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द्रोण पर्व · अध्याय 66

नारद द्वारा गय का वृत्तान्त

नारद सृञ्जय को राजा गय की कथा सुनाते हैं, जिन्होंने सौ वर्ष तक यज्ञ-शेष पर निर्वाह किया और जिन्हें अग्नि ने वर दिया: वेदों का ज्ञान, दूसरों को हानि पहुँचाए बिना अक्षय धन, दान में निरन्तर श्रद्धा, उत्तम सन्तान और धर्म-कार्यों में निर्विघ्नता। गय ने सौ वर्ष तक यज्ञ किए और सोने की पृथ्वी, सोने के यूप, विशाल स्वर्णमयी वेदी तथा अन्न, वस्त्र और आभूषणों के ढेर दान किए, जिससे उनकी कीर्ति तीनों लोकों में फैल गई। वे भी मर गए, इसलिए सृञ्जय को अपने पुत्र के लिए शोक नहीं करना चाहिए।

अध्याय 65अध्याय-सूचीअध्याय 67

नारद उवाच

श्लोक 1 (7.66.1)

गयं चाधूर्तरजसं मृतं सृञ्जय शुश्रुम । यो वै वर्षशतं राजा हुतशिष्टाशनोऽभवत् ॥

gayaṃ cādhūrtarajasaṃ mṛtaṃ sṛñjaya śuśruma | yo vai varṣaśataṃ rājā hutaśiṣṭāśano'bhavat

सृञ्जय, हमने सुना है कि अधूर्तरजस् गय भी मर गए — वे राजा, जो सौ वर्ष तक हवन से बचे हुए अन्न पर ही निर्वाह करते रहे।

श्लोक 2 (7.66.2)

तस्मै ह्यग्निर्वरं प्रादात्ततो वव्रे वरं गयः । तपसा ब्रह्मचर्येण व्रतेन नियमेन च ॥

tasmai hyagnirvaraṃ prādāttato vavre varaṃ gayaḥ | tapasā brahmacaryeṇa vratena niyamena ca

अग्नि ने उसे वर दिया, और तब गय ने अपना वर माँगा। उसने कहा: ‘तप, ब्रह्मचर्य, व्रत और नियम से,

गय उवाच

श्लोक 3 (7.66.3)

गुरूणां च प्रसादेन वेदानिच्छामि वेदितुम् । स्वधर्मेणाविहिंस्यान्यान्धनमिच्छामि चाक्षयम् ॥

gurūṇāṃ ca prasādena vedānicchāmi veditum | svadharmeṇāvihiṃsyānyāndhanamicchāmi cākṣayam

‘और गुरुजनों की कृपा से मैं वेदों को जानना चाहता हूँ; और अपने धर्म के अनुसार, दूसरों को हानि पहुँचाए बिना, मैं अक्षय धन चाहता हूँ।

श्लोक 4 (7.66.4)

विप्रेषु ददतश्चैव श्रद्धा भवतु नित्यशः । कन्यासु च सवर्णासु सुप्रजस्त्वं च मे भवेत् ॥

vipreṣu dadataścaiva śraddhā bhavatu nityaśaḥ | kanyāsu ca savarṇāsu suprajastvaṃ ca me bhavet

‘ब्राह्मणों को दान देने में मेरी श्रद्धा सदा बनी रहे, और सवर्ण कन्याओं से मुझे उत्तम सन्तान प्राप्त हो।

श्लोक 5 (7.66.5)

अन्नमोजो महो मह्यं धर्मे मे रमतां मनः । अविघ्नं चास्तु मे नित्यं धर्मकार्येषु पावक ॥

annamojo maho mahyaṃ dharme me ramatāṃ manaḥ | avighnaṃ cāstu me nityaṃ dharmakāryeṣu pāvaka

‘मुझे अन्न, ओज और तेज प्राप्त हो, मेरा मन धर्म में रमा रहे; और हे पावक, धर्म-कार्यों में मुझे कभी कोई विघ्न न हो।’

नारद उवाच

श्लोक 6 (7.66.6)

तथा भविष्यतीत्युक्त्वा तत्रैवान्तरधीयत । गयो ह्यवाप्य तत्सर्वं धर्मेणाराधयञ्जगत् ॥

tathā bhaviṣyatītyuktvā tatraivāntaradhīyata | gayo hyavāpya tatsarvaṃ dharmeṇārādhayañjagat

‘ऐसा ही होगा’ कहकर अग्नि वहीं अन्तर्धान हो गए। गय ने वह सब पाकर धर्म के द्वारा जगत् को प्रसन्न किया।

