Skip to main content

द्रोण पर्व · अध्याय 55

सृञ्जय का स्वर्णमय पुत्र और मरुत्त की मृत्यु

युधिष्ठिर के अनुरोध पर व्यास सोलह राजाओं की कथा सृञ्जय से आरम्भ करते हैं। सृञ्जय के घर ठहरे नारद और पर्वत उसकी कन्या को लेकर एक-दूसरे को शाप देते हैं, फिर नारद राजा को ऐसा पुत्र दिलाते हैं जिसके शरीर से सोना निकलता है। डाकू उस बालक को उठा ले जाकर मार डालते हैं, पर उन्हें कुछ नहीं मिलता; तब नारद शोकाकुल पिता को स्मरण कराते हैं कि अपरिमित यज्ञ करने वाले राजा मरुत्त भी मर गए।

अध्याय 54अध्याय-सूचीअध्याय 56

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.55.1)

श्रुत्वा मृत्युसमुत्पत्तिं कर्माण्यनुपमानि च । धर्मराजः पुनर्वाक्यं प्रसाद्यैनमथाब्रवीत् ॥

śrutvā mṛtyusamutpattiṃ karmāṇyanupamāni ca | dharmarājaḥ punarvākyaṃ prasādyainamathābravīt

मृत्यु की उत्पत्ति और उसके अनुपम कर्मों को सुनकर धर्मराज ने उन्हें फिर प्रसन्न करके कहा:

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 2 (7.55.2)

गुरवः पुण्यकर्माणः शक्रप्रतिमविक्रमाः । पूर्वं राजर्षयो ब्रह्मन्कियन्तो मृत्युना हताः ॥

guravaḥ puṇyakarmāṇaḥ śakrapratimavikramāḥ | pūrvaṃ rājarṣayo brahmankiyanto mṛtyunā hatāḥ

हे ब्रह्मन्, पुण्यकर्म करने वाले, इन्द्र के समान पराक्रमी, पूज्य प्राचीन राजर्षि कितने ही मृत्यु के हाथों मारे गए?

श्लोक 3 (7.55.3)

भूय एव तु मां तथ्यैर्वचोभिरभिबृंहय । राजर्षीणां पुराणानां समाश्वासय कर्मभिः ॥

bhūya eva tu māṃ tathyairvacobhirabhibṛṃhaya | rājarṣīṇāṃ purāṇānāṃ samāśvāsaya karmabhiḥ

सच्चे वचनों से मुझे फिर बल दीजिए; प्राचीन राजर्षियों के कर्म सुनाकर मुझे सान्त्वना दीजिए।

श्लोक 4 (7.55.4)

कियन्त्यो दक्षिणा दत्ताः काश्च दत्ता महात्मभिः । राजर्षिभिः पुण्यकृद्भिस्तद्भवान्प्रब्रवीतु मे ॥

kiyantyo dakṣiṇā dattāḥ kāśca dattā mahātmabhiḥ | rājarṣibhiḥ puṇyakṛdbhistadbhavānprabravītu me

उन महात्मा, पुण्यात्मा राजर्षियों ने कितनी दक्षिणाएँ दीं और कौन-कौन सी दीं? वह सब आप मुझे बताइए।

व्यास उवाच

श्लोक 5 (7.55.5)

अन्येऽपि यज्वनां लोका अन्ये चापि तपस्विनाम् । क्षमावतां च त्रींल्लोकाञ्शूरा गच्छन्ति भारत ॥

anye'pi yajvanāṃ lokā anye cāpi tapasvinām | kṣamāvatāṃ ca trīṃllokāñśūrā gacchanti bhārata

यज्ञ करने वालों के लोक और हैं, तपस्वियों के और; और हे भारत, शूरवीर क्षमाशीलों के तीनों लोकों को जाते हैं।

श्लोक 6 (7.55.6)

क्षत्रियस्य तु सङ्ग्रामे शत्रून्हत्वा हतस्य वा । फलमत्यन्तमित्याहुर्धर्मशास्त्रविदो जनाः ॥

kṣatriyasya tu saṅgrāme śatrūnhatvā hatasya vā | phalamatyantamityāhurdharmaśāstravido janāḥ

धर्मशास्त्र के जानकार कहते हैं कि युद्ध में शत्रुओं को मारने वाले अथवा स्वयं मारे जाने वाले क्षत्रिय को अनन्त फल मिलता है।

श्लोक 7 (7.55.7)

वेदविद्याव्रतस्नाता यज्वानः पुत्रिणश्च ये । तेभ्यः परार्थ्या यज्वानो यज्वभ्यश्च तनुत्यजः ॥

vedavidyāvratasnātā yajvānaḥ putriṇaśca ye | tebhyaḥ parārthyā yajvāno yajvabhyaśca tanutyajaḥ

