द्रोण पर्व · अध्याय 87
द्रोण द्वारा चक्रशकट व्यूह की रचना
प्रभात होते ही द्रोण कौरव सेना की व्यूह-रचना में लग जाते हैं, और योद्धा अर्जुन को पुकारते हुए अपने शस्त्र चमकाते हैं। द्रोण जयद्रथ को आश्वस्त करके महारथियों और उनकी विशाल सेनाओं के साथ पीछे रहने को कहते हैं, जहाँ देवता भी उसका सामना नहीं कर सकते। जयद्रथ अपने गान्धारों और घुड़सवारों के साथ चला जाता है, और द्रोण चक्रशकट नामक महाव्यूह रचते हैं, जिसके भीतर पद्म और सूची नाम के गूढ़ व्यूह हैं; कृतवर्मा, काम्बोज, जलसन्ध, दुर्योधन, कर्ण और जयद्रथ को उनके स्थानों पर रखकर वे स्वयं उसके मुख पर खड़े होते हैं। कौरव हर्षित होते हैं और आकाश से देखने वाले विस्मय में पड़ जाते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.87.1)
तस्यां निशायां व्युष्टायां द्रोणः शस्त्रभृतां वरः । स्वान्यनीकानि सर्वाणि प्राक्रामद्व्यूहितुं ततः ॥
tasyāṃ niśāyāṃ vyuṣṭāyāṃ droṇaḥ śastrabhṛtāṃ varaḥ | svānyanīkāni sarvāṇi prākrāmadvyūhituṃ tataḥ
जब वह रात बीतकर प्रभात हुआ, तब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ द्रोण अपनी सारी सेनाओं की व्यूह-रचना करने निकले।
श्लोक 2 (7.87.2)
शूराणां गर्जतां राजन्सङ्क्रुद्धानाममर्षिणाम् । श्रूयन्ते स्म गिरश्चित्राः परस्परवधैषिणाम् ॥
śūrāṇāṃ garjatāṃ rājansaṅkruddhānāmamarṣiṇām | śrūyante sma giraścitrāḥ parasparavadhaiṣiṇām
राजन्, क्रोध और अधैर्य से गरजते हुए, एक-दूसरे का वध चाहने वाले शूरों की तरह-तरह की वाणियाँ सुनाई दे रही थीं।
श्लोक 3 (7.87.3)
विष्फार्य च धनूंष्यन्ये ज्याः परे परिमृज्य च । विनिःश्वसन्तः प्राक्रोशन्क्वेदानीं स धनञ्जयः ॥
viṣphārya ca dhanūṃṣyanye jyāḥ pare parimṛjya ca | viniḥśvasantaḥ prākrośankvedānīṃ sa dhanañjayaḥ
कुछ लोग धनुषों की टंकार कर रहे थे, दूसरे डोरियाँ सहला रहे थे, और लम्बी साँसें लेते हुए चिल्ला उठे: "वह धनंजय अब कहाँ है?"
श्लोक 4 (7.87.4)
विकोशान्सुत्सरूनन्ये कृतधारान्समाहितान् । पीतानाकाशसङ्काशानसीन्केचिच्च चिक्षिपुः ॥
vikośānsutsarūnanye kṛtadhārānsamāhitān | pītānākāśasaṅkāśānasīnkecicca cikṣipuḥ
दूसरे कुछ लोगों ने म्यान से निकली, सुन्दर मूठ वाली, धार चढ़ाई हुई, पानी पिलाई हुई, आकाश के रंग की तलवारें उछालीं।
श्लोक 5 (7.87.5)
चरन्तस्त्वसिमार्गांश्च धनुर्मार्गांश्च शिक्षिताः । सङ्ग्राममनसः शूरा दृश्यन्ते स्म सहस्रशः ॥
carantastvasimārgāṃśca dhanurmārgāṃśca śikṣitāḥ | saṅgrāmamanasaḥ śūrā dṛśyante sma sahasraśaḥ
तलवार और धनुष के दाँव-पेंच कुशलता से चलते हुए, युद्ध में मन लगाए हजारों शूर दिखाई दे रहे थे।
