द्रोण पर्व · अध्याय 85
अभिमन्यु के वध के बाद धृतराष्ट्र के प्रश्न
कौरव सेनापतियों के घरों में उत्सव की ध्वनियाँ थम जाने पर धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं कि अभिमन्यु की मृत्यु के अगले प्रभात में कौरवों ने क्या किया। वे विलाप करते हैं कि उन्होंने दुर्योधन से वासुदेव के द्वारा सन्धि कर लेने को कहा था, पर उसने नहीं माना; वे पाण्डव पक्ष के बल का स्मरण करते हैं और आशंका करते हैं कि अर्जुन सूखे तृण में लगी आग की तरह सेना को जला देगा। अन्त में वे संजय से कहते हैं कि उस सन्ध्या को और पुत्रों की मन्त्रणा में जो कुछ हुआ, वह सब बताओ।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (7.85.1)
श्वोभूते किमकार्षुस्ते दुःखशोकसमन्विताः । अभिमन्यौ हते तत्र कैर्वाऽयुध्यन्त पाण्डवाः ॥
śvobhūte kimakārṣuste duḥkhaśokasamanvitāḥ | abhimanyau hate tatra kairvā'yudhyanta pāṇḍavāḥ
अगली सुबह दुःख और शोक से घिरे हुए उन्होंने क्या किया? और वहाँ अभिमन्यु के मारे जाने पर पाण्डव किनके साथ लड़े?
श्लोक 2 (7.85.2)
जानन्तस्तस्य कर्माणि कुरवः सव्यसाचिनः । कथं तत्किल्बिषं कृत्वा निर्भया ब्रूहि मामकाः ॥
jānantastasya karmāṇi kuravaḥ savyasācinaḥ | kathaṃ tatkilbiṣaṃ kṛtvā nirbhayā brūhi māmakāḥ
सव्यसाची के पराक्रमों को जानते हुए भी वह अपराध करके मेरे लोग निर्भय कैसे रहे? मुझे बताओ।
श्लोक 3 (7.85.3)
पुत्रशोकाभिसन्तप्तं क्रुद्धं मृत्युमिवान्तकम् । आयान्तं पुरुषव्याघ्रं कथं ददृशुराहवे ॥
putraśokābhisantaptaṃ kruddhaṃ mṛtyumivāntakam | āyāntaṃ puruṣavyāghraṃ kathaṃ dadṛśurāhave
पुत्र के शोक से सन्तप्त और अन्तक यमराज की तरह क्रुद्ध वह पुरुषसिंह जब आक्रमण करता आया, तब उन्होंने उसे युद्ध में कैसे देखा?
श्लोक 4 (7.85.4)
कपिराजध्वजं सङ्ख्ये विधुन्वानं महद्धनुः । दृष्ट्वा पुत्रपरिद्यूनं किमकुर्वत मामकाः ॥
kapirājadhvajaṃ saṅkhye vidhunvānaṃ mahaddhanuḥ | dṛṣṭvā putraparidyūnaṃ kimakurvata māmakāḥ
जिसकी ध्वजा पर वानरराज है, वह पुत्र-वध से व्याकुल अर्जुन जब युद्ध में अपना विशाल धनुष हिला रहा था, तब उसे देखकर मेरे लोगों ने क्या किया?
