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द्रोण पर्व · अध्याय 86

धृतराष्ट्र के विलाप पर सञ्जय का उत्तर

सञ्जय धृतराष्ट्र से कहते हैं कि उनका विलाप पानी निकल जाने के बाद बाँध बाँधने जैसा व्यर्थ है और दोष उन्हीं का है: यदि वे युधिष्ठिर को द्यूत से रोकते, युद्ध का समय आने पर पुत्रों को सँभालते और उद्दण्ड दुर्योधन को बाँध लेते, तो यह सब न होता। वे राजा को याद दिलाते हैं कि कृष्ण और पाण्डव अब उनका पहले जैसा आदर नहीं करते, कुरु योद्धाओं का पक्ष लेते हैं, जो कृष्ण, अर्जुन, सात्यकि और भीम से रक्षित सेना के विरुद्ध जितना मनुष्य कर सकते हैं उतना लड़ रहे हैं, और फिर युद्ध का वृत्तान्त सुनाना आरम्भ करते हैं।

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सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.86.1)

हन्त ते सम्प्रवक्ष्यामि सर्वं प्रत्यक्षदर्शिवान् । शुश्रूषस्व स्थिरो भूत्वा तव ह्यपनयो महान् ॥

hanta te sampravakṣyāmi sarvaṃ pratyakṣadarśivān | śuśrūṣasva sthiro bhūtvā tava hyapanayo mahān

अच्छा, मैं स्वयं देखने वाले के रूप में आपको सब कुछ बताऊँगा। स्थिर होकर सुनिए, क्योंकि बड़ा अन्याय आपका ही था।

श्लोक 2 (7.86.2)

गतोदके सेतुबन्धो यादृक्तादृगयं तव । विलापो निष्फलो राजन्मा शुचो भरतर्षभ ॥

gatodake setubandho yādṛktādṛgayaṃ tava | vilāpo niṣphalo rājanmā śuco bharatarṣabha

आपका यह विलाप पानी निकल जाने के बाद बाँध बाँधने के समान निष्फल है, राजन्। हे भरतश्रेष्ठ, शोक न कीजिए।

श्लोक 3 (7.86.3)

अनतिक्रमणीयोऽयं कृतान्तस्याद्भुतो विधिः । मा शुचो भरतश्रेष्ठ दिष्टमेतत्पुरातनम् ॥

anatikramaṇīyo'yaṃ kṛtāntasyādbhuto vidhiḥ | mā śuco bharataśreṣṭha diṣṭametatpurātanam

यह काल का अद्भुत विधान है, जिसे कोई लाँघ नहीं सकता। हे भरतश्रेष्ठ, शोक न कीजिए; यह बहुत पहले से निश्चित था।

श्लोक 4 (7.86.4)

यदि त्वं हि पुरा द्यूतात्कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् । निवर्तयेथाः पुत्रांश्च न त्वां व्यसनमाव्रजेत् ॥

yadi tvaṃ hi purā dyūtātkuntīputraṃ yudhiṣṭhiram | nivartayethāḥ putrāṃśca na tvāṃ vyasanamāvrajet

यदि आपने बहुत पहले कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर को द्यूत से और अपने पुत्रों को भी रोक दिया होता, तो आप पर विपत्ति न आती।

श्लोक 5 (7.86.5)

युद्धकाले पुनः प्राप्ते तदैव भवता यदि । निवर्तिताः स्युः संरब्धा न त्वां व्यसनमाव्रजेत् ॥

yuddhakāle punaḥ prāpte tadaiva bhavatā yadi | nivartitāḥ syuḥ saṃrabdhā na tvāṃ vyasanamāvrajet

और जब युद्ध का समय आया, तब भी यदि आपने क्रोध से भरे उन लोगों को रोक लिया होता, तो आप पर विपत्ति न आती।

श्लोक 6 (7.86.6)

दुर्योधनं चाविधेयं बध्नीयास्त्वं पुरा यदि । अवेक्ष्य कौरवान्राजन्प्राप्स्यसे त्वं महद्यशः ॥

duryodhanaṃ cāvidheyaṃ badhnīyāstvaṃ purā yadi | avekṣya kauravānrājanprāpsyase tvaṃ mahadyaśaḥ

यदि आपने बहुत पहले कौरवों का ध्यान रखकर अवज्ञाकारी दुर्योधन को बाँध लिया होता, तो राजन्, आपको बड़ा यश मिलता।

श्लोक 7 (7.86.7)

तत्ते बुद्धिव्यतीचारमुपलप्स्यन्ति तज्जनाः । पाञ्चाला वृष्णयः सर्वे ये चान्येऽपि नराधिपाः ॥

tatte buddhivyatīcāramupalapsyanti tajjanāḥ | pāñcālā vṛṣṇayaḥ sarve ye cānye'pi narādhipāḥ

