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द्रोण पर्व · अध्याय 73

अर्जुन की जयद्रथ-वध की प्रतिज्ञा

युधिष्ठिर अर्जुन को बताते हैं कि कैसे अभिमन्यु द्रोण की सेना में घुसा, कैसे जयद्रथ ने पाण्डवों को रोक लिया, और कैसे छह योद्धाओं द्वारा रथहीन किया गया वह बालक गदायुद्ध में दौःशासनि के हाथों मारा गया। अर्जुन मूर्छित हो जाते हैं, फिर क्रोध में उठकर प्रतिज्ञा करते हैं कि अगले सूर्यास्त से पहले जयद्रथ को मारेंगे; न मार सके तो पापियों की लम्बी सूची की गतियाँ अपने ऊपर लेंगे, और सूर्य पहले अस्त हुआ तो अग्नि में प्रवेश करेंगे। कृष्ण और अर्जुन शंख बजाते हैं, पाण्डव गर्जते हैं और भीम हर्षित होते हैं, जबकि कौरव-सेना हताश हो जाती है।

अध्याय 72अध्याय-सूचीअध्याय 74

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (7.73.1)

त्वयि याते महाबाहो संशप्तकबलं प्रति । प्रयत्नमकरोत्तीव्रमाचार्यो ग्रहणे मम ॥

tvayi yāte mahābāho saṃśaptakabalaṃ prati | prayatnamakarottīvramācāryo grahaṇe mama

हे महाबाहो, जब तुम संशप्तकों की सेना की ओर चले गए, तब आचार्य द्रोण ने मुझे पकड़ने का तीव्र प्रयत्न किया।

श्लोक 2 (7.73.2)

व्यूढानीकं ततो द्रोणं यतमानं महामृधे । प्रतिव्यूह्य सहानीकाः प्रत्यरुध्म वयं बलात् ॥

vyūḍhānīkaṃ tato droṇaṃ yatamānaṃ mahāmṛdhe | prativyūhya sahānīkāḥ pratyarudhma vayaṃ balāt

तब जब द्रोण अपनी सेना का व्यूह रचकर उस महायुद्ध में जूझ रहे थे, तो हमने भी अपनी सेनाओं सहित प्रतिव्यूह बनाकर बलपूर्वक उन्हें रोका।

श्लोक 3 (7.73.3)

स वार्यमाणो रथिभिर्मयि चापि सुरक्षिते । अस्मानभिजगामाशु पीडयन्निशितैः शरैः ॥

sa vāryamāṇo rathibhirmayi cāpi surakṣite | asmānabhijagāmāśu pīḍayanniśitaiḥ śaraiḥ

रथियों के रोकने पर भी, और मेरे भली-भाँति सुरक्षित रहते हुए भी, वे तीखे बाणों से हमें पीड़ा देते हुए शीघ्र हमारी ओर बढ़ आए।

श्लोक 4 (7.73.4)

ते पीड्यमाना द्रोणेन द्रोणानीकं न शक्नुमः । प्रतिवीक्षितुमप्याजौ भेत्तुं तत्कुत एव तु ॥

te pīḍyamānā droṇena droṇānīkaṃ na śaknumaḥ | prativīkṣitumapyājau bhettuṃ tatkuta eva tu

द्रोण से पीड़ित होकर हम युद्ध में उनकी सेना की ओर देख तक नहीं सकते थे; उसे भेदने की तो बात ही क्या।

श्लोक 5 (7.73.5)

ततस्तमप्रतिरथमहं सौभद्रमब्रवम् । द्रोणानीकमिदं भिन्द्धि द्वारं सञ्जनयस्व नः ॥

tatastamapratirathamahaṃ saubhadramabravam | droṇānīkamidaṃ bhinddhi dvāraṃ sañjanayasva naḥ

तब मैंने उन अनुपम रथी सौभद्र से कहा — "द्रोण की इस सेना को भेद दो और हमारे लिए प्रवेश-द्वार बना दो।"

श्लोक 6 (7.73.6)

स तथा चोदितोऽस्माभिः सदश्व इव वीर्यवान् । असह्यमपि तं भारं वोढुमेवोपचक्रमे ॥

sa tathā codito'smābhiḥ sadaśva iva vīryavān | asahyamapi taṃ bhāraṃ voḍhumevopacakrame

हमारे इस प्रकार प्रेरित करने पर वह पराक्रमी बालक, उत्तम घोड़े की तरह, उस असह्य बोझ को भी उठाने में जुट गया।

श्लोक 7 (7.73.7)

स तवास्त्रोपदेशेन वीर्येण च समन्वितः । प्राविशत्तद्बलं बालः सुपर्ण इव सागरम् ॥

sa tavāstropadeśena vīryeṇa ca samanvitaḥ | prāviśattadbalaṃ bālaḥ suparṇa iva sāgaram

तुमसे मिली अस्त्र-शिक्षा और अपने पराक्रम से सम्पन्न वह बालक उस सेना में ऐसे घुस गया जैसे गरुड़ समुद्र में झपटता है।

श्लोक 8 (7.73.8)

