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द्रोण पर्व · अध्याय 59

नारद दशरथपुत्र राम की कथा कहते हैं

नारद बताते हैं कि दशरथपुत्र राम ने चौदह वर्ष वन में बिताए, जनस्थान के राक्षसों का वध किया, और सीता के हरण के बाद वानरों के साथ समुद्र पार करके रावण को मारा। अयोध्या लौटकर उन्होंने ग्यारह हज़ार वर्ष पृथ्वी पर शासन किया, सौ अश्वमेध यज्ञ किए, और संसार को आरोग्य, दीर्घायु और धर्म से भर दिया; फिर वे स्वर्ग गए। यदि वे भी मर गए, तो सृञ्जय को अपने पुत्र के लिए शोक नहीं करना चाहिए।

अध्याय 58अध्याय-सूचीअध्याय 60

नारद उवाच

श्लोक 1 (7.59.1)

रामं दाशरथिं चैव मृतं सृञ्जय शुश्रुम । यं प्रजा अन्वमोदन्त पिता पुत्रमिवौरसम् । असङ्ख्येया गुणा यस्मिन्नासन्नमिततेजसि ॥

rāmaṃ dāśarathiṃ caiva mṛtaṃ sṛñjaya śuśruma | yaṃ prajā anvamodanta pitā putramivaurasam | asaṅkhyeyā guṇā yasminnāsannamitatejasi

हे सृञ्जय, हमने सुना है कि दशरथ के पुत्र राम भी मृत्यु को प्राप्त हुए — जिनमें प्रजा वैसे ही आनन्दित रहती थी जैसे पिता अपने औरस पुत्र में, और जिनमें अपार तेज और असंख्य गुण थे।

श्लोक 2 (7.59.2)

यश्चतुर्दशवर्षाणि निदेशात्पितुरच्युतः । वने वनितया सार्धमवसल्लक्ष्मणाग्रजः ॥

yaścaturdaśavarṣāṇi nideśātpituracyutaḥ | vane vanitayā sārdhamavasallakṣmaṇāgrajaḥ

कभी विचलित न होने वाले, लक्ष्मण के बड़े भाई राम ने पिता की आज्ञा से चौदह वर्ष वन में अपनी पत्नी के साथ बिताए।

श्लोक 3 (7.59.3)

जघान च जनस्थाने राक्षसान्मनुजर्षभः । तपस्विनां रक्षणार्थं सहस्राणि चतुर्दश ॥

jaghāna ca janasthāne rākṣasānmanujarṣabhaḥ | tapasvināṃ rakṣaṇārthaṃ sahasrāṇi caturdaśa

उन नरश्रेष्ठ ने जनस्थान में तपस्वियों की रक्षा के लिए चौदह हज़ार राक्षसों को मारा।

श्लोक 4 (7.59.4)

तत्रैव वसतस्तस्य रावणो नाम राक्षसः । जहार भार्यां वैदेहीं सम्मोह्यैनं सहानुजम् ॥

tatraiva vasatastasya rāvaṇo nāma rākṣasaḥ | jahāra bhāryāṃ vaidehīṃ sammohyainaṃ sahānujam

वहीं रहते हुए रावण नामक राक्षस ने उन्हें और उनके छोटे भाई को भुलावा देकर उनकी पत्नी विदेहकुमारी को हर लिया।

श्लोक 5 (7.59.5)

रामो हृतां राक्षसेन भार्यां श्रुत्वा जटायुषः । आतुरः शोकसन्तप्तो रामोऽगच्छद्धरीश्वरम् ॥

rāmo hṛtāṃ rākṣasena bhāryāṃ śrutvā jaṭāyuṣaḥ | āturaḥ śokasantapto rāmo'gacchaddharīśvaram

जटायु से यह सुनकर कि राक्षस उनकी पत्नी को हर ले गया है, व्याकुल और शोक से जलते हुए राम वानरराज के पास गए।