श्लोक 5 (7.85.5)
किन्तु सञ्जय सङ्ग्रामे वृत्तं दुर्योधनं प्रति । परिदेवो महानद्य श्रूयते हि गृहेगृहे ॥
kintu sañjaya saṅgrāme vṛttaṃ duryodhanaṃ prati | paridevo mahānadya śrūyate hi gṛhegṛhe
परन्तु संजय, युद्ध में दुर्योधन के विषय में क्या घटा? आज घर-घर में बड़ा विलाप सुनाई दे रहा है।
श्लोक 6 (7.85.6)
भूयाञ्शब्दानतीत्यान्याञ्शब्दः सैन्धववेश्मनि । पौराणिकानां तूर्याणां शङ्खदुन्दुभिघोषवान् ॥
bhūyāñśabdānatītyānyāñśabdaḥ saindhavaveśmani | paurāṇikānāṃ tūryāṇāṃ śaṅkhadundubhighoṣavān
सिन्धुराज के भवन में अन्य सब ध्वनियों से बढ़कर एक ध्वनि गूँजा करती थी, जिसमें पुराने तुरहियों, शंखों और दुन्दुभियों का घोष भरा रहता था।
श्लोक 7 (7.85.7)
सूतमागधबन्दीनां नर्तकानां च निःस्वनः । सोऽद्य न श्रूयते शब्दः सूत पुत्र यथा पुरा ॥
sūtamāgadhabandīnāṃ nartakānāṃ ca niḥsvanaḥ | so'dya na śrūyate śabdaḥ sūta putra yathā purā
सूतों, मागधों, बन्दियों और नर्तकों का वह कोलाहल, हे सूत पुत्र, आज वैसा नहीं सुनाई देता जैसा पहले सुनाई देता था।
श्लोक 8 (7.85.8)
शब्दो नानाविधोऽभीष्टमभवद्यत्र मे श्रुतः । दीनानामद्य तं शब्दं न शृणोमि समीरितम् ॥
śabdo nānāvidho'bhīṣṭamabhavadyatra me śrutaḥ | dīnānāmadya taṃ śabdaṃ na śṛṇomi samīritam
जहाँ मैं अनेक प्रकार की मनचाही ध्वनियाँ सुना करता था, वहाँ आज दीन बने हुए लोगों से उठती हुई वह ध्वनि मैं नहीं सुनता।
श्लोक 9 (7.85.9)
निवेशने सत्यधृतेः सोमदत्तस्य सञ्जय । आसीनोऽहं पुरा तात शब्दमश्रौषमुत्तमम् ॥
niveśane satyadhṛteḥ somadattasya sañjaya | āsīno'haṃ purā tāta śabdamaśrauṣamuttamam
संजय, पहले मैं सत्य में दृढ़ सोमदत्त के भवन में बैठा हुआ था और वहाँ मैंने एक उत्तम ध्वनि सुनी थी।
श्लोक 10 (7.85.10)
तदद्य पुण्यहीनोऽहमार्तस्वरनिनादितम् । निवेशनं गतोत्साहं विकृतं तात लक्षये ॥
tadadya puṇyahīno'hamārtasvaranināditam | niveśanaṃ gatotsāhaṃ vikṛtaṃ tāta lakṣaye
अब मैं पुण्यहीन उस भवन को आर्त स्वरों से गूँजता हुआ, उत्साह खोया हुआ और बदला हुआ देखता हूँ।
श्लोक 11 (7.85.11)
विविंशतेर्दुर्मुखस्य चित्रसेनविकर्णयोः । अन्येषां च सुतानां मे न तथा श्रूयते ध्वनिः ॥
viviṃśaterdurmukhasya citrasenavikarṇayoḥ | anyeṣāṃ ca sutānāṃ me na tathā śrūyate dhvaniḥ
विविंशति, दुर्मुख, चित्रसेन, विकर्ण और मेरे अन्य पुत्रों के भवनों में भी वैसी ध्वनि अब नहीं सुनाई देती।
श्लोक 12 (7.85.12)
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या यं शिष्याः पर्युपासते । द्रोणपुत्रं महेष्वासं पुत्राणां मे परायणम् ॥
brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyā yaṃ śiṣyāḥ paryupāsate | droṇaputraṃ maheṣvāsaṃ putrāṇāṃ me parāyaṇam
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य शिष्य बनकर जिसकी सेवा करते हैं, मेरे पुत्रों के उस परम आश्रय महाधनुर्धर द्रोणपुत्र के —
