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द्रोण पर्व · अध्याय 78

अभिमन्यु के लिए सुभद्रा का विलाप

कृष्ण के वचन सुनकर सुभद्रा अपने पुत्र अभिमन्यु के लिए लम्बा विलाप करती हैं: वे रणभूमि में पड़े उसके शरीर की कल्पना करती हैं, उसकी रक्षा न कर पाने वालों को धिक्कारती हैं और उससे दानियों, पवित्र जनों और वीरों को मिलने वाली गतियाँ पाने की कामना करती हैं। द्रौपदी और उत्तरा भी उनके पास आ जाती हैं और सुभद्रा मूर्च्छित हो जाती हैं। कृष्ण उन्हें होश में लाकर समझाते हैं कि अभिमन्यु ने प्रसिद्ध गति पाई है, और फिर अर्जुन के पास लौट जाते हैं।

अध्याय 77अध्याय-सूचीअध्याय 79

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.78.1)

एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य केशवस्य महात्मनः । सुभद्रा पुत्रशोकार्ता विललाप सुदुःखिता ॥

etacchrutvā vacastasya keśavasya mahātmanaḥ | subhadrā putraśokārtā vilalāpa suduḥkhitā

महात्मा केशव के ये वचन सुनकर पुत्र-शोक से पीड़ित और अत्यन्त दुःखी सुभद्रा विलाप करने लगीं।

सुभद्रोवाच

श्लोक 2 (7.78.2)

हा पुत्र मम मन्दायाः कथमेत्यासि संयुगम् । निधनं प्राप्तवांस्तात पितुस्तुल्यपराक्रमः ॥

hā putra mama mandāyāḥ kathametyāsi saṃyugam | nidhanaṃ prāptavāṃstāta pitustulyaparākramaḥ

हाय पुत्र! मैं अभागिनी माता हूँ; तुम संग्राम में जाकर कैसे मृत्यु को प्राप्त हो गए, बेटा, तुम तो पराक्रम में अपने पिता के समान थे!

श्लोक 3 (7.78.3)

कथमिन्दीवरश्यामं सुदंष्ट्रं चारुलोचनम् । मुखं ते दृश्यते वत्स गुण्ठितं रणरेणुना ॥

kathamindīvaraśyāmaṃ sudaṃṣṭraṃ cārulocanam | mukhaṃ te dṛśyate vatsa guṇṭhitaṃ raṇareṇunā

बेटा! नील कमल के समान श्याम, सुन्दर दाँतों और मनोहर नेत्रों वाला तुम्हारा यह मुख रण की धूल से सना हुआ कैसे दिखाई दे रहा है?

श्लोक 4 (7.78.4)

नूनं शूरं निपतितं त्वां पश्यन्त्यनिवर्तिनम् । सुशिरोग्रीवबाह्वंसं व्यूढोरस्कं नतोदरम् ॥

nūnaṃ śūraṃ nipatitaṃ tvāṃ paśyantyanivartinam | suśirogrīvabāhvaṃsaṃ vyūḍhoraskaṃ natodaram

निश्चय ही वे सब तुम्हें देख रहे हैं, जो गिरे पड़े हो, वीर हो और कभी पीछे न हटने वाले हो; जिनका सिर, गर्दन, भुजाएँ और कन्धे सुन्दर हैं, छाती चौड़ी है और पेट पतला है,

श्लोक 5 (7.78.5)

चारूपचितसर्वाङ्गं स्वक्षं शस्त्रक्षताचितम् । भूतानि त्वां निरीक्षन्ते भूमौ चन्द्रमिवोदितम् ॥

cārūpacitasarvāṅgaṃ svakṣaṃ śastrakṣatācitam | bhūtāni tvāṃ nirīkṣante bhūmau candramivoditam

जिनके सब अंग सुडौल हैं, नेत्र सुन्दर हैं और शरीर शस्त्रों के घावों से भरा है; सब प्राणी तुम्हें पृथ्वी पर उदित चन्द्रमा की तरह पड़ा हुआ देख रहे हैं।

श्लोक 6 (7.78.6)

शयनीयं पुराऽध्युष्य स्पर्ध्यास्तरणसंवृतम् । भूमावद्य कथं शेषे विप्रविद्धः सुखोचितः ॥

śayanīyaṃ purā'dhyuṣya spardhyāstaraṇasaṃvṛtam | bhūmāvadya kathaṃ śeṣe vipraviddhaḥ sukhocitaḥ

तुम जो पहले बहुमूल्य बिछौनों से ढकी शय्या पर सोते थे, वही सुख के अभ्यासी तुम आज उखाड़कर फेंके हुए-से भूमि पर कैसे पड़े हो?

