द्रोण पर्व · अध्याय 79
रात में कृष्ण का दारुक को आदेश
अर्जुन के साथ त्र्यम्बक को रात्रि-बलि अर्पित करके कृष्ण अपने शिविर में चले जाते हैं, जबकि पाण्डवों का शिविर जागता रहता है और सब सोचते हैं कि अर्जुन जयद्रथ-वध की प्रतिज्ञा कैसे पूरी करेंगे। रात के बीच जागकर कृष्ण अपने सारथि दारुक को बताते हैं कि दुर्योधन जयद्रथ की कैसे रक्षा करेगा, और कहते हैं कि वे ऐसा करेंगे कि अर्जुन सूर्यास्त से पहले उसे मार दें; वे प्रभात में अपना रथ तैयार रखने का आदेश देते हैं। दारुक उत्तर देता है कि जिसके सारथि कृष्ण हों, उसकी विजय निश्चित है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.79.1)
ततोऽर्जुनस्य भवनं प्रविश्याप्रतिमं विभुः । स्पृष्ट्वाम्भः पुण्डरीकाक्षः स्थण्डिले शुभलक्षणे । सन्तस्तार शुभां शय्यां दर्भैर्वैदूर्यसन्निभैः ॥
tato'rjunasya bhavanaṃ praviśyāpratimaṃ vibhuḥ | spṛṣṭvāmbhaḥ puṇḍarīkākṣaḥ sthaṇḍile śubhalakṣaṇe | santastāra śubhāṃ śayyāṃ darbhairvaidūryasannibhaiḥ
तब सर्वव्यापी कमलनयन श्रीकृष्ण ने अर्जुन के अनुपम भवन में प्रवेश किया और जल का स्पर्श किया। फिर शुभ लक्षणों वाली एक चुनी हुई भूमि पर वैदूर्यमणि के समान चमकते कुशों की सुन्दर शय्या बिछाई।
श्लोक 2 (7.79.2)
ततो माल्येन विधिवल्लाजैर्गन्धैः सुमङ्गलैः । अलञ्चकार तां शय्यां परिवार्यायुधोत्तमैः ॥
tato mālyena vidhivallājairgandhaiḥ sumaṅgalaiḥ | alañcakāra tāṃ śayyāṃ parivāryāyudhottamaiḥ
फिर उन्होंने विधि के अनुसार माला, लाजा (खील), गन्ध और अन्य सुमङ्गल वस्तुओं से उस शय्या को सजाया और उसके चारों ओर उत्तम अस्त्र-शस्त्र रख दिए।
श्लोक 3 (7.79.3)
ततः स्पृष्टोदकं पार्थं विनीतपरिचारकम् । नैत्यकं दर्शयाञ्चक्रे नैशं त्रैयम्बकं बलिम् ॥
tataḥ spṛṣṭodakaṃ pārthaṃ vinītaparicārakam | naityakaṃ darśayāñcakre naiśaṃ traiyambakaṃ balim
तब पार्थ ने जल का स्पर्श कर लिया और सेवक विनय से खड़े थे; उस समय कृष्ण ने उन्हें त्र्यम्बक (शिव) के लिए नित्य किया जाने वाला रात्रि-बलि दिखाया।
श्लोक 4 (7.79.4)
ततः प्रीतमनाः पार्थो गन्धमाल्यैश्च माधवम् । अलङ्कृत्योपहारं तं नैशं तस्मै न्यवेदयत् ॥
tataḥ prītamanāḥ pārtho gandhamālyaiśca mādhavam | alaṅkṛtyopahāraṃ taṃ naiśaṃ tasmai nyavedayat
तब प्रसन्न मन से पार्थ ने गन्ध और मालाओं से माधव को सजाया और वह रात्रि-उपहार उन्हें अर्पित किया।
श्लोक 5 (7.79.5)
साधुसाध्विति गोविन्दः फल्गुनं प्रत्यभाषत ॥
sādhusādhviti govindaḥ phalgunaṃ pratyabhāṣata
