द्रोण पर्व · अध्याय 77
कृष्ण द्वारा सुभद्रा को सान्त्वना
कृष्ण और अर्जुन शोक और क्रोध से भरे हुए सारी रात जागते रहते हैं और भयंकर अपशकुन प्रकट होते हैं, जिनसे सेनाएँ विचलित हो उठती हैं। अर्जुन के कहने पर कृष्ण पुत्र अभिमन्यु के शोक में डूबी सुभद्रा के पास जाकर उन्हें सान्त्वना देते हैं: वह तरुण वीर क्षत्रिय की मृत्यु पाकर पुण्यात्माओं के लोकों में गया है, और कल जयद्रथ को अपने कर्म का फल मिलेगा।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.77.1)
तां निशां दुःखशोकार्तौ निःश्वसन्ताविवोरगौ । निद्रां नैवोपलेभाते वासुदेवधनञ्जयौ ॥
tāṃ niśāṃ duḥkhaśokārtau niḥśvasantāvivoragau | nidrāṃ naivopalebhāte vāsudevadhanañjayau
उस रात दुःख और शोक से पीड़ित वासुदेव और धनञ्जय दो सर्पों की तरह लम्बी साँसें भरते रहे और उन्हें नींद नहीं आई।
श्लोक 2 (7.77.2)
नरनारायणौ क्रुद्धौ ज्ञात्वा देवाः सवासवाः । व्यथिताश्चिन्तयामासुः किंस्विदेतद्भविष्यति ॥
naranārāyaṇau kruddhau jñātvā devāḥ savāsavāḥ | vyathitāścintayāmāsuḥ kiṃsvidetadbhaviṣyati
नर और नारायण को क्रुद्ध जानकर इन्द्र सहित देवता व्याकुल होकर सोचने लगे, "यह क्या होने वाला है?"
श्लोक 3 (7.77.3)
ववुश्च दारुणा वाता रूक्षा घोराभिशंसिनः । सकबन्धस्तथाऽऽदित्ये परिघः समदृश्यत ॥
vavuśca dāruṇā vātā rūkṣā ghorābhiśaṃsinaḥ | sakabandhastathā''ditye parighaḥ samadṛśyata
भयंकर अनिष्ट सूचित करती हुई रूखी, कठोर हवाएँ चलने लगीं और सूर्य पर कबन्ध-सहित एक काली परिघ-रेखा दिखाई दी।
श्लोक 4 (7.77.4)
शुष्काशन्यश्च निष्पेतुः सनिर्घाताः सविद्युतः । चचाल चापि पृथिवी सशैलवनकानना ॥
śuṣkāśanyaśca niṣpetuḥ sanirghātāḥ savidyutaḥ | cacāla cāpi pṛthivī saśailavanakānanā
गड़गड़ाहट और बिजली के साथ सूखे वज्र गिरने लगे और पर्वतों, वनों और उपवनों सहित पृथ्वी काँप उठी।
श्लोक 5 (7.77.5)
चुक्षुभुश्च महाराज सागरा मकरालयाः । प्रतिस्रोतःप्रवृत्ताश्च तथा गन्तुं समुद्रगाः ॥
cukṣubhuśca mahārāja sāgarā makarālayāḥ | pratisrotaḥpravṛttāśca tathā gantuṃ samudragāḥ
हे महाराज! मगरमच्छों के निवास समुद्र क्षुब्ध हो उठे और नदियाँ उलटी धारा में बहने लगीं।
श्लोक 6 (7.77.6)
रथाश्वनरनागानां प्रवृत्तमधरोत्तरम् । क्रव्यादानां प्रमोदार्थं यमराष्ट्रविवृद्धये ॥
rathāśvanaranāgānāṃ pravṛttamadharottaram | kravyādānāṃ pramodārthaṃ yamarāṣṭravivṛddhaye
रथों, घोड़ों, मनुष्यों और हाथियों में उलट-पुलट मच गई, ऊँचा नीचा हो गया; यह मांसभक्षियों के हर्ष और यमराज के राज्य की वृद्धि के लिए था।
श्लोक 7 (7.77.7)
वाहनानि शकृन्मूत्रे मुमुचू रुरुदुश्च ह । तान्दृष्ट्वा दारुणान्सर्वानुत्पाताँल्लोमहर्षणान् ॥
