Skip to main content

द्रोण पर्व · अध्याय 69

नारद द्वारा पृथु और पृथ्वी-दोहन का वृत्तान्त

नारद सृञ्जय को वेन-पुत्र पृथु की कथा सुनाते हैं, जिन्हें महर्षियों ने अभिषिक्त किया और जिनके राज्य में पृथ्वी बिना जोते अन्न देती थी तथा प्रजा निर्भय रहती थी। जब प्राणियों ने उनसे वर माँगे तो वे गौ-रूप धारण करके भागती हुई पृथ्वी का पीछा करने लगे, यहाँ तक कि उसने प्राणों की याचना की और वे उसे पुत्री मानने को सहमत हुए; उन्होंने भूमि को समतल किया, और देवताओं, असुरों, मनुष्यों, नागों, ऋषियों, यक्षों, गन्धर्वों और पितरों ने अपने-अपने बछड़े, दोहक और पात्र के साथ उसे दुहा। फिर पृथु ने सारी पृथ्वी और उसके पदार्थों को सोने का बनाकर ब्राह्मणों को दे दिया। वे भी मर गए, इसलिए सृञ्जय को अपने पुत्र के लिए शोक नहीं करना चाहिए।

अध्याय 68अध्याय-सूचीअध्याय 70

नारद उवाच

श्लोक 1 (7.69.1)

पृथुं वैन्यं च राजानं मृतं सृञ्जय शुश्रुम । यमभ्यषिञ्चत्सम्मन्त्र्य राजसूये महर्षयः ॥

pṛthuṃ vainyaṃ ca rājānaṃ mṛtaṃ sṛñjaya śuśruma | yamabhyaṣiñcatsammantrya rājasūye maharṣayaḥ

सृञ्जय, हमने सुना है कि वेन-पुत्र राजा पृथु भी मर गए — जिन्हें महर्षियों ने परस्पर विचार करके राजसूय यज्ञ में अभिषिक्त किया था।

श्लोक 2 (7.69.2)

अयं नः प्रथयिष्येत सर्वानित्यभवत्पृथुः । क्षतान्नस्त्रास्यते सर्वानित्येवं क्षत्रियोऽभवत् ॥

ayaṃ naḥ prathayiṣyeta sarvānityabhavatpṛthuḥ | kṣatānnastrāsyate sarvānityevaṃ kṣatriyo'bhavat

‘यह हम सबको बढ़ाएगा’ — इसी से वह पृथु हुआ; ‘यह हम सबको क्षत से बचाएगा’ — इसी से वह क्षत्रिय हुआ।

श्लोक 3 (7.69.3)

पृथुं वैन्यं प्रजा दृष्ट्वा रक्ताः स्मेति यदब्रुवन् । ततो राजेति नामास्य अनुरागादजायत ॥

pṛthuṃ vainyaṃ prajā dṛṣṭvā raktāḥ smeti yadabruvan | tato rājeti nāmāsya anurāgādajāyata

वेन-पुत्र पृथु को देखकर प्रजा ने कहा, ‘हम प्रसन्न (रक्त) हैं’; इस प्रकार उनके अनुराग से उसका नाम ‘राजा’ पड़ा।

श्लोक 4 (7.69.4)

अकृष्टपच्या पृथिवी आसीद्वैन्यस्य कामधुक् । सर्वाः समादुघा गावः पुटकेपुटके मधु ॥

akṛṣṭapacyā pṛthivī āsīdvainyasya kāmadhuk | sarvāḥ samādughā gāvaḥ puṭakepuṭake madhu

वैन्य के लिए पृथ्वी कामधेनु थी, बिना जोते ही अन्न देती थी; सभी गायें पूरा-पूरा दूध देती थीं, और हर दोने में मधु भरा रहता था।

श्लोक 5 (7.69.5)

आसन्हिरण्मया वृक्षाः सुखस्पर्शाः सुखावहाः । तेषां चीराणि संवीताः प्रजास्तेष्वेव शेरते ॥

āsanhiraṇmayā vṛkṣāḥ sukhasparśāḥ sukhāvahāḥ | teṣāṃ cīrāṇi saṃvītāḥ prajāsteṣveva śerate