श्लोक 13 (7.85.13)
वितण्डालापसंलापैर्द्रुतवादित्रवादितैः । गीतैश्च विविधैरिष्टै रमते यो दिवानिशम् ॥
vitaṇḍālāpasaṃlāpairdrutavāditravāditaiḥ | gītaiśca vividhairiṣṭai ramate yo divāniśam
जो दिन-रात वाद-विवाद और बातचीत में, तेज़ बजाए जाते वाद्यों में और अनेक प्रिय गीतों में रमा रहता है,
श्लोक 14 (7.85.14)
उपास्यमानो बहुभिः कुरुपाण्डवसात्वतैः । श्लक्ष्णस्तस्य गृहे शब्दो नाद्य द्रौणेर्यथा पुरा ॥
upāsyamāno bahubhiḥ kurupāṇḍavasātvataiḥ | ślakṣṇastasya gṛhe śabdo nādya drauṇeryathā purā
और जिसकी सेवा में बहुत-से कुरु, पाण्डव और सात्वत रहते हैं — उस द्रोणपुत्र के घर में वह मधुर ध्वनि आज वैसी नहीं सुनाई देती जैसी पहले थी।
श्लोक 15 (7.85.15)
द्रोणपुत्रं महेष्वासं गायना नर्तकाश्च ये । अत्यर्थमुपतिष्ठन्ति तेषां न श्रूयते ध्वनिः ॥
droṇaputraṃ maheṣvāsaṃ gāyanā nartakāśca ye | atyarthamupatiṣṭhanti teṣāṃ na śrūyate dhvaniḥ
जो गायक और नर्तक महाधनुर्धर द्रोणपुत्र की बड़ी तत्परता से सेवा करते हैं, उनकी ध्वनि सुनाई नहीं देती।
श्लोक 16 (7.85.16)
विन्दानुविन्दयोः सायं शिबिरे यो महाध्वनिः । श्रूयते सोऽद्य न तथा केकयानां च वेश्मसु ॥
vindānuvindayoḥ sāyaṃ śibire yo mahādhvaniḥ | śrūyate so'dya na tathā kekayānāṃ ca veśmasu
सन्ध्या के समय विन्द और अनुविन्द के शिविर में जो बड़ा कोलाहल सुनाई देता था, वह आज नहीं सुनाई देता, और केकयों के घरों में भी नहीं।
श्लोक 17 (7.85.17)
नित्यं प्रमुदितानां च तालगीतस्वनो महान् । नृत्यतां श्रूयते तात गणानां सोऽद्य न स्वनः ॥
nityaṃ pramuditānāṃ ca tālagītasvano mahān | nṛtyatāṃ śrūyate tāta gaṇānāṃ so'dya na svanaḥ
सदा प्रसन्न रहने वाले नाचते हुए दलों की ताल और गीत की वह महान ध्वनि, जो सुनाई देती थी, आज नहीं सुनाई देती।
श्लोक 18 (7.85.18)
सप्ततन्तून्वितन्वाना याजका यमुपासते । सौमदत्तिं श्रुतनिधिं तेषां न श्रूयते ध्वनिः ॥
saptatantūnvitanvānā yājakā yamupāsate | saumadattiṃ śrutanidhiṃ teṣāṃ na śrūyate dhvaniḥ
यज्ञ के सात तन्तुओं का विस्तार करते हुए याजक जिस विद्या के भण्डार सोमदत्त-पुत्र की उपासना करते हैं, उनकी ध्वनि अब सुनाई नहीं देती।
श्लोक 19 (7.85.19)
ज्याघोषो ब्रह्मघोषश्च तोमरासिरथध्वनिः । द्रोणस्यासीदविरतो गृहे तं न शृणोम्यहम् ॥
jyāghoṣo brahmaghoṣaśca tomarāsirathadhvaniḥ | droṇasyāsīdavirato gṛhe taṃ na śṛṇomyaham
धनुष की टंकार, वेदपाठ, तोमर, तलवार और रथों की ध्वनि द्रोण के घर में निरन्तर रहती थी; उसे मैं अब नहीं सुनता।
श्लोक 20 (7.85.20)
नानादेशसमुत्थानां गीतानां योऽभवत्स्वनः । वादित्रनादितानां च सोऽद्य न श्रूयते महान् ॥
nānādeśasamutthānāṃ gītānāṃ yo'bhavatsvanaḥ | vāditranāditānāṃ ca so'dya na śrūyate mahān
