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द्रोण पर्व · अध्याय 88

अर्जुन का रणभूमि में प्रवेश

भयंकर बेला में, कौरवों के विनाश के अपशकुनों के बीच, शतानीक और धृष्टद्युम्न पाण्डवों की सेनाओं का व्यूह रचते हैं। दुर्मर्षण कौरव-सेना के आगे खड़ा होकर घोषणा करता है कि वह अर्जुन को रोक लेगा। उगते सूर्य के समान अर्जुन प्रकट होते हैं, और अर्जुन तथा कृष्ण के शंखनाद से कौरव-सेना भय से भर जाती है। अत्यन्त प्रसन्न अर्जुन तब कृष्ण से बोलते हैं।

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सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.88.1)

व्यूढेषु तव सैन्येषु समुत्क्रुष्टेषु मारिष । ताड्यमानासु भेरीषु मृदङ्गेष्वानकेषु च ॥

vyūḍheṣu tava sainyeṣu samutkruṣṭeṣu māriṣa | tāḍyamānāsu bherīṣu mṛdaṅgeṣvānakeṣu ca

हे आर्य, जब आपकी सेनाएँ व्यूह बनाकर खड़ी हो चुकी थीं, चारों ओर जयघोष उठ रहे थे और भेरियाँ, मृदंग तथा आनक बजाए जा रहे थे,

श्लोक 2 (7.88.2)

अनीकानां च संह्रादे वादित्राणां च निःस्वने । प्रध्मापितेषु शङ्खेषु सन्नादे रोमहर्षणे ॥

anīkānāṃ ca saṃhrāde vāditrāṇāṃ ca niḥsvane | pradhmāpiteṣu śaṅkheṣu sannāde romaharṣaṇe

जब सेनाओं का कोलाहल और वाद्यों की ध्वनि हो रही थी, और रोमाञ्च उठा देने वाले नाद के साथ शंख फूँके जा रहे थे,

श्लोक 3 (7.88.3)

प्रगृहीतेषु शस्त्रेषु भारतेषु युयुत्सुषु । रौद्रे मुहूर्ते सम्प्राप्ते सव्यसाची व्यदृश्यत ॥

pragṛhīteṣu śastreṣu bhārateṣu yuyutsuṣu | raudre muhūrte samprāpte savyasācī vyadṛśyata

जब युद्ध के इच्छुक भरतवंशी योद्धा शस्त्र उठा चुके थे और वह भयंकर बेला आ पहुँची थी, तब सव्यसाची दिखाई दिए।

श्लोक 4 (7.88.4)

बलानां वायसानां च पुरस्तात्सव्यसाचिनः । पिशितासृग्भुजां सङ्घाः प्रलीयन्ते सहस्रशः ॥

balānāṃ vāyasānāṃ ca purastātsavyasācinaḥ | piśitāsṛgbhujāṃ saṅghāḥ pralīyante sahasraśaḥ

सव्यसाची के आगे कौओं और मांस-रक्त खाने वाले अन्य पक्षियों के हज़ारों झुंड आकर बैठने लगे।

श्लोक 5 (7.88.5)

मृगाश्च घोरसन्नादाः शिवाश्चाशिवदर्शनाः । दक्षिणेन प्रयातानामस्माकं नेदुरध्वनि ॥

mṛgāśca ghorasannādāḥ śivāścāśivadarśanāḥ | dakṣiṇena prayātānāmasmākaṃ neduradhvani

जब हम आगे बढ़ रहे थे, तब भयंकर गर्जना करने वाले वन्य पशु और अशुभ रूप वाले सियार हमारे दाहिनी ओर के मार्ग पर चीत्कार करने लगे।

श्लोक 6 (7.88.6)

लोकक्षये महाराज यादृशास्तादृशा हि ते । अशिवा धार्तराष्ट्राणां शिवाः पार्थस्य संयुगे ॥

lokakṣaye mahārāja yādṛśāstādṛśā hi te | aśivā dhārtarāṣṭrāṇāṃ śivāḥ pārthasya saṃyuge

हे महाराज, लोकों के विनाश के समय जैसे चिह्न प्रकट होते हैं, वैसे ही ये थे: धृतराष्ट्र के पुत्रों के लिए अशुभ और युद्ध में पार्थ के लिए शुभ।

श्लोक 7 (7.88.7)

सनिर्घाता ज्वलन्त्यश्च पेतुरुल्काः सहस्रशः । चचाल च मही कृत्स्ना भये घोरे समुत्थिते ॥

sanirghātā jvalantyaśca peturulkāḥ sahasraśaḥ | cacāla ca mahī kṛtsnā bhaye ghore samutthite