वेद-विद्या और व्रत पूर्ण कर स्नातक हुए, यज्ञ करने वाले और पुत्रवान् जो भी हों—उनसे श्रेष्ठ यज्ञ करने वाले माने गए हैं, और यज्ञ करने वालों से श्रेष्ठ वे हैं जो अपने शरीर का त्याग करते हैं।

श्लोक 8 (7.55.8)

स वीरो यज्वनो नित्यं क्षत्रियानार्जुनिर्गतः । लोकान्पुण्यतमानिष्टानिति विद्धि विशाम्पते ॥

sa vīro yajvano nityaṃ kṣatriyānārjunirgataḥ | lokānpuṇyatamāniṣṭāniti viddhi viśāmpate

अर्जुन का वह वीर पुत्र सदा यज्ञ करने वाले क्षत्रियों के परम पवित्र और अभीष्ट लोकों में पहुँच गया है—हे विशाम्पते, यह जान लो।

श्लोक 9 (7.55.9)

सर्वेषां नृपसिंहानां शृणु यज्ञान्नृपोत्तम । तानतिक्रम्य गच्छन्ति स्वर्गकामास्तनुत्यजः ॥

sarveṣāṃ nṛpasiṃhānāṃ śṛṇu yajñānnṛpottama | tānatikramya gacchanti svargakāmāstanutyajaḥ

हे नृपश्रेष्ठ, सब राजसिंहों के यज्ञों के विषय में सुनो; स्वर्ग चाहने वाले, शरीर का त्याग करने वाले उन सबको लाँघकर आगे निकल जाते हैं।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 10 (7.55.10)

सर्वेषां यज्वनां यज्ञं श्रोतुमिच्छामि सुव्रत । दक्षिणाश्चानुरूपेभ्यो दत्ता राजर्षिसत्तमैः ॥

sarveṣāṃ yajvanāṃ yajñaṃ śrotumicchāmi suvrata | dakṣiṇāścānurūpebhyo dattā rājarṣisattamaiḥ

हे सुव्रत, मैं सब यज्ञ करने वालों के यज्ञों के विषय में सुनना चाहता हूँ, और यह भी कि श्रेष्ठ राजर्षियों ने योग्य पात्रों को कौन-सी दक्षिणाएँ दीं।

व्यास उवाच

श्लोक 11 (7.55.11)

शैब्यस्य नृपतेः पुत्रः सृञ्जयो नाम नामतः । सखायौ तस्य चेवोभौ ऋषी पर्वतनारदौ ॥

śaibyasya nṛpateḥ putraḥ sṛñjayo nāma nāmataḥ | sakhāyau tasya cevobhau ṛṣī parvatanāradau

राजा शैब्य का पुत्र सृञ्जय नाम से प्रसिद्ध था; पर्वत और नारद, दोनों ऋषि, उसके मित्र थे।

श्लोक 12 (7.55.12)

तौ कदाचिद्गृहं तस्य प्रविष्टौ तद्दिदृक्षया । विधिवच्चार्चितौ तेन प्रीतौ तत्रोषतुः सुखम् ॥

tau kadācidgṛhaṃ tasya praviṣṭau taddidṛkṣayā | vidhivaccārcitau tena prītau tatroṣatuḥ sukham

एक बार वे दोनों उससे मिलने की इच्छा से उसके घर में आए; उसने विधिपूर्वक उनका सत्कार किया, और वे प्रसन्न होकर वहाँ सुख से रहे।

श्लोक 13 (7.55.13)

तं कदाचित्सुखासीनं ताभ्यां सह शुचिस्मिता । दुहिताऽभ्यागमत्कन्या सृञ्जयं वरवर्णिनी ॥

taṃ kadācitsukhāsīnaṃ tābhyāṃ saha śucismitā | duhitā'bhyāgamatkanyā sṛñjayaṃ varavarṇinī

एक बार जब वह उन दोनों के साथ सुख से बैठा था, तब उसकी मनोहर मुसकान और सुन्दर वर्णवाली कन्या उसके पास आई।

श्लोक 14 (7.55.14)

तयाऽभिवादितः कन्यामभ्यनन्दद्यथाविधि । तत्सलिङ्गाभिराशीर्भिरिष्टाभिरभितः स्थिताम् ॥

tayā'bhivāditaḥ kanyāmabhyanandadyathāvidhi | tatsaliṅgābhirāśīrbhiriṣṭābhirabhitaḥ sthitām

उसके प्रणाम करने पर सृञ्जय ने पास खड़ी उस कन्या का विधिपूर्वक अभिनन्दन किया और उसके योग्य, इष्ट आशीर्वाद दिए।

श्लोक 15 (7.55.15)

तां निरीक्ष्याब्रवीद्वाक्यं पर्वतः प्रहसन्निव । कस्येयं चञ्चलापाङ्गी सर्वलक्षणसम्मता ॥

tāṃ nirīkṣyābravīdvākyaṃ parvataḥ prahasanniva | kasyeyaṃ cañcalāpāṅgī sarvalakṣaṇasammatā

उसे देखकर पर्वत ने मानो हँसते हुए कहा: 'चंचल कटाक्षोंवाली, सब शुभ लक्षणों से युक्त यह कन्या किसकी है?'