श्लोक 6 (7.59.6)

तेन रामः सुसङ्गम्य वानरैश्च महाबलैः । आजगामोदधेः पारं सेतुं कृत्वा महार्णवे ॥

tena rāmaḥ susaṅgamya vānaraiśca mahābalaiḥ | ājagāmodadheḥ pāraṃ setuṃ kṛtvā mahārṇave

उनसे और उनके महाबली वानरों से भली-भाँति मैत्री करके राम ने महासागर पर सेतु बनाया और उसके उस पार पहुँचे।

श्लोक 7 (7.59.7)

तत्र हत्वा तु पौलस्त्यान्ससुहृद्गणबान्धवान् । मायाविनं महाघोरं रावणं लोककण्टकम् ॥

tatra hatvā tu paulastyānsasuhṛdgaṇabāndhavān | māyāvinaṃ mahāghoraṃ rāvaṇaṃ lokakaṇṭakam

वहाँ उन्होंने पुलस्त्य के वंशजों को उनके मित्रों, गणों और बन्धुओं सहित नष्ट किया — और मायावी, महाभयंकर, लोक के कण्टक रावण को भी —

श्लोक 8 (7.59.8)

सुरासुरैरवध्यं तं देवब्राह्मणकण्टकम् । जघान स महाबाहुः पौलस्त्यं सगणं रणे ॥

surāsurairavadhyaṃ taṃ devabrāhmaṇakaṇṭakam | jaghāna sa mahābāhuḥ paulastyaṃ sagaṇaṃ raṇe

रावण को, जिसे देवता और असुर भी नहीं मार सकते थे और जो देवताओं तथा ब्राह्मणों का काँटा था, उन महाबाहु ने रण में उसके गणों सहित मार डाला।

श्लोक 9 (7.59.9)

हत्वा तत्र रिपुं सङ्ख्ये भार्यया सह सङ्गतः । स च लङ्केश्वरं चक्रे धर्मात्मानं विभीषणम् ॥

hatvā tatra ripuṃ saṅkhye bhāryayā saha saṅgataḥ | sa ca laṅkeśvaraṃ cakre dharmātmānaṃ vibhīṣaṇam

वहाँ युद्ध में शत्रु को मारकर और पत्नी से मिलकर उन्होंने धर्मात्मा विभीषण को लंका का स्वामी बनाया।

श्लोक 10 (7.59.10)

भार्यया सह संयुक्तस्ततो वानरसेनया । अयोध्यामागतो वीरः पुष्पकेण विराजता ॥

bhāryayā saha saṃyuktastato vānarasenayā | ayodhyāmāgato vīraḥ puṣpakeṇa virājatā

फिर पत्नी और वानरसेना के साथ वे वीर चमकते हुए पुष्पक विमान में अयोध्या आए।

श्लोक 11 (7.59.11)

तत्र राजन्प्रविष्टः सन्नयोध्यायां महायशाः । मातॄर्वयस्यान्सचिवानृत्विजः सपुरोहितान् ॥

tatra rājanpraviṣṭaḥ sannayodhyāyāṃ mahāyaśāḥ | mātṝrvayasyānsacivānṛtvijaḥ sapurohitān

हे राजन्, अयोध्या में प्रवेश करके वे महायशस्वी अपनी माताओं, मित्रों, मन्त्रियों, ऋत्विजों और पुरोहितों के बीच —

श्लोक 12 (7.59.12)

शुश्रूषमाणः सततं मन्त्रिभिश्चाभिषेचितः । विसृज्य हरिराजानं हनुमन्तं सहाङ्गदम् ॥

śuśrūṣamāṇaḥ satataṃ mantribhiścābhiṣecitaḥ | visṛjya harirājānaṃ hanumantaṃ sahāṅgadam

सदा मन्त्रियों से सेवित होकर अभिषिक्त हुए; और वानरराज को हनुमान तथा अङ्गद सहित विदा करके,