"बहुत अच्छा, बहुत अच्छा" — गोविन्द ने फल्गुन से कहा।
श्लोक 6 (7.79.6)
सुप्यतां पार्थ भद्रं ते कल्याणाय व्रजाम्यहम् । स्थापयित्वा ततो द्वास्थान्गोप्तॄंश्चात्तायुधान्नरान् ॥
supyatāṃ pārtha bhadraṃ te kalyāṇāya vrajāmyaham | sthāpayitvā tato dvāsthāngoptṝṃścāttāyudhānnarān
"पार्थ, अब सो जाओ; तुम्हारा कल्याण हो। मैं तुम्हारे हित के लिए जाता हूँ।" ऐसा कहकर, द्वारपालों और शस्त्र धारण किए हुए रक्षक पुरुषों को नियुक्त करके,
श्लोक 7 (7.79.7)
दारुकानुगतः श्रीमान्विवेश शिबिरं स्वकम् । शिश्ये च शयने शुभ्रे बहुकृत्य विचिन्तयन् ॥
dārukānugataḥ śrīmānviveśa śibiraṃ svakam | śiśye ca śayane śubhre bahukṛtya vicintayan
श्रीमान् कृष्ण दारुक के साथ अपने शिविर में गए और अनेक कार्यों का विचार करते हुए अपनी उजली शय्या पर लेट गए।
श्लोक 8 (7.79.8)
पार्थाय सर्वं भगवाञ्शोकदुःखापहं विधिम् । व्यदधात्पुण्डरीकाक्षस्तेजोद्युतिविवर्धनम् ॥
pārthāya sarvaṃ bhagavāñśokaduḥkhāpahaṃ vidhim | vyadadhātpuṇḍarīkākṣastejodyutivivardhanam
कमलनयन भगवान् ने पार्थ के लिए वह सारा विधान किया जो शोक और दुःख को दूर करता और तेज तथा कान्ति को बढ़ाता है;
श्लोक 9 (7.79.9)
योगमास्थाय युक्तात्मा सर्वेषामीश्वरेश्वरः । श्रेयस्कामः पृथुयशा विष्णुर्जिष्णुप्रियङ्करः ॥
yogamāsthāya yuktātmā sarveṣāmīśvareśvaraḥ | śreyaskāmaḥ pṛthuyaśā viṣṇurjiṣṇupriyaṅkaraḥ
योग का आश्रय लेकर, समाहित चित्त से — वे जो सबके ईश्वरों के भी ईश्वर हैं, विशाल यश वाले, कल्याण चाहने वाले और जिष्णु (अर्जुन) का प्रिय करने वाले विष्णु हैं।
श्लोक 10 (7.79.10)
न पाण्डवानां शिबिरे कश्चित्सुष्वाप तां निशाम् । प्रजागरः सर्वजनं ह्याविवेश विशाम्पते ॥
na pāṇḍavānāṃ śibire kaścitsuṣvāpa tāṃ niśām | prajāgaraḥ sarvajanaṃ hyāviveśa viśāmpate
हे राजन्! उस रात पाण्डवों के शिविर में कोई नहीं सोया; सभी लोगों को जागरण ने घेर लिया।
श्लोक 11 (7.79.11)
पुत्रशोकाभितप्तेन प्रतिज्ञातो महात्मना । श्वः सिन्धुराजस्य वधः कार्यो गाण्डीवधन्वना ॥
putraśokābhitaptena pratijñāto mahātmanā | śvaḥ sindhurājasya vadhaḥ kāryo gāṇḍīvadhanvanā
पुत्र के शोक से जलते हुए महात्मा गाण्डीवधारी ने प्रतिज्ञा की थी कि कल सिन्धुराज का वध किया जाएगा।
श्लोक 12 (7.79.12)
तत्कथं नु महाबाहुर्वासविः परवीरहा । प्रतिज्ञां सफलां कुर्यादिति ते समचिन्तयन् ॥
tatkathaṃ nu mahābāhurvāsaviḥ paravīrahā | pratijñāṃ saphalāṃ kuryāditi te samacintayan
