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द्रोण पर्व · अध्याय 7

द्रोण का सेनापति-अभिषेक और सेनाओं का प्रस्थान

द्रोण सेनापति का पद स्वीकार करते हैं; वे पाण्डवों से लड़ने का वचन देते हैं, पर धृष्टद्युम्न को न मारने की बात कहते हैं, क्योंकि वह उन्हीं के वध के लिए उत्पन्न हुआ है। दुर्योधन और राजा विधिपूर्वक, वाद्यों और मंगलध्वनि के साथ उनका सेनापति-पद पर अभिषेक करते हैं। सञ्जय कौरव-व्यूह का वर्णन करते हैं, जिसके आगे कर्ण है, और पाण्डवों के क्रौञ्च-व्यूह का, जिसके आगे अर्जुन की वानर-ध्वजा है; फिर द्रोण के प्रस्थान पर प्रकट भयंकर अपशकुन बताते हैं। युद्ध आरम्भ होता है और द्रोण पाण्डव-सृञ्जयों की पंक्तियों को तितर-बितर कर देते हैं, जब तक धृष्टद्युम्न उन्हें रोकता है।

अध्याय 6अध्याय-सूचीअध्याय 8

द्रोण उवाच

श्लोक 1 (7.7.1)

वेदं षडङ्गं वेदाहमर्थविद्यां च मानवीम् । त्रैय्यम्बकमथेष्वस्त्रं शस्त्राणि विविधानि च ॥

vedaṃ ṣaḍaṅgaṃ vedāhamarthavidyāṃ ca mānavīm | traiyyambakamatheṣvastraṃ śastrāṇi vividhāni ca

मैं छह अंगों सहित वेद को, मनु-प्रोक्त अर्थविद्या को, त्र्यम्बक की विद्या को, धनुर्विद्या को और अनेक प्रकार के शस्त्रों को जानता हूँ।

श्लोक 2 (7.7.2)

ये चाप्युक्ता मयि गुणा भवद्भिर्जयकाङ्क्षिभिः । चिकीर्षुस्तानहं सर्वान्योधयिष्यामि पाण्डवान् ॥

ye cāpyuktā mayi guṇā bhavadbhirjayakāṅkṣibhiḥ | cikīrṣustānahaṃ sarvānyodhayiṣyāmi pāṇḍavān

आप विजय चाहने वालों ने मुझमें जो गुण बताए हैं, उन सबको सत्य सिद्ध करना चाहता हुआ मैं पाण्डवों से युद्ध करूँगा।

श्लोक 3 (7.7.3)

पार्षतं तु रणे राजन्न हनिष्ये कथञ्चन । स हि सृष्टो वधार्थाय ममैव पुरुषर्षभः ॥

pārṣataṃ tu raṇe rājanna haniṣye kathañcana | sa hi sṛṣṭo vadhārthāya mamaiva puruṣarṣabhaḥ

परन्तु हे राजन्, मैं पृषत-पुत्र (धृष्टद्युम्न) को युद्ध में किसी प्रकार नहीं मारूँगा; वह पुरुषश्रेष्ठ मेरे ही वध के लिए रचा गया है।

श्लोक 4 (7.7.4)

योधयिष्यामि सैन्यानि नाशयन्सर्वसोमकान् । न च मां पाण्डवा युद्धे योधयिष्यन्ति हर्षिताः ॥

yodhayiṣyāmi sainyāni nāśayansarvasomakān | na ca māṃ pāṇḍavā yuddhe yodhayiṣyanti harṣitāḥ

मैं सब सोमकों का संहार करते हुए उनकी सेनाओं से लड़ूँगा; और हर्ष में भरे पाण्डव भी युद्ध में मुझसे नहीं लड़ेंगे।

सञ्जय उवाच

श्लोक 5 (7.7.5)

स एवमभ्यनुज्ञातश्चक्रे सेनापतिं ततः । द्रोणं तव सुतो राजन्विधिदृष्टेन कर्मणा ॥

sa evamabhyanujñātaścakre senāpatiṃ tataḥ | droṇaṃ tava suto rājanvidhidṛṣṭena karmaṇā

इस प्रकार अनुमति पाकर हे राजन्, आपके पुत्र ने विधि के अनुसार किए गए कर्म से द्रोण को सेनापति बनाया।

