Skip to main content

द्रोण पर्व · अध्याय 80

स्वप्न में अर्जुन की शिव के पास यात्रा

अपनी प्रतिज्ञा से व्याकुल अर्जुन को स्वप्न में कृष्ण समझाते हैं और शिव का ध्यान करके पाशुपत अस्त्र पाने का उपाय बताते हैं। कृष्ण उन्हें आकाश-मार्ग से हिमालय तथा अन्य पवित्र पर्वतों के ऊपर से उस पर्वत पर ले जाते हैं जहाँ शिव पार्वती और अपने गणों के साथ विराजमान हैं। दोनों उन्हें प्रणाम करते हैं; शिव उनका स्वागत करके उनकी इच्छा पूछते हैं, तब वे अस्त्र पाने के लिए एक लम्बे स्तोत्र से उनकी स्तुति करते हैं।

अध्याय 79अध्याय-सूचीअध्याय 81

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.80.1)

धार्तराष्ट्रस्य तं मन्त्रं स्मरन्नेव धनञ्जयः । प्रतिज्ञामात्मनो रक्षन्मुमोहाचिन्त्यविक्रमः ॥

dhārtarāṣṭrasya taṃ mantraṃ smaranneva dhanañjayaḥ | pratijñāmātmano rakṣanmumohācintyavikramaḥ

धृतराष्ट्र के पुत्र की उस योजना को स्मरण करते और अपनी प्रतिज्ञा की रक्षा का विचार करते हुए अचिन्त्य पराक्रम वाले धनञ्जय व्याकुल होकर मोह में डूब गए।

श्लोक 2 (7.80.2)

तं तु शोकेन सन्तप्तं स्वप्ने कपिवरध्वजम् । आससाद महातेजा ध्यायन्तं गरुडध्वजः ॥

taṃ tu śokena santaptaṃ svapne kapivaradhvajam | āsasāda mahātejā dhyāyantaṃ garuḍadhvajaḥ

शोक से सन्तप्त और चिन्ता में डूबे उस कपिध्वज अर्जुन के पास स्वप्न में महातेजस्वी गरुड़ध्वज कृष्ण आए।

श्लोक 3 (7.80.3)

प्रत्युत्थानं च कृष्णस्य सर्वावस्थासु फल्गुनः । न लोपयति धर्मात्मा भक्त्या प्रेम्णा च सर्वदा ॥

pratyutthānaṃ ca kṛṣṇasya sarvāvasthāsu phalgunaḥ | na lopayati dharmātmā bhaktyā premṇā ca sarvadā

धर्मात्मा फल्गुन ने भक्ति और प्रेम के कारण, किसी भी अवस्था में कृष्ण के सम्मान में उठकर खड़े होना कभी नहीं छोड़ा।

श्लोक 4 (7.80.4)

प्रत्युत्थाय च गोविन्दं स्वं तस्मै चासनं ददौ । न चासने स्वयं बुद्धिं बीभत्सुर्व्यदधात्तदा ॥

pratyutthāya ca govindaṃ svaṃ tasmai cāsanaṃ dadau | na cāsane svayaṃ buddhiṃ bībhatsurvyadadhāttadā

उठकर उन्होंने गोविन्द को अपना आसन दिया; परन्तु स्वयं बीभत्सु ने उस समय बैठने का विचार नहीं किया।

श्लोक 5 (7.80.5)

ततः कृष्णो महातेजा जानँल्लोकस्य निश्चयम् । कुन्तीपुत्रमिदं वाक्यमासीनः स्थितमब्रवीत् ॥

tataḥ kṛṣṇo mahātejā jānam̐llokasya niścayam | kuntīputramidaṃ vākyamāsīnaḥ sthitamabravīt

तब लोक की स्थिति को जानने वाले महातेजस्वी कृष्ण ने स्वयं बैठे हुए, खड़े हुए कुन्तीपुत्र से यह बात कही।

वासुदेव उवाच

श्लोक 6 (7.80.6)

मा विषादे मनः पार्थ कृथाः कालो हि दुर्जयः । कालः सर्वाणि भूतानि नियच्छति भवाभवे ॥

mā viṣāde manaḥ pārtha kṛthāḥ kālo hi durjayaḥ | kālaḥ sarvāṇi bhūtāni niyacchati bhavābhave

"पार्थ! मन को विषाद में मत डालो; काल को जीतना कठिन है। काल ही सब प्राणियों को उनके उत्पन्न होने और नष्ट होने में नियन्त्रित रखता है।

श्लोक 7 (7.80.7)

किमर्थं च विषादस्ते तद्ब्रूहि द्विपदां वर । न शोच्यं विदुषां श्रेष्ठ शोकः कार्यविनाशनः ॥

kimarthaṃ ca viṣādaste tadbrūhi dvipadāṃ vara | na śocyaṃ viduṣāṃ śreṣṭha śokaḥ kāryavināśanaḥ