तेऽनुयाता वयं वीरं सात्वतीपुत्रमाहवे । प्रवेष्टुकामास्तेनैव येन स प्राविशच्चमूम् ॥

te'nuyātā vayaṃ vīraṃ sātvatīputramāhave | praveṣṭukāmāstenaiva yena sa prāviśaccamūm

हम भी सात्वती के पुत्र उस वीर के पीछे-पीछे युद्ध में चले, उसी मार्ग से घुसना चाहते हुए जिससे वह सेना में प्रविष्ट हुआ था।

श्लोक 9 (7.73.9)

ततः सैन्धवको राजा क्षुद्रस्तात जयद्रथः । वरदानेन रुद्रस्य सर्वान्नः समवारयत् ॥

tataḥ saindhavako rājā kṣudrastāta jayadrathaḥ | varadānena rudrasya sarvānnaḥ samavārayat

तब, हे तात, सिन्धुराज नीच जयद्रथ ने रुद्र के वरदान के बल से हम सबको रोक दिया।

श्लोक 10 (7.73.10)

ततो द्रोणः कृपः कर्णो द्रौणिः कौसल्य एव च । कृतवर्मा च सौभद्रं षड्रथाः पर्यवारयन् ॥

tato droṇaḥ kṛpaḥ karṇo drauṇiḥ kausalya eva ca | kṛtavarmā ca saubhadraṃ ṣaḍrathāḥ paryavārayan

तब द्रोण, कृप, कर्ण, द्रोणपुत्र (अश्वत्थामा), कोसलराज (बृहद्बल) और कृतवर्मा — इन छह रथियों ने सौभद्र को घेर लिया।

श्लोक 11 (7.73.11)

परिवार्य तु तैः सर्वैर्युधि बालो महारथैः । यतमानः परं शक्त्या बहुभिर्विरथीकृतः ॥

parivārya tu taiḥ sarvairyudhi bālo mahārathaiḥ | yatamānaḥ paraṃ śaktyā bahubhirvirathīkṛtaḥ

उन सभी महारथियों से युद्ध में घिरा हुआ वह बालक अपनी पूरी शक्ति से लड़ता रहा, पर बहुतों ने मिलकर उसे रथहीन कर दिया।

श्लोक 12 (7.73.12)

ततो दौःशासनिः क्षिप्रं तथा तैर्विरथीकृतम् । संशयं परमं प्राप्तं पदातिनमवस्थितम् । गदाहस्तोऽभ्ययात्तूर्णं जिघांसुरपराजितम् ॥

tato dauḥśāsaniḥ kṣipraṃ tathā tairvirathīkṛtam | saṃśayaṃ paramaṃ prāptaṃ padātinamavasthitam | gadāhasto'bhyayāttūrṇaṃ jighāṃsuraparājitam

तब रथहीन किए गए, परम संकट में पड़े और पैदल खड़े उस अपराजित वीर को मारने की इच्छा से दौःशासनि गदा हाथ में लिए तुरन्त उस पर झपटा।

श्लोक 13 (7.73.13)

गदिनं त्वथ तं दृष्ट्वा वासवस्यात्मजात्मजः । स जग्राह गदां वीरो गदायुद्धविशारदः ॥

gadinaṃ tvatha taṃ dṛṣṭvā vāsavasyātmajātmajaḥ | sa jagrāha gadāṃ vīro gadāyuddhaviśāradaḥ

तब इन्द्र के पुत्र (अर्जुन) के पुत्र अभिमन्यु ने उसे गदा लिए देखा तो गदायुद्ध में निपुण उस वीर ने भी गदा उठा ली।

श्लोक 14 (7.73.14)

गदामण्डलमार्गस्थौ सर्वक्षत्रस्य पश्यतः । तौ सम्प्रजग्मतुर्वीरावन्योन्यस्यान्तरैषणौ ॥

gadāmaṇḍalamārgasthau sarvakṣatrasya paśyataḥ | tau samprajagmaturvīrāvanyonyasyāntaraiṣaṇau

सब क्षत्रियों के देखते-देखते, गदा के मण्डलाकार पैंतरों में स्थित वे दोनों वीर एक-दूसरे का छिद्र खोजते हुए भिड़ गए।

श्लोक 15 (7.73.15)

तावन्योन्यं गदाग्राभ्यां ताडितौ युद्धदुर्मदौ । इन्द्रध्वजाविवोत्सृष्टौ गतसत्वौ महींगतौ ॥

tāvanyonyaṃ gadāgrābhyāṃ tāḍitau yuddhadurmadau | indradhvajāvivotsṛṣṭau gatasatvau mahīṃgatau

गदा के अग्रभाग से एक-दूसरे पर प्रहार करते हुए, युद्ध के मद में चूर वे दोनों, गिराए गए दो इन्द्रध्वजों की भाँति, बलहीन होकर धरती पर गिर पड़े।

श्लोक 16 (7.73.16)

दौःशासनिरथोत्थाय कुरूणां कीर्तिवर्धनः । उत्तिष्ठमानं सौभद्रं गदया मूर्ध्न्यताडयत् ॥

dauḥśāsanirathotthāya kurūṇāṃ kīrtivardhanaḥ | uttiṣṭhamānaṃ saubhadraṃ gadayā mūrdhnyatāḍayat