श्लोक 6 (7.7.6)

अथाभिषिषिचुर्द्रोणं दुर्योधनमुखा नृपाः । स्वस्तिवादरवैश्चान्यैः श्लक्ष्णैश्चान्यैर्मनोरमैः । सैनापत्ये यथा स्कन्दं पुरा शक्रमुखाः सुराः ॥

athābhiṣiṣicurdroṇaṃ duryodhanamukhā nṛpāḥ | svastivādaravaiścānyaiḥ ślakṣṇaiścānyairmanoramaiḥ | saināpatye yathā skandaṃ purā śakramukhāḥ surāḥ

तब दुर्योधन को आगे करके राजाओं ने द्रोण का अभिषेक किया, स्वस्तिवाचन की ध्वनियों और अन्य मधुर, मनोहर स्वरों के साथ, जैसे पूर्वकाल में इन्द्र आदि देवताओं ने स्कन्द को सेनापति-पद पर अभिषिक्त किया था।

श्लोक 7 (7.7.7)

ततो वादित्रघोषेण शङ्खानां च महास्वनैः । प्रादुरासीत्कृते द्रोणे हर्षः सेनापतौ तदा ॥

tato vāditraghoṣeṇa śaṅkhānāṃ ca mahāsvanaiḥ | prādurāsītkṛte droṇe harṣaḥ senāpatau tadā

तब वाद्यों के घोष और शंखों के महानाद के साथ, द्रोण के सेनापति बनाए जाने पर हर्ष छा गया।

श्लोक 8 (7.7.8)

ततः पुण्याहघोषेण साशीर्वादस्वनेन च । संस्तवैर्गीतशब्दैश्च सूतमागधबन्दिनाम् ॥

tataḥ puṇyāhaghoṣeṇa sāśīrvādasvanena ca | saṃstavairgītaśabdaiśca sūtamāgadhabandinām

तब पुण्याह-घोष, आशीर्वाद की ध्वनि, तथा सूतों, मागधों और बन्दियों की स्तुतियों और गीतों के बीच,

श्लोक 9 (7.7.9)

जयशब्दैर्द्विजाग्र्याणां सुभगानर्तितैस्तथा । सत्कृत्य विधिना द्रोणं मेनिरे पाण्डवाञ्जितान् ॥

jayaśabdairdvijāgryāṇāṃ subhagānartitaistathā | satkṛtya vidhinā droṇaṃ menire pāṇḍavāñjitān

श्रेष्ठ ब्राह्मणों की जय-ध्वनि और सौभाग्यवती स्त्रियों के नृत्यों के साथ विधिपूर्वक द्रोण का सत्कार करके उन्होंने पाण्डवों को जीता हुआ मान लिया।

श्लोक 10 (7.7.10)

सैनापत्यं तु संप्राप्य भारद्वाजो महारथः । युयुत्सुर्व्यूह्य सैन्यानि प्रायात्तव सुतैः सह ॥

saināpatyaṃ tu saṃprāpya bhāradvājo mahārathaḥ | yuyutsurvyūhya sainyāni prāyāttava sutaiḥ saha

सेनापतित्व पाकर महारथी भारद्वाज युद्ध की इच्छा से सेनाओं की व्यूह-रचना करके आपके पुत्रों के साथ चल पड़े।

श्लोक 11 (7.7.11)

सैन्धवश्च कलिङ्गश्च विकर्णश्च तवात्मजः । दक्षिणं पार्श्वमास्थाय समतिष्ठन्त दंशिताः ॥

saindhavaśca kaliṅgaśca vikarṇaśca tavātmajaḥ | dakṣiṇaṃ pārśvamāsthāya samatiṣṭhanta daṃśitāḥ

सैन्धव (जयद्रथ), कलिंगराज और आपका पुत्र विकर्ण कवच धारण किए दाहिने पार्श्व में स्थित हुए।

श्लोक 12 (7.7.12)

प्रपक्षः शकुनिस्तेषां प्रवरैर्हयसादिभिः । ययौ गान्धारकैः सार्धं विमलप्रासयोधिभिः ॥

prapakṣaḥ śakunisteṣāṃ pravarairhayasādibhiḥ | yayau gāndhārakaiḥ sārdhaṃ vimalaprāsayodhibhiḥ