श्लोक 7 (7.78.7)

योऽन्वास्यत पुरा वीरो वरस्त्रीभिर्महाभुजः । कथमन्वास्यते सोऽद्य शिवाभिः पतितो मृधे ॥

yo'nvāsyata purā vīro varastrībhirmahābhujaḥ | kathamanvāsyate so'dya śivābhiḥ patito mṛdhe

वह महाबाहु वीर, जिसकी सेवा पहले सुन्दर स्त्रियाँ करती थीं, आज युद्ध में गिरकर सियारिनों से कैसे घिरा हुआ है?

श्लोक 8 (7.78.8)

योऽस्तूयत पुरा हृष्टैः सूतमागधबन्दिभिः । सोऽद्य क्रव्याद्गणैर्घोरैर्विनदद्भिरुपास्येत ॥

yo'stūyata purā hṛṣṭaiḥ sūtamāgadhabandibhiḥ | so'dya kravyādgaṇairghorairvinadadbhirupāsyeta

जिसकी स्तुति पहले प्रसन्न सूतों, मागधों और बन्दियों द्वारा की जाती थी, उसी के पास आज चिल्लाते हुए भयंकर मांसभक्षी झुंड बैठे हैं।

श्लोक 9 (7.78.9)

पाण्डवेषु च नाथेषु वृष्णिवीरेषु वा विभो । पाञ्चालेषु च वीरेषु हतः केनास्यनाथवत् ॥

pāṇḍaveṣu ca nātheṣu vṛṣṇivīreṣu vā vibho | pāñcāleṣu ca vīreṣu hataḥ kenāsyanāthavat

हे विभो! पाण्डव तुम्हारे रक्षक थे, वृष्णि और पांचाल वीर भी साथ थे; फिर तुम अनाथ की तरह किसके हाथ से मारे गए?

श्लोक 10 (7.78.10)

यत्र त्वं केशवे नाथे सत्यनाथो यथा हतः । अतृप्तदर्शना पुत्र दर्शनस्य तवानघ । मन्दभाग्या गमिष्यामि व्यक्तमद्य यमक्षयम् ॥

yatra tvaṃ keśave nāthe satyanātho yathā hataḥ | atṛptadarśanā putra darśanasya tavānagha | mandabhāgyā gamiṣyāmi vyaktamadya yamakṣayam

कि केशव के तुम्हारे रक्षक होते हुए भी तुम उसी की तरह मारे गए, जिसका एकमात्र रक्षक सत्य हो! हे निष्पाप पुत्र! तुम्हें देखकर भी मैं तृप्त न हो सकी; अभागिनी मैं आज निश्चय ही यमलोक को जाऊँगी।

श्लोक 11 (7.78.11)

विशालाक्षं सुकेशान्तं चारुवाक्यं सुगन्धि च । तव पुत्र कदा भूयो मुखं द्रक्ष्यामि निर्व्रणम् ॥

viśālākṣaṃ sukeśāntaṃ cāruvākyaṃ sugandhi ca | tava putra kadā bhūyo mukhaṃ drakṣyāmi nirvraṇam

बेटा! विशाल नेत्रों, सुन्दर केश-सीमा, मधुर वाणी और सुगन्ध से युक्त तुम्हारा वह निर्व्रण मुख मैं फिर कब देखूँगी?

श्लोक 12 (7.78.12)

धिग्बलं भीमसेनस्य धिक्पार्थस्य धनुष्मताम् । धिग्वीर्यं वृष्णिवीराणां पाञ्चालानां च धिग्बलं ॥

dhigbalaṃ bhīmasenasya dhikpārthasya dhanuṣmatām | dhigvīryaṃ vṛṣṇivīrāṇāṃ pāñcālānāṃ ca dhigbalaṃ

भीमसेन के बल को धिक्कार है, धनुर्धर पार्थ को धिक्कार है, वृष्णि वीरों के पराक्रम को और पांचालों के बल को भी धिक्कार है!