श्लोक 6 (7.87.6)
सघण्टाश्चन्दनादिग्धाः स्वर्णवज्रविभूषिताः । समुत्क्षिप्य गदाश्चान्ये पर्यपृच्छन्त पाण्डवम् ॥
saghaṇṭāścandanādigdhāḥ svarṇavajravibhūṣitāḥ | samutkṣipya gadāścānye paryapṛcchanta pāṇḍavam
दूसरे कुछ लोग घण्टियों वाली, चन्दन से लिपी, सोने और हीरों से सजी गदाएँ उठाकर पाण्डव (अर्जुन) के बारे में पूछ रहे थे।
श्लोक 7 (7.87.7)
अन्ये बलमदोन्मत्ताः परिघैर्बाहुशालिनः । चक्रुः सम्बाधमाकाशमुच्छ्रितेन्द्रध्वजोपमैः ॥
anye balamadonmattāḥ parighairbāhuśālinaḥ | cakruḥ sambādhamākāśamucchritendradhvajopamaiḥ
दूसरे बल के मद में उन्मत्त, बलिष्ठ भुजाओं वाले योद्धाओं ने ऊँचे उठे इन्द्रध्वज जैसे अपने परिघों से आकाश को भर दिया।
श्लोक 8 (7.87.8)
नानाप्रहरणैश्चान्ये विचित्रस्रगलङ्कृताः । सङ्ग्राममनसः शूरास्तत्रतत्र व्यवस्थिताः ॥
nānāpraharaṇaiścānye vicitrasragalaṅkṛtāḥ | saṅgrāmamanasaḥ śūrāstatratatra vyavasthitāḥ
और दूसरे अनेक शस्त्र लिए, रंग-बिरंगी मालाओं से सजे, युद्ध में मन लगाए शूर जगह-जगह खड़े थे।
श्लोक 9 (7.87.9)
क्वार्जुनः क्व स गोविन्दः क्व च मानी वृकोदरः । क्व च ते सुहृदस्तेषामाह्वयन्ते रणे तदा ॥
kvārjunaḥ kva sa govindaḥ kva ca mānī vṛkodaraḥ | kva ca te suhṛdasteṣāmāhvayante raṇe tadā
"अर्जुन कहाँ है? वह गोविन्द कहाँ है? अभिमानी वृकोदर कहाँ है? उनके मित्र कहाँ हैं?" — इस प्रकार वे उस समय रण में उन्हें पुकार रहे थे।
श्लोक 10 (7.87.10)
ततः शङ्खमुपाध्माय त्वरयन्वाजिनः स्वयम् । इतस्ततस्तान्रचयन्द्रोणश्चरति वेगितः ॥
tataḥ śaṅkhamupādhmāya tvarayanvājinaḥ svayam | itastatastānracayandroṇaścarati vegitaḥ
तब शंख फूँककर और स्वयं घोड़ों को हाँकते हुए द्रोण उन्हें इधर-उधर सजाते हुए तेज़ी से घूमने लगे।
श्लोक 11 (7.87.11)
तेष्वनीकेषु सर्वेषु स्थितेष्वाहवनन्दिषु । भारद्वाजो महाराज जयद्रथमथाब्रवीत् ॥
teṣvanīkeṣu sarveṣu sthiteṣvāhavanandiṣu | bhāradvājo mahārāja jayadrathamathābravīt
जब युद्ध में आनन्द लेने वाली वे सारी सेनाएँ अपने स्थानों पर खड़ी हो गईं, तब हे महाराज, भारद्वाज ने जयद्रथ से कहा:
द्रोण उवाच
श्लोक 12 (7.87.12)
त्वं चैव सौमदत्तिश्च कर्णश्चैव महारथः । अश्वत्थामा च शल्यश्च वृषसेनः कृपस्तथा ॥
tvaṃ caiva saumadattiśca karṇaścaiva mahārathaḥ | aśvatthāmā ca śalyaśca vṛṣasenaḥ kṛpastathā
"तुम, सौमदत्ति, महारथी कर्ण, अश्वत्थामा, शल्य, वृषसेन और कृप भी,
श्लोक 13 (7.87.13)
शतं चाश्वसहस्राणां रथानामयुतानि षट् । द्विरदानां प्रभिन्नानां सहस्राणि चतुर्दश ॥
