द्रोण पर्व · अध्याय 70
नारद का सृञ्जय को परशुराम का वृत्तान्त सुनाना
सोलह राजाओं की कथा में नारद सृञ्जय को जमदग्निपुत्र राम (परशुराम) का वृत्तान्त सुनाते हैं: जब क्षत्रियों ने उनके बछड़े और पिता पर हाथ डाला, तब उन्होंने कार्तवीर्य और हैहयों को मारा, फिर इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियों से रहित किया और देश-देश में उनका संहार किया। सैकड़ों यज्ञ करके उन्होंने पृथ्वी कश्यप को दे दी, कश्यप के कहने पर उसे छोड़ा, समुद्र को पीछे हटाया और महेन्द्र पर्वत पर बस गए। नारद कहते हैं कि राम भी मरेंगे; इसलिए सृञ्जय को अपने उस पुत्र के लिए शोक नहीं करना चाहिए जिसने न यज्ञ किया, न दक्षिणा दी।
नारद उवाच
श्लोक 1 (7.70.1)
रामो महातपाः शूरो वीरो लोकनमस्कृतः । जामदग्न्योऽप्यतियशा अवितृप्तो मरिष्यति ॥
rāmo mahātapāḥ śūro vīro lokanamaskṛtaḥ | jāmadagnyo'pyatiyaśā avitṛpto mariṣyati
जमदग्नि के पुत्र राम — महातपस्वी, शूर, वीर, जिन्हें सारा संसार नमन करता था — अपार यश वाले होकर भी अतृप्त रहकर ही मरेंगे।
श्लोक 2 (7.70.2)
यश्चास्त्रमनुपर्येति भूमिं कुर्वन्विपांसुलाम् । नचासीद्विक्रिया यस्य प्राप्य श्रियमनुत्तमाम् ॥
yaścāstramanuparyeti bhūmiṃ kurvanvipāṃsulām | nacāsīdvikriyā yasya prāpya śriyamanuttamām
जिसका अस्त्र पृथ्वी को निर्मल करता हुआ चारों ओर घूमता रहा, और जो सर्वोत्तम ऐश्वर्य पाकर भी कभी विकार को प्राप्त नहीं हुआ।
श्लोक 3 (7.70.3)
जामदग्न्यो न ते राजन्कच्चिच्छ्रोत्रमुपागतः । येनैकेन पुरा राजन्क्रुद्धेन हतबन्धुना ॥
jāmadagnyo na te rājankaccicchrotramupāgataḥ | yenaikena purā rājankruddhena hatabandhunā
हे राजन्! क्या जमदग्नि के पुत्र की कथा तुम्हारे कानों तक नहीं पहुँची? अपने बन्धुओं के मारे जाने पर क्रुद्ध हुए उन्होंने अकेले ही, हे राजन्,
श्लोक 4 (7.70.4)
भृगुभिस्ताम्यमानेन त्राहि रामेति विस्वरम् । त्रिःसप्तकृत्वो भूमिर्यत्कृता निःक्षत्रिया पुरा ॥
bhṛgubhistāmyamānena trāhi rāmeti visvaram | triḥsaptakṛtvo bhūmiryatkṛtā niḥkṣatriyā purā
भृगुवंशियों की "हे राम! हमारी रक्षा करो" — इस टूटे हुए स्वर की पुकार से व्यथित होकर, पूर्वकाल में इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियों से रहित कर दिया था।
श्लोक 5 (7.70.5)
यः क्षत्रियैः परामृष्टे वत्से पितरि चाब्रुवन् । ततोऽवधीत्कार्तवीर्यमजितं समरे परैः ॥
yaḥ kṣatriyaiḥ parāmṛṣṭe vatse pitari cābruvan | tato'vadhītkārtavīryamajitaṃ samare paraiḥ
जब क्षत्रियों ने उनके बछड़े और पिता पर हाथ डाला, तब बिना कोई डींग हाँके उन्होंने युद्ध में दूसरों से अजेय कार्तवीर्य को मार डाला।
श्लोक 6 (7.70.6)
क्षत्रियाणां चतुःषष्टिमयुतानि सहस्रशः । तदा मृत्योः समेतानि एकेन धनुषाऽजयत् ॥
