द्रोण पर्व · अध्याय 56
नारद द्वारा राजा सुहोत्र का वृत्तान्त
नारद सृञ्जय को सान्त्वना देते हुए राजा सुहोत्र का उदाहरण देते हैं, जिसने धर्म से शासन किया, पुरोहितों और मन्त्रियों का सम्मान किया और विशाल यज्ञ किए। उसके देश में मेघ सोना बरसाते थे और सोने की नदियाँ सोने के जीव बहाती थीं। फिर भी वह भी मर गया; नारद दोहराते हैं कि जिसने न यज्ञ किया न दान दिया, उस पुत्र के लिए सृञ्जय को शोक नहीं करना चाहिए।
नारद उवाच
श्लोक 1 (7.56.1)
सुहोत्रं नाम राजानं मृतं सृञ्जय शुश्रुम । एकवीरमशक्यं तममरैरभिवीक्षितुम् ॥
suhotraṃ nāma rājānaṃ mṛtaṃ sṛñjaya śuśruma | ekavīramaśakyaṃ tamamarairabhivīkṣitum
हे सृञ्जय, हमने सुना है कि राजा सुहोत्र भी मर गया—वह अकेला वीर, जिसकी ओर देवता भी नहीं देख सकते थे।
श्लोक 2 (7.56.2)
यः प्राप्य राज्यं धर्मेण ऋत्विङ्मन्त्रिपुरोहितान् । सम्मान्य चात्मनः श्रेयः पृष्ट्वा तेषां मते स्थितः ॥
yaḥ prāpya rājyaṃ dharmeṇa ṛtviṅmantripurohitān | sammānya cātmanaḥ śreyaḥ pṛṣṭvā teṣāṃ mate sthitaḥ
उसने धर्म से राज्य पाकर ऋत्विजों, मन्त्रियों और पुरोहितों का सम्मान किया और अपने कल्याण के विषय में उनसे पूछकर उनके मत के अनुसार चला।
श्लोक 3 (7.56.3)
प्रजानां पालनं धर्मो दानमिज्या द्विषज्जयः । एतत्सुहोत्रो विज्ञाय धर्म्यमैच्छद्धनागमम् ॥
prajānāṃ pālanaṃ dharmo dānamijyā dviṣajjayaḥ | etatsuhotro vijñāya dharmyamaicchaddhanāgamam
प्रजा का पालन, दान, यज्ञ और शत्रुओं पर विजय—इन्हें धर्म जानकर सुहोत्र ने धर्मसंगत उपाय से ही धन पाना चाहा।
श्लोक 4 (7.56.4)
धर्मेणाराधयन्देवान्बाणैः शत्रूञ्जयंस्तथा । सर्वाण्यपि च भूतानि स्वगुणैरन्वरञ्जयत् ॥
dharmeṇārādhayandevānbāṇaiḥ śatrūñjayaṃstathā | sarvāṇyapi ca bhūtāni svaguṇairanvarañjayat
उसने धर्म से देवताओं को प्रसन्न किया, बाणों से शत्रुओं को जीता, और अपने गुणों से सभी प्राणियों को आनन्दित किया।
श्लोक 5 (7.56.5)
यो भुक्त्वेमां वसुमतीं म्लेच्छाटविकवर्जिताम् । यस्मै ववर्ष पर्जन्यो हिरण्यं परिवत्सरान् ॥
yo bhuktvemāṃ vasumatīṃ mlecchāṭavikavarjitām | yasmai vavarṣa parjanyo hiraṇyaṃ parivatsarān
म्लेच्छों और जंगली जातियों से रहित इस पृथ्वी का उसने भोग किया, और उसके लिए पर्जन्य वर्ष-वर्ष सोना बरसाता रहा।
श्लोक 6 (7.56.6)
हैरण्यास्तत्र वाहिन्यः स्वैरिण्यो व्यवहन्पुरा । ग्राहान्कर्कटकांश्चैव मत्स्यांश्च विविधान्बहून् ॥