श्लोक 7 (7.66.7)

स दर्शपूर्णमासाभ्यां कालेष्वाग्रयणेन च । चातुर्मास्यैश्च विविधैर्यज्ञैश्चावाप्तदक्षिणैः ॥

sa darśapūrṇamāsābhyāṃ kāleṣvāgrayaṇena ca | cāturmāsyaiśca vividhairyajñaiścāvāptadakṣiṇaiḥ

दर्श और पौर्णमास यज्ञों से, ऋतुओं में आग्रयण से, चातुर्मास्य से तथा प्रचुर दक्षिणावाले अनेक अन्य यज्ञों से,

श्लोक 8 (7.66.8)

अयजच्छ्रद्धया राजा परिसंवत्सराञ्शतम् । गवां शतसहस्राणि शतमश्वशतानि च ॥

ayajacchraddhayā rājā parisaṃvatsarāñśatam | gavāṃ śatasahasrāṇi śatamaśvaśatāni ca

राजा ने श्रद्धा से वर्ष-पर-वर्ष सौ वर्षों तक यज्ञ किया; उसने एक लाख गायें और सौ सैकड़े घोड़े दिए,

श्लोक 9 (7.66.9)

शतं निष्कसहस्राणि गवां चाप्ययुतानि षट् । उत्थायोत्थाय सम्प्रादात्परिसंवत्सराञ्शतम् ॥

śataṃ niṣkasahasrāṇi gavāṃ cāpyayutāni ṣaṭ | utthāyotthāya samprādātparisaṃvatsarāñśatam

एक लाख निष्क और छह अयुत (साठ हजार) गायें; वह हर बार उठकर सौ वर्षों तक वर्ष-पर-वर्ष दान देता रहा।

श्लोक 10 (7.66.10)

नक्षत्रेषु च सर्वेषु ददन्नक्षत्रदक्षिणाः । ईजे च विविधैर्यज्ञैर्यथा सोमोऽङ्गिरा यथा ॥

nakṣatreṣu ca sarveṣu dadannakṣatradakṣiṇāḥ | īje ca vividhairyajñairyathā somo'ṅgirā yathā

सभी नक्षत्रों में नक्षत्र-दक्षिणाएँ देते हुए उसने अनेक प्रकार के यज्ञ किए, जैसे सोम और अंगिरा ने किए थे।

श्लोक 11 (7.66.11)

सौवर्णां पृथिवीं कृत्वा य इमां मणिशर्कराम् । विप्रेभ्यः प्राददद्राजा सोऽश्वमेधे महामखे ॥

sauvarṇāṃ pṛthivīṃ kṛtvā ya imāṃ maṇiśarkarām | viprebhyaḥ prādadadrājā so'śvamedhe mahāmakhe

उस राजा ने महान् अश्वमेध यज्ञ में इस पृथ्वी को, मणियों की कंकड़ियोंवाली होते हुए भी, सोने की बनाकर ब्राह्मणों को दे दिया।

श्लोक 12 (7.66.12)

जाम्बूनदमया यूपाः सर्वे रत्नपरिच्छदाः । गयस्यासन्समृद्धास्तु सर्वभूतमनोहराः ॥

jāmbūnadamayā yūpāḥ sarve ratnaparicchadāḥ | gayasyāsansamṛddhāstu sarvabhūtamanoharāḥ

गय के सभी यूप जाम्बूनद सोने के थे, रत्नों से सजे हुए, समृद्ध और सब प्राणियों के मन को हरनेवाले।

श्लोक 13 (7.66.13)

सर्वकामसमृद्धं च प्रादादन्नं गयस्तदा । ब्राह्मणेभ्यः प्रहृष्टेभ्यः सर्वभूतेभ्य एव च ॥

sarvakāmasamṛddhaṃ ca prādādannaṃ gayastadā | brāhmaṇebhyaḥ prahṛṣṭebhyaḥ sarvabhūtebhya eva ca

तब गय ने सब मनचाही वस्तुओं से भरपूर अन्न प्रसन्न ब्राह्मणों को और सभी प्राणियों को भी दिया।

श्लोक 14 (7.66.14)

ससमुद्रवनद्वीपनदीनदवनेषु च । नगरेषु च राष्ट्रेषु दिवि व्योम्नि च येऽवसन् ॥

sasamudravanadvīpanadīnadavaneṣu ca | nagareṣu ca rāṣṭreṣu divi vyomni ca ye'vasan

