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द्रोण पर्व · अध्याय 72

अर्जुन का शिविर लौटना और अभिमन्यु के लिए विलाप

धृतराष्ट्र सञ्जय से पूछते हैं कि अर्जुन संशप्तकों से कैसे लौटे और उन्हें पुत्र की मृत्यु का समाचार कैसे मिला। सञ्जय बताते हैं कि अपशकुनों के बीच सन्ध्या को लौटते हुए अर्जुन शिविर को सूना और पाण्डवों को उदास पाते हैं। अभिमन्यु को न देखकर वे बहुत विलाप करते हैं, सुभद्रा और द्रौपदी के लिए शोक करते हैं और कृष्ण को उलाहना देते हैं कि उन्होंने युद्ध में यह बात नहीं बताई। कृष्ण क्षत्रिय की गति कहकर उन्हें सान्त्वना देते हैं; फिर अर्जुन क्रोध में भाइयों को बालक की रक्षा न कर पाने के लिए फटकारते हैं, और युधिष्ठिर उत्तर देने को तैयार होते हैं।

अध्याय 71अध्याय-सूचीअध्याय 73

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 1 (7.72.1)

अथ संशप्तकैः सार्धं युध्यमाने धनञ्जये । अभिमन्यौ हते चापि बाले बलवतां वरे ॥

atha saṃśaptakaiḥ sārdhaṃ yudhyamāne dhanañjaye | abhimanyau hate cāpi bāle balavatāṃ vare

जब धनञ्जय संशप्तकों के साथ युद्ध कर रहे थे और बलवानों में श्रेष्ठ बालक अभिमन्यु मारा जा चुका था,

श्लोक 2 (7.72.2)

महर्षिसत्तमे याते व्यासे स तु युधिष्ठिरः । पाण्डवाः किमथाऽकार्षुः शोकोपहतचेतसः ॥

maharṣisattame yāte vyāse sa tu yudhiṣṭhiraḥ | pāṇḍavāḥ kimathā'kārṣuḥ śokopahatacetasaḥ

और महर्षियों में श्रेष्ठ व्यास चले गए, तब शोक से व्याकुल चित्त वाले युधिष्ठिर और पाण्डवों ने क्या किया?

श्लोक 3 (7.72.3)

कथं संशप्तकेभ्यो वा निवृत्तो वानरध्वजः । केन वा कथितस्तस्य प्रशान्तः सुतपावकः । एतन्मे शंस तत्त्वेन सर्वमेवेह सञ्जय ॥

kathaṃ saṃśaptakebhyo vā nivṛtto vānaradhvajaḥ | kena vā kathitastasya praśāntaḥ sutapāvakaḥ | etanme śaṃsa tattvena sarvameveha sañjaya

वानरध्वज अर्जुन संशप्तकों से कैसे लौटे? और किसने उन्हें बताया कि अग्नि के समान तेजस्वी उनका पुत्र शान्त हो गया है? हे संजय, यह सब मुझे यथार्थ रूप से बताओ।

सञ्जय उवाच

श्लोक 4 (7.72.4)

शृणु राजन्यथा तेभ्यो निवृत्तः कृष्णसारथिः । ततः सर्वाणि सैन्यानि दहन्कृष्णगतिर्यथा ॥

śṛṇu rājanyathā tebhyo nivṛttaḥ kṛṣṇasārathiḥ | tataḥ sarvāṇi sainyāni dahankṛṣṇagatiryathā

हे राजन्, सुनिए, कृष्ण जिनके सारथि हैं, वे अर्जुन अग्नि के समान सारी सेनाओं को जलाते हुए उनसे कैसे लौटे।

श्लोक 5 (7.72.5)

सम्प्रयातेऽस्तमादित्ये संध्याकाल उपस्थिते । आयातस्यात्मशिबिरं निमित्तैरघशंसिभिः ॥

samprayāte'stamāditye saṃdhyākāla upasthite | āyātasyātmaśibiraṃ nimittairaghaśaṃsibhiḥ

सूर्य के अस्त होने पर जब सन्ध्या का समय आ गया, तब वे अशुभ सूचक अपशकुनों के साथ अपने शिविर में पहुँचे।

श्लोक 6 (7.72.6)

यच्चासीन्मानसं तस्य यच्च कृष्णेन भाषितम् । यथा च कथितस्तस्य निहतः सुतपावकः । विस्तरेणैव मे सर्वं ब्रुवतः शृणु मारिष ॥

yaccāsīnmānasaṃ tasya yacca kṛṣṇena bhāṣitam | yathā ca kathitastasya nihataḥ sutapāvakaḥ | vistareṇaiva me sarvaṃ bruvataḥ śṛṇu māriṣa

हे आदरणीय राजन्, उनके मन में क्या था, कृष्ण ने क्या कहा, और उन्हें कैसे बताया गया कि उनका अग्नि-सा तेजस्वी पुत्र मारा गया है, यह सब मैं विस्तार से कहता हूँ, सुनिए।

श्लोक 7 (7.72.7)

तस्मिन्नहनि निर्वृत्ते घोरे प्राणभृतां क्षये । आदित्येऽस्तङ्गते श्रीमान्सन्ध्याकाल उपस्थिते ॥

tasminnahani nirvṛtte ghore prāṇabhṛtāṃ kṣaye | āditye'staṅgate śrīmānsandhyākāla upasthite

प्राणियों का संहार करने वाला वह भयानक दिन बीत गया, तेजस्वी सूर्य अस्त हो गया और सन्ध्या का समय आ गया,

श्लोक 8 (7.72.8)

व्यपयातेषु वासाय सर्वेषु भरतर्षभ । हत्वा संशप्तकव्रातान्दिव्यैरस्त्रैः कपिध्वजः ॥

vyapayāteṣu vāsāya sarveṣu bharatarṣabha | hatvā saṃśaptakavrātāndivyairastraiḥ kapidhvajaḥ

हे भरतश्रेष्ठ, सब अपने-अपने निवास को लौट चुके थे; तब वानरध्वज अर्जुन दिव्य अस्त्रों से संशप्तकों के समूहों को मारकर

श्लोक 9 (7.72.9)

प्रायात्स्वशिबिरं जिष्णुर्जैत्रमास्थाय तं रथम् । गच्छन्नेव च गोविन्दं साश्रुकण्ठोऽभ्यभाषत ॥

prāyātsvaśibiraṃ jiṣṇurjaitramāsthāya taṃ ratham | gacchanneva ca govindaṃ sāśrukaṇṭho'bhyabhāṣata

उस विजयी रथ पर बैठे हुए जिष्णु अपने शिविर की ओर चले; और जाते-जाते आँसुओं से भरे कण्ठ से उन्होंने गोविन्द से कहा।

अर्जुन उवाच

श्लोक 10 (7.72.10)

किं तु मे हृदयं त्रस्तं वाक्च सज्जति केशव । स्यन्दने नावतिष्ठामि गात्रैः सीदामि चाच्युत ॥

kiṃ tu me hṛdayaṃ trastaṃ vākca sajjati keśava | syandane nāvatiṣṭhāmi gātraiḥ sīdāmi cācyuta