वे लोग आपकी बुद्धि की उस चूक को देखेंगे — पांचाल, सभी वृष्णि और अन्य राजा।

श्लोक 8 (7.86.8)

स कृत्वा पितृकर्म त्वं पुत्रं संस्थाप्य सत्पथे । वर्तेथा यदि धर्मेण न त्वां व्यसनमाव्रजेत् ॥

sa kṛtvā pitṛkarma tvaṃ putraṃ saṃsthāpya satpathe | vartethā yadi dharmeṇa na tvāṃ vyasanamāvrajet

पिता का कर्तव्य निभाकर और पुत्र को सन्मार्ग पर स्थापित करके यदि आप धर्म से चलते, तो आप पर विपत्ति न आती।

श्लोक 9 (7.86.9)

त्वं तु प्राज्ञतमो लोके हित्वा धर्मं सनातनम् । दुर्योधनस्य कर्णस्य शकुनेश्चान्वगा मतम् ॥

tvaṃ tu prājñatamo loke hitvā dharmaṃ sanātanam | duryodhanasya karṇasya śakuneścānvagā matam

परन्तु संसार में सबसे बुद्धिमान होकर भी आपने सनातन धर्म को छोड़कर दुर्योधन, कर्ण और शकुनि की सलाह मानी।

श्लोक 10 (7.86.10)

तत्ते विलपितं सर्वं मया राजन्निशामितम् । अर्थे निविशमानस्य विषमिश्रं यथा मधु ॥

tatte vilapitaṃ sarvaṃ mayā rājanniśāmitam | arthe niviśamānasya viṣamiśraṃ yathā madhu

राजन्, आपका वह सारा विलाप मैंने सुना; वह स्वार्थ में लगे हुए व्यक्ति के मुँह से विष मिले मधु के समान है।

श्लोक 11 (7.86.11)

न तथा मन्यते कृष्णो न च राजा युधिष्ठिरः । न भीष्मो नैव च द्रोणो यथा त्वं मन्यसे नृप ॥

na tathā manyate kṛṣṇo na ca rājā yudhiṣṭhiraḥ | na bhīṣmo naiva ca droṇo yathā tvaṃ manyase nṛpa

जैसा आप सोचते हैं, वैसा न कृष्ण सोचते हैं, न राजा युधिष्ठिर, न भीष्म और न द्रोण, राजन्।

श्लोक 12 (7.86.12)

व्यजानीत यदा तु त्वां लुब्धं धर्मप्रवादिनम् । तदाप्रभृति कृष्णस्त्वां न तथा बहुमन्यते ॥

vyajānīta yadā tu tvāṃ lubdhaṃ dharmapravādinam | tadāprabhṛti kṛṣṇastvāṃ na tathā bahumanyate

जब से उन्होंने आपको लोभी और केवल धर्म की बातें करने वाला जाना, तभी से कृष्ण आपको पहले जैसा आदर नहीं देते।

श्लोक 13 (7.86.13)

परुषाण्युच्यमानांश्च यथा पार्थानुपेक्षसे । तस्यानुबन्धः प्राप्तस्त्वां पुत्राणां राज्यकामुक ॥

paruṣāṇyucyamānāṃśca yathā pārthānupekṣase | tasyānubandhaḥ prāptastvāṃ putrāṇāṃ rājyakāmuka

पृथा के पुत्रों से कठोर बातें कही जाती रहीं और आप उदासीन देखते रहे; उसका फल आप पर और आपके पुत्रों पर आ पड़ा है, हे राज्य के लोभी।

श्लोक 14 (7.86.14)

पितृपैतामहं राज्यमपावृत्तं त्वयाऽनघ । अथ पार्थैर्जितां कृत्स्नां पृथिवीं प्रत्यपद्यथाः ॥

pitṛpaitāmahaṃ rājyamapāvṛttaṃ tvayā'nagha | atha pārthairjitāṃ kṛtsnāṃ pṛthivīṃ pratyapadyathāḥ

हे निष्पाप, पिता-पितामह का राज्य आपके द्वारा उनसे दूर कर दिया गया, और फिर पार्थों की जीती हुई सारी पृथ्वी आपने पा ली।

श्लोक 15 (7.86.15)

पाण्डुना निर्जितं राज्यं कौरवाणां यशस्तथा । एतच्चाप्यधिकं भूयः पाण्डवैर्धर्मचारिभिः ॥

pāṇḍunā nirjitaṃ rājyaṃ kauravāṇāṃ yaśastathā | etaccāpyadhikaṃ bhūyaḥ pāṇḍavairdharmacāribhiḥ

पाण्डु का जीता हुआ राज्य और कौरवों का यश — और इससे भी अधिक कुछ धर्मपरायण पाण्डवों ने जीता।