śataṃ cāśvasahasrāṇāṃ rathānāmayutāni ṣaṭ | dviradānāṃ prabhinnānāṃ sahasrāṇi caturdaśa
एक लाख घोड़ों, छः अयुत रथों और चौदह हजार मदमत्त हाथियों के साथ,
श्लोक 14 (7.87.14)
पदातीनां सहस्राणि दंशितान्येकविंशतिः । गव्यूतिषु त्रिमात्रासु मामनासाद्य तिष्ठत ॥
padātīnāṃ sahasrāṇi daṃśitānyekaviṃśatiḥ | gavyūtiṣu trimātrāsu māmanāsādya tiṣṭhata
और इक्कीस हजार कवचधारी पैदल सैनिकों के साथ, मेरे पास न आकर, तीन गव्यूति की दूरी पर रहो।
श्लोक 15 (7.87.15)
तत्रस्थं त्वां न संसोढुं शक्ता देवाः सवासवाः । किं पुनः पाण्डवाः सर्वे समाश्वसिहि सैन्धव ॥
tatrasthaṃ tvāṃ na saṃsoḍhuṃ śaktā devāḥ savāsavāḥ | kiṃ punaḥ pāṇḍavāḥ sarve samāśvasihi saindhava
वहाँ खड़े तुम्हारा सामना इन्द्र सहित देवता भी नहीं कर सकते, फिर सारे पाण्डवों की तो बात ही क्या। हे सैन्धव, धीरज रखो।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 16 (7.87.16)
एवमुक्तः समाश्वस्तः सिन्धुराजो जयद्रथः । सम्प्रायात्सहगान्धारैर्वृतस्तैश्च महारथैः । वर्मिभिः सादिभिर्यत्तैः प्रासपाणिहयस्थितैः ॥
evamuktaḥ samāśvastaḥ sindhurājo jayadrathaḥ | samprāyātsahagāndhārairvṛtastaiśca mahārathaiḥ | varmibhiḥ sādibhiryattaiḥ prāsapāṇihayasthitaiḥ
यह सुनकर आश्वस्त हुआ सिन्धुराज जयद्रथ गान्धारों और उन महारथियों से घिरा हुआ, कवचधारी, दृढ़, हाथ में भाले लिए घुड़सवारों के साथ चल पड़ा।
श्लोक 17 (7.87.17)
चामरापीडिनः सर्वे जाम्बूनदविभूषिताः । जयद्रथस्य राजेन्द्र हयाः साधुप्रवाहिनः ॥
cāmarāpīḍinaḥ sarve jāmbūnadavibhūṣitāḥ | jayadrathasya rājendra hayāḥ sādhupravāhinaḥ
हे राजेन्द्र, जयद्रथ के सभी घोड़े चँवर के कलँगी वाले, सोने से सजे और अच्छी चाल वाले थे।
श्लोक 18 (7.87.18)
ते चैकसप्तसाहस्रास्त्रिसाहस्राश्च सैन्धवाः ॥
te caikasaptasāhasrāstrisāhasrāśca saindhavāḥ
और वे सैन्धव एक हजार और सात हजार थे, तथा तीन हजार और।
श्लोक 19 (7.87.19)
मत्तानां सुविरूढानां हस्त्यारोहैर्विशारदैः । हस्तिनां भीमरूपाणां वर्मिणां रौद्रकर्मिणाम् ॥
mattānāṃ suvirūḍhānāṃ hastyārohairviśāradaiḥ | hastināṃ bhīmarūpāṇāṃ varmiṇāṃ raudrakarmiṇām
मदमत्त, भली-भाँति सधे हुए, कुशल महावतों वाले, भयंकर रूप के, कवचधारी और भयानक कर्म वाले हाथियों में से —
श्लोक 20 (7.87.20)
अध्यर्धेन सहस्रेण पुत्रो दुर्मर्षणस्तव । अग्रतः सर्वसैन्यानां योत्स्यमानो व्यवस्थितः ॥
adhyardhena sahasreṇa putro durmarṣaṇastava | agrataḥ sarvasainyānāṃ yotsyamāno vyavasthitaḥ
डेढ़ हजार हाथियों के साथ आपका पुत्र दुर्मर्षण सब सेनाओं के आगे युद्ध के लिए खड़ा था।