"तो शत्रुवीरों का संहार करने वाले इन्द्र के पुत्र महाबाहु अर्जुन अपनी प्रतिज्ञा को कैसे सफल करेंगे?" — इस प्रकार वे सब सोचते रहे।
श्लोक 13 (7.79.13)
कष्टं हीदं व्यवसितं पाण्डवेन महात्मना । पुत्रशोकाभिभूतेन प्रतिज्ञा महती कृता ॥
kaṣṭaṃ hīdaṃ vyavasitaṃ pāṇḍavena mahātmanā | putraśokābhibhūtena pratijñā mahatī kṛtā
"महात्मा पाण्डव ने यह बड़ा कठिन निश्चय किया है; पुत्र-शोक से अभिभूत होकर उन्होंने बहुत भारी प्रतिज्ञा कर ली है।
श्लोक 14 (7.79.14)
भ्रातरश्चापि विक्रान्ता बहुलानि बलानि च । धृतराष्ट्रस्य पुत्रेण सर्वतः सन्निवेशिताः ॥
bhrātaraścāpi vikrāntā bahulāni balāni ca | dhṛtarāṣṭrasya putreṇa sarvataḥ sanniveśitāḥ
और धृतराष्ट्र के पुत्र ने अपने पराक्रमी भाइयों और अनेक सेनाओं को चारों ओर नियुक्त कर रखा है।
श्लोक 15 (7.79.15)
स हत्वा सैन्धवं सङ्ख्ये पुनरेतु जयी सुखी । हत्वा रिपुगणं सर्वं पारयित्वा महाव्रतम् ॥
sa hatvā saindhavaṃ saṅkhye punaretu jayī sukhī | hatvā ripugaṇaṃ sarvaṃ pārayitvā mahāvratam
वे संग्राम में सैन्धव को मारकर, शत्रुओं के समूह का संहार कर और अपना महान् व्रत पूरा करके विजयी और सुखी होकर लौटें।
श्लोक 16 (7.79.16)
यद्यस्ति सुकृतं किञ्चिदस्माकं हन्तु सैन्धवम् । जित्वा सर्वान्रिपून्पार्थस्त्रातु नोऽस्मान्महाभयात् ॥
yadyasti sukṛtaṃ kiñcidasmākaṃ hantu saindhavam | jitvā sarvānripūnpārthastrātu no'smānmahābhayāt
यदि हमारा कुछ भी पुण्य है, तो अर्जुन सैन्धव को मार डालें और सब शत्रुओं को जीतकर हमें इस महान् भय से बचाएँ।"
श्लोक 17 (7.79.17)
एवमाशंसमानास्ते केचित्तस्थुरुपश्रुतिम् । श्रुत्वा चेष्टं सुमनसो व्यक्तमाशंसिरे जयम् ॥
evamāśaṃsamānāste kecittasthurupaśrutim | śrutvā ceṣṭaṃ sumanaso vyaktamāśaṃsire jayam
इस प्रकार आशा करते हुए उनमें से कुछ लोग शुभ-अशुभ शकुन की बात सुनने के लिए खड़े रहे, और अनुकूल बात सुनकर प्रसन्न मन से स्पष्ट रूप से विजय की आशा करने लगे।
श्लोक 18 (7.79.18)
भविता नु कथं कृत्यमिदमित्यब्रुवञ्जनाः । श्वोऽहत्वा सिन्धुराजं वै धूमकेतुं प्रवेक्ष्यति ॥
bhavitā nu kathaṃ kṛtyamidamityabruvañjanāḥ | śvo'hatvā sindhurājaṃ vai dhūmaketuṃ pravekṣyati
लोग कहने लगे, "यह कार्य कैसे सिद्ध होगा? कल यदि वे सिन्धुराज को न मार सके तो अग्नि में प्रवेश कर लेंगे।
श्लोक 19 (7.79.19)
न शक्यमनृतां कर्तुं प्रतिज्ञां विजयेन हि । महद्धि साहसं पार्थः कृतवाच्छोकमोहितः ॥