हे केशव, मेरा हृदय क्यों भयभीत है और मेरी वाणी क्यों लड़खड़ा रही है? हे अच्युत, मैं रथ में सीधा खड़ा नहीं रह पा रहा हूँ; मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं।

श्लोक 11 (7.72.11)

अनिष्टं चैव मे श्लिष्टं हृदयान्नापसर्पति । भुवि ये दिक्षु चात्युग्रा उत्पातास्त्रासयन्ति माम् ॥

aniṣṭaṃ caiva me śliṣṭaṃ hṛdayānnāpasarpati | bhuvi ye dikṣu cātyugrā utpātāstrāsayanti mām

कोई अनिष्ट की आशंका मेरे हृदय से चिपक गई है और हटती नहीं; पृथ्वी और दिशाओं में जो भयंकर उत्पात दिखाई दे रहे हैं, वे मुझे डरा रहे हैं।

श्लोक 12 (7.72.12)

बहुप्रकारा दृश्यन्ते सर्व एवाघशंसिनः । अपि स्वस्ति भवेद्राज्ञः सामात्यस्य गुरोर्मम ॥

bahuprakārā dṛśyante sarva evāghaśaṃsinaḥ | api svasti bhavedrājñaḥ sāmātyasya gurormama

अनेक प्रकार के सभी अपशकुन दिखाई दे रहे हैं। मेरे बड़े भाई राजा युधिष्ठिर और उनके मन्त्रियों का कल्याण हो!

वासुदेव उवाच

श्लोक 13 (7.72.13)

व्यक्तं शिवं सहभ्रातुर्धर्मराजस्य पाण्डव । मा शुचः किञ्चिदेवान्यत्तत्रानिष्टं भविष्यति ॥

vyaktaṃ śivaṃ sahabhrāturdharmarājasya pāṇḍava | mā śucaḥ kiñcidevānyattatrāniṣṭaṃ bhaviṣyati

हे पाण्डव, निश्चय ही धर्मराज और उनके भाइयों का कुशल है। शोक मत करो; यदि वहाँ कोई अनिष्ट होगा भी तो वह कुछ और ही होगा।

सञ्जय उवाच

श्लोक 14 (7.72.14)

ततः सन्ध्यामुपास्यैव वीरौ वीरावसादने । कथयन्तौ रणे वृत्तं प्रयातौ रथमास्थितौ ॥

tataḥ sandhyāmupāsyaiva vīrau vīrāvasādane | kathayantau raṇe vṛttaṃ prayātau rathamāsthitau

तब सन्ध्या-उपासना करके वे दोनों वीर, वीरों के थकने की उस बेला में, रणभूमि की घटनाओं की चर्चा करते हुए रथ पर बैठे चल पड़े।

श्लोक 15 (7.72.15)

ततः स्वशिबिरं प्राप्तौ हतामित्रौ हतद्विषौ । वासुदेवोऽर्जुनश्चैव कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥

tataḥ svaśibiraṃ prāptau hatāmitrau hatadviṣau | vāsudevo'rjunaścaiva kṛtvā karma suduṣkaram

तब अत्यन्त कठिन कार्य पूरा करके, शत्रुओं का संहार कर चुके वासुदेव और अर्जुन अपने शिविर में पहुँचे।

श्लोक 16 (7.72.16)

ध्वस्ताकारमिवालेख्यं संवीक्ष्य शिबिरं स्वकम् । बीभत्सुरब्रवीत्कृष्णमस्वस्थहृदयस्ततः ॥

dhvastākāramivālekhyaṃ saṃvīkṣya śibiraṃ svakam | bībhatsurabravītkṛṣṇamasvasthahṛdayastataḥ

अपने शिविर को बिगड़े हुए चित्र के समान उजड़ा हुआ देखकर, व्याकुल हृदय वाले बीभत्सु ने कृष्ण से कहा—

अर्जुन उवाच

श्लोक 17 (7.72.17)

नदन्ति नाद्य तूर्याणि मङ्गल्यानि जनार्दन । मिश्रा दुन्दुभिनिर्धोषैः शङ्खाश्चाडम्बरैः सह ॥

nadanti nādya tūryāṇi maṅgalyāni janārdana | miśrā dundubhinirdhoṣaiḥ śaṅkhāścāḍambaraiḥ saha

हे जनार्दन, आज मंगलवाद्य नहीं बज रहे—न नगाड़ों की गर्जना के साथ मिलकर शंख बज रहे हैं, न तुरहियों की ध्वनि।

श्लोक 18 (7.72.18)

वीणा नैवाद्य वाद्यन्ते शम्यातालस्वनैः सह । मङ्गल्यानि च गीतानि न गायन्ति पठन्ति च ॥

vīṇā naivādya vādyante śamyātālasvanaiḥ saha | maṅgalyāni ca gītāni na gāyanti paṭhanti ca

आज ताल की ध्वनि के साथ वीणाएँ नहीं बजाई जा रहीं; मंगलगीत न गाए जा रहे हैं, न पाठ किए जा रहे हैं।

श्लोक 19 (7.72.19)

स्तुतियुक्तानि रम्याणि ममानीकेषु बन्दिनः । योधाश्चापि हि मां दृष्ट्वा निवर्तन्ते ह्यधोमुखाः ॥

stutiyuktāni ramyāṇi mamānīkeṣu bandinaḥ | yodhāścāpi hi māṃ dṛṣṭvā nivartante hyadhomukhāḥ

मेरी सेना में बन्दीजन स्तुति से भरे मनोहर गीत नहीं गा रहे; और योद्धा भी मुझे देखकर सिर झुकाए मुँह फेर लेते हैं।

श्लोक 20 (7.72.20)

कर्माणि च यथापूर्वं कृत्वा नाभिवदन्ति माम् । अपि स्वस्ति भवेदद्य भ्रातृभ्यो मम माधव ॥

karmāṇi ca yathāpūrvaṃ kṛtvā nābhivadanti mām | api svasti bhavedadya bhrātṛbhyo mama mādhava

वे पहले की तरह अपने कार्य करके भी मुझे नमस्कार नहीं करते। हे माधव, आज मेरे भाइयों का कुशल हो!

