द्रोण पर्व · अध्याय 76
अर्जुन की जयद्रथ-वध की प्रतिज्ञा
जयद्रथ की रक्षा करने वाले छह महारथियों के विषय में कृष्ण की शंकाओं का उत्तर देते हुए अर्जुन घोषणा करते हैं कि वे द्रोण की सेना को भेदकर अगले दिन सिन्धुराज को मार गिराएँगे, चाहे सभी देवता और प्राणी उसकी रक्षा करें। वे अपनी प्रतिज्ञा की सत्यता की शपथ लेते हैं, कृष्ण से अपना अपमान न करने को कहते हैं और प्रभात होते-होते उत्तम रथ सजाने का आदेश देते हैं।
अर्जुन उवाच
श्लोक 1 (7.76.1)
षड्रथान्धार्तराष्ट्रस्य मन्यसे यान्बलाधिकान् । तेषां वीर्यं ममार्धेन न तुल्यमिति मे मतिः ॥
ṣaḍrathāndhārtarāṣṭrasya manyase yānbalādhikān | teṣāṃ vīryaṃ mamārdhena na tulyamiti me matiḥ
तुम समझते हो कि धृतराष्ट्र-पुत्र के छह रथी मुझसे अधिक बलवान हैं; पर मेरा मत है कि उन सबका पराक्रम मेरे आधे के भी बराबर नहीं है।
श्लोक 2 (7.76.2)
अस्त्रमस्त्रेण सर्वेषामेतेषां मधुसूदन । मया द्रक्ष्यसि निर्भिन्नं जयद्रथवधैषिणा ॥
astramastreṇa sarveṣāmeteṣāṃ madhusūdana | mayā drakṣyasi nirbhinnaṃ jayadrathavadhaiṣiṇā
हे मधुसूदन! जयद्रथ के वध की इच्छा रखने वाले मेरे द्वारा तुम इन सबके अस्त्रों को मेरे अस्त्र से कटा हुआ देखोगे।
श्लोक 3 (7.76.3)
द्रोणस्य मिषतश्चाहं सगणस्य विपश्चितः । मूर्धानं सिन्धुराजस्य पातयिष्यामि भूतले ॥
droṇasya miṣataścāhaṃ sagaṇasya vipaścitaḥ | mūrdhānaṃ sindhurājasya pātayiṣyāmi bhūtale
विद्वान् द्रोण और उनकी सारी सेना के देखते-देखते मैं सिन्धुराज का मस्तक पृथ्वी पर गिरा दूँगा।
श्लोक 4 (7.76.4)
यदि साध्याश्च रुद्राश्च वसवश्च सहाश्विनः । मरुतश्च सहेन्द्रेण विश्वेदेवाः सहेश्वराः ॥
yadi sādhyāśca rudrāśca vasavaśca sahāśvinaḥ | marutaśca sahendreṇa viśvedevāḥ saheśvarāḥ
चाहे साध्य, रुद्र, अश्विनीकुमारों सहित वसु, इन्द्र सहित मरुद्गण, ईश्वरों सहित विश्वेदेव,
श्लोक 5 (7.76.5)
पितरः सहगन्धर्वाः सुपर्णाः सागराद्रयः । द्यौर्वियत्पृथिवी चेयं दिशश्च सदिगीश्वराः ॥
pitaraḥ sahagandharvāḥ suparṇāḥ sāgarādrayaḥ | dyaurviyatpṛthivī ceyaṃ diśaśca sadigīśvarāḥ
गन्धर्वों सहित पितर, सुपर्ण, समुद्र और पर्वत, स्वर्ग, आकाश, यह पृथ्वी तथा दिशापालों सहित सब दिशाएँ,
श्लोक 6 (7.76.6)
ग्राम्यारण्यानि भूतानि स्थावराणि चराणि च । त्रातारः सिन्धुराजस्य भवन्ति मधुसूदन ॥
grāmyāraṇyāni bhūtāni sthāvarāṇi carāṇi ca | trātāraḥ sindhurājasya bhavanti madhusūdana
तथा ग्राम्य और वन्य, चर और अचर सब प्राणी भी, हे मधुसूदन, सिन्धुराज के रक्षक बन जाएँ,
श्लोक 7 (7.76.7)
तथापि बाणैर्निहतं श्वो द्रष्टासि रणे मया । सत्येन च शपे कृष्ण तथैवायुधमालभे ॥