और जो अनेक प्रकार के प्राणी समुद्रों, वनों और द्वीपों में, नदियों, नदों और जंगलों में, नगरों और राष्ट्रों में, स्वर्ग में और आकाश में रहते थे,

श्लोक 15 (7.66.15)

भूतग्रामाश्च विविधाः सन्तृप्ता यज्ञसम्पदा । गयस्य सदृशो यज्ञो नास्त्यन्य इति तेऽब्रुवन् ॥

bhūtagrāmāśca vividhāḥ santṛptā yajñasampadā | gayasya sadṛśo yajño nāstyanya iti te'bruvan

वे सब उस यज्ञ-सम्पदा से तृप्त हो गए और बोले, ‘गय के यज्ञ के समान कोई दूसरा यज्ञ नहीं है।’

श्लोक 16 (7.66.16)

षट्त्रिंशद्योजनायामा त्रिंशद्योजनमायता । पश्चात्पुरश्चतुर्विंशद्वेदी ह्यासीद्धिरण्मयी ॥

ṣaṭtriṃśadyojanāyāmā triṃśadyojanamāyatā | paścātpuraścaturviṃśadvedī hyāsīddhiraṇmayī

वह सोने की वेदी छत्तीस योजन लम्बी और तीस योजन चौड़ी थी, तथा पीछे से आगे तक चौबीस योजन।

श्लोक 17 (7.66.17)

गयस्य यजमानस्य मुक्तावज्रमणिस्तृता । प्रादात्स ब्राह्मणेभ्योऽथ वासांस्याभरणानि च ॥

gayasya yajamānasya muktāvajramaṇistṛtā | prādātsa brāhmaṇebhyo'tha vāsāṃsyābharaṇāni ca

यज्ञ करते हुए गय की वह वेदी मोतियों, हीरों और मणियों से बिछी हुई थी। फिर उसने ब्राह्मणों को वस्त्र और आभूषण दिए,

श्लोक 18 (7.66.18)

यथोक्ता दक्षिणाश्चान्या विप्रेभ्यो भूरिदक्षिणः । यत्र भोजनशिष्टस्य पर्वताः पञ्चविंशतिः ॥

yathoktā dakṣiṇāścānyā viprebhyo bhūridakṣiṇaḥ | yatra bhojanaśiṣṭasya parvatāḥ pañcaviṃśatiḥ

और शास्त्र में कही गई अन्य दक्षिणाएँ भी ब्राह्मणों को दीं — गय बहुत दक्षिणा देनेवाला था — और उस यज्ञ में बचे हुए भोजन के पच्चीस पर्वत थे,

श्लोक 19 (7.66.19)

कुल्याश्च क्षीरवाहिन्यो रसानां चाभवंस्तदा । वस्त्राभरणगन्धानां राशयश्च पृथग्विधाः ॥

kulyāśca kṣīravāhinyo rasānāṃ cābhavaṃstadā | vastrābharaṇagandhānāṃ rāśayaśca pṛthagvidhāḥ

और दूध बहानेवाली नहरें, तथा स्वादिष्ट रसों की धाराएँ भी थीं, और वस्त्रों, आभूषणों और गन्धों के अनेक प्रकार के ढेर लगे थे।

श्लोक 20 (7.66.20)

यस्य प्रभावाच्च गयस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः । वटश्चाक्षय्यकरणः पुण्यं ब्रह्मसरश्च तत् ॥

yasya prabhāvācca gayastriṣu lokeṣu viśrutaḥ | vaṭaścākṣayyakaraṇaḥ puṇyaṃ brahmasaraśca tat

जिसके प्रभाव से गय तीनों लोकों में प्रसिद्ध हुआ — वहाँ अक्षय वटवृक्ष था और वह पवित्र ब्रह्मसर भी।

श्लोक 21 (7.66.21)

स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात्पुण्यतरस्तुभ्यं मा पुत्रमनुतप्यथाः । अयज्वानमदक्षिण्यमभि श्वैत्येत्युदाहरत् ॥

sa cenmamāra sṛñjaya caturbhadratarastvayā | putrātpuṇyatarastubhyaṃ mā putramanutapyathāḥ | ayajvānamadakṣiṇyamabhi śvaityetyudāharat

सृञ्जय, यदि वह भी मर गया — जो तुमसे चौगुना भाग्यशाली और तुम्हारे पुत्र से अधिक पुण्यात्मा था — तो तुम अपने उस पुत्र के लिए शोक मत करो, जिसने न कभी यज्ञ किया और न दक्षिणा दी। इस प्रकार नारद ने उसे ‘श्वैत्य’ कहकर सम्बोधित किया।

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