हे नरश्रेष्ठ! बताओ, तुम्हें विषाद किसलिए है? हे विद्वानों में श्रेष्ठ! शोक नहीं करना चाहिए, क्योंकि शोक कार्य को नष्ट कर देता है।

श्लोक 8 (7.80.8)

यत्तु कार्यं भवेत्कार्यं कर्मणा तत्समाचर । हीनचेष्टस्य यः शोकः स हि शत्रुर्धनञ्जय ॥

yattu kāryaṃ bhavetkāryaṃ karmaṇā tatsamācara | hīnaceṣṭasya yaḥ śokaḥ sa hi śatrurdhanañjaya

जो करना है, उसे कर्म से पूरा करो। धनञ्जय! जिसने प्रयत्न छोड़ दिया है, उसका शोक स्वयं ही शत्रु है।

श्लोक 9 (7.80.9)

शोचन्नन्दयते शत्रून्कर्शयत्यपि बान्धवान् । क्षीयते च नरस्तस्मान्न त्वं शोचितुमर्हसि ॥

śocannandayate śatrūnkarśayatyapi bāndhavān | kṣīyate ca narastasmānna tvaṃ śocitumarhasi

शोक करने वाला मनुष्य शत्रुओं को आनन्द देता है, बन्धुओं को क्षीण करता है और स्वयं भी नष्ट हो जाता है; इसलिए तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 10 (7.80.10)

इत्युक्तो वासुदेवेन बीभत्सुरपराजितः । आबभाषे तदा विद्वानिदं वचनमर्थवत् ॥

ityukto vāsudevena bībhatsuraparājitaḥ | ābabhāṣe tadā vidvānidaṃ vacanamarthavat

वासुदेव के इस प्रकार कहने पर अपराजित और विद्वान् बीभत्सु ने तब ये अर्थपूर्ण वचन कहे।

अर्जुन उवाच

श्लोक 11 (7.80.11)

मया प्रतिज्ञा महती जयद्रथवधे कृता । श्वोऽस्मि हन्ता दुरात्मानं पुत्रघ्नमिति केशव ॥

mayā pratijñā mahatī jayadrathavadhe kṛtā | śvo'smi hantā durātmānaṃ putraghnamiti keśava

"केशव! मैंने जयद्रथ के वध के विषय में बहुत बड़ी प्रतिज्ञा की है कि कल मैं उस दुरात्मा को, जो मेरे पुत्र का हत्यारा है, मार डालूँगा।

श्लोक 12 (7.80.12)

मत्प्रतिज्ञाविघातार्थं धार्तराष्ट्रैः किलाच्युत । पृष्ठतः सैन्धवः कार्यः सर्वैर्गुप्तो महारथैः ॥

matpratijñāvighātārthaṃ dhārtarāṣṭraiḥ kilācyuta | pṛṣṭhataḥ saindhavaḥ kāryaḥ sarvairgupto mahārathaiḥ

अच्युत! मेरी प्रतिज्ञा को विफल करने के लिए धृतराष्ट्र के पुत्र निश्चय ही सब महारथियों से रक्षित सैन्धव को पीछे की ओर रखेंगे।

श्लोक 13 (7.80.13)

दश चैका च ताः कृष्ण अक्षौहिण्यः सुदुर्जयाः । हतावशेषास्तत्रेमा हन्त माधव सङ्ख्यया ॥

daśa caikā ca tāḥ kṛṣṇa akṣauhiṇyaḥ sudurjayāḥ | hatāvaśeṣāstatremā hanta mādhava saṅkhyayā

कृष्ण! वे ग्यारह (दस और एक) अक्षौहिणी सेनाएँ अत्यन्त दुर्जय हैं; और माधव! संख्या में ये वे ही हैं जो मारे जाने के बाद शेष बची हैं।

श्लोक 14 (7.80.14)

ताभिः परिवृतः सङ्ख्ये सर्वैश्चैव महारथैः । कथं शक्येत सन्द्रष्टुं दुरात्मा कृष्ण सैन्धवः ॥

tābhiḥ parivṛtaḥ saṅkhye sarvaiścaiva mahārathaiḥ | kathaṃ śakyeta sandraṣṭuṃ durātmā kṛṣṇa saindhavaḥ

कृष्ण! उन सेनाओं और सब महारथियों से घिरे हुए उस दुरात्मा सैन्धव को युद्ध में देखा भी कैसे जा सकता है?

श्लोक 15 (7.80.15)

प्रतिज्ञापारणं चापि न भविष्यति केशव । प्रतिज्ञायां च हीनायां कथं जीवति मद्विधः ॥

pratijñāpāraṇaṃ cāpi na bhaviṣyati keśava | pratijñāyāṃ ca hīnāyāṃ kathaṃ jīvati madvidhaḥ

केशव! मेरी प्रतिज्ञा का पालन भी नहीं हो सकेगा; और प्रतिज्ञा के अधूरी रह जाने पर मेरे जैसा मनुष्य कैसे जीवित रहेगा?