श्लोक 21 (7.72.21)

न हि शुद्ध्यति मे भावो दृष्ट्वा स्वजनमाकुलम् । अपि पाञ्चालराजस्य विराटस्य च मानद ॥

na hi śuddhyati me bhāvo dṛṣṭvā svajanamākulam | api pāñcālarājasya virāṭasya ca mānada

अपने लोगों को व्याकुल देखकर मेरे मन को शान्ति नहीं मिल रही। हे मानद, पाञ्चालराज और विराट का भी कुशल हो,

श्लोक 22 (7.72.22)

सर्वेषां चैव योधानां सामग्र्यं स्यान्ममाच्युत । न च मामद्य सौभद्रः प्रहृष्टो भ्रातृभिः सह । रणादायान्तमुचितं प्रत्युद्याति हसन्निव ॥

sarveṣāṃ caiva yodhānāṃ sāmagryaṃ syānmamācyuta | na ca māmadya saubhadraḥ prahṛṣṭo bhrātṛbhiḥ saha | raṇādāyāntamucitaṃ pratyudyāti hasanniva

और हे अच्युत, सभी योद्धा सकुशल हों। फिर भी युद्ध से लौटते समय जैसे सौभद्र अपने भाइयों के साथ प्रसन्न होकर हँसता हुआ मेरी अगवानी करता है, वैसे आज वह मुझसे मिलने नहीं आ रहा।

सञ्जय उवाच

श्लोक 23 (7.72.23)

एवं सङ्कथयन्तौ तौ प्रविष्टौ शिबिरं स्वकम् । ददृशाते भृशास्वस्थान्पाण्डवान्नष्टचेतसः ॥

evaṃ saṅkathayantau tau praviṣṭau śibiraṃ svakam | dadṛśāte bhṛśāsvasthānpāṇḍavānnaṣṭacetasaḥ

इस प्रकार बातें करते हुए वे दोनों अपने शिविर में पहुँचे और उन्होंने पाण्डवों को अत्यन्त उदास और होश खोए हुए देखा।

श्लोक 24 (7.72.24)

दृष्ट्वा भ्रातृंश्च पुत्रांश्च विमना वानरध्वजः । अपश्यंश्चैव सौभद्रमिदं वचनमब्रवीत् ॥

dṛṣṭvā bhrātṛṃśca putrāṃśca vimanā vānaradhvajaḥ | apaśyaṃścaiva saubhadramidaṃ vacanamabravīt

भाइयों और पुत्रों को देखकर, किन्तु सौभद्र को न देखकर वानरध्वज अर्जुन ने उदास मन से यह बात कही—

अर्जुन उवाच

श्लोक 25 (7.72.25)

मुखवर्णोऽप्रसन्नो वः सर्वेषामेव लक्ष्यते । न चाभिमन्युं पश्यामि न च मां प्रतिनन्दथ ॥

mukhavarṇo'prasanno vaḥ sarveṣāmeva lakṣyate | na cābhimanyuṃ paśyāmi na ca māṃ pratinandatha

तुम सबके मुखों का रंग फीका दिखाई देता है। मैं अभिमन्यु को नहीं देख रहा, और तुम मेरा स्वागत भी नहीं कर रहे।

श्लोक 26 (7.72.26)

मया श्रुतश्च द्रोणेन पद्मव्यूहो विनिर्मितः । न च वस्तस्य भेत्ताऽस्ति विना सौभद्रमर्भकम् ॥

mayā śrutaśca droṇena padmavyūho vinirmitaḥ | na ca vastasya bhettā'sti vinā saubhadramarbhakam

मैंने सुना था कि द्रोण ने पद्मव्यूह रचा है। और बालक सौभद्र के सिवा तुममें से कोई उसे भेद नहीं सकता।

श्लोक 27 (7.72.27)

न चोपदिष्टस्तस्यासीन्मयानीकाद्विनिर्गमः । कच्चिन्न बालो युष्माभिः परानीकं प्रवेशितः ॥

na copadiṣṭastasyāsīnmayānīkādvinirgamaḥ | kaccinna bālo yuṣmābhiḥ parānīkaṃ praveśitaḥ

और मैंने उसे उस व्यूह से बाहर निकलना नहीं सिखाया था। मुझे आशा है कि तुम लोगों ने उस बालक को शत्रु की सेना में नहीं भेज दिया!

श्लोक 28 (7.72.28)

भित्त्वाऽनीकं महेष्वासः परेषां बहुभिर्युधि । कच्चिन्न निहतः सङ्ख्ये सौभद्रः परवीरहा ॥

bhittvā'nīkaṃ maheṣvāsaḥ pareṣāṃ bahubhiryudhi | kaccinna nihataḥ saṅkhye saubhadraḥ paravīrahā

कहीं ऐसा तो नहीं कि शत्रुओं की सेना को भेदने वाला वह महाधनुर्धर शत्रुहन्ता सौभद्र युद्ध में उनके बहुत-से योद्धाओं के हाथों मारा गया हो?

श्लोक 29 (7.72.29)

लोहिताक्षं महाबाहुं जातं सिंहमिवाद्रिषु । उपेन्द्रसदृशं ब्रूत कथमायोधने हतः ॥

lohitākṣaṃ mahābāhuṃ jātaṃ siṃhamivādriṣu | upendrasadṛśaṃ brūta kathamāyodhane hataḥ

मुझे बताओ, लाल नेत्रों वाला, विशाल भुजाओं वाला, पर्वतों में सिंह की भाँति उत्पन्न हुआ, उपेन्द्र के समान वह बालक युद्ध में कैसे मारा गया?

श्लोक 30 (7.72.30)

सुकुमारं महेष्वासं वासवस्यात्मजात्मजम् । सदा मम प्रियं ब्रूत कथमायोधने हतः ॥

sukumāraṃ maheṣvāsaṃ vāsavasyātmajātmajam | sadā mama priyaṃ brūta kathamāyodhane hataḥ

मुझे बताओ, इन्द्र के पुत्र का पुत्र, सुकुमार महाधनुर्धर, जो सदा मुझे प्रिय था, वह युद्ध में कैसे मारा गया?

श्लोक 31 (7.72.31)

सुभद्रायाः प्रियं पुत्रं द्रौपद्याः केशवस्य च । अम्बायाश्च प्रियं नित्यं कोऽवधीत्कालमोहितः ॥

subhadrāyāḥ priyaṃ putraṃ draupadyāḥ keśavasya ca | ambāyāśca priyaṃ nityaṃ ko'vadhītkālamohitaḥ

सुभद्रा, द्रौपदी और केशव का प्रिय पुत्र, और अपनी दादी का भी सदा प्रिय—कालमोहित होकर उसे किसने मारा?

श्लोक 32 (7.72.32)

सदृशो वृष्णिवीरस्य केशवस्य महात्मनः । विक्रमश्रुतमाहात्म्यैः कथमायोधने हतः ॥

sadṛśo vṛṣṇivīrasya keśavasya mahātmanaḥ | vikramaśrutamāhātmyaiḥ kathamāyodhane hataḥ

पराक्रम, विद्या और महिमा में वृष्णिवीर महात्मा केशव के समान वह युद्ध में कैसे मारा गया?