वज्रपात के-से गर्जन के साथ जलती हुई उल्काएँ हज़ारों की संख्या में गिरीं, और वह भयंकर संकट उपस्थित होने पर सारी पृथ्वी काँप उठी।

श्लोक 8 (7.88.8)

विष्वग्वाताः सनीहारा रूक्षाः शर्करकर्षिणः । ववुरायाति कौन्तेये सङ्ग्रामे समुपस्थिते ॥

viṣvagvātāḥ sanīhārā rūkṣāḥ śarkarakarṣiṇaḥ | vavurāyāti kaunteye saṅgrāme samupasthite

कुन्तीपुत्र के पास आते और युद्ध के उपस्थित होते ही चारों ओर से कुहरे से भरी, रूखी और कंकड़ घसीटती हवाएँ चलने लगीं।

श्लोक 9 (7.88.9)

नाकुलिश्च शतानीको धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः । पाण्डवानामनीकानि प्राज्ञौ तौ व्यूहतुस्तदा ॥

nākuliśca śatānīko dhṛṣṭadyumnaśca pārṣataḥ | pāṇḍavānāmanīkāni prājñau tau vyūhatustadā

नकुल के पुत्र शतानीक और पृषत के पुत्र धृष्टद्युम्न, उन दोनों बुद्धिमान वीरों ने तब पाण्डवों की सेनाओं का व्यूह रचा।

श्लोक 10 (7.88.10)

ततो रथसहस्रेण द्विरदानां शतेन च । त्रिभिरश्वसहस्रैश्च पदातीनां शतैः शतैः ॥

tato rathasahasreṇa dviradānāṃ śatena ca | tribhiraśvasahasraiśca padātīnāṃ śataiḥ śataiḥ

तब आपके पुत्र दुर्मर्षण ने एक हज़ार रथों, सौ हाथियों, तीन हज़ार घोड़ों और सैकड़ों-सैकड़ों पैदल सैनिकों के साथ,

श्लोक 11 (7.88.11)

अध्यर्धमात्रे धनुषां सहस्रे तनयस्तव । अग्रतः सर्वसैन्यानां स्थित्वा दुर्मर्षणोऽब्रवीत् ॥

adhyardhamātre dhanuṣāṃ sahasre tanayastava | agrataḥ sarvasainyānāṃ sthitvā durmarṣaṇo'bravīt

सारी सेना के आगे, डेढ़ हज़ार धनुष की दूरी पर खड़े होकर कहा:

दुर्मर्षण उवाच

श्लोक 12 (7.88.12)

अद्य गाण्डीवधन्वानं तपन्तं युद्धदुर्मदम् । अहमावारयिष्यामि वेलेव मकरालयम् ॥

adya gāṇḍīvadhanvānaṃ tapantaṃ yuddhadurmadam | ahamāvārayiṣyāmi veleva makarālayam

"आज मैं गाण्डीवधारी को, जो युद्ध के मद में तप रहा है, वैसे ही रोक लूँगा जैसे तट मगरमच्छों के निवास समुद्र को रोक लेता है।

श्लोक 13 (7.88.13)

अद्य पश्यन्तु सङ्ग्रामे धनञ्जयममर्षणम् । विषक्तं मयि दुर्धर्षं भिन्नं कुम्भमिवाश्मनि ॥

adya paśyantu saṅgrāme dhanañjayamamarṣaṇam | viṣaktaṃ mayi durdharṣaṃ bhinnaṃ kumbhamivāśmani

आज सब देखें कि वह क्रोधी धनञ्जय, जिसका सामना करना कठिन है, युद्ध में मुझसे भिड़कर पत्थर से टकराए घड़े की तरह चूर-चूर हो गया।

श्लोक 14 (7.88.14)

तिष्ठध्वं रथिनो यूयं सङ्ग्राममभिकाङ्क्षिणः । युध्यामि संहतानेतान्यशो मानं च वर्धयन् ॥

tiṣṭhadhvaṃ rathino yūyaṃ saṅgrāmamabhikāṅkṣiṇaḥ | yudhyāmi saṃhatānetānyaśo mānaṃ ca vardhayan

युद्ध की इच्छा रखने वाले रथियो, तुम डटे रहो। मैं यश और मान बढ़ाता हुआ इन एकजुट शत्रुओं से लड़ूँगा।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 15 (7.88.15)

एवं ब्रुवन्महाराज महात्मा स महीपतिः । महेष्वासैर्वृतो राजन्महेष्वासो व्यवस्थितः ॥

evaṃ bruvanmahārāja mahātmā sa mahīpatiḥ | maheṣvāsairvṛto rājanmaheṣvāso vyavasthitaḥ

