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द्रोण पर्व · अध्याय 6

दुर्योधन द्वारा द्रोण से सेनापति बनने की प्रार्थना

कर्ण की बात सुनकर दुर्योधन सेना के बीच खड़े द्रोण के पास जाकर उनसे सेनापति का पद स्वीकार करने की प्रार्थना करता है। वह द्रोण के कुल, विद्या, आयु और पराक्रम की प्रशंसा करता है, उन्हें देवताओं और प्राणियों में श्रेष्ठों के समान बताता है, ग्यारह अक्षौहिणी सेना उनके अधीन करता है और कहता है कि उनके नेतृत्व में वह निश्चय ही युधिष्ठिर को जीत लेगा। उपस्थित राजा द्रोण की जय पुकारते हैं और सैनिक हर्षध्वनि करते हैं; तब द्रोण उत्तर देने को तत्पर होते हैं।

अध्याय 5अध्याय-सूचीअध्याय 7

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.6.1)

कर्णस्य वचनं श्रुत्वा राजा दुर्योधनस्तदा । सेनामध्यगतं द्रोणमिदं वचनमब्रवीत् ॥

karṇasya vacanaṃ śrutvā rājā duryodhanastadā | senāmadhyagataṃ droṇamidaṃ vacanamabravīt

कर्ण की बात सुनकर राजा दुर्योधन ने उस समय सेना के बीच स्थित द्रोण से यह वचन कहा।

दुर्योधन उवाच

श्लोक 2 (7.6.2)

वर्णश्रैष्ठ्यात्कुलोत्पत्त्या श्रुतेन वयसा धिया । वीर्याद्दाक्ष्यादधृष्यत्वादर्थज्ञानान्नयाज्जयात् ॥

varṇaśraiṣṭhyātkulotpattyā śrutena vayasā dhiyā | vīryāddākṣyādadhṛṣyatvādarthajñānānnayājjayāt

वर्ण की श्रेष्ठता, कुल में जन्म, शास्त्रज्ञान, आयु और बुद्धि से, वीरता, दक्षता, अजेयता, अर्थ-ज्ञान, नीति और विजयों से,

श्लोक 3 (7.6.3)

तपसा च कृतज्ञत्वाद्वृद्धः सर्वगुणैरपि । युक्तो भवत्समो गोप्ता राज्ञामन्यो न विद्यते ॥

tapasā ca kṛtajñatvādvṛddhaḥ sarvaguṇairapi | yukto bhavatsamo goptā rājñāmanyo na vidyate

तथा तप और कृतज्ञता से, सब गुणों से सम्पन्न वृद्ध आप ही हैं; राजाओं का आपके समान दूसरा कोई रक्षक नहीं है।

श्लोक 4 (7.6.4)

स भवान्पातु नः सर्वान्देवानिव शतक्रतुः । भवन्नेत्राः पराञ्जेतुमिच्छामो द्विजसत्तम ॥

sa bhavānpātu naḥ sarvāndevāniva śatakratuḥ | bhavannetrāḥ parāñjetumicchāmo dvijasattama

अतः जैसे इन्द्र देवताओं की रक्षा करते हैं, वैसे ही आप हम सबकी रक्षा कीजिए। हे द्विजश्रेष्ठ, हम आपको नेता बनाकर शत्रुओं को जीतना चाहते हैं।

श्लोक 5 (7.6.5)

रुद्राणामिव कापालिर्वसूनामिव पावकः । कुबेर इव यक्षाणां मरुतामिव वासवः ॥

rudrāṇāmiva kāpālirvasūnāmiva pāvakaḥ | kubera iva yakṣāṇāṃ marutāmiva vāsavaḥ

जैसे रुद्रों में कपाली (शिव), वसुओं में पावक (अग्नि), यक्षों में कुबेर और मरुतों में वासव (इन्द्र),

श्लोक 6 (7.6.6)

वसिष्ठ इव विप्राणां तेजसामिव भास्करः । पितॄणामिव धर्मेन्द्रो यादसामिव चाम्बुराट् ॥

vasiṣṭha iva viprāṇāṃ tejasāmiva bhāskaraḥ | pitṝṇāmiva dharmendro yādasāmiva cāmburāṭ

जैसे ब्राह्मणों में वसिष्ठ, तेजस्वियों में सूर्य, पितरों में धर्मेन्द्र (यम) और जलचरों में जलों के राजा (वरुण),

श्लोक 7 (7.6.7)

नक्षत्राणामिव शशी दितिजानामिवोशनाः । सर्वेषामिव लोकानां विश्वस्य च यथा क्षयः ॥

nakṣatrāṇāmiva śaśī ditijānāmivośanāḥ | sarveṣāmiva lokānāṃ viśvasya ca yathā kṣayaḥ