श्लोक 33 (7.72.33)

वार्ष्णेयीदयितं शूरं मया सततलालितम् । यदि पुत्रं न पश्यामि यास्यामि यमसादनम् ॥

vārṣṇeyīdayitaṃ śūraṃ mayā satatalālitam | yadi putraṃ na paśyāmi yāsyāmi yamasādanam

वार्ष्णेयी (सुभद्रा) का प्रिय वह शूरवीर, जिसे मैंने सदा लाड़ किया—यदि मैं अपने पुत्र को न देखूँ तो मैं यमलोक चला जाऊँगा।

श्लोक 34 (7.72.34)

मृदुकुञ्चितकेशान्तं बालं बालमृगेक्षणम् । मत्तद्विरदविक्रान्तं सिंहपोतमिवोद्गतम् ॥

mṛdukuñcitakeśāntaṃ bālaṃ bālamṛgekṣaṇam | mattadviradavikrāntaṃ siṃhapotamivodgatam

जिसकी अलकों के छोर कोमल और घुँघराले हैं, जिसकी आँखें मृगशावक की-सी हैं, जिसकी चाल मतवाले हाथी की-सी है, जो सिंह के बच्चे की भाँति ऊँचा उठा है,

श्लोक 35 (7.72.35)

स्मिताभिभाषिणं दान्तं गुरुवाक्यकरं सदा । बाल्येऽप्यतुलकर्माणं प्रियवाक्यममत्सरम् ॥

smitābhibhāṣiṇaṃ dāntaṃ guruvākyakaraṃ sadā | bālye'pyatulakarmāṇaṃ priyavākyamamatsaram

जो मुस्कराकर बोलता है, संयमी है, सदा गुरुजनों की आज्ञा मानता है, बालक होकर भी जिसके कर्म अतुलनीय हैं, जो प्रिय बोलता है और ईर्ष्या से रहित है,

श्लोक 36 (7.72.36)

महोत्साहं महाबाहुं दीर्घराजीवलोचनम् । भक्तानुकम्पिनं दान्तं न च नीचानुसारिणम् ॥

mahotsāhaṃ mahābāhuṃ dīrgharājīvalocanam | bhaktānukampinaṃ dāntaṃ na ca nīcānusāriṇam

जो महान उत्साह से भरा है, विशाल भुजाओं वाला है, जिसके नेत्र कमल के समान दीर्घ हैं, जो अपने भक्तों पर दया करता है, संयमी है और नीच जनों का अनुसरण नहीं करता,

श्लोक 37 (7.72.37)

कृतज्ञं ज्ञानसम्पन्नं कृतास्त्रमनिवर्तिनम् । युद्धाभिनन्दिनं नित्यं द्विषतां भयवर्धनम् ॥

kṛtajñaṃ jñānasampannaṃ kṛtāstramanivartinam | yuddhābhinandinaṃ nityaṃ dviṣatāṃ bhayavardhanam

जो कृतज्ञ है, ज्ञान से सम्पन्न है, अस्त्र-विद्या में निपुण है, कभी पीछे नहीं हटता, सदा युद्ध में आनन्द पाता है और शत्रुओं का भय बढ़ाता है,

श्लोक 38 (7.72.38)

स्वेषां प्रियहिते युक्तं पितॄणां जयगृद्धिनम् । न च पूर्वं प्रहर्तारं सङ्ग्रामे नष्टसम्भ्रमम् । यदि पुत्रं न पश्यामि यास्यामि यमसादनम् ॥

sveṣāṃ priyahite yuktaṃ pitṝṇāṃ jayagṛddhinam | na ca pūrvaṃ prahartāraṃ saṅgrāme naṣṭasambhramam | yadi putraṃ na paśyāmi yāsyāmi yamasādanam

जो अपनों के प्रिय और हित में लगा रहता है, अपने पितरों की विजय चाहता है, जो पहले प्रहार नहीं करता और युद्ध की उथल-पुथल में घबराता नहीं—यदि मैं उस पुत्र को न देखूँ तो मैं यमलोक चला जाऊँगा।

श्लोक 39 (7.72.39)

रथेषु गण्यमानेषु गणितं तं महारथम् । मयाऽध्यर्धगुणं सङ्ख्ये तरुणं बाहुशालिनम् ॥

ratheṣu gaṇyamāneṣu gaṇitaṃ taṃ mahāratham | mayā'dhyardhaguṇaṃ saṅkhye taruṇaṃ bāhuśālinam

जब रथियों की गणना हो रही थी, तब मैंने उस तरुण, बलशाली भुजाओं वाले महारथी को युद्ध में डेढ़ गुना गिना था।

श्लोक 40 (7.72.40)

प्रद्युम्नस्य प्रियं नित्यं केशवस्य ममैव च । यदि पुत्रं न पश्यामि यास्यामि यमसादनम् ॥

pradyumnasya priyaṃ nityaṃ keśavasya mamaiva ca | yadi putraṃ na paśyāmi yāsyāmi yamasādanam

प्रद्युम्न, केशव और मुझे भी सदा प्रिय—यदि मैं अपने पुत्र को न देखूँ तो मैं यमलोक चला जाऊँगा।

श्लोक 41 (7.72.41)

सुनसं सुललाटान्तं स्वक्षिभ्रूदशनच्छदम् । अपश्यतस्तद्वदनं का शान्तिर्हृदयस्य मे ॥

sunasaṃ sulalāṭāntaṃ svakṣibhrūdaśanacchadam | apaśyatastadvadanaṃ kā śāntirhṛdayasya me

सुन्दर नासिका और सुन्दर ललाट वाले, सुन्दर नेत्र, भौंह, दाँत और होंठ वाले उस मुख को न देखकर मेरे हृदय को शान्ति कैसे मिले?

श्लोक 42 (7.72.42)

तन्त्रीस्वनसुखं रम्यं पुंस्कोकिलसमध्वनिम् । अशृण्वतः स्वनं तस्य का शान्तिर्हृदयस्य मे ॥

tantrīsvanasukhaṃ ramyaṃ puṃskokilasamadhvanim | aśṛṇvataḥ svanaṃ tasya kā śāntirhṛdayasya me

वीणा की ध्वनि के समान सुखद और नर कोकिल के स्वर जैसी उसकी मधुर वाणी को न सुनकर मेरे हृदय को शान्ति कैसे मिले?

श्लोक 43 (7.72.43)

रूपं चाप्रतिमं तस्य त्रिदशैश्चापि दुर्लभम् । अपश्यतो हि वीरस्य का शान्तिर्हृदयस्य मे ॥

rūpaṃ cāpratimaṃ tasya tridaśaiścāpi durlabham | apaśyato hi vīrasya kā śāntirhṛdayasya me

उस वीर के अनुपम रूप को, जो देवताओं में भी दुर्लभ है, न देखकर मेरे हृदय को शान्ति कैसे मिले?

श्लोक 44 (7.72.44)

अभिवादनदक्षं तं पितॄणां वचने रतम् । नाद्याहं यदि पश्यामि का शान्तिर्हृदयस्य मे ॥

abhivādanadakṣaṃ taṃ pitṝṇāṃ vacane ratam | nādyāhaṃ yadi paśyāmi kā śāntirhṛdayasya me

प्रणाम करने में कुशल, अपने पितरों की बात मानने में तत्पर उसको यदि आज मैं न देखूँ तो मेरे हृदय को शान्ति कैसे मिले?