वृक्ष सोने के थे, स्पर्श में सुखद और सुख देनेवाले; उनकी छाल के वस्त्र पहने प्रजा उन्हीं वृक्षों के बीच सोती थी।

श्लोक 6 (7.69.6)

फलान्यमृतकल्पानि स्वादूनि च मधूनि च । तेषामासीत्तदाऽऽहारो निराहाराश्च नाभवन् ॥

phalānyamṛtakalpāni svādūni ca madhūni ca | teṣāmāsīttadā''hāro nirāhārāśca nābhavan

उनके फल अमृत के समान थे, स्वादिष्ट, और मधु भी; वही तब उनका आहार था, और कोई भूखा नहीं रहता था।

श्लोक 7 (7.69.7)

अरोगाः सर्वसिद्धार्था मनुष्या ह्यकुतोभयाः । न्यवसन्त यथाकामं वृक्षेषु च गुहासु च ॥

arogāḥ sarvasiddhārthā manuṣyā hyakutobhayāḥ | nyavasanta yathākāmaṃ vṛkṣeṣu ca guhāsu ca

लोग रोगरहित थे, उनके सब प्रयोजन सिद्ध थे, और वे सब ओर से निर्भय थे; वे इच्छानुसार वृक्षों पर और गुफाओं में रहते थे।

श्लोक 8 (7.69.8)

प्रविभागो न राष्ट्राणां पुराणां चाभवत्तदा । यथासुखं यथाकामं तथैता मुदिताः प्रजाः ॥

pravibhāgo na rāṣṭrāṇāṃ purāṇāṃ cābhavattadā | yathāsukhaṃ yathākāmaṃ tathaitā muditāḥ prajāḥ

तब राष्ट्रों और नगरों का कोई विभाग नहीं था; प्रजा सुखपूर्वक, अपनी इच्छा के अनुसार प्रसन्न रहती थी।

श्लोक 9 (7.69.9)

तस्य संस्तम्भिता ह्यापः समुद्रमभियास्यतः । पर्वताश्च ददुर्मार्गं ध्वजभङ्गश्च नाभवत् ॥

tasya saṃstambhitā hyāpaḥ samudramabhiyāsyataḥ | parvatāśca dadurmārgaṃ dhvajabhaṅgaśca nābhavat

जब वह समुद्र की ओर जाता तो जल उसके लिए स्थिर हो जाता था; पर्वत उसे मार्ग दे देते थे और उसकी ध्वजा कभी नहीं टूटी।

श्लोक 10 (7.69.10)

तं वनस्पतयः शैला देवासुरनरोरगाः । सप्तर्षयः पुण्यजना गन्धर्वाप्सरसोऽपि च । पितरश्च सुखासीनमभिगम्येदमब्रुवन् ॥

taṃ vanaspatayaḥ śailā devāsuranaroragāḥ | saptarṣayaḥ puṇyajanā gandharvāpsaraso'pi ca | pitaraśca sukhāsīnamabhigamyedamabruvan

वृक्ष और पर्वत, देवता, असुर, मनुष्य और नाग, सप्तर्षि, पुण्यजन, गन्धर्व और अप्सराएँ, तथा पितर सुखपूर्वक बैठे हुए उसके पास आकर यह बोले:

वनस्पत्यादय ऊचुः

श्लोक 11 (7.69.11)

सम्राडसि क्षत्रियोऽसि राजा गोप्ता पिताऽसि नः । देह्यस्मभ्यं महाराज प्रभुः सन्नीप्सितान्वरान् । यैर्वयं शाश्वतं तृप्ता वर्तयिष्यामहे सुखम् ॥

samrāḍasi kṣatriyo'si rājā goptā pitā'si naḥ | dehyasmabhyaṃ mahārāja prabhuḥ sannīpsitānvarān | yairvayaṃ śāśvataṃ tṛptā vartayiṣyāmahe sukham