शकुनि उनके पक्ष-रूप में श्रेष्ठ अश्वारोहियों तथा उज्ज्वल भाले चलाने वाले गान्धारों के साथ चला।

श्लोक 13 (7.7.13)

कृपश्च कृतवर्मा च चित्रसेनो विविंशतिः । दुःशासनमुखा यत्ताः सव्यं पक्षमपालयन् ॥

kṛpaśca kṛtavarmā ca citraseno viviṃśatiḥ | duḥśāsanamukhā yattāḥ savyaṃ pakṣamapālayan

कृप, कृतवर्मा, चित्रसेन और विविंशति ने, दुःशासन को आगे रखकर, सावधान होकर बायाँ पार्श्व सँभाला।

श्लोक 14 (7.7.14)

तेषां प्रपक्षाः काम्भोजाः सुदक्षिणपुरस्सराः । ययुरश्वैर्महावेगैः शकाश्च यवनैः सह ॥

teṣāṃ prapakṣāḥ kāmbhojāḥ sudakṣiṇapurassarāḥ | yayuraśvairmahāvegaiḥ śakāśca yavanaiḥ saha

उनके पक्षों में सुदक्षिण के नेतृत्व वाले काम्बोज तेज़ घोड़ों पर चले, और शक यवनों के साथ गए।

श्लोक 15 (7.7.15)

मद्रास्त्रिगर्ताः साम्बष्ठाः प्रतीच्योदीच्यमालवाः । शिबयः शूरसेनाश्च शूद्राश्च मलदैः सह ॥

madrāstrigartāḥ sāmbaṣṭhāḥ pratīcyodīcyamālavāḥ | śibayaḥ śūrasenāśca śūdrāśca maladaiḥ saha

मद्र, त्रिगर्त, अम्बष्ठ, पश्चिमी और उत्तरी मालव, शिबि, शूरसेन और शूद्र, मलदों के साथ,

श्लोक 16 (7.7.16)

सौवीराः कितवाः प्राच्या दाक्षिणात्याश्च सर्वशः । तवात्मजं पुरस्कृत्य सूतपुत्रस्य पृष्ठतः ॥

sauvīrāḥ kitavāḥ prācyā dākṣiṇātyāśca sarvaśaḥ | tavātmajaṃ puraskṛtya sūtaputrasya pṛṣṭhataḥ

सौवीर, कितव, तथा पूर्व और दक्षिण के सब लोग आपके पुत्र को आगे करके सूतपुत्र के पीछे चले।

श्लोक 17 (7.7.17)

हर्षयन्तः स्वसैन्यानि ययुस्तव सुतैः सह । प्रवरः सर्वयोधानां बलेषु बलमादधत् ॥

harṣayantaḥ svasainyāni yayustava sutaiḥ saha | pravaraḥ sarvayodhānāṃ baleṣu balamādadhat

अपनी सेनाओं को हर्षित करते हुए वे आपके पुत्रों के साथ चले; सब योद्धाओं में श्रेष्ठ वह सेनाओं में बल भरता हुआ चला।

श्लोक 18 (7.7.18)

ययौ वैकर्तनः कर्णः प्रमुखे सर्वधन्विनाम् । तस्य दीप्तो महाकायः स्वान्यनीकानि हर्षयन् ॥

yayau vaikartanaḥ karṇaḥ pramukhe sarvadhanvinām | tasya dīpto mahākāyaḥ svānyanīkāni harṣayan

वैकर्तन कर्ण सब धनुर्धारियों के आगे चला; उसका विशाल शरीर दीप्त हो रहा था और वह अपनी टुकड़ियों को हर्षित कर रहा था।

श्लोक 19 (7.7.19)

हस्तिकक्ष्यो महाकेतुर्बभौ सूर्यसमद्युतिः । न भीष्मव्यसनं कश्चिदृष्ट्वा कर्णममन्यत ॥

hastikakṣyo mahāketurbabhau sūryasamadyutiḥ | na bhīṣmavyasanaṃ kaścidṛṣṭvā karṇamamanyata