श्लोक 13 (7.59.13)

भ्रातरं भरतं वीरं शत्रुघ्नं चैव लक्ष्मणम् । पूजयन्परया प्रीत्या वैदेह्या चाभिपूजितः ॥

bhrātaraṃ bharataṃ vīraṃ śatrughnaṃ caiva lakṣmaṇam | pūjayanparayā prītyā vaidehyā cābhipūjitaḥ

अपने भाइयों — वीर भरत, शत्रुघ्न और लक्ष्मण — का परम प्रेम से सत्कार करते हुए, और वैदेही से स्वयं सम्मानित होते हुए,

श्लोक 14 (7.59.14)

दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च । चतुःसागरपर्यन्तां पृथिवीमन्वशासत ॥

daśavarṣasahasrāṇi daśavarṣaśatāni ca | catuḥsāgaraparyantāṃ pṛthivīmanvaśāsata

उन्होंने चारों समुद्रों तक फैली हुई पृथ्वी पर दस हज़ार और दस सौ वर्ष तक शासन किया।

श्लोक 15 (7.59.15)

अश्वमेधशतैरीजे क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः । यश्च विप्रप्रसादेन सर्वकामानवाप्य च ॥

aśvamedhaśatairīje kratubhirbhūridakṣiṇaiḥ | yaśca vipraprasādena sarvakāmānavāpya ca

उन्होंने सैकड़ों अश्वमेधों और प्रचुर दक्षिणा वाले यज्ञों से यजन किया, और ब्राह्मणों की कृपा से सब कामनाएँ प्राप्त की थीं।

श्लोक 16 (7.59.16)

सम्प्राप्य विधिवद्राज्यं सर्वभूतानुकम्पनः । सर्वद्वीपानवष्टभ्य प्रजा धर्मेण पालयन् ॥

samprāpya vidhivadrājyaṃ sarvabhūtānukampanaḥ | sarvadvīpānavaṣṭabhya prajā dharmeṇa pālayan

विधिपूर्वक राज्य पाकर, सब प्राणियों पर दया करने वाले, सब द्वीपों को अपने अधीन रखते हुए वे धर्म से प्रजा का पालन करते थे।

श्लोक 17 (7.59.17)

स निर्गलं मुख्यतममश्वमेधशतं प्रभुः । आजहार सुरेशस्य हविषा मुदमाहरन् । अन्यैश्च विविधैर्यज्ञैरीजे बहुगुणैर्नृपः ॥

sa nirgalaṃ mukhyatamamaśvamedhaśataṃ prabhuḥ | ājahāra sureśasya haviṣā mudamāharan | anyaiśca vividhairyajñairīje bahuguṇairnṛpaḥ

उन प्रभु ने निर्बाध, श्रेष्ठतम सौ अश्वमेध किए और हविष्य से देवराज को प्रसन्न किया; और उन राजा ने अन्य अनेक बहुगुण यज्ञ भी किए।

श्लोक 18 (7.59.18)

क्षुत्पिपासेऽजयद्रामः सर्वरोगांश्च देहिनाम् । सततं गुणसम्पन्नो दीप्यमानः स्वतेजसा ॥

kṣutpipāse'jayadrāmaḥ sarvarogāṃśca dehinām | satataṃ guṇasampanno dīpyamānaḥ svatejasā

राम ने भूख, प्यास और देहधारियों के सब रोगों को जीत लिया; सदा गुणों से सम्पन्न वे अपने तेज से दीप्त रहते थे।

श्लोक 19 (7.59.19)

अतिसर्वाणि भूतानि रामो दाशरथिर्बभौ । ऋषीणां देवतानां च मानुषाणां च सर्वशः । पृथिव्यां सह वासोऽभूद्रामे राज्यं प्रशासति ॥

atisarvāṇi bhūtāni rāmo dāśarathirbabhau | ṛṣīṇāṃ devatānāṃ ca mānuṣāṇāṃ ca sarvaśaḥ | pṛthivyāṃ saha vāso'bhūdrāme rājyaṃ praśāsati