पर्वत उवाच

श्लोक 16 (7.55.16)

उषा स्विद्भाः स्विदर्कस्य ज्वलनस्य शिखापि वा । श्रीर्ह्रीः कीर्तिर्धृतिः पुष्टिः सिद्धिश्चन्द्रमसः प्रभा ॥

uṣā svidbhāḥ svidarkasya jvalanasya śikhāpi vā | śrīrhrīḥ kīrtirdhṛtiḥ puṣṭiḥ siddhiścandramasaḥ prabhā

'क्या यह उषा है, या सूर्य की प्रभा, या अग्नि की लपट? क्या यह श्री है, ह्री, कीर्ति, धृति, पुष्टि, सिद्धि, या चन्द्रमा की चाँदनी?'

सञ्जय उवाच

श्लोक 17 (7.55.17)

एवं ब्रुवाणं देवर्षिं नृपतिः सृञ्जयोऽब्रवीत् । ममेयं भगवन्कन्या वर्या वरमभीप्सति ॥

evaṃ bruvāṇaṃ devarṣiṃ nṛpatiḥ sṛñjayo'bravīt | mameyaṃ bhagavankanyā varyā varamabhīpsati

ऐसा कहते हुए देवर्षि से राजा सृञ्जय ने कहा: 'भगवन्, यह मेरी कन्या है; यह वरण करने योग्य है और पति चाहती है।'

श्लोक 18 (7.55.18)

नारदस्त्वब्रवीदेनं देहि मह्यमिमां नृप । भार्यार्थं सुमहच्छ्रेयः प्राप्तुं चेदिच्छसे नृप ॥

nāradastvabravīdenaṃ dehi mahyamimāṃ nṛpa | bhāryārthaṃ sumahacchreyaḥ prāptuṃ cedicchase nṛpa

तब नारद ने उससे कहा: 'हे राजन्, यह कन्या मुझे पत्नी के रूप में दे दो, यदि तुम अत्यन्त महान् कल्याण पाना चाहते हो।'

श्लोक 19 (7.55.19)

ददानीत्येवं संहृष्टः सृञ्जयः प्राह नारदम् ॥

dadānītyevaṃ saṃhṛṣṭaḥ sṛñjayaḥ prāha nāradam

'मैं दूँगा'—इस प्रकार प्रसन्न होकर सृञ्जय ने नारद से कहा।

व्यास उवाच

श्लोक 20 (7.55.20)

एवमुक्ते नृपतिना क्रोधपर्याकुलेक्षणः । पर्वतस्तु सुसङ्क्रुद्धो नारदं वाक्यमब्रवीत् ॥

evamukte nṛpatinā krodhaparyākulekṣaṇaḥ | parvatastu susaṅkruddho nāradaṃ vākyamabravīt

राजा के ऐसा कहने पर क्रोध से व्याकुल नेत्रोंवाले पर्वत ने अत्यन्त कुपित होकर नारद से यह बात कही:

पर्वत उवाच

श्लोक 21 (7.55.21)

पूर्वं ममैव मनसा विद्धि भार्यां वृतामृषे । यस्मादपाचरस्तस्मात्स्वर्गं न गच्छसि ॥

pūrvaṃ mamaiva manasā viddhi bhāryāṃ vṛtāmṛṣe | yasmādapācarastasmātsvargaṃ na gacchasi

हे ऋषे, जान लो कि मैंने पहले ही मन से उसे अपनी पत्नी के रूप में वरण कर लिया था। क्योंकि तुमने उसके विरुद्ध आचरण किया, इसलिए तुम स्वर्ग नहीं जाओगे।

व्यास उवाच

श्लोक 22 (7.55.22)

एवमुक्तो नारदस्तं प्रत्युवाचोत्तरं वचः । मनोवाग्बुद्धिसम्भाषा सत्यं तोयमथाग्नयः ॥

evamukto nāradastaṃ pratyuvācottaraṃ vacaḥ | manovāgbuddhisambhāṣā satyaṃ toyamathāgnayaḥ