तब कुरुओं की कीर्ति बढ़ाने वाला दौःशासनि उठ खड़ा हुआ और उठते हुए सौभद्र के सिर पर गदा से प्रहार किया।

श्लोक 17 (7.73.17)

गदावेगेन महता व्यायामेन च मोहितः । विमना न्यपतद्भूमौ सौभद्रः परवीरहा ॥

gadāvegena mahatā vyāyāmena ca mohitaḥ | vimanā nyapatadbhūmau saubhadraḥ paravīrahā

गदा के भारी वेग और परिश्रम से मूर्छित, शत्रुवीरों का संहारक सौभद्र बेसुध-सा होकर धरती पर गिर पड़ा।

श्लोक 18 (7.73.18)

स तु हत्वा सहस्राणि द्विपाश्वरथपत्तिनाम् । राजपुत्रशतं चाग्र्यं वीरांश्चालक्षितान्बहून् ॥

sa tu hatvā sahasrāṇi dvipāśvarathapattinām | rājaputraśataṃ cāgryaṃ vīrāṃścālakṣitānbahūn

पर गिरने से पहले उसने हजारों हाथियों, घोड़ों, रथों और पैदलों को मारा था, सौ श्रेष्ठ राजकुमारों को और बहुत-से अनजाने वीरों को भी।

श्लोक 19 (7.73.19)

बृहद्बलं च राजानं स्वर्गेण समयोजयत् । गतः सुकृतिनां लोकान्ये च स्वर्गजितां शुभाः ॥

bṛhadbalaṃ ca rājānaṃ svargeṇa samayojayat | gataḥ sukṛtināṃ lokānye ca svargajitāṃ śubhāḥ

उसने राजा बृहद्बल को भी स्वर्ग पहुँचा दिया; और वह स्वयं पुण्यात्माओं के उन लोकों में गया है जो स्वर्ग जीतने वालों के शुभ लोक हैं —

श्लोक 20 (7.73.20)

अदीनस्त्रासयञ्छत्रून्नन्दयित्वा च बान्धवान् । असकृन्नाम विश्राव्य पितॄणां मातुलस्य च ॥

adīnastrāsayañchatrūnnandayitvā ca bāndhavān | asakṛnnāma viśrāvya pitṝṇāṃ mātulasya ca

निर्भय रहकर शत्रुओं को त्रास देता और बन्धुओं को आनन्द देता हुआ, अपना तथा अपने पितरों और मामा का नाम बार-बार सुनाता हुआ —

श्लोक 21 (7.73.21)

वीरो दिष्टान्तमापन्नः शोचयन्बान्धवान्बहून् । ततः स्म शोकसन्तप्ता भवताऽद्य समेयुषः ॥

vīro diṣṭāntamāpannaḥ śocayanbāndhavānbahūn | tataḥ sma śokasantaptā bhavatā'dya sameyuṣaḥ

वह वीर अपने अन्तिम समय को प्राप्त हुआ और बहुत-से बन्धुओं को शोक में डाल गया। तब शोक से सन्तप्त हम सब आज तुम्हारे पास आ मिले हैं।

श्लोक 22 (7.73.22)

एतावदेव निर्वृत्तमस्माकं शोकवर्धनम् । स चैवं पुरुषव्याघ्रः स्वर्गलोकमवाप्तवान् ॥

etāvadeva nirvṛttamasmākaṃ śokavardhanam | sa caivaṃ puruṣavyāghraḥ svargalokamavāptavān

हमारे शोक को बढ़ाने वाली बस इतनी ही घटना हुई है। और इस प्रकार वह पुरुषसिंह स्वर्गलोक को प्राप्त हो गया।

सञ्जय उवाच

श्लोक 23 (7.73.23)

ततोऽर्जुनो वचः श्रुत्वा धर्मराजेन भाषितम् । हा पुत्र इति निःश्वस्य व्यथितो न्यपतद्भुवि ॥

tato'rjuno vacaḥ śrutvā dharmarājena bhāṣitam | hā putra iti niḥśvasya vyathito nyapatadbhuvi

तब धर्मराज की यह बात सुनकर अर्जुन "हा पुत्र!" कहकर आह भरते हुए व्यथित हो भूमि पर गिर पड़े।

श्लोक 24 (7.73.24)

विषण्णवदनाः सर्वे परिवार्य धनञ्जयम् । नेत्रैरनिमिषैर्दीनाः प्रत्यवैक्षन्परस्परम् ॥

viṣaṇṇavadanāḥ sarve parivārya dhanañjayam | netrairanimiṣairdīnāḥ pratyavaikṣanparasparam

सब लोग उदास मुख लिए धनंजय को घेरकर खड़े हो गए और दीन भाव से अपलक नेत्रों से एक-दूसरे को देखने लगे।

श्लोक 25 (7.73.25)

प्रतिलभ्य ततः संज्ञां वासविः क्रोधमूर्च्छितः । कम्पमानो ज्वरेणेव निःश्वसंश्च मुहुर्मुहुः ॥

pratilabhya tataḥ saṃjñāṃ vāsaviḥ krodhamūrcchitaḥ | kampamāno jvareṇeva niḥśvasaṃśca muhurmuhuḥ