श्लोक 45 (7.72.45)

सुकुमारः सदा वीरो महार्हशयनोचितः । भूमावनाथवच्छेते नूनं नाथवतां वरः ॥

sukumāraḥ sadā vīro mahārhaśayanocitaḥ | bhūmāvanāthavacchete nūnaṃ nāthavatāṃ varaḥ

निश्चय ही वह सुकुमार वीर, जो सदा बहुमूल्य शय्या के योग्य था और रक्षकों वालों में श्रेष्ठ था, आज अनाथ की भाँति भूमि पर पड़ा है।

श्लोक 46 (7.72.46)

शयानं समुपासन्ति यं पुरा परमस्त्रियः । तमद्य विप्रविद्धाङ्गमुपासन्त्यशिवाः शिवाः ॥

śayānaṃ samupāsanti yaṃ purā paramastriyaḥ | tamadya vipraviddhāṅgamupāsantyaśivāḥ śivāḥ

सोते समय जिसकी सेवा पहले उत्तम स्त्रियाँ करती थीं, उसी के अंग बिखरे पड़े हैं और आज अमंगल करने वाली सियारिनें उसके पास आ रही हैं।

श्लोक 47 (7.72.47)

यः पुरा बोध्यते सुप्तः सूतमागधबन्दिभिः । बोधयन्त्यद्य तं नूनं श्वापदा विकृतैः स्वनैः ॥

yaḥ purā bodhyate suptaḥ sūtamāgadhabandibhiḥ | bodhayantyadya taṃ nūnaṃ śvāpadā vikṛtaiḥ svanaiḥ

जिसे पहले सोते समय सूत, मागध और बन्दी जगाते थे, उसे आज निश्चय ही हिंसक पशु अपनी भयंकर आवाज़ों से जगा रहे हैं।

श्लोक 48 (7.72.48)

छत्रच्छायासमुचितं तस्य तद्वदनं शुभम् । नूनमद्य रजोध्वस्तं रणरेणुः करिष्यति ॥

chatracchāyāsamucitaṃ tasya tadvadanaṃ śubham | nūnamadya rajodhvastaṃ raṇareṇuḥ kariṣyati

छत्र की छाया में रहने के योग्य उसके उस सुन्दर मुख को निश्चय ही आज रणभूमि की धूल ढँक देगी।

श्लोक 49 (7.72.49)

हा पुत्रकावितृप्तस्य सततं पुत्रदर्शने । भाग्यहीनस्य कालेन यथा मे नीयसे बलात् ॥

hā putrakāvitṛptasya satataṃ putradarśane | bhāgyahīnasya kālena yathā me nīyase balāt

हाय मेरे पुत्र! पुत्र को देखते हुए मैं कभी तृप्त नहीं हुआ; मुझ अभागे से काल तुम्हें बलपूर्वक कैसे छीने जा रहा है!

श्लोक 50 (7.72.50)

सा च संयमनी नूनं सदा सुकृतिनां गतिः । स्वभाभिर्मोहिता रम्या त्वयाऽत्यर्थं विराजते ॥

sā ca saṃyamanī nūnaṃ sadā sukṛtināṃ gatiḥ | svabhābhirmohitā ramyā tvayā'tyarthaṃ virājate

और वह संयमनी पुरी, जो सदा पुण्यात्माओं की गति है, अपनी ही प्रभा से मोहित-सी रमणीय होकर आज तुम्हारे कारण अत्यन्त शोभित हो रही होगी।

श्लोक 51 (7.72.51)

नूनं वैवस्वतश्च त्वां वरुणश्च प्रियातिथिम् । शतक्रतुर्धनेशश्च प्राप्तमर्चन्त्यभीरुकम् ॥

nūnaṃ vaivasvataśca tvāṃ varuṇaśca priyātithim | śatakraturdhaneśaśca prāptamarcantyabhīrukam

निश्चय ही वैवस्वत, वरुण, शतक्रतु और धनेश आज अपने प्रिय अतिथि तुम्हारा, निर्भय वीर का, आया हुआ देखकर सत्कार कर रहे होंगे।

सञ्जय उवाच

श्लोक 52 (7.72.52)

एवं विलप्य बहुधा भिन्नपोतो वणिग्यथा । दुःखेन महताऽविष्टो युधिष्ठिरमपृच्छत ॥

evaṃ vilapya bahudhā bhinnapoto vaṇigyathā | duḥkhena mahatā'viṣṭo yudhiṣṭhiramapṛcchata

इस प्रकार बहुत विलाप करके, टूटी नाव वाले व्यापारी की भाँति महान दुःख से घिरे हुए अर्जुन ने युधिष्ठिर से पूछा—

अर्जुन उवाच

श्लोक 53 (7.72.53)

कथं त्वयि च भीमे च धृष्टद्युम्ने च जीवति । सात्यके शक्रविक्रान्ते सौभद्रो निहतः परैः ॥

kathaṃ tvayi ca bhīme ca dhṛṣṭadyumne ca jīvati | sātyake śakravikrānte saubhadro nihataḥ paraiḥ

तुम, भीम, धृष्टद्युम्न और इन्द्र के समान पराक्रमी सात्यकि के जीवित रहते सौभद्र शत्रुओं के हाथों कैसे मारा गया?

श्लोक 54 (7.72.54)

कच्चित्स कदनं कृत्वा परेषां कुरुनन्दन । स्वर्गतोऽभिमुखः सङ्ख्ये युध्यमानो नरर्षभैः ॥

kaccitsa kadanaṃ kṛtvā pareṣāṃ kurunandana | svargato'bhimukhaḥ saṅkhye yudhyamāno nararṣabhaiḥ

हे कुरुनन्दन, क्या उसने शत्रुओं का संहार करके, श्रेष्ठ पुरुषों से लड़ते हुए, युद्ध में उनके सामने रहकर स्वर्ग प्राप्त किया?

श्लोक 55 (7.72.55)

स नूनं बहुभिर्यत्तैर्युध्यमानो नरर्षभैः । असहायः सहायार्थी मामनुध्यातवान्ध्रुवम् ॥

sa nūnaṃ bahubhiryattairyudhyamāno nararṣabhaiḥ | asahāyaḥ sahāyārthī māmanudhyātavāndhruvam

निश्चय ही बहुत-से दृढ़ संकल्प वाले श्रेष्ठ योद्धाओं से लड़ते हुए, असहाय और सहायता चाहते हुए उसने मेरा स्मरण किया होगा।

श्लोक 56 (7.72.56)

पीड्यमानः शरैर्बालस्तात साध्वभिधाव माम् । इति विप्रलपन्मन्ये नृशंसैर्भुवि पातितः ॥

pīḍyamānaḥ śarairbālastāta sādhvabhidhāva mām | iti vipralapanmanye nṛśaṃsairbhuvi pātitaḥ

'पिताजी, शीघ्र मेरे पास दौड़ आइए, मैं बाणों से पीड़ित हूँ!'—मुझे लगता है कि निर्दयी योद्धाओं द्वारा भूमि पर गिरा दिया गया वह बालक ऐसा कहकर विलाप करता रहा होगा।

श्लोक 57 (7.72.57)

अथवा मत्प्रसूतः स स्वस्रीयो माधवस्य च । सुभद्रायां च सम्भूतो न चैवं वक्तुमर्हति ॥

athavā matprasūtaḥ sa svasrīyo mādhavasya ca | subhadrāyāṃ ca sambhūto na caivaṃ vaktumarhati

अथवा मुझसे उत्पन्न, माधव का भानजा और सुभद्रा का पुत्र होकर वह ऐसा कह नहीं सकता।

श्लोक 58 (7.72.58)

वज्रसारमयं नूनं हृदयं सुदृढं मम । अपश्यतो दीर्घबाहुं रक्ताक्षं यन्न दीर्यते ॥

vajrasāramayaṃ nūnaṃ hṛdayaṃ sudṛḍhaṃ mama | apaśyato dīrghabāhuṃ raktākṣaṃ yanna dīryate

मेरा हृदय निश्चय ही वज्र-सार का बना और अत्यन्त दृढ़ है, जो उस दीर्घबाहु, लाल नेत्रों वाले को न देखकर भी फट नहीं जाता।

श्लोक 59 (7.72.59)

कथं बाले महेष्वासा नृशंसा मर्मभेदिनः । स्वस्रीये वासुदेवस्य मम पुत्रेऽक्षिपञ्शरान् ॥

kathaṃ bāle maheṣvāsā nṛśaṃsā marmabhedinaḥ | svasrīye vāsudevasya mama putre'kṣipañśarān

उन निर्दय, मर्मभेदी महाधनुर्धरों ने वासुदेव के भानजे मेरे बालक पुत्र पर बाण कैसे चलाए?

