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द्रोण पर्व · अध्याय 75

कृष्ण की अर्जुन को चेतावनी

कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि उसने बिना परामर्श के जो प्रतिज्ञा की वह दुस्साहस थी, और गुप्तचरों का समाचार सुनाते हैं: कौरव घबरा गए थे, और जयद्रथ ने दुर्योधन से घर जाने की अनुमति या सुदृढ़ रक्षा माँगी, यह कहते हुए कि वासुदेव के साथ अर्जुन के सामने कोई नहीं टिक सकता। कृष्ण आगे बताते हैं कि द्रोण से उसकी रक्षा का आग्रह किया गया है, उन्होंने शकट-पद्म व्यूह रचा है जिसके मध्य में जयद्रथ छह महारथियों से रक्षित खड़ा रहेगा, और अर्जुन को उन छहों के बल का विचार करना चाहिए।

अध्याय 74अध्याय-सूचीअध्याय 76

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.75.1)

प्रतिज्ञाते तु पार्थेन सिन्धुराजवधे तदा । वासुदेवो महाबाहुर्धनञ्जयमभाषत ॥

pratijñāte tu pārthena sindhurājavadhe tadā | vāsudevo mahābāhurdhanañjayamabhāṣata

तब पार्थ के सिन्धुराज के वध की प्रतिज्ञा कर लेने पर महाबाहु वासुदेव ने धनंजय से कहा —

वासुदेव उवाच

श्लोक 2 (7.75.2)

भ्रातॄणां मतमज्ञाय त्वया वाचा प्रतिश्रुतम् । सैन्धवं चास्मि हन्तेति तत्साहसमिदं कृतम् ॥

bhrātṝṇāṃ matamajñāya tvayā vācā pratiśrutam | saindhavaṃ cāsmi hanteti tatsāhasamidaṃ kṛtam

"अपने भाइयों का मत जाने बिना ही तुमने 'मैं सैन्धव को मारूँगा' कहकर वचन दे दिया — यह दुस्साहस का कार्य किया है।

श्लोक 3 (7.75.3)

असम्मन्त्र्य मया सार्धमतिभारोऽयमुद्यतः । कथं तु सर्वलोकस्य नावहास्या भवेमहि ॥

asammantrya mayā sārdhamatibhāro'yamudyataḥ | kathaṃ tu sarvalokasya nāvahāsyā bhavemahi

मुझसे परामर्श किए बिना तुमने यह भारी बोझ उठा लिया है। हम सारे संसार के उपहास के पात्र कैसे न बनेंगे?

श्लोक 4 (7.75.4)

धार्तराष्ट्रस्य शिबिरे ये तु प्रणिहिताश्चराः । त इमे शीघ्रमागम्य प्रवृत्तिं वेदयन्ति नः ॥

dhārtarāṣṭrasya śibire ye tu praṇihitāścarāḥ | ta ime śīghramāgamya pravṛttiṃ vedayanti naḥ

धृतराष्ट्र-पुत्र के शिविर में जो गुप्तचर नियुक्त किए गए थे, वे शीघ्र लौटकर हमें समाचार बता रहे हैं।

श्लोक 5 (7.75.5)

त्वया वै सम्प्रतिज्ञाते सिन्धुराजवधे प्रभो । सिंहनादः सवादित्रः सुमहानिह तैः श्रुतः ॥

tvayā vai sampratijñāte sindhurājavadhe prabho | siṃhanādaḥ savāditraḥ sumahāniha taiḥ śrutaḥ

हे प्रभो, जब तुमने सिन्धुराज के वध की प्रतिज्ञा की, तब उन्होंने वहाँ वाद्यों के साथ एक बहुत बड़ा सिंहनाद सुना।

श्लोक 6 (7.75.6)

तेन शब्देन वित्रस्ता धार्तराष्ट्राः ससैन्धवाः । नाकस्मात्सिंहनादोऽयमिति मत्वा व्यवस्थिताः ॥

tena śabdena vitrastā dhārtarāṣṭrāḥ sasaindhavāḥ | nākasmātsiṃhanādo'yamiti matvā vyavasthitāḥ

उस ध्वनि से घबराकर धृतराष्ट्र-पुत्र और सैन्धव यह सोचकर डटे रहे — "यह सिंहनाद अकारण नहीं है।"

श्लोक 7 (7.75.7)

सुमहाञ्शब्दसम्पातः कौरवाणां महाभुज । आसीन्नागाश्वपत्तीनां रथघोषश्च भैरवः ॥

sumahāñśabdasampātaḥ kauravāṇāṃ mahābhuja | āsīnnāgāśvapattīnāṃ rathaghoṣaśca bhairavaḥ