vāhanāni śakṛnmūtre mumucū ruruduśca ha | tāndṛṣṭvā dāruṇānsarvānutpātām̐llomaharṣaṇān
वाहन-पशु मल-मूत्र त्यागने लगे और रोने लगे। उन सब भयंकर, रोंगटे खड़े कर देने वाले उत्पातों को देखकर
श्लोक 8 (7.77.8)
सर्वे ते व्यथिताः सैन्यास्त्वदीया भरतर्षभ । श्रुत्वा महाबलस्योग्रां प्रतिज्ञां सव्यसाचिनः ॥
sarve te vyathitāḥ sainyāstvadīyā bharatarṣabha | śrutvā mahābalasyogrāṃ pratijñāṃ savyasācinaḥ
हे भरतश्रेष्ठ! महाबली सव्यसाची की उस उग्र प्रतिज्ञा को सुनकर आपकी वे सब सेनाएँ भयभीत हो उठीं।
श्लोक 9 (7.77.9)
अथ कृष्णं महाबाहुरब्रवीत्पाकशासनिः । आश्वासय सुभद्रां त्वं भगिनीं स्नुषया सह ॥
atha kṛṣṇaṃ mahābāhurabravītpākaśāsaniḥ | āśvāsaya subhadrāṃ tvaṃ bhaginīṃ snuṣayā saha
तब महाबाहु इन्द्रपुत्र अर्जुन ने कृष्ण से कहा, "अपनी बहन सुभद्रा को उसकी पुत्रवधू के साथ सान्त्वना दीजिए।
अर्जुन उवाच
श्लोक 10 (7.77.10)
स्नुषां चास्या वयस्याश्च विशोकाः कुरु माधव । साम्ना सत्येन युक्तेन वचसाऽऽश्वासय प्रभो ॥
snuṣāṃ cāsyā vayasyāśca viśokāḥ kuru mādhava | sāmnā satyena yuktena vacasā''śvāsaya prabho
हे माधव! उसकी पुत्रवधू और उसकी सखियों को भी शोक-रहित कीजिए; हे प्रभो! मधुर, सत्य और उचित वचनों से उन्हें धीरज बँधाइए।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 11 (7.77.11)
ततोऽर्जुनगृहं गत्वा वासुदेवः सुदुर्मनाः । भगिनीं पुत्रशोकार्तामाश्वासयत दुःखिताम् ॥
tato'rjunagṛhaṃ gatvā vāsudevaḥ sudurmanāḥ | bhaginīṃ putraśokārtāmāśvāsayata duḥkhitām
तब अत्यन्त खिन्न वासुदेव ने अर्जुन के घर जाकर पुत्र-शोक से पीड़ित, दुःखी अपनी बहन को सान्त्वना दी।
वासुदेव उवाच
श्लोक 12 (7.77.12)
मा शोकं कुरु वार्ष्णेयि कुमारं प्रति सस्नुषा । सर्वेषां प्राणिनां भीरु निष्ठैषा कालनिर्मिता ॥
mā śokaṃ kuru vārṣṇeyi kumāraṃ prati sasnuṣā | sarveṣāṃ prāṇināṃ bhīru niṣṭhaiṣā kālanirmitā
हे वार्ष्णेयी! कुमार के लिए तुम और तुम्हारी पुत्रवधू शोक मत करो। हे भीरु! सब प्राणियों के लिए काल ने यही अन्त निश्चित किया है।
श्लोक 13 (7.77.13)
कुले जातस्य वीरस्य क्षत्रियस्य विशेषतः । सदृशं मरणं ह्येतत्तव पुत्रस्य मा शुचः ॥
kule jātasya vīrasya kṣatriyasya viśeṣataḥ | sadṛśaṃ maraṇaṃ hyetattava putrasya mā śucaḥ
उत्तम कुल में जन्मे वीर के लिए, और विशेषकर क्षत्रिय के लिए, यह मृत्यु उचित ही है। अपने पुत्र के लिए शोक मत करो।
श्लोक 14 (7.77.14)
दिष्ट्या महारथो धीरः पितुस्तुल्यपराक्रमः । क्षात्रेण विधिना प्राप्तो वीराभिलषितां गतिम् ॥
diṣṭyā mahāratho dhīraḥ pitustulyaparākramaḥ | kṣātreṇa vidhinā prāpto vīrābhilaṣitāṃ gatim