‘तुम सम्राट् हो, क्षत्रिय हो, राजा हो, हमारे रक्षक और पिता हो। हे महाराज, तुम समर्थ हो, हमें इच्छित वर दो, जिनसे हम सदा तृप्त होकर सुख से जीवन बिता सकें।’

नारद उवाच

श्लोक 12 (7.69.12)

विज्ञापितः प्रजाभिस्तु प्रजानां हितकाम्यया । धनुर्गृह्य पृषत्कांश्च वसुधामाद्रवद्बली ॥

vijñāpitaḥ prajābhistu prajānāṃ hitakāmyayā | dhanurgṛhya pṛṣatkāṃśca vasudhāmādravadbalī

प्रजा के प्रार्थना करने पर, उनके हित की इच्छा से, उस बलवान् राजा ने धनुष और बाण लेकर पृथ्वी पर धावा किया।

श्लोक 13 (7.69.13)

ततो वैन्यभयाद्राजन्गौर्भूत्वा प्राद्रवन्मही । तां पृथुर्धनुरादाय द्रवन्तीमन्वसारयत् ॥

tato vainyabhayādrājangaurbhūtvā prādravanmahī | tāṃ pṛthurdhanurādāya dravantīmanvasārayat

तब, हे राजन्, वैन्य के भय से पृथ्वी गौ बनकर भागी; पृथु ने धनुष लेकर भागती हुई उसका पीछा किया।

श्लोक 14 (7.69.14)

सा लोकान्ब्रह्मलोकादीन्गत्वा वैन्यभयार्दिता । सा ददर्शाग्रतो वैन्यं कार्मुकोद्यतपाणिकम् ॥

sā lokānbrahmalokādīngatvā vainyabhayārditā | sā dadarśāgrato vainyaṃ kārmukodyatapāṇikam

वैन्य के भय से पीड़ित वह ब्रह्मलोक आदि लोकों में गई, और उसने अपने सामने वैन्य को, हाथ में धनुष उठाए हुए, देखा।

श्लोक 15 (7.69.15)

ज्वलद्भिर्विशिखैर्बाणैर्दीप्ततेजःसमद्युतिम् । महायोगं महात्मानं दुर्धर्षममरैरपि ॥

jvaladbhirviśikhairbāṇairdīptatejaḥsamadyutim | mahāyogaṃ mahātmānaṃ durdharṣamamarairapi

वह जलते हुए बाणों से देदीप्यमान था, उसका तेज प्रज्वलित अग्नि के समान था; वह महायोगी, महात्मा और देवताओं के लिए भी दुर्धर्ष था।

श्लोक 16 (7.69.16)

अलभन्ती परित्राणं वैन्यमेवाभ्यपद्यत । कृताञ्जलिपुटा राजन्पूज्यं लोकैस्त्रिभिस्तदा ॥

alabhantī paritrāṇaṃ vainyamevābhyapadyata | kṛtāñjalipuṭā rājanpūjyaṃ lokaistribhistadā

कोई रक्षा न पाकर, हे राजन्, वह हाथ जोड़कर उसी वैन्य की शरण में गई, जो तीनों लोकों में पूजित था।

श्लोक 17 (7.69.17)

उवाच चैनं नाधर्म्यं स्त्रीवधं कर्तुमर्हसि । कथं धारयिता चासि प्रजा राजन्मया विना ॥

uvāca cainaṃ nādharmyaṃ strīvadhaṃ kartumarhasi | kathaṃ dhārayitā cāsi prajā rājanmayā vinā

उसने उससे कहा, ‘स्त्री का वध करना अधर्म है, आपको ऐसा नहीं करना चाहिए। हे राजन्, मेरे बिना आप प्रजा का पालन कैसे करेंगे?’

