द्रोण पर्व · अध्याय 71
नारद द्वारा सृञ्जय के पुत्र का पुनर्जीवन; व्यास का युधिष्ठिर को सान्त्वना देना
कथा से सृञ्जय का शोक दूर हो जाता है; नारद उसे वर देने को कहते हैं और उसका मरा हुआ पुत्र उसे लौटा देते हैं। फिर व्यास युधिष्ठिर से कहते हैं कि शत्रु के सामने मारा गया वीर अभिमन्यु अक्षय लोकों और अपने चान्द्र शरीर को पहुँच गया है, और शोक से पाप ही बढ़ता है; वे युधिष्ठिर को उठने और धैर्य रखने को कहकर चले जाते हैं। पूर्वकाल के राजाओं के यज्ञों का वर्णन सुनकर युधिष्ठिर शोकरहित होते हैं, पर फिर सोचने लगते हैं कि अर्जुन से क्या कहेंगे।
व्यास उवाच
श्लोक 1 (7.71.1)
पुण्यमाख्यानमायुष्यं श्रुत्वा षोडशराजकम् । अव्याहरन्नरपतिस्तूष्णीमासीत्स सृञ्जयः ॥
puṇyamākhyānamāyuṣyaṃ śrutvā ṣoḍaśarājakam | avyāharannarapatistūṣṇīmāsītsa sṛñjayaḥ
सोलह राजाओं का यह पुण्यदायक, आयु बढ़ाने वाला आख्यान सुनकर राजा सृञ्जय कुछ बोले नहीं, चुप ही रहे।
श्लोक 2 (7.71.2)
तमब्रवीत्तदा दीनं नारदो भगवानृषिः । कच्चिन्मया व्याहृतं यद्धृदये तत्स्थितं तव ॥
tamabravīttadā dīnaṃ nārado bhagavānṛṣiḥ | kaccinmayā vyāhṛtaṃ yaddhṛdaye tatsthitaṃ tava
तब भगवान् नारद ऋषि ने उन दुःखी राजा से कहा, "मैंने जो कुछ कहा, क्या वह तुम्हारे हृदय में टिका रहा,
श्लोक 3 (7.71.3)
आहोस्विदन्ततो नष्टं श्राद्धं शूद्रीपताविव । स एवमुक्तः प्रत्याह प्राञ्जलिः सृञ्जयस्तदा ॥
āhosvidantato naṣṭaṃ śrāddhaṃ śūdrīpatāviva | sa evamuktaḥ pratyāha prāñjaliḥ sṛñjayastadā
अथवा अन्त तक आते-आते नष्ट हो गया, जैसे शूद्रा के पति के लिए किया गया श्राद्ध?" ऐसा कहे जाने पर सृञ्जय ने तब हाथ जोड़कर उत्तर दिया।
सृञ्जय उवाच
श्लोक 4 (7.71.4)
पुत्रशोकापहं श्रुत्वा धन्यमाख्यानमुत्तमम् । राजर्षीणां पुराणानां यज्वनां दक्षिणावताम् ॥
putraśokāpahaṃ śrutvā dhanyamākhyānamuttamam | rājarṣīṇāṃ purāṇānāṃ yajvanāṃ dakṣiṇāvatām
"पुत्रशोक को हरने वाला, यज्ञ करने और दक्षिणा देने वाले प्राचीन राजर्षियों का यह धन्य और उत्तम आख्यान सुनकर,
श्लोक 5 (7.71.5)
विस्मयेन हृते शोके तमसीवार्कतेजसा । विपाप्माऽस्म्यव्यथोपेतो ब्रूहि किं करवाण्यहम् ॥
vismayena hṛte śoke tamasīvārkatejasā | vipāpmā'smyavyathopeto brūhi kiṃ karavāṇyaham
जैसे सूर्य के तेज से अँधेरा मिट जाता है, वैसे ही विस्मय से मेरा शोक दूर हो गया है; मैं पापरहित और व्यथा से मुक्त हो गया हूँ। बताइए, मैं क्या करूँ?"