श्लोक 16 (7.80.16)

दुःखापायस्य मे वीर विकाङ्क्षा परिवर्तते । द्रुतं च याति सविता तत एतद्ब्रवीम्यहम् ॥

duḥkhāpāyasya me vīra vikāṅkṣā parivartate | drutaṃ ca yāti savitā tata etadbravīmyaham

हे वीर! इस दुःख से निकलने का उपाय पाने की मेरी इच्छा मन में बार-बार घूमती है, और सूर्य शीघ्रता से चल रहा है; इसीलिए मैं यह आपसे कह रहा हूँ।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 17 (7.80.17)

शोकस्थानं तु तच्छ्रुत्वा पार्थस्य द्विजकेतनः । संस्पृश्याम्भस्ततः कृष्णः प्राङ्मुखः समवस्थितः ॥

śokasthānaṃ tu tacchrutvā pārthasya dvijaketanaḥ | saṃspṛśyāmbhastataḥ kṛṣṇaḥ prāṅmukhaḥ samavasthitaḥ

पार्थ के शोक का कारण सुनकर गरुड़ध्वज कृष्ण ने जल का स्पर्श किया और पूर्व की ओर मुख करके बैठ गए।

श्लोक 18 (7.80.18)

इदं वाक्यं महातेजा बभाषे पुष्करेक्षणः । हितार्थं पाण्डुपुत्रस्य सैन्धवस्य वधे कृती ॥

idaṃ vākyaṃ mahātejā babhāṣe puṣkarekṣaṇaḥ | hitārthaṃ pāṇḍuputrasya saindhavasya vadhe kṛtī

सैन्धव के वध के उपाय में कुशल, कमलनयन, महातेजस्वी कृष्ण ने पाण्डुपुत्र के हित के लिए ये वचन कहे।

श्रीभगवानुवाच

श्लोक 19 (7.80.19)

पार्थ पाशुपतं नाम परमास्त्रं सनातनम् । येन सर्वान्मृधे देत्याञ्जघ्ने देवो महेश्वरः ॥

pārtha pāśupataṃ nāma paramāstraṃ sanātanam | yena sarvānmṛdhe detyāñjaghne devo maheśvaraḥ

"पार्थ! पाशुपत नाम का एक सनातन परम अस्त्र है, जिससे देव महेश्वर ने युद्ध में सब दैत्यों को मारा था।

श्लोक 20 (7.80.20)

यदि तद्विदितं तेऽद्य श्वो हन्ताऽसि जयद्रथम् । अथ ज्ञातुं प्रपद्यस्व मनसा वृषभध्वजम् ॥

yadi tadviditaṃ te'dya śvo hantā'si jayadratham | atha jñātuṃ prapadyasva manasā vṛṣabhadhvajam

यदि वह तुम्हें आज ज्ञात है, तो कल तुम जयद्रथ को मार दोगे। और यदि नहीं, तो उसे जानने के लिए मन से वृषभध्वज (शिव) की शरण लो।

श्लोक 21 (7.80.21)

तं देवं मनसा ध्यात्वा जोषमास्स्व धनञ्जय । ततस्तस्य प्रसादात्त्वं भक्त्या प्राप्स्यसि तन्महत् ॥

taṃ devaṃ manasā dhyātvā joṣamāssva dhanañjaya | tatastasya prasādāttvaṃ bhaktyā prāpsyasi tanmahat

धनञ्जय! मन से उन देव का ध्यान करके मौन होकर बैठो; तब उनकी कृपा से भक्ति के द्वारा तुम वह महान् अस्त्र पा लोगे।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 22 (7.80.22)

ततः कृष्णवचः श्रुत्वा संस्पृश्याम्भो धनञ्जयः । भूमावासीन एकाग्रो जगाम मनसा भवम् ॥

tataḥ kṛṣṇavacaḥ śrutvā saṃspṛśyāmbho dhanañjayaḥ | bhūmāvāsīna ekāgro jagāma manasā bhavam

तब कृष्ण के वचन सुनकर धनञ्जय ने जल का स्पर्श किया और भूमि पर बैठकर एकाग्र चित्त से मन के द्वारा भव (शिव) की शरण में गए।

श्लोक 23 (7.80.23)

ततः प्रणिहितो ब्राह्मे मुहूर्ते शुभलक्षणे । आत्मानमर्जुनोऽपश्यद्गगने सहकेशवम् ॥

tataḥ praṇihito brāhme muhūrte śubhalakṣaṇe | ātmānamarjuno'paśyadgagane sahakeśavam

तब एकाग्र होकर शुभ लक्षणों वाले ब्राह्म मुहूर्त में अर्जुन ने अपने को केशव के साथ आकाश में देखा।

श्लोक 24 (7.80.24)

पुण्यं हिमवतः पादं मणिमन्तं च पर्वतम् । ज्योतिर्भिश्च समाकीर्णं सिद्धचारणसेवितम् ॥

puṇyaṃ himavataḥ pādaṃ maṇimantaṃ ca parvatam | jyotirbhiśca samākīrṇaṃ siddhacāraṇasevitam