अनेक देशों से आए हुए गीतों और बजते हुए वाद्यों की जो महान ध्वनि उठा करती थी, वह आज नहीं सुनाई देती।
श्लोक 21 (7.85.21)
यदाप्रभृत्युपप्लुव्याच्छान्तिमिच्छञ्जनार्दनः । आगतः सर्वभूतानामनुकम्पार्थमच्युतः ॥
yadāprabhṛtyupapluvyācchāntimicchañjanārdanaḥ | āgataḥ sarvabhūtānāmanukampārthamacyutaḥ
जब से अच्युत जनार्दन शान्ति की इच्छा से, समस्त प्राणियों पर दया करके, उपप्लव्य से आए थे,
श्लोक 22 (7.85.22)
ततोऽहमब्रुवं सूत मन्दं दुर्योधनं तदा । वासुदेवेन तीर्थेन पुत्र संशाम्य पाण्डवैः ॥
tato'hamabruvaṃ sūta mandaṃ duryodhanaṃ tadā | vāsudevena tīrthena putra saṃśāmya pāṇḍavaiḥ
तभी से, हे सूत, मैंने दुर्योधन से धीरे से कहा था: "पुत्र, वासुदेव के माध्यम से पाण्डवों के साथ सन्धि कर लो।
श्लोक 23 (7.85.23)
कालप्राप्तमहं मन्ये मा त्वं दुर्योधनातिगाः । संशाम्य भ्रातृभिस्तैस्तु क्षत्रियानभिपालय ॥
kālaprāptamahaṃ manye mā tvaṃ duryodhanātigāḥ | saṃśāmya bhrātṛbhistaistu kṣatriyānabhipālaya
मैं समझता हूँ कि इसका समय आ गया है; दुर्योधन, इसे लाँघ मत जाओ। उन भाइयों से सन्धि करके क्षत्रियों की रक्षा करो।
श्लोक 24 (7.85.24)
शमं चेद्याचमानं त्वं प्रत्याख्यास्यसि केशवम् । हितार्थमभिजल्पन्तं न तवास्ति रणे जयः ॥
śamaṃ cedyācamānaṃ tvaṃ pratyākhyāsyasi keśavam | hitārthamabhijalpantaṃ na tavāsti raṇe jayaḥ
यदि तुम शान्ति की याचना करते और तुम्हारे हित की बात कहते हुए केशव को ठुकराओगे, तो युद्ध में तुम्हारी विजय नहीं होगी।"
श्लोक 25 (7.85.25)
प्रत्याचष्ट स दाशार्हमृषभं सर्वधन्विनाम् । अनुनेयानि जल्पन्तमनयान्नान्वपद्यत ॥
pratyācaṣṭa sa dāśārhamṛṣabhaṃ sarvadhanvinām | anuneyāni jalpantamanayānnānvapadyata
उसने सब धनुर्धरों में श्रेष्ठ दाशार्ह को, मेल की बातें कहते रहने पर भी, ठुकरा दिया और अपनी नासमझी से उन्हें नहीं माना।
श्लोक 26 (7.85.26)
कर्णदुःशासनमतः सौबलस्य च दुर्मतेः । प्रत्याख्यातो महाबाहुः कुलान्तकरणेन वै ॥
karṇaduḥśāsanamataḥ saubalasya ca durmateḥ | pratyākhyāto mahābāhuḥ kulāntakaraṇena vai
कर्ण, दुःशासन और दुर्बुद्धि सुबलपुत्र की सलाह पर कुल का अन्त करने वाले उस दुर्योधन ने महाबाहु कृष्ण को ठुकरा दिया।
श्लोक 27 (7.85.27)
ततो दुःशासनस्यैव कर्णस्य च मतं द्वयोः । अन्ववर्तत मां हित्वा कृष्टः कालेन दुर्मतिः ॥
tato duḥśāsanasyaiva karṇasya ca mataṃ dvayoḥ | anvavartata māṃ hitvā kṛṣṭaḥ kālena durmatiḥ
तब वह दुर्बुद्धि पुत्र काल से खिंचकर मुझे छोड़ दुःशासन और कर्ण दोनों की सलाह पर चलने लगा।
श्लोक 28 (7.85.28)
न ह्यहं युद्धमिच्छामि विदुरो द्रोण एव वा । बाह्लीकः सोमदत्तो वा भीष्मो द्रौणायनिस्तथा ॥
na hyahaṃ yuddhamicchāmi viduro droṇa eva vā | bāhlīkaḥ somadatto vā bhīṣmo drauṇāyanistathā