श्लोक 13 (7.78.13)

धिक्केकयांस्तथा चेदीन्मत्स्यांश्चैवाथ सृञ्जयान् । ये त्वां रणगतं वीरं न शेकुरभिरक्षितुम् ॥

dhikkekayāṃstathā cedīnmatsyāṃścaivātha sṛñjayān | ye tvāṃ raṇagataṃ vīraṃ na śekurabhirakṣitum

केकयों, चेदियों, मत्स्यों और सृञ्जयों को भी धिक्कार है, जो रण में गए हुए तुम जैसे वीर की रक्षा न कर सके।

श्लोक 14 (7.78.14)

अद्य पश्यामि पृथिवीं शून्यामिव हतत्विषम् । अभिमन्युमपश्यन्ती शोकव्याकुललोचना ॥

adya paśyāmi pṛthivīṃ śūnyāmiva hatatviṣam | abhimanyumapaśyantī śokavyākulalocanā

आज मैं पृथ्वी को सूनी और तेजहीन-सी देख रही हूँ, क्योंकि अभिमन्यु मुझे दिखाई नहीं देता और मेरी आँखें शोक से व्याकुल हैं।

श्लोक 15 (7.78.15)

स्वस्रीयं वासुदेवस्य पुत्रं गाण्डीवधन्वनः । कथं त्वाऽतिरथं वीरं द्रक्ष्याम्यद्य निपातितम् ॥

svasrīyaṃ vāsudevasya putraṃ gāṇḍīvadhanvanaḥ | kathaṃ tvā'tirathaṃ vīraṃ drakṣyāmyadya nipātitam

तुम वासुदेव के भानजे और गाण्डीवधारी के पुत्र हो। तुम जैसे अतिरथी वीर को मैं आज मारा गया कैसे देख सकूँगी?

श्लोक 16 (7.78.16)

एह्येहि तृषितो वत्स स्तनौ पूर्णौ पिबाशु मे । अङ्कमारुह्य मन्दाया ह्यतृप्तायाश्च दर्शने ॥

ehyehi tṛṣito vatsa stanau pūrṇau pibāśu me | aṅkamāruhya mandāyā hyatṛptāyāśca darśane

आओ, आओ बेटा, तुम प्यासे हो; मेरे भरे हुए स्तनों से शीघ्र दूध पी लो। मेरी गोद में चढ़ आओ; मैं अभागिनी हूँ, तुम्हें देखकर भी तृप्त नहीं हुई।

श्लोक 17 (7.78.17)

हा वीर दृष्टो नष्टश्च धनं स्वप्न इवासि मे । अहो ह्यनित्यं मानुष्यं जलबुद्बुदचञ्चलम् ॥

hā vīra dṛṣṭo naṣṭaśca dhanaṃ svapna ivāsi me | aho hyanityaṃ mānuṣyaṃ jalabudbudacañcalam

हाय वीर! तुम मुझे दिखे और खो गए, स्वप्न में देखे धन के समान। अहो! मनुष्य का जीवन सचमुच अनित्य है, जल के बुलबुले के समान चंचल।

श्लोक 18 (7.78.18)

इमां ते तरुणीं भार्यां तवाधिभिरभिप्लुताम् । उत्तरामुत्तमां जात्या सुशीलां प्रियभाषिणीम् ॥

imāṃ te taruṇīṃ bhāryāṃ tavādhibhirabhiplutām | uttarāmuttamāṃ jātyā suśīlāṃ priyabhāṣiṇīm

यह तुम्हारी तरुण पत्नी, जो तुम्हारे लिए व्यथाओं से घिरी है: उत्तरा, जो जन्म से उत्तम, सुशील और मधुरभाषिणी है,

श्लोक 19 (7.78.19)

शनकैः परिरभ्यैनां स्नुषां मम यशस्विनीम् । सुकुमारीं विशालाक्षीं पूर्णचन्द्रनिभाननाम् ॥

śanakaiḥ parirabhyaināṃ snuṣāṃ mama yaśasvinīm | sukumārīṃ viśālākṣīṃ pūrṇacandranibhānanām