tathāpi bāṇairnihataṃ śvo draṣṭāsi raṇe mayā | satyena ca śape kṛṣṇa tathaivāyudhamālabhe
तो भी कल तुम उसे युद्ध में मेरे बाणों से मारा गया देखोगे। हे कृष्ण! मैं सत्य की शपथ खाता हूँ और अपने शस्त्र का स्पर्श करता हूँ।
श्लोक 8 (7.76.8)
यस्य गोप्ता महेष्वासो द्रोणः पापस्य दुर्मतेः । तमेव प्रथमं द्रोणमभियास्यामि केशव ॥
yasya goptā maheṣvāso droṇaḥ pāpasya durmateḥ | tameva prathamaṃ droṇamabhiyāsyāmi keśava
उस दुर्बुद्धि पापी का रक्षक महाधनुर्धर द्रोण है; हे केशव! मैं सबसे पहले उसी द्रोण पर चढ़ाई करूँगा।
श्लोक 9 (7.76.9)
तस्मिन्युद्धमिदं बद्धं मन्यते स सुयोधनः । तस्मात्तस्यैव सेनाग्रं भित्त्वा यास्यामि सैन्धवम् ॥
tasminyuddhamidaṃ baddhaṃ manyate sa suyodhanaḥ | tasmāttasyaiva senāgraṃ bhittvā yāsyāmi saindhavam
सुयोधन मानता है कि यह युद्ध उसी द्रोण पर टिका हुआ है। इसलिए मैं उसी की सेना के अग्रभाग को भेदकर सैन्धव के पास पहुँचूँगा।
श्लोक 10 (7.76.10)
द्रष्टासि श्वो महेष्वासान्नाराचैस्तिग्मतेजितैः । शृङ्गाणीव गिरेर्वज्रैर्दार्यमाणान्मया युधि ॥
draṣṭāsi śvo maheṣvāsānnārācaistigmatejitaiḥ | śṛṅgāṇīva girervajrairdāryamāṇānmayā yudhi
कल तुम देखोगे कि तीखी धार वाले पैने नाराच बाणों से मेरे द्वारा रण में महाधनुर्धर वैसे ही चीरे जा रहे हैं, जैसे वज्रों से पर्वत के शिखर चीरे जाते हैं।
श्लोक 11 (7.76.11)
नरनागाश्वदेहेभ्यो विस्रविष्यति शोणितम् । पतद्भ्यः पतितेभ्यश्च विभिन्नेभ्यः शितैः शरैः ॥
naranāgāśvadehebhyo visraviṣyati śoṇitam | patadbhyaḥ patitebhyaśca vibhinnebhyaḥ śitaiḥ śaraiḥ
मेरे तीखे बाणों से बिंधे हुए गिरते और गिरे हुए मनुष्यों, हाथियों और घोड़ों के शरीरों से रक्त बह निकलेगा।
श्लोक 12 (7.76.12)
गाण्डीवप्रेषिता बाणा मनोऽनिलसमा जवे । नृनागाश्वान्विदेहासून्कर्तारश्च सहस्रशः ॥
gāṇḍīvapreṣitā bāṇā mano'nilasamā jave | nṛnāgāśvānvidehāsūnkartāraśca sahasraśaḥ
गाण्डीव से छूटे हुए, मन और वायु के समान वेग वाले बाण हज़ारों की संख्या में मनुष्यों, हाथियों और घोड़ों को देह और प्राण से रहित कर देंगे।
श्लोक 13 (7.76.13)
शक्राद्भीष्मात्कृपाद्द्रोणाद्देवाद्रुद्राच्च यन्मया । उपात्तमस्त्रं घोरं तद्द्रष्टारोऽत्र नरा युधि ॥
śakrādbhīṣmātkṛpāddroṇāddevādrudrācca yanmayā | upāttamastraṃ ghoraṃ taddraṣṭāro'tra narā yudhi
इन्द्र, भीष्म, कृप, द्रोण, देवता और रुद्र से मैंने जो घोर अस्त्र प्राप्त किया है, उसे यहाँ युद्ध में लोग देखेंगे।
श्लोक 14 (7.76.14)
ब्राह्मेणास्त्रेण चास्त्राणि हन्यमानानि संयुगे । मया द्रष्टाऽसि सर्वेषां सैन्धवस्याभिरक्षिणाम् ॥
brāhmeṇāstreṇa cāstrāṇi hanyamānāni saṃyuge | mayā draṣṭā'si sarveṣāṃ saindhavasyābhirakṣiṇām