उन्होंने हिमालय का पवित्र पादप्रदेश और मणिमान् पर्वत देखा, जो ज्योतिर्मय पिण्डों से भरा था और सिद्धों तथा चारणों से सेवित था।

श्लोक 25 (7.80.25)

वायुवेगगतिः पार्थः खं भेजे सहकेशवः । केशवेन गृहीतः स दक्षिणे विभुना भुजे ॥

vāyuvegagatiḥ pārthaḥ khaṃ bheje sahakeśavaḥ | keśavena gṛhītaḥ sa dakṣiṇe vibhunā bhuje

वायु के वेग से चलते हुए पार्थ केशव के साथ आकाश में पहुँचे; सर्वव्यापी केशव ने उनकी दाहिनी भुजा पकड़ रखी थी।

श्लोक 26 (7.80.26)

प्रेक्षमाणो बहून्भावाञ्जगामाद्भुतदर्शनान् । उदीच्यां दिशि धर्मात्मा सोपश्यच्छ्वेतपर्वतम् ॥

prekṣamāṇo bahūnbhāvāñjagāmādbhutadarśanān | udīcyāṃ diśi dharmātmā sopaśyacchvetaparvatam

जाते हुए अनेक अद्भुत दृश्य देखते हुए धर्मात्मा अर्जुन ने उत्तर दिशा में श्वेत पर्वत को देखा।

श्लोक 27 (7.80.27)

कुबेरस्य विहारे च नलिनीं पद्मभूषिताम् । सरिच्छ्रेष्ठां च तां गङ्गां वीक्षमाणो बहूदकाम् ॥

kuberasya vihāre ca nalinīṃ padmabhūṣitām | saricchreṣṭhāṃ ca tāṃ gaṅgāṃ vīkṣamāṇo bahūdakām

कुबेर के विहार-स्थल में कमलों से सजी हुई एक पुष्करिणी और नदियों में श्रेष्ठ, प्रचुर जल वाली उस गङ्गा को उन्होंने देखा;

श्लोक 28 (7.80.28)

सदा पुष्पफलैर्वृक्षैरुपेतां स्फटिकोपलाम् । सिंहव्याघ्रसमाकीर्णां नानामृगसमाकुलाम् ॥

sadā puṣpaphalairvṛkṣairupetāṃ sphaṭikopalām | siṃhavyāghrasamākīrṇāṃ nānāmṛgasamākulām

जिसके किनारे ऐसे वृक्ष थे जिन पर सदा फूल और फल रहते थे, जहाँ स्फटिक की शिलाएँ थीं, और जो सिंहों, बाघों तथा अनेक प्रकार के पशुओं से भरी हुई थी;

श्लोक 29 (7.80.29)

पुण्याश्रमवतीं रम्यां मनोज्ञाण्डजसेविताम् । मन्दरस्य प्रदेशांश्च किन्नरोद्गीतनादितान् ॥

puṇyāśramavatīṃ ramyāṃ manojñāṇḍajasevitām | mandarasya pradeśāṃśca kinnarodgītanāditān

जो पवित्र आश्रमों से युक्त, रमणीय, मनोहर और पक्षियों से सेवित थी; और मन्दर पर्वत के वे प्रदेश जो किन्नरों के गीतों से गूँज रहे थे,

श्लोक 30 (7.80.30)

हेमरूप्यमयैः शृङ्गैर्नानौषधिविदीपितान् । तथा मन्दारवृक्षैश्च पुष्पितैरुपशोभितान् ॥

hemarūpyamayaiḥ śṛṅgairnānauṣadhividīpitān | tathā mandāravṛkṣaiśca puṣpitairupaśobhitān

जो सोने-चाँदी के शिखरों और नाना औषधियों से प्रकाशित थे और फूलों से लदे मन्दार वृक्षों से सुशोभित थे।

श्लोक 31 (7.80.31)

स्निग्धाञ्जनचयाकारं सम्प्राप्तः कालपर्वतम् । ब्रह्मतुङ्गं नदीश्चान्यास्तथा जनपदानपि ॥

snigdhāñjanacayākāraṃ samprāptaḥ kālaparvatam | brahmatuṅgaṃ nadīścānyāstathā janapadānapi

फिर वे चिकने अञ्जन के ढेर जैसे काले कालपर्वत पर पहुँचे, और ब्रह्मतुङ्ग, अन्य नदियों तथा जनपदों को भी देखा।

श्लोक 32 (7.80.32)

स तुङ्गं शतशृङ्गं च शर्यातिवनमेव च । पुण्यमश्वशिरस्थानं स्थानमाथर्वणस्य च ॥

sa tuṅgaṃ śataśṛṅgaṃ ca śaryātivanameva ca | puṇyamaśvaśirasthānaṃ sthānamātharvaṇasya ca

उन्होंने तुङ्ग, शतशृङ्ग, शर्याति का वन, पवित्र अश्वशिरस्थान और अथर्वा का स्थान देखा।

श्लोक 33 (7.80.33)