दशरथपुत्र राम सब प्राणियों से बढ़कर शोभित हुए। राम के राज्य करते समय पृथ्वी पर ऋषि, देवता और मनुष्य सब साथ-साथ रहते थे।

श्लोक 20 (7.59.20)

नाहीयत तदा प्राणः प्राणिनां न तदा व्यथा । प्राणापानौ समावास्तां रामे राज्यं प्रशासति ॥

nāhīyata tadā prāṇaḥ prāṇināṃ na tadā vyathā | prāṇāpānau samāvāstāṃ rāme rājyaṃ praśāsati

तब प्राणियों की प्राण-शक्ति क्षीण नहीं होती थी, न कोई पीड़ा थी; राम के राज्य करते समय प्राण और अपान सम रहते थे।

श्लोक 21 (7.59.21)

पर्यदीप्यन्त तेजांसि तदाऽनर्थाश्च नाभवन् । दीर्घायुषः प्रजाः सर्वा युवा न म्रियते तदा ॥

paryadīpyanta tejāṃsi tadā'narthāśca nābhavan | dīrghāyuṣaḥ prajāḥ sarvā yuvā na mriyate tadā

तेज दीप्त होते थे और कोई अनर्थ नहीं होता था; सारी प्रजा दीर्घायु थी और तब कोई युवा नहीं मरता था।

श्लोक 22 (7.59.22)

वेदैश्चतुर्भिः सुप्रीताः प्राप्नुवन्ति दिवौकसः । हव्यं कव्यं च विविधं निष्पूर्तं हुतमेव च ॥

vedaiścaturbhiḥ suprītāḥ prāpnuvanti divaukasaḥ | havyaṃ kavyaṃ ca vividhaṃ niṣpūrtaṃ hutameva ca

चारों वेदों से भली-भाँति प्रसन्न स्वर्गवासी अनेक प्रकार के हव्य और कव्य, दान-पुण्य के कर्म तथा अग्नि में दी गई आहुतियाँ ग्रहण करते थे।

श्लोक 23 (7.59.23)

अदंशमशका देशा नष्टव्यालसरीसृपाः । नाप्सु प्राणभृतां मृत्युर्नाकाले ज्वलनोऽदहत् ॥

adaṃśamaśakā deśā naṣṭavyālasarīsṛpāḥ | nāpsu prāṇabhṛtāṃ mṛtyurnākāle jvalano'dahat

देशों में डाँस और मच्छर नहीं थे और हिंसक जन्तु तथा सरीसृप नष्ट हो गए थे; जल में किसी प्राणी की मृत्यु नहीं होती थी और अग्नि असमय नहीं जलाती थी।

श्लोक 24 (7.59.24)

अधर्मरुचयो लुब्धा मूर्खा वा नाभवंस्तदा । शिष्टेष्टप्राज्ञकर्माणः सर्वे वर्णास्तदाऽभवन् ॥

adharmarucayo lubdhā mūrkhā vā nābhavaṃstadā | śiṣṭeṣṭaprājñakarmāṇaḥ sarve varṇāstadā'bhavan

तब कोई अधर्म में रुचि रखने वाला, लोभी या मूर्ख नहीं था; सभी वर्ण वही कर्म करते थे जो सज्जनों और बुद्धिमानों को इष्ट हैं।

श्लोक 25 (7.59.25)

स्वधां पूजां च रक्षोभिर्जनस्थाने प्रणाशिताम् । प्रादान्निहत्य रक्षांसि पितृदेवेभ्य ईश्वरः ॥

svadhāṃ pūjāṃ ca rakṣobhirjanasthāne praṇāśitām | prādānnihatya rakṣāṃsi pitṛdevebhya īśvaraḥ