मेरी इस यशस्विनी पुत्रवधू को धीरे से गले लगाओ, जो सुकुमार है, विशाल नेत्रों वाली है और जिसका मुख पूर्ण चन्द्रमा के समान है,

श्लोक 20 (7.78.20)

बालपल्लवतन्वङ्गीं मत्तमातङ्गगामिनीम् । बिम्बाधरोष्ठीमबलामभिमन्यो प्रहर्षय ॥

bālapallavatanvaṅgīṃ mattamātaṅgagāminīm | bimbādharoṣṭhīmabalāmabhimanyo praharṣaya

जो नई कोंपल जैसे कोमल अंगों वाली है, मतवाले हाथी की चाल से चलती है और जिसके होंठ बिम्बफल के समान हैं; हे अभिमन्यु! उस अबला को आनन्दित करो।

श्लोक 21 (7.78.21)

त्वया विना कथं पुत्र जीर्णां पतितमानसाम् । इमां सन्धारयिष्यामि वृषभादिव धेनुकाम् ॥

tvayā vinā kathaṃ putra jīrṇāṃ patitamānasām | imāṃ sandhārayiṣyāmi vṛṣabhādiva dhenukām

बेटा! तुम्हारे बिना मैं उसे, जो जीर्ण और टूटे मन की है, कैसे सँभालूँगी, जैसे बैल से बिछुड़ी गाय को?

श्लोक 22 (7.78.22)

अहो ह्यकाले प्रस्थानं कृतवानसि पुत्रक । विहाय फलकाले मां सुगृद्धां तव दर्शने ॥

aho hyakāle prasthānaṃ kṛtavānasi putraka | vihāya phalakāle māṃ sugṛddhāṃ tava darśane

हाय बेटा! तुमने अकाल में प्रस्थान कर दिया; फल के समय तुम्हें देखने को लालायित मुझ अभागिनी को छोड़कर चले गए।

श्लोक 23 (7.78.23)

नूनं गतिः कृतान्तस्य प्राज्ञैरपि सुदुर्विदा । यत्र त्वं केशवे नाथे सङ्ग्रामेऽनाथवद्धतः ॥

nūnaṃ gatiḥ kṛtāntasya prājñairapi sudurvidā | yatra tvaṃ keśave nāthe saṅgrāme'nāthavaddhataḥ

निश्चय ही काल की गति ज्ञानियों के लिए भी दुर्बोध है, क्योंकि केशव के रक्षक होते हुए भी तुम युद्ध में अनाथ की तरह मारे गए।

श्लोक 24 (7.78.24)

यज्वनां दानशीलानां ब्राह्मणानां कृतात्मनाम् । चरितब्रह्मचर्याणां पुण्यतीर्थावगाहिनाम् ॥

yajvanāṃ dānaśīlānāṃ brāhmaṇānāṃ kṛtātmanām | caritabrahmacaryāṇāṃ puṇyatīrthāvagāhinām

यज्ञ करने वालों, दानशीलों, शुद्धात्मा ब्राह्मणों, ब्रह्मचर्य का पालन करने वालों और पुण्य तीर्थों में स्नान करने वालों की जो गति है,

श्लोक 25 (7.78.25)

कृतज्ञानां वदान्यानां गुरुशुश्रूषिणामपि । सहस्रदक्षिणानां च या गतिस्तामवाप्नुहि ॥

kṛtajñānāṃ vadānyānāṃ guruśuśrūṣiṇāmapi | sahasradakṣiṇānāṃ ca yā gatistāmavāpnuhi

कृतज्ञों, उदार पुरुषों, गुरुजनों की सेवा करने वालों और सहस्र-दक्षिणा देने वालों की जो गति है, उसे तुम प्राप्त करो।

श्लोक 26 (7.78.26)

या गतिर्युध्यमानानां शूराणामनिवर्तिनाम् । हत्वारीन्निहतानां च सङ्ग्रामे तां गतिं व्रज ॥

yā gatiryudhyamānānāṃ śūrāṇāmanivartinām | hatvārīnnihatānāṃ ca saṅgrāme tāṃ gatiṃ vraja

लड़ते हुए कभी पीछे न हटने वाले शूरों की, और शत्रुओं को मारकर युद्ध में स्वयं मारे जाने वालों की जो गति है, उसी गति को जाओ।

