahāvīryaḥ svargalokaṃ mahārathaḥ

हे राजा युधिष्ठिर, अब आपने यह कथन सुन लिया और क्षत्रिय-धर्म तथा शूरों की परम गति को समझ लिया: वह महापराक्रमी महारथी स्वर्गलोक को पहुँच गया है।

श्लोक 57 (7.54.57)

अभिमन्युः परान्हत्वा प्रमुखे सर्वधन्विनाम् । युध्यमानो महेष्वासो हतः सोऽभिमुखो रणे ॥

abhimanyuḥ parānhatvā pramukhe sarvadhanvinām | yudhyamāno maheṣvāso hataḥ so'bhimukho raṇe

अभिमन्यु शत्रुओं को सब धनुर्धारियों के सामने मारकर, युद्ध करता हुआ वह महान् धनुर्धर रण में सामने से लड़ते हुए मारा गया,

श्लोक 58 (7.54.58)

असिना गदया शक्त्या धनुषा च महारथः । विरजाः सोमसूनुः स पुनस्तत्र प्रलीयते ॥

asinā gadayā śaktyā dhanuṣā ca mahārathaḥ | virajāḥ somasūnuḥ sa punastatra pralīyate

तलवार, गदा, शक्ति और धनुष से लड़ने वाला वह महारथी, निर्मल सोमपुत्र, फिर वहीं विलीन हो जाता है।

श्लोक 59 (7.54.59)

तस्मात्परां धृतिं कृत्वा भ्रातृभिः सह पाण्डव । अप्रमत्तः सुसन्नद्धः शीघ्रं योद्धुमुपाक्रम ॥

tasmātparāṃ dhṛtiṃ kṛtvā bhrātṛbhiḥ saha pāṇḍava | apramattaḥ susannaddhaḥ śīghraṃ yoddhumupākrama

इसलिए हे पाण्डव, अपने भाइयों के साथ परम धैर्य धारण करके सावधान और कवच आदि से सुसज्जित होकर शीघ्र युद्ध के लिए चलो।

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