फिर होश आने पर इन्द्र-पुत्र अर्जुन क्रोध से अचेत-से हो गए; वे ज्वर से काँपते हुए-से बार-बार लम्बी साँसें लेने लगे,

श्लोक 26 (7.73.26)

पाणिं पाणौ विनिष्पिष्य दन्तान्कटकटाय्य च । त्रिशिखां भ्रुकुटीं कृत्वा क्रोधसंरक्तलोचनः । उन्मत्त इव विप्रेक्षन्निदं वचनमब्रवीत् ॥

pāṇiṃ pāṇau viniṣpiṣya dantānkaṭakaṭāyya ca | triśikhāṃ bhrukuṭīṃ kṛtvā krodhasaṃraktalocanaḥ | unmatta iva viprekṣannidaṃ vacanamabravīt

हाथ पर हाथ रगड़कर, दाँत पीसकर, तीन रेखाओं वाली भौंहें चढ़ाकर और क्रोध से लाल आँखें किए, उन्मत्त की भाँति इधर-उधर देखते हुए उन्होंने यह वचन कहा —

अर्जुन उवाच

श्लोक 27 (7.73.27)

सत्यं वः प्रतिजानामि श्वोऽस्मि हन्ता जयद्रथम् । न चेद्वधभयाद्भीतो धार्तराष्ट्रान्प्रहास्यति ॥

satyaṃ vaḥ pratijānāmi śvo'smi hantā jayadratham | na cedvadhabhayādbhīto dhārtarāṣṭrānprahāsyati

मैं तुम सबसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ — कल मैं जयद्रथ को मार डालूँगा, यदि वह वध के भय से डरकर धृतराष्ट्र के पुत्रों को छोड़कर न भाग जाए,

श्लोक 28 (7.73.28)

न चास्माञ्शरणं गच्छेत्कृष्णं वा पुरुषोत्तमम् । भवन्तं वा महाराज श्वोऽस्मि हन्ता जयद्रथम् ॥

na cāsmāñśaraṇaṃ gacchetkṛṣṇaṃ vā puruṣottamam | bhavantaṃ vā mahārāja śvo'smi hantā jayadratham

और न हमारी, न पुरुषोत्तम कृष्ण की, और न हे महाराज, आपकी शरण में आए। कल मैं जयद्रथ को मार डालूँगा।

श्लोक 29 (7.73.29)

धार्तराष्ट्रप्रियकरं मयि विस्मृतसौहृदम् । पापं बालवधे हेतुं श्वोऽस्मि हन्ता जयद्रथम् ॥

dhārtarāṣṭrapriyakaraṃ mayi vismṛtasauhṛdam | pāpaṃ bālavadhe hetuṃ śvo'smi hantā jayadratham

जो पापी धृतराष्ट्र-पुत्रों का प्रिय करने वाला है, जिसने मेरे प्रति मित्रता भुला दी और जो बालक के वध का कारण बना — कल मैं उस जयद्रथ को मार डालूँगा।

श्लोक 30 (7.73.30)

रक्षमाणाश्च तं सङ्ख्ये ये मां योत्स्यन्ति केचन । अपि द्रोणकृपौ राजञ्छादयिष्यामि ताञ्छरैः ॥

rakṣamāṇāśca taṃ saṅkhye ye māṃ yotsyanti kecana | api droṇakṛpau rājañchādayiṣyāmi tāñcharaiḥ

और युद्ध में उसकी रक्षा करते हुए जो कोई मुझसे लड़ेंगे, हे राजन्, द्रोण और कृप भी हों तो भी मैं उन्हें बाणों से ढक दूँगा।

श्लोक 31 (7.73.31)

यद्येतदेवं सङ्ग्रामे न कुर्यां पुरुषर्षभाः । मा स्म पुण्यकृतां लोकान्प्राप्नुयां शूरसम्मतान् ॥

yadyetadevaṃ saṅgrāme na kuryāṃ puruṣarṣabhāḥ | mā sma puṇyakṛtāṃ lokānprāpnuyāṃ śūrasammatān

हे पुरुषश्रेष्ठो, यदि मैं युद्ध में ऐसा न कर सकूँ तो मुझे शूरवीरों से सम्मानित पुण्यात्माओं के लोक कभी न मिलें।

श्लोक 32 (7.73.32)

ये लोका मातृहन्तॄणां ये चापि पितृघातिनाम् । गुरुदारगतानां ये पिशुनानां च ये सदा ॥

ye lokā mātṛhantṝṇāṃ ye cāpi pitṛghātinām | gurudāragatānāṃ ye piśunānāṃ ca ye sadā

जो लोक माता को मारने वालों के हैं, पिता का घात करने वालों के हैं, गुरु-पत्नी के पास जाने वालों के हैं और सदा चुगली करने वालों के हैं —

श्लोक 33 (7.73.33)

साधूनसूयतां ये च ये चापि परिवादिनाम् । ये च निक्षेपहन्तॄणां ये च विश्वासघातिनाम् ॥

sādhūnasūyatāṃ ye ca ye cāpi parivādinām | ye ca nikṣepahantṝṇāṃ ye ca viśvāsaghātinām