श्लोक 27 (7.78.27)

गोसहस्रप्रदातॄणां क्रतुदानां च या गतिः । नैवेशिकं चाभिमतं ददतां या गतिः शुभा ॥

gosahasrapradātṝṇāṃ kratudānāṃ ca yā gatiḥ | naiveśikaṃ cābhimataṃ dadatāṃ yā gatiḥ śubhā

हज़ार गौओं का दान करने वालों, यज्ञों में दान देने वालों और अभीष्ट, साज-सामान से भरा गृह दान करने वालों की जो शुभ गति है,

श्लोक 28 (7.78.28)

ब्राह्मणेभ्यः शरण्येभ्यो निधिं निदधतां च या । या चापि न्यस्तदण्डानां तां गतिं व्रज पुत्रक ॥

brāhmaṇebhyaḥ śaraṇyebhyo nidhiṃ nidadhatāṃ ca yā | yā cāpi nyastadaṇḍānāṃ tāṃ gatiṃ vraja putraka

जो शरण के योग्य ब्राह्मणों के लिए निधि रख छोड़ते हैं और जिन्होंने दण्ड त्याग दिया है, उनकी जो गति है, उसी गति को जाओ, बेटा।

श्लोक 29 (7.78.29)

ब्रह्मचर्येण यां यान्ति मुनयः संशितव्रताः । एकपत्न्यश्च यां यान्ति तां गतिं व्रज पुत्रक ॥

brahmacaryeṇa yāṃ yānti munayaḥ saṃśitavratāḥ | ekapatnyaśca yāṃ yānti tāṃ gatiṃ vraja putraka

कठोर व्रत वाले मुनि ब्रह्मचर्य से जिस गति को पाते हैं, और एक पति के प्रति निष्ठा रखने वाली स्त्रियाँ जिस गति को पाती हैं, उसी गति को जाओ, बेटा।

श्लोक 30 (7.78.30)

राज्ञा सुचरितैर्या च गतिर्भवति शाश्वती । चरमाश्रमिणां पुण्यैः सेवितानां पुरः स्थितैः ॥

rājñā sucaritairyā ca gatirbhavati śāśvatī | caramāśramiṇāṃ puṇyaiḥ sevitānāṃ puraḥ sthitaiḥ

राजाओं को उनके सुचरित्र से जो शाश्वत गति मिलती है, और अन्तिम आश्रम वालों को, जिनकी सेवा सामने खड़े लोग करते हैं, उनके पुण्यों से जो गति मिलती है,

श्लोक 31 (7.78.31)

दीनानुकम्पिनां या च सततं संविभागिनाम् । पैशुन्याच्च निवृत्तानां तां गतिं व्रज पुत्रक ॥

dīnānukampināṃ yā ca satataṃ saṃvibhāginām | paiśunyācca nivṛttānāṃ tāṃ gatiṃ vraja putraka

जो दीनों पर सदा दया करते हैं, सदा अपना भाग बाँटते हैं और चुगली से दूर रहते हैं, उनकी जो गति है, उसी गति को जाओ, बेटा।

श्लोक 32 (7.78.32)

व्रतिनां धर्मशीलानां गुरुशुश्रूषिणामपि । अमोघातिथिनां या च तां गतिं व्रज पुत्रक ॥

vratināṃ dharmaśīlānāṃ guruśuśrūṣiṇāmapi | amoghātithināṃ yā ca tāṃ gatiṃ vraja putraka

व्रतधारियों, धर्मशीलों, गुरु-सेवकों और अतिथि-सत्कार को कभी निष्फल न होने देने वालों की जो गति है, उसी गति को जाओ, बेटा।

श्लोक 33 (7.78.33)

कृच्छ्रेषु या धारयतामात्मानं व्यसनेषु च । गतिः शोकाग्निदग्धानां तां गतिं व्रज पुत्रक ॥

kṛcchreṣu yā dhārayatāmātmānaṃ vyasaneṣu ca | gatiḥ śokāgnidagdhānāṃ tāṃ gatiṃ vraja putraka

जो कठिनाइयों और विपत्तियों में अपने को संभाले रखते हैं और शोक की अग्नि से जले हुए हैं, उनकी जो गति है, उसी गति को जाओ, बेटा।