पृथुरुवाच

श्लोक 18 (7.69.18)

एकस्यार्थाय यो हन्यादात्मनो वा परस्य वा । एकं प्राणान्बहून्वापि प्राणिनां नास्ति पातकं ॥

ekasyārthāya yo hanyādātmano vā parasya vā | ekaṃ prāṇānbahūnvāpi prāṇināṃ nāsti pātakaṃ

‘जो मनुष्य एक के लिए — अपने या दूसरे के लिए — एक को, या बहुतों को भी, मार डाले, तो प्राणियों के बीच उसे कोई पाप नहीं लगता।

श्लोक 19 (7.69.19)

यस्मिंस्तु निहते भद्रे बहवः सुखमेधते । तस्मिन्हते त्वघं नास्ति पातकं नोपभुज्यते ॥

yasmiṃstu nihate bhadre bahavaḥ sukhamedhate | tasminhate tvaghaṃ nāsti pātakaṃ nopabhujyate

‘हे भद्रे, जिसके मारे जाने पर बहुत-से लोग सुखपूर्वक फलते-फूलते हैं, उसे मारने में कोई पाप नहीं; वह पाप भोगना नहीं पड़ता।

श्लोक 20 (7.69.20)

सोऽहं पालनिमित्तं त्वां वधिष्यामि वसुंधरे । यदि चेद्वचनादद्य न करिष्यसि मे प्रियम् ॥

so'haṃ pālanimittaṃ tvāṃ vadhiṣyāmi vasuṃdhare | yadi cedvacanādadya na kariṣyasi me priyam

‘इसलिए, हे वसुन्धरे, प्रजा के पालन के लिए मैं तुम्हें मार डालूँगा, यदि आज तुम मेरे कहने से मेरा प्रिय कार्य नहीं करोगी।

श्लोक 21 (7.69.21)

त्वां निहत्य तु बाणेन मच्छासनपराङ्मुखीम् । आत्मानं प्रथयित्वाऽहं प्रजा धारयिता स्वयं ॥

tvāṃ nihatya tu bāṇena macchāsanaparāṅmukhīm | ātmānaṃ prathayitvā'haṃ prajā dhārayitā svayaṃ

‘मेरी आज्ञा से विमुख तुम्हें बाण से मारकर, मैं स्वयं को विस्तृत करके प्रजा का स्वयं धारण करूँगा।

श्लोक 22 (7.69.22)

सुखं वचनमास्थाय मम धर्मभृतां वरे । सञ्जीवय प्रजा नित्यं शक्ता ह्यसि वसुन्धरे ॥

sukhaṃ vacanamāsthāya mama dharmabhṛtāṃ vare | sañjīvaya prajā nityaṃ śaktā hyasi vasundhare

‘हे धर्म धारण करनेवालों में श्रेष्ठ, मेरी बात सहर्ष मान लो और प्रजा को सदा जीवित रखो; हे वसुन्धरे, तुम इसमें समर्थ हो।

श्लोक 23 (7.69.23)

दुहितृत्वं च मे गच्छ एवमेतन्महाशरम् । नियच्छेयं त्वदर्थाय उद्यतं घोरदर्शनम् ॥

duhitṛtvaṃ ca me gaccha evametanmahāśaram | niyaccheyaṃ tvadarthāya udyataṃ ghoradarśanam

‘और मेरी पुत्री बन जाओ; तब मैं तुम्हारे लिए उठाए हुए इस भयंकर, महान् बाण को रोक लूँगा।’

भूमिरुवाच

श्लोक 24 (7.69.24)

सर्वमेतन्महाराज विधास्यासि परन्तप । वत्सं त्वं पश्य राजन्वै क्षरेयं येन वत्सला ॥

sarvametanmahārāja vidhāsyāsi parantapa | vatsaṃ tvaṃ paśya rājanvai kṣareyaṃ yena vatsalā

‘हे महाराज, हे परन्तप, आप यह सब पूरा करेंगे। हे राजन्, बछड़ा खोजिए, जिससे मैं वत्सला गौ की तरह दूध दे सकूँ।

श्लोक 25 (7.69.25)

समां तु कुरु सर्वज्ञ मां तु धर्मभृतां वर । यथा विष्यन्दमानं वै क्षीरं सर्वत्र भावये ॥

samāṃ tu kuru sarvajña māṃ tu dharmabhṛtāṃ vara | yathā viṣyandamānaṃ vai kṣīraṃ sarvatra bhāvaye

‘और हे सर्वज्ञ, हे धर्मधारियों में श्रेष्ठ, मुझे समतल कर दीजिए, जिससे बहता हुआ दूध मैं सब ओर पहुँचा सकूँ।’