ऐसा कहे जाने पर नारद ने उसे यह उत्तर दिया: 'मन, वाणी और बुद्धि की सहमति, सत्य, जल और अग्नियाँ—'

नारद उवाच

श्लोक 23 (7.55.23)

पाणिग्रहणमन्त्राश्च प्रथितं दारलक्षणम् । न त्वेषां निश्चिता निष्ठा त्वया सा मनसा स्मृता ॥

pāṇigrahaṇamantrāśca prathitaṃ dāralakṣaṇam | na tveṣāṃ niścitā niṣṭhā tvayā sā manasā smṛtā

'पाणिग्रहण और मन्त्र—ये पत्नी के प्रसिद्ध लक्षण हैं। परन्तु इनमें से कोई भी पूर्ण नहीं हुआ; तुमने तो उसे केवल मन में स्मरण किया था।'

व्यास उवाच

श्लोक 24 (7.55.24)

एवं विद्वांस्तु मां यस्मादनुव्याहृतवानसि । तस्मात्त्वमपि न स्वर्गं गमिष्यसि मया विना । अन्योन्यमेवं शप्त्वा वै तस्थतुस्तत्र तौ तदा ॥

evaṃ vidvāṃstu māṃ yasmādanuvyāhṛtavānasi | tasmāttvamapi na svargaṃ gamiṣyasi mayā vinā | anyonyamevaṃ śaptvā vai tasthatustatra tau tadā

'यह जानते हुए भी तुमने मेरे विषय में ऐसा कहा, इसलिए तुम भी मेरे बिना स्वर्ग नहीं जाओगे।' इस प्रकार एक-दूसरे को शाप देकर वे दोनों वहीं रह गए।

श्लोक 25 (7.55.25)

अथ सोऽपि नृपो विप्रान्पानाच्छादनभोजनैः । पुत्रकामः परं शक्त्या यत्नाच्चोपाचरच्छुचिः ॥

atha so'pi nṛpo viprānpānācchādanabhojanaiḥ | putrakāmaḥ paraṃ śaktyā yatnāccopācaracchuciḥ

तब राजा भी पुत्र की कामना से पूरी शक्ति और प्रयत्न से, पवित्र रहकर, ब्राह्मणों की पेय, वस्त्र और भोजन से सेवा करने लगा।

श्लोक 26 (7.55.26)

तस्य प्रसन्ना विप्रेन्द्राः कदाचित्पुत्रदर्शिनः । तपःस्वाध्यायनिरता वेदवेदाङ्गपारगाः ॥

tasya prasannā viprendrāḥ kadācitputradarśinaḥ | tapaḥsvādhyāyaniratā vedavedāṅgapāragāḥ

एक बार उससे प्रसन्न हुए श्रेष्ठ ब्राह्मण, जो उसे पुत्रवान् देखना चाहते थे, तप और स्वाध्याय में लगे हुए और वेद-वेदाङ्गों के पारंगत थे,

श्लोक 27 (7.55.27)

सहिता नारदं प्राहुर्देह्यस्मै पुत्रमीप्सितम् । तथेत्युक्त्वा द्विजैरुक्तः सृञ्जयं नारदोऽब्रवीत् ॥

sahitā nāradaṃ prāhurdehyasmai putramīpsitam | tathetyuktvā dvijairuktaḥ sṛñjayaṃ nārado'bravīt

मिलकर नारद से बोले, 'इसे इसका इच्छित पुत्र दो।' 'ऐसा ही हो' कहकर ब्राह्मणों से प्रेरित नारद ने सृञ्जय से कहा:

नारद उवाच

श्लोक 28 (7.55.28)

तुभ्यं प्रसन्ना राजर्षे पुत्रमीप्सन्ति ब्राह्मणाः । वरं वृणीष्व भद्रं ते यादृशं पुत्रमीप्सितम् ॥

tubhyaṃ prasannā rājarṣe putramīpsanti brāhmaṇāḥ | varaṃ vṛṇīṣva bhadraṃ te yādṛśaṃ putramīpsitam

'हे राजर्षि, ब्राह्मण तुम पर प्रसन्न हैं और तुम्हें पुत्र देना चाहते हैं। तुम्हारा कल्याण हो; जैसा पुत्र तुम चाहते हो, वह वर माँगो।'

व्यास उवाच

श्लोक 29 (7.55.29)

तथोक्तः प्राञ्जली राजा पुत्रं वव्रे गुणान्वितम् । यशस्विनं कीर्तिमन्तं तेजस्विनमरिन्दमम् ॥

tathoktaḥ prāñjalī rājā putraṃ vavre guṇānvitam | yaśasvinaṃ kīrtimantaṃ tejasvinamarindamam