मैं युद्ध नहीं चाहता, और न विदुर, न द्रोण, न बाह्लीक, न सोमदत्त, न भीष्म और न द्रोणपुत्र ही चाहते हैं।
श्लोक 29 (7.85.29)
शलो भूरिश्रवाश्चैव पुरुमित्रो विविंशतिः । जयः कृपो वा धर्मात्मा ये चान्ये मम बान्धवाः ॥
śalo bhūriśravāścaiva purumitro viviṃśatiḥ | jayaḥ kṛpo vā dharmātmā ye cānye mama bāndhavāḥ
न शल, भूरिश्रवा, पुरुमित्र और विविंशति, न जय, न धर्मात्मा कृप, और न मेरे दूसरे बन्धु ही।
श्लोक 30 (7.85.30)
एतेषां मतमास्थाय यदि वत्स्यति पुत्रकः । एतेभ्यश्च मदूर्ध्वं च अभोक्ष्यद्वसुधामिमाम् ॥
eteṣāṃ matamāsthāya yadi vatsyati putrakaḥ | etebhyaśca madūrdhvaṃ ca abhokṣyadvasudhāmimām
यदि मेरा पुत्र इनकी सलाह मानकर चलता, तो वह इनके साथ और इनके तथा मेरे बाद भी इस पृथ्वी का भोग करता।
श्लोक 31 (7.85.31)
श्लक्ष्णा मधुरसम्भाषा ज्ञातिमध्ये प्रियंवदाः । कुलीनाः सम्मताः प्राज्ञाः सुखं जीवन्ति मानवाः ॥
ślakṣṇā madhurasambhāṣā jñātimadhye priyaṃvadāḥ | kulīnāḥ sammatāḥ prājñāḥ sukhaṃ jīvanti mānavāḥ
जो कोमल और मधुर बोलते हैं, स्वजनों के बीच प्रिय वचन कहते हैं, कुलीन, सम्मानित और बुद्धिमान हैं, ऐसे मनुष्य सुख से जीते हैं।
श्लोक 32 (7.85.32)
धर्मापेक्षी नरो नित्यं सर्वत्र लभते सुखम् । प्रेत्यभावे च कल्याणं प्रसादं प्रतिपद्यते ॥
dharmāpekṣī naro nityaṃ sarvatra labhate sukham | pretyabhāve ca kalyāṇaṃ prasādaṃ pratipadyate
जो मनुष्य सदा धर्म का ध्यान रखता है, वह सर्वत्र सुख पाता है और मृत्यु के बाद कल्याण और प्रसन्नता को प्राप्त होता है।
श्लोक 33 (7.85.33)
अर्हास्ते पृथिवीं भोक्तुं समर्थाः साधनेऽपि च । तेषामपि समुद्रान्ता पितृपैतामही मही ॥
arhāste pṛthivīṃ bhoktuṃ samarthāḥ sādhane'pi ca | teṣāmapi samudrāntā pitṛpaitāmahī mahī
वे पृथ्वी का भोग करने के योग्य हैं और उसे प्राप्त करने में समर्थ भी हैं; समुद्र तक फैली हुई जो पृथ्वी उनके पिता-पितामह की थी, वह उनकी भी है।
श्लोक 34 (7.85.34)
न च त्वाऽभिभविष्यन्ति हित्वा धर्मं पृथात्मजाः । नियुज्यमानाः स्थास्यन्ति पाण्डवा धर्मवर्त्मनि ॥
na ca tvā'bhibhaviṣyanti hitvā dharmaṃ pṛthātmajāḥ | niyujyamānāḥ sthāsyanti pāṇḍavā dharmavartmani
पृथा के पुत्र धर्म को छोड़कर तुम्हें नहीं दबाएँगे; सही निर्देश मिलने पर पाण्डव धर्म के मार्ग पर ही टिके रहेंगे।
श्लोक 35 (7.85.35)
सन्ति मे ज्ञातयस्तात येषां श्रोष्यन्ति पाण्डवाः । शल्यस्य सोमदत्तस्य भीष्मस्य च महात्मनः ॥
santi me jñātayastāta yeṣāṃ śroṣyanti pāṇḍavāḥ | śalyasya somadattasya bhīṣmasya ca mahātmanaḥ
बेटा, मेरे ऐसे सम्बन्धी हैं जिनकी बात पाण्डव सुनेंगे — शल्य, सोमदत्त और महात्मा भीष्म,
श्लोक 36 (7.85.36)
द्रोणस्याथ विकर्णस्य बाह्लीकस्य कृपस्य च । अन्येषां चैव वृद्धानां भरतानां महात्मनाम् । त्वदर्थमब्रवं तात न जहुर्वचनानि ते ॥