हे महाबाहो, कौरवों में हाथियों, घोड़ों और पैदलों का बड़ा भारी कोलाहल उठा और रथों की भयंकर घरघराहट होने लगी।

श्लोक 8 (7.75.8)

अभिमन्योर्वधं श्रुत्वा ध्रुवमार्तो धनञ्जयः । रात्रौ निर्यास्यति क्रोधादिति मत्वा व्यवस्थिताः ॥

abhimanyorvadhaṃ śrutvā dhruvamārto dhanañjayaḥ | rātrau niryāsyati krodhāditi matvā vyavasthitāḥ

"अभिमन्यु के वध की बात सुनकर दुःखी अर्जुन अवश्य ही क्रोध में रात को ही निकल पड़ेंगे" — यह सोचकर वे तैयार खड़े रहे।

श्लोक 9 (7.75.9)

तैश्चारेभ्य इयं कृत्स्ना श्रुता सत्यवतस्तव । प्रतिज्ञा सिन्धुराजस्य वधे राजीवलोचन ॥

taiścārebhya iyaṃ kṛtsnā śrutā satyavatastava | pratijñā sindhurājasya vadhe rājīvalocana

हे सत्यव्रत कमलनयन, अपने गुप्तचरों से उन्होंने सिन्धुराज के वध की तुम्हारी यह सारी प्रतिज्ञा सुन ली।

श्लोक 10 (7.75.10)

ततो विमनसः सर्वे त्रस्ताः क्षुद्रमृगा इव । आसन्सुयोधनामात्याः स च राजा जयद्रथः ॥

tato vimanasaḥ sarve trastāḥ kṣudramṛgā iva | āsansuyodhanāmātyāḥ sa ca rājā jayadrathaḥ

तब सुयोधन के सब मन्त्री और राजा जयद्रथ भी, छोटे मृगों की भाँति डरकर, उदास हो गए।

श्लोक 11 (7.75.11)

अथोत्थाय सहामात्यैर्दीनः स्वशिविरात्किल । अयात्सौवीरसिन्धूनामीश्वरो राजसंसदम् ॥

athotthāya sahāmātyairdīnaḥ svaśivirātkila | ayātsauvīrasindhūnāmīśvaro rājasaṃsadam

तब, कहते हैं, सौवीरों और सिन्धुओं का वह दीन स्वामी अपने मन्त्रियों सहित अपने शिविर से उठकर राज-सभा में गया।

श्लोक 12 (7.75.12)

स मन्त्रकाले संमन्त्र्य सर्वां नैश्रेयसीं क्रियाम् । सुयोधनमिदं वाक्यमब्रवीद्राजसंसदि ॥

sa mantrakāle saṃmantrya sarvāṃ naiśreyasīṃ kriyām | suyodhanamidaṃ vākyamabravīdrājasaṃsadi

मन्त्रणा के समय अपने कल्याण के सब उपायों पर विचार करके उसने राज-सभा में सुयोधन से ये वचन कहे —

जयद्रथ उवाच

श्लोक 13 (7.75.13)

मामसौ पुत्रहन्तेति श्वोऽभियाता धनञ्जयः । प्रतिज्ञातो हि सेनाया मध्ये तेन वधो मम ॥

māmasau putrahanteti śvo'bhiyātā dhanañjayaḥ | pratijñāto hi senāyā madhye tena vadho mama

"'यह मेरे पुत्र का हत्यारा है' — ऐसा सोचकर धनंजय कल मुझ पर चढ़ आएगा। उसने सेना के बीच मेरे वध की प्रतिज्ञा की है।

श्लोक 14 (7.75.14)

तां न देवा न गन्धर्वा नासुरोरगराक्षसाः । उत्सहन्तेऽन्यथा कर्तुं प्रतिज्ञां सव्यसाचिनः ॥

tāṃ na devā na gandharvā nāsuroragarākṣasāḥ | utsahante'nyathā kartuṃ pratijñāṃ savyasācinaḥ

सव्यसाची की उस प्रतिज्ञा को न देवता, न गन्धर्व, न असुर, नाग या राक्षस अन्यथा कर सकते हैं।

श्लोक 15 (7.75.15)

ते मां रक्षत सङ्ग्रामे मा वो मूर्ध्नि धनञ्जयः । पदं कृत्वाऽऽप्नुयाल्लक्ष्यं युक्तं प्रतिविधीयताम् ॥

te māṃ rakṣata saṅgrāme mā vo mūrdhni dhanañjayaḥ | padaṃ kṛtvā''pnuyāllakṣyaṃ yuktaṃ pratividhīyatām

इसलिए युद्ध में मेरी रक्षा करो, ऐसा न हो कि धनंजय तुम्हारे सिरों पर पैर रखकर अपना लक्ष्य पा ले। उचित प्रबन्ध किया जाए।