नारद उवाच

श्लोक 26 (7.69.26)

तत उत्सारयामास शिलाजालानि सर्वशः । पृथुर्वैन्यस्तदा राजा तेन शैला विवर्धिताः ॥

tata utsārayāmāsa śilājālāni sarvaśaḥ | pṛthurvainyastadā rājā tena śailā vivardhitāḥ

तब राजा वैन्य पृथु ने सब ओर से शिलाओं के समूह हटा दिए, और उसी से पर्वत बढ़ गए।

श्लोक 27 (7.69.27)

न हि पूर्वनिसर्गे वै विषमे वसुधातले । प्रविभागः पुराणां वा ग्रामाणां वा महीपते ॥

na hi pūrvanisarge vai viṣame vasudhātale | pravibhāgaḥ purāṇāṃ vā grāmāṇāṃ vā mahīpate

क्योंकि पहली सृष्टि में, जब पृथ्वी की सतह ऊबड़-खाबड़ थी, हे महीपते, नगरों या गाँवों का कोई विभाग नहीं था,

श्लोक 28 (7.69.28)

न सस्यानि न गोरक्ष्यं न कृषिर्न वणिक्पथः । वैन्यात्प्रभृति राजेन्द्र सर्वस्यैतस्य सम्भवः ॥

na sasyāni na gorakṣyaṃ na kṛṣirna vaṇikpathaḥ | vainyātprabhṛti rājendra sarvasyaitasya sambhavaḥ

न अन्न की खेती थी, न गोपालन, न कृषि, न व्यापार-मार्ग; हे राजेन्द्र, वैन्य से ही इस सबका आरम्भ हुआ।

श्लोक 29 (7.69.29)

यत्रयत्र च साम्यं तु भूमावासीत्किलानघ । तत्रतत्र प्रजास्तात निवासमभिरोचयन् । कृच्छ्रेण च महाराज इत्येवमनुशुश्रुम ॥

yatrayatra ca sāmyaṃ tu bhūmāvāsītkilānagha | tatratatra prajāstāta nivāsamabhirocayan | kṛcchreṇa ca mahārāja ityevamanuśuśruma

हे अनघ, जहाँ-जहाँ भूमि समतल थी, वहीं-वहीं प्रजा, हे तात, बसना पसन्द करती थी — यद्यपि कठिनाई से, हे महाराज; ऐसा हमने सुना है।

श्लोक 30 (7.69.30)

तथेत्युक्त्वा पुनर्वैन्यो गृहीत्वाऽऽजगवं धनुः । शरांश्चाप्रतिमान्घोरांश्चिन्तयित्वाऽब्रवीन्महीम् ॥

tathetyuktvā punarvainyo gṛhītvā''jagavaṃ dhanuḥ | śarāṃścāpratimānghorāṃścintayitvā'bravīnmahīm

‘ऐसा ही हो’ कहकर वैन्य ने फिर आजगव धनुष उठाया और अपने अनुपम, भयंकर बाणों का स्मरण करके पृथ्वी से कहा:

पृथुरुवाच

श्लोक 31 (7.69.31)

एह्येहि वसुधे क्षिप्रं क्षरैभ्यः काङ्क्षितं पयः । मच्छसनातिगां वै त्वां प्रमथिष्याम्यहं शरैः ॥

ehyehi vasudhe kṣipraṃ kṣaraibhyaḥ kāṅkṣitaṃ payaḥ | macchasanātigāṃ vai tvāṃ pramathiṣyāmyahaṃ śaraiḥ

‘आओ, आओ वसुधे, शीघ्र इनके लिए इच्छित दूध दो! मेरी आज्ञा का उल्लंघन करनेवाली तुम्हें मैं बाणों से कुचल दूँगा।’

नारद उवाच

श्लोक 32 (7.69.32)

तथोक्ता साऽत्मनः श्रेयश्चिन्तयित्वाऽब्रवीत्पृथुम् ॥

tathoktā sā'tmanaḥ śreyaścintayitvā'bravītpṛthum

इस प्रकार कहे जाने पर उसने अपने कल्याण का विचार किया और पृथु से कहा:

भूमिरुवाच

श्लोक 33 (7.69.33)

वत्सं पात्राणि दोग्धॄंश्च क्षीराणि च समादिश ॥

vatsaṃ pātrāṇi dogdhṝṃśca kṣīrāṇi ca samādiśa

‘बछड़ा, पात्र, दुहनेवाले और दूध निश्चित कर दीजिए।’

श्लोक 34 (7.69.34)

ततो दास्याम्यहं भद्र सर्वं यस्य यथेप्सितम् । दुहितृत्वे च मां वीर सङ्कल्पयितुमर्हसि ॥

tato dāsyāmyahaṃ bhadra sarvaṃ yasya yathepsitam | duhitṛtve ca māṃ vīra saṅkalpayitumarhasi

‘तब, हे भद्र, मैं सबको जो-जो जैसा चाहेगा वह सब दूँगी; और हे वीर, आप मुझे अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार करें।’

नारद उवाच

श्लोक 35 (7.69.35)

तथेत्युक्त्वा पृथुः सर्वं विधानमकरोद्वशी । ततो भूतनिकायास्तां वसुधां दुदुहुस्तदा ॥

tathetyuktvā pṛthuḥ sarvaṃ vidhānamakarodvaśī | tato bhūtanikāyāstāṃ vasudhāṃ duduhustadā

‘ऐसा ही हो’ कहकर संयमी पृथु ने सब व्यवस्था की। तब प्राणियों के समूहों ने उस पृथ्वी को दुहा।

श्लोक 36 (7.69.36)

तां वनस्पतयः पूर्वं समुत्तस्थुर्दुधुक्षवः । साऽतिष्ठद्वत्सला वत्सं दोग्धृपात्राणि चेच्छती ॥

tāṃ vanaspatayaḥ pūrvaṃ samuttasthurdudhukṣavaḥ | sā'tiṣṭhadvatsalā vatsaṃ dogdhṛpātrāṇi cecchatī

पहले वृक्ष उसे दुहने की इच्छा से उठ खड़े हुए। वत्सला गौ की तरह वह बछड़े और दुहनेवालों के पात्रों को चाहती हुई खड़ी रही।

श्लोक 37 (7.69.37)

वत्सोऽभूत्पुष्पितः सालः प्लक्षो दोग्धाऽभवत्तदा । छिन्नप्ररोहणं दुग्धं पात्रमौदुम्बरं शुभम् ॥

vatso'bhūtpuṣpitaḥ sālaḥ plakṣo dogdhā'bhavattadā | chinnaprarohaṇaṃ dugdhaṃ pātramaudumbaraṃ śubham

बछड़ा खिला हुआ साल वृक्ष था और दुहनेवाला प्लक्ष; दूध कटी हुई शाखाओं का फिर उग आना था और पात्र सुन्दर उदुम्बर।

श्लोक 38 (7.69.38)

उदयः पर्वतो वत्सो मेरुर्दोग्धा महागिरिः । रत्नान्योषधयो दुग्धं पात्रमश्ममयं तथा ॥

udayaḥ parvato vatso merurdogdhā mahāgiriḥ | ratnānyoṣadhayo dugdhaṃ pātramaśmamayaṃ tathā

उदय पर्वत बछड़ा था और महागिरि मेरु दुहनेवाला; दूध रत्न और ओषधियाँ थे और पात्र पत्थर का बना था।

श्लोक 39 (7.69.39)

देवानां वत्स इन्द्रोऽभूत्पात्रं दारुमयं तथा । दोग्धा च सविता देवो दुग्धमूर्जस्करं प्रियम् ॥

devānāṃ vatsa indro'bhūtpātraṃ dārumayaṃ tathā | dogdhā ca savitā devo dugdhamūrjaskaraṃ priyam

देवताओं के लिए इन्द्र बछड़ा था और पात्र काठ का; देवता सविता दुहनेवाला था और दूध प्रिय और बल देनेवाला था।

श्लोक 40 (7.69.40)