प्रभु ने राक्षसों को मारकर जनस्थान में उनके द्वारा नष्ट की गई स्वधा और पूजा पितरों और देवताओं को लौटा दी।

श्लोक 26 (7.59.26)

सहस्रपुत्राः पुरुषा दशवर्षशतायुषः । न च ज्येष्ठाः कनिष्ठेभ्यस्तदा श्राद्धानि कुर्वते ॥

sahasraputrāḥ puruṣā daśavarṣaśatāyuṣaḥ | na ca jyeṣṭhāḥ kaniṣṭhebhyastadā śrāddhāni kurvate

पुरुषों के हज़ार-हज़ार पुत्र होते थे और वे दस सौ वर्ष जीते थे; तब बड़े भाइयों को छोटों के श्राद्ध नहीं करने पड़ते थे।

श्लोक 27 (7.59.27)

श्यामो युवा लोहिताक्षो मत्तमातङ्गविक्रमः । आजानुबाहुः सुभुजः सिंहस्कन्धो महाबलः ॥

śyāmo yuvā lohitākṣo mattamātaṅgavikramaḥ | ājānubāhuḥ subhujaḥ siṃhaskandho mahābalaḥ

श्याम वर्ण, युवा, लाल नेत्रों वाले, मतवाले हाथी जैसे पराक्रम वाले, घुटनों तक लम्बी सुन्दर भुजाओं वाले, सिंह जैसे कन्धों वाले, महाबली —

श्लोक 28 (7.59.28)

दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च । सर्वभूतमनःकान्तो रामो राज्यमकारयत् ॥

daśavarṣasahasrāṇi daśavarṣaśatāni ca | sarvabhūtamanaḥkānto rāmo rājyamakārayat

सब प्राणियों के मन को प्रिय राम ने दस हज़ार और दस सौ वर्ष तक राज्य किया।

श्लोक 29 (7.59.29)

रामो रामो राम इति प्रजानामभवत्कथा । रामभूतं जगदभूद्रामे राज्यं प्रशासति ॥

rāmo rāmo rāma iti prajānāmabhavatkathā | rāmabhūtaṃ jagadabhūdrāme rājyaṃ praśāsati

प्रजा की चर्चा में "राम, राम, राम" ही था; राम के राज्य करते समय जगत् राममय हो गया।

श्लोक 30 (7.59.30)

चतुर्विधाः प्रजा रामः स्वर्गं नीत्वा दिवं गतः । आत्मेच्छया प्रतिष्ठाप्य राजवंशमिहाष्टधा ॥

caturvidhāḥ prajā rāmaḥ svargaṃ nītvā divaṃ gataḥ | ātmecchayā pratiṣṭhāpya rājavaṃśamihāṣṭadhā

राम चारों प्रकार के प्राणियों को स्वर्ग ले जाकर स्वयं भी स्वर्ग को गए, अपनी इच्छा से यहाँ राजवंश को आठ शाखाओं में प्रतिष्ठित करके।

श्लोक 31 (7.59.31)

स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात्पुण्यतरस्तुभ्यं मा पुत्रमनुतप्यथाः । अयज्वानमदक्षिण्यमभि श्वैत्येत्युदाहरत् ॥

sa cenmamāra sṛñjaya caturbhadratarastvayā | putrātpuṇyatarastubhyaṃ mā putramanutapyathāḥ | ayajvānamadakṣiṇyamabhi śvaityetyudāharat

यदि वह भी मर गया, हे सृञ्जय — जो तुमसे चार प्रकार से अधिक भाग्यशाली था और तुम्हारे पुत्र से अधिक पुण्यवान् था — तो तुम अपने उस पुत्र के लिए शोक मत करो, जिसने न यज्ञ किया, न दक्षिणा दी। इस प्रकार नारद ने श्वैत्य से कहा।

अध्याय 58अध्याय-सूचीअध्याय 60