संग्राम में तुम देखोगे कि सैन्धव की रक्षा करने वाले उन सबके अस्त्र मेरे ब्रह्मास्त्र से नष्ट किए जा रहे हैं।
श्लोक 15 (7.76.15)
शरवेगसमुत्कृत्तै राज्ञां केशव मूर्धभिः । आस्तीर्यमाणां पृथिवीं द्रष्टाऽसि श्वो मया युधि ॥
śaravegasamutkṛttai rājñāṃ keśava mūrdhabhiḥ | āstīryamāṇāṃ pṛthivīṃ draṣṭā'si śvo mayā yudhi
हे केशव! कल तुम युद्ध में देखोगे कि पृथ्वी मेरे बाणों के वेग से कटे हुए राजाओं के मस्तकों से पट गई है।
श्लोक 16 (7.76.16)
क्रव्यादांस्तर्पयिष्यामि द्रावयिष्यामि शात्रवान् । सुहृदो नन्दयिष्यामि प्रमथिष्यामि सैन्धवम् ॥
kravyādāṃstarpayiṣyāmi drāvayiṣyāmi śātravān | suhṛdo nandayiṣyāmi pramathiṣyāmi saindhavam
मैं मांसभक्षी जीवों को तृप्त करूँगा, शत्रुओं को भगा दूँगा, मित्रों को आनन्दित करूँगा और सैन्धव को कुचल डालूँगा।
श्लोक 17 (7.76.17)
बह्वागस्कृत्कुसंबन्धी पापदेशसमुद्भवः । मया सैन्धवको राजा हतः स्वाञ्शोचयिष्यति ॥
bahvāgaskṛtkusaṃbandhī pāpadeśasamudbhavaḥ | mayā saindhavako rājā hataḥ svāñśocayiṣyati
बहुत अपराध करने वाला, बुरे सम्बन्ध वाला और पापी देश में उत्पन्न वह सैन्धव राजा मेरे हाथ से मारा जाकर अपने लोगों को शोक में डालेगा।
श्लोक 18 (7.76.18)
सर्वे क्षीरान्नभोक्तारः पापाचारा रणाजिरे । मया सराजका बाणैर्हता नश्यन्ति सैन्धवाः ॥
sarve kṣīrānnabhoktāraḥ pāpācārā raṇājire | mayā sarājakā bāṇairhatā naśyanti saindhavāḥ
दूध और भात खाने वाले, पापाचारी वे सब सैन्धव अपने राजाओं सहित रणभूमि में मेरे बाणों से मारे जाकर नष्ट हो जाएँगे।
श्लोक 19 (7.76.19)
तथा प्रभाते कर्ताऽस्मि यथा कृष्ण सुयोधनः । नान्यं धनुर्धरं लोके मंस्यते मत्समं युधि ॥
tathā prabhāte kartā'smi yathā kṛṣṇa suyodhanaḥ | nānyaṃ dhanurdharaṃ loke maṃsyate matsamaṃ yudhi
हे कृष्ण! प्रभात होने पर मैं ऐसा करूँगा कि सुयोधन संसार में किसी दूसरे धनुर्धर को युद्ध में मेरे समान नहीं मानेगा।
श्लोक 20 (7.76.20)
गाण्डीवं च धनुर्दिव्यं योद्धारं च धनञ्जम् । यन्तारं च हृषीकेशं कोऽतिवर्तेत संयुगे ॥
gāṇḍīvaṃ ca dhanurdivyaṃ yoddhāraṃ ca dhanañjam | yantāraṃ ca hṛṣīkeśaṃ ko'tivarteta saṃyuge
दिव्य धनुष गाण्डीव, योद्धा धनञ्जय और सारथि हृषीकेश के सामने युद्ध में कौन टिक सकता है?
श्लोक 21 (7.76.21)
तव प्रसादाद्भगवन्किंनावाप्तं रणे मम । अविषह्यं हृषीकेश किं जानन्मां विगर्हसे ॥
tava prasādādbhagavankiṃnāvāptaṃ raṇe mama | aviṣahyaṃ hṛṣīkeśa kiṃ jānanmāṃ vigarhase
हे भगवन्! आपकी कृपा से युद्ध में मुझे क्या प्राप्त नहीं हुआ? हे हृषीकेश! मेरे लिए असह्य क्या है? क्या जानकर आप मेरी निन्दा करते हैं?