नारद उवाच
श्लोक 6 (7.71.6)
दिष्ट्यापहतशोकस्त्वं वृणीष्वेह यदिच्छसि । तत्ते सम्पत्स्यते सर्वं न मृषावादिनो वयम् ॥
diṣṭyāpahataśokastvaṃ vṛṇīṣveha yadicchasi | tatte sampatsyate sarvaṃ na mṛṣāvādino vayam
"सौभाग्य से तुम्हारा शोक दूर हो गया। यहाँ जो चाहो माँग लो; वह सब तुम्हें मिलेगा, क्योंकि हम झूठ बोलने वाले नहीं हैं।"
सृञ्जय उवाच
श्लोक 7 (7.71.7)
पावितोऽहमनेनैव प्रसन्नो यद्भवान्मम । प्रसन्नो यस्य भगवान्न तस्यास्तीह दुर्लभम् ॥
pāvito'hamanenaiva prasanno yadbhavānmama | prasanno yasya bhagavānna tasyāstīha durlabham
"आप भगवान् मुझ पर प्रसन्न हैं, इसी से मैं पवित्र हो गया हूँ। जिस पर भगवान् प्रसन्न हों, उसके लिए यहाँ कुछ भी दुर्लभ नहीं।"
नारद उवाच
श्लोक 8 (7.71.8)
पुनर्ददामि ते पुत्रं दस्युभिर्निहतं वृथा । उद्धृत्य नरकात्कष्टात्पशुवत्प्रोक्षितं यथा ॥
punardadāmi te putraṃ dasyubhirnihataṃ vṛthā | uddhṛtya narakātkaṣṭātpaśuvatprokṣitaṃ yathā
"डाकुओं ने जिसे व्यर्थ मार डाला था, तुम्हारे उस पुत्र को मैं उस कष्टदायी नरक से निकालकर फिर तुम्हें देता हूँ — जैसे जल से छिड़का हुआ पशु।"
व्यास उवाच
श्लोक 9 (7.71.9)
प्रादुरासीत्ततः पुत्रः सृञ्जयस्याद्भुतप्रभः । प्रसन्नेनर्षिणा दत्तः कुबेरतनयोपमः ॥
prādurāsīttataḥ putraḥ sṛñjayasyādbhutaprabhaḥ | prasannenarṣiṇā dattaḥ kuberatanayopamaḥ
तब सृञ्जय का पुत्र अद्भुत कान्ति के साथ प्रकट हो गया; प्रसन्न ऋषि ने उसे दिया था, वह कुबेर के पुत्र के समान था।
श्लोक 10 (7.71.10)
ततः सङ्गम्य पुत्रेण प्रीतिमानभवन्नृपः । ईजे च क्रतुभिः पुण्यैः समाप्तवरदक्षिणैः ॥
tataḥ saṅgamya putreṇa prītimānabhavannṛpaḥ | īje ca kratubhiḥ puṇyaiḥ samāptavaradakṣiṇaiḥ
पुत्र से मिलकर राजा प्रसन्न हुआ और उसने उत्तम दक्षिणाओं से पूर्ण पुण्य यज्ञ किए।
श्लोक 11 (7.71.11)
अकृतार्थश्च भीतश्च न च सन्नाहकोविदः । अयज्वाचानपत्यश्च ततोऽसौ जीवितः पुनः ॥
akṛtārthaśca bhītaśca na ca sannāhakovidaḥ | ayajvācānapatyaśca tato'sau jīvitaḥ punaḥ
वह न तो कृतार्थ हुआ था, न निडर था, न कवच-धारण में कुशल था, न यज्ञ करने वाला था और न सन्तान वाला; फिर भी वही तब फिर जीवित कर दिया गया।
श्लोक 12 (7.71.12)
शूरो वीरः कृतार्थश्च प्रमथ्यारीन्सहस्रशः । अभिमन्युर्गतः स्वर्गं सङ्ग्रामेऽभिमुखाहतः ॥
śūro vīraḥ kṛtārthaśca pramathyārīnsahasraśaḥ | abhimanyurgataḥ svargaṃ saṅgrāme'bhimukhāhataḥ
पर अभिमन्यु शूर और वीर था, कृतार्थ था; हज़ारों शत्रुओं को कुचलकर, युद्ध में सामने से मारा जाकर वह स्वर्ग गया है।
श्लोक 13 (7.71.13)
ब्रह्मचर्येण याँल्लोकान्प्रजया च श्रुतेन च । इष्टैश्च क्रतुभिर्यान्ति तांस्ते पुत्रोऽक्षयान्गतः ॥