na śakyamanṛtāṃ kartuṃ pratijñāṃ vijayena hi | mahaddhi sāhasaṃ pārthaḥ kṛtavācchokamohitaḥ
विजय (अर्जुन) अपनी प्रतिज्ञा को असत्य नहीं कर सकते, और शोक से मोहित होकर पार्थ ने बड़ा भारी साहस कर डाला है।"
श्लोक 20 (7.79.20)
धर्मपुत्रः कथं राजा भविष्यति मृतेऽर्जुने । तस्मिन्हि विजयः कृत्स्नः पाण्डवेन समाहितः ॥
dharmaputraḥ kathaṃ rājā bhaviṣyati mṛte'rjune | tasminhi vijayaḥ kṛtsnaḥ pāṇḍavena samāhitaḥ
"यदि अर्जुन मारे गए तो धर्मपुत्र राजा कैसे रहेंगे? क्योंकि उन पाण्डव ने अपनी सारी विजय अर्जुन में ही टिका रखी है।
श्लोक 21 (7.79.21)
यदि नोऽस्ति कृतं किञ्चिद्यदि दत्तं हुतं यदि । फलेन तस्य सर्वस्य सव्यसाची जयत्वरीन् ॥
yadi no'sti kṛtaṃ kiñcidyadi dattaṃ hutaṃ yadi | phalena tasya sarvasya savyasācī jayatvarīn
यदि हमने कुछ भी पुण्य किया हो, दान दिया हो या यज्ञ में आहुति दी हो, तो उस सबके फल से सव्यसाची शत्रुओं को जीतें।"
श्लोक 22 (7.79.22)
एवं कथयतां तेषां जयमाशंसतां प्रभो । कृच्छ्रेण महता राजन्रजनी व्यत्यवर्तत ॥
evaṃ kathayatāṃ teṣāṃ jayamāśaṃsatāṃ prabho | kṛcchreṇa mahatā rājanrajanī vyatyavartata
हे प्रभो! हे राजन्! इस प्रकार बातें करते और विजय की आशा करते हुए उन लोगों की वह रात बड़े कष्ट से बीती।
श्लोक 23 (7.79.23)
तस्या रजन्या मध्ये तु प्रतिबुद्धो जनार्दनः । स्मृत्वा प्रतिज्ञां पार्थस्य दारुकं प्रत्यभाषत ॥
tasyā rajanyā madhye tu pratibuddho janārdanaḥ | smṛtvā pratijñāṃ pārthasya dārukaṃ pratyabhāṣata
उस रात के मध्य में जनार्दन जाग उठे और पार्थ की प्रतिज्ञा को स्मरण करके दारुक से बोले।
वासुदेव उवाच
श्लोक 24 (7.79.24)
अर्जुनेन प्रतिज्ञातमार्तेन हतबन्धुना । जयद्रथं वधिष्यामि श्वोभूत इति दारुक ॥
arjunena pratijñātamārtena hatabandhunā | jayadrathaṃ vadhiṣyāmi śvobhūta iti dāruka
"दारुक! अपने बन्धु के मारे जाने से पीड़ित अर्जुन ने प्रतिज्ञा की है कि 'कल मैं जयद्रथ को मारूँगा।'
श्लोक 25 (7.79.25)
तत्तु दुर्योधनः श्रुत्वा मन्त्रिभिर्मन्त्रयिष्यति । यथा जयद्रथं पार्थो न हन्यादिति संयुगे ॥
tattu duryodhanaḥ śrutvā mantribhirmantrayiṣyati | yathā jayadrathaṃ pārtho na hanyāditi saṃyuge
यह सुनकर दुर्योधन अपने मन्त्रियों से सलाह करेगा कि युद्ध में पार्थ जयद्रथ को किसी प्रकार न मार सके।
श्लोक 26 (7.79.26)
अक्षौहिण्यो हि ताः सर्वा रक्षिष्यन्ति जयद्रथम् । द्रोणश्च सहपुत्रेण सर्वास्त्रविधिपारगः ॥
akṣauhiṇyo hi tāḥ sarvā rakṣiṣyanti jayadratham | droṇaśca sahaputreṇa sarvāstravidhipāragaḥ