जो साधुओं से द्वेष करने वालों के, निन्दकों के, धरोहर हड़पने वालों के और विश्वासघातियों के लोक हैं —

श्लोक 34 (7.73.34)

भुक्तपूर्वां स्त्रियं ये च निन्दतामघशंसिनाम् । ब्रह्मघ्नानां च ये लोका ये च गोघातिनामपि ॥

bhuktapūrvāṃ striyaṃ ye ca nindatāmaghaśaṃsinām | brahmaghnānāṃ ca ye lokā ye ca goghātināmapi

जो पहले भोगी हुई स्त्री की निन्दा करने वालों के और पाप का बखान करने वालों के हैं, ब्रह्महत्यारों के और गोहत्यारों के भी जो लोक हैं —

श्लोक 35 (7.73.35)

पायसं वा यवान्नं वा शाकं कृसरमेव वा । संयावापूपमांसानि ये च लोका वृथाश्नताम् । तानह्नैवाधिगच्छेयं न चेद्धन्यां जयद्रथम् ॥

pāyasaṃ vā yavānnaṃ vā śākaṃ kṛsarameva vā | saṃyāvāpūpamāṃsāni ye ca lokā vṛthāśnatām | tānahnaivādhigaccheyaṃ na ceddhanyāṃ jayadratham

और खीर, जौ का अन्न, साग, कृसर, संयाव, पूए और मांस को जो लोग बिना अर्पण किए यों ही खाते हैं, उनके जो लोक हैं — यदि मैं जयद्रथ को न मारूँ तो उसी दिन उन लोकों को प्राप्त होऊँ।

श्लोक 36 (7.73.36)

वेदाध्यायिनमत्यर्थं संशितं वा द्विजोत्तमम् । अवमन्यमानो यान्याति वृद्धान्साधून्गुरूंस्तथा ॥

vedādhyāyinamatyarthaṃ saṃśitaṃ vā dvijottamam | avamanyamāno yānyāti vṛddhānsādhūngurūṃstathā

जो वेदाध्ययन में अत्यन्त लगे हुए या कठोर व्रती श्रेष्ठ ब्राह्मण का, तथा वृद्धों, साधुओं और गुरुओं का अपमान करता है, वह जिन लोकों में जाता है —

श्लोक 37 (7.73.37)

स्पृशतो ब्राह्मणं गां च पादेनाग्निं च या भवेत् । याऽप्सु श्लेष्म पुरीषं च मूत्रं वा मुञ्चतां गतिः । तां गच्छेयं गतिं कष्टां न चेद्धन्यां जयद्रथम् ॥

spṛśato brāhmaṇaṃ gāṃ ca pādenāgniṃ ca yā bhavet | yā'psu śleṣma purīṣaṃ ca mūtraṃ vā muñcatāṃ gatiḥ | tāṃ gaccheyaṃ gatiṃ kaṣṭāṃ na ceddhanyāṃ jayadratham

जो ब्राह्मण, गौ या अग्नि को पैर से छूते हैं, और जो जल में कफ, मल या मूत्र त्यागते हैं, उनकी जो गति होती है — यदि मैं जयद्रथ को न मारूँ तो उसी कष्टदायक गति को प्राप्त होऊँ।

श्लोक 38 (7.73.38)

नग्नस्य स्नायमानस्य या च वन्ध्याऽतिथेर्गतिः । उत्कोचिनां मृषोक्तीनां वञ्चकानां च या गतिः ॥

nagnasya snāyamānasya yā ca vandhyā'tithergatiḥ | utkocināṃ mṛṣoktīnāṃ vañcakānāṃ ca yā gatiḥ

जो नग्न होकर स्नान करता है, जिसके यहाँ से अतिथि निराश लौटता है, जो घूस लेते हैं, झूठ बोलते हैं और ठगते हैं, उनकी जो गति है —

श्लोक 39 (7.73.39)

आत्मापहारिणां या च या च मिथ्याभिशंसिनाम् । भृत्यैः सन्दृश्यमानानां पुत्रदाराश्रितैस्तथा ॥

ātmāpahāriṇāṃ yā ca yā ca mithyābhiśaṃsinām | bhṛtyaiḥ sandṛśyamānānāṃ putradārāśritaistathā

जो अपने को अन्य रूप में दिखाते हैं, जो झूठा अभियोग लगाते हैं, और जो सेवकों, पुत्रों तथा पत्नी जैसे आश्रितों के देखते हुए खाते हैं, उनकी जो गति है —

श्लोक 40 (7.73.40)

असंविभज्य क्षुद्राणां या गतिर्मिष्टमश्नताम् । तां गच्छेयं गतिं घोरां न चेद्धन्यां जयद्रथम् ॥

asaṃvibhajya kṣudrāṇāṃ yā gatirmiṣṭamaśnatām | tāṃ gaccheyaṃ gatiṃ ghorāṃ na ceddhanyāṃ jayadratham

और जो क्षुद्र (दीन) जनों को बाँटे बिना मिठाई खाते हैं, उनकी जो भयंकर गति है — यदि मैं जयद्रथ को न मारूँ तो उसी गति को प्राप्त होऊँ।

श्लोक 41 (7.73.41)