सौभाग्य से वह धीर महारथी, जो पराक्रम में अपने पिता के समान था, क्षत्रिय-विधि से वीरों की अभिलषित गति को प्राप्त हुआ है।
श्लोक 15 (7.77.15)
जित्वा सुबहुशः शत्रून्प्रेषयित्वा च मृत्यवे । गतः पुण्यकृतां लोकान्सर्वकामदुहोऽक्षयान् ॥
jitvā subahuśaḥ śatrūnpreṣayitvā ca mṛtyave | gataḥ puṇyakṛtāṃ lokānsarvakāmaduho'kṣayān
बहुत-से शत्रुओं को जीतकर और उन्हें मृत्यु के पास भेजकर वह पुण्यात्माओं के उन अक्षय लोकों को गया है, जो सब कामनाएँ पूरी करने वाले हैं।
श्लोक 16 (7.77.16)
तपसा ब्रह्मचर्येण श्रुतेन प्रज्ञयापि च । सन्तो यां गतिमिच्छन्ति तां प्राप्तस्तव पुत्रकः ॥
tapasā brahmacaryeṇa śrutena prajñayāpi ca | santo yāṃ gatimicchanti tāṃ prāptastava putrakaḥ
तप, ब्रह्मचर्य, शास्त्र-ज्ञान और प्रज्ञा से सज्जन जिस गति की इच्छा करते हैं, उसे तुम्हारा पुत्र पा गया है।
श्लोक 17 (7.77.17)
वीरसूर्वीरपत्नी त्वं वीरजा वीरबान्धवा । मा शुचस्तनयं भद्रे गतः स परमां गतिम् ॥
vīrasūrvīrapatnī tvaṃ vīrajā vīrabāndhavā | mā śucastanayaṃ bhadre gataḥ sa paramāṃ gatim
तुम वीर की माता हो, वीर की पत्नी हो, वीरों से उत्पन्न और वीरों की बान्धवी हो। हे भद्रे! अपने पुत्र के लिए शोक मत करो; वह परम गति को गया है।
श्लोक 18 (7.77.18)
स्वाध्याययुक्तं ब्राह्मणी याचितारं । गौर्वोढारं त्वाशुगन्तारमश्वा । दासं शूद्रा कर्मकरं तु वैश्या । शूरं सूते त्वद्विधा राजपुत्री ॥
svādhyāyayuktaṃ brāhmaṇī yācitāraṃ | gaurvoḍhāraṃ tvāśugantāramaśvā | dāsaṃ śūdrā karmakaraṃ tu vaiśyā | śūraṃ sūte tvadvidhā rājaputrī
ब्राह्मणी वेदाध्ययन में लगे हुए याचक को जन्म देती है, गाय बोझ ढोने वाले को, घोड़ी तेज़ दौड़ने वाले को; शूद्रा दास को और वैश्या कर्म करने वाले (श्रमिक) को जन्म देती है; और तुम्हारे जैसी राजकन्या वीर को जन्म देती है।
श्लोक 19 (7.77.19)
प्राप्स्यते चाप्यसौ पापः सैन्धवो बालघातकः । अधर्मस्यास्य तु फलं ससुहृद्गणबान्धवः ॥
prāpsyate cāpyasau pāpaḥ saindhavo bālaghātakaḥ | adharmasyāsya tu phalaṃ sasuhṛdgaṇabāndhavaḥ
और बालक का घात करने वाला वह पापी सैन्धव अपने मित्रों, गणों और बान्धवों सहित इस अधर्म का फल पाएगा।
श्लोक 20 (7.77.20)
व्युष्टायां तु वरारोहे रजन्यां पापकर्मकृत् । न हि मोक्ष्यति पार्थात्स प्रविष्टोऽप्यमरावतीम् ॥
vyuṣṭāyāṃ tu varārohe rajanyāṃ pāpakarmakṛt | na hi mokṣyati pārthātsa praviṣṭo'pyamarāvatīm
हे वरारोहे! रात बीतने पर वह पापकर्मी पार्थ से नहीं बच सकेगा, चाहे वह अमरावती में ही क्यों न घुस जाए।
श्लोक 21 (7.77.21)
श्वः शिरः पादमूलं ते सैन्धवस्याहृतं ध्रुवम् । पद्भ्यां प्रमथितासि त्वं विशोका भव मा रुदः ॥