brahmacaryeṇa yām̐llokānprajayā ca śrutena ca | iṣṭaiśca kratubhiryānti tāṃste putro'kṣayāngataḥ
ब्रह्मचर्य, सन्तान, शास्त्रज्ञान और किए हुए यज्ञों से लोग जिन लोकों को पाते हैं, उन्हीं अक्षय लोकों को तुम्हारा पुत्र पहुँच गया है।
श्लोक 14 (7.71.14)
विद्वांसः कर्मभिः पुण्यैः स्वर्गमीहन्ति नित्यशः । न तु स्वर्गादयं लोकः काम्यते स्वर्गवासिभिः ॥
vidvāṃsaḥ karmabhiḥ puṇyaiḥ svargamīhanti nityaśaḥ | na tu svargādayaṃ lokaḥ kāmyate svargavāsibhiḥ
विद्वान् लोग पुण्य कर्मों से सदा स्वर्ग की कामना करते हैं; किन्तु स्वर्ग में रहने वाले इस लोक की कामना नहीं करते।
श्लोक 15 (7.71.15)
तस्मात्स्वर्गगतं पुत्रमर्जुनस्य हतं रणे । न चेहानयितुं शक्यं किञ्चिदप्राप्यमीहितम् ॥
tasmātsvargagataṃ putramarjunasya hataṃ raṇe | na cehānayituṃ śakyaṃ kiñcidaprāpyamīhitam
इसलिए अर्जुन का जो पुत्र रण में मारा जाकर स्वर्ग चला गया है, उसे यहाँ लौटा लाना सम्भव नहीं; जो वस्तु प्राप्त हो ही नहीं सकती, उसकी कामना करने से वह मिल नहीं जाती।
श्लोक 16 (7.71.16)
यां योगिनो ध्यानविविक्तदर्शनाः । प्रयान्ति यां चोत्तमयज्विनो जनाः । तपोभिरिद्धैरनुयान्ति यां तथा । तामक्षयां ते तनयो गतो गतिम् ॥
yāṃ yogino dhyānaviviktadarśanāḥ | prayānti yāṃ cottamayajvino janāḥ | tapobhiriddhairanuyānti yāṃ tathā | tāmakṣayāṃ te tanayo gato gatim
जिस गति को ध्यान से निर्मल दृष्टि वाले योगी पाते हैं, जिसे उत्तम यज्ञ करने वाले लोग पाते हैं, और जिसे लोग प्रखर तपस्या से प्राप्त करते हैं — उसी अक्षय गति को तुम्हारा पुत्र गया है।
श्लोक 17 (7.71.17)
अन्तात्पुनर्भावगतो विराजते । राजेव वीरो ह्यमृतात्मरश्मिभिः । तामैन्दवीमात्मतनुं द्विजोचितां । गतोऽभिमन्युर्न स शोकमर्हति ॥
antātpunarbhāvagato virājate | rājeva vīro hyamṛtātmaraśmibhiḥ | tāmaindavīmātmatanuṃ dvijocitāṃ | gato'bhimanyurna sa śokamarhati
मृत्यु के पार जाकर नए भाव को प्राप्त हुआ वह वीर अमृतमयी किरणों से राजा की भाँति शोभित हो रहा है; द्विजों के योग्य अपने चान्द्र शरीर को अभिमन्यु प्राप्त हुआ है — वह शोक के योग्य नहीं है।
श्लोक 18 (7.71.18)
एवं ज्ञात्वा स्थिरो भूत्वा मा शुचो धैर्यमाप्नुहि । जीवन्हि पुरुषः शोच्यो न तु स्वर्गगतोऽनघ ॥
evaṃ jñātvā sthiro bhūtvā mā śuco dhairyamāpnuhi | jīvanhi puruṣaḥ śocyo na tu svargagato'nagha
यह जानकर स्थिर हो जाओ, शोक मत करो, धैर्य धारण करो। हे निष्पाप! शोक के योग्य तो जीवित मनुष्य है, स्वर्ग गया हुआ नहीं।
श्लोक 19 (7.71.19)
शोचतो हि महाराज अघमेवाभिवर्धते । तस्माच्छोकं परित्यज्य श्रेयसे प्रयतेद्बुधः ॥
śocato hi mahārāja aghamevābhivardhate | tasmācchokaṃ parityajya śreyase prayatedbudhaḥ
हे महाराज! शोक करने वाले का पाप ही बढ़ता है; इसलिए बुद्धिमान् को शोक छोड़कर कल्याण के लिए यत्न करना चाहिए।