जैसे नक्षत्रों में चन्द्रमा, दितिपुत्रों में उशना (शुक्र), और जैसे सब लोकों तथा समस्त विश्व का प्रलय,

श्लोक 8 (7.6.8)

विश्वोत्पत्तिस्थितिलये श्रेष्ठो नारायणः प्रभुः । एवं सेनाप्रणेतॄणां मम सेनापतिर्भव ॥

viśvotpattisthitilaye śreṣṭho nārāyaṇaḥ prabhuḥ | evaṃ senāpraṇetṝṇāṃ mama senāpatirbhava

और जैसे विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और लय में प्रभु नारायण श्रेष्ठ हैं, वैसे ही सेनानायकों में आप मेरे सेनापति हों।

श्लोक 9 (7.6.9)

अक्षौहिण्यो दशैका च वशगाः सन्तु तेऽनघ । ताभिः शत्रून्प्रतिव्यूह्य जहीन्द्रो दानवानिव ॥

akṣauhiṇyo daśaikā ca vaśagāḥ santu te'nagha | tābhiḥ śatrūnprativyūhya jahīndro dānavāniva

हे निष्पाप, ग्यारह अक्षौहिणी सेनाएँ आपके वश में रहें। उनके साथ शत्रुओं के विरुद्ध व्यूह रचकर उन्हें वैसे ही मारिए, जैसे इन्द्र दानवों को मारते हैं।

श्लोक 10 (7.6.10)

प्रयातु नो भवानग्रे देवानामिव पावकिः । अनुयास्यामहे त्वाऽऽजौ सौरभेया इवर्षभम् ॥

prayātu no bhavānagre devānāmiva pāvakiḥ | anuyāsyāmahe tvā''jau saurabheyā ivarṣabham

जैसे देवताओं के आगे पावकि (स्कन्द) चलते हैं, वैसे ही आप हमारे आगे चलिए; हम युद्ध में आपके पीछे वैसे ही चलेंगे, जैसे गौएँ साँड़ के पीछे चलती हैं।

श्लोक 11 (7.6.11)

उग्रधन्वा महेष्वासो दिव्यं विष्फारयन्धनुः । दृष्ट्वा भवन्तं सङ्ग्रामे नार्जुनः प्रहरिष्यति ॥

ugradhanvā maheṣvāso divyaṃ viṣphārayandhanuḥ | dṛṣṭvā bhavantaṃ saṅgrāme nārjunaḥ prahariṣyati

उग्र धनुष वाला महान् धनुर्धर अर्जुन अपना दिव्य धनुष टंकारता है; पर युद्ध में आपको देखकर वह प्रहार नहीं करेगा।

श्लोक 12 (7.6.12)

ध्रुवं युधिष्ठिरं सङ्ख्ये सानुबन्धं सबान्धवम् । जेष्यामि पुरुषव्याघ्र भवान्सेनापतिर्यदि ॥

dhruvaṃ yudhiṣṭhiraṃ saṅkhye sānubandhaṃ sabāndhavam | jeṣyāmi puruṣavyāghra bhavānsenāpatiryadi

हे पुरुषव्याघ्र, यदि आप सेनापति हों, तो मैं युद्ध में युधिष्ठिर को उसके अनुयायियों और बन्धुओं सहित निश्चय ही जीत लूँगा।

सञ्जय उवाच

श्लोक 13 (7.6.13)

एवमुक्ते ततो द्रोणं जयेत्यूचुर्नराधिपाः । सिंहनादेन महता हर्षयन्तस्तवात्मजम् ॥

evamukte tato droṇaṃ jayetyūcurnarādhipāḥ | siṃhanādena mahatā harṣayantastavātmajam

ऐसा कहे जाने पर राजाओं ने द्रोण के लिए "जय हो" पुकारा और महान् सिंहनाद से आपके पुत्र को हर्षित किया।

श्लोक 14 (7.6.14)

सैनिकाश्च मुदा युक्ता वर्धयन्ति द्विजोत्तमम् । दुर्योधनं पुरस्कृत्य प्रार्थयन्तो महद्यशः । दुर्योधनं ततो राजन्द्रोणो वचनमब्रवीत् ॥

sainikāśca mudā yuktā vardhayanti dvijottamam | duryodhanaṃ puraskṛtya prārthayanto mahadyaśaḥ | duryodhanaṃ tato rājandroṇo vacanamabravīt

हर्ष से भरे सैनिक दुर्योधन को आगे करके, महान् यश की कामना करते हुए, द्विजश्रेष्ठ द्रोण का जयघोष करने लगे। तब हे राजन्, द्रोण ने दुर्योधन से कहा।

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