हे महाराज, ऐसा कहते हुए वह महात्मा राजकुमार, स्वयं महान धनुर्धर होकर, महान धनुर्धरों से घिरा हुआ खड़ा रहा।

श्लोक 16 (7.88.16)

ततोऽर्जुनो महाराज महात्मा महतां पतिः । महारथसमाख्यातो महेष्वासो व्यवस्थितः ॥

tato'rjuno mahārāja mahātmā mahatāṃ patiḥ | mahārathasamākhyāto maheṣvāso vyavasthitaḥ

तब हे महाराज, महान पुरुषों के स्वामी, महात्मा अर्जुन, जो महारथी के रूप में प्रसिद्ध और महान धनुर्धर हैं, अपने स्थान पर आ डटे।

श्लोक 17 (7.88.17)

कक्षाग्निरिव दुःस्पर्शः सवज्र इव वासवः । दण्डपाणिरिवासह्यो मृत्युः कालेन चोदितः ॥

kakṣāgniriva duḥsparśaḥ savajra iva vāsavaḥ | daṇḍapāṇirivāsahyo mṛtyuḥ kālena coditaḥ

सूखे झाड़-झंखाड़ में लगी आग के समान जिन्हें छूना कठिन था, वज्रधारी इन्द्र के समान, दण्ड हाथ में लिए यमराज की तरह दुर्धर्ष, काल से प्रेरित मृत्यु के समान,

श्लोक 18 (7.88.18)

शूलपाणिरिवाक्षोभ्यो वरुणः पाशवानिव । युगान्ताग्निरिवार्चिष्मान्दिधक्षुः स्थास्नुजङ्गमम् ॥

śūlapāṇirivākṣobhyo varuṇaḥ pāśavāniva | yugāntāgnirivārciṣmāndidhakṣuḥ sthāsnujaṅgamam

त्रिशूलधारी महादेव के समान अविचल, पाशधारी वरुण के समान, युगान्त की अग्नि की तरह दहकते हुए, मानो स्थावर-जंगम सबको जला डालना चाहते हों,

श्लोक 19 (7.88.19)

क्रोधामर्षबलोद्धूतो निवातकवचान्तकः । युद्धे जेता स्थितः सत्ये पारयिष्यन्महाव्रतम् ॥

krodhāmarṣabaloddhūto nivātakavacāntakaḥ | yuddhe jetā sthitaḥ satye pārayiṣyanmahāvratam

क्रोध और अमर्ष के बल से उत्तेजित, निवातकवचों के संहारक, युद्ध में विजयी, सत्य में स्थिर और अपने महान व्रत को पूरा करने को उद्यत,

श्लोक 20 (7.88.20)

आमुक्तकवचः खड्गी जाम्बूनदकिरीटभृत् । शुभ्रमाल्याम्बरधरः स्वङ्गदश्चारुकुण्डलः ॥

āmuktakavacaḥ khaḍgī jāmbūnadakirīṭabhṛt | śubhramālyāmbaradharaḥ svaṅgadaścārukuṇḍalaḥ

कवच धारण किए, तलवार लिए, सोने का मुकुट पहने, श्वेत माला और वस्त्र धारण किए, सुन्दर बाजूबन्दों और मनोहर कुण्डलों से सजे,

श्लोक 21 (7.88.21)

रथप्रवरमास्थाय नरो नारायणानुगः । विधुन्वन्गाण्डिवं सङ्ख्ये बभौ सूर्य इवोदितः ॥

rathapravaramāsthāya naro nārāyaṇānugaḥ | vidhunvangāṇḍivaṃ saṅkhye babhau sūrya ivoditaḥ

नारायण के साथ चलने वाले नर (अर्जुन) श्रेष्ठ रथ पर आरूढ़ होकर युद्ध में गाण्डीव को हिलाते हुए उदित सूर्य के समान शोभित हुए।

श्लोक 22 (7.88.22)

अग्रानीकस्य सोऽध्यर्ध इषुपाते धनञ्जयः । व्यवस्थाप्य रथं राजञ्शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् ॥

agrānīkasya so'dhyardha iṣupāte dhanañjayaḥ | vyavasthāpya rathaṃ rājañśaṅkhaṃ dadhmau pratāpavān

हे राजन्, सेना के अग्रभाग से डेढ़ बाण-पात की दूरी पर प्रतापी धनञ्जय ने अपना रथ खड़ा करके शंख बजाया।

श्लोक 23 (7.88.23)

अथ कृष्णोऽप्यसम्भ्रान्तः पार्थेन सह मारिष । प्राध्मापयत्पाञ्चजन्यं शङ्खप्रवरमोजसा ॥

atha kṛṣṇo'pyasambhrāntaḥ pārthena saha māriṣa | prādhmāpayatpāñcajanyaṃ śaṅkhapravaramojasā