वृषदंशं च शैलेन्द्रं महामन्दरमेव च । अप्सरोभिः समाकीर्णं किन्नरैश्चोपशोभितम् ॥

vṛṣadaṃśaṃ ca śailendraṃ mahāmandarameva ca | apsarobhiḥ samākīrṇaṃ kinnaraiścopaśobhitam

उन्होंने पर्वतराज वृषदंश और महामन्दर को देखा, जो अप्सराओं से भरे और किन्नरों से सुशोभित थे।

श्लोक 34 (7.80.34)

तस्मिञ्शैले व्रजन्पार्थः सकृष्णः समवैक्षत । शुभैः प्रस्रवणैर्जुष्टां हेमधातुविभूषिताम् ॥

tasmiñśaile vrajanpārthaḥ sakṛṣṇaḥ samavaikṣata | śubhaiḥ prasravaṇairjuṣṭāṃ hemadhātuvibhūṣitām

उस पर्वत पर कृष्ण के साथ जाते हुए पार्थ ने शुभ झरनों से युक्त और सोने की धातुओं से अलंकृत पृथ्वी को देखा,

श्लोक 35 (7.80.35)

चन्द्ररश्मिप्रकाशाङ्गीं पृथिवीं पुरमालिनीम् । समुद्रांश्चाद्भुताकारानपश्यद्बहुलाकरान् ॥

candraraśmiprakāśāṅgīṃ pṛthivīṃ puramālinīm | samudrāṃścādbhutākārānapaśyadbahulākarān

जिसका शरीर चन्द्रकिरणों की तरह उजला था और जो नगरों की माला पहने थी; और उन्होंने अद्भुत आकार वाले, अनेक खानों से भरे समुद्र देखे।

श्लोक 36 (7.80.36)

वियद्द्यां पृथिवीं चैव तथा विष्णुपदं व्रजन् । विस्मितः सह कृष्णेन क्षिप्तो बाण इवाभ्यगात् ॥

viyaddyāṃ pṛthivīṃ caiva tathā viṣṇupadaṃ vrajan | vismitaḥ saha kṛṣṇena kṣipto bāṇa ivābhyagāt

आकाश, स्वर्ग और पृथ्वी को पार करते हुए, विष्णुपद की ओर जाते हुए वे विस्मित होकर कृष्ण के साथ छोड़े हुए बाण की तरह आगे बढ़ते गए।

श्लोक 37 (7.80.37)

ग्रहनक्षत्रसोमानां सूर्याग्न्योश्च समत्विषम् । अपश्यत तदा पार्थो ज्वलन्तमिव पर्वतम् ॥

grahanakṣatrasomānāṃ sūryāgnyośca samatviṣam | apaśyata tadā pārtho jvalantamiva parvatam

तब पार्थ ने एक जलता हुआ-सा पर्वत देखा, जिसकी कान्ति ग्रह, नक्षत्र, चन्द्र, सूर्य और अग्नि के समान थी।

श्लोक 38 (7.80.38)

समासाद्य तु तं शैलं शैलाग्रे समवस्थितम् । तपोनित्यं महात्मानमपश्यद्वृषभध्वजम् ॥

samāsādya tu taṃ śailaṃ śailāgre samavasthitam | taponityaṃ mahātmānamapaśyadvṛṣabhadhvajam

उस पर्वत पर पहुँचकर उसके शिखर पर उन्होंने नित्य तपस्या में लगे हुए महात्मा वृषभध्वज (शिव) को बैठे देखा।

श्लोक 39 (7.80.39)

सहस्रमिव सूर्याणां दीप्यमानं स्वतेजसा । शूलिनं जटिलं गौरं वल्कलाजिनवाससम् ॥

sahasramiva sūryāṇāṃ dīpyamānaṃ svatejasā | śūlinaṃ jaṭilaṃ gauraṃ valkalājinavāsasam

वे अपने तेज से हज़ार सूर्यों के समान दीप्त थे; शूल धारण किए, जटाधारी, गौर वर्ण और वल्कल तथा मृगचर्म पहने थे।

श्लोक 40 (7.80.40)

नयनानां सहस्रैश्च विचित्राङ्गं महौजसम् । पार्वत्या सहितं देवं भूतसङ्घैश्च भास्वरैः ॥

nayanānāṃ sahasraiśca vicitrāṅgaṃ mahaujasam | pārvatyā sahitaṃ devaṃ bhūtasaṅghaiśca bhāsvaraiḥ

अद्भुत अङ्गों वाले, महान् ओज वाले, हज़ारों नेत्रों वाले वे देव पार्वती और चमकते हुए भूतगणों के साथ थे।

श्लोक 41 (7.80.41)

गीतवादित्रसन्नादैर्हास्यलास्यसमन्वितम् । वल्गितास्फोटितोत्क्रुष्टैः पुण्यैर्गन्धैश्च सेवितम् ॥

gītavāditrasannādairhāsyalāsyasamanvitam | valgitāsphoṭitotkruṣṭaiḥ puṇyairgandhaiśca sevitam