श्लोक 16 (7.86.16)

तेषां तत्तादृशं कर्म त्वामासाद्य सुनिष्फलम् । यत्पित्र्याद्भ्रंशिता राज्यात्त्वयेहामिषगृद्धिना ॥

teṣāṃ tattādṛśaṃ karma tvāmāsādya suniṣphalam | yatpitryādbhraṃśitā rājyāttvayehāmiṣagṛddhinā

उनका वैसा कर्म आपके पास पहुँचकर बिलकुल निष्फल हो गया, क्योंकि लोभ में पड़कर आपने उन्हें उनके पिता के राज्य से निकलवा दिया।

श्लोक 17 (7.86.17)

यत्पुनर्युद्धकाले त्वं पुत्रान्गर्हयसे नृप । बहुधा व्याहरन्दोषान्न तदद्योपपद्यते ॥

yatpunaryuddhakāle tvaṃ putrāngarhayase nṛpa | bahudhā vyāharandoṣānna tadadyopapadyate

और अब युद्ध के समय आप अपने पुत्रों को अनेक प्रकार से दोष गिनाते हुए कोसते हैं — यह आज उचित नहीं है।

श्लोक 18 (7.86.18)

न हि रक्षन्ति राजानो युध्यन्तो जीवितं रणे । चमूं विगाह्य पार्थानां युध्यन्ते क्षत्रियर्षभाः ॥

na hi rakṣanti rājāno yudhyanto jīvitaṃ raṇe | camūṃ vigāhya pārthānāṃ yudhyante kṣatriyarṣabhāḥ

युद्ध करते हुए राजा अपने प्राण नहीं बचाते; पार्थों की सेना में घुसकर श्रेष्ठ क्षत्रिय लड़ते हैं।

श्लोक 19 (7.86.19)

यां तु कृष्णार्जुनौ सेनां यां सात्यकिवृकोदरौ । रक्षेरन्को नु तां युध्येच्चमूमन्यत्र कौरवात् ॥

yāṃ tu kṛṣṇārjunau senāṃ yāṃ sātyakivṛkodarau | rakṣeranko nu tāṃ yudhyeccamūmanyatra kauravāt

जिस सेना की रक्षा कृष्ण और अर्जुन, सात्यकि और वृकोदर करते हैं, उससे कौरवों के सिवा और कौन लड़ेगा?

श्लोक 20 (7.86.20)

येषां योद्धा गुडाकेशो येषां मन्त्री जनार्दनः । येषां च सात्यकिर्योद्धा येषां योद्धा वृकोदरः ॥

yeṣāṃ yoddhā guḍākeśo yeṣāṃ mantrī janārdanaḥ | yeṣāṃ ca sātyakiryoddhā yeṣāṃ yoddhā vṛkodaraḥ

जिनके योद्धा गुडाकेश हैं, जिनके मन्त्री जनार्दन हैं, जिनके योद्धा सात्यकि हैं और जिनके योद्धा वृकोदर हैं —

श्लोक 21 (7.86.21)

को हि तान्विषहेद्योद्धुं मर्त्यधर्मा धनुर्धरः । अन्यत्र कौरवेयेभ्यो ये वा तेषां पदानुगाः ॥

ko hi tānviṣahedyoddhuṃ martyadharmā dhanurdharaḥ | anyatra kauraveyebhyo ye vā teṣāṃ padānugāḥ

कौरवों या उनके पीछे चलने वालों को छोड़कर और कौन मरणशील धनुर्धर उनसे युद्ध करने का साहस कर सकता है?

श्लोक 22 (7.86.22)

यावत्तु शक्यते कर्तुमन्तरज्ञैर्जनाधिपैः । क्षत्रधर्मरतैः शूरैस्तावत्कुर्वन्ति कौरवाः ॥

yāvattu śakyate kartumantarajñairjanādhipaiḥ | kṣatradharmarataiḥ śūraistāvatkurvanti kauravāḥ

अवसर को जानने वाले, क्षत्रिय धर्म में रत शूर राजाओं से जितना हो सकता है, उतना कौरव कर रहे हैं।

श्लोक 23 (7.86.23)

यथा तु पुरुषव्याघ्रैर्युद्धं परमसङ्कटम् । कुरूणां पाण्डवैः सार्धं तत्सर्वं शृणु तत्त्वतः ॥

yathā tu puruṣavyāghrairyuddhaṃ paramasaṅkaṭam | kurūṇāṃ pāṇḍavaiḥ sārdhaṃ tatsarvaṃ śṛṇu tattvataḥ

कुरुओं और पाण्डवों के बीच उन पुरुषसिंहों ने वह अत्यन्त संकटपूर्ण युद्ध जैसे लड़ा, वह सब यथार्थ रूप में सुनिए।

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