वे सारी अक्षौहिणी सेनाएँ जयद्रथ की रक्षा करेंगी, और सब अस्त्रों की विधि के पारंगत द्रोण भी अपने पुत्र के साथ उसकी रक्षा करेंगे।
श्लोक 27 (7.79.27)
एको वीरः सहस्राक्षो दैत्यदानवदर्पहा । सोऽपि तं नोत्सहेताजौ हन्तुं द्रोणेन रक्षितम् ॥
eko vīraḥ sahasrākṣo daityadānavadarpahā | so'pi taṃ notsahetājau hantuṃ droṇena rakṣitam
दैत्यों और दानवों का दर्प चूर करने वाले सहस्र नेत्रों वाले अकेले वीर इन्द्र भी, यदि द्रोण उसकी रक्षा कर रहे हों, तो उसे युद्ध में मारने का साहस नहीं करेंगे।
श्लोक 28 (7.79.28)
सोऽहं श्वस्तत्करिष्यामि यथा कुन्तीसुतोऽर्जुनः । अप्राप्तेऽस्तं दिनकरे हनिष्यति जयद्रथम् ॥
so'haṃ śvastatkariṣyāmi yathā kuntīsuto'rjunaḥ | aprāpte'staṃ dinakare haniṣyati jayadratham
इसलिए कल मैं ऐसा करूँगा कि कुन्तीपुत्र अर्जुन सूर्यास्त से पहले ही जयद्रथ का वध कर दें।
श्लोक 29 (7.79.29)
न हि दारा न मित्राणि ज्ञातयो न च बान्धवाः । कश्चिदन्यः प्रियतरः कुन्तीपुत्रान्ममार्जुनात् ॥
na hi dārā na mitrāṇi jñātayo na ca bāndhavāḥ | kaścidanyaḥ priyataraḥ kuntīputrānmamārjunāt
क्योंकि न पत्नियाँ, न मित्र, न जाति-भाई, न सम्बन्धी — कोई भी कुन्तीपुत्र अर्जुन से बढ़कर मुझे प्रिय नहीं है।
श्लोक 30 (7.79.30)
अनर्जुनमिमं लोकं मुहूर्तमपि दारुक । उदीक्षितुं न शक्तोऽहं भविता न च तत्तथा ॥
anarjunamimaṃ lokaṃ muhūrtamapi dāruka | udīkṣituṃ na śakto'haṃ bhavitā na ca tattathā
दारुक! अर्जुन के बिना मैं इस संसार को एक मुहूर्त भर भी नहीं देख सकता; और ऐसा होगा भी नहीं।
श्लोक 31 (7.79.31)
अहं विजित्य तान्सर्वान्सहसा सहयद्विपान् । अर्जुनार्थे हनिष्यामि सकर्णान्ससुयोधनान् ॥
ahaṃ vijitya tānsarvānsahasā sahayadvipān | arjunārthe haniṣyāmi sakarṇānsasuyodhanān
मैं घोड़ों और हाथियों सहित उन सबको, कर्ण और सुयोधन के साथ, शीघ्र जीतकर अर्जुन के लिए मार डालूँगा।
श्लोक 32 (7.79.32)
श्वो निरीक्षन्तु मे वीर्यं त्रयो लोका महाहवे । धनञ्जयार्थे समरे पराक्रान्तस्य दारुक ॥
śvo nirīkṣantu me vīryaṃ trayo lokā mahāhave | dhanañjayārthe samare parākrāntasya dāruka
दारुक! कल उस महायुद्ध में धनञ्जय के लिए पराक्रम करते हुए मेरा बल तीनों लोक देखें।
श्लोक 33 (7.79.33)
श्वो नरेन्द्रसहस्राणि राजपुत्रशतानि च । साश्वद्विपरथान्याजौ विद्रविष्यामि दारुक ॥
śvo narendrasahasrāṇi rājaputraśatāni ca | sāśvadviparathānyājau vidraviṣyāmi dāruka