वे गीत और वाद्यों की ध्वनि, हास्य और नृत्य, कूद-फाँद, ताली और ऊँचे जयघोषों तथा पवित्र सुगन्धों से सेवित हो रहे थे।

श्लोक 42 (7.80.42)

स्तूयमानं स्तवैर्दिव्यैर्ऋषिभिर्ब्रह्मवादिभिः । गोप्तारं सर्वभूतानामीशानं वरदं शिवम् ॥

stūyamānaṃ stavairdivyairṛṣibhirbrahmavādibhiḥ | goptāraṃ sarvabhūtānāmīśānaṃ varadaṃ śivam

ब्रह्मवादी ऋषि दिव्य स्तोत्रों से उनकी स्तुति कर रहे थे — वे सब प्राणियों के रक्षक, ईशान, वरदाता और शिव थे।

श्लोक 43 (7.80.43)

वासुदेवस्तु तं दृष्ट्वा जगाम शिरसा क्षितिम् । पार्थेन सह धर्मात्मा गृणन्ब्रह्म सनातनम् ॥

vāsudevastu taṃ dṛṣṭvā jagāma śirasā kṣitim | pārthena saha dharmātmā gṛṇanbrahma sanātanam

उन्हें देखकर धर्मात्मा वासुदेव ने पार्थ के साथ सनातन ब्रह्म का गान करते हुए सिर से भूमि पर प्रणाम किया।

श्लोक 44 (7.80.44)

लोकादिं विश्वकर्माणमजमीशानमव्ययम् । मनसः परमां योनिं खं वायुं ज्योतिषां निधिम् ॥

lokādiṃ viśvakarmāṇamajamīśānamavyayam | manasaḥ paramāṃ yoniṃ khaṃ vāyuṃ jyotiṣāṃ nidhim

वे लोकों के आदि, विश्वकर्मा, अजन्मा, ईशान और अविनाशी हैं; मन के परम उद्गम, आकाश और वायु के कारण और ज्योतियों के निधि हैं;

श्लोक 45 (7.80.45)

स्रष्टारं वारिधाराणां भुवश्च प्रकृतिं पराम् । देवदानवयक्षाणां मानवानां च शासकम् ॥

sraṣṭāraṃ vāridhārāṇāṃ bhuvaśca prakṛtiṃ parām | devadānavayakṣāṇāṃ mānavānāṃ ca śāsakam

जलधाराओं के रचयिता, पृथ्वी की परम प्रकृति और देवताओं, दानवों, यक्षों तथा मनुष्यों के शासक हैं;

श्लोक 46 (7.80.46)

योगानां च परं धाम दृष्टं ब्रह्मविदां निधिम् । चराचरस्य स्रष्टारं प्रतिहर्तारमेव च ॥

yogānāṃ ca paraṃ dhāma dṛṣṭaṃ brahmavidāṃ nidhim | carācarasya sraṣṭāraṃ pratihartārameva ca

योगों के परम धाम, ब्रह्मज्ञानियों के प्रकट निधि और चर-अचर सबके रचयिता तथा संहारकर्ता हैं।

श्लोक 47 (7.80.47)

कालकोपं महात्मानं शक्रसूर्यगुणोदयम् । ववन्दतुस्तदा कृष्णौ वाङ्मनोबुद्धिकर्मभिः ॥

kālakopaṃ mahātmānaṃ śakrasūryaguṇodayam | vavandatustadā kṛṣṇau vāṅmanobuddhikarmabhiḥ

काल के समान कोप वाले, इन्द्र और सूर्य के गुणों के उदय-स्थान उन महात्मा को तब कृष्ण और अर्जुन ने वाणी, मन, बुद्धि और कर्म से प्रणाम किया।

श्लोक 48 (7.80.48)

यं प्रपद्यन्ति विद्वांसः सूक्ष्माध्यात्मपदैषिणः । तमजं कारणात्मानं जग्मतुः शरणं भवम् ॥

yaṃ prapadyanti vidvāṃsaḥ sūkṣmādhyātmapadaiṣiṇaḥ | tamajaṃ kāraṇātmānaṃ jagmatuḥ śaraṇaṃ bhavam

जिनकी शरण सूक्ष्म आत्मतत्त्व के पदों को खोजने वाले विद्वान् लेते हैं, उन्हीं अजन्मा, कारणस्वरूप आत्मा भव की शरण में वे दोनों गए।

श्लोक 49 (7.80.49)

अर्जुनश्चापि तं देवं भूयो भूयोऽप्यवन्दत । ज्ञात्वा तं सर्वभूतादिं भूतभव्यभवोद्भवम् ॥

arjunaścāpi taṃ devaṃ bhūyo bhūyo'pyavandata | jñātvā taṃ sarvabhūtādiṃ bhūtabhavyabhavodbhavam

और अर्जुन ने भी उन देव को बार-बार प्रणाम किया, यह जानकर कि वे ही एक आदि सत्ता हैं — भूत और भविष्य के मूल तथा सब प्राणियों के उद्भव के कारण।

श्लोक 50 (7.80.50)