ऐसा कहे जाने पर राजा ने हाथ जोड़कर गुणवान्, यशस्वी, कीर्तिमान्, तेजस्वी और शत्रुओं का दमन करने वाला पुत्र माँगा—

श्लोक 30 (7.55.30)

यस्य मूत्रं पुरीषं च क्लेदः स्वेदश्च काञ्चनम् । सर्वं भवेत्प्रसादाद्वै तादृशं तनयं वृणे ॥

yasya mūtraṃ purīṣaṃ ca kledaḥ svedaśca kāñcanam | sarvaṃ bhavetprasādādvai tādṛśaṃ tanayaṃ vṛṇe

ऐसा पुत्र, जिसका मूत्र, मल, कफ और पसीना सब सोना हो: 'आपकी कृपा से सब ऐसा ही हो; मैं ऐसा ही पुत्र माँगता हूँ।'

श्लोक 31 (7.55.31)

तथा भविष्यतीत्युक्ते जज्ञे तस्योप्सितः सुतः । काञ्चनस्याकरः श्रीमान्प्रसादाद्वै सुकाङ्क्षितः ॥

tathā bhaviṣyatītyukte jajñe tasyopsitaḥ sutaḥ | kāñcanasyākaraḥ śrīmānprasādādvai sukāṅkṣitaḥ

'ऐसा ही होगा' कहे जाने पर उसे अपना मनचाहा पुत्र उत्पन्न हुआ—सोने की खान, श्रीमान्, जिसकी वह बहुत कामना करता था, उसी कृपा से।

श्लोक 32 (7.55.32)

रुदितस्य च नेत्राभ्यामपतत्तस्य नेत्रजम् । मूत्रं पुरीषं स्वेदश्च सर्वं भवति काञ्चनम् । सुवर्णष्ठीविरित्येव तस्य नामाभवत्कृतम् ॥

ruditasya ca netrābhyāmapatattasya netrajam | mūtraṃ purīṣaṃ svedaśca sarvaṃ bhavati kāñcanam | suvarṇaṣṭhīvirityeva tasya nāmābhavatkṛtam

रोने पर उसकी आँखों से जो आँसू गिरते थे, तथा उसका मूत्र, मल और पसीना—सब सोना बन जाता था; इसीलिए उसका नाम सुवर्णष्ठीवी रखा गया।

श्लोक 33 (7.55.33)

तस्मिन्वरप्रदानेन वर्धयत्यमितं धनम् । कारयामास नृपतिः सौवर्णं सर्वमीप्सितम् ॥

tasminvarapradānena vardhayatyamitaṃ dhanam | kārayāmāsa nṛpatiḥ sauvarṇaṃ sarvamīpsitam

उस वर के प्रभाव से उसके कारण अपार धन बढ़ता गया, और राजा ने अपनी इच्छा की सब वस्तुएँ सोने की बनवा लीं:

श्लोक 34 (7.55.34)

गृहप्राकारदुर्गाणि ब्राह्मणावसथान्यपि । शय्यासनानि यानानि स्थालीपिठरभाजनम् ॥

gṛhaprākāradurgāṇi brāhmaṇāvasathānyapi | śayyāsanāni yānāni sthālīpiṭharabhājanam

घर, परकोटे और किले, ब्राह्मणों के निवास, शय्याएँ, आसन और वाहन, हाँडी, कड़ाही और बर्तन।

श्लोक 35 (7.55.35)

तस्य राज्ञोऽपि यद्वेश्म बाह्याश्चोपस्कराश्च ये । सर्वं तत्काञ्चनमयं कालेन परिवर्धितम् ॥

tasya rājño'pi yadveśma bāhyāścopaskarāśca ye | sarvaṃ tatkāñcanamayaṃ kālena parivardhitam

राजा का भवन और उसकी बाहर की सब सामग्री—सब कुछ समय के साथ सोने का हो गया।

श्लोक 36 (7.55.36)

अथ दस्युगणाः श्रुत्वा दृष्ट्वा चैनं तथाविधम् । सम्भूय तस्य नृपतेः समारब्धाश्चिकीर्षितुम् ॥

atha dasyugaṇāḥ śrutvā dṛṣṭvā cainaṃ tathāvidham | sambhūya tasya nṛpateḥ samārabdhāścikīrṣitum

तब डाकुओं के दल यह सुनकर और उसे वैसा देखकर इकट्ठे हुए और राजा को हानि पहुँचाने के लिए तैयार हो गए।

श्लोक 37 (7.55.37)

केचित्तत्राब्रुवन्राज्ञः पुत्रं गृह्णीम वै स्वयम् । सोऽस्याकरः काञ्चनस्य तस्य यत्नं चरामहे ॥

kecittatrābruvanrājñaḥ putraṃ gṛhṇīma vai svayam | so'syākaraḥ kāñcanasya tasya yatnaṃ carāmahe