śvaḥ śiraḥ pādamūlaṃ te saindhavasyāhṛtaṃ dhruvam | padbhyāṃ pramathitāsi tvaṃ viśokā bhava mā rudaḥ
कल सैन्धव का सिर निश्चय ही तुम्हारे चरणों के पास लाया जाएगा, और तुम उसे अपने पैरों से कुचलोगी। शोक-रहित हो जाओ; मत रोओ।
श्लोक 22 (7.77.22)
क्षत्रधर्मं पुरस्कृत्य गतः शूरः सतां गतिम् । वयं च प्राप्नुयामेह ये चान्ये शस्त्रजीविनः ॥
kṣatradharmaṃ puraskṛtya gataḥ śūraḥ satāṃ gatim | vayaṃ ca prāpnuyāmeha ye cānye śastrajīvinaḥ
क्षत्रिय-धर्म को आगे रखकर वह शूर सज्जनों की गति को गया है; वही गति हम और शस्त्र से जीविका चलाने वाले अन्य लोग भी यहाँ पाएँ।
श्लोक 23 (7.77.23)
व्यूढोरस्को महाबाहुरनिवर्ती रिपुव्रजात् । गतस्तव वरारोहे पुत्रः स्वर्गं ज्वरं जहि ॥
vyūḍhorasko mahābāhuranivartī ripuvrajāt | gatastava varārohe putraḥ svargaṃ jvaraṃ jahi
चौड़ी छाती वाला, महाबाहु, शत्रु-समूह के सामने कभी पीछे न हटने वाला तुम्हारा पुत्र, हे वरारोहे! स्वर्ग को गया है। इस सन्ताप को त्याग दो।
श्लोक 24 (7.77.24)
अनुयातश्च पितरं मातृपक्षं च वीर्यवान् । सहस्रशो रिपून्हत्वा हतः शूरो महारथः ॥
anuyātaśca pitaraṃ mātṛpakṣaṃ ca vīryavān | sahasraśo ripūnhatvā hataḥ śūro mahārathaḥ
वह बलवान बालक अपने पिता और मातृकुल का अनुगामी रहा; हज़ारों शत्रुओं को मारकर वह शूर महारथी स्वयं मारा गया।
श्लोक 25 (7.77.25)
आश्वासय स्नुषां राज्ञि मा शुचः क्षत्रिये भृशम् । श्वः प्रियं सुमहच्छ्रुत्वा विशोका भव नन्दिनि ॥
āśvāsaya snuṣāṃ rājñi mā śucaḥ kṣatriye bhṛśam | śvaḥ priyaṃ sumahacchrutvā viśokā bhava nandini
हे रानी! अपनी पुत्रवधू को धीरज बँधाओ; क्षत्राणी होकर इतना शोक मत करो। हे आनन्ददायिनी! कल बहुत प्रिय समाचार सुनकर तुम शोक-रहित हो जाओगी।
श्लोक 26 (7.77.26)
यत्पार्थेन प्रतिज्ञातं तत्तथा न तदन्यथा । चिकीर्षितं हि ते भर्तुर्न भवेज्जातु निष्फलम् ॥
yatpārthena pratijñātaṃ tattathā na tadanyathā | cikīrṣitaṃ hi te bharturna bhavejjātu niṣphalam
पार्थ ने जो प्रतिज्ञा की है, वह वैसी ही होगी, अन्यथा नहीं। तुम्हारे पति का संकल्प कभी निष्फल नहीं होगा।
श्लोक 27 (7.77.27)
यदि च मनुजपन्नगाः पिशाचा । रजनिचचाराः पतगाः सुरासुराश्च । रणगतमभियान्ति सिन्धुराजं । न स भविता सह तैरपि प्रभाते ॥
yadi ca manujapannagāḥ piśācā | rajanicacārāḥ patagāḥ surāsurāśca | raṇagatamabhiyānti sindhurājaṃ | na sa bhavitā saha tairapi prabhāte
यदि मनुष्य, नाग, पिशाच, निशाचर, पक्षी, देवता और असुर भी रण में सिन्धुराज के पास उसकी रक्षा के लिए पहुँच जाएँ, तो भी प्रभात होने पर वह उनके साथ जीवित नहीं रहेगा।