श्लोक 21 (7.87.21)
ततो दुःशासनश्चैव विकर्णश्च तवात्मजौ । सिन्धुराजार्थसिद्ध्यर्थमग्रानीके व्यवस्थितौ ॥
tato duḥśāsanaścaiva vikarṇaśca tavātmajau | sindhurājārthasiddhyarthamagrānīke vyavasthitau
फिर आपके पुत्र दुःशासन और विकर्ण सिन्धुराज का प्रयोजन सिद्ध करने के लिए सेना के अग्रभाग में खड़े हुए।
श्लोक 22 (7.87.22)
दीर्घो द्वादशगव्यूतिः पश्चार्धे पञ्चविस्तृतः । व्यूहस्तु चक्रशकटो भारद्वाजेन निर्मितः ॥
dīrgho dvādaśagavyūtiḥ paścārdhe pañcavistṛtaḥ | vyūhastu cakraśakaṭo bhāradvājena nirmitaḥ
भारद्वाज द्वारा बनाया गया वह व्यूह चक्रशकट था, बारह गव्यूति लम्बा और पिछले आधे भाग में पाँच गव्यूति चौड़ा।
श्लोक 23 (7.87.23)
नानानृपतिभिर्वीरैस्तत्रतत्र व्यवस्थितैः । रथाश्वगजपत्त्योघैर्द्रोणेन विहितः स्वयम् ॥
nānānṛpatibhirvīraistatratatra vyavasthitaiḥ | rathāśvagajapattyoghairdroṇena vihitaḥ svayam
उसे द्रोण ने स्वयं रचा था, जगह-जगह अनेक राजा और वीर खड़े थे और रथों, घोड़ों, हाथियों तथा पैदलों के समूह थे।
श्लोक 24 (7.87.24)
पश्चार्धे तस्य पद्मस्तु गर्भव्यूहः पुनः कृतः । सूचीपद्मस्य गर्भस्थो गूढो व्यूहः कृतः पुनः ॥
paścārdhe tasya padmastu garbhavyūhaḥ punaḥ kṛtaḥ | sūcīpadmasya garbhastho gūḍho vyūhaḥ kṛtaḥ punaḥ
उसके पिछले भाग में पद्म व्यूह बना था, उसके भीतर फिर गर्भ-व्यूह रचा गया; और सूची-पद्म के गर्भ में एक और गूढ़ व्यूह बनाया गया।
श्लोक 25 (7.87.25)
एवमेतं महाव्यूहं व्यूह्य द्रोणो व्यवस्थितः । सूचीमुखे महेष्वासः कृतवर्मा व्यवस्थितः ॥
evametaṃ mahāvyūhaṃ vyūhya droṇo vyavasthitaḥ | sūcīmukhe maheṣvāsaḥ kṛtavarmā vyavasthitaḥ
इस प्रकार इस महाव्यूह को रचकर द्रोण स्थित हुए; सूची के मुख पर महाधनुर्धर कृतवर्मा खड़े हुए।
श्लोक 26 (7.87.26)
अनन्तरं च काम्भोजो जलसन्धश्च मारिष । दुर्योधनश्च कर्णश्च तदनन्तरमेव च ॥
anantaraṃ ca kāmbhojo jalasandhaśca māriṣa | duryodhanaśca karṇaśca tadanantarameva ca
उसके बाद हे मारिष, काम्बोज और जलसन्ध खड़े हुए, और उनके पीछे दुर्योधन और कर्ण।
श्लोक 27 (7.87.27)
ततः शतसहस्राणि योधानामनिवर्तिनाम् । व्यवस्थितानि सर्वाणि शकटे मुखरक्षिणाम् ॥
tataḥ śatasahasrāṇi yodhānāmanivartinām | vyavasthitāni sarvāṇi śakaṭe mukharakṣiṇām
फिर कभी पीछे न हटने वाले, मुख की रक्षा करने वाले लाखों योद्धा उस शकट में नियुक्त किए गए।
श्लोक 28 (7.87.28)
तेषां च पृष्ठतो राजा बलेन महता वृतः । जयद्रथस्ततो राजा सूचीपार्श्वे व्यवस्थितः ॥
teṣāṃ ca pṛṣṭhato rājā balena mahatā vṛtaḥ | jayadrathastato rājā sūcīpārśve vyavasthitaḥ