उनमें से कुछ ने वहाँ कहा, 'चलो, राजा के पुत्र को हम स्वयं पकड़ लें; वही सोने की खान है; उसी के लिए यत्न करें।'

श्लोक 38 (7.55.38)

ततस्ते दस्यवो लुब्धाः प्रविश्य नृपतेर्गृहम् । राजपुत्रं तथाऽऽजह्रुः सुवर्णष्ठीविनं बलात् ॥

tataste dasyavo lubdhāḥ praviśya nṛpatergṛham | rājaputraṃ tathā''jahruḥ suvarṇaṣṭhīvinaṃ balāt

तब उन लोभी डाकुओं ने राजा के घर में घुसकर सुवर्णष्ठीवी राजकुमार को बलपूर्वक उठा लिया।

श्लोक 39 (7.55.39)

गृह्यैनमनुपायज्ञा नीत्वाऽरण्यमचेतसः । हत्वा विशस्य चापश्यँल्लुब्धा वसु न किञ्चन ॥

gṛhyainamanupāyajñā nītvā'raṇyamacetasaḥ | hatvā viśasya cāpaśyam̐llubdhā vasu na kiñcana

उसे पकड़कर वे अनजान और विवेकहीन लोग उसे जंगल में ले गए और मारकर चीर डाला, परन्तु वे लोभी कोई धन नहीं पा सके।

श्लोक 40 (7.55.40)

तस्य प्राणैर्विमुक्तस्य नष्टं तत्काञ्चनं वरम् । दस्यवश्च तदाऽन्योन्यं जघ्नुर्मूर्खा विचेतसः ॥

tasya prāṇairvimuktasya naṣṭaṃ tatkāñcanaṃ varam | dasyavaśca tadā'nyonyaṃ jaghnurmūrkhā vicetasaḥ

प्राण निकल जाने पर वह उत्तम सोना नष्ट हो गया; और मूर्ख, बुद्धिहीन डाकू तब आपस में ही एक-दूसरे को मारने लगे।

श्लोक 41 (7.55.41)

हत्वा परस्परं नष्टाः कुमारं चाद्भुतं भुवि । असम्भाव्यं गता घोरं नरकं दुष्टकारिणः ॥

hatvā parasparaṃ naṣṭāḥ kumāraṃ cādbhutaṃ bhuvi | asambhāvyaṃ gatā ghoraṃ narakaṃ duṣṭakāriṇaḥ

एक-दूसरे को मारकर वे नष्ट हो गए; पृथ्वी पर उस अद्भुत कुमार को मारने वाले वे दुष्ट कर्म करने वाले अकल्पनीय भयंकर नरक में गए।

श्लोक 42 (7.55.42)

तं दृष्ट्वा निहतं पुत्रं वरदत्तं महातपाः । विललाप सुदुःखार्तो बहुधा करुणं नृपः ॥

taṃ dṛṣṭvā nihataṃ putraṃ varadattaṃ mahātapāḥ | vilalāpa suduḥkhārto bahudhā karuṇaṃ nṛpaḥ

वर से मिले अपने उस पुत्र को मरा देखकर महातपस्वी राजा दुःख से व्याकुल होकर बहुत प्रकार से करुण विलाप करने लगा।

श्लोक 43 (7.55.43)

विलपन्तं निशम्याथ पुत्रशोकहतं नृपम् । प्रत्यदृश्यत देवर्षिर्नारदस्तस्य सन्निधौ ॥

vilapantaṃ niśamyātha putraśokahataṃ nṛpam | pratyadṛśyata devarṣirnāradastasya sannidhau

पुत्रशोक से मारे हुए राजा का विलाप सुनकर देवर्षि नारद उसके सामने प्रकट हो गए।

श्लोक 44 (7.55.44)

उवाच चैनं दुःखार्तं विलपन्तमचेतसम् । सृञ्जयं नारदो यद्यत्तन्निबोध युधिष्ठिर ॥

uvāca cainaṃ duḥkhārtaṃ vilapantamacetasam | sṛñjayaṃ nārado yadyattannibodha yudhiṣṭhira

हे युधिष्ठिर, दुःख से पीड़ित, विलाप करते हुए, व्याकुल सृञ्जय से नारद ने जो-जो कहा, उसे सुनो।

नारद उवाच

श्लोक 45 (7.55.45)

त्यज शोकं महाराज वैक्लब्यं त्यज बुद्धिमन् । न मृतः शोचतो जीवेन्मुह्यतो वा नराधिप ॥

tyaja śokaṃ mahārāja vaiklabyaṃ tyaja buddhiman | na mṛtaḥ śocato jīvenmuhyato vā narādhipa