droṇasyātha vikarṇasya bāhlīkasya kṛpasya ca | anyeṣāṃ caiva vṛddhānāṃ bharatānāṃ mahātmanām | tvadarthamabravaṃ tāta na jahurvacanāni te
द्रोण, विकर्ण, बाह्लीक, कृप और भरतवंश के दूसरे महात्मा वृद्ध। बेटा, मैंने यह तुम्हारे ही लिए कहा था कि वे उन वचनों को नहीं टालेंगे।
श्लोक 37 (7.85.37)
कं वा त्वं मन्यसे तेषां यस्त्वां ब्रूयादतोऽन्यथा । कृष्णो न धर्मं सञ्जह्यात्सर्वे ते हि तदन्वयाः ॥
kaṃ vā tvaṃ manyase teṣāṃ yastvāṃ brūyādato'nyathā | kṛṣṇo na dharmaṃ sañjahyātsarve te hi tadanvayāḥ
उनमें किसे तुम ऐसा समझते हो जो तुमसे इसके विपरीत कहे? कृष्ण धर्म को कभी नहीं छोड़ेंगे, और वे सब उसी मार्ग पर चलने वाले हैं।
श्लोक 38 (7.85.38)
मयाऽपि चोक्तास्ते वीरा वचनं धर्मसंहितम् । नान्यथा प्रकरिष्यन्ति धर्मात्मानो हि पाण्डवाः ॥
mayā'pi coktāste vīrā vacanaṃ dharmasaṃhitam | nānyathā prakariṣyanti dharmātmāno hi pāṇḍavāḥ
मैंने भी उन वीरों से धर्मसंगत वचन कहे थे; धर्मात्मा पाण्डव उससे अन्यथा नहीं करेंगे।
श्लोक 39 (7.85.39)
इत्यहं विलपन्सूत बहुशः पुत्रमुक्तवान् । न च मे श्रुतवान्मूढो मन्ये कालस्य पर्ययम् ॥
ityahaṃ vilapansūta bahuśaḥ putramuktavān | na ca me śrutavānmūḍho manye kālasya paryayam
हे सूत, इस प्रकार विलाप करते हुए मैंने पुत्र से बहुत बार कहा, पर उस मूढ़ ने मेरी नहीं सुनी। मैं इसे काल का फेर मानता हूँ।
श्लोक 40 (7.85.40)
वृकोदरार्जुनौ यत्र वृष्णिवीरश्च सात्यकिः । उत्तमौजाश्च पाञ्चाल्यो युधामन्युश्च दुर्जयः ॥
vṛkodarārjunau yatra vṛṣṇivīraśca sātyakiḥ | uttamaujāśca pāñcālyo yudhāmanyuśca durjayaḥ
जहाँ वृकोदर और अर्जुन हैं, वृष्णिवीर सात्यकि हैं, पांचाल उत्तमौजा और दुर्जय युधामन्यु हैं,
श्लोक 41 (7.85.41)
धृष्टद्युम्नश्च दुर्धर्षः शिखण्डी चापराजितः । अश्मकाः केकयाश्चैव क्षत्रधर्मा च सौमकिः ॥
dhṛṣṭadyumnaśca durdharṣaḥ śikhaṇḍī cāparājitaḥ | aśmakāḥ kekayāścaiva kṣatradharmā ca saumakiḥ
दुर्धर्ष धृष्टद्युम्न, अपराजित शिखण्डी, अश्मक और केकय तथा सोमक-वंशी क्षत्रधर्मा हैं,
श्लोक 42 (7.85.42)
चैद्यश्च चेकितानश्च पुत्रः काश्यस्य चाभिभूः । द्रौपदेया विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥
caidyaśca cekitānaśca putraḥ kāśyasya cābhibhūḥ | draupadeyā virāṭaśca drupadaśca mahārathaḥ
चैद्य, चेकितान, काशिराज का पुत्र अभिभू, द्रौपदी के पुत्र, विराट और महारथी द्रुपद हैं,
श्लोक 43 (7.85.43)
यमौ च पुरुषव्याघ्रौ मन्त्री च मधुसूदनः । क एताञ्जातु युध्येत लोकेऽस्मिन्वै जिजीविषुः ॥
yamau ca puruṣavyāghrau mantrī ca madhusūdanaḥ | ka etāñjātu yudhyeta loke'sminvai jijīviṣuḥ
दोनों पुरुषसिंह जुड़वाँ भाई हैं और मन्त्री के रूप में मधुसूदन हैं — इस संसार में जीने की इच्छा रखने वाला कौन उनसे कभी लड़ेगा?