दारुक! कल मैं युद्ध में हज़ारों राजाओं और सैकड़ों राजकुमारों को उनके घोड़ों, हाथियों और रथों सहित तितर-बितर कर दूँगा।
श्लोक 34 (7.79.34)
श्वस्तां चक्रप्रमथितां द्रक्ष्यसे नृपवाहिनीम् । मया क्रुद्धेन समरे पाण्डवार्थे निपातिताम् ॥
śvastāṃ cakrapramathitāṃ drakṣyase nṛpavāhinīm | mayā kruddhena samare pāṇḍavārthe nipātitām
कल तुम राजाओं की उस सेना को मेरे चक्र से कुचली हुई देखोगे, जिसे मैंने पाण्डव के लिए क्रुद्ध होकर युद्ध में गिरा दिया होगा।
श्लोक 35 (7.79.35)
श्वः सदेवाः सगन्धर्वाः पिशाचोरगराक्षसाः । ज्ञास्यन्ति लोकाः सर्वे मां सुहृदं सव्यसाचिनः ॥
śvaḥ sadevāḥ sagandharvāḥ piśācoragarākṣasāḥ | jñāsyanti lokāḥ sarve māṃ suhṛdaṃ savyasācinaḥ
कल देवता, गन्धर्व, पिशाच, सर्प, राक्षस — सारे लोक मुझे सव्यसाची का मित्र जानेंगे।
श्लोक 36 (7.79.36)
यस्तं द्वेष्टि स मां द्वेष्टि यस्तं चानु स मामनु । इति सङ्कल्प्यतां बुद्ध्या शरीरार्धं ममार्जुनः ॥
yastaṃ dveṣṭi sa māṃ dveṣṭi yastaṃ cānu sa māmanu | iti saṅkalpyatāṃ buddhyā śarīrārdhaṃ mamārjunaḥ
जो उससे द्वेष करता है, वह मुझसे द्वेष करता है; जो उसका अनुसरण करता है, वह मेरा अनुसरण करता है। यह बात बुद्धि से धारण कर लो कि अर्जुन मेरे शरीर का आधा भाग है।
श्लोक 37 (7.79.37)
यथा त्वं मे प्रभातायामस्यां निशि रथोत्तमम् । कल्पयित्वा यथाशास्त्रमादाय व्रज संयतः ॥
yathā tvaṃ me prabhātāyāmasyāṃ niśi rathottamam | kalpayitvā yathāśāstramādāya vraja saṃyataḥ
इस रात के प्रभात होने पर तुम मेरे उत्तम रथ को शास्त्र के अनुसार सजाकर, संयत रहकर उसे लेकर आना।
श्लोक 38 (7.79.38)
गदां कौमोदकीं दिव्यां शक्तिं चक्रं धनुः शरान् । आरोप्य वै रथे सूत सर्वोपकरणानि च ॥
gadāṃ kaumodakīṃ divyāṃ śaktiṃ cakraṃ dhanuḥ śarān | āropya vai rathe sūta sarvopakaraṇāni ca
सूत! रथ पर दिव्य गदा कौमोदकी, शक्ति, चक्र, धनुष, बाण और सब सामग्री चढ़ा लो।
श्लोक 39 (7.79.39)
स्थानं च कल्पयित्वाऽथ रथोपस्थे ध्वजस्य मे । वैनतेयस्य वीरस्य समरे रथशोभिनः ॥
sthānaṃ ca kalpayitvā'tha rathopasthe dhvajasya me | vainateyasya vīrasya samare rathaśobhinaḥ
और रथ के बैठने के स्थान पर मेरी ध्वजा के लिए जगह बना दो, जिस पर युद्ध में रथ की शोभा बढ़ाने वाले वीर वैनतेय (गरुड़) विराजते हैं।
श्लोक 40 (7.79.40)
छत्रं जाम्बूनदैर्जालैरर्कज्वलनसप्रभैः । विश्वकर्मकृतैर्दिव्यैरश्वानपि विभूषय ॥
chatraṃ jāmbūnadairjālairarkajvalanasaprabhaiḥ | viśvakarmakṛtairdivyairaśvānapi vibhūṣaya