उनके पीछे विशाल सेना से घिरा राजा जयद्रथ सूची के पार्श्व में खड़ा हुआ।
श्लोक 29 (7.87.29)
शकटस्य तु राजेन्द्र भारद्वाजो मुखे स्थितः । नात्र तस्याभवद्भेदो जुगोपैनं ततः स्वयम् ॥
śakaṭasya tu rājendra bhāradvājo mukhe sthitaḥ | nātra tasyābhavadbhedo jugopainaṃ tataḥ svayam
हे राजेन्द्र, शकट के मुख पर भारद्वाज खड़े थे। वहाँ उसमें कोई दरार नहीं थी, और उसकी रक्षा वे स्वयं कर रहे थे।
श्लोक 30 (7.87.30)
श्वेतवर्माम्बरोष्णीषो व्यूढोरस्को महाभुजः । धनुर्विस्फारयन्द्रोणस्तस्थौ क्रुद्ध इवान्तकः । तस्य सैन्यस्य सर्वस्य नेता गोप्ता च वीर्यवान् ॥
śvetavarmāmbaroṣṇīṣo vyūḍhorasko mahābhujaḥ | dhanurvisphārayandroṇastasthau kruddha ivāntakaḥ | tasya sainyasya sarvasya netā goptā ca vīryavān
श्वेत कवच, वस्त्र और पगड़ी पहने, चौड़ी छाती और लम्बी भुजाओं वाले द्रोण धनुष की टंकार करते हुए यम के समान क्रुद्ध खड़े थे। वे पराक्रमी थे और उस सारी सेना के नेता तथा रक्षक थे।
श्लोक 31 (7.87.31)
पताकिनं शोणहयं वेदीकृष्णाजिनध्वजम् । द्रोणस्य रथमालोक्य प्रहृष्टाः कुरवोऽभवन् ॥
patākinaṃ śoṇahayaṃ vedīkṛṣṇājinadhvajam | droṇasya rathamālokya prahṛṣṭāḥ kuravo'bhavan
पताका वाले, लाल घोड़ों वाले और वेदी तथा काले मृगचर्म की ध्वजा वाले द्रोण के रथ को देखकर कौरव हर्ष से भर गए।
श्लोक 32 (7.87.32)
सिद्धचारणसङ्घानां विस्मयः सुमहानभूत् । द्रोणेन विहितं दृष्ट्वा व्यूहं क्षुब्धार्णवोपमम् ॥
siddhacāraṇasaṅghānāṃ vismayaḥ sumahānabhūt | droṇena vihitaṃ dṛṣṭvā vyūhaṃ kṣubdhārṇavopamam
द्रोण द्वारा रचे हुए, क्षुब्ध समुद्र जैसे उस व्यूह को देखकर सिद्धों और चारणों के समूहों में बड़ा विस्मय छा गया।
श्लोक 33 (7.87.33)
सशैलसागरवनां नानाजनपदाकुलाम् । ग्रसेद्व्यूहः क्षितिं सर्वामिति भूतानि मेनिरे ॥
saśailasāgaravanāṃ nānājanapadākulām | grasedvyūhaḥ kṣitiṃ sarvāmiti bhūtāni menire
"यह व्यूह पर्वतों, समुद्रों और वनों सहित, अनेक जनपदों से भरी सारी पृथ्वी को निगल जाएगा" — प्राणियों ने ऐसा माना।
श्लोक 34 (7.87.34)
बहुरथमनुजाश्वपत्तिनागं । प्रतिभयनिःस्वनमद्भुतानुरूपम् । अहितहृदयभेदनं महद्वै । शकटमवेक्ष्य कृतं ननन्द राजा ॥
bahurathamanujāśvapattināgaṃ | pratibhayaniḥsvanamadbhutānurūpam | ahitahṛdayabhedanaṃ mahadvai | śakaṭamavekṣya kṛtaṃ nananda rājā
अनेक रथों, मनुष्यों, घोड़ों, पैदलों और हाथियों से भरे, भयंकर ध्वनि वाले, अद्भुत रूप के, शत्रुओं के हृदय को चीर देने वाले उस शकट व्यूह को बना देखकर राजा आनन्दित हुआ।