हे महाराज, शोक छोड़िए; हे बुद्धिमान्, व्याकुलता छोड़िए। हे नराधिप, शोक करने या मोहित होने से मरा हुआ जीवित नहीं होता।

श्लोक 46 (7.55.46)

त्यज शोकं नृपश्रेष्ठ न शोचन्ति भवद्विधाः । वीरो भवान्महाराज ज्ञानवृद्धोऽपि मे मतः । कामानामवितृप्तस्त्वं सृञ्जयेह मरिष्यसि ॥

tyaja śokaṃ nṛpaśreṣṭha na śocanti bhavadvidhāḥ | vīro bhavānmahārāja jñānavṛddho'pi me mataḥ | kāmānāmavitṛptastvaṃ sṛñjayeha mariṣyasi

हे नृपश्रेष्ठ, शोक छोड़िए; आप जैसे लोग शोक नहीं करते। हे महाराज, आप वीर हैं और मेरे विचार में ज्ञान में वृद्ध भी हैं। फिर भी हे सृञ्जय, आप भी यहाँ अपनी कामनाओं से अतृप्त रहकर ही मरेंगे।

श्लोक 47 (7.55.47)

यस्य चैते वयं गेहे उषिता ब्रह्मवादिनः । आविक्षितं मरुत्तं च मृतं सृञ्जय शुश्रुम ॥

yasya caite vayaṃ gehe uṣitā brahmavādinaḥ | āvikṣitaṃ maruttaṃ ca mṛtaṃ sṛñjaya śuśruma

जिसके घर में हम ब्रह्मवादी रहे थे, उस आविक्षित-पुत्र मरुत्त के विषय में भी, हे सृञ्जय, हमने सुना है कि वह मर गया।

श्लोक 48 (7.55.48)

संवर्तो याजयामास स्पर्धया वै बृहस्पतेः । यस्मै राजर्षये प्रादाद्धनं स भगवान्प्रभुः । हैमं हिमवतः पादं यियक्षोर्विविधैः सवैः ॥

saṃvarto yājayāmāsa spardhayā vai bṛhaspateḥ | yasmai rājarṣaye prādāddhanaṃ sa bhagavānprabhuḥ | haimaṃ himavataḥ pādaṃ yiyakṣorvividhaiḥ savaiḥ

बृहस्पति से स्पर्धा के कारण संवर्त ने उसका यज्ञ कराया; अनेक यज्ञों से यजन की इच्छा रखने वाले उस राजर्षि को उन भगवान् प्रभु ने धन दिया—हिमालय का स्वर्णमय पाद।

श्लोक 49 (7.55.49)

यस्य सेन्द्रामरगणा बृहस्पतिपुरोगमाः । देवा विश्वसृजः सर्वे यजनान्ते समासते । यज्ञवाटस्य सौवर्णाः सर्वे चासन्परिच्छदाः ॥

yasya sendrāmaragaṇā bṛhaspatipurogamāḥ | devā viśvasṛjaḥ sarve yajanānte samāsate | yajñavāṭasya sauvarṇāḥ sarve cāsanparicchadāḥ

उसके यज्ञ में इन्द्र सहित देवगण, बृहस्पति को आगे करके, तथा सब विश्वसृजक देवता यज्ञ के अन्त में बैठे; और यज्ञभूमि के सारे साज-सामान सोने के थे।

श्लोक 50 (7.55.50)

यस्य सर्वं तदा ह्यन्नं मनोभिप्रायगं शुचि । कामतो बुभुजुर्विप्राः सर्वे चान्नार्थिनो द्विजाः । पयो दधि घृतं क्षौद्रं भक्ष्यं भोज्यं च शोभनम् ॥

yasya sarvaṃ tadā hyannaṃ manobhiprāyagaṃ śuci | kāmato bubhujurviprāḥ sarve cānnārthino dvijāḥ | payo dadhi ghṛtaṃ kṣaudraṃ bhakṣyaṃ bhojyaṃ ca śobhanam

उसका सारा अन्न उस समय पवित्र था और मन की इच्छा के अनुसार मिल जाता था; ब्राह्मणों और अन्न चाहने वाले सब द्विजों ने इच्छानुसार भोजन किया—दूध, दही, घी, शहद, और सुन्दर खाद्य तथा भोज्य पदार्थ।

श्लोक 51 (7.55.51)

यस्य यज्ञेषु सर्वेषु वासांस्याभरणानि च । ईप्सितान्युपतिष्ठन्ते प्रहृष्टान्वेदपारगान् ॥

yasya yajñeṣu sarveṣu vāsāṃsyābharaṇāni ca | īpsitānyupatiṣṭhante prahṛṣṭānvedapāragān