शरण्यं शरणं देवमीशानं परमेश्वरम् । जगाम जगतां नाथमर्जुनः सजनार्दनः ॥

śaraṇyaṃ śaraṇaṃ devamīśānaṃ parameśvaram | jagāma jagatāṃ nāthamarjunaḥ sajanārdanaḥ

अर्जुन जनार्दन के साथ शरण देने वाले, ईशान, परमेश्वर और जगत् के नाथ उन देव की शरण में गए।

श्लोक 51 (7.80.51)

ततस्तावागतौ दृष्ट्वा नरनारायणावुभौ । सुप्रसन्नमनाः शर्वः प्रोवाच प्रहसन्निव ॥

tatastāvāgatau dṛṣṭvā naranārāyaṇāvubhau | suprasannamanāḥ śarvaḥ provāca prahasanniva

तब नर और नारायण — उन दोनों को आया देखकर प्रसन्न मन वाले शर्व (शिव) मानो हँसते हुए बोले।

शर्व उवाच

श्लोक 52 (7.80.52)

स्वागतं वां नरश्रेष्ठावुत्तिष्ठेतां गतक्लमौ । किञ्च वामीप्सितं वीरौ मनसः क्षिप्रमुच्यताम् ॥

svāgataṃ vāṃ naraśreṣṭhāvuttiṣṭhetāṃ gataklamau | kiñca vāmīpsitaṃ vīrau manasaḥ kṣipramucyatām

"नरश्रेष्ठो! तुम्हारा स्वागत है; थकान त्यागकर उठो। वीरो! तुम्हारी क्या इच्छा है? मन की बात शीघ्र कहो।

श्लोक 53 (7.80.53)

येन कार्येण सम्प्राप्तौ युवां तत्साधयामि किम् । व्रियतामात्मनः श्रेयस्तत्सर्वं प्रददानि वाम् ॥

yena kāryeṇa samprāptau yuvāṃ tatsādhayāmi kim | vriyatāmātmanaḥ śreyastatsarvaṃ pradadāni vām

जिस कार्य से तुम दोनों आए हो, उसे मैं पूरा करूँ? अपने लिए जो श्रेष्ठ हो, वह माँग लो; मैं तुम दोनों को वह सब दूँगा।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 54 (7.80.54)

ततस्तद्वचनं श्रुत्वा प्रत्युत्थाय कृताञ्जली । वासुदेवार्जुनौ शर्वं तुष्टुवाते महामती । भक्त्यास्तवेन दिव्येन महात्मानावनिन्दितौ ॥

tatastadvacanaṃ śrutvā pratyutthāya kṛtāñjalī | vāsudevārjunau śarvaṃ tuṣṭuvāte mahāmatī | bhaktyāstavena divyena mahātmānāvaninditau

तब उनके वचन सुनकर, वे दोनों महात्मा, निर्दोष और बुद्धिमान वासुदेव और अर्जुन हाथ जोड़कर उठे और भक्तिपूर्ण दिव्य स्तोत्र से शर्व की स्तुति करने लगे।

कृष्णार्जुनावूचतुः

श्लोक 55 (7.80.55)

नमो भवाय शर्वाय रुद्राय वरदाय च । पशूनां पतये नित्यमुग्राय च कपर्दिने ॥

namo bhavāya śarvāya rudrāya varadāya ca | paśūnāṃ pataye nityamugrāya ca kapardine

"भव को, शर्व को, वरदाता रुद्र को नमस्कार; पशुओं के पति को, सदा उग्र रूप वाले और जटाधारी को नमस्कार।

श्लोक 56 (7.80.56)

महादेवाय भीमाय त्र्यम्बकाय च शान्तये । ईशानाय मखघ्नाय नमोऽस्त्वन्धकघातिने ॥

mahādevāya bhīmāya tryambakāya ca śāntaye | īśānāya makhaghnāya namo'stvandhakaghātine

महादेव को, भीम को, त्र्यम्बक को और शान्त स्वरूप को; ईशान को, यज्ञ का विघात करने वाले को; अन्धक का वध करने वाले को नमस्कार है।

श्लोक 57 (7.80.57)

कुमारगुरवे तुभ्यं नीलग्रीवाय वेधसे । पिनाकिने हविष्याय सत्याय विभवे सदा ॥

kumāragurave tubhyaṃ nīlagrīvāya vedhase | pinākine haviṣyāya satyāya vibhave sadā

कुमार के गुरु, नीलकण्ठ और विधाता आपको नमस्कार; पिनाकधारी को, हवि के योग्य को, सत्य स्वरूप को और सर्वव्यापी विभु को सदा नमस्कार।

श्लोक 58 (7.80.58)

विलोहिताय धूम्राय व्याधायानपराजिते । नित्यं नीलशिखण्डाय शूलिने दिव्यचक्षुषे ॥

vilohitāya dhūmrāya vyādhāyānaparājite | nityaṃ nīlaśikhaṇḍāya śūline divyacakṣuṣe