श्लोक 60 (7.72.60)

यो मां नित्यमदीनात्मा प्रत्युद्गम्याभिनन्दति । उपयान्तं रिपून्हत्वा सोऽद्य मां किं न पश्यति ॥

yo māṃ nityamadīnātmā pratyudgamyābhinandati | upayāntaṃ ripūnhatvā so'dya māṃ kiṃ na paśyati

जो अदीन मन से सदा शत्रुओं को मारकर लौटते हुए मेरे सामने आकर मेरा अभिनन्दन करता था, वह आज मुझे क्यों नहीं देखता?

श्लोक 61 (7.72.61)

नूनं स पातितः शेते धरण्यां रुधिरोक्षितः । शोभयन्मेदिनीं गात्रैरादित्य इव पातितः ॥

nūnaṃ sa pātitaḥ śete dharaṇyāṃ rudhirokṣitaḥ | śobhayanmedinīṃ gātrairāditya iva pātitaḥ

निश्चय ही वह रक्त से भीगा हुआ भूमि पर पड़ा है और गिरे हुए सूर्य की भाँति अपने अंगों से पृथ्वी को शोभित कर रहा है।

श्लोक 62 (7.72.62)

सुभद्रामनुशोचामि या पुत्रमपलायिनम् । रणे विनिहतं श्रुत्वा शोकार्ता वै विनङ्क्षति ॥

subhadrāmanuśocāmi yā putramapalāyinam | raṇe vinihataṃ śrutvā śokārtā vai vinaṅkṣati

मैं सुभद्रा के लिए शोक करता हूँ, जो अपने कभी न भागने वाले पुत्र को युद्ध में मारा गया सुनकर शोक से पीड़ित होकर प्राण त्याग देगी।

श्लोक 63 (7.72.63)

सुभद्रा वक्ष्यते किं मामभिमन्युमपश्यती । द्रौपदीं चैव दुःखार्तां किं वा वक्ष्यामि तामहम् ॥

subhadrā vakṣyate kiṃ māmabhimanyumapaśyatī | draupadīṃ caiva duḥkhārtāṃ kiṃ vā vakṣyāmi tāmaham

अभिमन्यु को न देखकर सुभद्रा मुझसे क्या कहेगी? और दुःख से व्याकुल द्रौपदी से मैं क्या कहूँगा?

श्लोक 64 (7.72.64)

वज्रसारमयं नूनं हृदयं यन्न यास्यति । सहस्रधा वधूं दृष्ट्वा रुदतीं शोककर्शिताम् ॥

vajrasāramayaṃ nūnaṃ hṛdayaṃ yanna yāsyati | sahasradhā vadhūṃ dṛṣṭvā rudatīṃ śokakarśitām

मेरा हृदय निश्चय ही वज्र-सार का बना है, यदि वह शोक से दुर्बल, रोती हुई बहू को देखकर हज़ार टुकड़ों में नहीं फट जाएगा।

श्लोक 65 (7.72.65)

हृष्टानां धार्तराष्ट्राणां सिंहनादो मया श्रुतः । युयुत्सुश्चापि कृष्णेन श्रुतो वीरानुपालभन् ॥

hṛṣṭānāṃ dhārtarāṣṭrāṇāṃ siṃhanādo mayā śrutaḥ | yuyutsuścāpi kṛṣṇena śruto vīrānupālabhan

मैंने हर्षित धृतराष्ट्र-पुत्रों के सिंहनाद सुने; और कृष्ण ने युयुत्सु को वीरों को फटकारते हुए सुना।

श्लोक 66 (7.72.66)

अशक्नुवन्तः पार्थस्य बालं हत्वा महाबलम् । किं न लज्जन्त्यधर्मज्ञाः पार्थिवा दृश्यतां बलम् ॥

aśaknuvantaḥ pārthasya bālaṃ hatvā mahābalam | kiṃ na lajjantyadharmajñāḥ pārthivā dṛśyatāṃ balam

'पार्थ का सामना न कर सकने पर तुमने उसके महाबली बालक को मार डाला। हे धर्म न जानने वाले राजाओ, क्या तुम्हें लज्जा नहीं आती? अब अपना बल दिखाओ!'

श्लोक 67 (7.72.67)

किं तयोर्विप्रियं कृत्वा केशवार्जुनयोर्मृधे । सिंहवन्नदथ प्रीताः शोककाल उपस्थिते ॥

kiṃ tayorvipriyaṃ kṛtvā keśavārjunayormṛdhe | siṃhavannadatha prītāḥ śokakāla upasthite

'युद्ध में केशव और अर्जुन का तुमने कौन-सा अपकार किया था कि शोक का समय आने पर भी तुम प्रसन्न होकर सिंह की तरह गरज रहे हो?'

श्लोक 68 (7.72.68)

आगमिष्यति वः क्षिप्रं फलं पापस्य कर्मणः । अधर्मो हि कृतस्तीव्रः कथं स्यादफलश्चिरम् ॥

āgamiṣyati vaḥ kṣipraṃ phalaṃ pāpasya karmaṇaḥ | adharmo hi kṛtastīvraḥ kathaṃ syādaphalaściram

'तुम्हारे पापकर्म का फल तुम्हें शीघ्र मिलेगा। तुमने भयंकर अधर्म किया है; वह देर तक निष्फल कैसे रह सकता है?'