kṣatriyāṇāṃ catuḥṣaṣṭimayutāni sahasraśaḥ | tadā mṛtyoḥ sametāni ekena dhanuṣā'jayat
उस समय मृत्यु के लिए एकत्र हुए चौंसठ अयुत (दस-दस हज़ार) — हज़ारों-हज़ार — क्षत्रियों को उन्होंने अकेले एक धनुष से जीत लिया।
श्लोक 7 (7.70.7)
ब्रह्मद्विषां चाथ तस्मिन्सहस्राणि चतुर्दश । पुनरन्यान्निजग्राह दन्तक्रूरे जघान ह ॥
brahmadviṣāṃ cātha tasminsahasrāṇi caturdaśa | punaranyānnijagrāha dantakrūre jaghāna ha
ब्राह्मणों से द्वेष करने वालों में से चौदह हज़ार वहीं थे; फिर दूसरों को उन्होंने पकड़ा और दन्तक्रूर में मार डाला।
श्लोक 8 (7.70.8)
सहस्रं मुसलेनाहन्सहस्रमसिनाऽवधीत् । उद्बन्धनात्सहस्रं च सहस्रमुदके कृतम् ॥
sahasraṃ musalenāhansahasramasinā'vadhīt | udbandhanātsahasraṃ ca sahasramudake kṛtam
एक हज़ार को मूसल से मारा, एक हज़ार को तलवार से काटा; एक हज़ार को फाँसी पर लटकाया और एक हज़ार को जल में डुबो दिया।
श्लोक 9 (7.70.9)
दन्तान्भङ्क्त्वा सहस्रस्य भिन्नकर्णांस्तथाऽकरोत् । ततः सप्तसहस्राणां कणधूममपाययत् ॥
dantānbhaṅktvā sahasrasya bhinnakarṇāṃstathā'karot | tataḥ saptasahasrāṇāṃ kaṇadhūmamapāyayat
एक हज़ार के दाँत तोड़कर उन्होंने उन्हें कटे कानों वाला भी कर दिया; फिर सात हज़ार को भूसी का धुआँ पिलाया।
श्लोक 10 (7.70.10)
शिष्टान्बद्ध्वा च हत्वा वै तेषां मूर्ध्नि विभिद्य च । गुणावतीमुत्तरेण खाण्डवाद्दक्षिणेन च । गिर्यन्ते शतसाहस्रा हैहयाः समरे हताः ॥
śiṣṭānbaddhvā ca hatvā vai teṣāṃ mūrdhni vibhidya ca | guṇāvatīmuttareṇa khāṇḍavāddakṣiṇena ca | giryante śatasāhasrā haihayāḥ samare hatāḥ
शेष को उन्होंने बाँधा और मारा, उनके सिर चीर डाले; गुणावती के उत्तर और खाण्डव के दक्षिण, पर्वतों की तलहटी में लाखों हैहय युद्ध में मारे गए।
श्लोक 11 (7.70.11)
सरथाश्वगजा वीरा निहतास्तत्र शेरते । पितुर्वधामर्षितेन जामदग्न्येन धीमता ॥
sarathāśvagajā vīrā nihatāstatra śerate | piturvadhāmarṣitena jāmadagnyena dhīmatā
रथ, घोड़े और हाथियों सहित वे वीर वहाँ मरे पड़े हैं, जिन्हें पिता के वध से क्रुद्ध बुद्धिमान् जमदग्निपुत्र ने मार गिराया था।
श्लोक 12 (7.70.12)
निजघ्ने दशसाहस्रान्रामः परशुना तदा । न ह्यमृष्यत ता वाचो यास्तैर्भृशमुदीरिताः ॥
nijaghne daśasāhasrānrāmaḥ paraśunā tadā | na hyamṛṣyata tā vāco yāstairbhṛśamudīritāḥ
तब राम ने फरसे से दस हज़ार को मार गिराया; उन्होंने जो कठोर वचन कहे थे, उन्हें वे सह न सके।
श्लोक 13 (7.70.13)
भृगो रामाभिधावेति यदाक्रन्दन्द्विजोत्तमाः । ततः काश्मीरदरदान्कुन्तिक्षुद्रकमालवान् ॥
bhṛgo rāmābhidhāveti yadākrandandvijottamāḥ | tataḥ kāśmīradaradānkuntikṣudrakamālavān