श्लोक 44 (7.85.44)
दिव्यमस्त्रं विकुर्वाणान्प्रसहेद्वा परान्मम । अन्यो दुर्योधनात्कर्णाच्छकुनेश्चापि सौबलात् । दुःशासनचतुर्थानां नान्यं पश्यामि पञ्चमम् ॥
divyamastraṃ vikurvāṇānprasahedvā parānmama | anyo duryodhanātkarṇācchakuneścāpi saubalāt | duḥśāsanacaturthānāṃ nānyaṃ paśyāmi pañcamam
दिव्य अस्त्रों का प्रयोग करते हुए मेरे शत्रुओं का सामना कौन कर सकेगा? दुर्योधन, कर्ण और सुबलपुत्र शकुनि के सिवा, जिनमें दुःशासन चौथा है, मुझे कोई पाँचवाँ नहीं दिखता।
श्लोक 45 (7.85.45)
येषां वचनकृत्स स्याद्विष्वक्सेनो रथे स्थितः । सन्नद्धश्चार्जुनो योद्धा तेषां नास्ति पराजयः ॥
yeṣāṃ vacanakṛtsa syādviṣvakseno rathe sthitaḥ | sannaddhaścārjuno yoddhā teṣāṃ nāsti parājayaḥ
जिनके लिए विष्वक्सेन रथ पर खड़े होकर उनकी आज्ञा का पालन करते हैं और योद्धा अर्जुन कवच बाँधे तैयार है, उनकी पराजय नहीं होती।
श्लोक 46 (7.85.46)
तथा मम विलापानां नायं दुर्योधनः स्मरेत् । हतौ हि पुरुषव्याघ्रौ भीष्मद्रोणौ त्वमात्थ वै ॥
tathā mama vilāpānāṃ nāyaṃ duryodhanaḥ smaret | hatau hi puruṣavyāghrau bhīṣmadroṇau tvamāttha vai
दुर्योधन मेरे उन विलापों को याद नहीं रखता। तुमने मुझे बताया है कि पुरुषसिंह भीष्म और द्रोण मारे गए।
श्लोक 47 (7.85.47)
तेषां विदुरवाक्यानामुक्तानां दीर्घदर्शनात् । दृष्ट्वेमां फलनिर्वृत्तिं मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ॥
teṣāṃ viduravākyānāmuktānāṃ dīrghadarśanāt | dṛṣṭvemāṃ phalanirvṛttiṃ manye śocanti putrakāḥ
दूरदर्शिता से कहे गए विदुर के उन वचनों का यह फल देखकर मैं समझता हूँ कि मेरे पुत्र शोक कर रहे हैं।
श्लोक 48 (7.85.48)
सेनां दृष्ट्वाऽभिभूतां मे शैनेयेनार्जुनेन च । शून्यान्दृष्ट्वा रथोपस्थान्मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ॥
senāṃ dṛṣṭvā'bhibhūtāṃ me śaineyenārjunena ca | śūnyāndṛṣṭvā rathopasthānmanye śocanti putrakāḥ
शैनेय (सात्यकि) और अर्जुन के द्वारा मेरी सेना को पराजित और रथों के आसनों को सूना देखकर मैं समझता हूँ कि मेरे पुत्र शोक कर रहे हैं।
श्लोक 49 (7.85.49)
हिमात्यये यथा कक्षं शुष्कं वातेरितो महान् । अग्निर्दहेत्तथा सेनां मामिकां स धनञ्जयः ॥