श्लोक 69 (7.72.69)

इति तान्परिभाषन्वै वैश्यापुत्रो महामतिः । अपायाच्छस्त्रमुत्सृज्य कोपदुःखसमन्वितः ॥

iti tānparibhāṣanvai vaiśyāputro mahāmatiḥ | apāyācchastramutsṛjya kopaduḥkhasamanvitaḥ

इस प्रकार उन्हें फटकारकर वैश्य-पुत्र बुद्धिमान युयुत्सु क्रोध और दुःख से भरे हुए शस्त्र फेंककर रणभूमि से चले गए।

श्लोक 70 (7.72.70)

किमर्थमेतन्नाख्यातं त्वया कृष्ण रणे मम । अधक्ष्यं तानहं क्रूरांस्तदा सर्वान्महारथान् ॥

kimarthametannākhyātaṃ tvayā kṛṣṇa raṇe mama | adhakṣyaṃ tānahaṃ krūrāṃstadā sarvānmahārathān

हे कृष्ण, यह बात आपने मुझे युद्ध में क्यों नहीं बताई? तब मैं उन सब क्रूर महारथियों को जला डालता।

सञ्जय उवाच

श्लोक 71 (7.72.71)

पुत्रशोकार्दितं पार्थं ध्यायन्तं साश्रुलोचनम् । निगृह्य वासुदेवस्तं पुत्राधिभिरभिप्लुतम् । मैवमित्यब्रवीत्कृष्णस्तीव्रशोकसमन्वितम् ॥

putraśokārditaṃ pārthaṃ dhyāyantaṃ sāśrulocanam | nigṛhya vāsudevastaṃ putrādhibhirabhiplutam | maivamityabravītkṛṣṇastīvraśokasamanvitam

पुत्रशोक से पीड़ित, आँसू भरी आँखों से सोच में डूबे हुए पार्थ को देखकर वासुदेव ने पुत्र की चिन्ता में डूबे उन्हें थाम लिया; और स्वयं तीव्र शोक से भरे हुए कृष्ण ने उनसे कहा, 'ऐसा मत करो।'

वासुदेव उवाच

श्लोक 72 (7.72.72)

सर्वेषामेष वै पन्थाः शूराणामनिवर्तिनाम् । क्षत्रियाणां विशेषेण येषां नः शस्त्रजीविका ॥

sarveṣāmeṣa vai panthāḥ śūrāṇāmanivartinām | kṣatriyāṇāṃ viśeṣeṇa yeṣāṃ naḥ śastrajīvikā

यह सभी पीछे न हटने वाले शूरों का मार्ग है, और विशेष रूप से उन क्षत्रियों का, जिनकी आजीविका शस्त्र है।

श्लोक 73 (7.72.73)

एषा वै युध्यमानानां शूराणामनिवर्तिनाम् । विहिता सर्वशास्त्रज्ञैर्गतिर्मतिमतां वर ॥

eṣā vai yudhyamānānāṃ śūrāṇāmanivartinām | vihitā sarvaśāstrajñairgatirmatimatāṃ vara

हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, सब शास्त्रों के ज्ञाताओं ने लड़ने वाले और पीछे न हटने वाले शूरों के लिए यही गति निश्चित की है।

श्लोक 74 (7.72.74)

ध्रुवं हि युद्धे मरणं शूराणामनिवर्तिनाम् । गतः पुण्यकृतां लोकानभिमन्युर्न संशयः ॥

dhruvaṃ hi yuddhe maraṇaṃ śūrāṇāmanivartinām | gataḥ puṇyakṛtāṃ lokānabhimanyurna saṃśayaḥ

पीछे न हटने वाले शूरों के लिए युद्ध में मृत्यु निश्चित है। अभिमन्यु निःसन्देह पुण्यात्माओं के लोकों को गया है।

श्लोक 75 (7.72.75)

एतच्च सर्ववीराणां काङ्क्षितं भरतर्षभ । सङ्ग्रामेऽभिमुखा मृत्युं प्राप्नुयामेति मानद ॥

etacca sarvavīrāṇāṃ kāṅkṣitaṃ bharatarṣabha | saṅgrāme'bhimukhā mṛtyuṃ prāpnuyāmeti mānada

हे भरतश्रेष्ठ, हे मानद, सभी वीर यही चाहते हैं कि 'हम युद्ध में शत्रु का सामना करते हुए मृत्यु पाएँ।'

श्लोक 76 (7.72.76)

स च वीरान्रणे हत्वा राजपुत्रान्महाबलान् । वीरैराकाङ्क्षितं मृत्युं सम्प्राप्तोऽभिमुखं रणे ॥

sa ca vīrānraṇe hatvā rājaputrānmahābalān | vīrairākāṅkṣitaṃ mṛtyuṃ samprāpto'bhimukhaṃ raṇe

और उसने युद्ध में महाबली राजकुमारों को मारकर, वीरों द्वारा चाही जाने वाली मृत्यु रणभूमि में सामना करते हुए पाई है।

श्लोक 77 (7.72.77)

मा शुचः पुरुषव्याघ्र पूर्वैरेष सनातनः । धर्मकृद्भिः कृतो धर्मः क्षत्रियाणां रणे क्षयः ॥

mā śucaḥ puruṣavyāghra pūrvaireṣa sanātanaḥ | dharmakṛdbhiḥ kṛto dharmaḥ kṣatriyāṇāṃ raṇe kṣayaḥ

हे पुरुषव्याघ्र, शोक मत करो। यह सनातन मार्ग है; पूर्वकाल के धर्मात्माओं ने यही धर्म बनाया है कि क्षत्रिय युद्ध में नष्ट हों।

श्लोक 78 (7.72.78)

इमे ते भ्रातरः सर्वे दीना भरतसत्तम । त्वयि शोकसमाविष्टे नृपाश्च सुहृदस्तव ॥

ime te bhrātaraḥ sarve dīnā bharatasattama | tvayi śokasamāviṣṭe nṛpāśca suhṛdastava

हे भरतश्रेष्ठ, तुम्हें शोक में डूबा देखकर ये तुम्हारे सभी भाई, राजा और मित्र दुखी हैं।

श्लोक 79 (7.72.79)

एतांश्च वचसा साम्ना समाश्वासय मानद । विदितं वेदितव्यं ते न शोकं कर्तुमर्हसि ॥

etāṃśca vacasā sāmnā samāśvāsaya mānada | viditaṃ veditavyaṃ te na śokaṃ kartumarhasi

हे मानद, इन्हें मधुर वचनों से सान्त्वना दो। तुम जानने योग्य बात जान चुके हो; तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।

सञ्जय उवाच

श्लोक 80 (7.72.80)

एवमाश्वासितः पार्थः कृष्णेनाद्भुतकर्मणा । ततोऽब्रवीत्तदा भ्रातॄन्सर्वान्पार्थः सगद्गदम् ॥

evamāśvāsitaḥ pārthaḥ kṛṣṇenādbhutakarmaṇā | tato'bravīttadā bhrātṝnsarvānpārthaḥ sagadgadam

अद्भुत कर्म करने वाले कृष्ण से इस प्रकार आश्वासन पाकर पार्थ ने तब गद्गद स्वर में अपने सब भाइयों से कहा।

अर्जुन उवाच

श्लोक 81 (7.72.81)

स दीर्घबाहुः पृथ्वंसो दीर्घराजीवलोचनः । अभिमन्युर्यथा वृत्तः श्रोतुमिच्छाम्यहं तथा ॥

sa dīrghabāhuḥ pṛthvaṃso dīrgharājīvalocanaḥ | abhimanyuryathā vṛttaḥ śrotumicchāmyahaṃ tathā

लम्बी भुजाओं, चौड़े कन्धों और कमल-से दीर्घ नेत्रों वाले अभिमन्यु के साथ जो कुछ हुआ, उसे मैं सुनना चाहता हूँ।

श्लोक 82 (7.72.82)

सनागस्यन्दनहयान्सङ्ग्रामे निहतान्मया । क्षिप्रं द्रक्ष्यन्ति ते नूनं मम पुत्रं निहत्य वै ॥

sanāgasyandanahayānsaṅgrāme nihatānmayā | kṣipraṃ drakṣyanti te nūnaṃ mama putraṃ nihatya vai

मेरे पुत्र को मारने वाले शीघ्र ही देखेंगे कि उनके हाथी, रथ और घोड़े युद्ध में मेरे हाथों गिरा दिए गए हैं।

श्लोक 83 (7.72.83)

कथं च वः कृतास्त्राणां सर्वेषां शस्त्रपाणिनाम् । सौभद्रो निधनं गच्छेद्वज्रिणापि समागतः ॥

kathaṃ ca vaḥ kṛtāstrāṇāṃ sarveṣāṃ śastrapāṇinām | saubhadro nidhanaṃ gacchedvajriṇāpi samāgataḥ

तुम सब अस्त्र-विद्या में निपुण और हाथों में शस्त्र लिए हुए थे; फिर वज्रधारी इन्द्र भी सामने आता तो सौभद्र की मृत्यु कैसे हो सकती थी?