हाथी की कक्ष्या (रस्सी) के चिह्न वाली उसकी महाध्वजा सूर्य के समान तेज से चमक रही थी। कर्ण को देखकर किसी को भीष्म की विपत्ति का ध्यान नहीं रहा।

श्लोक 20 (7.7.20)

विशोकाश्चाभवन्सर्वे राजानः कुरुभिः सह । हृष्टाश्च बहवो योधास्तत्राजल्पन्त वेगतः ॥

viśokāścābhavansarve rājānaḥ kurubhiḥ saha | hṛṣṭāśca bahavo yodhāstatrājalpanta vegataḥ

कुरुओं के साथ सब राजा शोकरहित हो गए, और हर्ष से भरे बहुत-से योद्धा वहाँ उत्साह से बोलने लगे।

योधा ऊचुः

श्लोक 21 (7.7.21)

न हि कर्णं रणे दृष्ट्वा युधि स्थास्यन्ति पाण्डवाः । कर्णो हि समरे शक्तो जेतुं देवान्सवासवान् ॥

na hi karṇaṃ raṇe dṛṣṭvā yudhi sthāsyanti pāṇḍavāḥ | karṇo hi samare śakto jetuṃ devānsavāsavān

"युद्ध में कर्ण को देखकर पाण्डव टिक नहीं सकेंगे; कर्ण समर में वासव (इन्द्र) सहित देवताओं को भी जीतने में समर्थ है।"

श्लोक 22 (7.7.22)

किमु पाण्डुसुतान्युद्धे हीनवीर्यपराक्रमान् । भीष्मेण तु रणे पार्थाः पालिता बाहुशालिना ॥

kimu pāṇḍusutānyuddhe hīnavīryaparākramān | bhīṣmeṇa tu raṇe pārthāḥ pālitā bāhuśālinā

"फिर बल और पराक्रम में हीन पाण्डु-पुत्रों की तो बात ही क्या? रणभूमि में पार्थों की रक्षा तो बाहुबली भीष्म ने की थी।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 23 (7.7.23)

तांस्तु कर्णः शरैस्तीक्ष्णैर्नाशयिष्यति संयुगे । एवं ब्रुवन्तस्तेऽन्योन्यं हृष्टरूपा विशांपते ॥

tāṃstu karṇaḥ śaraistīkṣṇairnāśayiṣyati saṃyuge | evaṃ bruvantaste'nyonyaṃ hṛṣṭarūpā viśāṃpate

"कर्ण तीखे बाणों से युद्ध में उनका नाश कर देगा।" हे प्रजापति, इस प्रकार हर्षित वे आपस में कहते हुए

श्लोक 24 (7.7.24)

राधेयं पूजयन्तश्च प्रशंसन्तश्च निर्ययुः । अस्माकं शकटव्यूहो द्रोणेन विहितोऽभवत् ॥

rādheyaṃ pūjayantaśca praśaṃsantaśca niryayuḥ | asmākaṃ śakaṭavyūho droṇena vihito'bhavat

राधेय का सम्मान और प्रशंसा करते हुए निकल पड़े। हमारा व्यूह द्रोण ने शकट (गाड़ी) के आकार का रचा था,

श्लोक 25 (7.7.25)

परेषां क्रौञ्च एवासीद्व्यूहो राजन्महात्मनाम् । प्रीयमाणेन विहितो धर्मराजेन भारत ॥

pareṣāṃ krauñca evāsīdvyūho rājanmahātmanām | prīyamāṇena vihito dharmarājena bhārata

और हे राजन्, उन महात्मा शत्रुओं का व्यूह क्रौञ्च (बगुला) आकार का था, जिसे हे भारत, धर्मराज ने प्रसन्न होकर रचा था।

श्लोक 26 (7.7.26)

व्यूहप्रमुखतस्तेषां तस्थतुः पुरुषर्षभौ । वानरध्वजमुच्छ्रित्य विष्वक्सेनधनंजयौ ॥

vyūhapramukhatasteṣāṃ tasthatuḥ puruṣarṣabhau | vānaradhvajamucchritya viṣvaksenadhanaṃjayau

उनके व्यूह के आगे वानर-ध्वज ऊँचा उठाए दो पुरुषश्रेष्ठ, विष्वक्सेन (कृष्ण) और धनंजय, खड़े थे।