छत्र को और घोड़ों को भी विश्वकर्मा के बनाए हुए, सूर्य और अग्नि के समान चमकने वाले जाम्बूनद सोने के दिव्य जालों से सजा दो।
श्लोक 41 (7.79.41)
बलाहकं मेघपुष्पं शैब्यं सुग्रीवमेव च । युक्त्वा वाजिवरांस्तत्र कवची तिष्ठ दारुक ॥
balāhakaṃ meghapuṣpaṃ śaibyaṃ sugrīvameva ca | yuktvā vājivarāṃstatra kavacī tiṣṭha dāruka
दारुक! बलाहक, मेघपुष्प, शैब्य और सुग्रीव — इन श्रेष्ठ घोड़ों को जोतकर कवच पहने तैयार रहो।
श्लोक 42 (7.79.42)
पाञ्चजन्यस्य निर्घोषं पर्जन्यनिनदोपमम् । श्रुत्वा च भैरवं नादमुपेयास्त्वं जवेन माम् ॥
pāñcajanyasya nirghoṣaṃ parjanyaninadopamam | śrutvā ca bhairavaṃ nādamupeyāstvaṃ javena mām
मेघ-गर्जन के समान पाञ्चजन्य का घोष और उसका भयंकर नाद सुनकर तुम वेग से मेरे पास आ जाना।
श्लोक 43 (7.79.43)
एकाह्नाऽहममर्षं च सर्वदुःखानि चैव ह । भ्रातुः पैतृष्वसेयस्य व्यपनेष्यामि दारुक ॥
ekāhnā'hamamarṣaṃ ca sarvaduḥkhāni caiva ha | bhrātuḥ paitṛṣvaseyasya vyapaneṣyāmi dāruka
दारुक! मैं एक ही दिन में अपने बुआ के पुत्र अर्जुन का क्रोध और सारे दुःख दूर कर दूँगा।
श्लोक 44 (7.79.44)
सर्वोपायैर्यतिष्यामि यथा बीभत्सुराहवे । पश्यतां धार्तराष्ट्राणां हनिष्यति जयद्रथम् ॥
sarvopāyairyatiṣyāmi yathā bībhatsurāhave | paśyatāṃ dhārtarāṣṭrāṇāṃ haniṣyati jayadratham
मैं सब उपायों से यत्न करूँगा कि बीभत्सु धृतराष्ट्र के पुत्रों के देखते-देखते युद्ध में जयद्रथ को मार डाले।
श्लोक 45 (7.79.45)
यस्य यस्य च बीभत्सुर्वधे यत्नं करिष्यति । आशंसेऽहं रणे तं तं तत्र तत्र हनिष्यति ॥
yasya yasya ca bībhatsurvadhe yatnaṃ kariṣyati | āśaṃse'haṃ raṇe taṃ taṃ tatra tatra haniṣyati
बीभत्सु जिस-जिसके वध का यत्न करेगा, मुझे आशा है कि वह रण में उस-उसको वहीं-वहीं मार डालेगा।"
दारुक उवाच
श्लोक 46 (7.79.46)
जय एव ध्रुवस्तस्य कुत एव पराजयः । यस्य त्वं पुरुषव्याघ्र सारथ्यमुपजग्मिवान् ॥
jaya eva dhruvastasya kuta eva parājayaḥ | yasya tvaṃ puruṣavyāghra sārathyamupajagmivān
"पुरुषव्याघ्र! जिसके सारथि आप बने हैं, उसकी विजय निश्चित ही है; उसकी पराजय कैसे हो सकती है?
श्लोक 47 (7.79.47)
एवं चैतत्करिष्यामि यथा मामनुभाषसे । सुप्रभातामिमां रात्रिं जयाय विजयस्य हि ॥
evaṃ caitatkariṣyāmi yathā māmanubhāṣase | suprabhātāmimāṃ rātriṃ jayāya vijayasya hi
आप जैसा मुझे आदेश देते हैं, मैं वैसा ही करूँगा। विजय (अर्जुन) की जीत के लिए यह रात सुन्दर प्रभात वाली हो।"