hairaṇyāstatra vāhinyaḥ svairiṇyo vyavahanpurā | grāhānkarkaṭakāṃścaiva matsyāṃśca vividhānbahūn
वहाँ सोने की नदियाँ अपनी इच्छा से बहा करती थीं, जिनमें अनेक प्रकार के घड़ियाल, केकड़े और बहुत-सी मछलियाँ बहती थीं।
श्लोक 7 (7.56.7)
कामान्वर्षति पर्जन्यो रूप्याणि विविधानि च । सौवर्णान्यप्रमेयाणि वाप्यश्च क्रोशसम्मिताः ॥
kāmānvarṣati parjanyo rūpyāṇi vividhāni ca | sauvarṇānyaprameyāṇi vāpyaśca krośasammitāḥ
पर्जन्य मनचाही वस्तुएँ, अनेक प्रकार की चाँदी, अनगिनत सोने की वस्तुएँ और कोस भर की बावड़ियाँ बरसाता था।
श्लोक 8 (7.56.8)
सहस्रं वामनान्कुब्जान्नक्रान्मकरकच्छपान् । सौवर्णान्विहितान्दृष्ट्वा ततोऽस्मयत वै तदा ॥
sahasraṃ vāmanānkubjānnakrānmakarakacchapān | sauvarṇānvihitāndṛṣṭvā tato'smayata vai tadā
सोने से बने हज़ारों बौने, कुबड़े, घड़ियाल, मकर और कछुए देखकर वह उस समय चकित हो गया।
श्लोक 9 (7.56.9)
तत्सुवर्णमपर्यन्तं राजर्षिः कुरुजाङ्गले । ईजानो वितते यज्ञे ब्राह्मणेभ्यो ह्यमन्यत ॥
tatsuvarṇamaparyantaṃ rājarṣiḥ kurujāṅgale | ījāno vitate yajñe brāhmaṇebhyo hyamanyata
उस असीम सोने को उस राजर्षि ने कुरुजांगल में विस्तृत यज्ञ करते हुए ब्राह्मणों के लिए ही माना।
श्लोक 10 (7.56.10)
सोऽश्वमेधसहस्रेण राजसूयशतेन च । पुण्यैः क्षत्रिययज्ञैश्च प्रभूतवरदक्षिणैः ॥
so'śvamedhasahasreṇa rājasūyaśatena ca | puṇyaiḥ kṣatriyayajñaiśca prabhūtavaradakṣiṇaiḥ
एक हज़ार अश्वमेध, सौ राजसूय और प्रचुर उत्तम दक्षिणा वाले पुण्यमय क्षत्रिय-यज्ञों से,
श्लोक 11 (7.56.11)
काम्यनैमित्तिकाजस्रैरिष्ट्वेष्टां गतिमाप्तवान् । स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया ॥
kāmyanaimittikājasrairiṣṭveṣṭāṃ gatimāptavān | sa cenmamāra sṛñjaya caturbhadratarastvayā
तथा काम्य, नैमित्तिक और नित्य यज्ञों को करके उसने इष्ट गति पाई। वह भी, हे सृञ्जय, मर गया, जो चार कल्याणों में आपसे बढ़कर था,
श्लोक 12 (7.56.12)
पुत्रात्पुण्यतरस्तुभ्यं मा पुत्रमनुतप्यथाः । अयज्वानमदक्षिण्यमभि श्वैत्येत्युदाहरत् ॥
putrātpuṇyatarastubhyaṃ mā putramanutapyathāḥ | ayajvānamadakṣiṇyamabhi śvaityetyudāharat
जो आपके पुत्र से अधिक पुण्यवान् था। 'जिसने न यज्ञ किया, न दक्षिणा दी, उस पुत्र के लिए शोक मत कीजिए'—उन्होंने श्वैत्य से ऐसा कहा।