himātyaye yathā kakṣaṃ śuṣkaṃ vāterito mahān | agnirdahettathā senāṃ māmikāṃ sa dhanañjayaḥ
जैसे शिशिर बीतने पर हवा से भड़की हुई बड़ी आग सूखी घास को जला देती है, वैसे ही वह धनंजय मेरी सेना को जला देगा।
श्लोक 50 (7.85.50)
आचक्ष्व मम तत्सर्वं कुशलो ह्यसि सञ्जय । यदोपयाताः सायाह्ने कृत्वा पार्थस्य किल्बिषं ॥
ācakṣva mama tatsarvaṃ kuśalo hyasi sañjaya | yadopayātāḥ sāyāhne kṛtvā pārthasya kilbiṣaṃ
संजय, तुम निपुण हो, मुझे वह सब बताओ: जब तुम सन्ध्या के समय पार्थ का अपराध करके लौटे थे,
श्लोक 51 (7.85.51)
अभिमन्यौ हते तात कथमासीन्मनो हि वः ॥
abhimanyau hate tāta kathamāsīnmano hi vaḥ
हे तात, अभिमन्यु के मारे जाने पर तुम्हारे मन की दशा कैसी थी?
श्लोक 52 (7.85.52)
न जातु तस्य कर्माणि युधि गाण्डीवधन्वनः । अपकृत्य महत्तात सोढुं शक्ष्यन्ति मामकाः ॥
na jātu tasya karmāṇi yudhi gāṇḍīvadhanvanaḥ | apakṛtya mahattāta soḍhuṃ śakṣyanti māmakāḥ
बेटा, गाण्डीवधारी के पराक्रमों को, उसका इतना बड़ा अपकार करके, मेरे लोग कभी सह नहीं सकेंगे।
श्लोक 53 (7.85.53)
किन्नु दुर्योधनः कृत्यं कर्णः कृत्यं किमब्रवीत् । दुःशासनः सौबलश्च तेषामेवं गते सति ॥
kinnu duryodhanaḥ kṛtyaṃ karṇaḥ kṛtyaṃ kimabravīt | duḥśāsanaḥ saubalaśca teṣāmevaṃ gate sati
ऐसी स्थिति आ जाने पर दुर्योधन ने क्या करने को कहा, कर्ण ने क्या कहा, और दुःशासन तथा सुबलपुत्र ने क्या कहा?
श्लोक 54 (7.85.54)
सर्वेषां समवेतानां पुत्राणां मम सञ्जय । यद्वृत्तं तात सङ्ग्रामे मन्दस्यापनयैर्भृशम् ॥
sarveṣāṃ samavetānāṃ putrāṇāṃ mama sañjaya | yadvṛttaṃ tāta saṅgrāme mandasyāpanayairbhṛśam
संजय, इकट्ठे हुए मेरे सब पुत्रों में, उस मन्दबुद्धि की भारी अनीति से युद्ध में जो कुछ हुआ,
श्लोक 55 (7.85.55)
लोभानुगस्य दुर्बुद्धेः क्रोधेन विकृतात्मनः । राज्यकामस्य मूढस्य रागोपहतचेतसः । दुर्नीतं वा सुनीतं वा तन्ममाचक्ष्व सञ्जय ॥
lobhānugasya durbuddheḥ krodhena vikṛtātmanaḥ | rājyakāmasya mūḍhasya rāgopahatacetasaḥ | durnītaṃ vā sunītaṃ vā tanmamācakṣva sañjaya
जो लोभ के पीछे चलता है, दुर्बुद्धि है, जिसका मन क्रोध से विकृत हो गया है, जो राज्य का कामी, मूढ़ और राग से ग्रस्त चित्त वाला है — उसने जो किया, वह चाहे अनीति हो या सुनीति, वह सब मुझे बताओ, संजय।