श्लोक 27 (7.7.27)

ककुदं सर्वसैन्यानां धाम सर्वधनुष्मताम् । आदित्यपथगः केतुः पार्थस्यामिततेजसः ॥

kakudaṃ sarvasainyānāṃ dhāma sarvadhanuṣmatām | ādityapathagaḥ ketuḥ pārthasyāmitatejasaḥ

सब सेनाओं का शिखर, सब धनुर्धारियों का आश्रय, अमित तेज वाले पार्थ की वह ध्वजा, जो आकाश में सूर्य के मार्ग पर पहुँचती थी,

श्लोक 28 (7.7.28)

दीपयामास तत्सैन्यं पाण्डवस्य महात्मनः । यथा प्रज्वलितः सूर्यो युगान्ते वै वसुंधराम् ॥

dīpayāmāsa tatsainyaṃ pāṇḍavasya mahātmanaḥ | yathā prajvalitaḥ sūryo yugānte vai vasuṃdharām

उन महात्मा पाण्डव की सेना को उसी प्रकार प्रकाशित कर रही थी, जैसे युगान्त में प्रज्वलित सूर्य पृथ्वी को प्रकाशित करता है।

श्लोक 29 (7.7.29)

दीप्यन्दृश्येत हि तथा केतुः सर्वत्र धीमतः । योधानामर्जुनः श्रेष्ठो गाण्डीवं धनुषां वरम् ॥

dīpyandṛśyeta hi tathā ketuḥ sarvatra dhīmataḥ | yodhānāmarjunaḥ śreṣṭho gāṇḍīvaṃ dhanuṣāṃ varam

इस प्रकार उन बुद्धिमान् की वह ध्वजा सब ओर दीप्त दिखाई देती थी। योद्धाओं में अर्जुन श्रेष्ठ है और धनुषों में गाण्डीव श्रेष्ठ है,

श्लोक 30 (7.7.30)

वासुदेवश्च भूतानां चक्राणां च सुदर्शनम् । चत्वार्येतानि तेजांसि वहञ्श्वेतहयो रथः ॥

vāsudevaśca bhūtānāṃ cakrāṇāṃ ca sudarśanam | catvāryetāni tejāṃsi vahañśvetahayo rathaḥ

वासुदेव प्राणियों में श्रेष्ठ हैं और सुदर्शन चक्रों में — इन चार तेजों को वह श्वेत अश्वों वाला रथ धारण किए हुए था,

श्लोक 31 (7.7.31)

परेषामग्रतस्तस्थौ कालचक्रमिवोद्यतम् । एवं तौ सुमहात्मानौ बलसेनाग्रगावुभौ ॥

pareṣāmagratastasthau kālacakramivodyatam | evaṃ tau sumahātmānau balasenāgragāvubhau

और शत्रुओं के सामने उठे हुए कालचक्र के समान खड़ा था। इस प्रकार वे दोनों महात्मा, सेना और बल के अग्रभाग में स्थित,

श्लोक 32 (7.7.32)

तावकानां मुखे कर्णः परेषां च धनंजयः । ततो जयाभिसंरब्धौ परस्परवधैषिणौ ॥

tāvakānāṃ mukhe karṇaḥ pareṣāṃ ca dhanaṃjayaḥ | tato jayābhisaṃrabdhau parasparavadhaiṣiṇau

आपकी सेना के मुख पर कर्ण और शत्रुओं के मुख पर धनंजय थे; तब विजय की उमंग से उत्तेजित, एक-दूसरे का वध चाहने वाले वे दोनों,

श्लोक 33 (7.7.33)

अवेक्षेतां तदान्योन्यं समरे कर्णपाण्डवौ । ततः प्रयाते सहसा भारद्वाजे महारथे ॥

avekṣetāṃ tadānyonyaṃ samare karṇapāṇḍavau | tataḥ prayāte sahasā bhāradvāje mahārathe

युद्ध में कर्ण और पाण्डव (अर्जुन) एक-दूसरे को देखने लगे। तब जब महारथी भारद्वाज सहसा आगे बढ़े,

श्लोक 34 (7.7.34)