संश्रितं चापि यस्त्यक्त्वा साधुं तद्वचने रतम् । न बिभर्ति नृशंसात्मा निन्दते चोपकारिणम् ॥

saṃśritaṃ cāpi yastyaktvā sādhuṃ tadvacane ratam | na bibharti nṛśaṃsātmā nindate copakāriṇam

जो क्रूर हृदय का मनुष्य अपनी शरण में आए, अपनी बात मानने वाले सज्जन को छोड़कर उसका भरण-पोषण नहीं करता और उपकारी की निन्दा करता है —

श्लोक 42 (7.73.42)

अर्हते प्रातिवेश्याय श्राद्धं यो न ददाति च । अनर्हेभ्यश्च यो दद्याद्वृषलीपतये तथा ॥

arhate prātiveśyāya śrāddhaṃ yo na dadāti ca | anarhebhyaśca yo dadyādvṛṣalīpataye tathā

और जो योग्य पड़ोसी को श्राद्ध का भोजन नहीं देता, पर अयोग्यों को तथा शूद्रा के पति को भी देता है —

श्लोक 43 (7.73.43)

मद्यपो भिन्नमर्यादः कृतघ्नो भर्तृनिन्दकः । तेषां गतिमियां क्षिप्रं न चेद्धन्यां जयद्रथम् ॥

madyapo bhinnamaryādaḥ kṛtaghno bhartṛnindakaḥ | teṣāṃ gatimiyāṃ kṣipraṃ na ceddhanyāṃ jayadratham

शराबी, मर्यादा तोड़ने वाला, कृतघ्न और स्वामी की निन्दा करने वाला — इन सबकी गति को मैं शीघ्र प्राप्त होऊँ, यदि मैं जयद्रथ को न मारूँ।

श्लोक 44 (7.73.44)

भुञ्जानानां तु सव्येन उत्सङ्गे चापि खादताम् । पालाशमासनं चैव तिन्दुकैर्दन्तधावनम् ॥

bhuñjānānāṃ tu savyena utsaṅge cāpi khādatām | pālāśamāsanaṃ caiva tindukairdantadhāvanam

जो बाएँ हाथ से खाते हैं या गोद में रखकर खाते हैं, जो पलाश का आसन और तिन्दुक की दातुन काम में लाते हैं —

श्लोक 45 (7.73.45)

ये चावर्जयतां लोकाः स्वपतां च तथोषसि । शीतभीताश्च ये विप्रा रणभीताश्च क्षत्रियाः ॥

ye cāvarjayatāṃ lokāḥ svapatāṃ ca tathoṣasi | śītabhītāśca ye viprā raṇabhītāśca kṣatriyāḥ

जो इन्हें त्यागते नहीं और जो भोर में सोते हैं, तथा जो सर्दी से डरने वाले ब्राह्मण और युद्ध से डरने वाले क्षत्रिय हैं — उनके लोक —

श्लोक 46 (7.73.46)

एककूपोदकग्रामे वेदध्वनिविवर्जिते । षण्मासं तत्र वसतां तथा शास्त्रं विनिन्दताम् ॥

ekakūpodakagrāme vedadhvanivivarjite | ṣaṇmāsaṃ tatra vasatāṃ tathā śāstraṃ vinindatām

जो ऐसे गाँव में, जहाँ एक ही कुआँ हो और वेद की ध्वनि न सुनाई देती हो, छह महीने तक रहते हैं, और जो शास्त्र की निन्दा करते हैं —

श्लोक 47 (7.73.47)

दिवामैथुनिनां चापि दिवसेषु च शेरते । अगारदाहिनां चैव गरदानां च ये मताः ॥

divāmaithunināṃ cāpi divaseṣu ca śerate | agāradāhināṃ caiva garadānāṃ ca ye matāḥ

जो दिन में स्त्री-सहवास करते हैं और दिनों में सोते रहते हैं, तथा जो घर जलाने वाले और विष देने वाले माने गए हैं —

श्लोक 48 (7.73.48)

अग्न्यातिथ्यविहीनाश्च गोपानेषु च विघ्नदाः । रजस्वलां सेवयन्तः कन्यां शुल्केन दायिनः ॥

agnyātithyavihīnāśca gopāneṣu ca vighnadāḥ | rajasvalāṃ sevayantaḥ kanyāṃ śulkena dāyinaḥ

जो अग्निहोत्र और अतिथि-सत्कार से रहित हैं, जो गौओं के पानी पीने के स्थानों में बाधा डालते हैं, जो रजस्वला स्त्री के साथ रहते हैं और जो कन्या को मूल्य लेकर देते हैं —

श्लोक 49 (7.73.49)

या च वै बहुयाजिनां ब्राह्मणानां श्ववृत्तिनाम् । आस्यमैथुनिकानां च ये दिवामैथुने रताः ॥

yā ca vai bahuyājināṃ brāhmaṇānāṃ śvavṛttinām | āsyamaithunikānāṃ ca ye divāmaithune ratāḥ

और जो बहुतों का यज्ञ कराने वाले, कुत्ते की-सी वृत्ति से जीने वाले ब्राह्मण हैं, जो मुख-मैथुन करने वाले हैं और जो दिन में मैथुन में लगे रहते हैं, उनकी गति —