श्लोक 20 (7.71.20)
प्रहर्षं प्रीतिमानन्दं प्रियमुत्सिक्तचित्तताम् । एतदाहुर्बुधाः शौचमशौचं शोक उच्यते ॥
praharṣaṃ prītimānandaṃ priyamutsiktacittatām | etadāhurbudhāḥ śaucamaśaucaṃ śoka ucyate
हर्ष, प्रीति, आनन्द, प्रियभाव और चित्त का उल्लास — इन्हें विद्वान् शुचिता कहते हैं, और शोक को अशुचिता कहा जाता है।
श्लोक 21 (7.71.21)
एवं विद्वन्समुत्तिष्ठ प्रयतो भव मा शुचः । श्रुतस्ते सम्भवो मृत्योस्तपांस्यनुपमानि च ॥
evaṃ vidvansamuttiṣṭha prayato bhava mā śucaḥ | śrutaste sambhavo mṛtyostapāṃsyanupamāni ca
इसलिए हे विद्वान्! उठो, संयत हो जाओ, शोक मत करो। तुमने मृत्यु की उत्पत्ति और अनुपम तपस्याओं का वर्णन सुना है,
श्लोक 22 (7.71.22)
सर्वभूतसमत्वं च ब्रह्मणा चापि चोदितम् । सृञ्जयस्य तु पुत्रोऽसौ मृतः सञ्जीवितः श्रुतः ॥
sarvabhūtasamatvaṃ ca brahmaṇā cāpi coditam | sṛñjayasya tu putro'sau mṛtaḥ sañjīvitaḥ śrutaḥ
और सब प्राणियों में समभाव का वह उपदेश भी, जो स्वयं ब्रह्मा ने दिया था। और यह भी सुना कि सृञ्जय का मरा हुआ पुत्र फिर जीवित हो गया।
श्लोक 23 (7.71.23)
एवं विद्वन्महाराज मा शुचः साधयाम्यहम् ॥
evaṃ vidvanmahārāja mā śucaḥ sādhayāmyaham
हे विद्वान् महाराज! यह जानकर शोक मत करो; अब मैं जाता हूँ।
सञ्जय उवाच
श्लोक 24 (7.71.24)
एतावदुक्त्वा भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत ॥
etāvaduktvā bhagavāṃstatraivāntaradhīyata
इतना कहकर भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 25 (7.71.25)
वागीशाने भगवति व्यासे व्यभ्रनभःप्रभे । गते मतिमतां श्रेष्ठे समाश्वास्य युधिष्ठिरम् ॥
vāgīśāne bhagavati vyāse vyabhranabhaḥprabhe | gate matimatāṃ śreṣṭhe samāśvāsya yudhiṣṭhiram
वाणी के स्वामी, मेघरहित आकाश के समान दीप्ति वाले, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ भगवान् व्यास जब युधिष्ठिर को समझा-बुझाकर चले गए,
श्लोक 26 (7.71.26)
पूर्वेषां पार्थिवेन्द्राणां महेन्द्रप्रतिमौजसाम् । न्यायाधिगतवित्तानां तां श्रुत्वा यज्ञसम्पदम् ॥
pūrveṣāṃ pārthivendrāṇāṃ mahendrapratimaujasām | nyāyādhigatavittānāṃ tāṃ śrutvā yajñasampadam
तब महेन्द्र के समान तेजस्वी, न्याय से धन पाने वाले उन पूर्वकाल के श्रेष्ठ राजाओं की यज्ञ-सम्पदा का वह वर्णन सुनकर,
श्लोक 27 (7.71.27)
सम्पूज्य मनसा विद्वान्विशोकोऽभूद्युधिष्ठिरः । पुनश्चाचिन्तयद्दीनः किंस्विद्वक्ष्ये धनञ्जयम् ॥
sampūjya manasā vidvānviśoko'bhūdyudhiṣṭhiraḥ | punaścācintayaddīnaḥ kiṃsvidvakṣye dhanañjayam
विद्वान् युधिष्ठिर ने मन ही मन उनका आदर किया और शोकरहित हो गए। किन्तु फिर वे दुःखी होकर सोचने लगे, "मैं धनञ्जय से क्या कहूँगा?"