सिंहनादेन घोरेण वसुधा समकम्पत । ततस्तुमुलमाकाशमावृणोत्सदिवाकरम् ॥

siṃhanādena ghoreṇa vasudhā samakampata | tatastumulamākāśamāvṛṇotsadivākaram

तो भयंकर सिंहनाद से पृथ्वी काँप उठी, और फिर उसने सूर्य सहित कोलाहल से भरे आकाश को ढक लिया —

श्लोक 35 (7.7.35)

वातोद्भूतं रजस्तीव्रं कौशेयनिकरोपमम् । ववर्ष द्यौरनभ्राऽपि मांसास्थिरुधिराण्युत ॥

vātodbhūtaṃ rajastīvraṃ kauśeyanikaropamam | vavarṣa dyauranabhrā'pi māṃsāsthirudhirāṇyuta

वायु से उड़ी हुई प्रचण्ड धूल, जो रेशमी वस्त्रों के ढेर जैसी थी; और बिना बादलों के भी आकाश से मांस, हड्डियों और रक्त की वर्षा हुई।

श्लोक 36 (7.7.36)

गृध्राः श्येना बकाः कङ्का वायसाश्च सहस्रशः । उपर्युपरि सेनां ते तदा पर्यपतन्नृप ॥

gṛdhrāḥ śyenā bakāḥ kaṅkā vāyasāśca sahasraśaḥ | uparyupari senāṃ te tadā paryapatannṛpa

हे राजन्, गीध, बाज, बगुले, कंक और कौए हज़ारों की संख्या में उस समय आपकी सेना के ऊपर-ऊपर मँडराकर गिर रहे थे।

श्लोक 37 (7.7.37)

गोमायवश्च प्राक्रोशन्भयदान्दारुणान्रवान् । अकार्षुरपसव्यं च बहुशः पृतनां तव ॥

gomāyavaśca prākrośanbhayadāndāruṇānravān | akārṣurapasavyaṃ ca bahuśaḥ pṛtanāṃ tava

सियार भयदायक, भयानक स्वर में चीख़ रहे थे, और वे बार-बार आपकी सेना को अपने बाएँ रखकर घूमे, जो अशुभ संकेत था।

श्लोक 38 (7.7.38)

चिखादिषन्तो मांसानि पिपासन्तश्च शोणितम् । अपतद्दीप्यमाना च सनिर्घाता सकम्पना ॥

cikhādiṣanto māṃsāni pipāsantaśca śoṇitam | apataddīpyamānā ca sanirghātā sakampanā

मांस खाने और रक्त पीने की लालसा से वे चिल्ला रहे थे; और गड़गड़ाहट तथा भूकम्प के साथ एक जलती हुई उल्का गिरी,

श्लोक 39 (7.7.39)

उल्का ज्वलन्ती सङ्ग्रामे पुच्छेनावृत्य सर्वशः । परिवेषो महांश्चापि सविद्युत्स्तनयित्नुमान् ॥

ulkā jvalantī saṅgrāme pucchenāvṛtya sarvaśaḥ | pariveṣo mahāṃścāpi savidyutstanayitnumān

युद्ध में जलती हुई उल्का, जो अपनी पूँछ से सब ओर को ढक रही थी; और बिजली और गर्जन के साथ एक विशाल परिवेश (मण्डल),

श्लोक 40 (7.7.40)

भास्करस्याभवद्राजन्प्रयाते वाहिनीपतौ । एते चान्ये च बहवः प्रादुरासन्सुदारुणाः । उत्पाता युधि वीराणां जीवितक्षयकारिणः ॥

bhāskarasyābhavadrājanprayāte vāhinīpatau | ete cānye ca bahavaḥ prādurāsansudāruṇāḥ | utpātā yudhi vīrāṇāṃ jīvitakṣayakāriṇaḥ

सूर्य के चारों ओर प्रकट हुआ, हे राजन्, जब सेनापति आगे बढ़े। ये और दूसरे बहुत-से अत्यन्त भयंकर उत्पात प्रकट हुए, जो युद्ध में वीरों के प्राणों का अन्त करने वाले थे।

श्लोक 41 (7.7.41)

ततः प्रववृते युद्धं परस्परवधैषिणाम् । कुरुपाण्डवसैन्यानां शब्देनापूरयज्जगत् ॥

tataḥ pravavṛte yuddhaṃ parasparavadhaiṣiṇām | kurupāṇḍavasainyānāṃ śabdenāpūrayajjagat