श्लोक 50 (7.73.50)

ब्राह्मणस्य प्रतिश्रुत्य यो वै लोभाद्ददाति न । तेषां गतिं गमिष्यामि श्वो न हन्यां जयद्रथम् ॥

brāhmaṇasya pratiśrutya yo vai lobhāddadāti na | teṣāṃ gatiṃ gamiṣyāmi śvo na hanyāṃ jayadratham

तथा जो ब्राह्मण को देने का वचन देकर लोभ से नहीं देता — इन सबकी गति को मैं प्राप्त होऊँगा, यदि कल जयद्रथ को न मारूँ।

श्लोक 51 (7.73.51)

धर्मादपेता ये चान्ये मया नात्रानुकीर्तिताः । ये चानुकीर्तितास्तेषां गतिं क्षिप्रमवाप्नुयाम् ॥

dharmādapetā ye cānye mayā nātrānukīrtitāḥ | ye cānukīrtitāsteṣāṃ gatiṃ kṣipramavāpnuyām

इनके सिवा धर्म से गिरे हुए और भी जो लोग हैं जिनका मैंने यहाँ नाम नहीं लिया, उनकी और जिनका नाम लिया है उनकी भी गति मुझे शीघ्र प्राप्त हो —

श्लोक 52 (7.73.52)

यदि व्युष्टामिमां रात्रिं श्वो न हन्यां जयद्रथम् । इमां चाप्यपरां भूयः प्रतिज्ञां मे निबोधत ॥

yadi vyuṣṭāmimāṃ rātriṃ śvo na hanyāṃ jayadratham | imāṃ cāpyaparāṃ bhūyaḥ pratijñāṃ me nibodhata

यदि इस रात के बीतने पर कल मैं जयद्रथ को न मारूँ। मेरी यह दूसरी प्रतिज्ञा भी सुनो —

श्लोक 53 (7.73.53)

यद्यस्मिन्नहते पापे सूर्योऽस्तमुपयास्यति । इहैव सम्प्रवेष्टाऽहं ज्वलितं जातवेदसम् ॥

yadyasminnahate pāpe sūryo'stamupayāsyati | ihaiva sampraveṣṭā'haṃ jvalitaṃ jātavedasam

यदि उस पापी के न मारे जाने पर सूर्य अस्त हो गया, तो मैं यहीं प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगा।

श्लोक 54 (7.73.54)

असुरसुरमनुष्याः पक्षिणो वोरगा वा । पितृरजनिचरा वा ब्रह्मदेवर्षयो वा । चरमचरमपीदं यत्परं चापि तस्मात् । तदपि मम रिपुं तं रक्षितुं नैव शक्ताः ॥

asurasuramanuṣyāḥ pakṣiṇo voragā vā | pitṛrajanicarā vā brahmadevarṣayo vā | caramacaramapīdaṃ yatparaṃ cāpi tasmāt | tadapi mama ripuṃ taṃ rakṣituṃ naiva śaktāḥ

असुर, देवता और मनुष्य, पक्षी और नाग, पितर और राक्षस, ब्राह्मण और देवर्षि — यह सारा चराचर जगत और इससे परे जो कुछ भी है — यह सब भी मेरे उस शत्रु की रक्षा करने में समर्थ नहीं है।

श्लोक 55 (7.73.55)

यदि विशति रसातलं तदग्र्यं । वियदपि देवपुरं दितेः पुरं वा । तदपि शरशतैरहं प्रभाते । भृशमभिमन्युरिपोः शिरोऽभिहर्ता ॥

yadi viśati rasātalaṃ tadagryaṃ | viyadapi devapuraṃ diteḥ puraṃ vā | tadapi śaraśatairahaṃ prabhāte | bhṛśamabhimanyuripoḥ śiro'bhihartā

यदि वह श्रेष्ठ रसातल में घुस जाए, या आकाश में, या देवताओं के नगर में, या दिति (के पुत्रों) के नगर में चला जाए, तो भी मैं प्रातःकाल सैकड़ों बाणों से अभिमन्यु के उस शत्रु का सिर काट गिराऊँगा।

सञ्जय उवाच

श्लोक 56 (7.73.56)

एवमुक्त्वा विचिक्षेप गाण्डीवं सव्यदक्षिणम् । तस्य सर्वमतिक्रम्य धनुःशब्दोऽस्पृशद्दिवम् ॥

evamuktvā vicikṣepa gāṇḍīvaṃ savyadakṣiṇam | tasya sarvamatikramya dhanuḥśabdo'spṛśaddivam

ऐसा कहकर अर्जुन ने बाएँ और दाएँ दोनों हाथों से गाण्डीव खींचा; उसकी टंकार सब ध्वनियों को पार करके आकाश को छू गई।

श्लोक 57 (7.73.57)

अर्जुनेन प्रतिज्ञाते पाञ्चजन्यं जनार्दनः । प्रदध्मौ तत्र सङ्क्रुद्धो देवदत्तं च फल्गुनः ॥

arjunena pratijñāte pāñcajanyaṃ janārdanaḥ | pradadhmau tatra saṅkruddho devadattaṃ ca phalgunaḥ