गहरे लाल वर्ण वाले, धूम्र वर्ण वाले, व्याध-रूप और अपराजित को; सदा नीले शिखण्ड वाले, त्रिशूलधारी और दिव्य नेत्रों वाले को नमस्कार।

श्लोक 59 (7.80.59)

होत्रे पोत्रे त्रिनेत्राय व्याधाय वसुरेतसे । अचिन्त्यायाम्बिकाभर्त्रे सर्वदेवस्तुताय च ॥

hotre potre trinetrāya vyādhāya vasuretase | acintyāyāmbikābhartre sarvadevastutāya ca

होता को, पोता को, त्रिनेत्र को, व्याध को, वसुरेता को; अचिन्त्य, अम्बिका के पति और सब देवताओं से स्तुत को नमस्कार।

श्लोक 60 (7.80.60)

वृषध्वजाय मुण्डाय जटिने ब्रह्मचारिणे । तप्यमानाय सलिले ब्रह्मण्यायाजिताय च ॥

vṛṣadhvajāya muṇḍāya jaṭine brahmacāriṇe | tapyamānāya salile brahmaṇyāyājitāya ca

वृषध्वज को, मुण्डित को, जटाधारी को, ब्रह्मचारी को; जल में तप करने वाले को, ब्राह्मणों के हितैषी को और अजित को नमस्कार।

श्लोक 61 (7.80.61)

विश्वात्मने विश्वसृजे विश्वमावृत्य तिष्ठते । नमोनमस्ते सेव्याय भूतानां प्रभवे सदा ॥

viśvātmane viśvasṛje viśvamāvṛtya tiṣṭhate | namonamaste sevyāya bhūtānāṃ prabhave sadā

विश्वात्मा को, विश्व के रचयिता को, विश्व को व्याप्त करके स्थित रहने वाले को; सेवा के योग्य और प्राणियों के सदा प्रभु आपको बार-बार नमस्कार।

श्लोक 62 (7.80.62)

ब्रह्मवक्त्राय सर्वाय शंकराय शिवाय च । नमोस्तु वाचस्पतये प्रजानां पतये नमः ॥

brahmavaktrāya sarvāya śaṃkarāya śivāya ca | namostu vācaspataye prajānāṃ pataye namaḥ

ब्रह्ममुख को, सर्व को, शंकर और शिव को; वाणी के पति को नमस्कार, प्रजाओं के पति को नमस्कार।

श्लोक 63 (7.80.63)

अभिगम्याय काम्याय स्तुत्यायार्याय सर्वदा । नमोऽस्तु देवदेवाय महाभूतधराय च । नमो विश्वस्य पतये पत्तीनां पतये नमः ॥

abhigamyāya kāmyāya stutyāyāryāya sarvadā | namo'stu devadevāya mahābhūtadharāya ca | namo viśvasya pataye pattīnāṃ pataye namaḥ

जो सदा सुगम, कामना योग्य, स्तुत्य और आर्य हैं, उन्हें; देवों के देव और महाभूतों को धारण करने वाले को नमस्कार; विश्व के पति को नमस्कार, पैदल सेनाओं के पति को नमस्कार।

श्लोक 64 (7.80.64)

नमो विश्वस्य पतये महतां पतये नमः । नमः सहस्रशिरसे सहस्रभुजमृत्यवे । सहस्रनेत्रपादाय नमोऽसङ्ख्येयकर्मणे ॥

namo viśvasya pataye mahatāṃ pataye namaḥ | namaḥ sahasraśirase sahasrabhujamṛtyave | sahasranetrapādāya namo'saṅkhyeyakarmaṇe

विश्व के पति को नमस्कार, महान् जनों के पति को नमस्कार; हज़ार सिरों वाले, हज़ार भुजाओं वाले मृत्यु-स्वरूप को; हज़ार नेत्र और चरणों वाले, असंख्य कर्मों वाले को नमस्कार।

श्लोक 65 (7.80.65)

नमो हिरण्यवर्णाय हिरण्यकवचाय च । भक्तानुकम्पिने नित्यं सिध्यतां नो वरः प्रभो ॥

namo hiraṇyavarṇāya hiraṇyakavacāya ca | bhaktānukampine nityaṃ sidhyatāṃ no varaḥ prabho

स्वर्ण वर्ण वाले को, स्वर्ण कवच वाले को, भक्तों पर सदा कृपा करने वाले को नमस्कार; प्रभो! हमारा वर सिद्ध हो।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 66 (7.80.66)

एवं स्तुत्वा महादेवं वासुदेवः सहार्जुनः । प्रसादयामास भवं तदा ह्यस्त्रोपलब्धये ॥

evaṃ stutvā mahādevaṃ vāsudevaḥ sahārjunaḥ | prasādayāmāsa bhavaṃ tadā hyastropalabdhaye

इस प्रकार महादेव की स्तुति करके वासुदेव ने अर्जुन के साथ तब अस्त्र की प्राप्ति के लिए भव को प्रसन्न किया।

अध्याय 79अध्याय-सूचीअध्याय 81