तब एक-दूसरे का वध चाहने वाले कुरु और पाण्डव सैनिकों का युद्ध आरम्भ हुआ, और उनके शब्द से संसार भर गया।

श्लोक 42 (7.7.42)

ते त्वन्योन्यं सुसंरब्धाः पाण्डवाः कौरवैः सह । अभ्यघ्नन्निशितैः शस्त्रैर्जयगृद्धाः प्रहारिणः ॥

te tvanyonyaṃ susaṃrabdhāḥ pāṇḍavāḥ kauravaiḥ saha | abhyaghnanniśitaiḥ śastrairjayagṛddhāḥ prahāriṇaḥ

क्रोध से भरे पाण्डव और कौरव विजय के लोभी और प्रहार करने वाले होकर एक-दूसरे पर तीखे शस्त्रों से वार करने लगे।

श्लोक 43 (7.7.43)

स पाण्डवानां महतीं महेष्वासो महाद्युतिः । वेगेनाभ्यद्रवत्सेनां किरञ्शरशतैः शितैः ॥

sa pāṇḍavānāṃ mahatīṃ maheṣvāso mahādyutiḥ | vegenābhyadravatsenāṃ kirañśaraśataiḥ śitaiḥ

महान् तेजस्वी महाधनुर्धर (द्रोण) सैकड़ों तीखे बाण बरसाते हुए पाण्डवों की विशाल सेना पर वेग से टूट पड़े।

श्लोक 44 (7.7.44)

द्रोणमभ्युद्यतं दृष्ट्वा पाण्डवाः सहसृञ्जयैः । प्रत्यगृह्णंस्तदा राजञ्छरवर्षैः पृथक्पृथक् ॥

droṇamabhyudyataṃ dṛṣṭvā pāṇḍavāḥ sahasṛñjayaiḥ | pratyagṛhṇaṃstadā rājañcharavarṣaiḥ pṛthakpṛthak

द्रोण को आगे बढ़ते देखकर पाण्डवों ने सृञ्जयों के साथ, हे राजन्, अलग-अलग बाणवर्षा से उनका सामना किया।

श्लोक 45 (7.7.45)

विक्षोभ्यमाणा द्रोणेन भिद्यमाना महाचमूः । व्यशीर्यत सपाञ्चाला वातेनेव वलाहकाः ॥

vikṣobhyamāṇā droṇena bhidyamānā mahācamūḥ | vyaśīryata sapāñcālā vāteneva valāhakāḥ

द्रोण से विक्षुब्ध और छिन्न-भिन्न की जाती हुई वह विशाल सेना पाञ्चालों सहित वैसे ही बिखर गई, जैसे वायु से बादल बिखर जाते हैं।

श्लोक 46 (7.7.46)

बहूनीह विकुर्वाणो दिव्यान्यस्त्राणि संयुगे । अपीडयत्क्षणेनैव द्रोणः पाण्डवसृञ्जयान् ॥

bahūnīha vikurvāṇo divyānyastrāṇi saṃyuge | apīḍayatkṣaṇenaiva droṇaḥ pāṇḍavasṛñjayān

युद्ध में अनेक दिव्य अस्त्रों का प्रयोग करते हुए द्रोण ने क्षण भर में पाण्डवों और सृञ्जयों को पीड़ित कर दिया।

श्लोक 47 (7.7.47)

ते वध्यमाना द्रोणेन वासवेनेव दानवाः । पाञ्चालाः समकम्पन्त धृष्टद्युम्नपुरोगमाः ॥

te vadhyamānā droṇena vāsaveneva dānavāḥ | pāñcālāḥ samakampanta dhṛṣṭadyumnapurogamāḥ

वासव द्वारा दानवों की तरह द्रोण द्वारा मारे जाते हुए धृष्टद्युम्न-प्रमुख पाञ्चाल काँप उठे।

श्लोक 48 (7.7.48)

ततो दिव्यास्त्रविच्छूरो याज्ञसेनिर्महारथः । अभिनच्छरवर्षेण द्रोणानीकमनेकधा ॥

tato divyāstravicchūro yājñasenirmahārathaḥ | abhinaccharavarṣeṇa droṇānīkamanekadhā