जब श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने "हे भृगुवंशी राम! दौड़कर आओ" कहकर पुकारा, तब कश्मीर, दरद, कुन्ति, क्षुद्रक और मालव देश के लोगों को,
श्लोक 14 (7.70.14)
अङ्गवङ्गकलिङ्गांश्च विदेहांस्ताम्रलिप्तकान् । रक्षोवाहान्वीतिहोत्रांस्त्रिगर्तान्मार्तिकावतान् ॥
aṅgavaṅgakaliṅgāṃśca videhāṃstāmraliptakān | rakṣovāhānvītihotrāṃstrigartānmārtikāvatān
अङ्ग, वङ्ग और कलिङ्ग, विदेह, ताम्रलिप्तक, रक्षोवाह, वीतिहोत्र, त्रिगर्त और मार्तिकावत लोगों को,
श्लोक 15 (7.70.15)
शिबीनन्यांश्च राजन्यान्देशान्देशान्सहस्रशः । निजघान शितैर्बाणैर्जामदग्न्यः प्रतापवान् ॥
śibīnanyāṃśca rājanyāndeśāndeśānsahasraśaḥ | nijaghāna śitairbāṇairjāmadagnyaḥ pratāpavān
शिबियों को तथा और भी राजाओं को — देश-देश में हज़ारों की संख्या में — प्रतापी जमदग्निपुत्र ने तीखे बाणों से मार डाला।
श्लोक 16 (7.70.16)
कोटीशतसहस्राणि क्षत्रियाणां सहस्रशः । इन्द्रगोपकवर्णस्य बन्धुजीवनिभस्य च ॥
koṭīśatasahasrāṇi kṣatriyāṇāṃ sahasraśaḥ | indragopakavarṇasya bandhujīvanibhasya ca
क्षत्रियों के सैकड़ों-हज़ारों करोड़, हज़ारों की गिनती में, जिनका रक्त इन्द्रगोप कीट के रंग का और बन्धुजीव पुष्प के समान लाल था —
श्लोक 17 (7.70.17)
रुधिरस्य परीवाहैः पूरयित्वा सरांसि च । सर्वानष्टादश द्वीपान्वशमानीय भार्गवः ॥
rudhirasya parīvāhaiḥ pūrayitvā sarāṃsi ca | sarvānaṣṭādaśa dvīpānvaśamānīya bhārgavaḥ
उस रक्त की धाराओं से उन्होंने सरोवर भर दिए; और अठारहों द्वीपों को अपने वश में करके भार्गव ने
श्लोक 18 (7.70.18)
ईजे क्रतुशतैः पुण्यैः समाप्तवरदक्षिणैः । वेदीमष्टनलोत्सेधां सौवर्णां विधिनिर्मिताम् ॥
īje kratuśataiḥ puṇyaiḥ samāptavaradakṣiṇaiḥ | vedīmaṣṭanalotsedhāṃ sauvarṇāṃ vidhinirmitām
सैकड़ों पुण्य यज्ञ किए, जिनमें उत्तम दक्षिणाएँ पूरी-पूरी दी गईं, और विधि से बनी आठ नल ऊँची सोने की वेदी भी अर्पित की,
श्लोक 19 (7.70.19)
सर्वरत्नशतैः पूर्णां पताकाशतमालिनीम् । ग्राम्यारण्यैः पशुगणैः सम्पूर्णां च महीमिमाम् ॥
sarvaratnaśataiḥ pūrṇāṃ patākāśatamālinīm | grāmyāraṇyaiḥ paśugaṇaiḥ sampūrṇāṃ ca mahīmimām
जो सैकड़ों प्रकार के रत्नों से भरी और सैकड़ों पताकाओं की मालाओं से सजी थी, और ग्राम्य तथा वन्य पशुओं के झुंडों से भरी यह पृथ्वी भी।
श्लोक 20 (7.70.20)
रामस्य जामदग्न्यस्य प्रतिजग्राह कश्यपः । ततः शतसहस्राणि द्विपेन्द्रान्हेमभूषणान् ॥
rāmasya jāmadagnyasya pratijagrāha kaśyapaḥ | tataḥ śatasahasrāṇi dvipendrānhemabhūṣaṇān
जमदग्निपुत्र राम से कश्यप ने ये सब ग्रहण किए, और उसके बाद सोने के आभूषणों से सजे लाखों श्रेष्ठ हाथी भी।
श्लोक 21 (7.70.21)
निर्दस्युं पृथिवीं कृत्वा शिष्टेष्टजनसङ्कुलाम् । कश्यपाय ददौ रामो हयमेधे महामखे ॥