श्लोक 34 (7.78.34)

मातापित्रोश्च शुश्रूषां कल्पयन्तीह ये सदा । स्वदारनिरतानां च या गतिस्तामवाप्नुहि ॥

mātāpitrośca śuśrūṣāṃ kalpayantīha ye sadā | svadāraniratānāṃ ca yā gatistāmavāpnuhi

जो यहाँ सदा माता-पिता की सेवा करते हैं और अपनी ही पत्नी में अनुरक्त रहते हैं, उनकी जो गति है, उसे तुम प्राप्त करो।

श्लोक 35 (7.78.35)

ऋतुकाले स्वकां भार्यां गच्छतां या मनीषिणाम् । परस्त्रीभ्यो निवृत्तानां तां गतिं व्रज पुत्रक ॥

ṛtukāle svakāṃ bhāryāṃ gacchatāṃ yā manīṣiṇām | parastrībhyo nivṛttānāṃ tāṃ gatiṃ vraja putraka

जो विवेकी पुरुष ऋतुकाल में अपनी ही पत्नी के पास जाते हैं और पराई स्त्रियों से दूर रहते हैं, उनकी जो गति है, उसी गति को जाओ, बेटा।

श्लोक 36 (7.78.36)

साम्ना ये सर्वभूतानि पश्यन्ति गतमत्सराः । नारुन्तुदानां क्षमिणां या गतिस्तामवाप्नुहि ॥

sāmnā ye sarvabhūtāni paśyanti gatamatsarāḥ | nāruntudānāṃ kṣamiṇāṃ yā gatistāmavāpnuhi

जो ईर्ष्या त्यागकर सब प्राणियों को प्रेम से देखते हैं, दूसरों के मर्म को नहीं छेदते और क्षमाशील हैं, उनकी जो गति है, उसे तुम प्राप्त करो।

श्लोक 37 (7.78.37)

मधुमांसान्निवृत्तानां मदाद्दम्भात्तथाऽनृतात् । परोपतापादन्यायात्तां गतिं व्रज पुत्रक ॥

madhumāṃsānnivṛttānāṃ madāddambhāttathā'nṛtāt | paropatāpādanyāyāttāṃ gatiṃ vraja putraka

जो मधु और मांस से, मद, दम्भ और असत्य से, दूसरों को सताने से और अन्याय से दूर रहते हैं, उनकी जो गति है, उसी गति को जाओ, बेटा।

श्लोक 38 (7.78.38)

ह्रीमन्तः सर्वशास्त्रज्ञा ज्ञानतृप्ता जितेन्द्रियाः । यां गतिं साधवो यान्ति तां गतिं व्रज पुत्रक ॥

hrīmantaḥ sarvaśāstrajñā jñānatṛptā jitendriyāḥ | yāṃ gatiṃ sādhavo yānti tāṃ gatiṃ vraja putraka

लज्जाशील, सब शास्त्रों के ज्ञाता, ज्ञान से तृप्त और जितेन्द्रिय सज्जन जिस गति को पाते हैं, उसी गति को जाओ, बेटा।

सञ्जय उवाच

श्लोक 39 (7.78.39)

एवं विलपतीं दीनां सुभद्रां शोककर्शिताम् । अन्वपद्यत पाञ्चाली वैराटिसहितां तदा ॥

evaṃ vilapatīṃ dīnāṃ subhadrāṃ śokakarśitām | anvapadyata pāñcālī vairāṭisahitāṃ tadā

इस प्रकार दीन और शोक से क्षीण सुभद्रा के विलाप करते समय पांचाली विराट की पुत्री के साथ उनके पास आ गईं।

श्लोक 40 (7.78.40)

सा प्रकामं रुदित्वा च विलप्य च सुदुःखिता । उन्मत्तवत्तदा राजन्विसंज्ञा पतिता क्षितौ ॥

sā prakāmaṃ ruditvā ca vilapya ca suduḥkhitā | unmattavattadā rājanvisaṃjñā patitā kṣitau

हे राजन्! बहुत रोकर और विलाप करके, अत्यन्त दुःखी वह उन्मत्त की तरह मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़ी।