श्लोक 16 (7.75.16)

अथ रक्षा न मे सम्यक्क्रियते कुरुनन्दन । अनुजानीहि मां राजन्गमिष्यामि गृहान्प्रति ॥

atha rakṣā na me samyakkriyate kurunandana | anujānīhi māṃ rājangamiṣyāmi gṛhānprati

और यदि मेरी ठीक रक्षा नहीं की जाती, हे कुरुनन्दन, तो हे राजन्, मुझे आज्ञा दो; मैं घर चला जाऊँगा।"

वासुदेव उवाच

श्लोक 17 (7.75.17)

एवमुक्तस्त्ववाक्शीर्षो विमनाः स सुयोधनः । श्रुत्वा तं समयं तस्य ध्यानमेवान्वपद्यत ॥

evamuktastvavākśīrṣo vimanāḥ sa suyodhanaḥ | śrutvā taṃ samayaṃ tasya dhyānamevānvapadyata

इस प्रकार कहे जाने पर सुयोधन सिर झुकाए, उदास होकर उसकी वह शर्त सुनकर चिन्ता में डूब गया।

श्लोक 18 (7.75.18)

तमार्तमभिसम्प्रेक्ष्य राजा किल स सैन्धवः । मृदु चात्महितं चैव सापेक्षमिदमुक्तवान् ॥

tamārtamabhisamprekṣya rājā kila sa saindhavaḥ | mṛdu cātmahitaṃ caiva sāpekṣamidamuktavān

उसे दुःखी देखकर सैन्धव राजा ने, कहते हैं, कोमल, अपने हित से भरे और अपेक्षा-भरे ये वचन कहे —

जयद्रथ उवाच

श्लोक 19 (7.75.19)

नेह पश्यामि भवतां तथावीर्यं धनुर्धरम् । योऽर्जुनस्यास्त्रमस्त्रेण प्रतिहन्यान्महाहवे ॥

neha paśyāmi bhavatāṃ tathāvīryaṃ dhanurdharam | yo'rjunasyāstramastreṇa pratihanyānmahāhave

"मैं तुम लोगों में ऐसा कोई धनुर्धर नहीं देखता जो महायुद्ध में अर्जुन के अस्त्र को अस्त्र से काट सके।

श्लोक 20 (7.75.20)

वासुदेवसहायस्य गाण्डीवं धुन्वतो धनुः । कोऽर्जुनस्याग्रतस्तिष्ठेत्साक्षादपि शतक्रतुः ॥

vāsudevasahāyasya gāṇḍīvaṃ dhunvato dhanuḥ | ko'rjunasyāgratastiṣṭhetsākṣādapi śatakratuḥ

वासुदेव जिसके सहायक हैं और जो गाण्डीव धनुष हिला रहा है, उस अर्जुन के सामने कौन ठहर सकता है — साक्षात् इन्द्र भी नहीं।

श्लोक 21 (7.75.21)

महेश्वरोऽपि पार्थेन श्रूयते योधितः पुरा । पदातिना महावीर्यो गिरौ हिमवति प्रभुः ॥

maheśvaro'pi pārthena śrūyate yodhitaḥ purā | padātinā mahāvīryo girau himavati prabhuḥ

सुना जाता है कि पहले हिमालय पर्वत पर पैदल पार्थ ने महापराक्रमी प्रभु महेश्वर से भी युद्ध किया था।

श्लोक 22 (7.75.22)

दानवानां सहस्राणि हिरण्यपुरवासिनाम् । जघानैकरथेनैव देवराजप्रचोदितः ॥

dānavānāṃ sahasrāṇi hiraṇyapuravāsinām | jaghānaikarathenaiva devarājapracoditaḥ

उसने देवराज की प्रेरणा से एक ही रथ पर हिरण्यपुरवासी हजारों दानवों को मार डाला था।

श्लोक 23 (7.75.23)

समायुक्तो हि कौन्तेयो वासुदेवेन धीमता । सामरानपि लोकांस्त्रीन्हन्यादिति मतिर्मम ॥

samāyukto hi kaunteyo vāsudevena dhīmatā | sāmarānapi lokāṃstrīnhanyāditi matirmama

बुद्धिमान् वासुदेव के साथ मिला हुआ कुन्तीपुत्र देवताओं सहित तीनों लोकों का भी संहार कर सकता है — ऐसा मेरा विचार है।

श्लोक 24 (7.75.24)

सोऽहमिच्छाम्यनुज्ञातुं रक्षितुं वा महात्मना । द्रोणेन सहपुत्रेण वीरेण यदि मन्यसे ॥

so'hamicchāmyanujñātuṃ rakṣituṃ vā mahātmanā | droṇena sahaputreṇa vīreṇa yadi manyase