तब दिव्य अस्त्रों के ज्ञाता वीर महारथी याज्ञसेनि (धृष्टद्युम्न) ने बाणवर्षा से द्रोण की सेना को अनेक प्रकार से भेद दिया।

श्लोक 49 (7.7.49)

द्रोणस्य शरवर्षाणि शरवर्षेण पार्षतः । सन्निवार्य ततः सर्वान्कुरूनप्यवधीद्बली ॥

droṇasya śaravarṣāṇi śaravarṣeṇa pārṣataḥ | sannivārya tataḥ sarvānkurūnapyavadhīdbalī

पृषत-पुत्र ने द्रोण की बाणवर्षाओं को अपनी बाणवर्षा से रोककर उस बलवान् ने फिर सब कुरुओं को भी मारा।

श्लोक 50 (7.7.50)

संयम्य तु ततो द्रोणः समवस्थाप्य चाहवे । स्वमनीकं महेष्वासः पार्षतं समुपाद्रवत् ॥

saṃyamya tu tato droṇaḥ samavasthāpya cāhave | svamanīkaṃ maheṣvāsaḥ pārṣataṃ samupādravat

तब महान् धनुर्धर द्रोण ने युद्ध में अपनी सेना को सँभालकर और स्थिर करके पृषत-पुत्र पर आक्रमण किया।

श्लोक 51 (7.7.51)

स बाणवर्षं सुमहदसृजत्पार्षतं प्रति । मघवान्समभिक्रुद्धः सहसा दानवानिव ॥

sa bāṇavarṣaṃ sumahadasṛjatpārṣataṃ prati | maghavānsamabhikruddhaḥ sahasā dānavāniva

उन्होंने पृषत-पुत्र पर बाणों की बहुत बड़ी वर्षा की, जैसे अत्यन्त क्रुद्ध मघवा (इन्द्र) सहसा दानवों पर करते हैं।

श्लोक 52 (7.7.52)

ते कम्प्यमाना द्रोणेन बाणैः पाण्डवसृञ्जयाः । पुनःपुनरभज्यन्त सिंहेनैवेतरे मृगाः ॥

te kampyamānā droṇena bāṇaiḥ pāṇḍavasṛñjayāḥ | punaḥpunarabhajyanta siṃhenaivetare mṛgāḥ

द्रोण के बाणों से काँपते हुए पाण्डव और सृञ्जय बार-बार टूटते रहे, जैसे सिंह के सामने अन्य पशु।

श्लोक 53 (7.7.53)

तथा पर्यपतद्रोणः पाण्डवानां बले बली । अलातचक्रवद्राजंस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥

tathā paryapatadroṇaḥ pāṇḍavānāṃ bale balī | alātacakravadrājaṃstadadbhutamivābhavat

इस प्रकार बलवान् द्रोण, हे राजन्, घुमाए जाते अलातचक्र की भाँति पाण्डव सेना पर टूट पड़े, और वह दृश्य अद्भुत था।

श्लोक 54 (7.7.54)

खचरनगरकल्पं कल्पितं शास्त्रदृष्ट्या चलदनिलपताकं ह्लादनं वल्गिताश्वम् । स्फटिकविमलकेतुं त्रासनं शात्रवाणां रथवरमधिरूढः सञ्जहारारिसेनाम् ॥

khacaranagarakalpaṃ kalpitaṃ śāstradṛṣṭyā caladanilapatākaṃ hlādanaṃ valgitāśvam | sphaṭikavimalaketuṃ trāsanaṃ śātravāṇāṃ rathavaramadhirūḍhaḥ sañjahārārisenām

वे अपने श्रेष्ठ रथ पर आरूढ़ थे, जो शास्त्र की रीति से आकाश-नगर के समान बनाया गया था, जिसकी पताकाएँ चलती वायु में लहरा रही थीं, जो अपने योद्धाओं को आनन्द देने वाला था, जिसके घोड़े उछल रहे थे, जिसकी ध्वजा स्फटिक के समान निर्मल थी और जो शत्रुओं को त्रस्त करने वाला था; उस रथ पर बैठकर उन्होंने शत्रु-सेना का संहार किया।

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