श्लोक 41 (7.78.41)

सोपचारस्तु कृष्णस्तां दुःखितां भृशदुःखितः । सिक्त्वाम्भसा समाश्वास्य तत्तदुक्त्वा हितं वचः ॥

sopacārastu kṛṣṇastāṃ duḥkhitāṃ bhṛśaduḥkhitaḥ | siktvāmbhasā samāśvāsya tattaduktvā hitaṃ vacaḥ

स्वयं अत्यन्त दुःखी कृष्ण ने उस दुःखिनी का उपचार किया, उस पर जल छिड़ककर उसे धीरज बँधाया और उससे हितकर वचन कहे।

श्लोक 42 (7.78.42)

विसंज्ञकल्पां रुदतीमपविद्धां प्रवेपतीम् । भगिनीं पुण्डरीकाक्ष इदं वचनमब्रवीत् ॥

visaṃjñakalpāṃ rudatīmapaviddhāṃ pravepatīm | bhaginīṃ puṇḍarīkākṣa idaṃ vacanamabravīt

तब पुण्डरीकाक्ष ने रोती हुई, प्रायः अचेत, भूमि पर पड़ी हुई और काँपती हुई अपनी बहन से यह वचन कहा।

वासुदेव उवाच

श्लोक 43 (7.78.43)

सुभद्रे मा शुचः पुत्रं पाञ्चाल्याश्वासयोत्तराम् । गतोऽभिमन्युः प्रथितां गतिं क्षत्रियपुङ्गवः ॥

subhadre mā śucaḥ putraṃ pāñcālyāśvāsayottarām | gato'bhimanyuḥ prathitāṃ gatiṃ kṣatriyapuṅgavaḥ

सुभद्रे! पुत्र के लिए शोक मत करो; पांचाली! उत्तरा को धीरज बँधाओ। क्षत्रियों में श्रेष्ठ अभिमन्यु प्रसिद्ध गति को गया है।

श्लोक 44 (7.78.44)

ये चान्येऽपि कुले सन्ति पुरुषा नो वरानने । सर्वे न ते गतिं यान्ति याऽभिमन्योर्यशस्विनः ॥

ye cānye'pi kule santi puruṣā no varānane | sarve na te gatiṃ yānti yā'bhimanyoryaśasvinaḥ

हे सुमुखी! हमारे कुल में जो अन्य पुरुष हैं, वे सब उस गति को नहीं पाते, जो यशस्वी अभिमन्यु को मिली है।

श्लोक 45 (7.78.45)

कुर्याम तद्वयं कर्म कुर्युर्यत्सुहृदश्च नः । कृतवान्यादृगद्यैकस्तव पुत्रो महारथः ॥

kuryāma tadvayaṃ karma kuryuryatsuhṛdaśca naḥ | kṛtavānyādṛgadyaikastava putro mahārathaḥ

हम वैसा ही कर्म करें, और हमारे मित्र भी वैसा ही करें, जैसा आज तुम्हारे महारथी पुत्र ने अकेले किया है।

सञ्जय उवाच

श्लोक 46 (7.78.46)

एवमाश्वास्य भगिनीं द्रौपदीमपि चोत्तराम् । पार्थस्यैव महाबाहुः पार्श्वमागादरिन्दमः ॥

evamāśvāsya bhaginīṃ draupadīmapi cottarām | pārthasyaiva mahābāhuḥ pārśvamāgādarindamaḥ

इस प्रकार अपनी बहन, द्रौपदी और उत्तरा को भी सान्त्वना देकर महाबाहु शत्रुदमन कृष्ण पार्थ के पास ही लौट आए।

श्लोक 47 (7.78.47)

ततोऽभ्यनुज्ञाय नृपान्कृष्णो बन्धूंस्तथाऽर्जुनम् । विवेशान्तः पुरे राजंस्ते च जग्मुः स्वमालयम् ॥

tato'bhyanujñāya nṛpānkṛṣṇo bandhūṃstathā'rjunam | viveśāntaḥ pure rājaṃste ca jagmuḥ svamālayam

हे राजन्! फिर कृष्ण राजाओं, बान्धवों और अर्जुन से विदा लेकर अन्तःपुर में चले गए और वे सब अपने-अपने निवास को चले गए।

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