श्लोक 22 (7.76.22)
यथा लक्ष्म स्थिरं चन्द्रे समुद्रे च यथा जलम् । एवमेतां प्रतिज्ञां मे सत्यां विद्धि जनार्दन ॥
yathā lakṣma sthiraṃ candre samudre ca yathā jalam | evametāṃ pratijñāṃ me satyāṃ viddhi janārdana
जैसे चन्द्रमा में कलंक स्थिर है और समुद्र में जल, वैसे ही हे जनार्दन! मेरी इस प्रतिज्ञा को भी सत्य जानो।
श्लोक 23 (7.76.23)
मावमंस्था ममास्त्राणि मावमंस्थाश्च गाण्डिवम् । मावमंस्था बलं बाह्वोर्मावमंस्था धनञ्जयम् ॥
māvamaṃsthā mamāstrāṇi māvamaṃsthāśca gāṇḍivam | māvamaṃsthā balaṃ bāhvormāvamaṃsthā dhanañjayam
मेरे अस्त्रों का अनादर मत करो; गाण्डीव का अनादर मत करो; मेरी भुजाओं के बल का अनादर मत करो; धनञ्जय का अनादर मत करो।
श्लोक 24 (7.76.24)
गाण्डीवं च धनुर्दिव्यं योद्धा चाहं नरर्षभ । त्वं च यन्ता हृषीकेश किन्नु स्यादजितं मया ॥
gāṇḍīvaṃ ca dhanurdivyaṃ yoddhā cāhaṃ nararṣabha | tvaṃ ca yantā hṛṣīkeśa kinnu syādajitaṃ mayā
दिव्य धनुष गाण्डीव, योद्धा मैं, हे नरश्रेष्ठ! और सारथि आप, हे हृषीकेश! फिर ऐसा क्या होगा जिसे मैं जीत न सकूँ?
श्लोक 25 (7.76.25)
यथाभियाय सङ्ग्रमं न जितो वै जयामि च । तेन सत्येन सङ्ग्रामे हतं विद्धि जयद्रथम् ॥
yathābhiyāya saṅgramaṃ na jito vai jayāmi ca | tena satyena saṅgrāme hataṃ viddhi jayadratham
जिस प्रकार संग्राम में जाकर मैं कभी हारता नहीं, जीतता ही हूँ, उसी सत्य के बल पर जानो कि जयद्रथ युद्ध में मारा जा चुका है।
श्लोक 26 (7.76.26)
त्वं च माधव सर्वं तत्तथा प्रतिविधास्यसि । यथा रिपूणां मिषतां प्रमथिष्यामि सैन्धवम् ॥
tvaṃ ca mādhava sarvaṃ tattathā pratividhāsyasi | yathā ripūṇāṃ miṣatāṃ pramathiṣyāmi saindhavam
और हे माधव! तुम वह सब ऐसा प्रबन्ध करोगे कि शत्रुओं के देखते-देखते मैं सैन्धव को कुचल डालूँ।
श्लोक 27 (7.76.27)
ध्रुवं वै ब्राह्मणे सत्यं ध्रुवा साधुषु सन्नतिः । श्रीर्ध्रुवाऽपि च दक्षेषु ध्रुवो नारायणे जयः ॥
dhruvaṃ vai brāhmaṇe satyaṃ dhruvā sādhuṣu sannatiḥ | śrīrdhruvā'pi ca dakṣeṣu dhruvo nārāyaṇe jayaḥ
ब्राह्मण में सत्य निश्चित है, सज्जनों में विनय निश्चित है, कुशल पुरुषों में लक्ष्मी निश्चित है और नारायण में विजय निश्चित है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 28 (7.76.28)
एवमुक्त्वा हृषीकेशं स्वयमात्मानमात्मना । सन्दिदेशार्जुनो नर्दन्वासविः केशवं प्रभुम् ॥
evamuktvā hṛṣīkeśaṃ svayamātmānamātmanā | sandideśārjuno nardanvāsaviḥ keśavaṃ prabhum
हृषीकेश से इस प्रकार अपने मन की बात कहकर इन्द्रपुत्र अर्जुन ने गर्जना करते हुए प्रभु केशव को आदेश दिया।
अर्जुन उवाच
श्लोक 29 (7.76.29)
यथा प्रभातां रजनीं कल्पितः स्याद्रथोत्तमः । तथा कार्यं त्वया कृष्ण प्रतिज्ञा स्याद्यथा ध्रुवा ॥
yathā prabhātāṃ rajanīṃ kalpitaḥ syādrathottamaḥ | tathā kāryaṃ tvayā kṛṣṇa pratijñā syādyathā dhruvā
हे कृष्ण! ऐसा करना कि रात्रि के प्रभात होने तक उत्तम रथ सजकर तैयार हो जाए और मेरी प्रतिज्ञा अटल रहे।