असुरा दुदुहुर्मायामयःपात्रे तु तां तदा । दोग्धा द्विमूर्धा तत्रासीद्वत्सश्चासीद्विरोचनः ॥

asurā duduhurmāyāmayaḥpātre tu tāṃ tadā | dogdhā dvimūrdhā tatrāsīdvatsaścāsīdvirocanaḥ

असुरों ने तब उससे माया को लोहे के पात्र में दुहा। वहाँ दुहनेवाला द्विमूर्धा था और बछड़ा विरोचन।

श्लोक 41 (7.69.41)

कृषिं च सस्यं च नरा दुदुहुः पृथिवीतले । स्वायंभुवो मनुर्वत्सस्तेषां दोग्धाऽभवत्पृथुः ॥

kṛṣiṃ ca sasyaṃ ca narā duduhuḥ pṛthivītale | svāyaṃbhuvo manurvatsasteṣāṃ dogdhā'bhavatpṛthuḥ

मनुष्यों ने पृथ्वी पर कृषि और अन्न को दुहा; स्वायम्भुव मनु बछड़ा थे और पृथु उनके दुहनेवाले।

श्लोक 42 (7.69.42)

अलाबुपात्रे च तथा विषं दुग्धा वसुन्धरा । धृतराष्ट्रोऽभवद्दोग्धा तेषां वत्सस्तु तक्षकः ॥

alābupātre ca tathā viṣaṃ dugdhā vasundharā | dhṛtarāṣṭro'bhavaddogdhā teṣāṃ vatsastu takṣakaḥ

लौकी के पात्र में नागों ने पृथ्वी से विष दुहा; धृतराष्ट्र उनके दुहनेवाले थे और तक्षक उनका बछड़ा।

श्लोक 43 (7.69.43)

सप्तर्षिभिर्ब्रह्म दुग्धा तथा चाक्लिष्टकर्मभिः । दोग्धा बृहस्पतिः पात्रं छन्दो वत्सश्च सोमराट् ॥

saptarṣibhirbrahma dugdhā tathā cākliṣṭakarmabhiḥ | dogdhā bṛhaspatiḥ pātraṃ chando vatsaśca somarāṭ

अक्लिष्टकर्मा सप्तर्षियों ने उससे ब्रह्म, अर्थात् वेद, दुहा; बृहस्पति दुहनेवाले थे, छन्द पात्र था और सोमराज बछड़ा।

श्लोक 44 (7.69.44)

अन्तर्धानं चामपात्रे दुग्धा पुण्यजनैर्विराट् । दोग्धा वैश्रवणस्तेषां वत्सश्चासीद्वृषध्वजः ॥

antardhānaṃ cāmapātre dugdhā puṇyajanairvirāṭ | dogdhā vaiśravaṇasteṣāṃ vatsaścāsīdvṛṣadhvajaḥ

पुण्यजनों ने कच्चे मिट्टी के पात्र में पृथ्वी से अन्तर्धान की शक्ति दुही; वैश्रवण उनके दुहनेवाले थे और वृषध्वज बछड़ा।

श्लोक 45 (7.69.45)

पुण्यगन्धान्पद्मपात्रे गन्धर्वाप्सरसोऽदुहन् । वत्सश्चित्ररथस्तेषां दोग्धा विश्वरुचिः प्रभुः ॥

puṇyagandhānpadmapātre gandharvāpsaraso'duhan | vatsaścitrarathasteṣāṃ dogdhā viśvaruciḥ prabhuḥ

गन्धर्वों और अप्सराओं ने कमल के पात्र में पवित्र सुगन्धें दुहीं; उनका बछड़ा चित्ररथ था और दुहनेवाले प्रभु विश्वरुचि।

श्लोक 46 (7.69.46)

स्वधां रजतपात्रेषु दुदुहुः पितरश्च ताम् । वत्सो वैवस्वतस्तेषां यमो दोग्धान्तकस्तदा ॥

svadhāṃ rajatapātreṣu duduhuḥ pitaraśca tām | vatso vaivasvatasteṣāṃ yamo dogdhāntakastadā