अर्जुन के प्रतिज्ञा करने पर जनार्दन ने वहाँ पाञ्चजन्य बजाया और क्रोध में भरे फल्गुन ने देवदत्त शंख फूँका।

श्लोक 58 (7.73.58)

स पाञ्चजन्योऽच्युतवक्त्रवायुना । भृशं सुपूर्णोदरनिःसृतध्वनिः । जगत्सपातालवियद्दिगीश्वरं । प्रकम्पयामास युगात्यये यथा ॥

sa pāñcajanyo'cyutavaktravāyunā | bhṛśaṃ supūrṇodaraniḥsṛtadhvaniḥ | jagatsapātālaviyaddigīśvaraṃ | prakampayāmāsa yugātyaye yathā

अच्युत के मुख की वायु से भरे हुए, अपने पूर्ण उदर से निकली ध्वनि वाले उस पाञ्चजन्य ने पाताल, आकाश, दिशाओं और उनके अधिपतियों सहित सारे जगत को युगान्त की भाँति कँपा दिया।

श्लोक 59 (7.73.59)

ततो वादित्रघोषाश्च प्रादुरासन्सहस्रशः । सिंहनादश्च पाण्डूनां प्रतिज्ञाते महात्मना ॥

tato vāditraghoṣāśca prādurāsansahasraśaḥ | siṃhanādaśca pāṇḍūnāṃ pratijñāte mahātmanā

तब महात्मा अर्जुन के प्रतिज्ञा करने पर हजारों वाद्यों की ध्वनि और पाण्डवों के सिंहनाद उठने लगे।

श्लोक 60 (7.73.60)

प्रानृत्यदिव गाण्डीवं शरास्तूणीगता मुदा । निराक्रामन्निव तदा स्वयमेव मृधैषिणः ॥

prānṛtyadiva gāṇḍīvaṃ śarāstūṇīgatā mudā | nirākrāmanniva tadā svayameva mṛdhaiṣiṇaḥ

गाण्डीव मानो हर्ष से नाच उठा और तरकस में पड़े बाण युद्ध की इच्छा से मानो अपने आप ही बाहर निकल पड़े।

श्लोक 61 (7.73.61)

भीमसेनः सुसंहृष्टः प्रत्यभाषत भारत । धनञ्जयमभिप्रेक्ष्य हर्षगद्गदया गिरा ॥

bhīmasenaḥ susaṃhṛṣṭaḥ pratyabhāṣata bhārata | dhanañjayamabhiprekṣya harṣagadgadayā girā

हे भारत, तब अत्यन्त हर्षित भीमसेन ने धनंजय की ओर देखकर हर्ष से गद्गद वाणी में कहा —

भीमसेन उवाच

श्लोक 62 (7.73.62)

प्रतिज्ञोद्भवशब्देन कृष्णशङ्खस्वनेन च । निहतो धार्तराष्ट्रोऽयं सानुबन्धः सुयोधनः ॥

pratijñodbhavaśabdena kṛṣṇaśaṅkhasvanena ca | nihato dhārtarāṣṭro'yaṃ sānubandhaḥ suyodhanaḥ

"तुम्हारी प्रतिज्ञा से उठे शब्द और कृष्ण के शंख की ध्वनि से यह धृतराष्ट्र-पुत्र सुयोधन अपने बन्धुओं सहित मारा ही गया।"

श्लोक 63 (7.73.63)

अथ मृदिततमाग्र्यदाममाल्यं । तव सुतशोकमयं च रोषजातम् । व्यपनुदति महाप्रभावमेतन् । नरवर वाक्यमिदं महार्थमिष्टम् ॥

atha mṛditatamāgryadāmamālyaṃ | tava sutaśokamayaṃ ca roṣajātam | vyapanudati mahāprabhāvametan | naravara vākyamidaṃ mahārthamiṣṭam

"हे नरश्रेष्ठ, अर्थ में गहरी, प्रिय और महान् प्रभाव वाली यह वाणी तुम्हारी उस दशा को दूर कर रही है जो मसले हुए श्रेष्ठ हार-माला के समान मुरझाई हुई, पुत्र-शोक से भरी और क्रोध से उपजी है।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 64 (7.73.64)

अथ शङ्खैश्च भेरीभिः पणवैः सैनिकास्तथा । ससूतमागधा जिष्णुं स्तुतिभिः समपूजयन् ॥

atha śaṅkhaiśca bherībhiḥ paṇavaiḥ sainikāstathā | sasūtamāgadhā jiṣṇuṃ stutibhiḥ samapūjayan

तब सैनिकों ने शंखों, भेरियों और पणवों के साथ, सूतों और मागधों समेत, स्तुतियों से जिष्णु का सम्मान किया।

श्लोक 65 (7.73.65)

तदा भीमं बलं सर्वं तेन नादेन मोहितम् । तावकं तन्महाराज विषण्णं समपद्यत ॥

tadā bhīmaṃ balaṃ sarvaṃ tena nādena mohitam | tāvakaṃ tanmahārāja viṣaṇṇaṃ samapadyata

तब हे महाराज, उस नाद से मोहित होकर आपकी वह सारी भयंकर सेना खिन्न हो गई।

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