उसके सब यज्ञों में प्रसन्न वेदपारगों को इच्छित वस्त्र और आभूषण प्रस्तुत किए जाते थे।

श्लोक 52 (7.55.52)

मरुतः परिवेष्टारो मरुत्तस्याभवन्गृहे । आविक्षितस्य राजर्षेर्विश्वेदेवाः सभासदः ॥

marutaḥ pariveṣṭāro maruttasyābhavangṛhe | āvikṣitasya rājarṣerviśvedevāḥ sabhāsadaḥ

आविक्षित-पुत्र राजर्षि मरुत्त के घर में मरुद्गण परोसने वाले थे और विश्वेदेव सभासद थे।

श्लोक 53 (7.55.53)

यस्य वीर्यवतो राज्ञः सुवृष्ट्या सस्यसम्पदः । हविर्भिस्तर्पिता येन सम्यक्क्लृप्तैर्दिवौकसः ॥

yasya vīryavato rājñaḥ suvṛṣṭyā sasyasampadaḥ | havirbhistarpitā yena samyakklṛptairdivaukasaḥ

उस पराक्रमी राजा के राज्य में अच्छी वर्षा से अन्न की सम्पदा फली-फूली, और उसने भली-भाँति तैयार किए हविष्यों से स्वर्गवासियों को तृप्त किया।

श्लोक 54 (7.55.54)

ऋषीणां च पितॄणां च देवानां सुखजीविनम् । ब्रह्मचर्यश्रुतिमुखैः सर्वैर्दानैश्च सर्वदा ॥

ṛṣīṇāṃ ca pitṝṇāṃ ca devānāṃ sukhajīvinam | brahmacaryaśrutimukhaiḥ sarvairdānaiśca sarvadā

उसने ऋषियों, पितरों और देवताओं को सदा सुख से रखा—ब्रह्मचर्य और वेदाध्ययन आदि सब साधनों से और दानों से।

श्लोक 55 (7.55.55)

शयनासनपानानि स्वर्णराशीश्च दुस्त्यजाः । तत्सर्वममितं वित्तं दत्तं विप्रेभ्य इच्छया ॥

śayanāsanapānāni svarṇarāśīśca dustyajāḥ | tatsarvamamitaṃ vittaṃ dattaṃ viprebhya icchayā

शय्या, आसन, पेय और सोने के ढेर, जिन्हें त्यागना कठिन है—वह सारा अपार धन उसने ब्राह्मणों को अपनी इच्छा से दे दिया।

श्लोक 56 (7.55.56)

सोऽनुध्यातस्तु शक्रेण प्रजाः कृत्वा निरामयाः । श्रद्दधानो जिताँल्लोकान्गतः पुण्यदुहोऽक्षयान् ॥

so'nudhyātastu śakreṇa prajāḥ kṛtvā nirāmayāḥ | śraddadhāno jitām̐llokāngataḥ puṇyaduho'kṣayān

इन्द्र के अनुग्रह का पात्र बनकर, प्रजा को रोगरहित करके, श्रद्धा से भरा हुआ वह जीते हुए, अक्षय, पुण्यफलदायी लोकों को गया।

श्लोक 57 (7.55.57)

सप्रजः सनृपामात्यः सदारापत्यबान्धवः । यौवनेन सहस्राब्दं मरुत्तो राज्यमन्वशात् ॥

saprajaḥ sanṛpāmātyaḥ sadārāpatyabāndhavaḥ | yauvanena sahasrābdaṃ marutto rājyamanvaśāt

प्रजा, राजाओं और मन्त्रियों, पत्नी, सन्तान और बन्धुओं के साथ मरुत्त ने यौवन की अवस्था में एक हज़ार वर्ष तक राज्य किया।

श्लोक 58 (7.55.58)

स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात्पुण्यतरस्तुभ्यं मा पुत्रमनुतप्यथाः । अयज्वानमदक्षिण्यमभि श्वैत्येत्युदाहरत् ॥

sa cenmamāra sṛñjaya caturbhadratarastvayā | putrātpuṇyatarastubhyaṃ mā putramanutapyathāḥ | ayajvānamadakṣiṇyamabhi śvaityetyudāharat

हे सृञ्जय, वह भी मर गया, जो चार कल्याणों में आपसे बढ़कर था और आपके पुत्र से अधिक पुण्यवान् था। 'जिसने न यज्ञ किया, न दक्षिणा दी, उस पुत्र के लिए शोक मत कीजिए'—उन्होंने श्वैत्य से ऐसा कहा।

अध्याय 54अध्याय-सूचीअध्याय 56