nirdasyuṃ pṛthivīṃ kṛtvā śiṣṭeṣṭajanasaṅkulām | kaśyapāya dadau rāmo hayamedhe mahāmakhe
पृथ्वी को दस्युओं से रहित और सज्जन तथा प्रिय जनों से भरी हुई करके, राम ने उसे महान् अश्वमेध यज्ञ में कश्यप को दे दिया।
श्लोक 22 (7.70.22)
त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं कृत्वा निःक्षत्रियां प्रभुः । इष्ट्वा क्रतुशतैर्वीरो ब्राह्मणेभ्यो ह्यमन्यत ॥
triḥsaptakṛtvaḥ pṛthivīṃ kṛtvā niḥkṣatriyāṃ prabhuḥ | iṣṭvā kratuśatairvīro brāhmaṇebhyo hyamanyata
प्रभु वीर राम ने इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियों से रहित करके और सैकड़ों यज्ञ करके उसे ब्राह्मणों की ही माना।
श्लोक 23 (7.70.23)
सप्तद्वीपां वसुमतीं मारीचोऽगृह्णत द्विजः । रामं प्रोवाच निर्गच्छ वसुधातो ममाज्ञया ॥
saptadvīpāṃ vasumatīṃ mārīco'gṛhṇata dvijaḥ | rāmaṃ provāca nirgaccha vasudhāto mamājñayā
तब मरीचिपुत्र ब्राह्मण कश्यप ने सात द्वीपों वाली पृथ्वी को ग्रहण कर लिया और राम से कहा, "मेरी आज्ञा से इस पृथ्वी से निकल जाओ।"
श्लोक 24 (7.70.24)
स कश्यपस्य वचनात्प्रोत्सार्य सरिताम्पतिम् । इषुपाते युधां श्रेष्ठः कुर्वन्ब्राह्मणशासनम् ॥
sa kaśyapasya vacanātprotsārya saritāmpatim | iṣupāte yudhāṃ śreṣṭhaḥ kurvanbrāhmaṇaśāsanam
कश्यप के वचन से योद्धाओं में श्रेष्ठ राम ने ब्राह्मण की आज्ञा का पालन करते हुए नदियों के स्वामी समुद्र को बाण के गिरने की दूरी तक पीछे हटा दिया
श्लोक 25 (7.70.25)
अध्यावसद्गिरिश्रेष्ठं महेन्द्रं पर्वतोत्तमम् । एवं गुणशतैर्युक्तो भृगूणां कीर्तिवर्धनः ॥
adhyāvasadgiriśreṣṭhaṃ mahendraṃ parvatottamam | evaṃ guṇaśatairyukto bhṛgūṇāṃ kīrtivardhanaḥ
और पर्वतों में श्रेष्ठ, उत्तम पर्वत महेन्द्र पर निवास किया। इस प्रकार सैकड़ों गुणों से युक्त, भृगुवंश की कीर्ति बढ़ाने वाले
श्लोक 26 (7.70.26)
जामदग्न्यो ह्यतियशा मरिष्यति महाद्युतिः । त्वया चतुर्भद्रतरः पुण्यात्पुण्यतरस्तव ॥
jāmadagnyo hyatiyaśā mariṣyati mahādyutiḥ | tvayā caturbhadrataraḥ puṇyātpuṇyatarastava
अतिशय यशस्वी, महातेजस्वी जमदग्निपुत्र भी मरेंगे। वे तुमसे चौगुने भाग्यशाली हैं और तुम्हारे पुण्य से भी अधिक पुण्यवान् हैं।
श्लोक 27 (7.70.27)
अयज्वानमदक्षिण्यं मा पुत्रमनुतप्यथाः । एते चतुर्भद्रतरास्त्वया भद्रशताधिकाः । मृता नरवरश्रेष्ठ मरिष्यन्ति च सृञ्जय ॥
ayajvānamadakṣiṇyaṃ mā putramanutapyathāḥ | ete caturbhadratarāstvayā bhadraśatādhikāḥ | mṛtā naravaraśreṣṭha mariṣyanti ca sṛñjaya
जिसने न यज्ञ किया और न दक्षिणा दी, उस अपने पुत्र के लिए शोक मत करो। ये सब तुमसे चौगुने भाग्यशाली और सैकड़ों गुना अधिक कल्याणवाले थे; फिर भी, हे नरश्रेष्ठ सृञ्जय! वे मर गए, और आगे भी मरेंगे।