पितरों ने चाँदी के पात्रों में उससे स्वधा दुही; वैवस्वत उनका बछड़ा था और तब यम अन्तक दुहनेवाले थे।

श्लोक 47 (7.69.47)

एवं निकायैस्तैर्दुग्धा पयोऽभीष्टं हि सा विराट् । यैर्वर्तयन्ति ते ह्यद्य पात्रैर्वत्सैश्च नित्यशः ॥

evaṃ nikāyaistairdugdhā payo'bhīṣṭaṃ hi sā virāṭ | yairvartayanti te hyadya pātrairvatsaiśca nityaśaḥ

इस प्रकार उन समूहों ने उस पृथ्वी से अपना-अपना इच्छित दूध दुहा, जिससे वे आज भी अपने पात्रों और बछड़ों के साथ सदा निर्वाह करते हैं।

श्लोक 48 (7.69.48)

यज्ञैश्च विविधैरिष्ट्वा पृथुर्वैन्यः प्रतापवान् । सन्तर्पयित्वा भूतानि सर्वैः कामैर्मनःप्रियैः ॥

yajñaiśca vividhairiṣṭvā pṛthurvainyaḥ pratāpavān | santarpayitvā bhūtāni sarvaiḥ kāmairmanaḥpriyaiḥ

अनेक प्रकार के यज्ञों से यजन करके और सब प्राणियों को सभी मनचाही कामनाओं से तृप्त करके, प्रतापी वेन-पुत्र पृथु ने

श्लोक 49 (7.69.49)

हैरण्यानकरोद्राजा ये केचित्पार्थिवा भुवि । तान्ब्राह्मणेभ्यः प्रायच्छदश्वमेधे महामखे ॥

hairaṇyānakarodrājā ye kecitpārthivā bhuvi | tānbrāhmaṇebhyaḥ prāyacchadaśvamedhe mahāmakhe

पृथ्वी के जो-जो पदार्थ थे, उन सबको सोने का बना दिया और महान् अश्वमेध यज्ञ में ब्राह्मणों को दे दिया।

श्लोक 50 (7.69.50)

स षष्टिं गोसहस्राणि षष्टिं नागशतानि च । सौवर्णानकरोद्राजा ब्राह्मणेभ्यश्च तान्ददौ ॥

sa ṣaṣṭiṃ gosahasrāṇi ṣaṣṭiṃ nāgaśatāni ca | sauvarṇānakarodrājā brāhmaṇebhyaśca tāndadau

उसने साठ हजार गायें और छह हजार हाथी सोने के बना दिए, और राजा ने उन्हें ब्राह्मणों को दे दिया।

श्लोक 51 (7.69.51)

इमां च पृथिवीं सर्वां मणिरत्नविभूषिताम् । सौवर्णीमकरोद्राजा ब्राह्मणेभ्यश्च तां ददौ ॥

imāṃ ca pṛthivīṃ sarvāṃ maṇiratnavibhūṣitām | sauvarṇīmakarodrājā brāhmaṇebhyaśca tāṃ dadau

और मणियों और रत्नों से विभूषित इस सारी पृथ्वी को राजा ने सोने की बना दिया और ब्राह्मणों को दे दिया।

श्लोक 52 (7.69.52)

स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात्पुण्यतरस्तुभ्यं मा पुत्रमनुतप्यथाः । अयज्वानमदक्षिण्यमभि श्वैत्येत्युदाहरत् ॥

sa cenmamāra sṛñjaya caturbhadratarastvayā | putrātpuṇyatarastubhyaṃ mā putramanutapyathāḥ | ayajvānamadakṣiṇyamabhi śvaityetyudāharat

सृञ्जय, यदि वह भी मर गया — जो तुमसे चौगुना भाग्यशाली और तुम्हारे पुत्र से अधिक पुण्यात्मा था — तो तुम अपने उस पुत्र के लिए शोक मत करो, जिसने न कभी यज्ञ किया और न दक्षिणा दी। इस प्रकार नारद ने उसे ‘श्वैत्य’ कहकर सम्बोधित किया।

अध्याय 68अध्याय-सूचीअध्याय 70