तब हे आर्य, कृष्ण ने भी निर्भय रहकर पार्थ के साथ पूरे बल से श्रेष्ठ शंख पाञ्चजन्य बजाया।

श्लोक 24 (7.88.24)

तयोः शङ्खप्रणादेन तव सैन्ये विशाम्पते । आसन्संहृष्टरोमाणः कम्पिता गतचेतसः ॥

tayoḥ śaṅkhapraṇādena tava sainye viśāmpate | āsansaṃhṛṣṭaromāṇaḥ kampitā gatacetasaḥ

हे प्रजापति, उन दोनों के शंखनाद से आपकी सेना के लोगों के रोम खड़े हो गए; वे काँप उठे और अचेत-से हो गए।

श्लोक 25 (7.88.25)

यथा त्रस्यन्ति भूतानि सर्वाण्यशनिनिःस्वनात् । तथा शङ्खप्रणादेन वित्रेसुस्तव सैनिकाः ॥

yathā trasyanti bhūtāni sarvāṇyaśaniniḥsvanāt | tathā śaṅkhapraṇādena vitresustava sainikāḥ

जैसे वज्र की गड़गड़ाहट से सभी प्राणी काँप उठते हैं, वैसे ही शंखनाद से आपके सैनिक थरथरा उठे।

श्लोक 26 (7.88.26)

प्रसुस्रुवुः शकृन्मूत्रं वाहनानि च सर्वशः । एवं सवाहनं सर्वमाविग्नमभवद्बलम् ॥

prasusruvuḥ śakṛnmūtraṃ vāhanāni ca sarvaśaḥ | evaṃ savāhanaṃ sarvamāvignamabhavadbalam

सब ओर उनके वाहन मल-मूत्र त्यागने लगे। इस प्रकार वाहनों सहित सारी सेना घबरा उठी।

श्लोक 27 (7.88.27)

सीदन्ति स्म नरा राजञ्शङ्खशब्देन मारिष । विसंज्ञाश्चाभवन्केचित्केचिद्राजन्वितत्रसुः ॥

sīdanti sma narā rājañśaṅkhaśabdena māriṣa | visaṃjñāścābhavankecitkecidrājanvitatrasuḥ

हे राजन्, हे आर्य, शंख की ध्वनि से लोग निढाल हो गए; कुछ अचेत हो गए और कुछ भय से काँपने लगे।

श्लोक 28 (7.88.28)

ततः कपिर्महानादं सहभूतैर्ध्वजालयैः । अकरोद्व्यादितास्यश्च भीषयंस्तव सैनिकान् ॥

tataḥ kapirmahānādaṃ sahabhūtairdhvajālayaiḥ | akarodvyāditāsyaśca bhīṣayaṃstava sainikān

तब ध्वजा पर बैठे वानर ने, ध्वजाओं में रहने वाले भूतों के साथ, मुँह फाड़कर भारी गर्जना की और आपके सैनिकों को डरा दिया।

श्लोक 29 (7.88.29)

ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च मृदङ्गाश्चानकैः सह । पुनरेवाभ्यहन्यन्त तव सैन्यप्रहर्षणाः ॥

tataḥ śaṅkhāśca bheryaśca mṛdaṅgāścānakaiḥ saha | punarevābhyahanyanta tava sainyapraharṣaṇāḥ

तब आपकी सेना को हर्षित करने वाले शंख, भेरियाँ, मृदंग और आनक फिर से बजाए जाने लगे।

श्लोक 30 (7.88.30)

नानावादित्रसंह्रादैः क्ष्वेडितास्फोटिताकुलैः । सिंहनादैः समुत्क्रुष्टैः समाधूतैर्महारथैः ॥

nānāvāditrasaṃhrādaiḥ kṣveḍitāsphoṭitākulaiḥ | siṃhanādaiḥ samutkruṣṭaiḥ samādhūtairmahārathaiḥ

अनेक वाद्यों के घोष, दहाड़ों और भुजाओं की थाप से भरे कोलाहल, सिंहनादों और उत्तेजित महारथियों के साथ,

श्लोक 31 (7.88.31)

तस्मिंस्तु तुमुले शब्दे भीरूणां भयवर्धने । अतीव हृष्टो दाशार्हमब्रवीत्पाकशासनिः ॥

tasmiṃstu tumule śabde bhīrūṇāṃ bhayavardhane | atīva hṛṣṭo dāśārhamabravītpākaśāsaniḥ

भीरुओं का भय बढ़ाने वाले उस तुमुल कोलाहल में इन्द्र के पुत्र (अर्जुन) ने अत्यन्त प्रसन्न होकर दाशार्ह (कृष्ण) से कहा।

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