श्लोक 84 (7.72.84)

यद्येवमहमज्ञास्यमशक्तान्रक्षणे मम । सूनोः पाण्डवपाञ्चालानगोप्स्यं तं महारणे ॥

yadyevamahamajñāsyamaśaktānrakṣaṇe mama | sūnoḥ pāṇḍavapāñcālānagopsyaṃ taṃ mahāraṇe

यदि मुझे पता होता कि पाण्डव और पाञ्चाल मेरे पुत्र की रक्षा करने में असमर्थ हैं, तो मैं स्वयं उस महायुद्ध में उसकी रक्षा करता।

श्लोक 85 (7.72.85)

कथं च वो रथस्थानां शरवर्षाणि मुञ्चताम् । नीतोऽभिमन्युर्निधनं कदर्थीकृत्य वः परैः ॥

kathaṃ ca vo rathasthānāṃ śaravarṣāṇi muñcatām | nīto'bhimanyurnidhanaṃ kadarthīkṛtya vaḥ paraiḥ

तुम रथों में खड़े होकर बाणों की वर्षा कर रहे थे, फिर शत्रुओं ने अभिमन्यु का अपमान करके उसे मृत्यु तक कैसे पहुँचा दिया?

श्लोक 86 (7.72.86)

अहो वः पौरुषं नास्ति न च वोऽस्ति पराक्रमः । यत्राभिमन्युः समरे पश्यतां वो निपातितः ॥

aho vaḥ pauruṣaṃ nāsti na ca vo'sti parākramaḥ | yatrābhimanyuḥ samare paśyatāṃ vo nipātitaḥ

अहो, तुममें न पौरुष है, न पराक्रम, क्योंकि तुम्हारे देखते-देखते अभिमन्यु युद्ध में मार गिराया गया।

श्लोक 87 (7.72.87)

आत्मानमेव गर्हेयं यदहं वै सुदुर्बलान् । युष्मानाज्ञाय निर्यातो भीरूनकृतनिश्चयान् ॥

ātmānameva garheyaṃ yadahaṃ vai sudurbalān | yuṣmānājñāya niryāto bhīrūnakṛtaniścayān

मैं अपने को ही दोष दूँगा कि मैं तुम जैसे अत्यन्त दुर्बल, डरपोक और निश्चयहीन लोगों पर भरोसा करके चला गया।

श्लोक 88 (7.72.88)

आहोस्विद्भूषणार्थाय वर्मशस्त्रायुधानि वः । वाचस्तु वक्तुं संसत्सु मम पुत्रमरक्षताम् ॥

āhosvidbhūṣaṇārthāya varmaśastrāyudhāni vaḥ | vācastu vaktuṃ saṃsatsu mama putramarakṣatām

या फिर तुम्हारे कवच, शस्त्र और आयुध केवल शोभा के लिए हैं, और तुम्हारी वाणी केवल सभाओं में बोलने के लिए, तुम जिन्होंने मेरे पुत्र की रक्षा नहीं की?

सञ्जय उवाच

श्लोक 89 (7.72.89)

एवमुक्त्वा ततो वाक्यमतिष्ठद्वै वरासिमान् । न स्माशक्यत बीभत्सुः केनचित्प्रसमीक्षितुम् ॥

evamuktvā tato vākyamatiṣṭhadvai varāsimān | na smāśakyata bībhatsuḥ kenacitprasamīkṣitum

यह कहकर वे उत्तम खड्ग हाथ में लिए खड़े हो गए, और कोई भी बीभत्सु की ओर देख नहीं सकता था।

श्लोक 90 (7.72.90)

तमन्तकमिव क्रुद्धं निःश्वसन्तं मुहुर्मुहुः । महेन्द्रमिव तिष्ठन्तं वज्रोद्यतमहाभुजम् । पुत्रशोकाभिसन्तप्तमश्रुपूर्णमुखं तदा ॥

tamantakamiva kruddhaṃ niḥśvasantaṃ muhurmuhuḥ | mahendramiva tiṣṭhantaṃ vajrodyatamahābhujam | putraśokābhisantaptamaśrupūrṇamukhaṃ tadā

यमराज के समान क्रुद्ध, बार-बार साँस लेते हुए, वज्र उठाए हुए महेन्द्र की भाँति अपनी विशाल भुजा उठाए खड़े, पुत्रशोक से तपते और आँसुओं से भरे मुख वाले उन अर्जुन को देखकर

श्लोक 91 (7.72.91)

न भाषितुं शक्नुवन्ति द्रष्टुं वा सुहृदोऽर्जुनम् । अन्यत्र वासुदेवाद्वा ज्येष्ठाद्वा पाण्डुनन्दनात् ॥

na bhāṣituṃ śaknuvanti draṣṭuṃ vā suhṛdo'rjunam | anyatra vāsudevādvā jyeṣṭhādvā pāṇḍunandanāt

उनके मित्र न उनसे बोल सकते थे, न उन्हें देख सकते थे—केवल वासुदेव अथवा उनके बड़े भाई पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर को छोड़कर।

श्लोक 92 (7.72.92)

सर्वास्ववस्थासु हितावर्जुनस्य मनोनुगौ । बहुमानात्प्रियत्वाच्च तावेनं वक्तमर्हतः ॥

sarvāsvavasthāsu hitāvarjunasya manonugau | bahumānātpriyatvācca tāvenaṃ vaktamarhataḥ

वे दोनों सब अवस्थाओं में अर्जुन के हितैषी और उनके मन के अनुकूल चलने वाले थे; आदर और प्रेम के कारण वे ही उनसे बात कर सकते थे।

श्लोक 93 (7.72.93)

ततस्तं पुत्रशोकेन भृशं पीडितमानसम् । राजीवलोचनं क्रुद्धं राजा वचनमब्रवीत् ॥

tatastaṃ putraśokena bhṛśaṃ pīḍitamānasam | rājīvalocanaṃ kruddhaṃ rājā vacanamabravīt

तब पुत्रशोक से अत्यन्त पीड़ित मन वाले, कमल-नयन और क्रुद्ध अर्जुन से राजा युधिष्ठिर ने कहा।

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