इसलिए मैं या तो जाने की आज्ञा चाहता हूँ, या यदि तुम ठीक समझो तो पुत्र सहित महात्मा वीर द्रोण के द्वारा अपनी रक्षा चाहता हूँ।"

श्रीभगवानुवाच

श्लोक 25 (7.75.25)

स राज्ञा स्वयमाचार्यो भृशमत्रार्थितोऽर्जुन । संविधानं च विहितं रथाश्च किल सज्जिताः ॥

sa rājñā svayamācāryo bhṛśamatrārthito'rjuna | saṃvidhānaṃ ca vihitaṃ rathāśca kila sajjitāḥ

हे अर्जुन, राजा ने स्वयं आचार्य से इस विषय में बहुत आग्रह किया है; व्यवस्था हो चुकी है और रथ, कहते हैं, सजा दिए गए हैं।

श्लोक 26 (7.75.26)

कर्णो भूरिश्रवा द्रौणिर्वृषसेनश्च दुर्जयः । कृपश्च मद्रराजश्च षडेतेऽस्य पुरोगमाः ॥

karṇo bhūriśravā drauṇirvṛṣasenaśca durjayaḥ | kṛpaśca madrarājaśca ṣaḍete'sya purogamāḥ

कर्ण, भूरिश्रवा, द्रोणपुत्र, दुर्जय वृषसेन, कृप और मद्रराज — ये छह उसके आगे रहेंगे।

श्लोक 27 (7.75.27)

शकटः पद्मपश्चार्धो व्यूहो द्रोणेन निर्मितः । पद्मकर्णिकमध्यस्थः सूची पार्श्वे जयद्रथः ॥

śakaṭaḥ padmapaścārdho vyūho droṇena nirmitaḥ | padmakarṇikamadhyasthaḥ sūcī pārśve jayadrathaḥ

द्रोण ने जो व्यूह बनाया है वह शकट है जिसका पिछला आधा भाग पद्म है। पद्म की कर्णिका के मध्य में, सूची-व्यूह को पार्श्व में रखकर, जयद्रथ खड़ा रहेगा —

श्लोक 28 (7.75.28)

स्थास्यते रक्षिते वीरैः सिन्धुराट् स सुदुर्मदः । धनुष्यस्त्रे च वीर्ये च प्राणे चैव तथौरसे ॥

sthāsyate rakṣite vīraiḥ sindhurāṭ sa sudurmadaḥ | dhanuṣyastre ca vīrye ca prāṇe caiva tathaurase

सिन्धुराज वह अत्यन्त मदान्ध वीरों से रक्षित होकर खड़ा रहेगा — धनुष, अस्त्र, पराक्रम, प्राणबल और वक्षःस्थल के बल में —

श्लोक 29 (7.75.29)

अविषह्यतमा ह्येते निश्चिताः पार्थ षड्रथाः । एतानजित्वा सगणान्नैव प्राप्यो जयद्रथः ॥

aviṣahyatamā hyete niścitāḥ pārtha ṣaḍrathāḥ | etānajitvā sagaṇānnaiva prāpyo jayadrathaḥ

ये छह रथी, हे पार्थ, सबसे अधिक अजेय और दृढ़ निश्चय वाले हैं। इन्हें इनके गणों सहित जीते बिना जयद्रथ तक पहुँचा नहीं जा सकता।

श्लोक 30 (7.75.30)

तेषामेकैकशो वीर्यं षण्णां त्वमनुचिन्तय । सहिता हि नरव्याघ्र न शक्या जेतुमञ्जसा ॥

teṣāmekaikaśo vīryaṃ ṣaṇṇāṃ tvamanucintaya | sahitā hi naravyāghra na śakyā jetumañjasā

उन छहों के पराक्रम को एक-एक करके विचारो। हे नरव्याघ्र, मिले हुए होने पर उन्हें सहज ही जीता नहीं जा सकता।

श्लोक 31 (7.75.31)

भूयस्तु मन्त्रयिष्यामि नीतिमात्महिताय वै । मन्त्रज्ञैः सचिवैः सार्धं सुहृद्भिः कार्यसिद्धये ॥

bhūyastu mantrayiṣyāmi nītimātmahitāya vai | mantrajñaiḥ sacivaiḥ sārdhaṃ suhṛdbhiḥ kāryasiddhaye

और मैं अपने हित के लिए नीति पर मन्त्रज्ञ सचिवों और मित्रों के साथ कार्य-सिद्धि के निमित्त फिर विचार करूँगा।"

अध्याय 74अध्याय-सूचीअध्याय 76